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		<title>Gospel Translations Hindi - सदस्य योगदान [hi]</title>
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		<updated>2026-04-07T07:45:46Z</updated>
		<subtitle>विकिपीडिया, एक मुक्त ज्ञानकोष से</subtitle>
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		<title>बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन</title>
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				<updated>2018-07-24T20:34:17Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Parenting with Hope in the Worst of Times}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूं जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, वा रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा। 2 भक्त लोग पृथ्वी पर से नाश हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा; वे सब के सब हत्या के लिये घात लगाते, और जाल लगाकर अपने अपने भाई का आहेर करते हैं। 3 वे अपने दोनों हाथों से मन लगाकर बुराई करते हैं; हाकिम घूस मांगता, और न्यायी घूस लेने को तैयार रहता है, और रईस अपने मन की दुष्टता वर्णन करता है; इसी प्रकार से वे सब मिलकर जालसाज़ी करते हैं। 4 उन में से जो सबसे उत्तम है, वह कटीली झाड़ी के समान दुःखदायी है, जो सबसे सीधा है, वह कांटेवाले बाड़े से भी बुरा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; तेरे पहरुओं का कहा हुआ दिन, अर्थात् तेरे दण्ड का दिन आ गया है। अब वे शीघ्र चैंधिया जाएंगे। 5 मित्र पर विश्वास मत करो, परम मित्र पर भी भरोसा मत रखो; वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना। 6 क्योंकि पुत्र पिता का अपमान करता, और बेटी माता के, और पतोह सास के विरुद्ध उठती है; मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 7 परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूंगा, मैं अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्वर की बाट जोहता रहूंगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा। 8 हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा; और ज्योंही मैं अन्धकार में पड़ूंगा त्योंही यहोवा मेरे लिये ज्योति का काम देगा। 9 मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं उस समय तक उसके क्रोध को सहता रहूंगा जब तक कि वह मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय न चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म देखूंगा। 10 तब मेरी बैरिन जो मुझ से यह कहती है कि तेरा परमेश्वर यहोवा कहां रहा, वह भी उसे देखेगी और लज्जा से मुंह ढांपेगी। मैं अपनी आंखों से उसे देखूंगा; तब वह सड़कों की कीच की नाईं लताड़ी जाएगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 11 तेरे बाड़ों के बान्धने के दिन उसकी सीमा बढ़ाई जायेगी। 12 उस दिन अश्शूर से, और मिस्र के नगरों से, और मिस्र और महानद के बीच के, और समुद्र-समुद्र और पहाड़-पहाड़ के बीच के देशों से लोग तेरे पास आएंगे। 13 तौभी ये देश अपने रहनेवालों के कामों के कारण उजाड़ ही रहेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 14 तू लाठी लिये हुए अपनी प्रजा की चरवाही कर, अर्थात् अपने निज भाग की भेड़-बकरियों की, जो कर्मेल के वन में अलग बैठती हैं; वे पूर्व काल की नाईं बाशान और गिलाद में चरा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 15 जैसे कि मिस्र देश से तेरे निकल आने के दिनों में, वैसे ही अब मैं उसको अद्भुत काम दिखाऊंगा। 16 अन्यजातियां देखकर अपने सारे पराक्रम के विषय में लजाएंगी; वे अपने मुंह को हाथ से छिपाएंगी, और उनके कान बहिरे हो जाएंगे। 17 वे सर्प की नाईं मिट्टी चाटेंगी और भूमि पर रेंगने वाले जन्तुओं की भांति अपने बिलों में से कांपती हुई निकलेंगी; वे हमारे परमेश्वर यहोवा के पास थरथराती हुई आएंगी, और वे तुझ से डरेंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 18 तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है। 19 वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा। 20 तू याकूब के विषय में वह सच्चाई, और इब्राहीम के विषय में वह करुणा पूरी करेगा, जिस की शपथ तू प्राचीनकाल के दिनों से लेकर अब तक हमारे पितरों से खाता आया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज हम आत्मिक लालन-पालन पर एक श्रंखला का समापन करते हैं। इस अन्तिम संदेश के लिए जो शीर्षक मैंने चुना है वो है ‘‘बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन।’’ कोई भी समय ऐसे नहीं हैं जो बच्चों को जन्म देने और पालने के लिए सरल हैं। उत्पत्ति 3 की सारवस्तु ये है कि जैसे ही पाप ने जगत में प्रवेश किया, बच्चे जन्माना और बच्चे पालना बहुत कठिन हो गया। प्रभु ने हव्वा से कहा, ‘‘मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीडि़त होकर बालक उत्पन्न करेगी’’ (उत्पत्ति 3:16)। और उसके और आदम द्वारा दो लड़कों को बड़ा करने के बाद, उन में से एक ने दूसरे को मार डाला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्वतंत्र होने का एकमात्र तरीका ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस कहानी की सारवस्तु ये है कि अब पाप संसार में है — प्रत्येक माता-पिता में और प्रत्येक बच्चे में। और इसी प्रकार की चीज है जो पाप करता है। ये लोगों को बरबाद करता है, और ये परिवारों को बरबाद करता है। संसार में प्रमुख समस्या है, अन्तर्निवास करनेवाले पाप की ताकत। और यह एक ताकत है। यह एक बल है, एक खराबी, एक चरित्रहीनता, मानव प्राण में एक भ्रष्टता। यह स्वतंत्र चुनावों की एक श्रंखला नहीं है। पाप एक शक्तिशाली बन्धुआई है जो मानव स्वतंत्रता को नष्ट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मानव के लिए स्वतंत्र होने का एकमात्र तरीका — एक माता-पिता या एक बच्चे के लिए स्वतंत्र होने का — परमेश्वर के ‘आत्मा’ द्वारा नया जन्म पाना; यीशु मसीह को उद्धारकर्ता के रूप में आलिंगन करना; विश्व के सृष्टिकर्ता द्वारा पाप के लिए क्षमा किया जाना; और पाप की ताकत के एकमात्र प्रतिताकत के रूप में ‘पवित्र आत्मा’ को ग्रहण करना, है। संसार के लिए और माता-पिता और बच्चों के लिए एकमात्र आशा वही है। प्रत्येक युग में यह सदैव सच है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== लालन-पालन के लिए कोई आसान समय नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जन्माने और नम्र, प्रेममय, धर्मी, सृजनात्मक, उत्पादक, मसीह को ऊंचा उठानेवाले वयस्कों में, उनका लालन-पालन के लिए कोई आसान समय नहीं हैं। कोई आसान समय नहीं हैं। अपितु, कुछ समय अन्य समयों से अधिक कठिन होते हैं। और वे अधिक कठिन हैं या नहीं यह आपकी व्यक्तिगत परिस्थितियों या सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर हो सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज मेरी इच्छा है कि बदतर या सबसे खराब परिस्थितियों में आशा के साथ आप माता-पिता की सहायता करूं। और मेरा अर्थ है, घर में बदतर, तथा संस्कृति में बदतर, दोनों। और उनके लिए जो माता-पिता नहीं हैं, प्रत्येक बात जो मैं कहता हूँ, आप पर लागू होती है, क्योंकि बदतर समयों में आशा कैसे रखें, ये हर एक के लिए समान है। विभिन्न कारणों के लिए हमें इसकी आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== भविष्यद्वक्ता मीका ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहूदी भविष्यद्वक्ता मीका ने यहूदा के राजाओं योताम, आहाज और हिजक्यियाह के शासनकालों में प्रचार किया (मीका1:1)। ये लगभग 750 से 687 ईसा पूर्व है। क्यों वह उस दृश्य में आया इसका स्पष्टतम बयान मीका 3:8 में दिया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु मैं तो यहोवा की आत्मा से शक्ति, न्याय और पराक्रम पाकर परिपूर्ण हूं कि मैं याकूब को उसका अपराध और इस्राएल को उसका पाप जता सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== न्याय और दया उद्घोषित करना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा कि लोगों को उनका पाप स्पष्ट कर दें। और उनके पाप के साथ भविष्यद्वक्ताओं ने न्याय उद्घोषित किया, और उन्होंने दया उद्घोषित की। सम्पूर्ण बाइबिल में ये इसी प्रकार से है: न्याय और दया। न्याय और दया। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, और पापमय लोगों पर न्याय पर भेजता है। और परमेश्वर दयापूर्ण और धीरजवन्त और करुणामय है, और पापमय लोगों को ‘उसके’ न्याय से छुड़ाता है। मीका इसे मीका 4:10 में स्पष्ट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे सियोन की बेटी, जच्चा स्त्री की नाईं पीड़ा उठाकर उत्पन्न कर; क्योंकि अब तू गढ़ी में से निकलकर मैदान में बसेगी; वरन बाबुल तक जाएगी। वहीं तू छुड़ाई जाएगी; अर्थात् वहीं यहोवा तुझे तेरे शत्रुओं के वश में से छुड़ा लेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु, ईश्वरीय-दण्ड में उन्हें बाबुल भेजने वाला है। और ‘वह’, दया में उन्हें वापिस उनकी भूमि में लाने वाला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दण्ड आ रहा है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अध्याय 7 में, मीका, बदतर (सबसे खराब) समयों में लालन-पालन का उल्लेख करता है — घर पर बदतर और संस्कृति में बदतर। पद 1: ‘‘हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूं जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, वा रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।’’ हो सकता है कि वह इस बारे में बात कर रहा है कि वह भोजन के लिए कितना निस्सहाय है। किन्तु मुझे संदेह है कि वह भक्तिपूर्ण मित्रों और संगी-साथियों से निस्सहाय होकर, लाक्षणिक रूप से कह रहा है। क्योंकि वह आगे कहता चला जाता है, पद 2-3: ‘‘भक्त लोग पृथ्वी पर से नाश हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा; वे सब के सब हत्या के लिये घात लगाते, और जाल लगाकर अपने अपने भाई का आहेर करते हैं। वे अपने दोनों हाथों से मन लगाकर बुराई करते हैं; हाकिम घूस मांगता, और न्यायी घूस लेने को तैयार रहता है, और रईस अपने मन की दुष्टता वर्णन करता है; इसी प्रकार से वे सब मिलकर जालसाज़ी करते हैं।’’ अगुवे भ्रष्ट हैं। वे षड्यन्त्र (‘‘जालसाज़ी’’) करते हैं कि जितना अधिक वे कर सकते हैं उतनी दुष्टता करें, और इसे अच्छी तरह से करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4: ‘‘उन में से जो सबसे उत्तम है, वह कटीली झाड़ी के समान दुःखदायी है, जो सबसे सीधा है, वह कांटेवाले बाड़े से भी बुरा है।’’ यदि मीका उनके पास जाने का प्रयास करता है, वे उसे चुभते हैं। ‘‘तेरे पहरुओं का कहा हुआ दिन, अर्थात् तेरे दण्ड का दिन आ गया है। अब वे शीघ्र चैंधिया जाएंगे।’’ अतः पहरुआ, जो शत्रु को आता हुआ देखने के लिए नियुक्त किया जाता है — उसका दिन अतिशीघ्र आ रहा है। दण्ड आ रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहाँ तक कि पत्नी और बच्चे ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब मीका इसे संस्कृति से आस-पड़ोस और परिवार में लाता है। पद 5: ‘‘मित्र पर विश्वास मत करो, परम मित्र पर भी भरोसा मत रखो; वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना।’’ दूसरे शब्दों में, पाप और भ्रष्टता और धोखा इतने अधिक व्यापक हैं कि आपको चैकस रहने की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि आपकी पत्नी ही आपको धोखा दे — ‘‘अपनी अर्द्दांगिन से भी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब बच्चों से। पद 6: ‘‘क्योंकि पुत्र पिता का अपमान करता, और बेटी माता के, और पतोह सास के विरुद्ध उठती है; मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं।’’ इस चित्र में पाँच लोग हैं। एक पिता और एक माँ। एक पुत्र और एक पुत्री। और एक बहू। अतः पुत्र विवाहित है। मीका कह चुका है कि पति और पत्नी के मध्य चीजें अनिश्चित हैं (‘‘वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना’’)। और अब वह कहता है कि बेटा, अपने पिता के विरोध में उठ रहा है। और बेटी अपनी माँ के विरोध में उठ रही है, और बहू, माँ के विरोध में बेटी का साथ दे रही है। मीका उन्हें मनुष्य के शत्रु तक कहता है। पद 6 के अन्त में: ‘‘मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं।’’ वह विशेषकर पुत्रों की ओर संकेत कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि बेटियाँ उसकी पत्नी पर अपना बैर-भाव केन्द्रित कर रही हैं। किन्तु उसे चोट पहुँचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये दिल तोड़नेवाला है। आप में से कुछ ठीक इसी स्थिति में रहते हैं। ये बदतर समयों में से एक है। संस्कृति भ्रष्ट है, और विवाह और परिवार संकट में हैं। मीका 7 में यही तस्वीर है। आप में से कुछ के लिए आज वही तस्वीर है। और अन्य लोगों के लिए, ये कल होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु इसे ले आते हैं&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पूर्व कि इस स्थिति में मीका की आशा की ओर, मैं आपको संकेत करूँ, मैं चाहता हूँ कि आप देखें कि यीशु ने इस परिवार के साथ क्या किया जिसका चित्रण पद 6 में किया गया है। मत्ती 10: 34-36 खोलिये। यीशु अपने आगमन के परिणाम का वर्णन करते हैं: ‘‘यह न समझो, कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने को आया हूं; मैं मिलाप कराने को नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूं। {तब ‘वे’ मीका 7: 6 को उपयोग करते हैं।} मैं तो आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उस की मां से, और बहू को उस की सास से अलग कर दूं। मनुष्य के बैरी उसके घर ही के लोग होंगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ वही पाँच लोग हैं, आपके अपने घर में शत्रुओं का वही उल्लेख, किन्तु एक चैंकानेवाला अन्तर। यीशु कहते हैं कि ‘वे’ यह ले आये हैं। पद 35: ‘‘मैं तो आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से … अलग कर दूं।’’ निस्संदेह, ‘उसका’ ये अर्थ नहीं है, कि ‘उसे’ परिवारों को तोड़ना पसन्द है। जो ‘उसका’ अर्थ है वो ये कि शिष्यत्व की ‘उसकी’ मूलभूत बुलाहट, अवश्य ही सम्बन्धों को विच्छेदित किया करती है। एक विश्वास करता है, दूसरा नहीं। एक पिता यीशु का अनुसरण करता है, एक पुत्र नहीं। एक पुत्र यीशु के पीछे चलता है, एक पिता नहीं। एक पुत्री यीशु के पीछे चलती है, एक माँ नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहाँ यीशु क्यों ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु को यहाँ तस्वीर में लाने का अभिप्राय पहिले ये दिखाना है कि मीका के दिनों में परिवार में विघटन, आवश्यक नहीं है कि परिवार में केवल विकार के कारण है। ये परिवार में धार्मिकता के कारण हो सकता है। हर एक चीज ठीक चल रही हो सकती है जब तक कि कोई परमेश्वर के बारे में, और ‘उसकी’ वाचा के बारे में, और ‘उसके’ वचन के बारे में गम्भीर न हो गया हो। तब दोषारोपण उड़ने लगते हैं। ‘‘तुम सोचते हो कि तुम इतना अधिक बेहतर हो, अब, जब कि तुम्हें धर्म मिल गया है! सब ठीक-ठाक था, और अब तुम सोचते हो कि हम शेष लोगों को जुड़ जाना चाहिए।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और इस मूल-पाठ का यीशु द्वारा उपयोग किये जाने, का उल्लेख करने का अन्य कारण है, ये दिखाना कि मीका के दिनों के बारे में कुछ अनोखा नहीं था। यह 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सच था। ये प्रथम शताब्दी ईस्वी सन् में सच था। और यह 21वीं सदी में सच है। किसी के लिए, यह सदैव सबसे खराब समयों में से है, यदि यह आपके के लिए न हो तब भी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन के बारे में, मीका के पास कहने को क्या है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मीका के पास कहने को क्या है: ''टूटे मन के साथ दुस्साहस'' ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह स्वयँ का वर्णन करता है — मुझे संदेह है, एक प्रतीकात्मक पिता और इस्राएल के लोगों के एक प्रतिनिधि के रूप में — और रुख जो वह अपनाता है, वो है एक टूटे मन के साथ निर्भीकता। यही उसका सारतत्व है, जो मैं आपको बदतर समयों में लालन-पालन के बारे में कहना चाहता हूँ। इसे टूटे हृदय की निर्भीकता की मनःस्थिति से कीजिये। और इसे सुनिश्चित करने के लिए कि आप जानते हैं कि ‘‘टूटे मन का’’ से मेरा क्या अर्थ है और ‘‘दुस्साहस’’ से मेरा क्या अर्थ है, हमें पूछने की आवश्यकता है: ''वह किस बारे में टूटे मन का है? और किस आधार पर वह इतना निर्भीक हो सकता है&amp;amp;nbsp;?'' आइये उन दो प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए हम पद 7-9 को देखें। वह किस बारे में टूटे मन का है? और वह इतना निर्भीक कैसे हो सकता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्वयँ-की-धार्मिकता में नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 6 में यह कहने के ठीक बाद कि, ‘‘मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं,’’ वह पद 7 में कहता है, ‘‘परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूंगा, मैं अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्वर की बाट जोहता रहूंगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा।’’ अतः बदतर समयों में हम प्रभु की ओर ताकते हैं। हो सकता है हमने और कहीं ताकने का प्रयास किया हो। कुछ भी काम नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर चीज टूट जाती है। हमने सोचा कि कदाचित् हम परिवार को चलने दे सकते हैं। कदाचित् ये बच्चे हमारे अधिकार में होते कि जिस तरह भी हम चुनें आकृति दें। कदाचित् मात्र विवाह की उचित पुस्तकों द्वारा, गहरा परस्पर भरोसा और आदर और प्रशंसा और स्नेह हमारे अधिकार में होता। और अब। अब, हम प्रभु की ओर ताकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सावधान् रहिये। क्या मीका प्रभु की ओर स्वयँ-की-धार्मिकता में ताक रहा है? ऐसी चीज सम्भव है। क्या वह कह रहा है, ‘‘मैंने हर चीज ठीक की — वो सब जो एक डैडी को करना चाहिए। यदि ये परिवार नहीं चल रहा है, मेरा दिल टूट गया है, किन्तु मैं समस्या नहीं हूँ। वे हैं।’’ क्या इस व्यक्ति की वो मनःस्थिति है? नहीं, ये नहीं है। और मैं आशा करता हूँ कि ये आपकी भी नहीं होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विरुद्ध पाप किया गया, किन्तु हमारे स्वयँ के पाप के प्रति सचेत ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनिये कि वह पद 8 और 9 में क्या कहता है। निर्भीकता और टूटेपन के लिए सुनिये। वह क्यों टूटा हुआ है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा; और ज्योंही मैं अन्धकार में पड़ूंगा त्योंही यहोवा मेरे लिये ज्योति का काम देगा। 9 मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं उस समय तक उसके क्रोध को सहता रहूंगा जब तक कि वह मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय न चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म देखूंगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 9 का आरम्भ मत चूकिये, ‘‘मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं … उसके क्रोध को सहता रहूंगा।’’ इसे देखना पति-पत्नी और माता-पिता के लिए इतना महत्वपूर्ण होने का कारण ये है कि वह इसे वास्तव में ''विरुद्ध पाप किया'' जाने के संदर्भ में कहता है। पद 8 में, वह अपने शत्रु से कहता है (कदाचित् उसका पुत्र या उसकी पत्नी), ‘‘हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर।’’ मुझे मत घूरो। और पद 9 में मध्य में वह कहता है, प्रभु मेरा मुक़दमा लड़ेगा और मेरा न्याय चुकाएगा, मेरे विरोध में नहीं। ‘‘वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म (अंग्रेजी से अनुवाद- दोषनिवारण) देखूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वह जानता है कि उसके विरुद्ध पाप किया जा रहा है। वह जानता है कि उनके कुछ दोषारोपण गलत हैं। वह जानता है कि परमेश्वर उसकी ओर है और उसके विरोध में नहीं। परमेश्वर उसे अन्धियारे से बाहर निकालेगा और उजियाले में लायेगा; ‘वह’ उसे निर्दोष ठहरायेगा। वह इस आत्मविश्वास में और इस दावे में, निर्भीक है। अद्भुत रूप से निर्भीक/दुःसाहसी। जो भी हो, प्रभु के क्रोध और अपने स्वयँ के अन्धियारे के बारे में समझाने के लिए वह जिस बात पर ध्यान खींचता है, वो है उसका स्वयँ का पाप। ‘‘मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं … उसके क्रोध को सहता रहूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इतना टूटे मन का क्यों ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो यहाँ है उस प्रश्न के लिए मेरा उत्तर: ''वह क्यों टूटे मन का है&amp;amp;nbsp;?'' मुख्यतः यह नहीं है कि परिवार में उसके विरुद्ध पाप किया जा रहा है, अपितु यह कि वह पाप करता है। बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन करने की मनःस्थिति, टूटे मन के साथ निर्भीकता की मनःस्थिति है। और टूटा मन होने की स्थिति, सर्वप्रथम उसके स्वयँ के पाप के कारण है, और केवल तब ही उसके विरुद्ध में पाप किये जाने के कारण। ये बड़ा युद्ध है जिसका सामना हम करते हैं। परमेश्वर के अनुग्रह से, क्या हम उस प्रकार की नम्रता को ढूंढेंगे जो हमें, हमारे परिवारों और स्वयँ को, उस तरह से देखने की योग्यता देती है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इतना निर्भीक कैसे ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा प्रश्न: ''वह इतना निर्भीक कैसे हो सकता है, यदि उसने पाप किया है&amp;amp;nbsp;?'' वह उस तरह से कैसे बात कर सकता है जबकि उसका स्वयं का पाप उसके दिमाग में इतना स्पष्ट है? इस प्रकार की दुस्साहस कहाँ से आता है? ‘‘हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा … परमेश्वर मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म/दोषनिवारण देखूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर, अध्याय के अन्त में दिया गया है। और ये तथ्य कि यह सम्पूर्ण पुस्तक में आखिरी चीज के रूप में आता है, और यह कि ये इतना बल देकर आता है, दर्शाता है, कि पुस्तक में यह कितना परम महत्वपूर्ण है — अवश्य ही, सम्पूर्ण बाइबिल में। पद 18-19: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है। वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण कि मीका अपने टूटेपन में इतना निर्भीक है, यह है कि वह परमेश्वर को जानता है। वह जानता है कि परमेश्वर के बारे में वास्तव में अद्भुत और अद्वितीय क्या है। ‘‘तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है?’’ उसका अर्थ है: तेरे समान कोई परमेश्वर नहीं है। तेरे मार्ग, हमारे मार्गों से ऊँचे हैं। तेरे मार्ग संसार में किसी भी देवता से ऊँचे हैं। और तेरी अद्वितीयता क्या है? तू अधर्म को क्षमा करता और अपने लोगों के अपराध को लांघ जाता है। अतः बाइबिल के परमेश्वर के बारे में विशिष्ट अद्वितीयता — और कोई परमेश्वर है ही नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की क्षमा के साथ गहिरे में जाना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब आप, बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन कैसे करते हैं? आप आशा के साथ लालन-पालन कैसे करते हैं जबकि आपका स्वयँ का परिवार, दो के विरोध में तीन और तीन के विरोध में दो, में विभाजित हो? आप प्रभु की ओर ताकते हैं। आप प्रभु को पुकारते हैं (पद 7)। और आप ‘उसे’ दो बहुत गहरी क़ायलियत के साथ पुकारते हैं। एक यह कि आप एक पापी हैं और ये कि आप परमेश्वर से कुछ पाने की योग्यता नहीं रखते। हम आदर्श माता-पिता नहीं रहे हैं। हम ने पाप किया है। और हम मूर्ख या निष्कपट नहीं हैं। हम जानते हैं कि हमारे विरुद्ध भी पाप किया गया है। वरन् हमारे शरीर में हर चीज उसके बारे में सोचना चाहती है। केवल ‘पवित्र आत्मा’ हमें हमारे स्वयँ का पाप दिखा सकता है। केवल ‘पवित्र आत्मा’ हमें हमारे दोष का बोध कराता है। ये एक गहरी क़ायलियत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा यह है, कि हमारे परमेश्वर जैसा कोई परमेश्वर नहीं है, जो अधर्म को क्षमा करता है और अपराध को लांघ जाता है, क्रोध से नरम पड़ जाता है, और करुणा (स्थिर प्रेम) में आनन्दित होता है। हम इसके उतने ही गहराई से क़ायल हैं जितने कि हम इसके क़ायल हैं कि हमने अपने जीवन-साथी के विरुद्ध पाप किया है और ये कि हमने अपने बच्चों के विरुद्ध पाप किया है, और ये कि इस सब में हमने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। क्या आप देखते हैं कि कैसे दोनों महत्वपूर्ण हैं — कैसे वे दोनों साथ काम करते हैं, प्रत्येक, दूसरे की गहराई को सम्भव बनाता है? यदि आप अपने पाप और दोष की अनुभूति नहीं करते, आप परमेश्वर की क्षमा के साथ गम्भीर नहीं होंगे। किन्तु ये विपरीत तरीके से काम करता है, और यह परिवारों में महत्वपूर्ण है: यदि आप परमेश्वर की क्षमा की गहराईयों को नहीं जानते, आप अपने स्वयँ के पाप के साथ गम्भीर नहीं होंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये दो गहरी क़ायलियत, ''टूटे मन की निर्भीकता'' की मनःस्थिति उत्पन्न करती हैं। और बदतर समयों में आशा के साथ लालन -पालन करने की मनःस्थिति, वही है। विरुद्ध में पाप किये जाने के चक्रवात् के बीच, हमारे पाप के लिए ''टूटे हुए'', और ''निर्भीक'' क्योंकि, ‘‘तेरे जैसा क्षमा करनेवाला परमेश्वर कौन है!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== टूटे मन का दुःसाहस — यीशु में तीव्र किया हुआ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और मसीहियों के लिए, इस मनःस्थिति के दोनों अर्द्ध, यीशु को तथा हमारे लिए ‘उस’ ने क्रूस पर क्या किया, जानने के द्वारा, जड़ पकड़ते और तीव्र हो जाते हैं। मीका के लिए, अध्याय 5 में यीशु मात्र एक आशा था: ‘‘हे बेतलेहेम … तुझ में से मेरे लिये एक पुरुष निकलेगा, जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा … वह खड़ा होकर यहोवा की दी हुई शक्ति से … उनकी चरवाही करेगा’’ (मीका 5:2,4)। इस अच्छे चरवाहे ने भेड़ों के लिए अपने प्राण दे दिया (यूहन्ना 10:11)। और जब उसने किया, हमने पहिले से कहीं बढ़कर स्पष्टता के साथ हमारे पाप की विराटता को देखा (जिसके लिए इस सीमा तक दुःख उठाने की आवश्यकता थी) और इसे क्षमा करने के लिए परमेश्वर के संकल्प की महानता। और इस प्रकार टूटी-हृदयता और निर्भीकता तीव्र कर दिये गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, यदि आप बदतर समयों में लालन-पालन कर रहे हैं, अथवा बदतर समयों में लालन-पालन करने के लिए तैयार होना चाहते हैं, अथवा बदतर समयों में मात्र आशा चाहते हैं, मीका की ओर देखें और यीशु की ओर देखें और ये मनःस्थिति रखें&amp;amp;nbsp;: आपके पाप के कारण, टूटापन, और मसीह के कारण निर्भीकता। तब ‘पवित्र आत्मा’ की सामर्थ में — यीशु की ख़ातिर — जितना बन सके, सर्वोत्तम त्रुटिपूर्ण माता-पिता बने रहने पर अपना मन स्थिर कीजिये।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन</title>
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				<updated>2018-07-24T20:33:57Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Parenting with Hope in the Worst of Times}}   &amp;amp;gt; हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया ...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Parenting with Hope in the Worst of Times}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूं जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, वा रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा। 2 भक्त लोग पृथ्वी पर से नाश हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा; वे सब के सब हत्या के लिये घात लगाते, और जाल लगाकर अपने अपने भाई का आहेर करते हैं। 3 वे अपने दोनों हाथों से मन लगाकर बुराई करते हैं; हाकिम घूस मांगता, और न्यायी घूस लेने को तैयार रहता है, और रईस अपने मन की दुष्टता वर्णन करता है; इसी प्रकार से वे सब मिलकर जालसाज़ी करते हैं। 4 उन में से जो सबसे उत्तम है, वह कटीली झाड़ी के समान दुःखदायी है, जो सबसे सीधा है, वह कांटेवाले बाड़े से भी बुरा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; तेरे पहरुओं का कहा हुआ दिन, अर्थात् तेरे दण्ड का दिन आ गया है। अब वे शीघ्र चैंधिया जाएंगे। 5 मित्र पर विश्वास मत करो, परम मित्र पर भी भरोसा मत रखो; वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना। 6 क्योंकि पुत्र पिता का अपमान करता, और बेटी माता के, और पतोह सास के विरुद्ध उठती है; मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 7 परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूंगा, मैं अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्वर की बाट जोहता रहूंगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा। 8 हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा; और ज्योंही मैं अन्धकार में पड़ूंगा त्योंही यहोवा मेरे लिये ज्योति का काम देगा। 9 मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं उस समय तक उसके क्रोध को सहता रहूंगा जब तक कि वह मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय न चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म देखूंगा। 10 तब मेरी बैरिन जो मुझ से यह कहती है कि तेरा परमेश्वर यहोवा कहां रहा, वह भी उसे देखेगी और लज्जा से मुंह ढांपेगी। मैं अपनी आंखों से उसे देखूंगा; तब वह सड़कों की कीच की नाईं लताड़ी जाएगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 11 तेरे बाड़ों के बान्धने के दिन उसकी सीमा बढ़ाई जायेगी। 12 उस दिन अश्शूर से, और मिस्र के नगरों से, और मिस्र और महानद के बीच के, और समुद्र-समुद्र और पहाड़-पहाड़ के बीच के देशों से लोग तेरे पास आएंगे। 13 तौभी ये देश अपने रहनेवालों के कामों के कारण उजाड़ ही रहेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 14 तू लाठी लिये हुए अपनी प्रजा की चरवाही कर, अर्थात् अपने निज भाग की भेड़-बकरियों की, जो कर्मेल के वन में अलग बैठती हैं; वे पूर्व काल की नाईं बाशान और गिलाद में चरा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 15 जैसे कि मिस्र देश से तेरे निकल आने के दिनों में, वैसे ही अब मैं उसको अद्भुत काम दिखाऊंगा। 16 अन्यजातियां देखकर अपने सारे पराक्रम के विषय में लजाएंगी; वे अपने मुंह को हाथ से छिपाएंगी, और उनके कान बहिरे हो जाएंगे। 17 वे सर्प की नाईं मिट्टी चाटेंगी और भूमि पर रेंगने वाले जन्तुओं की भांति अपने बिलों में से कांपती हुई निकलेंगी; वे हमारे परमेश्वर यहोवा के पास थरथराती हुई आएंगी, और वे तुझ से डरेंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 18 तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है। 19 वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा। 20 तू याकूब के विषय में वह सच्चाई, और इब्राहीम के विषय में वह करुणा पूरी करेगा, जिस की शपथ तू प्राचीनकाल के दिनों से लेकर अब तक हमारे पितरों से खाता आया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज हम आत्मिक लालन-पालन पर एक श्रंखला का समापन करते हैं। इस अन्तिम संदेश के लिए जो शीर्षक मैंने चुना है वो है ‘‘बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन।’’ कोई भी समय ऐसे नहीं हैं जो बच्चों को जन्म देने और पालने के लिए सरल हैं। उत्पत्ति 3 की सारवस्तु ये है कि जैसे ही पाप ने जगत में प्रवेश किया, बच्चे जन्माना और बच्चे पालना बहुत कठिन हो गया। प्रभु ने हव्वा से कहा, ‘‘मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीडि़त होकर बालक उत्पन्न करेगी’’ (उत्पत्ति 3:16)। और उसके और आदम द्वारा दो लड़कों को बड़ा करने के बाद, उन में से एक ने दूसरे को मार डाला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्वतंत्र होने का एकमात्र तरीका ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस कहानी की सारवस्तु ये है कि अब पाप संसार में है — प्रत्येक माता-पिता में और प्रत्येक बच्चे में। और इसी प्रकार की चीज है जो पाप करता है। ये लोगों को बरबाद करता है, और ये परिवारों को बरबाद करता है। संसार में प्रमुख समस्या है, अन्तर्निवास करनेवाले पाप की ताकत। और यह एक ताकत है। यह एक बल है, एक खराबी, एक चरित्रहीनता, मानव प्राण में एक भ्रष्टता। यह स्वतंत्र चुनावों की एक श्रंखला नहीं है। पाप एक शक्तिशाली बन्धुआई है जो मानव स्वतंत्रता को नष्ट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मानव के लिए स्वतंत्र होने का एकमात्र तरीका — एक माता-पिता या एक बच्चे के लिए स्वतंत्र होने का — परमेश्वर के ‘आत्मा’ द्वारा नया जन्म पाना; यीशु मसीह को उद्धारकर्ता के रूप में आलिंगन करना; विश्व के सृष्टिकर्ता द्वारा पाप के लिए क्षमा किया जाना; और पाप की ताकत के एकमात्र प्रतिताकत के रूप में ‘पवित्र आत्मा’ को ग्रहण करना, है। संसार के लिए और माता-पिता और बच्चों के लिए एकमात्र आशा वही है। प्रत्येक युग में यह सदैव सच है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== लालन-पालन के लिए कोई आसान समय नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जन्माने और नम्र, प्रेममय, धर्मी, सृजनात्मक, उत्पादक, मसीह को ऊंचा उठानेवाले वयस्कों में, उनका लालन-पालन के लिए कोई आसान समय नहीं हैं। कोई आसान समय नहीं हैं। अपितु, कुछ समय अन्य समयों से अधिक कठिन होते हैं। और वे अधिक कठिन हैं या नहीं यह आपकी व्यक्तिगत परिस्थितियों या सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर हो सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज मेरी इच्छा है कि बदतर या सबसे खराब परिस्थितियों में आशा के साथ आप माता-पिता की सहायता करूं। और मेरा अर्थ है, घर में बदतर, तथा संस्कृति में बदतर, दोनों। और उनके लिए जो माता-पिता नहीं हैं, प्रत्येक बात जो मैं कहता हूँ, आप पर लागू होती है, क्योंकि बदतर समयों में आशा कैसे रखें, ये हर एक के लिए समान है। विभिन्न कारणों के लिए हमें इसकी आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== भविष्यद्वक्ता मीका ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहूदी भविष्यद्वक्ता मीका ने यहूदा के राजाओं योताम, आहाज और हिजक्यियाह के शासनकालों में प्रचार किया (मीका1:1)। ये लगभग 750 से 687 ईसा पूर्व है। क्यों वह उस दृश्य में आया इसका स्पष्टतम बयान मीका 3:8 में दिया गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु मैं तो यहोवा की आत्मा से शक्ति, न्याय और पराक्रम पाकर परिपूर्ण हूं कि मैं याकूब को उसका अपराध और इस्राएल को उसका पाप जता सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== न्याय और दया उद्घोषित करना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने भविष्यद्वक्ताओं को भेजा कि लोगों को उनका पाप स्पष्ट कर दें। और उनके पाप के साथ भविष्यद्वक्ताओं ने न्याय उद्घोषित किया, और उन्होंने दया उद्घोषित की। सम्पूर्ण बाइबिल में ये इसी प्रकार से है: न्याय और दया। न्याय और दया। परमेश्वर पवित्र और धार्मिक है, और पापमय लोगों पर न्याय पर भेजता है। और परमेश्वर दयापूर्ण और धीरजवन्त और करुणामय है, और पापमय लोगों को ‘उसके’ न्याय से छुड़ाता है। मीका इसे मीका 4:10 में स्पष्ट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे सियोन की बेटी, जच्चा स्त्री की नाईं पीड़ा उठाकर उत्पन्न कर; क्योंकि अब तू गढ़ी में से निकलकर मैदान में बसेगी; वरन बाबुल तक जाएगी। वहीं तू छुड़ाई जाएगी; अर्थात् वहीं यहोवा तुझे तेरे शत्रुओं के वश में से छुड़ा लेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु, ईश्वरीय-दण्ड में उन्हें बाबुल भेजने वाला है। और ‘वह’, दया में उन्हें वापिस उनकी भूमि में लाने वाला। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दण्ड आ रहा है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अध्याय 7 में, मीका, बदतर (सबसे खराब) समयों में लालन-पालन का उल्लेख करता है — घर पर बदतर और संस्कृति में बदतर। पद 1: ‘‘हाय मुझ पर! क्योंकि मैं उस जन के समान हो गया हूं जो धूपकाल के फल तोड़ने पर, वा रही हुई दाख बीनने के समय के अन्त में आ जाए, मुझे तो पक्की अंजीरों की लालसा थी, परन्तु खाने के लिये कोई गुच्छा नहीं रहा।’’ हो सकता है कि वह इस बारे में बात कर रहा है कि वह भोजन के लिए कितना निस्सहाय है। किन्तु मुझे संदेह है कि वह भक्तिपूर्ण मित्रों और संगी-साथियों से निस्सहाय होकर, लाक्षणिक रूप से कह रहा है। क्योंकि वह आगे कहता चला जाता है, पद 2-3: ‘‘भक्त लोग पृथ्वी पर से नाश हो गए हैं, और मनुष्यों में एक भी सीधा जन नहीं रहा; वे सब के सब हत्या के लिये घात लगाते, और जाल लगाकर अपने अपने भाई का आहेर करते हैं। वे अपने दोनों हाथों से मन लगाकर बुराई करते हैं; हाकिम घूस मांगता, और न्यायी घूस लेने को तैयार रहता है, और रईस अपने मन की दुष्टता वर्णन करता है; इसी प्रकार से वे सब मिलकर जालसाज़ी करते हैं।’’ अगुवे भ्रष्ट हैं। वे षड्यन्त्र (‘‘जालसाज़ी’’) करते हैं कि जितना अधिक वे कर सकते हैं उतनी दुष्टता करें, और इसे अच्छी तरह से करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4: ‘‘उन में से जो सबसे उत्तम है, वह कटीली झाड़ी के समान दुःखदायी है, जो सबसे सीधा है, वह कांटेवाले बाड़े से भी बुरा है।’’ यदि मीका उनके पास जाने का प्रयास करता है, वे उसे चुभते हैं। ‘‘तेरे पहरुओं का कहा हुआ दिन, अर्थात् तेरे दण्ड का दिन आ गया है। अब वे शीघ्र चैंधिया जाएंगे।’’ अतः पहरुआ, जो शत्रु को आता हुआ देखने के लिए नियुक्त किया जाता है — उसका दिन अतिशीघ्र आ रहा है। दण्ड आ रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहाँ तक कि पत्नी और बच्चे ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब मीका इसे संस्कृति से आस-पड़ोस और परिवार में लाता है। पद 5: ‘‘मित्र पर विश्वास मत करो, परम मित्र पर भी भरोसा मत रखो; वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना।’’ दूसरे शब्दों में, पाप और भ्रष्टता और धोखा इतने अधिक व्यापक हैं कि आपको चैकस रहने की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि आपकी पत्नी ही आपको धोखा दे — ‘‘अपनी अर्द्दांगिन से भी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब बच्चों से। पद 6: ‘‘क्योंकि पुत्र पिता का अपमान करता, और बेटी माता के, और पतोह सास के विरुद्ध उठती है; मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं।’’ इस चित्र में पाँच लोग हैं। एक पिता और एक माँ। एक पुत्र और एक पुत्री। और एक बहू। अतः पुत्र विवाहित है। मीका कह चुका है कि पति और पत्नी के मध्य चीजें अनिश्चित हैं (‘‘वरन अपनी अर्द्दांगिन से भी संभलकर बोलना’’)। और अब वह कहता है कि बेटा, अपने पिता के विरोध में उठ रहा है। और बेटी अपनी माँ के विरोध में उठ रही है, और बहू, माँ के विरोध में बेटी का साथ दे रही है। मीका उन्हें मनुष्य के शत्रु तक कहता है। पद 6 के अन्त में: ‘‘मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं।’’ वह विशेषकर पुत्रों की ओर संकेत कर रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि बेटियाँ उसकी पत्नी पर अपना बैर-भाव केन्द्रित कर रही हैं। किन्तु उसे चोट पहुँचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये दिल तोड़नेवाला है। आप में से कुछ ठीक इसी स्थिति में रहते हैं। ये बदतर समयों में से एक है। संस्कृति भ्रष्ट है, और विवाह और परिवार संकट में हैं। मीका 7 में यही तस्वीर है। आप में से कुछ के लिए आज वही तस्वीर है। और अन्य लोगों के लिए, ये कल होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु इसे ले आते हैं&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पूर्व कि इस स्थिति में मीका की आशा की ओर, मैं आपको संकेत करूँ, मैं चाहता हूँ कि आप देखें कि यीशु ने इस परिवार के साथ क्या किया जिसका चित्रण पद 6 में किया गया है। मत्ती 10: 34-36 खोलिये। यीशु अपने आगमन के परिणाम का वर्णन करते हैं: ‘‘यह न समझो, कि मैं पृथ्वी पर मिलाप कराने को आया हूं; मैं मिलाप कराने को नहीं, पर तलवार चलवाने आया हूं। {तब ‘वे’ मीका 7: 6 को उपयोग करते हैं।} मैं तो आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से, और बेटी को उस की मां से, और बहू को उस की सास से अलग कर दूं। मनुष्य के बैरी उसके घर ही के लोग होंगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ वही पाँच लोग हैं, आपके अपने घर में शत्रुओं का वही उल्लेख, किन्तु एक चैंकानेवाला अन्तर। यीशु कहते हैं कि ‘वे’ यह ले आये हैं। पद 35: ‘‘मैं तो आया हूं, कि मनुष्य को उसके पिता से … अलग कर दूं।’’ निस्संदेह, ‘उसका’ ये अर्थ नहीं है, कि ‘उसे’ परिवारों को तोड़ना पसन्द है। जो ‘उसका’ अर्थ है वो ये कि शिष्यत्व की ‘उसकी’ मूलभूत बुलाहट, अवश्य ही सम्बन्धों को विच्छेदित किया करती है। एक विश्वास करता है, दूसरा नहीं। एक पिता यीशु का अनुसरण करता है, एक पुत्र नहीं। एक पुत्र यीशु के पीछे चलता है, एक पिता नहीं। एक पुत्री यीशु के पीछे चलती है, एक माँ नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहाँ यीशु क्यों ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु को यहाँ तस्वीर में लाने का अभिप्राय पहिले ये दिखाना है कि मीका के दिनों में परिवार में विघटन, आवश्यक नहीं है कि परिवार में केवल विकार के कारण है। ये परिवार में धार्मिकता के कारण हो सकता है। हर एक चीज ठीक चल रही हो सकती है जब तक कि कोई परमेश्वर के बारे में, और ‘उसकी’ वाचा के बारे में, और ‘उसके’ वचन के बारे में गम्भीर न हो गया हो। तब दोषारोपण उड़ने लगते हैं। ‘‘तुम सोचते हो कि तुम इतना अधिक बेहतर हो, अब, जब कि तुम्हें धर्म मिल गया है! सब ठीक-ठाक था, और अब तुम सोचते हो कि हम शेष लोगों को जुड़ जाना चाहिए।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और इस मूल-पाठ का यीशु द्वारा उपयोग किये जाने, का उल्लेख करने का अन्य कारण है, ये दिखाना कि मीका के दिनों के बारे में कुछ अनोखा नहीं था। यह 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सच था। ये प्रथम शताब्दी ईस्वी सन् में सच था। और यह 21वीं सदी में सच है। किसी के लिए, यह सदैव सबसे खराब समयों में से है, यदि यह आपके के लिए न हो तब भी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन के बारे में, मीका के पास कहने को क्या है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मीका के पास कहने को क्या है: ''टूटे मन के साथ दुस्साहस'' ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह स्वयँ का वर्णन करता है — मुझे संदेह है, एक प्रतीकात्मक पिता और इस्राएल के लोगों के एक प्रतिनिधि के रूप में — और रुख जो वह अपनाता है, वो है एक टूटे मन के साथ निर्भीकता। यही उसका सारतत्व है, जो मैं आपको बदतर समयों में लालन-पालन के बारे में कहना चाहता हूँ। इसे टूटे हृदय की निर्भीकता की मनःस्थिति से कीजिये। और इसे सुनिश्चित करने के लिए कि आप जानते हैं कि ‘‘टूटे मन का’’ से मेरा क्या अर्थ है और ‘‘दुस्साहस’’ से मेरा क्या अर्थ है, हमें पूछने की आवश्यकता है: ''वह किस बारे में टूटे मन का है? और किस आधार पर वह इतना निर्भीक हो सकता है&amp;amp;nbsp;?'' आइये उन दो प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए हम पद 7-9 को देखें। वह किस बारे में टूटे मन का है? और वह इतना निर्भीक कैसे हो सकता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== स्वयँ-की-धार्मिकता में नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 6 में यह कहने के ठीक बाद कि, ‘‘मनुष्य के शत्रु उसके घर ही के लोग होते हैं,’’ वह पद 7 में कहता है, ‘‘परन्तु मैं यहोवा की ओर ताकता रहूंगा, मैं अपने उद्धारकर्त्ता परमेश्वर की बाट जोहता रहूंगा; मेरा परमेश्वर मेरी सुनेगा।’’ अतः बदतर समयों में हम प्रभु की ओर ताकते हैं। हो सकता है हमने और कहीं ताकने का प्रयास किया हो। कुछ भी काम नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हर चीज टूट जाती है। हमने सोचा कि कदाचित् हम परिवार को चलने दे सकते हैं। कदाचित् ये बच्चे हमारे अधिकार में होते कि जिस तरह भी हम चुनें आकृति दें। कदाचित् मात्र विवाह की उचित पुस्तकों द्वारा, गहरा परस्पर भरोसा और आदर और प्रशंसा और स्नेह हमारे अधिकार में होता। और अब। अब, हम प्रभु की ओर ताकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सावधान् रहिये। क्या मीका प्रभु की ओर स्वयँ-की-धार्मिकता में ताक रहा है? ऐसी चीज सम्भव है। क्या वह कह रहा है, ‘‘मैंने हर चीज ठीक की — वो सब जो एक डैडी को करना चाहिए। यदि ये परिवार नहीं चल रहा है, मेरा दिल टूट गया है, किन्तु मैं समस्या नहीं हूँ। वे हैं।’’ क्या इस व्यक्ति की वो मनःस्थिति है? नहीं, ये नहीं है। और मैं आशा करता हूँ कि ये आपकी भी नहीं होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विरुद्ध पाप किया गया, किन्तु हमारे स्वयँ के पाप के प्रति सचेत ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनिये कि वह पद 8 और 9 में क्या कहता है। निर्भीकता और टूटेपन के लिए सुनिये। वह क्यों टूटा हुआ है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा; और ज्योंही मैं अन्धकार में पड़ूंगा त्योंही यहोवा मेरे लिये ज्योति का काम देगा। 9 मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं उस समय तक उसके क्रोध को सहता रहूंगा जब तक कि वह मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय न चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म देखूंगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 9 का आरम्भ मत चूकिये, ‘‘मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं … उसके क्रोध को सहता रहूंगा।’’ इसे देखना पति-पत्नी और माता-पिता के लिए इतना महत्वपूर्ण होने का कारण ये है कि वह इसे वास्तव में ''विरुद्ध पाप किया'' जाने के संदर्भ में कहता है। पद 8 में, वह अपने शत्रु से कहता है (कदाचित् उसका पुत्र या उसकी पत्नी), ‘‘हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर।’’ मुझे मत घूरो। और पद 9 में मध्य में वह कहता है, प्रभु मेरा मुक़दमा लड़ेगा और मेरा न्याय चुकाएगा, मेरे विरोध में नहीं। ‘‘वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म (अंग्रेजी से अनुवाद- दोषनिवारण) देखूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वह जानता है कि उसके विरुद्ध पाप किया जा रहा है। वह जानता है कि उनके कुछ दोषारोपण गलत हैं। वह जानता है कि परमेश्वर उसकी ओर है और उसके विरोध में नहीं। परमेश्वर उसे अन्धियारे से बाहर निकालेगा और उजियाले में लायेगा; ‘वह’ उसे निर्दोष ठहरायेगा। वह इस आत्मविश्वास में और इस दावे में, निर्भीक है। अद्भुत रूप से निर्भीक/दुःसाहसी। जो भी हो, प्रभु के क्रोध और अपने स्वयँ के अन्धियारे के बारे में समझाने के लिए वह जिस बात पर ध्यान खींचता है, वो है उसका स्वयँ का पाप। ‘‘मैंने यहोवा के विरुद्ध पाप किया है, इस कारण मैं … उसके क्रोध को सहता रहूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इतना टूटे मन का क्यों ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो यहाँ है उस प्रश्न के लिए मेरा उत्तर: ''वह क्यों टूटे मन का है&amp;amp;nbsp;?'' मुख्यतः यह नहीं है कि परिवार में उसके विरुद्ध पाप किया जा रहा है, अपितु यह कि वह पाप करता है। बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन करने की मनःस्थिति, टूटे मन के साथ निर्भीकता की मनःस्थिति है। और टूटा मन होने की स्थिति, सर्वप्रथम उसके स्वयँ के पाप के कारण है, और केवल तब ही उसके विरुद्ध में पाप किये जाने के कारण। ये बड़ा युद्ध है जिसका सामना हम करते हैं। परमेश्वर के अनुग्रह से, क्या हम उस प्रकार की नम्रता को ढूंढेंगे जो हमें, हमारे परिवारों और स्वयँ को, उस तरह से देखने की योग्यता देती है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इतना निर्भीक कैसे ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा प्रश्न: ''वह इतना निर्भीक कैसे हो सकता है, यदि उसने पाप किया है&amp;amp;nbsp;?'' वह उस तरह से कैसे बात कर सकता है जबकि उसका स्वयं का पाप उसके दिमाग में इतना स्पष्ट है? इस प्रकार की दुस्साहस कहाँ से आता है? ‘‘हे मेरी बैरिन, मुझ पर आनन्द मत कर; क्योंकि ज्योंही मैं गिरूंगा त्योंही उठूंगा … परमेश्वर मेरा मुक़दमा लड़कर मेरा न्याय चुकाएगा। उस समय वह मुझे उजियाले में निकाल ले आएगा, और मैं उसका धर्म/दोषनिवारण देखूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर, अध्याय के अन्त में दिया गया है। और ये तथ्य कि यह सम्पूर्ण पुस्तक में आखिरी चीज के रूप में आता है, और यह कि ये इतना बल देकर आता है, दर्शाता है, कि पुस्तक में यह कितना परम महत्वपूर्ण है — अवश्य ही, सम्पूर्ण बाइबिल में। पद 18-19: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है जो अधर्म को क्षमा करे और अपने निज भाग के बचे हुओं के अपराध को ढांप दे? वह अपने क्रोध को सदा बनाए नहीं रहता, क्योंकि वह करुणा से प्रीति रखता है। वह फिर हम पर दया करेगा, और हमारे अधर्म के कामों को लताड़ डालेगा। तू उनके सब पापों को गहिरे समुद्र में डाल देगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण कि मीका अपने टूटेपन में इतना निर्भीक है, यह है कि वह परमेश्वर को जानता है। वह जानता है कि परमेश्वर के बारे में वास्तव में अद्भुत और अद्वितीय क्या है। ‘‘तेरे समान ऐसा परमेश्वर कहां है?’’ उसका अर्थ है: तेरे समान कोई परमेश्वर नहीं है। तेरे मार्ग, हमारे मार्गों से ऊँचे हैं। तेरे मार्ग संसार में किसी भी देवता से ऊँचे हैं। और तेरी अद्वितीयता क्या है? तू अधर्म को क्षमा करता और अपने लोगों के अपराध को लांघ जाता है। अतः बाइबिल के परमेश्वर के बारे में विशिष्ट अद्वितीयता — और कोई परमेश्वर है ही नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की क्षमा के साथ गहिरे में जाना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब आप, बदतर समयों में आशा के साथ लालन-पालन कैसे करते हैं? आप आशा के साथ लालन-पालन कैसे करते हैं जबकि आपका स्वयँ का परिवार, दो के विरोध में तीन और तीन के विरोध में दो, में विभाजित हो? आप प्रभु की ओर ताकते हैं। आप प्रभु को पुकारते हैं (पद 7)। और आप ‘उसे’ दो बहुत गहरी क़ायलियत के साथ पुकारते हैं। एक यह कि आप एक पापी हैं और ये कि आप परमेश्वर से कुछ पाने की योग्यता नहीं रखते। हम आदर्श माता-पिता नहीं रहे हैं। हम ने पाप किया है। और हम मूर्ख या निष्कपट नहीं हैं। हम जानते हैं कि हमारे विरुद्ध भी पाप किया गया है। वरन् हमारे शरीर में हर चीज उसके बारे में सोचना चाहती है। केवल ‘पवित्र आत्मा’ हमें हमारे स्वयँ का पाप दिखा सकता है। केवल ‘पवित्र आत्मा’ हमें हमारे दोष का बोध कराता है। ये एक गहरी क़ायलियत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा यह है, कि हमारे परमेश्वर जैसा कोई परमेश्वर नहीं है, जो अधर्म को क्षमा करता है और अपराध को लांघ जाता है, क्रोध से नरम पड़ जाता है, और करुणा (स्थिर प्रेम) में आनन्दित होता है। हम इसके उतने ही गहराई से क़ायल हैं जितने कि हम इसके क़ायल हैं कि हमने अपने जीवन-साथी के विरुद्ध पाप किया है और ये कि हमने अपने बच्चों के विरुद्ध पाप किया है, और ये कि इस सब में हमने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। क्या आप देखते हैं कि कैसे दोनों महत्वपूर्ण हैं — कैसे वे दोनों साथ काम करते हैं, प्रत्येक, दूसरे की गहराई को सम्भव बनाता है? यदि आप अपने पाप और दोष की अनुभूति नहीं करते, आप परमेश्वर की क्षमा के साथ गम्भीर नहीं होंगे। किन्तु ये विपरीत तरीके से काम करता है, और यह परिवारों में महत्वपूर्ण है: यदि आप परमेश्वर की क्षमा की गहराईयों को नहीं जानते, आप अपने स्वयँ के पाप के साथ गम्भीर नहीं होंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये दो गहरी क़ायलियत, ''टूटे मन की निर्भीकता'' की मनःस्थिति उत्पन्न करती हैं। और बदतर समयों में आशा के साथ लालन -पालन करने की मनःस्थिति, वही है। विरुद्ध में पाप किये जाने के चक्रवात् के बीच, हमारे पाप के लिए ''टूटे हुए'', और ''निर्भीक'' क्योंकि, ‘‘तेरे जैसा क्षमा करनेवाला परमेश्वर कौन है!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== टूटे मन का दुःसाहस — यीशु में तीव्र किया हुआ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और मसीहियों के लिए, इस मनःस्थिति के दोनों अर्द्ध, यीशु को तथा हमारे लिए ‘उस’ ने क्रूस पर क्या किया, जानने के द्वारा, जड़ पकड़ते और तीव्र हो जाते हैं। मीका के लिए, अध्याय 5 में यीशु मात्र एक आशा था: ‘‘हे बेतलेहेम … तुझ में से मेरे लिये एक पुरुष निकलेगा, जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा … वह खड़ा होकर यहोवा की दी हुई शक्ति से … उनकी चरवाही करेगा’’ (मीका 5:2,4)। इस अच्छे चरवाहे ने भेड़ों के लिए अपने प्राण दे दिया (यूहन्ना 10:11)। और जब उसने किया, हमने पहिले से कहीं बढ़कर स्पष्टता के साथ हमारे पाप की विराटता को देखा (जिसके लिए इस सीमा तक दुःख उठाने की आवश्यकता थी) और इसे क्षमा करने के लिए परमेश्वर के संकल्प की महानता। और इस प्रकार टूटी-हृदयता और निर्भीकता तीव्र कर दिये गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, यदि आप बदतर समयों में लालन-पालन कर रहे हैं, अथवा बदतर समयों में लालन-पालन करने के लिए तैयार होना चाहते हैं, अथवा बदतर समयों में मात्र आशा चाहते हैं, मीका की ओर देखें और यीशु की ओर देखें और ये मनःस्थिति रखें&amp;amp;nbsp;: आपके पाप के कारण, टूटापन, और मसीह के कारण निर्भीकता। तब ‘पवित्र आत्मा’ की सामर्थ में — यीशु की ख़ातिर — जितना बन सके, सर्वोत्तम त्रुटिपूर्ण माता-पिता बने रहने पर अपना मन स्थिर कीजिये।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>हमने उसकी महिमा देखी, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण</title>
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				<updated>2018-07-03T15:04:51Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;हमने उसकी महिमा देखी, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|We Beheld His Glory, Full of Grace and Truth}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और वचन देहधारी हुआ&amp;amp;nbsp;; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा। 15 (यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, कि ‘‘यह वही है, जिस का मैंने वर्णन किया, कि ‘जो मेरे बाद आ रहा है, वह मुझ से बढ़कर है क्योंकि वह मुझ से पहले था।’’) 16 क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह। 17 इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा कि द्वारा दी गई&amp;amp;nbsp;; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। 18 परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अनुच्छेद के प्रमुख बिन्दु को देखने के लिए, आइये हम पद 14 पर आरम्भ करें ‘‘और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ ये स्मरण करने के लिए कि ‘‘वचन’’ किसे संकेत करता है, पद 1 पर वापस जाइये। ‘‘आदि में ‘वचन’ था, और ‘वचन’ परमेश्वर के साथ था, और ‘वचन’ परमेश्वर था।’’ (यूहन्ना 1: 1) अतः ‘वचन’, परमेश्वर-पुत्र की ओर संकेत करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं पुत्र शब्द का उपयोग करता हूँ, क्योंकि यह शब्द यहाँ पद 14 में उपयोग किया गया है: ‘‘और ‘वचन’ देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र ) की महिमा।’’ अतः ‘वचन’, परमेश्वर का ‘पुत्र’ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक परमेश्वर , तीन व्यक्ति ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुसलमान, इस शब्द पुत्र पर ठोकर खाते हैं, जैसे कि कई अन्य भी। उन में से कुछ सोचते हैं कि हमारा अर्थ है कि परमेश्वर ने मरियम के साथ सम्भोग किया और एक पुत्र उत्पन्न किया। बाइबल का जो अर्थ है, वो यह नहीं है। यूहन्ना 1: 1 कहता है, ‘‘आदि में ‘वचन’ था।’’ वो परमेश्वर का पुत्र है। और उसका कोई आरम्भ नहीं हुआ। आदि में ‘वह’ था। जितना भी पीछे आप जा सकते हैं--सनातन काल तक, ‘वह’ वहाँ था। और पद 3 कहता है, ‘‘सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।’’ इसका अर्थ है कि ‘वह’ बनाया नहीं गया। ‘वह’ किसी भी तरह से सृष्टि का हिस्सा नहीं है। अतः हम परमेश्वर के ‘पुत्र’ के बारे में जो भी जानते हैं, वो यह है: 1) ‘वह’ परमेश्वर है। 2) पिता भी परमेश्वर है। 3) ‘पुत्र’, पिता नहीं है; ‘वह’ पिता के साथ था। 4) ‘वह’ स्वयंभू/असृजित और सनातन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रियेक परमेश्वर की धर्मशिक्षा—यह है कि परमेश्वर, एक परमेश्वर तीन व्यक्ति, पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के रूप में विद्यमान रहता है, के बारे में बहुत कुछ कहना शेष है। किन्तु अभी के लिए उतना ही अपने दिमाग और हृदय में रखिये। ‘पु़त्र’ और ‘पिता’ एक परमेश्वर हैं, लेकिन वे दो व्यक्ति हैं। उनका एक ईश्वरीय स्वभाव है। चेतना के दो केन्द्रों के साथ वे एक परमेश्वर हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर, मनुष्य बना--परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, पद 14 क्या कहता है--और इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से ये एक है--यह कि ‘वचन’, ‘पुत्र’, मानव बना, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना। यही है जिसे हम दो सप्ताहों में देख रहे होंगे: हम कैसे जानते हैं कि मामला यही है, और व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘‘वचन’ देहधारी हुआ।’’ अर्थात्, ईश्वरीय ‘वचन’, परमेश्वर का ईश्वरीय ‘पुत्र’, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना एक मानव बना। हम इसे कैसे जानें&amp;amp;nbsp;? और इसका हमारे लिए क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? पद 14 से इसका उत्तर देने में हम आज का हमारा सम्पूर्ण समय खर्च करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन . . . हमारे बीच में डेरा किया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वरीय ‘वचन’ ने जब ‘वह’ मानव बना, ईश्वरीय ‘वचन’ बने रहना बन्द नहीं किया, हमारे यह कहने का पहला कारण, पद 14 का कथन है कि ‘वचन’ ने ‘‘हमारे बीच में डेरा किया’’। क्रिया, डेरा किया का कर्ता, ‘वचन’ है। और ‘वचन’, परमेश्वर है। अतः इसे समझने का सर्वाधिक स्वभाविक तरीका है कि परमेश्वर ने, ‘वचन’ ने, हमारे मध्य डेरा किया। यही कारण है कि स्वर्गदूत ने मत्ती 1: 23 में कहा, ‘‘देखो एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल (जिस का अर्थ यह है परमेश्वर हमारे साथ ) रखा जाएगा’’। ‘वचन’ ने, ‘पुत्र’ ने, जब ‘वह’ मनुष्य बना, परमेश्वर बने रहना बन्द नहीं किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== महिमा, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा कारण कि हम यह विश्वास करते हैं, पद 14 में अगला वाक्यांश है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ किसकी महिमा&amp;amp;nbsp;? ‘वचन’ की महिमा--‘वचन’ जो परमेश्वर है। और ये महिमा किस प्रकार की है&amp;amp;nbsp;? यह है, ‘‘पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब यूहन्ना कहता है कि देहधारी ‘वचन’ की महिमा, ‘‘जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा,’’ तो क्या इस शब्द जैसी का अर्थ है कि ये एक नकली/प्रतिलिपि महिमा है&amp;amp;nbsp;? क्या यह ‘पुत्र’ की वास्तविक महिमा नहीं अपितु मात्र ‘पुत्र’ के जैसी महिमा है&amp;amp;nbsp;? मैं ऐसा नहीं सोचता। उदाहरण के लिए, यदि मैं कहता हूँ, ‘‘मेरे पास देने के लिए एक पुस्तक है, और मेरे प्रथम चुनाव के जैसा, मैं इसे आप को देना चाहूँगा,’’ आप प्रत्युत्तर नहीं देते, कि ‘‘मैं वास्तव में आपका प्रथम चुनाव नहीं हूँ; मैं मात्र आपके प्रथम चुनाव जैसा हूँ।’’ नहीं। जैसा का ये अर्थ नहीं होता, जब मैं कहता हूँ ‘‘मैं आपको इसे प्रथम चुनाव जैसा देना चाहता हूँ।’’ इसका अर्थ होता है: मैं इसे आपको देता हूँ क्योंकि आप वास्तव में मेरा प्रथम चुनाव हैं। जब यूहन्ना कहता है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा’’, उसका अर्थ है, ‘‘हमने उसकी महिमा देखी है, महिमा जैसी कि वो वास्तव में है--परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम यह जानते हैं क्योंकि पुनः, पद 14 के प्रथम भाग में, यूहन्ना सरलता से और स्पष्टवादिता के साथ कहता है, ‘‘हमने उसकी महिमा देखी’’ --कोई कमी नहीं। किसकी महिमा&amp;amp;nbsp;? सनातन ‘वचन’, ‘पुत्र’ की महिमा। ‘‘वचन देहधारी हुआ; और . . . हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की . . . महिमा देखी।’’ अतः देहधारण के चमत्कार को घटाया नहीं गया है। ‘वचन’ देहधारी हुआ, और उसने ऐसा, परमेश्वर बने रहना बन्द करके नहीं किया। ‘वह’ परमेश्वर की महिमा प्रगट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे लिए इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह विश्वास करने के लिए कि ‘वचन’, परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना, देहधारी हुआ, 15-18 आयतें और भी कारण देती हैं। प्रभु चाहे तो, हम उसमें अगले सप्ताह जायेंगे। किन्तु अभी के लिए, आइये हम पद 14 में पूछें कि इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ--कि परमेश्वर का ‘पुत्र’, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना मानव बना। मैं यह प्रश्न क्यों पूछता हूँ&amp;amp;nbsp;? प्रथम, क्योंकि मूल-पाठ इसका उत्तर देता है। लेकिन एक अन्य कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सम्बन्धात्मक संस्कृति का संवर्धन करना (बढ़ावा देना) ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या आपको स्मरण है कि दो माह पूर्व, मैंने कई संदेशों द्वारा उपदेश दिया था, परमेश्वर से याचना करते हुए, कि ‘वह’ उनका उपयोग वो विकसित करने के लिए करें, जिसे मैं हमारी कलीसिया की सम्बन्धात्मक संस्कृति कहता हूँ। मैंने समझाया कि फिलिप्पियों 2: 3-4 का उद्धरण देने से मेरा तात्पर्य क्या था: ‘‘विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे।’’ दूसरे शब्दों में, आइये हम एक कलीसिया के रूप में इस तरह से विकास करें कि हम अपने स्वयँ से बाहर जायें और दूसरों की सेवा करें और दूसरों की रुचियों की चिन्ता करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और क्या आपको याद है कि उस सेवक, सम्बन्धात्मक मनो-विचार का आधार क्या था&amp;amp;nbsp;? अगली आयत ने स्पष्ट किया: ‘‘जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिस ने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।’’ (फिलिप्पियों 2:5-7)। दूसरे शब्दों में, दीन, सेवक, प्रेम की नींव-- और बैतलहम में नवीनीकृत सम्बन्धात्मक संस्कृति थी: ‘वचन’ देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया—और हमारे लिए मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== देहधारण और प्रासंगिकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘मेरा इसे उल्लेख करने का कारण ये है, ताकि हम न कहें, ‘‘ठीक है, हमने पिछले ग्रीष्म में थोड़ा सम्बन्धात्मक पर जोर दिया, और अब हम धर्मविज्ञान में हैं।’’ नहीं। एकमात्र धर्मविज्ञान जिसका कोई मूल्य है, फिलिप्पियों-2 प्रकार की है, जो कि ठीक यूहन्ना-रचित-सुसमाचार प्रकार की है। यह हमें ख्रीष्ट (मसीह), और मसीह में महिमा को जानने में, और प्रेम के कारण मसीह के द्वारा रूपान्तरित होने में, सहायता करता है (13: 34; 15: 12)--जिसका अर्थ है कि यह हमारी कलीसिया को सम्बन्धात्मक रूप से रूपान्तरित कर देता है। यह हमें और अधिक प्रेमी, और अधिक सहायता करने वाला, और अधिक सेवक-समान, कम घमण्डी, कम स्वार्थी, कम अन्तर्मुखी, दूसरों की अधिक चिन्ता करने वाला, बनाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जब मैं कहता हूँ , ‘‘हम पद 14 को तब तक न छोड़ें जब तक कि हम ये पूछते हैं कि इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ,’’ आप उस प्रश्न के पीछे कुछ हृदयस्पन्दन सुन सकते हैं। मेरी एक आँख सदैव इस पर रहती है कि ये महान धर्मविज्ञान हमारे व्यक्तिगत और सम्बन्धात्मक जीवनों के लिए क्या अन्तर लाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु में हम परमेश्वर की महिमा देखते हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ। पद 14 कहता है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण महिमा।’’ इसका अर्थ है कि यीशु मसीह में हम परमेश्वर की महिमा देख सकते हैं। और इसका अर्थ है कि परमेश्वर की महिमा जो यीशु में प्रगट हुई, हमें हमारे पाप में भस्म नहीं कर देती। इसके अलावा, यह ‘‘अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण’’ है। अर्थात्, मसीह में परमेश्वर की महिमा, ‘उसकी’ सच्चाई, ‘उसकी’ विश्वासयोग्यता से स्वयं के प्रति समझौता किये बिना, हमारे प्रति ‘उसका’ अनुग्रहकारी स्वभाव है। और ये अनुग्रहकारी स्वभाव बहुत, बहुत महान है। इसी कारण वह परिपूर्ण शब्द का उपयोग करता है--शब्द परिपूर्ण, महिमा को रूपान्तरित करता है। परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा, परमेश्वर की सच्चाई से समझौता किये बिना, हम पापियों के प्रति अनुग्रहकारिता से भरी हुई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह से परिपूर्ण . . . ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सचमुच शुभ संदेश है। परमेश्वर, एक न्यायी और दण्डित करने वाले के रूप में देहधारी होने का, चुनाव कर सकता था। और हम सब ‘उसके’ सम्मुख दोषी पाये जाते और सदाकाल के दण्ड की दण्डाज्ञा पाते। लेकिन ‘वह’ उस तरह से देहधारी नहीं हुआ। ‘वचन’, ‘पुत्र’, जो परमेश्वर है, देहधारी हुआ कि एक ईश्वरीय महिमा प्रगट करे जो ‘‘अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण’’ है। परमेश्वर का ‘वचन’ देह बना कि हमारे प्रति अनुग्रहकारी हो। ‘वचन’ देह बना ताकि हमारे प्रति ये अनुग्रह- कारिता, परमेश्वर की सच्चाई के अनुरूप आये। ये अनुग्रह की निरर्थक, असैद्धान्तिक, भावनात्मकता नहीं रहेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक धार्मिक, परमेश्वर को ऊँचा उठाने वाला, मूल्यवान अनुग्रह रहेगा। यह सीधे क्रूस पर यीशु की मृत्यु की ओर ले जायेगा। वास्तव में, यही कारण था कि ‘वह’ देह बना (देहधारी हुआ)। ‘उसके’ पास देह होनी ही थी ताकि मर सके। ‘उसे’ मानव होना ही था ताकि हमारे स्थान पर, एक परमेश्वर-मनुष्य के रूप में मर सके (इब्रानियों 2: 14-15)। ‘वचन’ देह बना ताकि यीशु मसीह की मृत्यु सम्भव हो सके। क्रूस वो स्थान है जहाँ अनुग्रह सर्वाधिक दीप्तिमय (चमकीला/सुस्पष्ट) दिखता है। यह वहाँ पूरा किया गया और खरीदा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== और सच्चाई से . . . ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और कारण कि ये मृत्यु के द्वारा हुआ, यह है कि परमेश्वर का ‘पुत्र’ अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है। परमेश्वर हमारे प्रति अनुग्रहकारी और स्वयं के प्रति ईमानदार है। इसलिए, जब ‘उसका’ ‘पुत्र’ आता है, ‘वह’ अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है। जब मसीह मरा, परमेश्वर स्वयं के प्रति ईमानदार था, क्योंकि पाप दण्डित किया गया। और जब मसीह मरा, परमेश्वर हमारे प्रति अनुग्रहकारी था, क्योंकि मसीह ने दण्ड उठाया, हमने नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘वचन देहधारी हुआ’’ का हमारे लिए अर्थ है कि परमेश्वर की महिमा इतिहास में प्रगट की गई, जैसी कि पहले कभी नहीं की गई, यथा (अर्थात्), अनुग्रह की परिपूर्णता में और सच्चाई की परिपूर्णता में, जो पापियों के लिए यीशु की मृत्यु में सर्वाधिक दीप्ति के साथ चमकती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आत्मिक सुन्दरता देखना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ सावधान रहिये कि आप यह न कहें, ‘‘अच्छा, मैं ‘उसे’ देखने के लिए वहाँ नहीं था अतः वह महिमा मेरे देखने के लिए उपलब्ध नहीं है। आप धर्मी प्रकार के लोग, परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा के बारे में वो सब जो आप चाहें, बातें कर सकते हैं, किन्तु ‘वह’ देखने के लिए यहाँ नहीं है।’’ सावधान रहिये। पद 14 में इस महिमा के बारे में ऐसा मत सोचिये कि यह मात्र बाहरी चमक या सुन्दरता है। यीशु भौतिक (शारीरिक) रूप से दीप्तिमय या सुन्दर नहीं था। ‘‘उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते’’ (यशायाह 53: 2)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पद 14 में इस महिमा को आश्चर्यकर्मां का मात्र प्रदर्शन मत सोचिये। ऐसे लोग थे जिन्हों ने आश्चर्यकर्म देखे, जानते थे कि वे वास्तव में हुए, और कुछ भी सुन्दर या महिमामय नहीं देखा। वे ‘उसे’ मार डालना चाहते थे (यूहन्ना 11: 45-48)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहीं, परमेश्वर के ‘पुत्र’ की प्रगट की गई महिमा, ‘वचन’ की महिमा, यीशु मसीह की महिमा, ‘उसके’ प्रथम आगमन में मुख्यतः एक आत्मिक महिमा है, एक आत्मिक सुन्दरता। यह ऐसी चीज नहीं है जो आप शारीरिक आँखों से देखते हैं, अपितु हृदय की आँखों से (इफिसियों 1: 18)। हम उस तरह से देखते हैं जैसा ‘वह’ कहता है, व्यवहार करता और प्रेम करता और मर जाता है, और अनुग्रह के द्वारा, हम एक स्वतः अधिप्रमाणित करने वाली ईश्वरीय महिमा, या सुन्दरता देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह और सच्चाई का अनुपम मिश्रण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 कुरिन्थियों 4: 4 में पौलुस ने इसे इस तरह प्रस्तुत किया, ‘‘उन अविश्वासियों के लिए, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय (मसीह की महिमा के) सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।’’ ‘‘मसीह की महिमा, जो परमेश्वर का प्रतिरूप है,’’ वो वही है जिसे यूहन्ना 1: 14 कहता है ‘‘महिमा जैसी कि पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की, अनुग्रह और सच्चाई परिपूर्ण।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और याद रखिये, पौलुस उन लोगों से बातें कर रहा है जिन्होंने पृथ्वी पर के यीशु को कभी नहीं देखा था, और यूहन्ना अपना सुसमाचार उन लोगों के लिए लिख रहा है जिन्होंने पृथ्वी पर के यीशु को कभी नहीं देखा--हमारे जैसे लोग। यूहन्ना 1: 14 की महिमा और 2 कुरिन्थियों 4: 4 की महिमा, वो महिमा है जिसे, आप जब यीशु की कहानी सुनते हैं, आप आत्मिक रूप से देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको ‘उसे’ शारीरिक रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। यूहन्ना 20: 29 में यीशु ने कहा, ‘‘धन्य हैं वे जिन्हों ने बिना देखे विश्वास किया।’’ आप ‘उस’ से यूहन्ना के सुसमाचार और बाइबल के अन्य लेखों में मिलते हैं। और जब आप ‘उस’ से ‘उसके’ शब्दों और कार्यों की इन प्रेरणामय कहानियों के द्वारा मिलते हैं, ‘उसकी’ महिमा चमक उठती है--अनुग्रह और सच्चाई के अनुपम मिश्रण की वो स्वतः अधिप्रमाणित करने वाली सुन्दरता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार के द्वारा नया जन्म ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह कोई संयोग नहीं है कि 12-13 आयतें नया जन्म पाने का वर्णन करती हैं, और पद 14 परमेश्वर के पुत्र की महिमा देखे जाने का वर्णन करती है। 12-14 आयतें: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4 याद रखिये: ‘‘उस में जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।’’ जब नया आत्मिक जीवन दिया जाता है, नयी ज्योति आती है। यह ज्योति कोई भौतिक प्रकाश नहीं है। यह परमेश्वर के पुत्र की महिमा की आत्मिक चमक है, जिसका उल्लेख पद 14 में किया गया है। इसी प्रकार हम इसे देख पाते हैं! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हमें यह नया आत्मिक जीवन कैसे मिलता है&amp;amp;nbsp;? पद 13 कहता है, यह तब होता है जब हम मनुष्य के द्वारा नहीं, परमेश्वर द्वारा जन्म लेते हैं। यह नया जन्म पाने के द्वारा होता है। इसी प्रकार से हम विश्वास में आते हैं और मसीह को ग्रहण करते हैं और परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं (यूहन्ना 1: 12)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुसमाचार के द्वारा--यीशु के बचाने वाले कार्यों और शब्दों की कहानी सुनने के द्वारा--परमेश्वर हमारे अन्दर आत्मिक जीवन उत्पन्न करता है। हम सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं(1 पतरस 1: 23-25)। और वो नया आत्मिक जीवन, मसीह की महिमा की ज्योति देखता है (यूहन्ना 1&amp;amp;nbsp;:4)। यह इस तरह तुरन्त होता है। इसी कारण यूहन्ना 8:12 इसे ‘‘जीवन की ज्योति’’ कहता है। जब आपको आत्मिक जीवन दिया जाता है, आप आत्मिक महिमा देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== महिमा को देखना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, पद 12 के अनुसार, इसे कहने का दूसरा तरीका है, यह कि यह नया जीवन और दृष्टि, ज्योति में विश्वास करता है और ज्योति को, यीशु मसीह--परमेश्वर के ‘पुत्र’ की सच्चाई और महिमा, के रूप में, ग्रहण करता है। और उस जीवन व ज्योति और विश्वास करने व ग्रहण करने में, पद 12 कहता है, हमें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का अधिकार प्राप्त होता है। अर्थात्, हम परमेश्वर की सन्तान हैं क्योंकि यह जीवन और ज्योति और विश्वास और ग्रहण करना, परमेश्वर के सन्तान होने के लिए हमारे अधिकार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं आपके समक्ष परमेश्वर के देहधारी ‘पुत्र’ को ऊँचा उठाता हूँ: ‘वचन’ देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया, परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना। ‘उसकी’ महिमा देखिये, महिमा जैसी पिता के एकमात्र पुत्र की, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण। ‘उसे’ देखिये, उस महिमा के लिए जो ‘वह’ है, और जीवित रहिये। आमीन।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>हमने उसकी महिमा देखी, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण</title>
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				<updated>2018-07-03T15:03:55Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|We Beheld His Glory, Full of Grace and Truth}}   &amp;amp;gt; और वचन देहधारी हुआ&amp;amp;nbsp;; और अनुग्रह और सच्चाई...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|We Beheld His Glory, Full of Grace and Truth}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और वचन देहधारी हुआ&amp;amp;nbsp;; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा। 15 (यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, कि ‘‘यह वही है, जिस का मैंने वर्णन किया, कि ‘जो मेरे बाद आ रहा है, वह मुझ से बढ़कर है क्योंकि वह मुझ से पहले था।’’) 16 क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात् अनुग्रह पर अनुग्रह। 17 इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा कि द्वारा दी गई&amp;amp;nbsp;; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची। 18 परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में है, उसी ने उसे प्रगट किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस अनुच्छेद के प्रमुख बिन्दु को देखने के लिए, आइये हम पद 14 पर आरम्भ करें ‘‘और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ ये स्मरण करने के लिए कि ‘‘वचन’’ किसे संकेत करता है, पद 1 पर वापस जाइये। ‘‘आदि में ‘वचन’ था, और ‘वचन’ परमेश्वर के साथ था, और ‘वचन’ परमेश्वर था।’’ (यूहन्ना 1: 1) अतः ‘वचन’, परमेश्वर-पुत्र की ओर संकेत करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं पुत्र शब्द का उपयोग करता हूँ, क्योंकि यह शब्द यहाँ पद 14 में उपयोग किया गया है: ‘‘और ‘वचन’ देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र ) की महिमा।’’ अतः ‘वचन’, परमेश्वर का ‘पुत्र’ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक परमेश्वर , तीन व्यक्ति ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुसलमान, इस शब्द पुत्र पर ठोकर खाते हैं, जैसे कि कई अन्य भी। उन में से कुछ सोचते हैं कि हमारा अर्थ है कि परमेश्वर ने मरियम के साथ सम्भोग किया और एक पुत्र उत्पन्न किया। बाइबल का जो अर्थ है, वो यह नहीं है। यूहन्ना 1: 1 कहता है, ‘‘आदि में ‘वचन’ था।’’ वो परमेश्वर का पुत्र है। और उसका कोई आरम्भ नहीं हुआ। आदि में ‘वह’ था। जितना भी पीछे आप जा सकते हैं--सनातन काल तक, ‘वह’ वहाँ था। और पद 3 कहता है, ‘‘सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।’’ इसका अर्थ है कि ‘वह’ बनाया नहीं गया। ‘वह’ किसी भी तरह से सृष्टि का हिस्सा नहीं है। अतः हम परमेश्वर के ‘पुत्र’ के बारे में जो भी जानते हैं, वो यह है: 1) ‘वह’ परमेश्वर है। 2) पिता भी परमेश्वर है। 3) ‘पुत्र’, पिता नहीं है; ‘वह’ पिता के साथ था। 4) ‘वह’ स्वयंभू/असृजित और सनातन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
त्रियेक परमेश्वर की धर्मशिक्षा—यह है कि परमेश्वर, एक परमेश्वर तीन व्यक्ति, पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के रूप में विद्यमान रहता है, के बारे में बहुत कुछ कहना शेष है। किन्तु अभी के लिए उतना ही अपने दिमाग और हृदय में रखिये। ‘पु़त्र’ और ‘पिता’ एक परमेश्वर हैं, लेकिन वे दो व्यक्ति हैं। उनका एक ईश्वरीय स्वभाव है। चेतना के दो केन्द्रों के साथ वे एक परमेश्वर हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर, मनुष्य बना--परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, पद 14 क्या कहता है--और इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से ये एक है--यह कि ‘वचन’, ‘पुत्र’, मानव बना, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना। यही है जिसे हम दो सप्ताहों में देख रहे होंगे: हम कैसे जानते हैं कि मामला यही है, और व्यक्तिगत रूप से हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘‘वचन’ देहधारी हुआ।’’ अर्थात्, ईश्वरीय ‘वचन’, परमेश्वर का ईश्वरीय ‘पुत्र’, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना एक मानव बना। हम इसे कैसे जानें&amp;amp;nbsp;? और इसका हमारे लिए क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? पद 14 से इसका उत्तर देने में हम आज का हमारा सम्पूर्ण समय खर्च करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन . . . हमारे बीच में डेरा किया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्वरीय ‘वचन’ ने जब ‘वह’ मानव बना, ईश्वरीय ‘वचन’ बने रहना बन्द नहीं किया, हमारे यह कहने का पहला कारण, पद 14 का कथन है कि ‘वचन’ ने ‘‘हमारे बीच में डेरा किया’’। क्रिया, डेरा किया का कर्ता, ‘वचन’ है। और ‘वचन’, परमेश्वर है। अतः इसे समझने का सर्वाधिक स्वभाविक तरीका है कि परमेश्वर ने, ‘वचन’ ने, हमारे मध्य डेरा किया। यही कारण है कि स्वर्गदूत ने मत्ती 1: 23 में कहा, ‘‘देखो एक कुँवारी गर्भवती होगी और एक पुत्र जनेगी और उसका नाम इम्मानुएल (जिस का अर्थ यह है परमेश्वर हमारे साथ ) रखा जाएगा’’। ‘वचन’ ने, ‘पुत्र’ ने, जब ‘वह’ मनुष्य बना, परमेश्वर बने रहना बन्द नहीं किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== महिमा, जैसे पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा कारण कि हम यह विश्वास करते हैं, पद 14 में अगला वाक्यांश है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ किसकी महिमा&amp;amp;nbsp;? ‘वचन’ की महिमा--‘वचन’ जो परमेश्वर है। और ये महिमा किस प्रकार की है&amp;amp;nbsp;? यह है, ‘‘पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब यूहन्ना कहता है कि देहधारी ‘वचन’ की महिमा, ‘‘जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा,’’ तो क्या इस शब्द जैसी का अर्थ है कि ये एक नकली/प्रतिलिपि महिमा है&amp;amp;nbsp;? क्या यह ‘पुत्र’ की वास्तविक महिमा नहीं अपितु मात्र ‘पुत्र’ के जैसी महिमा है&amp;amp;nbsp;? मैं ऐसा नहीं सोचता। उदाहरण के लिए, यदि मैं कहता हूँ, ‘‘मेरे पास देने के लिए एक पुस्तक है, और मेरे प्रथम चुनाव के जैसा, मैं इसे आप को देना चाहूँगा,’’ आप प्रत्युत्तर नहीं देते, कि ‘‘मैं वास्तव में आपका प्रथम चुनाव नहीं हूँ; मैं मात्र आपके प्रथम चुनाव जैसा हूँ।’’ नहीं। जैसा का ये अर्थ नहीं होता, जब मैं कहता हूँ ‘‘मैं आपको इसे प्रथम चुनाव जैसा देना चाहता हूँ।’’ इसका अर्थ होता है: मैं इसे आपको देता हूँ क्योंकि आप वास्तव में मेरा प्रथम चुनाव हैं। जब यूहन्ना कहता है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की महिमा’’, उसका अर्थ है, ‘‘हमने उसकी महिमा देखी है, महिमा जैसी कि वो वास्तव में है--परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम यह जानते हैं क्योंकि पुनः, पद 14 के प्रथम भाग में, यूहन्ना सरलता से और स्पष्टवादिता के साथ कहता है, ‘‘हमने उसकी महिमा देखी’’ --कोई कमी नहीं। किसकी महिमा&amp;amp;nbsp;? सनातन ‘वचन’, ‘पुत्र’ की महिमा। ‘‘वचन देहधारी हुआ; और . . . हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की . . . महिमा देखी।’’ अतः देहधारण के चमत्कार को घटाया नहीं गया है। ‘वचन’ देहधारी हुआ, और उसने ऐसा, परमेश्वर बने रहना बन्द करके नहीं किया। ‘वह’ परमेश्वर की महिमा प्रगट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे लिए इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह विश्वास करने के लिए कि ‘वचन’, परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना, देहधारी हुआ, 15-18 आयतें और भी कारण देती हैं। प्रभु चाहे तो, हम उसमें अगले सप्ताह जायेंगे। किन्तु अभी के लिए, आइये हम पद 14 में पूछें कि इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ--कि परमेश्वर का ‘पुत्र’, परमेश्वर रहना बन्द किये बिना मानव बना। मैं यह प्रश्न क्यों पूछता हूँ&amp;amp;nbsp;? प्रथम, क्योंकि मूल-पाठ इसका उत्तर देता है। लेकिन एक अन्य कारण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सम्बन्धात्मक संस्कृति का संवर्धन करना (बढ़ावा देना) ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या आपको स्मरण है कि दो माह पूर्व, मैंने कई संदेशों द्वारा उपदेश दिया था, परमेश्वर से याचना करते हुए, कि ‘वह’ उनका उपयोग वो विकसित करने के लिए करें, जिसे मैं हमारी कलीसिया की सम्बन्धात्मक संस्कृति कहता हूँ। मैंने समझाया कि फिलिप्पियों 2: 3-4 का उद्धरण देने से मेरा तात्पर्य क्या था: ‘‘विरोध या झूठी बड़ाई के लिए कुछ न करो पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे।’’ दूसरे शब्दों में, आइये हम एक कलीसिया के रूप में इस तरह से विकास करें कि हम अपने स्वयँ से बाहर जायें और दूसरों की सेवा करें और दूसरों की रुचियों की चिन्ता करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और क्या आपको याद है कि उस सेवक, सम्बन्धात्मक मनो-विचार का आधार क्या था&amp;amp;nbsp;? अगली आयत ने स्पष्ट किया: ‘‘जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो। जिस ने परमेश्वर के स्वरूप में होकर भी परमेश्वर के तुल्य होने को अपने वश में रखने की वस्तु न समझा। वरन अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में हो गया।’’ (फिलिप्पियों 2:5-7)। दूसरे शब्दों में, दीन, सेवक, प्रेम की नींव-- और बैतलहम में नवीनीकृत सम्बन्धात्मक संस्कृति थी: ‘वचन’ देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया—और हमारे लिए मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== देहधारण और प्रासंगिकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘मेरा इसे उल्लेख करने का कारण ये है, ताकि हम न कहें, ‘‘ठीक है, हमने पिछले ग्रीष्म में थोड़ा सम्बन्धात्मक पर जोर दिया, और अब हम धर्मविज्ञान में हैं।’’ नहीं। एकमात्र धर्मविज्ञान जिसका कोई मूल्य है, फिलिप्पियों-2 प्रकार की है, जो कि ठीक यूहन्ना-रचित-सुसमाचार प्रकार की है। यह हमें ख्रीष्ट (मसीह), और मसीह में महिमा को जानने में, और प्रेम के कारण मसीह के द्वारा रूपान्तरित होने में, सहायता करता है (13: 34; 15: 12)--जिसका अर्थ है कि यह हमारी कलीसिया को सम्बन्धात्मक रूप से रूपान्तरित कर देता है। यह हमें और अधिक प्रेमी, और अधिक सहायता करने वाला, और अधिक सेवक-समान, कम घमण्डी, कम स्वार्थी, कम अन्तर्मुखी, दूसरों की अधिक चिन्ता करने वाला, बनाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जब मैं कहता हूँ , ‘‘हम पद 14 को तब तक न छोड़ें जब तक कि हम ये पूछते हैं कि इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ,’’ आप उस प्रश्न के पीछे कुछ हृदयस्पन्दन सुन सकते हैं। मेरी एक आँख सदैव इस पर रहती है कि ये महान धर्मविज्ञान हमारे व्यक्तिगत और सम्बन्धात्मक जीवनों के लिए क्या अन्तर लाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु में हम परमेश्वर की महिमा देखते हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इसका हमारे लिए क्या अर्थ है कि ‘वचन’ देहधारी हुआ। पद 14 कहता है, ‘‘हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण महिमा।’’ इसका अर्थ है कि यीशु मसीह में हम परमेश्वर की महिमा देख सकते हैं। और इसका अर्थ है कि परमेश्वर की महिमा जो यीशु में प्रगट हुई, हमें हमारे पाप में भस्म नहीं कर देती। इसके अलावा, यह ‘‘अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण’’ है। अर्थात्, मसीह में परमेश्वर की महिमा, ‘उसकी’ सच्चाई, ‘उसकी’ विश्वासयोग्यता से स्वयं के प्रति समझौता किये बिना, हमारे प्रति ‘उसका’ अनुग्रहकारी स्वभाव है। और ये अनुग्रहकारी स्वभाव बहुत, बहुत महान है। इसी कारण वह परिपूर्ण शब्द का उपयोग करता है--शब्द परिपूर्ण, महिमा को रूपान्तरित करता है। परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा, परमेश्वर की सच्चाई से समझौता किये बिना, हम पापियों के प्रति अनुग्रहकारिता से भरी हुई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह से परिपूर्ण . . . ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सचमुच शुभ संदेश है। परमेश्वर, एक न्यायी और दण्डित करने वाले के रूप में देहधारी होने का, चुनाव कर सकता था। और हम सब ‘उसके’ सम्मुख दोषी पाये जाते और सदाकाल के दण्ड की दण्डाज्ञा पाते। लेकिन ‘वह’ उस तरह से देहधारी नहीं हुआ। ‘वचन’, ‘पुत्र’, जो परमेश्वर है, देहधारी हुआ कि एक ईश्वरीय महिमा प्रगट करे जो ‘‘अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण’’ है। परमेश्वर का ‘वचन’ देह बना कि हमारे प्रति अनुग्रहकारी हो। ‘वचन’ देह बना ताकि हमारे प्रति ये अनुग्रह- कारिता, परमेश्वर की सच्चाई के अनुरूप आये। ये अनुग्रह की निरर्थक, असैद्धान्तिक, भावनात्मकता नहीं रहेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक धार्मिक, परमेश्वर को ऊँचा उठाने वाला, मूल्यवान अनुग्रह रहेगा। यह सीधे क्रूस पर यीशु की मृत्यु की ओर ले जायेगा। वास्तव में, यही कारण था कि ‘वह’ देह बना (देहधारी हुआ)। ‘उसके’ पास देह होनी ही थी ताकि मर सके। ‘उसे’ मानव होना ही था ताकि हमारे स्थान पर, एक परमेश्वर-मनुष्य के रूप में मर सके (इब्रानियों 2: 14-15)। ‘वचन’ देह बना ताकि यीशु मसीह की मृत्यु सम्भव हो सके। क्रूस वो स्थान है जहाँ अनुग्रह सर्वाधिक दीप्तिमय (चमकीला/सुस्पष्ट) दिखता है। यह वहाँ पूरा किया गया और खरीदा गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== और सच्चाई से . . . ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और कारण कि ये मृत्यु के द्वारा हुआ, यह है कि परमेश्वर का ‘पुत्र’ अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है। परमेश्वर हमारे प्रति अनुग्रहकारी और स्वयं के प्रति ईमानदार है। इसलिए, जब ‘उसका’ ‘पुत्र’ आता है, ‘वह’ अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण है। जब मसीह मरा, परमेश्वर स्वयं के प्रति ईमानदार था, क्योंकि पाप दण्डित किया गया। और जब मसीह मरा, परमेश्वर हमारे प्रति अनुग्रहकारी था, क्योंकि मसीह ने दण्ड उठाया, हमने नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘वचन देहधारी हुआ’’ का हमारे लिए अर्थ है कि परमेश्वर की महिमा इतिहास में प्रगट की गई, जैसी कि पहले कभी नहीं की गई, यथा (अर्थात्), अनुग्रह की परिपूर्णता में और सच्चाई की परिपूर्णता में, जो पापियों के लिए यीशु की मृत्यु में सर्वाधिक दीप्ति के साथ चमकती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आत्मिक सुन्दरता देखना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ सावधान रहिये कि आप यह न कहें, ‘‘अच्छा, मैं ‘उसे’ देखने के लिए वहाँ नहीं था अतः वह महिमा मेरे देखने के लिए उपलब्ध नहीं है। आप धर्मी प्रकार के लोग, परमेश्वर के ‘पुत्र’ की महिमा के बारे में वो सब जो आप चाहें, बातें कर सकते हैं, किन्तु ‘वह’ देखने के लिए यहाँ नहीं है।’’ सावधान रहिये। पद 14 में इस महिमा के बारे में ऐसा मत सोचिये कि यह मात्र बाहरी चमक या सुन्दरता है। यीशु भौतिक (शारीरिक) रूप से दीप्तिमय या सुन्दर नहीं था। ‘‘उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते’’ (यशायाह 53: 2)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पद 14 में इस महिमा को आश्चर्यकर्मां का मात्र प्रदर्शन मत सोचिये। ऐसे लोग थे जिन्हों ने आश्चर्यकर्म देखे, जानते थे कि वे वास्तव में हुए, और कुछ भी सुन्दर या महिमामय नहीं देखा। वे ‘उसे’ मार डालना चाहते थे (यूहन्ना 11: 45-48)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहीं, परमेश्वर के ‘पुत्र’ की प्रगट की गई महिमा, ‘वचन’ की महिमा, यीशु मसीह की महिमा, ‘उसके’ प्रथम आगमन में मुख्यतः एक आत्मिक महिमा है, एक आत्मिक सुन्दरता। यह ऐसी चीज नहीं है जो आप शारीरिक आँखों से देखते हैं, अपितु हृदय की आँखों से (इफिसियों 1: 18)। हम उस तरह से देखते हैं जैसा ‘वह’ कहता है, व्यवहार करता और प्रेम करता और मर जाता है, और अनुग्रह के द्वारा, हम एक स्वतः अधिप्रमाणित करने वाली ईश्वरीय महिमा, या सुन्दरता देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह और सच्चाई का अनुपम मिश्रण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 कुरिन्थियों 4: 4 में पौलुस ने इसे इस तरह प्रस्तुत किया, ‘‘उन अविश्वासियों के लिए, जिन की बुद्धि को इस संसार के ईश्वर ने अन्धी कर दी है, ताकि मसीह जो परमेश्वर का प्रतिरूप है, उसके तेजोमय (मसीह की महिमा के) सुसमाचार का प्रकाश उन पर न चमके।’’ ‘‘मसीह की महिमा, जो परमेश्वर का प्रतिरूप है,’’ वो वही है जिसे यूहन्ना 1: 14 कहता है ‘‘महिमा जैसी कि पिता के एकलौते (एकमात्र पुत्र) की, अनुग्रह और सच्चाई परिपूर्ण।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और याद रखिये, पौलुस उन लोगों से बातें कर रहा है जिन्होंने पृथ्वी पर के यीशु को कभी नहीं देखा था, और यूहन्ना अपना सुसमाचार उन लोगों के लिए लिख रहा है जिन्होंने पृथ्वी पर के यीशु को कभी नहीं देखा--हमारे जैसे लोग। यूहन्ना 1: 14 की महिमा और 2 कुरिन्थियों 4: 4 की महिमा, वो महिमा है जिसे, आप जब यीशु की कहानी सुनते हैं, आप आत्मिक रूप से देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको ‘उसे’ शारीरिक रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है। यूहन्ना 20: 29 में यीशु ने कहा, ‘‘धन्य हैं वे जिन्हों ने बिना देखे विश्वास किया।’’ आप ‘उस’ से यूहन्ना के सुसमाचार और बाइबल के अन्य लेखों में मिलते हैं। और जब आप ‘उस’ से ‘उसके’ शब्दों और कार्यों की इन प्रेरणामय कहानियों के द्वारा मिलते हैं, ‘उसकी’ महिमा चमक उठती है--अनुग्रह और सच्चाई के अनुपम मिश्रण की वो स्वतः अधिप्रमाणित करने वाली सुन्दरता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार के द्वारा नया जन्म ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह कोई संयोग नहीं है कि 12-13 आयतें नया जन्म पाने का वर्णन करती हैं, और पद 14 परमेश्वर के पुत्र की महिमा देखे जाने का वर्णन करती है। 12-14 आयतें: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं। वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं। और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4 याद रखिये: ‘‘उस में जीवन था; और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी।’’ जब नया आत्मिक जीवन दिया जाता है, नयी ज्योति आती है। यह ज्योति कोई भौतिक प्रकाश नहीं है। यह परमेश्वर के पुत्र की महिमा की आत्मिक चमक है, जिसका उल्लेख पद 14 में किया गया है। इसी प्रकार हम इसे देख पाते हैं! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हमें यह नया आत्मिक जीवन कैसे मिलता है&amp;amp;nbsp;? पद 13 कहता है, यह तब होता है जब हम मनुष्य के द्वारा नहीं, परमेश्वर द्वारा जन्म लेते हैं। यह नया जन्म पाने के द्वारा होता है। इसी प्रकार से हम विश्वास में आते हैं और मसीह को ग्रहण करते हैं और परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं (यूहन्ना 1: 12)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुसमाचार के द्वारा--यीशु के बचाने वाले कार्यों और शब्दों की कहानी सुनने के द्वारा--परमेश्वर हमारे अन्दर आत्मिक जीवन उत्पन्न करता है। हम सुसमाचार के द्वारा परमेश्वर से उत्पन्न होते हैं(1 पतरस 1: 23-25)। और वो नया आत्मिक जीवन, मसीह की महिमा की ज्योति देखता है (यूहन्ना 1&amp;amp;nbsp;:4)। यह इस तरह तुरन्त होता है। इसी कारण यूहन्ना 8:12 इसे ‘‘जीवन की ज्योति’’ कहता है। जब आपको आत्मिक जीवन दिया जाता है, आप आत्मिक महिमा देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== महिमा को देखना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, पद 12 के अनुसार, इसे कहने का दूसरा तरीका है, यह कि यह नया जीवन और दृष्टि, ज्योति में विश्वास करता है और ज्योति को, यीशु मसीह--परमेश्वर के ‘पुत्र’ की सच्चाई और महिमा, के रूप में, ग्रहण करता है। और उस जीवन व ज्योति और विश्वास करने व ग्रहण करने में, पद 12 कहता है, हमें परमेश्वर की सन्तान कहलाने का अधिकार प्राप्त होता है। अर्थात्, हम परमेश्वर की सन्तान हैं क्योंकि यह जीवन और ज्योति और विश्वास और ग्रहण करना, परमेश्वर के सन्तान होने के लिए हमारे अधिकार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं आपके समक्ष परमेश्वर के देहधारी ‘पुत्र’ को ऊँचा उठाता हूँ: ‘वचन’ देहधारी हुआ और हमारे बीच में डेरा किया, परमेश्वर बने रहना बन्द किये बिना। ‘उसकी’ महिमा देखिये, महिमा जैसी पिता के एकमात्र पुत्र की, अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण। ‘उसे’ देखिये, उस महिमा के लिए जो ‘वह’ है, और जीवित रहिये। आमीन।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नया जन्म में क्या होता है ? (भाग-2)</title>
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				<updated>2018-06-12T20:33:48Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;नया जन्म में क्या होता है ? (भाग-2)&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Happens in the New Birth? Part 2}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2 उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता ।’’ 3 यीशु ने उस को उत्तर दिया; कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकता ।’’ 4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ 5 यीशु ने उत्तर दिया, कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता । 6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है । 8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ 9 नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं&amp;amp;nbsp;?’’ 10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा&amp;amp;nbsp;; ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में क्या होता है, इसके ऊपर पिछले सप्ताह का संदेश हम आज पूरा करते हैं। यूहन्ना 3: 7 में यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, ‘‘अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा&amp;amp;nbsp;; कि ‘तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।’’ और पद 3 में ‘उसने’ नीकुदेमुस से कहा--और हम से भी--कि हमारा अनन्त जीवन हमारे नया जन्म लेने पर निर्भर है। ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ अतः मसीही जीवन में हम किसी पार्श्ववर्ती या वैकल्पिक या कान्तिवर्द्धक बात पर विचार नहीं कर रहे हैं। नया जन्म, कोई श्रृंगार नहीं है जो अन्त्येष्टि करने वाले, मृत देहों को जीवित जैसा दिखाने के प्रयास में करते हैं। नया जन्म, आत्मिक जीवन की सृष्टि है, जीवन की नकल नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रश्न का उत्तर कि ''नया जन्म में क्या होता है''? पिछली बार हमने दो कथनों से आरम्भ किया: 1) नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है और 2) नया जन्म में जो होता है, वो मात्र यीशु में अलौकिकता का समर्थन नहीं है, अपितु, अपने स्वयँ के अन्दर अलौकिकता का अनुभव है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पवित्र आत्मा के द्वारा नया जीवन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस एक फरीसी था और उसके पास धर्म बहुत था। लेकिन उसके पास कोई आत्मिक जीवन नहीं था। और उसने यीशु में परमेश्वर का अलौकिक कार्य देखा, किन्तु उसने परमेश्वर के उस अलौकिक कार्य का अपने अन्दर अनुभव नहीं किया। अतः पिछली बार के हमारे दो बिन्दुओं को एक साथ रखते हुए, जो नीकुदेमुस को आवश्यक था, जैसा यीशु ने कहा, वो था पवित्र आत्मा के द्वारा अलौकिक रूप से प्रदान किया गया नया जीवन। इस नये जीवन को क्या आत्मिक बनाता है और क्या इसे ''अलौकिक* बनाता है, वो ये कि यह, परमेश्वर जो ‘आत्मा’ है ‘उसका’ कार्य है। ये हमारे शरीरिक हृदयों और मस्तिष्कों के स्वाभाविक जीवन से ऊपर है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 6 में यीशु कहते हैं, ‘‘क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।’’ शरीर में एक प्रकार का जीवन होता है। प्रत्येक मानव, एक जीवित शरीर है। किन्तु प्रत्येक मानव, एक जीवित आत्मा नहीं है। एक जीवित आत्मा बनने के लिए या एक आत्मिक जीवन पाने के लिए, यीशु कहते हैं कि हमें ‘‘आत्मा से जन्मा’’ होना अवश्य है। शरीर एक प्रकार का जीवन उत्पन्न करता है। ‘आत्मा’ एक अन्य प्रकार का जीवन उत्पन्न करता है। यदि हमारे पास ये दूसरे प्रकार का जीवन नहीं है, हम परमेश्वर का राज्य नहीं देख पायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु में, आत्मा के द्वारा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछली बार जब हमने बन्द किया तब, हमने दो अति-महत्वपूर्ण बातों को देखा था: नया जन्म का यीशु के साथ सम्बन्ध और नया जन्म का विश्वास के साथ सम्बन्ध। यीशु ने कहा,‘‘मार्ग और सच्चाई (सत्य) और जीवन मैं ही हूँ’’ (यूहन्ना 14:6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रॆरित यूहन्ना ने कहा, ‘‘परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है: और यह जीवन उसके पुत्र में है। जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है&amp;amp;nbsp;; और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है’’ (1 यूहन्ना 5: 11-12)। अतः एक और नया जीवन जिसकी हमें आवश्यकता है, ‘‘पुत्र में है’’--यीशु वो जीवन है। यदि आपके पास ‘वह’ है, आपके पास नया आत्मिक, अनन्त जीवन है। और दूसरी ओर यूहन्ना 6: 63 में यीशु कहते हैं, ‘‘आत्मा तो जीवनदायक है।’’ और जब तक आप ‘''आत्मा’ से न जन्मॆं’'', आप परमेश्वर के राज्य में प्रवॆश नहीं कर सकते (यूहन्ना 3: 5)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर का पुत्र-जो हमारा जीवन है-के साथ जुड़ने के द्वारा हमारे पास जीवन है, और हमारे पास वो जीवन ‘आत्मा’ के कार्य के द्वारा है। इस प्रकार, हमने निष्कर्ष निकाला था, कि पुनरुज्जीवन में ‘आत्मा’ का कार्य, हमें मसीह से संयुक्त करने द्वारा हमें नया जीवन प्रदान करना है। जिस तरह जॉन कैल्विन कहता है, ये है, ‘‘पवित्र आत्मा वो बन्धन है जिसके द्वारा मसीह हमें प्रभावकारी ढंग से स्वयँ से जोड़ता है’’ (इंस्टिट्यूट्स -तृतीय, 1, 1) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विश्वास के द्वारा यीशु के साथ जोड़े गए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और फिर हमने विश्वास के साथ इस तरह सम्बन्ध बनाया। यूहन्ना 20: 31 कहता है, ‘‘ये इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और ''विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।''’’ और 1 यूहन्ना 5: 4 कहता है, ‘‘जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है--हमारा विश्वास है।’’ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ--जय पाने की कुंजी। विश्वास--जय पाने की कुंजी। क्योंकि विश्वास वो माध्यम है जिससे हम परमेश्वर से जन्मने का अनुभव करते हैं। अतः विगत सप्ताह हमने संदेश को इस तरह सारांश किया था: नया जन्म में, ''विश्वास के द्वारा हमें यीशु मसीह से जोड़ने के द्वारा, ‘पवित्र आत्मा’ हमें अलौकिक रीति से नया आत्मिक जीवन देता है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म&amp;amp;nbsp;: एक नयी सृष्टि, पुराने को सुधारना/संशोधित करना नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो अब हमें यह वर्णन करने के तीसरे तरीके पर ले आता है कि नया जन्म में क्या होता है। नया जन्म में जो होता है वो आपके पुराने मानव-स्वभाव की उन्नति या सुधारना नहीं है अपितु एक नये मानव-स्वभाव की सृष्टि है--एक स्वभाव जो वास्तव में ''आप'' हैं, जो क्षमा किया गया और शुद्ध किया गया है; और एक स्वभाव जो वास्तव में नया है, और आपके अन्दर वास करने वाले परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा बनाया जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको उस यात्रा के संक्षिप्त वृत्तान्त में अपने साथ ले चलता हूँ जिससे होकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यूहन्ना 3: 5 में यीशु नीकुदेमुस से कहते हैं, ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ इन दो शब्दों ‘‘जल और आत्मा से’’ से यीशु का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? कुछ मसीही सम्प्रदाय विश्वास करते हैं कि ये पानी के बपतिस्मा का उद्धरण/संकेत है, वो तरीका जिससे ‘पवित्र आत्मा’ हमें मसीह से जोड़ता है। उदाहरण के लिए, एक ‘वेब-साइट’ इसे इस तरह समझाता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पवित्र बपतिस्मा, सम्पूर्ण मसीही जीवन का आधार है, ‘आत्मा’ में जीवन का प्रवेश-द्वार और वो द्वार जो अन्य संस्कारों तक हमारी पहुँच बनाता है। बपतिस्मा के द्वारा हम पाप से स्वतंत्र किये जाते हैं और परमेश्वर के पुत्र के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं; हम मसीह के अंग/सदस्य बन जाते हैं, कलीसिया में सम्मिलित किये जाते और कलीसिया के अभियान में हिस्सेदार हो जाते हैं। ‘‘बपतिस्मा, वचन में जल के द्वारा पुनर्जन्म का संस्कार है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाखों लोगों को ये सिखाया गया है कि उनके बपतिस्मा ने उन्हें नया जन्म दिया है। यदि ये सच नहीं है, तो ये एक विशाल और विश्व-व्यापी त्रासदी है। और मैं विश्वास नहीं करता कि ये सच है। तो फिर यीशु का क्या मतलब है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यूहन्ना 3 में &amp;quot;जल&amp;quot;, बुपतिस्मा का संकेत/ उल्लेख क्यो नहीं है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ विभिन्न कारण हैं कि मैं क्यों सोचता हूँ कि जल का उल्लेख, मसीही-बपतिस्मा का संकेत नहीं है। फिर हम देखेंगे कि प्रसंग हमें कहाँ ले जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) शेष पूरे अध्याय में कही भी बपतिस्मा का उल्लेख नहीं है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहला, यदि यह मसीही-बपतिस्मा का संकेत था और नया जन्म के लिए ये अनिवार्य था, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि यह है, तो ये अजीब प्रतीत होता है कि जो यीशु ने इस अध्याय में हमें ये बताने के लिए कहा कि सनातन जीवन कैसे पायें उसमें यह ग़ायब है। 15 पद: ‘‘जो कोई विश्वास करॆ, उस में अनन्त जीवन पाए।’’ पद 16: ‘‘जो कोई उस पर विश्वास करॆ, वह नाश न हो (होगा), परन्तु अनन्त जीवन पाए।’’ पद 18: ‘‘जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती।’’ यदि बपतिस्मा उतना ही अनिवार्य था, यह विचित्र प्रतीत होगा, यह विश्वास के साथ-साथ व्यक्त नहीं किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) हवा की अनुरुपता/तुल्यरुपता के साथ बपतिस्मा सही नहीं बैठता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा, पद 8 में हवा के साथ तुलना करना अजीब प्रतीत होगा यदि नया जन्म लेना, पानी के बपतिस्मा के संग इतनी मजबूती से जुड़ा हुआ है। यीशु कहते हैं, ‘‘हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई ‘आत्मा’ से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ ये यह कहता हुआ प्रतीत होता है कि पुनरुज्जीवन देने के लिए परमेश्वर, हवा के जैसा ही स्वतंत्र है। किन्तु हर बार जब एक शिशु पर छिड़काव किया जाता है, ऐसा होता है, तो वो सच प्रतीत नहीं होता है। उस मामले में हवा, उस संस्कार द्वारा बहुत सीमित होगी । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3) नीकुदेमुस को यीशु की झिड़की के साथ बपतिस्मा सही नहीं बैठता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा, यदि यीशु मसीह-बपतिस्मा का संकेत कर रहे हैं, तो ये अजीब प्रतीत होता है कि ‘वह’ फरीसी नीकुदेमुस से पद 10 में कहे, ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता&amp;amp;nbsp;?’’ ये बात अर्थपूर्ण है यदि यीशु किसी ऐसी बात का संकेत कर रहे हैं जो पुराना नियम में सिखाया गया हो। लेकिन यदि ‘वह’ एक बपतिस्मा का संकेत कर रहे हैं जो बाद में आयेगा और यीशु के जीवन और मृत्यु से अपना अर्थ लेगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ‘उसने’ नीकुदेमुस को झिड़का होता कि इस्राएल का एक गुरु नहीं समझता कि ‘वह’ क्या कह रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4) नयी वाचा की प्रतिज्ञाओं में जल और आत्मा जुड़े हुए हैं''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, पद 10 में वही बयान हमें कुछ पृष्ठभूमि के लिए पुराना नियम में भेज देता है, और हम क्या पाते हैं कि जल और आत्मा, नयी वाचा की प्रतिज्ञाओं में निकटता से जुड़े हुए हैं, विशेषतया यहेजकेल 36 में। अतः आइये हम एक-साथ वहाँ चलें। इस संदेश के शेष भाग के लिए, यह मूल-पाठ आधार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहेजकेल 36 में जल और आत्मा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहेजकेल भविष्यवाणी कर रहा है कि परमेश्वर अपने लोगों के लिए क्या करेगा, जब ‘वह’ उन्हें बाबुल के निर्वासन से वापस ले आयेगा। इसका आशय मात्र इस्राएल के लोगों की तुलना में बहुत विशाल है, क्योंकि यीशु, ‘नयी वाचा’ को अपने लहु के द्वारा उन सब के लिए सुरक्षित रखने का दावा करता है जो उस में विश्वास रखेंगे (लूका 22: 20)। और यह ‘नयी वाचा’ की प्रतिज्ञाओं का एक बयान है, यिर्मयाह 31: 31 (से आगे) में बयान की गई के ही समान। आइये हम इसे मिलकर पढ़ें। यहेजकेल 36: 24-28: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा, और देशों में से इकट्ठा करूँगा; और तुम को तुम्हारे निज देश में पहुँचा दूँगा। मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा। मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को माँस का हृदय दूँगा। और मैं अपना ‘आत्मा’ तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे। तुम उस देश में बसोगे जो मैं ने तुम्हारे पितरों को दिया था; और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि यही वो परिच्छेद है जो यीशु के शब्दों को उत्पन्न करता हैं, ‘‘जब तक कोई मनुष्य ''जल'' और ''आत्मा'' से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ ‘वह’ किससे कहता है कि, ‘‘तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा’’ (पद 28)&amp;amp;nbsp;? पद 25: उन लोगों से जिन्हें ‘वह’ कहता है, ‘‘मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा।’’ और पद 26: उन लोगों से जिन्हें ‘वह’ कहता है, ‘‘मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा।’’ दूसरे शब्दों में, वो लोग जो राज्य में प्रवेश करेंगे वे हैं जिनके पास एक नयापन है जिसमें सम्मिलित है पुराने का शुद्ध किया जाना और एक नये की सृष्टि। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं ये निष्कर्ष निकालता हूँ कि जब हमारा नया जन्म होता है ‘‘जल और आत्मा’’ हमारे नयेपन के दो पहलुओं की ओर संकेत करते हैं । और वो कारण कि दोनों महत्वपूर्ण हैं ये है: जब हम कहते हैं कि एक नया आत्मा, या एक नया हृदय हमें दिया गया है, हमारा ये अर्थ नहीं कि हम मानव रहना समाप्त कर देते हैं--नैतिक रूप से जवाबदेह हम स्वयं--जो कि हम सदा से रहे हैं। इससे पूर्व कि मेरा नया जन्म हुआ मैं एक मानव-जीव जॉन पाइपर था, और मैं वही मानव जॉन पाइपर नया जन्म के बाद हूँ। वहाँ एक निरन्तरता है। इसी कारण वहाँ शुद्धिकरण का होना अवश्य है। यदि पुराना मानव जॉन पाइपर, पूर्णतया लोप हो गया होता, क्षमा और शुद्धिकरण का पूरा विचार ही असंगत होता। विगत से कुछ भी शेष नहीं बचा होता जिसे क्षमा या शुद्ध किया जाता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम जानते हैं कि बाइबल हमें बताती है कि हमारा पुराना मनुष्यत्व क्रूस पर चढ़ाया गया (रोमियों 6: 6), और यह कि हम मसीह के साथ मर गए (कुलुस्सियों 3: 3), और हमें स्वयँ को ‘‘मरा हुआ समझना’’ (रोमियों 6: 11), और ‘‘पुराने मनुष्यत्व को उतारना’’ (इफिसियों 4:22) है। किन्तु उनमें से किसी का भी ये अर्थ नहीं है कि वही मानव-जीव, जीवन पर्यन्त दृष्टि में नहीं है। इसका अर्थ है कि एक पुराना स्वभाव, एक पुराना चरित्र, या सिद्धान्त, या झुकाव था, जिसे नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आपके नये हृदय, नया आत्मा, नये स्वभाव के बारे में सोचने का तरीका ये है कि यह अब भी आप हैं और इस कारण क्षमा किये जाने और शुद्ध किये जाने की आवश्यकता है--जल का उल्लेख करने में यही मूल बात है। मेरा अपराध/पाप अवश्य ही धोया जाना है। जल से शुद्ध किया जाना उसी का चित्र है। यिर्मयाह 33: 8 इसे इस तरह प्रस्तुत करता है: ‘‘मैं उनको उनके सारे अधर्म और पाप के काम से शुद्ध करूंगा जो उन्हों ने मेरे विरुद्ध किये हैं; और उन्हों ने जितने अधर्म और अपराध के काम मेरे विरुद्ध किये हैं, उन सब को मैं क्षमा करूँगा।’’ अतः जो व्यक्ति हम हैं--जो निरन्तर अस्तित्व में रहता है -अवश्य है कि क्षमा किया जाए, और दोष धो दिया जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया होने की आवश्यकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु क्षमा किया जाना और शुद्धिकरण पर्याप्त नहीं है। मुझे नया होने की आवश्यकता है। मुझे रूपान्तरित किये जाने की आवश्यकता है। मुझे जीवन की आवश्यकता है। मुझे देखने और सोचने और मूल्य आँकने के एक नये तरीके की आवश्यकता है। इसी कारण पद 26 और 27 में यहेजकेल एक नया हृदय और नया आत्मा की बात करता है: ‘‘मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूंगा। और मैं अपना ‘''आत्मा''’ तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन आयतों को समझने का मेरा तरीका ये है: निश्चित ही, पत्थर के हृदय का अर्थ है मृत हृदय जो आत्मिक वास्तविकता के प्रति संवेदनहीन और प्रतिक्रियाहीन था--जैसा कि नया जन्म से पहिले आपका हृदय महसूस कर सकता था। ये आवेग और इच्छा के साथ बहुत सी चीजों के प्रति प्रत्युत्तर दे सकता था। किन्तु आत्मिक सच्चाई और यीशु मसीह की सुन्दरता और परमेश्वर की महिमा और पवित्रता के पथ के प्रति यह पत्थर था। इसी को बदलना है यदि हमें परमेश्वर का राज्य देखना है। अतः नया जन्म में, परमेश्वर पत्थर का हृदय निकाल देता है और मांस का एक हृदय डाल देता है। शब्द ''मांस'' का अर्थ ‘‘मात्र मानव’’ नहीं है जैसा कि ये ''यूहन्ना 3:6'' में अर्थ देता है। इसका अर्थ है, एक निर्जीव पत्थर बने रहने की जगह, कोमल और जीवित और प्रति-क्रियाशील और अनुभूतिपूर्ण। नया जन्म में, मसीह के साथ हमारी मृत, पत्थरीली ऊब,एक हृदय के द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है जो यीशु के महत्व की अनुभूति (आत्मिक रूप से चेतना) करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब जब 26 और 27 आयतों में यहेजकेल कहता है, ‘‘तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा ... मैं ''अपना ‘आत्मा’'' तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे’’, मैं सोचता हूँ कि उसका अर्थ है कि नया जन्म में, परमेश्वर हमारे हृदय में एक जीवित, अलौकिक, आत्मिक जीवन डालता है, और वो नया जीवन—वो नया आत्मा—हमारे नये हृदय को नया आकार और चरित्र देते हुए स्वयँ ‘पवित्र आत्मा’ का कार्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो तस्वीर मेरे दिमाग में है वो यह कि ये नया गर्म, संवेदनशील, प्रतिक्रियाशील, जीवित हृदय मिट्टी के एक नरम लौंदे के समान है, और ‘पवित्र आत्मा’ स्वयँ इसके अन्दर जाता है और अपनी स्वयँ के रूप के अनुरूप इसे आत्मिक, नैतिक आकृति देता है। स्वयँ ‘उसके’ हमारे अन्दर होने के द्वारा, हमारे हृदय और मस्तिष्क ‘उसके’ स्वरूप--लेते हैं, ‘उसका’ आत्मा (तुलना कीजिये, इफिसियों 4: 23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 'उसे ' अपने ख़जाने/निधि के रुप में ग्रहण कीजिए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अब आइये हम पीछे जाकर इन दो सप्ताहों को सारांश करें। नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? नया जन्म में, विश्वास की मार्फत हमें यीशु मसीह से जोड़ने के द्वारा, ‘पवित्र आत्मा’ अलौकिक रूप से हमें नया आत्मिक जीवन देता है। अथवा, इसे दूसरे तरीके से कहें, ‘पवित्र आत्मा’ हमें मसीह के साथ संयोजित करता (जोड़ता) है जहाँ हमारे पापों के लिए शुद्धि है, और ‘वह’ हमारे कठोर, अप्रतिक्रियाशील हृदय को, एक कोमल हृदय से प्रतिस्थापित कर देता है जो यीशु को सब बातों से ऊपर अपने अन्दर संजोता है और जो ‘पवित्र आत्मा’ की उपस्थिति के द्वारा एक ऐसे हृदय में रूपान्तरित हो रहा है जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से प्रेम करता है (यहेजकेल 36: 27)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि वो मार्ग जिससे आप इन सभी का अनुभव करते हैं, विश्वास के द्वारा है, मैं यीशु के नाम में, और ‘उसके’ ‘आत्मा’ की सामर्थ के द्वारा, आपको अभी आमंत्रित करता हूँ, कि आप ‘उसे’ अपने जीवन के पाप-क्षमा करने वाले, रूपान्तरित करने वाले ख़जाने/निधि के रूप में ग्रहण करें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नया जन्म में क्या होता है ? (भाग-2)</title>
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				<updated>2018-06-12T20:33:10Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|What Happens in the New Birth? Part 2}}&amp;lt;br&amp;gt;   &amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था,...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Happens in the New Birth? Part 2}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2 उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता ।’’ 3 यीशु ने उस को उत्तर दिया; कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य नहीं देख सकता ।’’ 4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ 5 यीशु ने उत्तर दिया, कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता । 6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है । 8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ 9 नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं&amp;amp;nbsp;?’’ 10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा&amp;amp;nbsp;; ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में क्या होता है, इसके ऊपर पिछले सप्ताह का संदेश हम आज पूरा करते हैं। यूहन्ना 3: 7 में यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, ‘‘अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा&amp;amp;nbsp;; कि ‘तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।’’ और पद 3 में ‘उसने’ नीकुदेमुस से कहा--और हम से भी--कि हमारा अनन्त जीवन हमारे नया जन्म लेने पर निर्भर है। ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ अतः मसीही जीवन में हम किसी पार्श्ववर्ती या वैकल्पिक या कान्तिवर्द्धक बात पर विचार नहीं कर रहे हैं। नया जन्म, कोई श्रृंगार नहीं है जो अन्त्येष्टि करने वाले, मृत देहों को जीवित जैसा दिखाने के प्रयास में करते हैं। नया जन्म, आत्मिक जीवन की सृष्टि है, जीवन की नकल नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रश्न का उत्तर कि ''नया जन्म में क्या होता है''? पिछली बार हमने दो कथनों से आरम्भ किया: 1) नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है और 2) नया जन्म में जो होता है, वो मात्र यीशु में अलौकिकता का समर्थन नहीं है, अपितु, अपने स्वयँ के अन्दर अलौकिकता का अनुभव है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पवित्र आत्मा के द्वारा नया जीवन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस एक फरीसी था और उसके पास धर्म बहुत था। लेकिन उसके पास कोई आत्मिक जीवन नहीं था। और उसने यीशु में परमेश्वर का अलौकिक कार्य देखा, किन्तु उसने परमेश्वर के उस अलौकिक कार्य का अपने अन्दर अनुभव नहीं किया। अतः पिछली बार के हमारे दो बिन्दुओं को एक साथ रखते हुए, जो नीकुदेमुस को आवश्यक था, जैसा यीशु ने कहा, वो था पवित्र आत्मा के द्वारा अलौकिक रूप से प्रदान किया गया नया जीवन। इस नये जीवन को क्या आत्मिक बनाता है और क्या इसे ''अलौकिक* बनाता है, वो ये कि यह, परमेश्वर जो ‘आत्मा’ है ‘उसका’ कार्य है। ये हमारे शरीरिक हृदयों और मस्तिष्कों के स्वाभाविक जीवन से ऊपर है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 6 में यीशु कहते हैं, ‘‘क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।’’ शरीर में एक प्रकार का जीवन होता है। प्रत्येक मानव, एक जीवित शरीर है। किन्तु प्रत्येक मानव, एक जीवित आत्मा नहीं है। एक जीवित आत्मा बनने के लिए या एक आत्मिक जीवन पाने के लिए, यीशु कहते हैं कि हमें ‘‘आत्मा से जन्मा’’ होना अवश्य है। शरीर एक प्रकार का जीवन उत्पन्न करता है। ‘आत्मा’ एक अन्य प्रकार का जीवन उत्पन्न करता है। यदि हमारे पास ये दूसरे प्रकार का जीवन नहीं है, हम परमेश्वर का राज्य नहीं देख पायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु में, आत्मा के द्वारा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछली बार जब हमने बन्द किया तब, हमने दो अति-महत्वपूर्ण बातों को देखा था: नया जन्म का यीशु के साथ सम्बन्ध और नया जन्म का विश्वास के साथ सम्बन्ध। यीशु ने कहा,‘‘मार्ग और सच्चाई (सत्य) और जीवन मैं ही हूँ’’ (यूहन्ना 14:6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रॆरित यूहन्ना ने कहा, ‘‘परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है: और यह जीवन उसके पुत्र में है। जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है&amp;amp;nbsp;; और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है’’ (1 यूहन्ना 5: 11-12)। अतः एक और नया जीवन जिसकी हमें आवश्यकता है, ‘‘पुत्र में है’’--यीशु वो जीवन है। यदि आपके पास ‘वह’ है, आपके पास नया आत्मिक, अनन्त जीवन है। और दूसरी ओर यूहन्ना 6: 63 में यीशु कहते हैं, ‘‘आत्मा तो जीवनदायक है।’’ और जब तक आप ‘''आत्मा’ से न जन्मॆं’'', आप परमेश्वर के राज्य में प्रवॆश नहीं कर सकते (यूहन्ना 3: 5)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर का पुत्र-जो हमारा जीवन है-के साथ जुड़ने के द्वारा हमारे पास जीवन है, और हमारे पास वो जीवन ‘आत्मा’ के कार्य के द्वारा है। इस प्रकार, हमने निष्कर्ष निकाला था, कि पुनरुज्जीवन में ‘आत्मा’ का कार्य, हमें मसीह से संयुक्त करने द्वारा हमें नया जीवन प्रदान करना है। जिस तरह जॉन कैल्विन कहता है, ये है, ‘‘पवित्र आत्मा वो बन्धन है जिसके द्वारा मसीह हमें प्रभावकारी ढंग से स्वयँ से जोड़ता है’’ (इंस्टिट्यूट्स -तृतीय, 1, 1) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विश्वास के द्वारा यीशु के साथ जोड़े गए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और फिर हमने विश्वास के साथ इस तरह सम्बन्ध बनाया। यूहन्ना 20: 31 कहता है, ‘‘ये इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और ''विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ।''’’ और 1 यूहन्ना 5: 4 कहता है, ‘‘जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है--हमारा विश्वास है।’’ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ--जय पाने की कुंजी। विश्वास--जय पाने की कुंजी। क्योंकि विश्वास वो माध्यम है जिससे हम परमेश्वर से जन्मने का अनुभव करते हैं। अतः विगत सप्ताह हमने संदेश को इस तरह सारांश किया था: नया जन्म में, ''विश्वास के द्वारा हमें यीशु मसीह से जोड़ने के द्वारा, ‘पवित्र आत्मा’ हमें अलौकिक रीति से नया आत्मिक जीवन देता है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म&amp;amp;nbsp;: एक नयी सृष्टि, पुराने को सुधारना/संशोधित करना नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो अब हमें यह वर्णन करने के तीसरे तरीके पर ले आता है कि नया जन्म में क्या होता है। नया जन्म में जो होता है वो आपके पुराने मानव-स्वभाव की उन्नति या सुधारना नहीं है अपितु एक नये मानव-स्वभाव की सृष्टि है--एक स्वभाव जो वास्तव में ''आप'' हैं, जो क्षमा किया गया और शुद्ध किया गया है; और एक स्वभाव जो वास्तव में नया है, और आपके अन्दर वास करने वाले परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा बनाया जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको उस यात्रा के संक्षिप्त वृत्तान्त में अपने साथ ले चलता हूँ जिससे होकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यूहन्ना 3: 5 में यीशु नीकुदेमुस से कहते हैं, ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ इन दो शब्दों ‘‘जल और आत्मा से’’ से यीशु का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? कुछ मसीही सम्प्रदाय विश्वास करते हैं कि ये पानी के बपतिस्मा का उद्धरण/संकेत है, वो तरीका जिससे ‘पवित्र आत्मा’ हमें मसीह से जोड़ता है। उदाहरण के लिए, एक ‘वेब-साइट’ इसे इस तरह समझाता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पवित्र बपतिस्मा, सम्पूर्ण मसीही जीवन का आधार है, ‘आत्मा’ में जीवन का प्रवेश-द्वार और वो द्वार जो अन्य संस्कारों तक हमारी पहुँच बनाता है। बपतिस्मा के द्वारा हम पाप से स्वतंत्र किये जाते हैं और परमेश्वर के पुत्र के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं; हम मसीह के अंग/सदस्य बन जाते हैं, कलीसिया में सम्मिलित किये जाते और कलीसिया के अभियान में हिस्सेदार हो जाते हैं। ‘‘बपतिस्मा, वचन में जल के द्वारा पुनर्जन्म का संस्कार है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लाखों लोगों को ये सिखाया गया है कि उनके बपतिस्मा ने उन्हें नया जन्म दिया है। यदि ये सच नहीं है, तो ये एक विशाल और विश्व-व्यापी त्रासदी है। और मैं विश्वास नहीं करता कि ये सच है। तो फिर यीशु का क्या मतलब है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यूहन्ना 3 में &amp;quot;जल&amp;quot;, बुपतिस्मा का संकेत/ उल्लेख क्यो नहीं है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ विभिन्न कारण हैं कि मैं क्यों सोचता हूँ कि जल का उल्लेख, मसीही-बपतिस्मा का संकेत नहीं है। फिर हम देखेंगे कि प्रसंग हमें कहाँ ले जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) शेष पूरे अध्याय में कही भी बपतिस्मा का उल्लेख नहीं है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहला, यदि यह मसीही-बपतिस्मा का संकेत था और नया जन्म के लिए ये अनिवार्य था, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं कि यह है, तो ये अजीब प्रतीत होता है कि जो यीशु ने इस अध्याय में हमें ये बताने के लिए कहा कि सनातन जीवन कैसे पायें उसमें यह ग़ायब है। 15 पद: ‘‘जो कोई विश्वास करॆ, उस में अनन्त जीवन पाए।’’ पद 16: ‘‘जो कोई उस पर विश्वास करॆ, वह नाश न हो (होगा), परन्तु अनन्त जीवन पाए।’’ पद 18: ‘‘जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती।’’ यदि बपतिस्मा उतना ही अनिवार्य था, यह विचित्र प्रतीत होगा, यह विश्वास के साथ-साथ व्यक्त नहीं किया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) हवा की अनुरुपता/तुल्यरुपता के साथ बपतिस्मा सही नहीं बैठता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा, पद 8 में हवा के साथ तुलना करना अजीब प्रतीत होगा यदि नया जन्म लेना, पानी के बपतिस्मा के संग इतनी मजबूती से जुड़ा हुआ है। यीशु कहते हैं, ‘‘हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई ‘आत्मा’ से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ ये यह कहता हुआ प्रतीत होता है कि पुनरुज्जीवन देने के लिए परमेश्वर, हवा के जैसा ही स्वतंत्र है। किन्तु हर बार जब एक शिशु पर छिड़काव किया जाता है, ऐसा होता है, तो वो सच प्रतीत नहीं होता है। उस मामले में हवा, उस संस्कार द्वारा बहुत सीमित होगी । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3) नीकुदेमुस को यीशु की झिड़की के साथ बपतिस्मा सही नहीं बैठता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा, यदि यीशु मसीह-बपतिस्मा का संकेत कर रहे हैं, तो ये अजीब प्रतीत होता है कि ‘वह’ फरीसी नीकुदेमुस से पद 10 में कहे, ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता&amp;amp;nbsp;?’’ ये बात अर्थपूर्ण है यदि यीशु किसी ऐसी बात का संकेत कर रहे हैं जो पुराना नियम में सिखाया गया हो। लेकिन यदि ‘वह’ एक बपतिस्मा का संकेत कर रहे हैं जो बाद में आयेगा और यीशु के जीवन और मृत्यु से अपना अर्थ लेगा, ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ‘उसने’ नीकुदेमुस को झिड़का होता कि इस्राएल का एक गुरु नहीं समझता कि ‘वह’ क्या कह रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4) नयी वाचा की प्रतिज्ञाओं में जल और आत्मा जुड़े हुए हैं''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, पद 10 में वही बयान हमें कुछ पृष्ठभूमि के लिए पुराना नियम में भेज देता है, और हम क्या पाते हैं कि जल और आत्मा, नयी वाचा की प्रतिज्ञाओं में निकटता से जुड़े हुए हैं, विशेषतया यहेजकेल 36 में। अतः आइये हम एक-साथ वहाँ चलें। इस संदेश के शेष भाग के लिए, यह मूल-पाठ आधार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यहेजकेल 36 में जल और आत्मा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहेजकेल भविष्यवाणी कर रहा है कि परमेश्वर अपने लोगों के लिए क्या करेगा, जब ‘वह’ उन्हें बाबुल के निर्वासन से वापस ले आयेगा। इसका आशय मात्र इस्राएल के लोगों की तुलना में बहुत विशाल है, क्योंकि यीशु, ‘नयी वाचा’ को अपने लहु के द्वारा उन सब के लिए सुरक्षित रखने का दावा करता है जो उस में विश्वास रखेंगे (लूका 22: 20)। और यह ‘नयी वाचा’ की प्रतिज्ञाओं का एक बयान है, यिर्मयाह 31: 31 (से आगे) में बयान की गई के ही समान। आइये हम इसे मिलकर पढ़ें। यहेजकेल 36: 24-28: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं तुम को जातियों में से ले लूँगा, और देशों में से इकट्ठा करूँगा; और तुम को तुम्हारे निज देश में पहुँचा दूँगा। मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा। मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को माँस का हृदय दूँगा। और मैं अपना ‘आत्मा’ तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूँगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे। तुम उस देश में बसोगे जो मैं ने तुम्हारे पितरों को दिया था; और तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि यही वो परिच्छेद है जो यीशु के शब्दों को उत्पन्न करता हैं, ‘‘जब तक कोई मनुष्य ''जल'' और ''आत्मा'' से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ ‘वह’ किससे कहता है कि, ‘‘तुम मेरी प्रजा ठहरोगे, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा’’ (पद 28)&amp;amp;nbsp;? पद 25: उन लोगों से जिन्हें ‘वह’ कहता है, ‘‘मैं तुम पर शुद्ध जल छिड़कूँगा, और तुम शुद्ध हो जाओगे; और मैं तुम को तुम्हारी सारी अशुद्धता और मूरतों से शुद्ध करूँगा।’’ और पद 26: उन लोगों से जिन्हें ‘वह’ कहता है, ‘‘मैं तुम को नया मन दूंगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा।’’ दूसरे शब्दों में, वो लोग जो राज्य में प्रवेश करेंगे वे हैं जिनके पास एक नयापन है जिसमें सम्मिलित है पुराने का शुद्ध किया जाना और एक नये की सृष्टि। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं ये निष्कर्ष निकालता हूँ कि जब हमारा नया जन्म होता है ‘‘जल और आत्मा’’ हमारे नयेपन के दो पहलुओं की ओर संकेत करते हैं । और वो कारण कि दोनों महत्वपूर्ण हैं ये है: जब हम कहते हैं कि एक नया आत्मा, या एक नया हृदय हमें दिया गया है, हमारा ये अर्थ नहीं कि हम मानव रहना समाप्त कर देते हैं--नैतिक रूप से जवाबदेह हम स्वयं--जो कि हम सदा से रहे हैं। इससे पूर्व कि मेरा नया जन्म हुआ मैं एक मानव-जीव जॉन पाइपर था, और मैं वही मानव जॉन पाइपर नया जन्म के बाद हूँ। वहाँ एक निरन्तरता है। इसी कारण वहाँ शुद्धिकरण का होना अवश्य है। यदि पुराना मानव जॉन पाइपर, पूर्णतया लोप हो गया होता, क्षमा और शुद्धिकरण का पूरा विचार ही असंगत होता। विगत से कुछ भी शेष नहीं बचा होता जिसे क्षमा या शुद्ध किया जाता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम जानते हैं कि बाइबल हमें बताती है कि हमारा पुराना मनुष्यत्व क्रूस पर चढ़ाया गया (रोमियों 6: 6), और यह कि हम मसीह के साथ मर गए (कुलुस्सियों 3: 3), और हमें स्वयँ को ‘‘मरा हुआ समझना’’ (रोमियों 6: 11), और ‘‘पुराने मनुष्यत्व को उतारना’’ (इफिसियों 4:22) है। किन्तु उनमें से किसी का भी ये अर्थ नहीं है कि वही मानव-जीव, जीवन पर्यन्त दृष्टि में नहीं है। इसका अर्थ है कि एक पुराना स्वभाव, एक पुराना चरित्र, या सिद्धान्त, या झुकाव था, जिसे नष्ट किये जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आपके नये हृदय, नया आत्मा, नये स्वभाव के बारे में सोचने का तरीका ये है कि यह अब भी आप हैं और इस कारण क्षमा किये जाने और शुद्ध किये जाने की आवश्यकता है--जल का उल्लेख करने में यही मूल बात है। मेरा अपराध/पाप अवश्य ही धोया जाना है। जल से शुद्ध किया जाना उसी का चित्र है। यिर्मयाह 33: 8 इसे इस तरह प्रस्तुत करता है: ‘‘मैं उनको उनके सारे अधर्म और पाप के काम से शुद्ध करूंगा जो उन्हों ने मेरे विरुद्ध किये हैं; और उन्हों ने जितने अधर्म और अपराध के काम मेरे विरुद्ध किये हैं, उन सब को मैं क्षमा करूँगा।’’ अतः जो व्यक्ति हम हैं--जो निरन्तर अस्तित्व में रहता है -अवश्य है कि क्षमा किया जाए, और दोष धो दिया जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया होने की आवश्यकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु क्षमा किया जाना और शुद्धिकरण पर्याप्त नहीं है। मुझे नया होने की आवश्यकता है। मुझे रूपान्तरित किये जाने की आवश्यकता है। मुझे जीवन की आवश्यकता है। मुझे देखने और सोचने और मूल्य आँकने के एक नये तरीके की आवश्यकता है। इसी कारण पद 26 और 27 में यहेजकेल एक नया हृदय और नया आत्मा की बात करता है: ‘‘मैं तुम को नया मन दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम को मांस का हृदय दूंगा। और मैं अपना ‘''आत्मा''’ तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे और मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन आयतों को समझने का मेरा तरीका ये है: निश्चित ही, पत्थर के हृदय का अर्थ है मृत हृदय जो आत्मिक वास्तविकता के प्रति संवेदनहीन और प्रतिक्रियाहीन था--जैसा कि नया जन्म से पहिले आपका हृदय महसूस कर सकता था। ये आवेग और इच्छा के साथ बहुत सी चीजों के प्रति प्रत्युत्तर दे सकता था। किन्तु आत्मिक सच्चाई और यीशु मसीह की सुन्दरता और परमेश्वर की महिमा और पवित्रता के पथ के प्रति यह पत्थर था। इसी को बदलना है यदि हमें परमेश्वर का राज्य देखना है। अतः नया जन्म में, परमेश्वर पत्थर का हृदय निकाल देता है और मांस का एक हृदय डाल देता है। शब्द ''मांस'' का अर्थ ‘‘मात्र मानव’’ नहीं है जैसा कि ये ''यूहन्ना 3:6'' में अर्थ देता है। इसका अर्थ है, एक निर्जीव पत्थर बने रहने की जगह, कोमल और जीवित और प्रति-क्रियाशील और अनुभूतिपूर्ण। नया जन्म में, मसीह के साथ हमारी मृत, पत्थरीली ऊब,एक हृदय के द्वारा प्रतिस्थापित हो जाती है जो यीशु के महत्व की अनुभूति (आत्मिक रूप से चेतना) करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब जब 26 और 27 आयतों में यहेजकेल कहता है, ‘‘तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा ... मैं ''अपना ‘आत्मा’'' तुम्हारे भीतर देकर ऐसा करूंगा कि तुम मेरी विधियों पर चलोगे’’, मैं सोचता हूँ कि उसका अर्थ है कि नया जन्म में, परमेश्वर हमारे हृदय में एक जीवित, अलौकिक, आत्मिक जीवन डालता है, और वो नया जीवन—वो नया आत्मा—हमारे नये हृदय को नया आकार और चरित्र देते हुए स्वयँ ‘पवित्र आत्मा’ का कार्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो तस्वीर मेरे दिमाग में है वो यह कि ये नया गर्म, संवेदनशील, प्रतिक्रियाशील, जीवित हृदय मिट्टी के एक नरम लौंदे के समान है, और ‘पवित्र आत्मा’ स्वयँ इसके अन्दर जाता है और अपनी स्वयँ के रूप के अनुरूप इसे आत्मिक, नैतिक आकृति देता है। स्वयँ ‘उसके’ हमारे अन्दर होने के द्वारा, हमारे हृदय और मस्तिष्क ‘उसके’ स्वरूप--लेते हैं, ‘उसका’ आत्मा (तुलना कीजिये, इफिसियों 4: 23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 'उसे ' अपने ख़जाने/निधि के रुप में ग्रहण कीजिए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अब आइये हम पीछे जाकर इन दो सप्ताहों को सारांश करें। नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? नया जन्म में, विश्वास की मार्फत हमें यीशु मसीह से जोड़ने के द्वारा, ‘पवित्र आत्मा’ अलौकिक रूप से हमें नया आत्मिक जीवन देता है। अथवा, इसे दूसरे तरीके से कहें, ‘पवित्र आत्मा’ हमें मसीह के साथ संयोजित करता (जोड़ता) है जहाँ हमारे पापों के लिए शुद्धि है, और ‘वह’ हमारे कठोर, अप्रतिक्रियाशील हृदय को, एक कोमल हृदय से प्रतिस्थापित कर देता है जो यीशु को सब बातों से ऊपर अपने अन्दर संजोता है और जो ‘पवित्र आत्मा’ की उपस्थिति के द्वारा एक ऐसे हृदय में रूपान्तरित हो रहा है जो परमेश्वर की इच्छा पूरी करने से प्रेम करता है (यहेजकेल 36: 27)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चूँकि वो मार्ग जिससे आप इन सभी का अनुभव करते हैं, विश्वास के द्वारा है, मैं यीशु के नाम में, और ‘उसके’ ‘आत्मा’ की सामर्थ के द्वारा, आपको अभी आमंत्रित करता हूँ, कि आप ‘उसे’ अपने जीवन के पाप-क्षमा करने वाले, रूपान्तरित करने वाले ख़जाने/निधि के रूप में ग्रहण करें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नया जन्म में क्या होता है (भाग-1)</title>
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				<updated>2018-06-12T20:18:07Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;नया जन्म में क्या होता है (भाग-1)&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Happens in the New Birth? Part 1}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2 उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ 3 यीशु ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद&amp;amp;nbsp;: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ 4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ 5 यीशु ने उत्तर दिया, कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा&amp;amp;nbsp;; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है। 8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ 9 नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं&amp;amp;nbsp;?’’ 10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा&amp;amp;nbsp;; ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म पर हमने संदशों की एक श्रं श्रृंखला आरम्भ की है। यूहन्ना 3: 3 में, यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ जब ‘उसने’ ऐसा कहा, ‘वह’ हम सब से बातें कर रहा था। नीकुदेमुस एक विशेष मामला नहीं था। आपको और मुझे नया जन्म लेना ही है, अन्यथा हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। इसका अर्थ है, हम बचाये नहीं जायेंगे (उद्धार नहीं पायेंगे); हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा नहीं होंगे, और स्वर्ग नहीं जायेंगे, अपितु इसकी बजाय नरक में जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस, फरीसियों में से एक था, यहूदियों के सर्वाधिक धर्मी अगुवे। मत्ती 23: 15 और 33 में यीशु ने उन से कहा, ‘‘हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय&amp;amp;nbsp;! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो . . . हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे&amp;amp;nbsp;?’’ अतः जो श्रृंखला हमने आरम्भ की है वो हाशिये की नहीं है। यह केन्द्रीय है। जब हम नया जन्म के बारे में बात कर रहे हैं, तराजू में सनातन लटकती है। ‘‘जब तक कोई नया जन्म न ले, वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म बेचैन करनेवाला/घबरा देनेवाला है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछली बार प्रथम संदेश में हमने इस श्रंखला के कारणों पर और उन प्रश्नों के प्रकारों पर जो हम पूछने वाले थे, ध्यान केन्द्रित किया था। आज का प्रश्न है: नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? इससे पूर्व कि मैं उस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूं, मुझे एक बहुत ईमानदार चिन्ता व्यक्त करने दीजिये जो मुझे इन संदेशों को सुने जाने के तरीकों के बारे में है। मुझे मालूम है कि संदशों की यह श्रृंखला आप में से कई लोगों को बेचैन करने वाली होगी--ठीक उसी तरह जैसे यीशु के शब्द हमें बारम्बार बेचैन करनेवाले हैं यदि हम उन्हें गम्भीरता से लें। इसके कम से कम तीन कारण हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) हमारी निराशाजनक दशा के कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षाएँ, परमेश्वर के पुनर्जीवित करने वाले अनुग्रह से दूर हमारी निराशाजनक आत्मिक तथा नैतिक तथा वैधानिक दशा के साथ, हमारा सामना करती हैं। इस से पूर्व कि हमारा नया जन्म हो, हम आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम नैतिक रूप से स्वार्थी और बलवा करनेवाले हैं। और हम वैधानिक तौर पर परमेश्वर की व्यवस्था के समक्ष दोषी हैं और ‘उसके’ क्रोध के नीचे हैं। जब यीशु हम से कहता है कि हमें नया जन्म लेना है, ‘वह’ कह रहा है कि हमारी वर्तमान दशा निराशाजनक रूप से भावशून्य, भ्रष्ट, और दोषी है। हमारे जीवनों में विस्मयकारी अनुग्रह से हटकर, हम स्वयं के बारे में वो सुनना नहीं चाहते। अतः यह बेचैन करनेवाला है जब यीशु हमें कहता है कि हमें नया जन्म लेना अवश्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) क्योंकि हम नया जन्म उत्पन्न नहीं कर सकते ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म के बारे में शिक्षा बेचैन करनेवाली है क्योंकि यह कुछ उस का संकेत करती है जो हमारे साथ किया जाता है, कुछ वो नहीं जो हम करते हैं। यूहन्ना 1: 13 इस पर जोर देता है। यह परमेश्वर की सन्तानों का उल्लेख उन लोगों के जैसा करती है जो ‘‘वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।’’ पतरस इसी चीज पर जोर देता है, ‘‘हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद दो! जिस ने . . . अपनी बड़ी दया से . . . हमें . . . नया जन्म दिया’’ (1 पतरस 1:3)। हम नया जन्म उत्पन्न नहीं करते। परमेश्वर नया जन्म देता/उत्पन्न करता है। कोई भी अच्छा कार्य जो हम करते हैं, नया जन्म का एक परिणाम है, नया जन्म देने वाला या उत्पन्न करनेवाला नहीं। इसका अर्थ है कि नया जन्म हमारे हाथों से ले लिया गया है। यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। और इसीलिए ये हमारी निराशाजनक दशा और हमारे बाहर से ‘किसी अन्य’ पर हमारी पूर्ण निर्भरता के साथ, हमारा सामना करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह बेचैन करनेवाला है। हम से कहा गया है कि यदि हम नया जन्म न लें तो हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। और हमें कहा गया है कि हम स्वयं के द्वारा नया जन्म नहीं पा सकते। यह बेचैन करनेवाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3) क्योंकि परमेश्वर की परम स्वतंत्रता हमारा सामना करती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तीसरा कारण कि नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षा बेचैन करनेवाली है, यह कि ये हमारा सामना परमेश्वर की परम स्वतंत्रता के साथ करती है। परमेश्वर के बिना, हम अपने स्वार्थीपन और बलवे में आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं (इफिसियों 2: 3)। हमारा बलवा इतना गहरा है कि हम सुसमाचार में मसीह की महिमा की खोज या इच्छा नहीं कर सकते (2 कुरिन्थियों 4: 4)। इसलिए, हम यदि हम नया जन्म पाने जा रहे हैं, यह निर्णायक रूप से तथा अन्तिम रूप से परमेश्वर पर निर्भर होगा। हमें जिन्दा करने का ‘उसका’ निर्णय, इसका प्रत्युत्तर नहीं होगा जो हम आत्मिक लाशों के रूप में करते हैं, वरन्, जो हम करते हैं वो ‘उसके’ हमें जिन्दा कर देने का प्रत्युत्तर होगा। अधिकांश लोगों के लिए, कम से कम आरम्भ में, यह बेचैन करनेवाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मेरी आशा: स्थिर करना और उद्धार, मात्र बेचैन करना/घबरा देना नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, जब कि मैं यह श्रृंखला आरम्भ करता हूँ, मुझे बोध है कि नया जन्म पर यह शिक्षण कितना बेचैन करनेवाला हो सकता है। और ओह, मैं कितना सावधान रहना चाहता हूँ। मैं कोमल प्राणों को कोई अनावश्यक वेदना नहीं देना चाहता। और मैं उन लोगों को कोई झूठी आशा नहीं देना चाहता जिन्होंने आत्मिक जीवन को नैतिकता या धर्म के साथ उलझा दिया है। कृपया मेरे लिए प्रार्थना कीजिए। मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि इन दिनों में मैं सनातन आत्माएँ अपने हाथों में ले रहा हूँ। और फिर भी मैं जानता हूँ कि उन्हें जीवन देने के लिए मेरे अन्दर स्वयं की कोई सामर्थ्य नहीं है। लेकिन परमेश्वर के पास है। और मैं बहुत आशान्वित हूँ कि जो ‘वह’ इफिसियों 2: 4-5 में कहता है, वो ‘वह’ करेगा, ‘‘परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है&amp;amp;nbsp;; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया--अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।’’ परमेश्वर अपने जीवन-दायक अनुग्रह के धन को आवर्धित करना पसन्द करता है, जहाँ मसीह को सत्य में ऊपर उठाया जाता है। वो मेरी आशा है: यह कि ये श्रृंखला मात्र बेचैन नहीं करेगी वरन्, स्थिर करेगी और बचायेगी/उद्धार देगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आइये हम उस प्रश्न की ओर मुड़ें: नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? मैं उत्तर को तीन कथनों में रखने का प्रयास करूँगा। पहले दो, हम आज देखेंगे, और तीसरा (प्रभु चाहे तो) हम आगामी सप्ताह लेंगे। 1) नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है। 2) नया जन्म में जो होता है, वो मात्र यीशु में अलौकिकता का समर्थन नहीं है, अपितु, अपने स्वयं के अन्दर अलौकिकता का अनुभव है। 3 )नया जन्म में जो होता है, वो आपके पुराने मानव स्वभाव का सुधार या उन्नति नहीं है अपितु, एक नये मानव स्वभाव का सृजन है--एक ऐसा स्वभाव जो वास्तव में आप हैं, और जो क्षमा किया गया तथा शुद्ध किया गया है&amp;amp;nbsp;; और एक स्वभाव जो वास्तव में नया है, और अन्दर वास करने वाले परमेश्वर के आत्मा द्वारा बनाया जा रहा है। आइये हम इन्हें एक-एक करके लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) नया जीवन, नया धर्म नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है। मेरे साथ यूहन्ना 3 की प्रथम तीन आयतें पढि़ये: ‘‘फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’ यीशु ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना यह सुनिश्चित करता है कि हम जान लें कि नीकुदेमुस एक फरीसी है और यहूदियों का एक शासक है। सारे यहूदी समूह में फरीसी सबसे अधिक कठोरता से धर्मी थे। ऐसे व्यक्ति को, यीशु कहता है (पद 3 में), ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ और पद 7 में और अधिक व्यक्तिगत रूप से: ‘‘तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।’’ अतः यूहन्ना के बिन्दुओं में से एक यह है: नीकुदेमुस का सम्पूर्ण धर्म, उसका सारा विस्मयकारी फरीसी अध्ययन व अनुशासन तथा व्यवस्था-पालन, नया जन्म प्राप्त करने की आवश्यकता का स्थान नहीं ले सकता। वास्तव में, वे नया जन्म की आवश्यकता को और स्पष्ट बनाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस को जिसकी आवश्यकता है, और आपको व मुझे आवश्यकता है, वो धर्म नहीं अपितु जीवन है। नया जन्म का उल्लेख करने का कारण ये है कि जन्म लेना, संसार में एक नया जीवन ले आता है। यद्यपि, एक अर्थ में, नीकुदेमुस जीवित है। वह श्वास ले रहा है, सोच रहा है, महसूस कर रहा है, कार्य कर रहा है। वह मानव है, जो परमेश्वर के स्वरूप में सिरजा गया है। लेकिन स्पष्ट तमा, यीशु सोचता है कि वह मरा हुआ है। नीकुदेमुस में कोई आत्मिक जीवन नहीं है। आत्मिक रूप से वह अजन्मा है। उसे जीवन की आवश्यकता है, और अधिक धार्मिक गतिविधियाँ या अधिक धार्मिक उत्साह नहीं। उसके पास वो बहुतायत से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप स्मरण कीजिये कि यीशु ने लूका 9: 60 में, उस व्यक्ति से क्या कहा था, जो यीशु के पीछे जाने से इस कारण रुक रहा था कि वह अपने पिता को गाड़ दे&amp;amp;nbsp;? यीशु ने कहा, ‘‘मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे।’’ इसका अर्थ है कि शारीरिक रूप से मरे हुए लोग हैं जिन्हें गाड़े जाने की आवश्यकता है। और आत्मिक रूप से मरे हुए लोग हैं, जो उन्हें गाड़ सकते हैं। दूसरे शब्दों में, यीशु ने उन लोगों के बारे में सोचा जो बहुत प्रत्यक्ष जीवन के साथ घूमते-फिरते हैं और मरे हुए हैं। उड़ाऊ पुत्र के विषय में ‘उसके’ दृष्टान्त में, पिता कहता है, ‘‘मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है।’’(लूका 15: 24)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस को धर्म की आवश्यकता नहीं थी&amp;amp;nbsp;; उसे जीवन की आवश्यकता थी--आत्मिक जीवन। नया जन्म में जो होता है वो यह कि एक जीवन अस्तित्व में आता है जो पहले वहाँ नहीं था। नया जन्म के समय, नया जीवन होता है। यह धार्मिक गतिविधि या अनुशासन या निर्णय नहीं है। यह जीवन का अस्तित्व में आना है। यह पहला तरीका है, यह वर्णन करने का कि नया जन्म में क्या होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) अलौकिक का अनुभव करना, मात्र इसका समर्थन या स्वीकरण नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में जो होता है वो यीशु में अलौकिकता का मात्र समर्थन नहीं अपितु अलौकिकता का अपने स्वयँ के अन्दर अनुभव करना है। पद 2 में, नीकुदेमुस कहता है, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ दूसरे शब्दों में, नीकुदेमुस, यीशु में एक प्रामाणिक ईश्वरीय गतिविधि देखता है। वह स्वीकार करता है कि यीशु, परमेश्वर की ओर से है। यीशु, परमेश्वर के काम करता है। इस पर, यीशु यह कह कर प्रत्युत्तर नहीं देता कि, ‘‘का़श, पलिश्तीन में प्रत्येक जन उस सच्चाई को देख पाता जो तुम मेरे विषय में देखते हो।’’ इसकी बनिस्बत, ‘वह’ कहता है, ‘‘तुम्हें नया जन्म पाना अवश्य है अन्यथा तुम परमेश्वर का राज्य कदापि न देखोगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ह और आश्चर्यकर्म देखना, और उन पर चकित होना, और उन आश्चर्यकर्मों के कर्ता को उनके लिए श्रेय देना कि वह परमेश्वर की ओर से है, किसी को नहीं बचाता (किसी का उद्धार नहीं करता)। चिन्हों और आश्चर्यकर्मों के बड़े ख़तरों में से एक यह है: उन पर चकित होने के लिए आपको एक नये हृदय की आवश्यकता नहीं है। वो पुराना, पतित मानव स्वभाव ही पर्याप्त है, चिन्हों और आश्चर्यकर्मों पर चकित होने के लिए। और वो पुराना, पतित मानव स्वभाव, यह कहने के लिए तैयार है कि आश्चर्यकर्म को करनेवाला परमेश्वर से है। शैतान स्वयँ जानता है कि यीशु, परमेश्वर का पुत्र है और आष्चर्यकर्म करता है (मरकुस 1: 24)। नहीं, नीकुदेमुस, का मुझे परमेश्वर की ओर से भेजा हुआ एक आश्चर्यकर्म करनेवाले के रूप में देखना, परमेश्वर के राज्य की कुंजी नहीं है। ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जो मायने रखता है, वो यीशु में अलौकिकता को स्वीकार करना मात्र नहीं है, अपितु, अलौकिकता का अपने स्वयं में अनुभव करना है। नया जन्म अलौकिक है, प्राकृतिक नहीं। यह उन चीजों के द्वारा नहीं समझा जा सकता जो इस संसार में पहले ही से पायी जाती हैं। पद 6, नया जन्म के अलौकिक प्रकृति पर जोर देता है: ‘‘जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।’’ शरीर वो है, जो हम प्राकृतिक रूप से हैं। परमेश्वर का आत्मा वह अलौकिक व्यक्ति है जो नया जन्म ले आता है। यीशु पद 8 में इसे पुनः कहता है: ‘‘हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ ‘पवित्र आत्मा’ इस प्राकृतिक संसार का एक हिस्सा नहीं है। ‘वह’ प्रकृति से ऊपर है। ‘वह’ अलौकिक है। अवश्य ही, ‘वह’ परमेश्वर है। ‘वह’ नया जन्म का कर्ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नीकुदेमुस, यीशु कहता है, नया जन्म में जो होता है वो मात्र मेरे अन्दर अलौकिक का समर्थन या स्वीकरण नहीं है, अपितु, तुम्हारे स्वयं के अन्दर अलौकिक का अनुभव है। तुम्हें नया जन्म लेना अवश्य है। और किसी लाक्षणिक प्राकृतिक तरीके से नहीं, अपितु, एक अलौकिक तरीके से। ‘पवित्र आत्मा’ परमेश्वर का तुम्हारे ऊपर आना और नये जीवन को अस्तित्व में लाना अवश्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगली बार हम पद 5 के शब्दों को देखेंगे: ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ यहाँ पर जल और आत्मा किस ओर इंगित करते हैं&amp;amp;nbsp;? और नया जन्म में क्या हो रहा है, इसे समझने में वो हमारी कैसे सहायता करता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु जीवन है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज, ‘आत्मा’ के द्वारा नया जन्म पाने और यीशु में विश्वास के द्वारा सनातन जीवन पाने के बीच, एक निर्णायक संबंध स्थापित करते हुए, मैं समाप्त करना चाहता हूँ। अब तक जो हमने देखा वो यह कि नया जन्म पाने में जो होता है, वो आत्मिक जीवन को अस्तित्व में लाने के लिए, (जहाँ वो पहले नहीं था), पवित्र आत्मा के द्वारा अलौकिक कार्य है। यीशु यूहन्ना 6: 63 में इसे पुनः कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है&amp;amp;nbsp;; शरीर से कुछ लाभ नहीं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु यूहन्ना रचित सुसमाचार कुछ और को भी स्पष्ट करता है: यीशु वो जीवन है जो पवित्र आत्मा देता है। या हम कह सकते थे: वो आत्मिक जीवन जो ‘वह’ देता है, ‘वह’ केवल यीशु के सम्बन्ध में देता है। यीशु के साथ संयुक्ति ही वो स्थान है जहाँ हम अलौकिक, आत्मिक जीवन का अनुभव करते हैं। यूहन्ना 14: 6 में यीशु ने कहा, ‘‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ&amp;amp;nbsp;; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।’’ यूहन्ना 6: 35 में उसने कहा, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूँ।’’ और 20: 31 में यूहन्ना कहता है, ‘‘यह इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से/में जीवन पाओ।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु से अलग, कोई जीवन नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यीशु के साथ जुड़ने से अलग और यीशु में विश्वास के बिना, कोई आत्मिक जीवन नहीं--कोई सनातन जीवन नहीं। नया जन्म और यीशु में विश्वास के बीच संबंध के बारे में हमारे पास कहने को बहुत कुछ रहेगा। लेकिन अभी के लिए हम इसे इस ढंग से रखें: नया जन्म में, पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ एक जीवित संयुक्ति में जोड़ता है। मसीह जीवन है। मसीह दाखलता है, जहाँ जीवन बहता है। हम डालियाँ हैं (यूहन्ना 15: 1 से आगे)। नया जन्म में जो होता है वो यह कि नये आत्मिक जीवन का अलौकिक सृजन, और यह यीशु के साथ संयुक्ति के द्वारा सिरजा जाता है। पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ जैविक संयोजन में लाता है जो मार्ग, सत्य, और जीवन है। यही वो वस्तुगत वास्तविकता है जो नया जन्म में होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हमारी ओर से--जिस तरह हम इसका अनुभव करते हैं--यह है कि हमारे हृदयों में यीशु में विश्वास जागृत होता है। आत्मिक जीवन और यीशु में विश्वास एक-साथ अस्तित्व में आते हैं। नया जीवन, विश्वास को सम्भव बनाता है, और चूँकि आत्मिक जीवन सदैव विश्वास को जागृत करता तथा स्वयं को विश्वास में व्यक्त करता है, यीशु में विश्वास के बिना कोई जीवन नहीं है। इसलिए, हमें नया जन्म को, यीशु में विश्वास से, कभी पृथक नहीं करना चाहिए। परमेश्वर की ओर से, नया जन्म में हम मसीह के साथ संयोजित किये जाते हैं। यही है वो जो पवित्र आत्मा करता है। हमारी ओर से, हम यीशु में विश्वास के द्वारा इस संयुक्ति का अनुभव करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म और यीशु में विश्वास को कभी भी पृथक मत कीजिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 4 में, यूहन्ना उन्हें कैसे साथ में रखता है: ‘‘जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है--हमारा विश्वास है।’’ परमेश्वर से उत्पन्न-- जय प्राप्त करने की कुंजी। विश्वास--जय प्राप्त करने की कुंजी। क्योंकि विश्वास वो मार्ग है जिसके द्वारा हम परमेश्वर से उत्पन्न होने का अनुभव करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 11-12 में यूहन्ना इसे कैसे कहता है: ‘‘और वह गवाही यह है, कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है: और यह जीवन उसके पुत्र में है। जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है, और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।’’ इसलिए, जब यीशु कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है&amp;amp;nbsp;; शरीर से कुछ लाभ नहीं’’ (यूहन्ना 6: 63), और जब वह कहता है, कि जीवन पाने के लिए ‘‘तुम्हें आत्मा से जन्म लेना अवश्य है,’’ उसका अर्थ है: नया जन्म में, विश्वास के द्वारा हमें यीशु मसीह से संयोजित करने के द्वारा, पवित्र आत्मा हमें अलौकिक रीति से नया आत्मिक जीवन देता है। क्योंकि यीशु जीवन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यूहन्ना 3 में यीशु के इन दो कथनों को कभी पृथक न करें: ‘‘यदि कोई नये सिरे से न जन्मे&amp;amp;nbsp;;सही अनुवाद: नया जन्म न लेंद्ध तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता’’ (पद 3) और ‘‘जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है’’ (पद 36)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नया जन्म में क्या होता है (भाग-1)</title>
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				<updated>2018-06-12T20:17:36Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|What Happens in the New Birth? Part 1}}&amp;lt;br&amp;gt;   &amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था,...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Happens in the New Birth? Part 1}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2 उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ 3 यीशु ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद&amp;amp;nbsp;: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ 4 नीकुदेमुस ने उस से कहा, ‘‘मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो क्योंकर जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ 5 यीशु ने उत्तर दिया, कि ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6 क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7 अचम्भा न कर, कि मैं ने तुझ से कहा&amp;amp;nbsp;; कि तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है। 8 हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ 9 नीकुदेमुस ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ये बातें क्योंकर हो सकती हैं&amp;amp;nbsp;?’’ 10 यह सुनकर यीशु ने उस से कहा&amp;amp;nbsp;; ‘‘तू इस्राएलियों का गुरु हो कर भी क्या इन बातों को नहीं समझता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म पर हमने संदशों की एक श्रं श्रृंखला आरम्भ की है। यूहन्ना 3: 3 में, यीशु ने नीकुदेमुस से कहा, ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ जब ‘उसने’ ऐसा कहा, ‘वह’ हम सब से बातें कर रहा था। नीकुदेमुस एक विशेष मामला नहीं था। आपको और मुझे नया जन्म लेना ही है, अन्यथा हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। इसका अर्थ है, हम बचाये नहीं जायेंगे (उद्धार नहीं पायेंगे); हम परमेश्वर के परिवार का हिस्सा नहीं होंगे, और स्वर्ग नहीं जायेंगे, अपितु इसकी बजाय नरक में जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस, फरीसियों में से एक था, यहूदियों के सर्वाधिक धर्मी अगुवे। मत्ती 23: 15 और 33 में यीशु ने उन से कहा, ‘‘हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय&amp;amp;nbsp;! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है, तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो . . . हे सांपो, हे करैतों के बच्चों, तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे&amp;amp;nbsp;?’’ अतः जो श्रृंखला हमने आरम्भ की है वो हाशिये की नहीं है। यह केन्द्रीय है। जब हम नया जन्म के बारे में बात कर रहे हैं, तराजू में सनातन लटकती है। ‘‘जब तक कोई नया जन्म न ले, वह परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म बेचैन करनेवाला/घबरा देनेवाला है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछली बार प्रथम संदेश में हमने इस श्रंखला के कारणों पर और उन प्रश्नों के प्रकारों पर जो हम पूछने वाले थे, ध्यान केन्द्रित किया था। आज का प्रश्न है: नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? इससे पूर्व कि मैं उस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करूं, मुझे एक बहुत ईमानदार चिन्ता व्यक्त करने दीजिये जो मुझे इन संदेशों को सुने जाने के तरीकों के बारे में है। मुझे मालूम है कि संदशों की यह श्रृंखला आप में से कई लोगों को बेचैन करने वाली होगी--ठीक उसी तरह जैसे यीशु के शब्द हमें बारम्बार बेचैन करनेवाले हैं यदि हम उन्हें गम्भीरता से लें। इसके कम से कम तीन कारण हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) हमारी निराशाजनक दशा के कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षाएँ, परमेश्वर के पुनर्जीवित करने वाले अनुग्रह से दूर हमारी निराशाजनक आत्मिक तथा नैतिक तथा वैधानिक दशा के साथ, हमारा सामना करती हैं। इस से पूर्व कि हमारा नया जन्म हो, हम आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम नैतिक रूप से स्वार्थी और बलवा करनेवाले हैं। और हम वैधानिक तौर पर परमेश्वर की व्यवस्था के समक्ष दोषी हैं और ‘उसके’ क्रोध के नीचे हैं। जब यीशु हम से कहता है कि हमें नया जन्म लेना है, ‘वह’ कह रहा है कि हमारी वर्तमान दशा निराशाजनक रूप से भावशून्य, भ्रष्ट, और दोषी है। हमारे जीवनों में विस्मयकारी अनुग्रह से हटकर, हम स्वयं के बारे में वो सुनना नहीं चाहते। अतः यह बेचैन करनेवाला है जब यीशु हमें कहता है कि हमें नया जन्म लेना अवश्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) क्योंकि हम नया जन्म उत्पन्न नहीं कर सकते ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म के बारे में शिक्षा बेचैन करनेवाली है क्योंकि यह कुछ उस का संकेत करती है जो हमारे साथ किया जाता है, कुछ वो नहीं जो हम करते हैं। यूहन्ना 1: 13 इस पर जोर देता है। यह परमेश्वर की सन्तानों का उल्लेख उन लोगों के जैसा करती है जो ‘‘वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।’’ पतरस इसी चीज पर जोर देता है, ‘‘हमारे प्रभु यीशु मसीह के परमेश्वर और पिता का धन्यवाद दो! जिस ने . . . अपनी बड़ी दया से . . . हमें . . . नया जन्म दिया’’ (1 पतरस 1:3)। हम नया जन्म उत्पन्न नहीं करते। परमेश्वर नया जन्म देता/उत्पन्न करता है। कोई भी अच्छा कार्य जो हम करते हैं, नया जन्म का एक परिणाम है, नया जन्म देने वाला या उत्पन्न करनेवाला नहीं। इसका अर्थ है कि नया जन्म हमारे हाथों से ले लिया गया है। यह हमारे नियंत्रण में नहीं है। और इसीलिए ये हमारी निराशाजनक दशा और हमारे बाहर से ‘किसी अन्य’ पर हमारी पूर्ण निर्भरता के साथ, हमारा सामना करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह बेचैन करनेवाला है। हम से कहा गया है कि यदि हम नया जन्म न लें तो हम परमेश्वर का राज्य नहीं देखेंगे। और हमें कहा गया है कि हम स्वयं के द्वारा नया जन्म नहीं पा सकते। यह बेचैन करनेवाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3) क्योंकि परमेश्वर की परम स्वतंत्रता हमारा सामना करती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तीसरा कारण कि नया जन्म के बारे में यीशु की शिक्षा बेचैन करनेवाली है, यह कि ये हमारा सामना परमेश्वर की परम स्वतंत्रता के साथ करती है। परमेश्वर के बिना, हम अपने स्वार्थीपन और बलवे में आत्मिक रूप से मरे हुए हैं। हम स्वभाव से क्रोध की सन्तान हैं (इफिसियों 2: 3)। हमारा बलवा इतना गहरा है कि हम सुसमाचार में मसीह की महिमा की खोज या इच्छा नहीं कर सकते (2 कुरिन्थियों 4: 4)। इसलिए, हम यदि हम नया जन्म पाने जा रहे हैं, यह निर्णायक रूप से तथा अन्तिम रूप से परमेश्वर पर निर्भर होगा। हमें जिन्दा करने का ‘उसका’ निर्णय, इसका प्रत्युत्तर नहीं होगा जो हम आत्मिक लाशों के रूप में करते हैं, वरन्, जो हम करते हैं वो ‘उसके’ हमें जिन्दा कर देने का प्रत्युत्तर होगा। अधिकांश लोगों के लिए, कम से कम आरम्भ में, यह बेचैन करनेवाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मेरी आशा: स्थिर करना और उद्धार, मात्र बेचैन करना/घबरा देना नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, जब कि मैं यह श्रृंखला आरम्भ करता हूँ, मुझे बोध है कि नया जन्म पर यह शिक्षण कितना बेचैन करनेवाला हो सकता है। और ओह, मैं कितना सावधान रहना चाहता हूँ। मैं कोमल प्राणों को कोई अनावश्यक वेदना नहीं देना चाहता। और मैं उन लोगों को कोई झूठी आशा नहीं देना चाहता जिन्होंने आत्मिक जीवन को नैतिकता या धर्म के साथ उलझा दिया है। कृपया मेरे लिए प्रार्थना कीजिए। मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि इन दिनों में मैं सनातन आत्माएँ अपने हाथों में ले रहा हूँ। और फिर भी मैं जानता हूँ कि उन्हें जीवन देने के लिए मेरे अन्दर स्वयं की कोई सामर्थ्य नहीं है। लेकिन परमेश्वर के पास है। और मैं बहुत आशान्वित हूँ कि जो ‘वह’ इफिसियों 2: 4-5 में कहता है, वो ‘वह’ करेगा, ‘‘परन्तु परमेश्वर ने जो दया का धनी है&amp;amp;nbsp;; अपने उस बड़े प्रेम के कारण, जिस से उस ने हम से प्रेम किया, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तो हमें मसीह के साथ जिलाया--अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है।’’ परमेश्वर अपने जीवन-दायक अनुग्रह के धन को आवर्धित करना पसन्द करता है, जहाँ मसीह को सत्य में ऊपर उठाया जाता है। वो मेरी आशा है: यह कि ये श्रृंखला मात्र बेचैन नहीं करेगी वरन्, स्थिर करेगी और बचायेगी/उद्धार देगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आइये हम उस प्रश्न की ओर मुड़ें: नया जन्म में क्या होता है&amp;amp;nbsp;? मैं उत्तर को तीन कथनों में रखने का प्रयास करूँगा। पहले दो, हम आज देखेंगे, और तीसरा (प्रभु चाहे तो) हम आगामी सप्ताह लेंगे। 1) नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है। 2) नया जन्म में जो होता है, वो मात्र यीशु में अलौकिकता का समर्थन नहीं है, अपितु, अपने स्वयं के अन्दर अलौकिकता का अनुभव है। 3 )नया जन्म में जो होता है, वो आपके पुराने मानव स्वभाव का सुधार या उन्नति नहीं है अपितु, एक नये मानव स्वभाव का सृजन है--एक ऐसा स्वभाव जो वास्तव में आप हैं, और जो क्षमा किया गया तथा शुद्ध किया गया है&amp;amp;nbsp;; और एक स्वभाव जो वास्तव में नया है, और अन्दर वास करने वाले परमेश्वर के आत्मा द्वारा बनाया जा रहा है। आइये हम इन्हें एक-एक करके लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) नया जीवन, नया धर्म नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में जो होता है, वो नया धर्म प्राप्त करना नहीं है अपितु नया जीवन प्राप्त करना है। मेरे साथ यूहन्ना 3 की प्रथम तीन आयतें पढि़ये: ‘‘फरीसियों में से नीकुदेमुस नाम एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। उस ने रात को यीशु के पास आकर उस से कहा, ‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’ यीशु ने उस को उत्तर दिया&amp;amp;nbsp;; कि ‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे (सही अनुवाद: नया जन्म न ले) तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना यह सुनिश्चित करता है कि हम जान लें कि नीकुदेमुस एक फरीसी है और यहूदियों का एक शासक है। सारे यहूदी समूह में फरीसी सबसे अधिक कठोरता से धर्मी थे। ऐसे व्यक्ति को, यीशु कहता है (पद 3 में), ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूं, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ और पद 7 में और अधिक व्यक्तिगत रूप से: ‘‘तुम्हें नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।’’ अतः यूहन्ना के बिन्दुओं में से एक यह है: नीकुदेमुस का सम्पूर्ण धर्म, उसका सारा विस्मयकारी फरीसी अध्ययन व अनुशासन तथा व्यवस्था-पालन, नया जन्म प्राप्त करने की आवश्यकता का स्थान नहीं ले सकता। वास्तव में, वे नया जन्म की आवश्यकता को और स्पष्ट बनाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस को जिसकी आवश्यकता है, और आपको व मुझे आवश्यकता है, वो धर्म नहीं अपितु जीवन है। नया जन्म का उल्लेख करने का कारण ये है कि जन्म लेना, संसार में एक नया जीवन ले आता है। यद्यपि, एक अर्थ में, नीकुदेमुस जीवित है। वह श्वास ले रहा है, सोच रहा है, महसूस कर रहा है, कार्य कर रहा है। वह मानव है, जो परमेश्वर के स्वरूप में सिरजा गया है। लेकिन स्पष्ट तमा, यीशु सोचता है कि वह मरा हुआ है। नीकुदेमुस में कोई आत्मिक जीवन नहीं है। आत्मिक रूप से वह अजन्मा है। उसे जीवन की आवश्यकता है, और अधिक धार्मिक गतिविधियाँ या अधिक धार्मिक उत्साह नहीं। उसके पास वो बहुतायत से है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप स्मरण कीजिये कि यीशु ने लूका 9: 60 में, उस व्यक्ति से क्या कहा था, जो यीशु के पीछे जाने से इस कारण रुक रहा था कि वह अपने पिता को गाड़ दे&amp;amp;nbsp;? यीशु ने कहा, ‘‘मरे हुओं को अपने मुरदे गाड़ने दे।’’ इसका अर्थ है कि शारीरिक रूप से मरे हुए लोग हैं जिन्हें गाड़े जाने की आवश्यकता है। और आत्मिक रूप से मरे हुए लोग हैं, जो उन्हें गाड़ सकते हैं। दूसरे शब्दों में, यीशु ने उन लोगों के बारे में सोचा जो बहुत प्रत्यक्ष जीवन के साथ घूमते-फिरते हैं और मरे हुए हैं। उड़ाऊ पुत्र के विषय में ‘उसके’ दृष्टान्त में, पिता कहता है, ‘‘मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है।’’(लूका 15: 24)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीकुदेमुस को धर्म की आवश्यकता नहीं थी&amp;amp;nbsp;; उसे जीवन की आवश्यकता थी--आत्मिक जीवन। नया जन्म में जो होता है वो यह कि एक जीवन अस्तित्व में आता है जो पहले वहाँ नहीं था। नया जन्म के समय, नया जीवन होता है। यह धार्मिक गतिविधि या अनुशासन या निर्णय नहीं है। यह जीवन का अस्तित्व में आना है। यह पहला तरीका है, यह वर्णन करने का कि नया जन्म में क्या होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) अलौकिक का अनुभव करना, मात्र इसका समर्थन या स्वीकरण नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया जन्म में जो होता है वो यीशु में अलौकिकता का मात्र समर्थन नहीं अपितु अलौकिकता का अपने स्वयँ के अन्दर अनुभव करना है। पद 2 में, नीकुदेमुस कहता है, ‘‘हे रब्बी, हम जानते हैं, कि तू परमेश्वर की ओर से गुरु होकर आया है&amp;amp;nbsp;; क्योंकि कोई इन चिन्हों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्वर उसके साथ न हो, तो नहीं दिखा सकता।’’ दूसरे शब्दों में, नीकुदेमुस, यीशु में एक प्रामाणिक ईश्वरीय गतिविधि देखता है। वह स्वीकार करता है कि यीशु, परमेश्वर की ओर से है। यीशु, परमेश्वर के काम करता है। इस पर, यीशु यह कह कर प्रत्युत्तर नहीं देता कि, ‘‘का़श, पलिश्तीन में प्रत्येक जन उस सच्चाई को देख पाता जो तुम मेरे विषय में देखते हो।’’ इसकी बनिस्बत, ‘वह’ कहता है, ‘‘तुम्हें नया जन्म पाना अवश्य है अन्यथा तुम परमेश्वर का राज्य कदापि न देखोगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चिन्ह और आश्चर्यकर्म देखना, और उन पर चकित होना, और उन आश्चर्यकर्मों के कर्ता को उनके लिए श्रेय देना कि वह परमेश्वर की ओर से है, किसी को नहीं बचाता (किसी का उद्धार नहीं करता)। चिन्हों और आश्चर्यकर्मों के बड़े ख़तरों में से एक यह है: उन पर चकित होने के लिए आपको एक नये हृदय की आवश्यकता नहीं है। वो पुराना, पतित मानव स्वभाव ही पर्याप्त है, चिन्हों और आश्चर्यकर्मों पर चकित होने के लिए। और वो पुराना, पतित मानव स्वभाव, यह कहने के लिए तैयार है कि आश्चर्यकर्म को करनेवाला परमेश्वर से है। शैतान स्वयँ जानता है कि यीशु, परमेश्वर का पुत्र है और आष्चर्यकर्म करता है (मरकुस 1: 24)। नहीं, नीकुदेमुस, का मुझे परमेश्वर की ओर से भेजा हुआ एक आश्चर्यकर्म करनेवाले के रूप में देखना, परमेश्वर के राज्य की कुंजी नहीं है। ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जो मायने रखता है, वो यीशु में अलौकिकता को स्वीकार करना मात्र नहीं है, अपितु, अलौकिकता का अपने स्वयं में अनुभव करना है। नया जन्म अलौकिक है, प्राकृतिक नहीं। यह उन चीजों के द्वारा नहीं समझा जा सकता जो इस संसार में पहले ही से पायी जाती हैं। पद 6, नया जन्म के अलौकिक प्रकृति पर जोर देता है: ‘‘जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है&amp;amp;nbsp;; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है।’’ शरीर वो है, जो हम प्राकृतिक रूप से हैं। परमेश्वर का आत्मा वह अलौकिक व्यक्ति है जो नया जन्म ले आता है। यीशु पद 8 में इसे पुनः कहता है: ‘‘हवा जिधर चाहती है उधर चलती है, और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता, कि वह कहां से आती और किधर को जाती है&amp;amp;nbsp;? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।’’ ‘पवित्र आत्मा’ इस प्राकृतिक संसार का एक हिस्सा नहीं है। ‘वह’ प्रकृति से ऊपर है। ‘वह’ अलौकिक है। अवश्य ही, ‘वह’ परमेश्वर है। ‘वह’ नया जन्म का कर्ता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नीकुदेमुस, यीशु कहता है, नया जन्म में जो होता है वो मात्र मेरे अन्दर अलौकिक का समर्थन या स्वीकरण नहीं है, अपितु, तुम्हारे स्वयं के अन्दर अलौकिक का अनुभव है। तुम्हें नया जन्म लेना अवश्य है। और किसी लाक्षणिक प्राकृतिक तरीके से नहीं, अपितु, एक अलौकिक तरीके से। ‘पवित्र आत्मा’ परमेश्वर का तुम्हारे ऊपर आना और नये जीवन को अस्तित्व में लाना अवश्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगली बार हम पद 5 के शब्दों को देखेंगे: ‘‘मैं तुझ से सच सच कहता हूँ&amp;amp;nbsp;; जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।’’ यहाँ पर जल और आत्मा किस ओर इंगित करते हैं&amp;amp;nbsp;? और नया जन्म में क्या हो रहा है, इसे समझने में वो हमारी कैसे सहायता करता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु जीवन है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज, ‘आत्मा’ के द्वारा नया जन्म पाने और यीशु में विश्वास के द्वारा सनातन जीवन पाने के बीच, एक निर्णायक संबंध स्थापित करते हुए, मैं समाप्त करना चाहता हूँ। अब तक जो हमने देखा वो यह कि नया जन्म पाने में जो होता है, वो आत्मिक जीवन को अस्तित्व में लाने के लिए, (जहाँ वो पहले नहीं था), पवित्र आत्मा के द्वारा अलौकिक कार्य है। यीशु यूहन्ना 6: 63 में इसे पुनः कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है&amp;amp;nbsp;; शरीर से कुछ लाभ नहीं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु यूहन्ना रचित सुसमाचार कुछ और को भी स्पष्ट करता है: यीशु वो जीवन है जो पवित्र आत्मा देता है। या हम कह सकते थे: वो आत्मिक जीवन जो ‘वह’ देता है, ‘वह’ केवल यीशु के सम्बन्ध में देता है। यीशु के साथ संयुक्ति ही वो स्थान है जहाँ हम अलौकिक, आत्मिक जीवन का अनुभव करते हैं। यूहन्ना 14: 6 में यीशु ने कहा, ‘‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ&amp;amp;nbsp;; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।’’ यूहन्ना 6: 35 में उसने कहा, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूँ।’’ और 20: 31 में यूहन्ना कहता है, ‘‘यह इसलिये लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से/में जीवन पाओ।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु से अलग, कोई जीवन नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यीशु के साथ जुड़ने से अलग और यीशु में विश्वास के बिना, कोई आत्मिक जीवन नहीं--कोई सनातन जीवन नहीं। नया जन्म और यीशु में विश्वास के बीच संबंध के बारे में हमारे पास कहने को बहुत कुछ रहेगा। लेकिन अभी के लिए हम इसे इस ढंग से रखें: नया जन्म में, पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ एक जीवित संयुक्ति में जोड़ता है। मसीह जीवन है। मसीह दाखलता है, जहाँ जीवन बहता है। हम डालियाँ हैं (यूहन्ना 15: 1 से आगे)। नया जन्म में जो होता है वो यह कि नये आत्मिक जीवन का अलौकिक सृजन, और यह यीशु के साथ संयुक्ति के द्वारा सिरजा जाता है। पवित्र आत्मा हमें मसीह के साथ जैविक संयोजन में लाता है जो मार्ग, सत्य, और जीवन है। यही वो वस्तुगत वास्तविकता है जो नया जन्म में होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हमारी ओर से--जिस तरह हम इसका अनुभव करते हैं--यह है कि हमारे हृदयों में यीशु में विश्वास जागृत होता है। आत्मिक जीवन और यीशु में विश्वास एक-साथ अस्तित्व में आते हैं। नया जीवन, विश्वास को सम्भव बनाता है, और चूँकि आत्मिक जीवन सदैव विश्वास को जागृत करता तथा स्वयं को विश्वास में व्यक्त करता है, यीशु में विश्वास के बिना कोई जीवन नहीं है। इसलिए, हमें नया जन्म को, यीशु में विश्वास से, कभी पृथक नहीं करना चाहिए। परमेश्वर की ओर से, नया जन्म में हम मसीह के साथ संयोजित किये जाते हैं। यही है वो जो पवित्र आत्मा करता है। हमारी ओर से, हम यीशु में विश्वास के द्वारा इस संयुक्ति का अनुभव करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== नया जन्म और यीशु में विश्वास को कभी भी पृथक मत कीजिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 4 में, यूहन्ना उन्हें कैसे साथ में रखता है: ‘‘जो कुछ परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वह संसार पर जय प्राप्त करता है, और वह विजय जिस से संसार पर जय प्राप्त होती है--हमारा विश्वास है।’’ परमेश्वर से उत्पन्न-- जय प्राप्त करने की कुंजी। विश्वास--जय प्राप्त करने की कुंजी। क्योंकि विश्वास वो मार्ग है जिसके द्वारा हम परमेश्वर से उत्पन्न होने का अनुभव करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा सुनिये कि 1 यूहन्ना 5: 11-12 में यूहन्ना इसे कैसे कहता है: ‘‘और वह गवाही यह है, कि परमेश्वर ने हमें अनन्त जीवन दिया है: और यह जीवन उसके पुत्र में है। जिस के पास पुत्र है, उसके पास जीवन है, और जिस के पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन भी नहीं है।’’ इसलिए, जब यीशु कहता है, ‘‘आत्मा तो जीवन-दायक है&amp;amp;nbsp;; शरीर से कुछ लाभ नहीं’’ (यूहन्ना 6: 63), और जब वह कहता है, कि जीवन पाने के लिए ‘‘तुम्हें आत्मा से जन्म लेना अवश्य है,’’ उसका अर्थ है: नया जन्म में, विश्वास के द्वारा हमें यीशु मसीह से संयोजित करने के द्वारा, पवित्र आत्मा हमें अलौकिक रीति से नया आत्मिक जीवन देता है। क्योंकि यीशु जीवन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यूहन्ना 3 में यीशु के इन दो कथनों को कभी पृथक न करें: ‘‘यदि कोई नये सिरे से न जन्मे&amp;amp;nbsp;;सही अनुवाद: नया जन्म न लेंद्ध तो परमेश्वर का राज्य देख नहीं सकता’’ (पद 3) और ‘‘जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है’’ (पद 36)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नये स्वर्गां और नयी पृथ्वी में सुसमाचार की विजय</title>
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				<updated>2018-03-09T21:04:18Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;नये स्वर्गां और नयी पृथ्वी में सुसमाचार की विजय&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|The Triumph of the Gospel in the New Heavens and the New Earth}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल के प्रथम अध्याय की प्रथम आयत कहती है, ‘‘आदि में परमेश्वर ने आकाश (स्वर्गों) और पृथ्वी की सृष्टि की।’’ पद 27 में परमेश्वर मनुष्य की सृष्टि नर और नारी के रूप में अपने स्वरूप में करता है, और फिर 31 पद में कहता है कि ये सब बहुत ही अच्छा है। अध्याय तीन में, आदम और हव्वा, परमेश्वर को उनकी सर्वोत्कृष्ट बुद्धि और सुन्दरता और लालसा के रूप में तिरस्कार करते हैं और इस प्रकार अपने ऊपर, उनकी भावी-पीढि़यों, और सृष्टि के प्राकृतिक क्रम पर, परमेश्वर का श्राप ले आते हैं:- ‘‘भूमि तुम्हारे कारण शापित है (यहोवा परमेश्वर कहता है); तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगा’’ (उत्पत्ति 3: 17)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्पत्ति 3: 15, आशा बनाये रखता है कि ये शाप, परमेश्वर की सृष्टि के लिए अंतिम शब्द नहीं रहेंगे। परमेश्वर, प्राण-विनाशक, सृष्टि-विनाशक सर्प से कहता है, ‘‘मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।’’ पौलुस प्रेरित इस आशा को इस पद के मध्य देखता है और रोमियों 8: 20-21 में इसे इस ढंग से रखता है:- ‘‘क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करनेवाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई, कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दुःख का असहनीय दृश्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बड़ी तस्वीर, रूपरेखा के रूप में:- परमेश्वर ने बिना कुछ से विश्व की सृष्टि की; जिस तरह से ‘उस’ ने इसे बनाया, यह सब बहुत अच्छा था; इसमें कोई दोष नहीं थे, कोई दुःख नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई बुराई नहीं; और तब आदम और हव्वा ने उनके हृदयों में कुछ किया जो इतना भयावह रूप से बुरा था--इतना अकथ्य रूप से दुष्ट, परमेश्वर की संगति से एक पेड़ के फल को अधिक पसन्द करते हुए--कि परमेश्वर ने न केवल उन पर मृत्यु दण्ड की आज्ञा दी (उत्पत्ति 2: 17), वरन् सम्पूर्ण सृष्टि को उसके आधीन कर दिया, जिसे पौलुस ने ‘‘व्यर्थता’’ और विनाश का दासत्व’’ (रोमियों 8: 21-22) कहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जबकि एक समय कोई दुःख या दर्द या मृत्यु नहीं थी, अब प्रत्येक मानव मरता है, प्रत्येक मानव दुःख भोगता है, पशु दुःख भोगते हैं, नदियाँ अचानक अपने किनारों से उफनती हैं और गांवों को बहा ले जाती हैं, हिमस्खलन ‘स्कीइंग’ करनेवालों को दफ़न कर देते हैं, ज्वालमुखी पूरे-पूरे शहरों को नाश कर देते हैं, एक ‘सूनामी’ एक रात में 2,50,000 लोगों को मार डालता है, तूफान 800 सवार लोगों सहित फिलिप्पीनी नौकाओं को डुबा देता है, ‘एड्स’ और मलेरिया और कैंसर और हृदय-रोग लाखों वृद्ध व जवान लोगों मार डालते हैं, एक दैत्याकार टॉरनेडो (बवण्डर) सारे ‘मिडवैस्टर्न’ शहर को उखाड़ देता है, सूखा और आकाल लाखों को भूखे मरने की कग़ार पर--या कग़ार से भी आगे ले आते हैं। मौज में चलते हुए दुर्घटनाएं होती हैं, और एक मित्र का पुत्र, अनाज उठाने की मशीन में गिर जाता है और मर जाता है। एक अन्य, एक आँख खो देता है। और एक शिशु बिना चेहरे के पैदा होता है। यदि हम एक क्षण में, इस संसार के दुःखों का दस हजार में से एक भाग भी देख सकते, हम इस सब की भयावहता से मर जाते। केवल परमेश्वर ही उस दृश्य को सहन कर सकता और अपना काम जारी रख सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सृष्टि की व्यर्थता में चित्रित पाप की बीभत्सता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्यों परमेश्वर ने मानव-जीवधारियों के पाप के कारण, प्राकृतिक क्रम को ऐसी व्यर्थता के आधीन कर दिया? प्राकृतिक क्रम ने पाप नहीं किया। मानव-जीवधारियों ने पाप किया। किन्तु पौलुस कहता है, ‘‘सृष्टि, व्यर्थता के आधीन की गई।’’ सृष्टि, ‘‘विनाश के दासत्व’’ में कर दी गई। क्यों? परमेश्वर ने कहा, ‘‘भूमि तुम्हारे कारण शापित है’’ (उत्पत्ति 3:17)। लेकिन क्यों? मनुष्य में नैतिक असफलताओं के प्रत्युत्तर में, सृष्टि में प्राकृतिक आपदाएँ क्यों हैं? आदम के दोषी सन्तानों के लिए मात्र सरल मृत्यु क्यों नहीं? क्यों शताब्दि के बाद शताब्दि तक भयावह दुःख के ये रक्तरंजित बहुमूर्तिदर्शी? क्यों हृदय- मरोड़नेवाली अशक्तताओं के साथ, इतने सारे बच्चे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर ये है कि परमेश्वर ने प्राकृतिक संसार को एक शाप के आधीन कर दिया ताकि बीमारियों व विपत्तियों में जो भौतिक विभीषिकाएँ हम अपने चारों ओर देखते हैं, इसका जीता-जागता चित्र बन जावें कि पाप कितना भयानक है। दूसरे शब्दों में, प्राकृतिक बुराई, नैतिक बुराई की अकथ्य बीभत्सता की ओर इंगित करता हुआ, एक मार्गपट्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैतिक और आत्मिक संसार की विकृति--अर्थात्, पाप के कारण, परमेश्वर ने प्राकृतिक संसार को अस्तव्यस्त कर दिया। हमारी वर्तमान पतित दशा में, पाप की अत्याधिक दुष्टता के प्रति इतने अधिक अन्धे हो गए हमारे हृदयों के साथ, हम देख या अनुभूति नहीं कर सकते कि पाप कितना घिनावना है। कदाचित् ही संसार में कोई घृणित बुराई की अनुभूति करता है जो कि हमारा पाप है। जिस तरह से वे परमेश्वर की महिमा कम करते हैं, लगभग कोई भी उत्तेजित नहीं होता या उसका जी नहीं मिचलाता। लेकिन उनके शरीरों को दर्द छूने भी दो, और परमेश्वर को स्वयं की सफाई देने के लिए बुलाया जाता है। जिस तरह से हम उसकी महिमा को चोट पहुंचाते हैं, हम उससे विचलित नहीं होते, लेकिन ‘उसे’ हमारी प्यारी छोटी अंगुली को चोट तो पहुंचाने दो और हमारा सारा नीति-गत क्रोध उभर आता है। जो दिखाता है कि हम स्वयँ को कितना ऊंचा करनेवाले और परमेश्वर को ‘उस’ के पद से उतारनेवाले हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शारीरिक दर्द की तुरही का तूर्यनाद/उच्चनाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शारीरिक कष्ट, एक भौतिक तुरही के साथ परमेश्वर का उच्चनाद है कि हमें बताये कि नैतिक और आत्मिक रूप से कुछ भयानक रूप से गलत है। बीमारियाँ और विकृतियाँ, शैतान का घमण्ड हैं। किन्तु परमेश्वर के प्रत्यादेश विधान में, वे परमेश्वर के शब्दचित्र हैं कि आत्मिक परिमण्डल में पाप कैसा है। वो सच है हालांकि कुछ अत्याधिक भक्तिपूर्ण लोग, उन विकृतियों को सहन करते हैं। पाप क्या पात्रता रखता है, विपत्तियाँ उसका परमेश्वर के पूर्वदर्शन हैं, और यह कि एक दिन हजार गुना अधिक बुरा दण्ड पायेगा। वे चेतावनियाँ हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश, हम सब देख सकते और महसूस कर सकते कि हमारे ‘बनानेवाले’ से बढ़कर किसी भी चीज को अधिक महत्व देना, ‘उसे’ अनदेखा करना और ‘उसे’ अविश्वास करना और ‘उसे’ अप्रतिष्ठित करना और हमारे बैठक के कमरे के फर्श पर के गलीचे की तुलना में, अपने हृदयों में ‘उसे’ कम ध्यान देना, कितना प्रतिकूल, कितना अपमानजनक, कितना घृणित है। हमें इसे अवश्य देखना है, अन्यथा पाप से उद्धार के लिए हम मसीह की ओर नहीं फिरेंगे, और केवल आराम को छोड़कर स्वर्ग को किसी और कारण से नहीं चाहेंगे। और आराम के लिए स्वर्ग को चाहने को वर्जित किया जाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== जागिये! पाप ऐसा ही है! ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए परमेश्वर, दयापूर्णता से, हमारी बीमारी व कष्ट व विपत्तियों में हमें पुकारता है:- जागो! पाप ऐसा है! पाप ऐसी ही चीजों की ओर ले जाता है। (देखिये, प्रकाशितवाक्य 9:20; 16:9,11।) परमेश्वर के साथ संगति से अधिक टेलीविज़न को पसन्द करना, ऐसा है। स्वर्ग में आराम-चैन की इच्छा करना, किन्तु ‘मुक्तिदाता’ की इच्छा न करना, ऐसा है। प्राकृतिक संसार ऐसी विभीषिकाओं से भरा है जो हमें ये सोचने के स्वप्न-संसार से जगाने का लक्ष्य रखते हैं कि परमेश्वर को अप्रतिष्ठित करना कोई बड़ी बात नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने बैतलेहम में, 9/11 की चैथी बरसी पर इस सत्य का प्रचार किया, इस बात को जानते हुए कि भंयकर दुःखों से जूझते हुए हमारी कलीसिया में लोग थे। दो या तीन सप्ताह पश्चात्, मैं हमारे झुण्ड के साथ एक पूर्व-सेवा प्रार्थना सभा में था, और एक गम्भीर रूप से अशक्त बच्चे की नौजवान माँ ने प्रार्थना की, ‘‘प्रिय प्रभु, मेरी सहायता कीजिये कि जैसा मैं अपने बेटे की विकलांगता की विभीषिका की अनुभूति करती हूँ, उसी प्रकार में पाप की विभीषिका की अनुभूति करूं।’’ भाइयो, मैं एक पासवान् होना पसन्द करता हूँ--परमेश्वर के ‘वचन’ के साथ कांपता हुआ एक दूत। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बड़ी तस्वीर के वर्णन पर वापिस आते हुए:- परमेश्वर ने बिना कुछ के, विश्व की सृष्टि की। जिस तरह से ‘उस’ ने इसे बनाया था, ये सब बहुत अच्छा था। इसमें कोई दोष नहीं था, कोई दुःख नहीं, कोई कष्ट नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई बुराई नहीं। तब आदम और हव्वा ने अपने हृदयों में कुछ किया जो इतना भयावह रूप से बुरा था कि परमेश्वर ने न केवल उन्हें मृत्यु-दण्ड दिया (उत्पत्ति 2: 17), अपितु सारी सृष्टि को ‘‘व्यर्थता’’ के आधीन और ‘‘विनाश के दासत्व’’ में कर दिया (रोमियों 8: 21-22)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब फिर हमारा और इस सृष्टि का क्या होना है जिसे परमेश्वर ने व्यर्थता के आधीन कर दिया है? आप उन माता-पिता से क्या कहते हैं जिनके बच्चों के पास इस जीवन में, एक छः माह के बच्चे से बढ़कर मानसिक ताकत कभी भी नहीं होगी? आंसुओं के साथ और आशा के आनन्द के साथ (‘‘शोकित हैं तथापि सदा आनन्दित’’), आप उन्हें रोमियों 8: 18-25 से इस परिच्छेद का शेष भाग पढ़कर सुनाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं समझता हूं, कि इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के साम्हने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं। क्योंकि सृष्टि बड़ी आशाभरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोह रही है। क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करनेवाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई, कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी। क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कहरते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं। आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है परन्तु जिस वस्तु की आशा की जाती है, जब वह देखने की आए, तो फिर आशा कहां रही? क्योंकि जिस वस्तु को कोई देख रहा है, उस की आशा क्या करेगा? परन्तु जिस वस्तु को हम नहीं देखते, यदि उस की आशा रखते हैं, तो धीरज से उस की बाट जोहते भी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नौजवान पासवानों के लिए, स्पष्टता प्राप्त करने के लिए इस की तुलना में, कुछ और मूल-पाठ और अधिक महत्वपूर्ण हैं। बैतलेहम में आने के पश्चात् सत्ताईस साल पूर्व अपना प्रथम प्रवचन जिसका मैंने उपदेश दिया था, ‘‘क्राइस्ट एण्ड कैंसर’’ कहलाया है। मैं चाहता था कि मेरे लोग बीमारी और दुःख की मेरी धर्मशिक्षा को जानें। मैं चाहता था कि वे जानें कि जब मैं अस्पताल में उनसे मिलने को आया था, मैं यह पूर्वानुमान नहीं कर रहा था कि यदि उनके पास पर्याप्त विश्वास होता, परमेश्वर उन्हें निश्चित ही चंगा कर देता। मैं चाहता था कि वे विशेषतया पद 23 देखें, ‘‘और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कहरते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।’’ अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हुए, ‘आत्मा’ से भरे हुए लोग कहरते हैं। बाइबिल में यह पूरा परिच्छेद, विश्व-मण्डलीय रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण में से एक और पासवानों के लिए सर्वाधिक बहुमूल्य है। यह हमें नये शरीरों के साथ, नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी की ओर ले जाता है, और यह अभी इस युग में हमारे कहरने की परम् यर्थाथ् तस्वीर देता है, और यह हमें उस आशा के साथ सम्भालता है जिस में हम ने उद्धार पाया था। अतः चार टिप्पणियों के साथ मुझे इसे खोलने का प्रयास करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि इस सृष्टि का इसकी व्यर्थता से और विनाश के दासत्व से एक छुटकारा होगा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 21अ:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा … प्राप्त करेगी।’’ प्राकृतिक संसार--पदार्थी, भौतिक संसार --शाप से, व्यर्थता और विनाश की आधीनता से मुक्त किये जायेंगे। नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी के बारे में बताने का ये पौलुस का तरीका है। ये पृथ्वी, ये आकाश, स्वतंत्र किये जावेंगे। ये पृथ्वी एक नयी पृथ्वी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 65:17:- देखो, मैं एक नया आकाश और नई पृथ्वी उत्पन्न करता हूं; और पहिली बातें स्मरण न रहेंगी और सोच विचार में भी न आएंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 66:22:- क्योंकि जिस प्रकार नया आकाश और नई पृथ्वी, जो मैं बनाने पर हूं, मेरे सम्मुख बनी रहेगी, उसी प्रकार तुम्हारा वंश और तुम्हारा नाम भी बना रहेगा; यहोवा की यही वाणी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 पतरस 3:13:- उस की प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नये आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिन में धार्मिकता वास करेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रकाशितवाक्य 21:1, 4:- फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा … और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रेरितों के काम 3: 19-21:- इसलिए, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं, जिस से प्रभु के सन्मुख से विश्रान्ति के दिन आएं। और वह उस मसीह यीशु को भेजे जो तुम्हारे लिये पहिले ही से ठहराया गया है। अवश्य है कि वह स्वर्ग में उस समय तक रहे जब तक कि वह सब बातों का सुधार न कर ले जिस की चर्चा परमेश्वर ने अपने पवित्र भविष्यद्-वक्ताओं के मुख से की है, जो जगत की उत्पत्ति से होते आए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 8: 21 में पौलुस के शब्द, पुरानी पृथ्वी और नयी पृथ्वी के बीच निरन्तरता का एक स्पष्ट साक्षी हैं:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा … प्राप्त करेगी।’’ अतः वह ‘‘नयी’’ का अर्थ ‘‘नयी की गई’’ समझता है, प्रतिस्थापित की गई नहीं। यह ‘‘मुझे एक नयी कार मिली’’ के समान नहीं है। जब कोई चीज स्वतंत्र की जाती है, ये अस्तित्व से बाहर नहीं हो जाती या परित्याग नहीं कर दी जाती। ये बदल सकती है, किन्तु ये अब भी वहाँ है, और स्वतंत्र है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अशक्त बच्चे के साथ उस माँ से जो आप कहते हैं, उनमें से एक है:- आप जानती हैं, बाइबिल सिखाती है कि परमेश्वर की महिमा के लिए यद्यपि आपके बच्चे को इस पृथ्वी पर कूदने और दौड़ने से आजीवन वंचित किया गया है, हर बीमारी और विकलांगता से मुक्त की गई, एक नयी पृथ्वी आ रही है, और उस के पास न केवल आजीवन मात्र होगा, अपितु एक सनातन होगा, परमेश्वर की महिमा के लिए दौड़ने और कूदने के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. विनाश के इसके दासत्व से प्राकृतिक क्रम की यह मुक्ति, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता में एक हिस्सेदारी होगी। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 21:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ यहाँ पर क्रम अर्थ-पूर्ण है। ठीक जैसे कि सृष्टि ने पाप में गिरे मनुष्य का विनाश में अनुसरण किया, उसी प्रकार सृष्टि छुटकारा पाए हुए मनुष्य का महिमा में अनुसरण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दुःख उठाते हुए सन्त एक पीडि़त बच्चे के माता-पिता को कोई व्यक्ति कहने को प्रलोभित हो सकता है, ‘‘आप देखिये कि बाइबिल क्या कहती हैः- प्राकृतिक क्रम--सृष्टि--विनाश से इसके दासत्व से स्वतंत्र की जावेगी। ठीक है, आपका शरीर--अथवा आपके बेटे का शरीर--उस क्रम का हिस्सा है, क्या ऐसा नहीं है? हाँ, आप भी--वह भी--विनाश से इस महिमामय स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे और एक नयी पुनरूत्थान की देह पायेंगे, क्योंकि जो स्वतंत्र किया जा रहा है, आप उसका हिस्सा हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित ही यह वो तरीका नहीं है जैसा कि पौलुस चीजों को देखता है। ये सच है कि हमारे शरीर एक नयी श्रेणी में मुक्त किये जायेंगे। पद 23ब:- ‘‘हम भी … लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।’’ लेकिन हमारे शरीर, सृष्टि का हिस्सा होने के कारण इस नयेपन में बदल नहीं जाते। यह ठीक इसके विपरीत तरह से है। सृष्टि, ‘‘परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता’’ में बदल जायेगी। पद 21:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता पहिले आती है। तब, उनके नये और महिमामय देहों के द्वारा ‘उस’ की सन्तानों को महिमित करने के बाद--जो यीशु ने कहा कि हमारे ‘पिता’ के राज्य में सूर्य के समान चमकेंगे (मत्ती 13: 43) --तब सम्पूर्ण सृष्टि, महिमित परिवार के लिए एक उपयुक्त निवास के रूप में परमेश्वर द्वारा, सज्जित कर दी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आप अशक्त बच्चे के माता-पिता से कहते हैं, ‘‘आपका बच्चा, नये महिमित विश्व के अनुकूल होने के लिए बदल नहीं दिया जावेगा; नया विश्व आपके महिमित बच्चे--और आप के अनुकूल होने के लिए बदल दिया जायेगा।’’ पद 21 की मूल बात ये है कि परमेश्वर अपने बच्चों से प्रेम करता है और जो उनके लिए सर्वोत्तम है, उपलब्ध करता है। इस वाक्यांश पर ध्यान दीजिये, ‘‘परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता।’’ सन्तों की महिमा की स्वतंत्रता नहीं, या मसीहीगणों की महिमा की स्वतंत्रता, या छुड़ाये हुओं की महिमा की स्वतंत्रता नहीं। ये सच होगा। लेकिन पौलुस इस तरह से नहीं सोच रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस के दिमाग में यहाँ पर क्या है, कुछ वो है जो पाँच आयतों पूर्व है--रोमियों 8:16-17:- ‘‘‘आत्मा’ आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, बरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुःख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं।’’ पद 21 में मूल बात ये है कि नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी, सन्तानों की मीरास है। विश्व अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं है। यह परमेश्वर की सन्तानों के खेल के मैदान के रूप में महत्वपूर्ण है--और मंदिर और फ़ार्म और शिल्प की दुकान के रूप में। परमेश्वर अपनी सन्तानों को विश्व के लिए आकार नहीं देता। ‘वह’ विश्व को अपनी सन्तानों के लिए आकार देता है। यह आदि से सच था और यह अन्त में भी सच है, और यह विशेषकर ‘उस’ के देहधारी ‘पुत्र’, परमेश्वर-मनुष्य यीशु मसीह, के लिए सच है। सभी चीजें ‘उस’ के लिए बनायी गई थीं। आपके अशक्त बच्चे को और अधिक अनुकूल नहीं बनना होगा। उसकी देह पूरी तरह छुड़ायी जावेगी और नयी होगी। और सृष्टि में हर चीज उसके अनुकूल होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. नयी, स्वतंत्र की गई सृष्टि के आगमन की तुलना एक जन्म के साथ की गई है, ताकि न केवल इस संसार के साथ निरन्तरता है अपितु अन्तराल भी। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 22:- ‘‘क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाओं (सनोडिवी ) में पड़ी तड़पती है।’’ (अंग्रेजी से सही अनुवादः- ‘‘बच्चा जनने की पीड़ाओं में’’।) जब एक बच्चा पैदा होता है, वो बच्चा एक मानव है, एक घोड़ा नहीं। वहाँ निरन्तरता है। किन्तु वो बच्चा ठीक वही मानव नहीं है। अब मैं नहीं सोचता कि हम इस प्रकार के एक रूपक पर बल दे सकते हैं--नयी पृथ्वी का आगमन, एक बच्चे के जन्म के जैसा है--मानो ये अर्थ हो कि नयी पृथ्वी का पुरानी पृथ्वी से ठीक वही सम्बन्ध है जैसा कि एक बच्चे का एक माँ के साथ होता है। वो शब्दों को बहुत अधिक वजन दे देगा। किन्तु वे अवश्य ही सम्भावित अन्तराल का प्रश्न उठाते हैं और अन्य परिच्छेदों को देखने की ओर हमें भेजते हैं कि देखें कि वहाँ किस प्रकार का अन्तराल हो सकता है। अवश्य ही, वर्तमान संदर्भ कहता है:- यह शरीर, व्यर्थता और विनाश से स्वतंत्र हो जाने वाला है। किन्तु कुछ और अधिक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, हम निरन्तरता और अन्तराल, दोनों की ओर सुस्पष्ट संकेतक पाते हैं। पौलुस में, स्पष्टतम् संकेतक 1 कुरिन्थियों 15 में हैं। वह पद 35 में प्रश्न सामने रखता है:- ‘‘अब कोई ये कहेगा, कि ‘मुर्दे किस रीति से जी उठते हैं, और कैसी देह के साथ आते हैं?’’’ फिर वह इस प्रकार के शब्दों के साथ उत्तर देता है। 37-51 आयतें:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और जो तू बोता है, यह वह देह नहीं जो उत्पन्न होनेवाली है (वो अन्तराल है), परन्तु निरा दाना है, चाहे गेहूं का, चाहे किसी और अनाज का। परन्तु परमेश्वर अपनी इच्छा के अनुसार उसको देह देता है; और हर एक बीज को उसकी विशेष देह {यह ठीक सृष्टिकर्ता के समान ध्वनित होता है, मात्र छुटकारा देनेवाले के समान नहीं, जो कि तसल्ली देनेवाला है जब आप सोचते हैं कि आपके पुरखों की देह अब विघटित हो चुकी हैं, और वे परमाणु जिन्होंने उनकी देहों को बनाया, अब हजारों अन्य लोगों और पौधों और पशुओं में हैं} … शरीर नाशमान दशा में बोया जाता है, और अविनाशी रूप में जी उठता है। वह अनादर के साथ बोया जाता है, और तेज के साथ जी उठता है; निर्बलता के साथ बोया जाता है; और सामर्थ के साथ जी उठता है। स्वाभाविक देह बोई जाती है, और आत्मिक देह जी उठती है। {बार-बार वह कहता है, यह बोया गया था और वही यह जिलाया गया है। वो निरन्तरता है।} जब कि स्वाभाविक देह है, तो आत्मिक देह भी है {अतः शब्द देह में निरन्तरता निहित है और प्राकृतिक और आत्मिक शब्दों में अन्तराल निहित है} … जैसे हम ने उसका रूप जो मिट्टी का था, धारण किया वैसे ही उस स्वर्गीय का रूप भी धारण करेंगे। {रूप अभिन्न नहीं हैं; वहां अन्तराल और निरन्तरता है।} हे भाइयो, मैं यह कहता हूं कि मांस और लोहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है। देखो! मैं तुम से भेद की बात कहता हूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवश्य ही, एक भेद। हम सब बदल जाएंगे। किन्तु, जैसा कि यूहन्ना कहता है, ‘‘हे प्रियो, अभी हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे’’ (1 यूहन्ना 3:2)। यीशु ने कहा, ‘‘जी उठने पर ब्याह शादी न होगी; परन्तु वे स्वर्ग में परमेश्वर के दूतों की नाईं होंगे (मत्ती 22:30)। चीजें भिन्न होंगी। उदाहरण के लिए, पतरस, अपनी दूसरी पत्री में, वर्तमान संसार का एक सरल पुनसर्थापन या सुधार नहीं देखता। 2 पतरस 3:7 में वह कहता है, ‘‘वर्तमान काल के आकाश और पृथ्वी उसी वचन के द्वारा इसलिये रखे हैं, कि जलाए जाएं; और वह भक्तिहीन मनुष्यों के न्याय और नाश होने के दिन तक ऐसे ही रखे रहेंगे।’’ प्रेरित यूहन्ना कहता है, ‘‘पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा’’ (प्रकाशितवाक्य 21:1)। ‘‘और उस नगर में सूर्य और चान्द के उजाले का प्रयोजन नहीं, क्योंकि परमेश्वर के तेज से उस में उजाला हो रहा है, और मेम्ना उसका दीपक है’’ (प्रकाशितवाक्य 21:23)। ‘‘और फिर रात न होगी’’’ (प्रकाशितवाक्य 22:5)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोई रात नहीं, सूरज नहीं, चान्द नहीं, समुद्र नहीं, विवाह नहीं, एक संसार में आग में से आत्मिक देह लाये गए। और तथापि निरन्तरता--फिलिप्पियों 3:21:- ‘‘वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिस के द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा के देह के अनुकूल बना देगा।’’ और यीशु की पुनरुत्थान की देह किस प्रकार की थी जिस के समान हमारी देह होगी? ये पहचाने जाने लायक थी। यह आकाशीय रूप से अबोध्य थी, असाधारण तरीकों से आने और अदृश्य हो जाने वाली। और फिर भी लूका 24:39-43 के इन चकित करनेवाले और महत्वपूर्ण शब्दों को देखिये: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।’’ यह कहकर उस ने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए। जब आनन्द के मारे उन को प्रतीति न हुई, और आश्चर्य करते थे, तो उस ने उन से पूछा; ‘‘क्या यहां तुम्हारे पास कुछ भोजन है?’’ उन्हों ने उसे भूनी मछली का टुकड़ा दिया। उस ने लेकर उन के साम्हने खाया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उस’ ने मछली खाया। अतः तीसरा मूल बात है:- नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी में, इस संसार के साथ निरन्तरता होगी और एक इस प्रकार का अन्तराल जो हमारे लिए एक ‘‘भेद’’ रह जाता है। अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे। हम अवश्य जानते हैं कि हम उस के समान होंगे। अतः जब अशक्त बच्चे के माता-पिता पूछते हैं, ‘‘क्या हमारा बेटा बढ़ेगा? क्या वह अपने आप से खायेगा? क्या वह सृष्टि के साथ कुछ कर सकेगा?’’ हम कहेंगे, परमेश्वर ने संसार को इसलिए नहीं बनाया और संरक्षित रखा कि तबाह किया जावे। आपका बेटा यीशु के साथ खायेगा। परमेश्वर उसे एक ऐसे स्तर का विकास देगा जो उसके सबसे बड़े आनन्द का और परमेश्वर की महानतम् महिमा के लिए होगा। लेकिन बहुत भेद है। हम एक कांच में से धुंधला देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इतने अधिक भेद के प्रकाश में उनका सबसे गहरा आश्वासन् क्या है? और उनके पुत्र के लिए--और उनके लिए, उनकी सबसे ऊंची आशा क्या है? ये अन्ततः हमें चैथी टिप्पणी की ओर, और यीशु मसीह के सुसमाचार की ओर ले आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4. नयी सृष्टि में छुटकारा पाये हुए देहों को पाने की आशा, हमारे उद्धार के द्वारा सुरक्षित है, जिसे हम सुसमाचार में विश्वास के द्वारा प्राप्त करते हैं, किन्तु ये हमारी सर्वोत्तम आशा नहीं है। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशेष रूप से रोमियों 8:23ब-24 पर ध्यान दीजिये:- ‘‘हम भी … लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं। आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है {अंग्रेजी से सही अनुवादः- क्योंकि इसी आशा में हमारा उद्धार हुआ था }’’ उसका क्या अर्थ है--‘‘इसी आशा में हमारा उद्धार हुआ था?’’ यह एक सम्प्रदान कारक है (टे गार एलपिडि ईसोथेमैन)। शायद उद्धरण का एक सम्प्रदान कारक:- इस आशा के संदर्भ में हमारा उद्धार हुआ। निश्चित ही यह इस अर्थे को सम्मिलित करेगा कि, जब हमारा उद्धारा हुआ था, यह आशा हमारे लिए सुरक्षित की गई थी। और चूंकि हमारा उद्धार, इस सुसमाचार पर भरोसा करने के द्वारा होता है कि मसीह हमारे पापों के लिए मर गया और फिर जी उठा (1 कुरिन्थियों 15:1-3), ये आशा, सुसमाचार के द्वारा सुरक्षित की गई है। इस आशा तक हमें लाने में सुसमाचार विजयी होता है (रोमियों 6:5; 8:11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु हमें इसे वहीं नहीं छोड़ देना चाहिए। सुसमाचार, एक चट्टान के समान ठोस आश्वासन् है कि नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी होगें और यह कि हम छुटकारा पाये हुए देहों के साथ जिलाये जायेंगे कि वहाँ सदा के लिए रहें। हमारे स्थान पर मसीह को क्रूसित किये जाने का सुसमाचार, हमारी क्षमा हमें प्रदान करते हुए और हमारी धार्मिकता प्रदान करते हुए और सभी चीजों के ऊपर अधिकार के साथ मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, इस काम को न्यायसंगत प्रमाणित करना--यही है जो हम इन माता-पिता को बतायेंगे, जब वे भय और ग्लानि के सम्मुख किसी चट्टान को ढूंढ रहे हैं कि खड़े हो सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार का परम उपहार: क्रूसित मसीह में परमेश्वर देखा गया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सुसमाचार का परम उपहार, नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी नहीं है। सुसमाचार की परम अच्छाई, एक छुटकारा पायी हुई देह नहीं है। सुसमाचार की परम भलाई क्षमा, या छुटकारा, या प्रायश्चित, या धर्मी ठहराया जाना, नहीं है। ये सभी एक अन्त के लिए माध्यम हैं। सुसमाचार की परम अच्छाई जो सुसमाचार को शुभ-संदेश बनाता है, और जिसके बिना इनमें से कोई भी उपहार शुभ-संदेश नहीं होंते, वो है स्वयँ परमेश्वर--जो ‘उस’ के क्रूसित और जी उठे ‘पुत्र’ की महिमा में देखा जाता है, और उसकी असीम सुन्दरता के कारण आनन्द उठाया जाता है, और उसके असीम मूल्य के कारण संजोया जाता है, और प्रतिबिम्बित किया जाता है क्योंकि हम उसके ‘पुत्र’ के स्वरूप के सदृश्य कर दिये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार: परमेश्वर की महिमा का पूरा-पूरा प्रदर्शन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अन्तिम कारण कि एक नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी है, यह कि चूंकि जी उठा मसीह अपनी मानव देह को कभी भी नहीं त्यागेगा अपितु कलवरी के सनातन प्रतीक के रूप में रखेगा, जहाँ परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा का सर्वाधिक पूर्णरूपेण प्रर्दशन किया गया था। सर्वप्रथम सम्पूर्ण भौतिक विश्व की सृष्टि हुई, और फिर इसका नया रूप दिया गया, ताकि ‘परमेश्वर का पुत्र’ एक मनुष्य के रूप में देह धारण कर सके, शरीर में दुःख उठाये, क्रूस पर चढ़ाया जावे, मृतकों में से जी उठे, और परमेश्वर-मनुष्य के रूप में राज्य करे और छुटकारे पाये हुए लोगों को अनगिनत भीड़ द्वारा घेरा जावे, जो, हमारी आत्मिक देहों में गाये और बोले और काम करे और खेले और प्रेम करे, उन तरीकों से जो उसकी महिमा को पूर्ण स्पष्टतया दृश्य रूप से प्रतिबिम्बित करते हैं, क्योंकि हमारे पास शरीर हैं, ऐसे संसार में, जो आत्मिक व भौतिक रूप से परमेश्वर की महिमा से कान्तिमय/प्रकाशमान् हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नये स्वर्गां और नयी पृथ्वी में सुसमाचार की विजय</title>
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				<updated>2018-03-09T21:03:45Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|The Triumph of the Gospel in the New Heavens and the New Earth}}   बाइबिल के प्रथम अध्याय की प्रथम आयत क...&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{info|The Triumph of the Gospel in the New Heavens and the New Earth}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल के प्रथम अध्याय की प्रथम आयत कहती है, ‘‘आदि में परमेश्वर ने आकाश (स्वर्गों) और पृथ्वी की सृष्टि की।’’ पद 27 में परमेश्वर मनुष्य की सृष्टि नर और नारी के रूप में अपने स्वरूप में करता है, और फिर 31 पद में कहता है कि ये सब बहुत ही अच्छा है। अध्याय तीन में, आदम और हव्वा, परमेश्वर को उनकी सर्वोत्कृष्ट बुद्धि और सुन्दरता और लालसा के रूप में तिरस्कार करते हैं और इस प्रकार अपने ऊपर, उनकी भावी-पीढि़यों, और सृष्टि के प्राकृतिक क्रम पर, परमेश्वर का श्राप ले आते हैं:- ‘‘भूमि तुम्हारे कारण शापित है (यहोवा परमेश्वर कहता है); तू उसकी उपज जीवन भर दुःख के साथ खाया करेगा’’ (उत्पत्ति 3: 17)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्पत्ति 3: 15, आशा बनाये रखता है कि ये शाप, परमेश्वर की सृष्टि के लिए अंतिम शब्द नहीं रहेंगे। परमेश्वर, प्राण-विनाशक, सृष्टि-विनाशक सर्प से कहता है, ‘‘मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच बैर उत्पन्न करूंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।’’ पौलुस प्रेरित इस आशा को इस पद के मध्य देखता है और रोमियों 8: 20-21 में इसे इस ढंग से रखता है:- ‘‘क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करनेवाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई, कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दुःख का असहनीय दृश्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बड़ी तस्वीर, रूपरेखा के रूप में:- परमेश्वर ने बिना कुछ से विश्व की सृष्टि की; जिस तरह से ‘उस’ ने इसे बनाया, यह सब बहुत अच्छा था; इसमें कोई दोष नहीं थे, कोई दुःख नहीं, कोई दर्द नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई बुराई नहीं; और तब आदम और हव्वा ने उनके हृदयों में कुछ किया जो इतना भयावह रूप से बुरा था--इतना अकथ्य रूप से दुष्ट, परमेश्वर की संगति से एक पेड़ के फल को अधिक पसन्द करते हुए--कि परमेश्वर ने न केवल उन पर मृत्यु दण्ड की आज्ञा दी (उत्पत्ति 2: 17), वरन् सम्पूर्ण सृष्टि को उसके आधीन कर दिया, जिसे पौलुस ने ‘‘व्यर्थता’’ और विनाश का दासत्व’’ (रोमियों 8: 21-22) कहा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जबकि एक समय कोई दुःख या दर्द या मृत्यु नहीं थी, अब प्रत्येक मानव मरता है, प्रत्येक मानव दुःख भोगता है, पशु दुःख भोगते हैं, नदियाँ अचानक अपने किनारों से उफनती हैं और गांवों को बहा ले जाती हैं, हिमस्खलन ‘स्कीइंग’ करनेवालों को दफ़न कर देते हैं, ज्वालमुखी पूरे-पूरे शहरों को नाश कर देते हैं, एक ‘सूनामी’ एक रात में 2,50,000 लोगों को मार डालता है, तूफान 800 सवार लोगों सहित फिलिप्पीनी नौकाओं को डुबा देता है, ‘एड्स’ और मलेरिया और कैंसर और हृदय-रोग लाखों वृद्ध व जवान लोगों मार डालते हैं, एक दैत्याकार टॉरनेडो (बवण्डर) सारे ‘मिडवैस्टर्न’ शहर को उखाड़ देता है, सूखा और आकाल लाखों को भूखे मरने की कग़ार पर--या कग़ार से भी आगे ले आते हैं। मौज में चलते हुए दुर्घटनाएं होती हैं, और एक मित्र का पुत्र, अनाज उठाने की मशीन में गिर जाता है और मर जाता है। एक अन्य, एक आँख खो देता है। और एक शिशु बिना चेहरे के पैदा होता है। यदि हम एक क्षण में, इस संसार के दुःखों का दस हजार में से एक भाग भी देख सकते, हम इस सब की भयावहता से मर जाते। केवल परमेश्वर ही उस दृश्य को सहन कर सकता और अपना काम जारी रख सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सृष्टि की व्यर्थता में चित्रित पाप की बीभत्सता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्यों परमेश्वर ने मानव-जीवधारियों के पाप के कारण, प्राकृतिक क्रम को ऐसी व्यर्थता के आधीन कर दिया? प्राकृतिक क्रम ने पाप नहीं किया। मानव-जीवधारियों ने पाप किया। किन्तु पौलुस कहता है, ‘‘सृष्टि, व्यर्थता के आधीन की गई।’’ सृष्टि, ‘‘विनाश के दासत्व’’ में कर दी गई। क्यों? परमेश्वर ने कहा, ‘‘भूमि तुम्हारे कारण शापित है’’ (उत्पत्ति 3:17)। लेकिन क्यों? मनुष्य में नैतिक असफलताओं के प्रत्युत्तर में, सृष्टि में प्राकृतिक आपदाएँ क्यों हैं? आदम के दोषी सन्तानों के लिए मात्र सरल मृत्यु क्यों नहीं? क्यों शताब्दि के बाद शताब्दि तक भयावह दुःख के ये रक्तरंजित बहुमूर्तिदर्शी? क्यों हृदय- मरोड़नेवाली अशक्तताओं के साथ, इतने सारे बच्चे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर ये है कि परमेश्वर ने प्राकृतिक संसार को एक शाप के आधीन कर दिया ताकि बीमारियों व विपत्तियों में जो भौतिक विभीषिकाएँ हम अपने चारों ओर देखते हैं, इसका जीता-जागता चित्र बन जावें कि पाप कितना भयानक है। दूसरे शब्दों में, प्राकृतिक बुराई, नैतिक बुराई की अकथ्य बीभत्सता की ओर इंगित करता हुआ, एक मार्गपट्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नैतिक और आत्मिक संसार की विकृति--अर्थात्, पाप के कारण, परमेश्वर ने प्राकृतिक संसार को अस्तव्यस्त कर दिया। हमारी वर्तमान पतित दशा में, पाप की अत्याधिक दुष्टता के प्रति इतने अधिक अन्धे हो गए हमारे हृदयों के साथ, हम देख या अनुभूति नहीं कर सकते कि पाप कितना घिनावना है। कदाचित् ही संसार में कोई घृणित बुराई की अनुभूति करता है जो कि हमारा पाप है। जिस तरह से वे परमेश्वर की महिमा कम करते हैं, लगभग कोई भी उत्तेजित नहीं होता या उसका जी नहीं मिचलाता। लेकिन उनके शरीरों को दर्द छूने भी दो, और परमेश्वर को स्वयं की सफाई देने के लिए बुलाया जाता है। जिस तरह से हम उसकी महिमा को चोट पहुंचाते हैं, हम उससे विचलित नहीं होते, लेकिन ‘उसे’ हमारी प्यारी छोटी अंगुली को चोट तो पहुंचाने दो और हमारा सारा नीति-गत क्रोध उभर आता है। जो दिखाता है कि हम स्वयँ को कितना ऊंचा करनेवाले और परमेश्वर को ‘उस’ के पद से उतारनेवाले हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शारीरिक दर्द की तुरही का तूर्यनाद/उच्चनाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शारीरिक कष्ट, एक भौतिक तुरही के साथ परमेश्वर का उच्चनाद है कि हमें बताये कि नैतिक और आत्मिक रूप से कुछ भयानक रूप से गलत है। बीमारियाँ और विकृतियाँ, शैतान का घमण्ड हैं। किन्तु परमेश्वर के प्रत्यादेश विधान में, वे परमेश्वर के शब्दचित्र हैं कि आत्मिक परिमण्डल में पाप कैसा है। वो सच है हालांकि कुछ अत्याधिक भक्तिपूर्ण लोग, उन विकृतियों को सहन करते हैं। पाप क्या पात्रता रखता है, विपत्तियाँ उसका परमेश्वर के पूर्वदर्शन हैं, और यह कि एक दिन हजार गुना अधिक बुरा दण्ड पायेगा। वे चेतावनियाँ हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
काश, हम सब देख सकते और महसूस कर सकते कि हमारे ‘बनानेवाले’ से बढ़कर किसी भी चीज को अधिक महत्व देना, ‘उसे’ अनदेखा करना और ‘उसे’ अविश्वास करना और ‘उसे’ अप्रतिष्ठित करना और हमारे बैठक के कमरे के फर्श पर के गलीचे की तुलना में, अपने हृदयों में ‘उसे’ कम ध्यान देना, कितना प्रतिकूल, कितना अपमानजनक, कितना घृणित है। हमें इसे अवश्य देखना है, अन्यथा पाप से उद्धार के लिए हम मसीह की ओर नहीं फिरेंगे, और केवल आराम को छोड़कर स्वर्ग को किसी और कारण से नहीं चाहेंगे। और आराम के लिए स्वर्ग को चाहने को वर्जित किया जाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== जागिये! पाप ऐसा ही है! ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए परमेश्वर, दयापूर्णता से, हमारी बीमारी व कष्ट व विपत्तियों में हमें पुकारता है:- जागो! पाप ऐसा है! पाप ऐसी ही चीजों की ओर ले जाता है। (देखिये, प्रकाशितवाक्य 9:20; 16:9,11।) परमेश्वर के साथ संगति से अधिक टेलीविज़न को पसन्द करना, ऐसा है। स्वर्ग में आराम-चैन की इच्छा करना, किन्तु ‘मुक्तिदाता’ की इच्छा न करना, ऐसा है। प्राकृतिक संसार ऐसी विभीषिकाओं से भरा है जो हमें ये सोचने के स्वप्न-संसार से जगाने का लक्ष्य रखते हैं कि परमेश्वर को अप्रतिष्ठित करना कोई बड़ी बात नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने बैतलेहम में, 9/11 की चैथी बरसी पर इस सत्य का प्रचार किया, इस बात को जानते हुए कि भंयकर दुःखों से जूझते हुए हमारी कलीसिया में लोग थे। दो या तीन सप्ताह पश्चात्, मैं हमारे झुण्ड के साथ एक पूर्व-सेवा प्रार्थना सभा में था, और एक गम्भीर रूप से अशक्त बच्चे की नौजवान माँ ने प्रार्थना की, ‘‘प्रिय प्रभु, मेरी सहायता कीजिये कि जैसा मैं अपने बेटे की विकलांगता की विभीषिका की अनुभूति करती हूँ, उसी प्रकार में पाप की विभीषिका की अनुभूति करूं।’’ भाइयो, मैं एक पासवान् होना पसन्द करता हूँ--परमेश्वर के ‘वचन’ के साथ कांपता हुआ एक दूत। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बड़ी तस्वीर के वर्णन पर वापिस आते हुए:- परमेश्वर ने बिना कुछ के, विश्व की सृष्टि की। जिस तरह से ‘उस’ ने इसे बनाया था, ये सब बहुत अच्छा था। इसमें कोई दोष नहीं था, कोई दुःख नहीं, कोई कष्ट नहीं, कोई मृत्यु नहीं, कोई बुराई नहीं। तब आदम और हव्वा ने अपने हृदयों में कुछ किया जो इतना भयावह रूप से बुरा था कि परमेश्वर ने न केवल उन्हें मृत्यु-दण्ड दिया (उत्पत्ति 2: 17), अपितु सारी सृष्टि को ‘‘व्यर्थता’’ के आधीन और ‘‘विनाश के दासत्व’’ में कर दिया (रोमियों 8: 21-22)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब फिर हमारा और इस सृष्टि का क्या होना है जिसे परमेश्वर ने व्यर्थता के आधीन कर दिया है? आप उन माता-पिता से क्या कहते हैं जिनके बच्चों के पास इस जीवन में, एक छः माह के बच्चे से बढ़कर मानसिक ताकत कभी भी नहीं होगी? आंसुओं के साथ और आशा के आनन्द के साथ (‘‘शोकित हैं तथापि सदा आनन्दित’’), आप उन्हें रोमियों 8: 18-25 से इस परिच्छेद का शेष भाग पढ़कर सुनाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं समझता हूं, कि इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के साम्हने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं। क्योंकि सृष्टि बड़ी आशाभरी दृष्टि से परमेश्वर के पुत्रों के प्रगट होने की बाट जोह रही है। क्योंकि सृष्टि अपनी इच्छा से नहीं पर आधीन करनेवाले की ओर से व्यर्थता के आधीन इस आशा से की गई, कि सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी। क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाओं में पड़ी तड़पती है। और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कहरते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं। आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है परन्तु जिस वस्तु की आशा की जाती है, जब वह देखने की आए, तो फिर आशा कहां रही? क्योंकि जिस वस्तु को कोई देख रहा है, उस की आशा क्या करेगा? परन्तु जिस वस्तु को हम नहीं देखते, यदि उस की आशा रखते हैं, तो धीरज से उस की बाट जोहते भी हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नौजवान पासवानों के लिए, स्पष्टता प्राप्त करने के लिए इस की तुलना में, कुछ और मूल-पाठ और अधिक महत्वपूर्ण हैं। बैतलेहम में आने के पश्चात् सत्ताईस साल पूर्व अपना प्रथम प्रवचन जिसका मैंने उपदेश दिया था, ‘‘क्राइस्ट एण्ड कैंसर’’ कहलाया है। मैं चाहता था कि मेरे लोग बीमारी और दुःख की मेरी धर्मशिक्षा को जानें। मैं चाहता था कि वे जानें कि जब मैं अस्पताल में उनसे मिलने को आया था, मैं यह पूर्वानुमान नहीं कर रहा था कि यदि उनके पास पर्याप्त विश्वास होता, परमेश्वर उन्हें निश्चित ही चंगा कर देता। मैं चाहता था कि वे विशेषतया पद 23 देखें, ‘‘और केवल वही नहीं पर हम भी जिन के पास आत्मा का पहिला फल है, आप ही अपने में कहरते हैं; और लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।’’ अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हुए, ‘आत्मा’ से भरे हुए लोग कहरते हैं। बाइबिल में यह पूरा परिच्छेद, विश्व-मण्डलीय रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण में से एक और पासवानों के लिए सर्वाधिक बहुमूल्य है। यह हमें नये शरीरों के साथ, नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी की ओर ले जाता है, और यह अभी इस युग में हमारे कहरने की परम् यर्थाथ् तस्वीर देता है, और यह हमें उस आशा के साथ सम्भालता है जिस में हम ने उद्धार पाया था। अतः चार टिप्पणियों के साथ मुझे इसे खोलने का प्रयास करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि इस सृष्टि का इसकी व्यर्थता से और विनाश के दासत्व से एक छुटकारा होगा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 21अ:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा … प्राप्त करेगी।’’ प्राकृतिक संसार--पदार्थी, भौतिक संसार --शाप से, व्यर्थता और विनाश की आधीनता से मुक्त किये जायेंगे। नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी के बारे में बताने का ये पौलुस का तरीका है। ये पृथ्वी, ये आकाश, स्वतंत्र किये जावेंगे। ये पृथ्वी एक नयी पृथ्वी होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 65:17:- देखो, मैं एक नया आकाश और नई पृथ्वी उत्पन्न करता हूं; और पहिली बातें स्मरण न रहेंगी और सोच विचार में भी न आएंगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 66:22:- क्योंकि जिस प्रकार नया आकाश और नई पृथ्वी, जो मैं बनाने पर हूं, मेरे सम्मुख बनी रहेगी, उसी प्रकार तुम्हारा वंश और तुम्हारा नाम भी बना रहेगा; यहोवा की यही वाणी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 पतरस 3:13:- उस की प्रतिज्ञा के अनुसार हम एक नये आकाश और नई पृथ्वी की आस देखते हैं जिन में धार्मिकता वास करेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रकाशितवाक्य 21:1, 4:- फिर मैं ने नये आकाश और नयी पृथ्वी को देखा, क्योंकि पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा … और वह उन की आंखों से सब आंसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती रहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रेरितों के काम 3: 19-21:- इसलिए, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं, जिस से प्रभु के सन्मुख से विश्रान्ति के दिन आएं। और वह उस मसीह यीशु को भेजे जो तुम्हारे लिये पहिले ही से ठहराया गया है। अवश्य है कि वह स्वर्ग में उस समय तक रहे जब तक कि वह सब बातों का सुधार न कर ले जिस की चर्चा परमेश्वर ने अपने पवित्र भविष्यद्-वक्ताओं के मुख से की है, जो जगत की उत्पत्ति से होते आए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 8: 21 में पौलुस के शब्द, पुरानी पृथ्वी और नयी पृथ्वी के बीच निरन्तरता का एक स्पष्ट साक्षी हैं:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा … प्राप्त करेगी।’’ अतः वह ‘‘नयी’’ का अर्थ ‘‘नयी की गई’’ समझता है, प्रतिस्थापित की गई नहीं। यह ‘‘मुझे एक नयी कार मिली’’ के समान नहीं है। जब कोई चीज स्वतंत्र की जाती है, ये अस्तित्व से बाहर नहीं हो जाती या परित्याग नहीं कर दी जाती। ये बदल सकती है, किन्तु ये अब भी वहाँ है, और स्वतंत्र है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अशक्त बच्चे के साथ उस माँ से जो आप कहते हैं, उनमें से एक है:- आप जानती हैं, बाइबिल सिखाती है कि परमेश्वर की महिमा के लिए यद्यपि आपके बच्चे को इस पृथ्वी पर कूदने और दौड़ने से आजीवन वंचित किया गया है, हर बीमारी और विकलांगता से मुक्त की गई, एक नयी पृथ्वी आ रही है, और उस के पास न केवल आजीवन मात्र होगा, अपितु एक सनातन होगा, परमेश्वर की महिमा के लिए दौड़ने और कूदने के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. विनाश के इसके दासत्व से प्राकृतिक क्रम की यह मुक्ति, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता में एक हिस्सेदारी होगी। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 21:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ यहाँ पर क्रम अर्थ-पूर्ण है। ठीक जैसे कि सृष्टि ने पाप में गिरे मनुष्य का विनाश में अनुसरण किया, उसी प्रकार सृष्टि छुटकारा पाए हुए मनुष्य का महिमा में अनुसरण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दुःख उठाते हुए सन्त एक पीडि़त बच्चे के माता-पिता को कोई व्यक्ति कहने को प्रलोभित हो सकता है, ‘‘आप देखिये कि बाइबिल क्या कहती हैः- प्राकृतिक क्रम--सृष्टि--विनाश से इसके दासत्व से स्वतंत्र की जावेगी। ठीक है, आपका शरीर--अथवा आपके बेटे का शरीर--उस क्रम का हिस्सा है, क्या ऐसा नहीं है? हाँ, आप भी--वह भी--विनाश से इस महिमामय स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे और एक नयी पुनरूत्थान की देह पायेंगे, क्योंकि जो स्वतंत्र किया जा रहा है, आप उसका हिस्सा हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित ही यह वो तरीका नहीं है जैसा कि पौलुस चीजों को देखता है। ये सच है कि हमारे शरीर एक नयी श्रेणी में मुक्त किये जायेंगे। पद 23ब:- ‘‘हम भी … लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं।’’ लेकिन हमारे शरीर, सृष्टि का हिस्सा होने के कारण इस नयेपन में बदल नहीं जाते। यह ठीक इसके विपरीत तरह से है। सृष्टि, ‘‘परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता’’ में बदल जायेगी। पद 21:- ‘‘सृष्टि भी आप ही विनाश के दासत्व से छुटकारा पाकर, परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता प्राप्त करेगी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता पहिले आती है। तब, उनके नये और महिमामय देहों के द्वारा ‘उस’ की सन्तानों को महिमित करने के बाद--जो यीशु ने कहा कि हमारे ‘पिता’ के राज्य में सूर्य के समान चमकेंगे (मत्ती 13: 43) --तब सम्पूर्ण सृष्टि, महिमित परिवार के लिए एक उपयुक्त निवास के रूप में परमेश्वर द्वारा, सज्जित कर दी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आप अशक्त बच्चे के माता-पिता से कहते हैं, ‘‘आपका बच्चा, नये महिमित विश्व के अनुकूल होने के लिए बदल नहीं दिया जावेगा; नया विश्व आपके महिमित बच्चे--और आप के अनुकूल होने के लिए बदल दिया जायेगा।’’ पद 21 की मूल बात ये है कि परमेश्वर अपने बच्चों से प्रेम करता है और जो उनके लिए सर्वोत्तम है, उपलब्ध करता है। इस वाक्यांश पर ध्यान दीजिये, ‘‘परमेश्वर की सन्तानों की महिमा की स्वतंत्रता।’’ सन्तों की महिमा की स्वतंत्रता नहीं, या मसीहीगणों की महिमा की स्वतंत्रता, या छुड़ाये हुओं की महिमा की स्वतंत्रता नहीं। ये सच होगा। लेकिन पौलुस इस तरह से नहीं सोच रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस के दिमाग में यहाँ पर क्या है, कुछ वो है जो पाँच आयतों पूर्व है--रोमियों 8:16-17:- ‘‘‘आत्मा’ आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है, कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। और यदि सन्तान हैं, तो वारिस भी, बरन परमेश्वर के वारिस और मसीह के संगी वारिस हैं, जब कि हम उसके साथ दुःख उठाएं कि उसके साथ महिमा भी पाएं।’’ पद 21 में मूल बात ये है कि नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी, सन्तानों की मीरास है। विश्व अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं है। यह परमेश्वर की सन्तानों के खेल के मैदान के रूप में महत्वपूर्ण है--और मंदिर और फ़ार्म और शिल्प की दुकान के रूप में। परमेश्वर अपनी सन्तानों को विश्व के लिए आकार नहीं देता। ‘वह’ विश्व को अपनी सन्तानों के लिए आकार देता है। यह आदि से सच था और यह अन्त में भी सच है, और यह विशेषकर ‘उस’ के देहधारी ‘पुत्र’, परमेश्वर-मनुष्य यीशु मसीह, के लिए सच है। सभी चीजें ‘उस’ के लिए बनायी गई थीं। आपके अशक्त बच्चे को और अधिक अनुकूल नहीं बनना होगा। उसकी देह पूरी तरह छुड़ायी जावेगी और नयी होगी। और सृष्टि में हर चीज उसके अनुकूल होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. नयी, स्वतंत्र की गई सृष्टि के आगमन की तुलना एक जन्म के साथ की गई है, ताकि न केवल इस संसार के साथ निरन्तरता है अपितु अन्तराल भी। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 22:- ‘‘क्योंकि हम जानते हैं, कि सारी सृष्टि अब तक मिलकर कहरती और पीड़ाओं (सनोडिवी ) में पड़ी तड़पती है।’’ (अंग्रेजी से सही अनुवादः- ‘‘बच्चा जनने की पीड़ाओं में’’।) जब एक बच्चा पैदा होता है, वो बच्चा एक मानव है, एक घोड़ा नहीं। वहाँ निरन्तरता है। किन्तु वो बच्चा ठीक वही मानव नहीं है। अब मैं नहीं सोचता कि हम इस प्रकार के एक रूपक पर बल दे सकते हैं--नयी पृथ्वी का आगमन, एक बच्चे के जन्म के जैसा है--मानो ये अर्थ हो कि नयी पृथ्वी का पुरानी पृथ्वी से ठीक वही सम्बन्ध है जैसा कि एक बच्चे का एक माँ के साथ होता है। वो शब्दों को बहुत अधिक वजन दे देगा। किन्तु वे अवश्य ही सम्भावित अन्तराल का प्रश्न उठाते हैं और अन्य परिच्छेदों को देखने की ओर हमें भेजते हैं कि देखें कि वहाँ किस प्रकार का अन्तराल हो सकता है। अवश्य ही, वर्तमान संदर्भ कहता है:- यह शरीर, व्यर्थता और विनाश से स्वतंत्र हो जाने वाला है। किन्तु कुछ और अधिक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, हम निरन्तरता और अन्तराल, दोनों की ओर सुस्पष्ट संकेतक पाते हैं। पौलुस में, स्पष्टतम् संकेतक 1 कुरिन्थियों 15 में हैं। वह पद 35 में प्रश्न सामने रखता है:- ‘‘अब कोई ये कहेगा, कि ‘मुर्दे किस रीति से जी उठते हैं, और कैसी देह के साथ आते हैं?’’’ फिर वह इस प्रकार के शब्दों के साथ उत्तर देता है। 37-51 आयतें:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और जो तू बोता है, यह वह देह नहीं जो उत्पन्न होनेवाली है (वो अन्तराल है), परन्तु निरा दाना है, चाहे गेहूं का, चाहे किसी और अनाज का। परन्तु परमेश्वर अपनी इच्छा के अनुसार उसको देह देता है; और हर एक बीज को उसकी विशेष देह {यह ठीक सृष्टिकर्ता के समान ध्वनित होता है, मात्र छुटकारा देनेवाले के समान नहीं, जो कि तसल्ली देनेवाला है जब आप सोचते हैं कि आपके पुरखों की देह अब विघटित हो चुकी हैं, और वे परमाणु जिन्होंने उनकी देहों को बनाया, अब हजारों अन्य लोगों और पौधों और पशुओं में हैं} … शरीर नाशमान दशा में बोया जाता है, और अविनाशी रूप में जी उठता है। वह अनादर के साथ बोया जाता है, और तेज के साथ जी उठता है; निर्बलता के साथ बोया जाता है; और सामर्थ के साथ जी उठता है। स्वाभाविक देह बोई जाती है, और आत्मिक देह जी उठती है। {बार-बार वह कहता है, यह बोया गया था और वही यह जिलाया गया है। वो निरन्तरता है।} जब कि स्वाभाविक देह है, तो आत्मिक देह भी है {अतः शब्द देह में निरन्तरता निहित है और प्राकृतिक और आत्मिक शब्दों में अन्तराल निहित है} … जैसे हम ने उसका रूप जो मिट्टी का था, धारण किया वैसे ही उस स्वर्गीय का रूप भी धारण करेंगे। {रूप अभिन्न नहीं हैं; वहां अन्तराल और निरन्तरता है।} हे भाइयो, मैं यह कहता हूं कि मांस और लोहू परमेश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं हो सकते, और न विनाश अविनाशी का अधिकारी हो सकता है। देखो! मैं तुम से भेद की बात कहता हूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अवश्य ही, एक भेद। हम सब बदल जाएंगे। किन्तु, जैसा कि यूहन्ना कहता है, ‘‘हे प्रियो, अभी हम परमेश्वर की सन्तान हैं, और अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे’’ (1 यूहन्ना 3:2)। यीशु ने कहा, ‘‘जी उठने पर ब्याह शादी न होगी; परन्तु वे स्वर्ग में परमेश्वर के दूतों की नाईं होंगे (मत्ती 22:30)। चीजें भिन्न होंगी। उदाहरण के लिए, पतरस, अपनी दूसरी पत्री में, वर्तमान संसार का एक सरल पुनसर्थापन या सुधार नहीं देखता। 2 पतरस 3:7 में वह कहता है, ‘‘वर्तमान काल के आकाश और पृथ्वी उसी वचन के द्वारा इसलिये रखे हैं, कि जलाए जाएं; और वह भक्तिहीन मनुष्यों के न्याय और नाश होने के दिन तक ऐसे ही रखे रहेंगे।’’ प्रेरित यूहन्ना कहता है, ‘‘पहिला आकाश और पहिली पृथ्वी जाती रही थी, और समुद्र भी न रहा’’ (प्रकाशितवाक्य 21:1)। ‘‘और उस नगर में सूर्य और चान्द के उजाले का प्रयोजन नहीं, क्योंकि परमेश्वर के तेज से उस में उजाला हो रहा है, और मेम्ना उसका दीपक है’’ (प्रकाशितवाक्य 21:23)। ‘‘और फिर रात न होगी’’’ (प्रकाशितवाक्य 22:5)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कोई रात नहीं, सूरज नहीं, चान्द नहीं, समुद्र नहीं, विवाह नहीं, एक संसार में आग में से आत्मिक देह लाये गए। और तथापि निरन्तरता--फिलिप्पियों 3:21:- ‘‘वह अपनी शक्ति के उस प्रभाव के अनुसार जिस के द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा के देह के अनुकूल बना देगा।’’ और यीशु की पुनरुत्थान की देह किस प्रकार की थी जिस के समान हमारी देह होगी? ये पहचाने जाने लायक थी। यह आकाशीय रूप से अबोध्य थी, असाधारण तरीकों से आने और अदृश्य हो जाने वाली। और फिर भी लूका 24:39-43 के इन चकित करनेवाले और महत्वपूर्ण शब्दों को देखिये: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘मेरे हाथ और मेरे पांव को देखो, कि मैं वहीं हूं; मुझे छूकर देखो; क्योंकि आत्मा के हड्डी मांस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।’’ यह कहकर उस ने उन्हें अपने हाथ पांव दिखाए। जब आनन्द के मारे उन को प्रतीति न हुई, और आश्चर्य करते थे, तो उस ने उन से पूछा; ‘‘क्या यहां तुम्हारे पास कुछ भोजन है?’’ उन्हों ने उसे भूनी मछली का टुकड़ा दिया। उस ने लेकर उन के साम्हने खाया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उस’ ने मछली खाया। अतः तीसरा मूल बात है:- नये स्वर्गों और नयी पृथ्वी में, इस संसार के साथ निरन्तरता होगी और एक इस प्रकार का अन्तराल जो हमारे लिए एक ‘‘भेद’’ रह जाता है। अब तक यह प्रगट नहीं हुआ, कि हम क्या कुछ होंगे। हम अवश्य जानते हैं कि हम उस के समान होंगे। अतः जब अशक्त बच्चे के माता-पिता पूछते हैं, ‘‘क्या हमारा बेटा बढ़ेगा? क्या वह अपने आप से खायेगा? क्या वह सृष्टि के साथ कुछ कर सकेगा?’’ हम कहेंगे, परमेश्वर ने संसार को इसलिए नहीं बनाया और संरक्षित रखा कि तबाह किया जावे। आपका बेटा यीशु के साथ खायेगा। परमेश्वर उसे एक ऐसे स्तर का विकास देगा जो उसके सबसे बड़े आनन्द का और परमेश्वर की महानतम् महिमा के लिए होगा। लेकिन बहुत भेद है। हम एक कांच में से धुंधला देखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इतने अधिक भेद के प्रकाश में उनका सबसे गहरा आश्वासन् क्या है? और उनके पुत्र के लिए--और उनके लिए, उनकी सबसे ऊंची आशा क्या है? ये अन्ततः हमें चैथी टिप्पणी की ओर, और यीशु मसीह के सुसमाचार की ओर ले आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4. नयी सृष्टि में छुटकारा पाये हुए देहों को पाने की आशा, हमारे उद्धार के द्वारा सुरक्षित है, जिसे हम सुसमाचार में विश्वास के द्वारा प्राप्त करते हैं, किन्तु ये हमारी सर्वोत्तम आशा नहीं है। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशेष रूप से रोमियों 8:23ब-24 पर ध्यान दीजिये:- ‘‘हम भी … लेपालक होने की, अर्थात् अपनी देह के छुटकारे की बाट जोहते हैं। आशा के द्वारा तो हमारा उद्धार हुआ है {अंग्रेजी से सही अनुवादः- क्योंकि इसी आशा में हमारा उद्धार हुआ था }’’ उसका क्या अर्थ है--‘‘इसी आशा में हमारा उद्धार हुआ था?’’ यह एक सम्प्रदान कारक है (टे गार एलपिडि ईसोथेमैन)। शायद उद्धरण का एक सम्प्रदान कारक:- इस आशा के संदर्भ में हमारा उद्धार हुआ। निश्चित ही यह इस अर्थे को सम्मिलित करेगा कि, जब हमारा उद्धारा हुआ था, यह आशा हमारे लिए सुरक्षित की गई थी। और चूंकि हमारा उद्धार, इस सुसमाचार पर भरोसा करने के द्वारा होता है कि मसीह हमारे पापों के लिए मर गया और फिर जी उठा (1 कुरिन्थियों 15:1-3), ये आशा, सुसमाचार के द्वारा सुरक्षित की गई है। इस आशा तक हमें लाने में सुसमाचार विजयी होता है (रोमियों 6:5; 8:11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु हमें इसे वहीं नहीं छोड़ देना चाहिए। सुसमाचार, एक चट्टान के समान ठोस आश्वासन् है कि नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी होगें और यह कि हम छुटकारा पाये हुए देहों के साथ जिलाये जायेंगे कि वहाँ सदा के लिए रहें। हमारे स्थान पर मसीह को क्रूसित किये जाने का सुसमाचार, हमारी क्षमा हमें प्रदान करते हुए और हमारी धार्मिकता प्रदान करते हुए और सभी चीजों के ऊपर अधिकार के साथ मरे हुओं में से जी उठने के द्वारा, इस काम को न्यायसंगत प्रमाणित करना--यही है जो हम इन माता-पिता को बतायेंगे, जब वे भय और ग्लानि के सम्मुख किसी चट्टान को ढूंढ रहे हैं कि खड़े हो सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार का परम उपहार: क्रूसित मसीह में परमेश्वर देखा गया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन सुसमाचार का परम उपहार, नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी नहीं है। सुसमाचार की परम अच्छाई, एक छुटकारा पायी हुई देह नहीं है। सुसमाचार की परम भलाई क्षमा, या छुटकारा, या प्रायश्चित, या धर्मी ठहराया जाना, नहीं है। ये सभी एक अन्त के लिए माध्यम हैं। सुसमाचार की परम अच्छाई जो सुसमाचार को शुभ-संदेश बनाता है, और जिसके बिना इनमें से कोई भी उपहार शुभ-संदेश नहीं होंते, वो है स्वयँ परमेश्वर--जो ‘उस’ के क्रूसित और जी उठे ‘पुत्र’ की महिमा में देखा जाता है, और उसकी असीम सुन्दरता के कारण आनन्द उठाया जाता है, और उसके असीम मूल्य के कारण संजोया जाता है, और प्रतिबिम्बित किया जाता है क्योंकि हम उसके ‘पुत्र’ के स्वरूप के सदृश्य कर दिये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार: परमेश्वर की महिमा का पूरा-पूरा प्रदर्शन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अन्तिम कारण कि एक नये स्वर्ग और नयी पृथ्वी है, यह कि चूंकि जी उठा मसीह अपनी मानव देह को कभी भी नहीं त्यागेगा अपितु कलवरी के सनातन प्रतीक के रूप में रखेगा, जहाँ परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा का सर्वाधिक पूर्णरूपेण प्रर्दशन किया गया था। सर्वप्रथम सम्पूर्ण भौतिक विश्व की सृष्टि हुई, और फिर इसका नया रूप दिया गया, ताकि ‘परमेश्वर का पुत्र’ एक मनुष्य के रूप में देह धारण कर सके, शरीर में दुःख उठाये, क्रूस पर चढ़ाया जावे, मृतकों में से जी उठे, और परमेश्वर-मनुष्य के रूप में राज्य करे और छुटकारे पाये हुए लोगों को अनगिनत भीड़ द्वारा घेरा जावे, जो, हमारी आत्मिक देहों में गाये और बोले और काम करे और खेले और प्रेम करे, उन तरीकों से जो उसकी महिमा को पूर्ण स्पष्टतया दृश्य रूप से प्रतिबिम्बित करते हैं, क्योंकि हमारे पास शरीर हैं, ऐसे संसार में, जो आत्मिक व भौतिक रूप से परमेश्वर की महिमा से कान्तिमय/प्रकाशमान् हैं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रर्दशन-मंजूषा</title>
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				<updated>2018-02-22T20:55:04Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रर्दशन-मंजूषा&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [mo&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Marriage: God's Showcase of Covenant-Keeping Grace}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, 14 और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। 15 और उस ने प्रधानताओं और अधिकारों को अपने ऊपर से उतार कर उन का खुल्लमखुल्ला तमाशा बनाया और क्रूस के कारण उन पर जय-जय- कार की ध्वनि सुनाई … 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो, 13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। 14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो। 15 और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो। 16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। 17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो। 18 हे पत्नियो, जैसा प्रभु में उचित है, वैसा ही अपने अपने पति के आधीन रहो। 19 हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उन से कठोरता न करो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विगत दो सप्ताहों में जो हमने देखा है वो ये कि विवाह के बारे में हम जो सर्वाधिक बुनियादी चीज कह सकते हैं वो ये कि यह परमेश्वर का कार्य है, और सर्वाधिक अन्तिम चीज जो आप विवाह के बारे में कह सकते हैं ये है कि यह परमेश्वर का प्रदर्शन है। ये दो विशेषताएँ मूसा द्वारा उत्पत्ति 2 में व्यक्त किये गए हैं। लेकिन वे और अधिक स्पष्टता से यीशु और पौलुस के द्वारा ‘नया नियम’ में व्यक्त किये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु: विवाह, परमेश्वर का कार्य है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह परमेश्वर का कार्य है। मरकुस 10: 6-9, ‘‘सृष्टि के आरम्भ से ‘परमेश्वर ने नर और नारी करके उन को बनाया’ {उत्पत्ति 1: 27}, है, ‘इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे’ {उत्पत्ति 2: 24}। इसलिये वे अब दो नहीं पर एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।’’ बाइबिल में ये सबसे स्पष्ट बयान है कि विवाह मात्र मानव का कार्य नहीं है। ‘‘परमेश्वर ने जोड़ा है’’ शब्दों का अर्थ है कि ये परमेश्वर का कार्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पौलुस: विवाह परमेश्वर का प्रदर्शन है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह की बनावट, परमेश्वर का प्रदर्शन होने के लिए की गई है। इफिसियों 5: 31-32 में, वह उत्पत्ति 2:24 को उद्धृत करता है और फिर हमें वो भेद बताता है जो इसने सदैव अपने अन्दर रखा: ‘‘‘इस कारण मनुष्य अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।’ यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।’’ दूसरे शब्दों में, माता पिता को छोड़ने और एक जीवन -साथी से मिले रहने और एक तन हो जाने में जो वाचा सम्मिलित है, वो मसीह और कलीसिया के बीच की वाचा का चित्रण है। मसीह और ‘उसकी’ कलीसिया के बीच वाचा-पालन करनेवाले प्रेम का प्रदर्शन करने के लिए, विवाह, सर्वाधिक मूलभूत रूप में अस्तित्व में रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह और कलीसिया का एक नमूना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने ‘नोएल’ से पूछा कि क्या कोई चीज थी जो वह चाहती थी कि मैं आज कहूँ। उसने कहा, ‘‘तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है।’’ मैं सोचता हूँ कि वह सही है और इसके कम से कम तीन कारण हैं: 1) ये विवाह को मलिन हास्यप्रद तस्वीरों से बाहर निकालता है और इसे वो भव्य अर्थ देता है जो परमेश्वर का अभिप्राय था कि इसका हो; 2) ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, क्योंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है; और 3) ये दिखाता है कि पति की प्रधानता और पत्नी की आधीनता, क्रूसाकार और क्रूसित हैं। अर्थात्, मसीह और कलीसिया के प्रदर्शन के रूप में वे विवाह के अर्थ में ही बुने हुए हैं, लेकिन वे दोनों, मसीह के क्रूस पर स्वयँ का इन्कार करनेवाले काम के द्वारा परिभाषित होते हैं ताकि उनके घमण्ड और स्वार्थपरकता रद्द हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने पहिले दो संदेश, इन कारणों में से प्रथम पर खर्च किये हैं: परमेश्वर के वाचा-प्रेम के प्रदर्शन के रूप में, विवाह के लिए नींव देते हुए। विवाह, एक पुरुष और एक स्त्री के बीच एक वाचा है जिसमें वे, जब तक कि वे दोनों जीवित हैं, एक नये एक-तन संयुक्तता में, एक वफ़ादार पति और एक वफ़ादार पत्नी रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र प्रतिज्ञाओं और लैंगिक संयुक्तता के द्वारा मुहर लगायी गई, ये वाचा, परमेश्वर के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करने लिए संरचित की गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह में एक ठोस आधार  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो है आज का शीर्षक: ‘‘विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन-मंजूषा।’’ अतः हम उस दूसरे कारण की ओर चलते हैं जो मैंने कहा कि ‘नोएल’ सही थी ये कहने में कि तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है: यथा, कि ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, चूंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, आज मुख्य विषय ये है कि, चूंकि इस कलीसिया के साथ मसीह की नयी वाचा, लोहू से मोल लिये गए अनुग्रह के द्वारा सृजी गई और बनायी रखी जाती है, इसलिए, मानव विवाह, उस नये-वाचा-अनुग्रह को प्रदर्शित करने के लिए हैं। और जिस तरीके से वे इसे प्रदर्शित करते हैं वो है परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव में टिकाव लेने के द्वारा और परमेश्वर के साथ एक लम्बवत् अनुभव से, अपने पति/पत्नी के साथ एक क्षैतिज अनुभव में इसे बाहर मोड़ने के द्वारा। दूसरे शब्दों में, विवाह में, आप घंटा ब घंटा, परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए भविष्य के अनुग्रह में एक हर्षपूर्ण निर्भरता में रहते हैं, और घंटा ब घंटा आप इसे बाहर अपने पति/पत्नी की ओर मोड़ते हैं — परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए सहायता के विस्तार के रूप में। आज का विषय ये है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह की केन्द्रीयता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं चैकस हूँ कि सभी मसीहीगणों को अपने सभी सम्बन्धों में ये करने की अपेक्षा है (मात्र विवाहित मसीहीगण नहीं): घंटा ब घंटा, परमेश्वर के क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले, समस्त आपूर्ति करनेवाले अनुग्रह द्वारा जीवित रहिये, और फिर अपने जीवन में इसे अन्य सभों की ओर मोडि़ये। और यीशु कहते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन, परमेश्वर की महिमा का एक प्रदर्शन -मंजूषा है (मत्ति 5:16)। लेकिन विवाह, परमेश्वर के वाचा-अनुग्रह का एक अद्वितीय प्रदर्शन होने के लिए निर्दिष्ट किया गया है क्योंकि, अन्य सभी मानव सम्बन्धों से असमान, पति और पत्नी वाचा के द्वारा आजीवन, निकटतम सम्भव सम्बन्ध में बन्धे हुए हैं। प्रधानता और अधीनता की अद्वितीय भूमिकाएँ हैं, लेकिन आज का मेरा विषय वो नहीं है। वो बाद में आयेगा। आज मैं पति और पत्नी पर मसीहियों के रूप में विचार करता हूँ, सिर और शरीर की तुल्यरूपता पर नहीं। इसके पूर्व कि एक पुरुष और स्त्री बाइबिल आधारित और कृपालुता से, सिरत्व और अधीनता की अनोखी भूमिकाओं को लागू करें, उन्हें ये खोजना चाहिए कि क्षमाशीलता और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा की गई सहायता के लम्बवत् अनुभव पर अपने जीवनों को निर्मित करने और फिर इसे उनके जीवन-साथी की ओर क्षैतिज रूप से मोड़ने का क्या अर्थ है। अतः आज का केन्द्र -बिन्दु वही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, इसे विगत सप्ताह के संदेश के शब्दों में रखें: नग्न रहने और लज्जित न होने (उत्पत्ति 2: 25) की कुंजी, जबकि, वास्तव में, एक पति और एक पत्नी कई ऐसी चीजें करते हैं जिनके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना चाहिए, परमेश्वर के लम्बवत् क्षमाशील, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह का अनुभव है, जो क्षैतिज रूप से एक-दूसरे की ओर मोड़ा जाता है और संसार को प्रदर्शित किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर का आने वाला प्रकोप  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संक्षेप में, आइये इस सच के लिए नींव को हम कुलुस्सियों में देखें। हम कुलुस्सियों 3: 6 से आरम्भ करेंगे, ‘‘इन ही के कारण परमेश्वर का प्रकोप आज्ञा न माननेवालों पर पड़ता है।’’ यदि आप कहें, ‘‘सबसे अखिरी बात जो मैं अपनी समस्याग्रस्त विवाह में सुनाना चाहता हूँ, वो है परमेश्वर का प्रकोप,’’ तो आप दिसम्बर 26, 2004 को इन्डोनेशिया के पश्चिमी तट पर एक निराश मछुआरे के समान हैं, जो कह रहा है, ‘‘अंतिम बात जो मैं मेरे समस्याग्रस्त मछली के व्यापार के बारे में सुनना चाहूंगा वो हैं ‘सुनामी’।’’ परमेश्वर के प्रकोप की एक गहरी समझ और भय ही, ठीक वो है, जो अनेकों विवाहों को आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना, सुसमाचार को मात्र मानव सम्बन्धों तक तरल कर दिया जाता है और वो अपनी बाइबिल-शास्त्रीय महिमा खो देता है। और इसके बिना, आप से सोचने को प्रलोभित होंगे कि आपके जीवन-साथी के विरुद्ध आपका प्रकोप—आपका क्रोध — जय पाने के लिए बहुत बड़ा है, क्योंकि आपने वास्तव में कभी नहीं चखा कि असीम विराट प्रकोप को अनुग्रह के द्वारा जय पाते देखना क्या है, यथा, आपके विरोध में परमेश्वर का प्रकोप। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रकोप का हटाया जाना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम परमेश्वर का प्रकोप और इसके हटाये जाने से आरम्भ करते हैं। अब मेरे साथ कुलुस्सियों 2:13-14 में वापिस जाइये, ‘‘और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके {मसीह के} साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे अंतिम शब्द सर्वाधिक निर्णायक हैं। यह — विधियों {ऋण} का वह लेख जो हमारे विरोध में था — परमेश्वर ने उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। वो कब हुआ? दो हजार साल पहिले। ये आपके अन्दर नहीं हुआ, और यह आप से किसी सहायता के साथ नहीं हुआ। आपके जन्म लेने के भी पूर्व, परमेश्वर ने उसे आपके लिए किया और आपके बाहर किया। हमारे उद्धार की, ये महान् यथार्थता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ऋण का अभिलेख, क्रूस पर रद्द हो गया  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित कीजिये कि सब सत्यों से सर्वाधिक अद्भुत और चकित करनेवाले इस सच को आप देखें: परमेश्वर ने आपके सभी पापों के अभिलेख को, जिसने आपको प्रकोप का ऋणी बनाया था (पाप, परमेश्वर के विरुद्ध अपराध हैं जो ‘उसके’ प्रकोप को ले आते हैं), लिया और उन्हें आपके मुख के सम्मुख पकड़े रहने और आपको नरक में भेजने के वारंट के रूप में उपयोग करने की बनिस्बत, ‘उसने’ उन्हें अपने पुत्र की हथेली पर रख दिया और उनसे होता हुआ एक कीला क्रूस में गाड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किस के पाप क्रूस पर कील से जड़ दिये गए? किस के पापों को क्रूस पर दण्डित किया गया? उत्तर: मेरे पाप। और ‘नोएल’ के पाप — मेरी पत्नी के पाप और मेरे पाप — उन सभी के पाप जो स्वयँ को बचाने से हताश हैं और केवल मसीह में भरोसा रखते हैं। किस के हाथ क्रूस पर कीलों से ठोंक दिये गए? किसे क्रूस पर दण्डित किया गया? यीशु को। इसके लिए एक सुन्दर नाम है। इसे एक प्रतिस्थापन कहा जाता है। परमेश्वर ने मेरे पाप पर, मसीह के शरीर में, दण्ड की आज्ञा दी (रोमियों 8:3)। पतियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकते। पत्नियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकतीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि हम पीछे जायें और रोमियों की पत्री से निर्दोष ठहराये जाने की अपनी सारी समझ को यहाँ ले आयें, तो हम और अधिक कह सकते हैं। निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है। मसीह के कारण न केवल हमें क्षमा किया जाता है, अपितु परमेश्वर हमें मसीह के कारण धर्मी भी घोषित करता है। परमेश्वर हम से दो चीजों की मांग करता है: हमारे पापों के लिए दण्ड और हमारी जीवनों में सिद्धता। हमारे पापों को दण्डित किया जाना अवश्य है और हमारी जीवनों को धर्मी होना अवश्य है। लेकिन हम स्वयँ अपना दण्ड नहीं उठा सकते (भजन 49:7-8), और हम अपनी स्वयँ की धार्मिकता उपलब्ध नहीं कर सकते। कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं (रोमियों 3:10)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए, परमेश्वर ने, हमारे लिए ‘उसके’ अपार प्रेम के द्वारा, अपने स्वयँ के पुत्र को उपलब्ध कर दिया कि दोनों काम करे। मसीह हमारे दण्ड को उठाता है और मसीह हमारी धार्मिकता पूरी करता है। और जब हम मसीह को ग्रहण करते हैं (यूहन्ना 1:12), ‘उसका’ सम्पूर्ण दण्ड और ‘उसकी’ सारी धार्मिकता हमारी गिनी जाती है (रोमियों 4:4-6; 5:19; 5:1; 8:1; 10:4; फिलिप्पियों 3:8-9; 2 कुरिन्थियों 5:21)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, बाहर की ओर मुड़ा हुआ  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये वो लम्बवत् वास्तविकता है जो हमारे जीवन-साथी के प्रति बाहर क्षैतिज रूप से मोड़ी जाना चाहिए यदि विवाह को परमेश्वर के वाचा-बान्धने, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करना है। हम इसे कुलुस्सियों 3:12-13 में देखते हैं, ‘‘इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो:जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो’’ — आपके जीवन-साथी (पति/पत्नी) को। जैसा प्रभु आपकी ‘‘सह लेता है,’’ वैसा ही आपको आपके जीवन-साथी की सह लेना चाहिए। जब आप ‘उसकी’ इच्छा से कम पाये जाते हैं, प्रभु प्रतिदिन आपकी ‘‘सह लेता है।’’ अवश्य ही, मसीह आपसे जो अपेक्षा करता है और जो आप उपार्जित करते हैं, के बीच की दूरी, उस दूरी से असीमित रूप से विशाल है, जो आप अपने जीवन-साथी से अपेक्षा करते हैं और जो वह उपार्जित करता है। हम जितना करते हैं, मसीह सदैव उससे अधिक क्षमा करता व धीरज से सहता है। क्षमा कीजिये जैसे कि आप क्षमा किये गए। सह लीजिये जैसा कि ‘वह’ आपकी सह लेता है। ये बात दोनों दशा में लागू होती है चाहे आप एक विश्वासी से विवाहित हैं अथवा एक अविश्वासी से। मसीह के क्रूस में आपके लिए परमेश्वर के अनुग्रह की माप को आपके जीवन-साथी के प्रति आपके अनुग्रह की माप होने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि आप एक विश्वासी से विवाहित हैं, आप ये जोड़ सकते हैं: जैसा प्रभु आपको मसीह में धर्मी गिनता है, यद्यपि आप वास्तविक व्यवहार या मनोभाव में नहीं हैं, उसी तरह अपने जीवन-साथी को मसीह में धर्मी गिनिये, यद्यपि वह (पति) है नहीं — यद्यपि वो (पत्नी) है नहीं। दूसरे शब्दों में, कुलुस्सियों 3 कहता है, क्षमा और निर्दोष ठहराने का लम्बवत् अनुग्रह लो और उन्हें बाहर की ओर क्षैतिज रूप में अपने जीवन-साथी की ओर मोड़ दो। विवाह इसी के लिए है, सर्वाधिक अन्ततोगत्वा — मसीह के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार में जड़ पकड़े हुई बुद्धिमŸाा की आवश्यकता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इस बिन्दु पर, सैकड़ों जटिल स्थितियाँ उभरती हैं जो इन सुसमाचार की सच्चाईयों में और दुःखदायी, ईमानदार अनुभव के लम्बे वर्षों में जड़ पकड़े हुई, गहरी आत्मिक बुद्धिमत्ता के लिए पुकार करती हैं। दूसरे शब्दों में, कोई तरीका नहीं है कि मैं इस संदेश को प्रत्येक जन की विशिष्ट आवश्यकताओं पर लागू कर सकता। उपदेश देने के अलावा, हमें पवित्र आत्मा की आवश्यकता है, हमें प्रार्थना की आवश्यकता है, हमें अपने स्वयँ के लिए ‘वचन’ के ऊपर मनन करने की आवश्यकता है, हमें दूसरों की अन्तर्दृष्टि को पढ़ने की आवश्यकता है, हमें बुद्धिमान मित्रों के परामर्श की आवश्यकता है जो दुःखों से पक्के हो चुके हैं, हमें कलीसिया की आवश्यकता है कि हमें सहारा दे जब सब कुछ बिखर जाता है। अतः मुझे कोई भ्रान्तियाँ नहीं हैं कि आपकी सहायता करने के लिए जो सब कहा जाना था मैं कह सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== लम्बवत् रूप से जीना, फिर बाहर की ओर मुड़ना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमा और दूसरे को धर्मी गिनने के रूप में वाचा-प्रेम पर मैं क्यों जोर दे रहा हूँ, इसके कई कारण देने के द्वारा समाप्त करने में सहायता हो सकती है। क्या मैं दूसरे व्यक्ति में प्रसन्न रहने में विश्वास नहीं करता? हाँ, मैं करता हूँ। अनुभव और बाइबिल दोनों मुझे उधर ढकेलते हैं। निश्चित करने के लिए कि यीशु का ब्याह ‘उसकी’ दुल्हिन, कलीसिया से हो जावे और स्पष्टतया ये सम्भव और अच्छा दोनों है कि प्रभु को प्रसन्न रखा जावे (कुलुस्सियों 1:10)। और ‘उस’ में हमारी प्रसन्नता के ‘वह’ परम योग्य है। विवाह में यह आदर्श है: दो व्यक्ति अपने आप को नम्र करते हुए और भक्तिपूर्ण तरीकों से बदल जाने की खोज में रहें, जो हमारे जीवन-साथियों को प्रसन्न करे और उनकी शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करे अथवा हर एक भले तरीके से उन्हें प्रसन्न करे। हाँ। मसीह और कलीसिया का सम्बन्ध उस सब को सम्मिलित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन, कारण कि परमेश्वर के अनुग्रह से लम्बवत् रूप से जीने और फिर अपने जीवन-साथी की ओर क्षमा और निर्दोष ठहराने में बाहर क्षैतिज रूप से मुड़ने, पर मैं जोर देता हूं, है 1) क्योंकि पाप और अपरिचित होने के आधार पर टकराव होने जा रहा है (और एक-दूसरे के बारे में अन्जानापन क्या है और पाप क्या है, इस बारे में आप एक-दूसरे के साथ सहमत भी नहीं हो सकेंगे); और 2) क्योंकि धीरज से सहने और क्षमा करने का कठोर, खुरदुरा कार्य ही है जो स्नेहों का फलना-फूलना सम्भव बनाता है जबकि वे मर गए प्रतीत होते हैं; और 3) क्योंकि परमेश्वर को महिमा मिलती है जब दो बहुत भिन्न और बहुत त्रुटिपूर्ण व्यक्ति, मसीह पर भरोसा रखते हुए, क्लेश के भट्टे में तपाकर वफ़ादारी का जीवन गढ़ते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह में, परमेश्वर ने आपको — और आपके पति/आपकी पत्नी को क्षमा कर दिया है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं इसे यहाँ अगली बार उठाऊंगा और एक खोज के बारे में बताऊंगा जो ‘नोएल’ और मैंने की है। मैं भविष्यकथन करता हूँ कि संदेश को ‘‘द कॉम्पोस्ट पाइल सरमन’’ कहा जावेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब तक, पतियो और पत्नियो, इन विशाल सच्चाईयों को अपने विवेकों में बसा लीजिये — वे सच जो आपके विवाह में की किसी भी समस्या से बड़े हैं — कि परमेश्वर ने ‘‘हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, ऋण का वह लेख जो हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में, इसकी वैधानिक मांगों के साथ था, मिटा डाला। इसे ‘उसने’ क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ इस पर अपने सम्पूर्ण हृदय से विश्वास कीजिये और अपने पति/पत्नी की ओर मोडि़ये।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रर्दशन-मंजूषा</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9:_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87,_%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%87_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B6%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A5%82%E0%A4%B7%E0%A4%BE"/>
				<updated>2018-02-22T20:54:04Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Marriage: God's Showcase of Covenant-Keeping Grace}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, 14 और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। 15 और उस ने प्रधानताओं और अधिकारों को अपने ऊपर से उतार कर उन का खुल्लमखुल्ला तमाशा बनाया और क्रूस के कारण उन पर जय-जय- कार की ध्वनि सुनाई … 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो, 13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। 14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो। 15 और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो। 16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। 17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो। 18 हे पत्नियो, जैसा प्रभु में उचित है, वैसा ही अपने अपने पति के आधीन रहो। 19 हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उन से कठोरता न करो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विगत दो सप्ताहों में जो हमने देखा है वो ये कि विवाह के बारे में हम जो सर्वाधिक बुनियादी चीज कह सकते हैं वो ये कि यह परमेश्वर का कार्य है, और सर्वाधिक अन्तिम चीज जो आप विवाह के बारे में कह सकते हैं ये है कि यह परमेश्वर का प्रदर्शन है। ये दो विशेषताएँ मूसा द्वारा उत्पत्ति 2 में व्यक्त किये गए हैं। लेकिन वे और अधिक स्पष्टता से यीशु और पौलुस के द्वारा ‘नया नियम’ में व्यक्त किये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु: विवाह, परमेश्वर का कार्य है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह परमेश्वर का कार्य है। मरकुस 10: 6-9, ‘‘सृष्टि के आरम्भ से ‘परमेश्वर ने नर और नारी करके उन को बनाया’ {उत्पत्ति 1: 27}, है, ‘इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे’ {उत्पत्ति 2: 24}। इसलिये वे अब दो नहीं पर एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।’’ बाइबिल में ये सबसे स्पष्ट बयान है कि विवाह मात्र मानव का कार्य नहीं है। ‘‘परमेश्वर ने जोड़ा है’’ शब्दों का अर्थ है कि ये परमेश्वर का कार्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पौलुस: विवाह परमेश्वर का प्रदर्शन है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह की बनावट, परमेश्वर का प्रदर्शन होने के लिए की गई है। इफिसियों 5: 31-32 में, वह उत्पत्ति 2:24 को उद्धृत करता है और फिर हमें वो भेद बताता है जो इसने सदैव अपने अन्दर रखा: ‘‘‘इस कारण मनुष्य अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।’ यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।’’ दूसरे शब्दों में, माता पिता को छोड़ने और एक जीवन -साथी से मिले रहने और एक तन हो जाने में जो वाचा सम्मिलित है, वो मसीह और कलीसिया के बीच की वाचा का चित्रण है। मसीह और ‘उसकी’ कलीसिया के बीच वाचा-पालन करनेवाले प्रेम का प्रदर्शन करने के लिए, विवाह, सर्वाधिक मूलभूत रूप में अस्तित्व में रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह और कलीसिया का एक नमूना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने ‘नोएल’ से पूछा कि क्या कोई चीज थी जो वह चाहती थी कि मैं आज कहूँ। उसने कहा, ‘‘तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है।’’ मैं सोचता हूँ कि वह सही है और इसके कम से कम तीन कारण हैं: 1) ये विवाह को मलिन हास्यप्रद तस्वीरों से बाहर निकालता है और इसे वो भव्य अर्थ देता है जो परमेश्वर का अभिप्राय था कि इसका हो; 2) ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, क्योंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है; और 3) ये दिखाता है कि पति की प्रधानता और पत्नी की आधीनता, क्रूसाकार और क्रूसित हैं। अर्थात्, मसीह और कलीसिया के प्रदर्शन के रूप में वे विवाह के अर्थ में ही बुने हुए हैं, लेकिन वे दोनों, मसीह के क्रूस पर स्वयँ का इन्कार करनेवाले काम के द्वारा परिभाषित होते हैं ताकि उनके घमण्ड और स्वार्थपरकता रद्द हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने पहिले दो संदेश, इन कारणों में से प्रथम पर खर्च किये हैं: परमेश्वर के वाचा-प्रेम के प्रदर्शन के रूप में, विवाह के लिए नींव देते हुए। विवाह, एक पुरुष और एक स्त्री के बीच एक वाचा है जिसमें वे, जब तक कि वे दोनों जीवित हैं, एक नये एक-तन संयुक्तता में, एक वफ़ादार पति और एक वफ़ादार पत्नी रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र प्रतिज्ञाओं और लैंगिक संयुक्तता के द्वारा मुहर लगायी गई, ये वाचा, परमेश्वर के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करने लिए संरचित की गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह में एक ठोस आधार  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो है आज का शीर्षक: ‘‘विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन-मंजूषा।’’ अतः हम उस दूसरे कारण की ओर चलते हैं जो मैंने कहा कि ‘नोएल’ सही थी ये कहने में कि तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है: यथा, कि ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, चूंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, आज मुख्य विषय ये है कि, चूंकि इस कलीसिया के साथ मसीह की नयी वाचा, लोहू से मोल लिये गए अनुग्रह के द्वारा सृजी गई और बनायी रखी जाती है, इसलिए, मानव विवाह, उस नये-वाचा-अनुग्रह को प्रदर्शित करने के लिए हैं। और जिस तरीके से वे इसे प्रदर्शित करते हैं वो है परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव में टिकाव लेने के द्वारा और परमेश्वर के साथ एक लम्बवत् अनुभव से, अपने पति/पत्नी के साथ एक क्षैतिज अनुभव में इसे बाहर मोड़ने के द्वारा। दूसरे शब्दों में, विवाह में, आप घंटा ब घंटा, परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए भविष्य के अनुग्रह में एक हर्षपूर्ण निर्भरता में रहते हैं, और घंटा ब घंटा आप इसे बाहर अपने पति/पत्नी की ओर मोड़ते हैं — परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए सहायता के विस्तार के रूप में। आज का विषय ये है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह की केन्द्रीयता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं चैकस हूँ कि सभी मसीहीगणों को अपने सभी सम्बन्धों में ये करने की अपेक्षा है (मात्र विवाहित मसीहीगण नहीं): घंटा ब घंटा, परमेश्वर के क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले, समस्त आपूर्ति करनेवाले अनुग्रह द्वारा जीवित रहिये, और फिर अपने जीवन में इसे अन्य सभों की ओर मोडि़ये। और यीशु कहते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन, परमेश्वर की महिमा का एक प्रदर्शन -मंजूषा है (मत्ति 5:16)। लेकिन विवाह, परमेश्वर के वाचा-अनुग्रह का एक अद्वितीय प्रदर्शन होने के लिए निर्दिष्ट किया गया है क्योंकि, अन्य सभी मानव सम्बन्धों से असमान, पति और पत्नी वाचा के द्वारा आजीवन, निकटतम सम्भव सम्बन्ध में बन्धे हुए हैं। प्रधानता और अधीनता की अद्वितीय भूमिकाएँ हैं, लेकिन आज का मेरा विषय वो नहीं है। वो बाद में आयेगा। आज मैं पति और पत्नी पर मसीहियों के रूप में विचार करता हूँ, सिर और शरीर की तुल्यरूपता पर नहीं। इसके पूर्व कि एक पुरुष और स्त्री बाइबिल आधारित और कृपालुता से, सिरत्व और अधीनता की अनोखी भूमिकाओं को लागू करें, उन्हें ये खोजना चाहिए कि क्षमाशीलता और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा की गई सहायता के लम्बवत् अनुभव पर अपने जीवनों को निर्मित करने और फिर इसे उनके जीवन-साथी की ओर क्षैतिज रूप से मोड़ने का क्या अर्थ है। अतः आज का केन्द्र -बिन्दु वही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, इसे विगत सप्ताह के संदेश के शब्दों में रखें: नग्न रहने और लज्जित न होने (उत्पत्ति 2: 25) की कुंजी, जबकि, वास्तव में, एक पति और एक पत्नी कई ऐसी चीजें करते हैं जिनके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना चाहिए, परमेश्वर के लम्बवत् क्षमाशील, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह का अनुभव है, जो क्षैतिज रूप से एक-दूसरे की ओर मोड़ा जाता है और संसार को प्रदर्शित किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर का आने वाला प्रकोप  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संक्षेप में, आइये इस सच के लिए नींव को हम कुलुस्सियों में देखें। हम कुलुस्सियों 3: 6 से आरम्भ करेंगे, ‘‘इन ही के कारण परमेश्वर का प्रकोप आज्ञा न माननेवालों पर पड़ता है।’’ यदि आप कहें, ‘‘सबसे अखिरी बात जो मैं अपनी समस्याग्रस्त विवाह में सुनाना चाहता हूँ, वो है परमेश्वर का प्रकोप,’’ तो आप दिसम्बर 26, 2004 को इन्डोनेशिया के पश्चिमी तट पर एक निराश मछुआरे के समान हैं, जो कह रहा है, ‘‘अंतिम बात जो मैं मेरे समस्याग्रस्त मछली के व्यापार के बारे में सुनना चाहूंगा वो हैं ‘सुनामी’।’’ परमेश्वर के प्रकोप की एक गहरी समझ और भय ही, ठीक वो है, जो अनेकों विवाहों को आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना, सुसमाचार को मात्र मानव सम्बन्धों तक तरल कर दिया जाता है और वो अपनी बाइबिल-शास्त्रीय महिमा खो देता है। और इसके बिना, आप से सोचने को प्रलोभित होंगे कि आपके जीवन-साथी के विरुद्ध आपका प्रकोप—आपका क्रोध — जय पाने के लिए बहुत बड़ा है, क्योंकि आपने वास्तव में कभी नहीं चखा कि असीम विराट प्रकोप को अनुग्रह के द्वारा जय पाते देखना क्या है, यथा, आपके विरोध में परमेश्वर का प्रकोप। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रकोप का हटाया जाना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम परमेश्वर का प्रकोप और इसके हटाये जाने से आरम्भ करते हैं। अब मेरे साथ कुलुस्सियों 2:13-14 में वापिस जाइये, ‘‘और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके {मसीह के} साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे अंतिम शब्द सर्वाधिक निर्णायक हैं। यह — विधियों {ऋण} का वह लेख जो हमारे विरोध में था — परमेश्वर ने उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। वो कब हुआ? दो हजार साल पहिले। ये आपके अन्दर नहीं हुआ, और यह आप से किसी सहायता के साथ नहीं हुआ। आपके जन्म लेने के भी पूर्व, परमेश्वर ने उसे आपके लिए किया और आपके बाहर किया। हमारे उद्धार की, ये महान् यथार्थता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ऋण का अभिलेख, क्रूस पर रद्द हो गया  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित कीजिये कि सब सत्यों से सर्वाधिक अद्भुत और चकित करनेवाले इस सच को आप देखें: परमेश्वर ने आपके सभी पापों के अभिलेख को, जिसने आपको प्रकोप का ऋणी बनाया था (पाप, परमेश्वर के विरुद्ध अपराध हैं जो ‘उसके’ प्रकोप को ले आते हैं), लिया और उन्हें आपके मुख के सम्मुख पकड़े रहने और आपको नरक में भेजने के वारंट के रूप में उपयोग करने की बनिस्बत, ‘उसने’ उन्हें अपने पुत्र की हथेली पर रख दिया और उनसे होता हुआ एक कीला क्रूस में गाड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किस के पाप क्रूस पर कील से जड़ दिये गए? किस के पापों को क्रूस पर दण्डित किया गया? उत्तर: मेरे पाप। और ‘नोएल’ के पाप — मेरी पत्नी के पाप और मेरे पाप — उन सभी के पाप जो स्वयँ को बचाने से हताश हैं और केवल मसीह में भरोसा रखते हैं। किस के हाथ क्रूस पर कीलों से ठोंक दिये गए? किसे क्रूस पर दण्डित किया गया? यीशु को। इसके लिए एक सुन्दर नाम है। इसे एक प्रतिस्थापन कहा जाता है। परमेश्वर ने मेरे पाप पर, मसीह के शरीर में, दण्ड की आज्ञा दी (रोमियों 8:3)। पतियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकते। पत्नियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकतीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि हम पीछे जायें और रोमियों की पत्री से निर्दोष ठहराये जाने की अपनी सारी समझ को यहाँ ले आयें, तो हम और अधिक कह सकते हैं। निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है। मसीह के कारण न केवल हमें क्षमा किया जाता है, अपितु परमेश्वर हमें मसीह के कारण धर्मी भी घोषित करता है। परमेश्वर हम से दो चीजों की मांग करता है: हमारे पापों के लिए दण्ड और हमारी जीवनों में सिद्धता। हमारे पापों को दण्डित किया जाना अवश्य है और हमारी जीवनों को धर्मी होना अवश्य है। लेकिन हम स्वयँ अपना दण्ड नहीं उठा सकते (भजन 49:7-8), और हम अपनी स्वयँ की धार्मिकता उपलब्ध नहीं कर सकते। कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं (रोमियों 3:10)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए, परमेश्वर ने, हमारे लिए ‘उसके’ अपार प्रेम के द्वारा, अपने स्वयँ के पुत्र को उपलब्ध कर दिया कि दोनों काम करे। मसीह हमारे दण्ड को उठाता है और मसीह हमारी धार्मिकता पूरी करता है। और जब हम मसीह को ग्रहण करते हैं (यूहन्ना 1:12), ‘उसका’ सम्पूर्ण दण्ड और ‘उसकी’ सारी धार्मिकता हमारी गिनी जाती है (रोमियों 4:4-6; 5:19; 5:1; 8:1; 10:4; फिलिप्पियों 3:8-9; 2 कुरिन्थियों 5:21)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, बाहर की ओर मुड़ा हुआ  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये वो लम्बवत् वास्तविकता है जो हमारे जीवन-साथी के प्रति बाहर क्षैतिज रूप से मोड़ी जाना चाहिए यदि विवाह को परमेश्वर के वाचा-बान्धने, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करना है। हम इसे कुलुस्सियों 3:12-13 में देखते हैं, ‘‘इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो:जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो’’ — आपके जीवन-साथी (पति/पत्नी) को। जैसा प्रभु आपकी ‘‘सह लेता है,’’ वैसा ही आपको आपके जीवन-साथी की सह लेना चाहिए। जब आप ‘उसकी’ इच्छा से कम पाये जाते हैं, प्रभु प्रतिदिन आपकी ‘‘सह लेता है।’’ अवश्य ही, मसीह आपसे जो अपेक्षा करता है और जो आप उपार्जित करते हैं, के बीच की दूरी, उस दूरी से असीमित रूप से विशाल है, जो आप अपने जीवन-साथी से अपेक्षा करते हैं और जो वह उपार्जित करता है। हम जितना करते हैं, मसीह सदैव उससे अधिक क्षमा करता व धीरज से सहता है। क्षमा कीजिये जैसे कि आप क्षमा किये गए। सह लीजिये जैसा कि ‘वह’ आपकी सह लेता है। ये बात दोनों दशा में लागू होती है चाहे आप एक विश्वासी से विवाहित हैं अथवा एक अविश्वासी से। मसीह के क्रूस में आपके लिए परमेश्वर के अनुग्रह की माप को आपके जीवन-साथी के प्रति आपके अनुग्रह की माप होने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि आप एक विश्वासी से विवाहित हैं, आप ये जोड़ सकते हैं: जैसा प्रभु आपको मसीह में धर्मी गिनता है, यद्यपि आप वास्तविक व्यवहार या मनोभाव में नहीं हैं, उसी तरह अपने जीवन-साथी को मसीह में धर्मी गिनिये, यद्यपि वह (पति) है नहीं — यद्यपि वो (पत्नी) है नहीं। दूसरे शब्दों में, कुलुस्सियों 3 कहता है, क्षमा और निर्दोष ठहराने का लम्बवत् अनुग्रह लो और उन्हें बाहर की ओर क्षैतिज रूप में अपने जीवन-साथी की ओर मोड़ दो। विवाह इसी के लिए है, सर्वाधिक अन्ततोगत्वा — मसीह के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार में जड़ पकड़े हुई बुद्धिमŸाा की आवश्यकता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इस बिन्दु पर, सैकड़ों जटिल स्थितियाँ उभरती हैं जो इन सुसमाचार की सच्चाईयों में और दुःखदायी, ईमानदार अनुभव के लम्बे वर्षों में जड़ पकड़े हुई, गहरी आत्मिक बुद्धिमत्ता के लिए पुकार करती हैं। दूसरे शब्दों में, कोई तरीका नहीं है कि मैं इस संदेश को प्रत्येक जन की विशिष्ट आवश्यकताओं पर लागू कर सकता। उपदेश देने के अलावा, हमें पवित्र आत्मा की आवश्यकता है, हमें प्रार्थना की आवश्यकता है, हमें अपने स्वयँ के लिए ‘वचन’ के ऊपर मनन करने की आवश्यकता है, हमें दूसरों की अन्तर्दृष्टि को पढ़ने की आवश्यकता है, हमें बुद्धिमान मित्रों के परामर्श की आवश्यकता है जो दुःखों से पक्के हो चुके हैं, हमें कलीसिया की आवश्यकता है कि हमें सहारा दे जब सब कुछ बिखर जाता है। अतः मुझे कोई भ्रान्तियाँ नहीं हैं कि आपकी सहायता करने के लिए जो सब कहा जाना था मैं कह सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== लम्बवत् रूप से जीना, फिर बाहर की ओर मुड़ना  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमा और दूसरे को धर्मी गिनने के रूप में वाचा-प्रेम पर मैं क्यों जोर दे रहा हूँ, इसके कई कारण देने के द्वारा समाप्त करने में सहायता हो सकती है। क्या मैं दूसरे व्यक्ति में प्रसन्न रहने में विश्वास नहीं करता? हाँ, मैं करता हूँ। अनुभव और बाइबिल दोनों मुझे उधर ढकेलते हैं। निश्चित करने के लिए कि यीशु का ब्याह ‘उसकी’ दुल्हिन, कलीसिया से हो जावे और स्पष्टतया ये सम्भव और अच्छा दोनों है कि प्रभु को प्रसन्न रखा जावे (कुलुस्सियों 1:10)। और ‘उस’ में हमारी प्रसन्नता के ‘वह’ परम योग्य है। विवाह में यह आदर्श है: दो व्यक्ति अपने आप को नम्र करते हुए और भक्तिपूर्ण तरीकों से बदल जाने की खोज में रहें, जो हमारे जीवन-साथियों को प्रसन्न करे और उनकी शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करे अथवा हर एक भले तरीके से उन्हें प्रसन्न करे। हाँ। मसीह और कलीसिया का सम्बन्ध उस सब को सम्मिलित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन, कारण कि परमेश्वर के अनुग्रह से लम्बवत् रूप से जीने और फिर अपने जीवन-साथी की ओर क्षमा और निर्दोष ठहराने में बाहर क्षैतिज रूप से मुड़ने, पर मैं जोर देता हूं, है 1) क्योंकि पाप और अपरिचित होने के आधार पर टकराव होने जा रहा है (और एक-दूसरे के बारे में अन्जानापन क्या है और पाप क्या है, इस बारे में आप एक-दूसरे के साथ सहमत भी नहीं हो सकेंगे); और 2) क्योंकि धीरज से सहने और क्षमा करने का कठोर, खुरदुरा कार्य ही है जो स्नेहों का फलना-फूलना सम्भव बनाता है जबकि वे मर गए प्रतीत होते हैं; और 3) क्योंकि परमेश्वर को महिमा मिलती है जब दो बहुत भिन्न और बहुत त्रुटिपूर्ण व्यक्ति, मसीह पर भरोसा रखते हुए, क्लेश के भट्टे में तपाकर वफ़ादारी का जीवन गढ़ते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह में, परमेश्वर ने आपको — और आपके पति/आपकी पत्नी को क्षमा कर दिया है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं इसे यहाँ अगली बार उठाऊंगा और एक खोज के बारे में बताऊंगा जो ‘नोएल’ और मैंने की है। मैं भविष्यकथन करता हूँ कि संदेश को ‘‘द कॉम्पोस्ट पाइल सरमन’’ कहा जावेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब तक, पतियो और पत्नियो, इन विशाल सच्चाईयों को अपने विवेकों में बसा लीजिये — वे सच जो आपके विवाह में की किसी भी समस्या से बड़े हैं — कि परमेश्वर ने ‘‘हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, ऋण का वह लेख जो हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में, इसकी वैधानिक मांगों के साथ था, मिटा डाला। इसे ‘उसने’ क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ इस पर अपने सम्पूर्ण हृदय से विश्वास कीजिये और अपने पति/पत्नी की ओर मोडि़ये।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रर्दशन-मंजूषा</title>
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				<updated>2018-02-22T20:52:22Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Marriage: God’s Showcase of Covenant-Keeping Grace}}&amp;lt;br&amp;gt;   &amp;amp;gt; और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, औ...&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;{{info|Marriage: God’s Showcase of Covenant-Keeping Grace}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, 14 और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। 15 और उस ने प्रधानताओं और अधिकारों को अपने ऊपर से उतार कर उन का खुल्लमखुल्ला तमाशा बनाया और क्रूस के कारण उन पर जय-जय- कार की ध्वनि सुनाई … 3:12 इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो, 13 और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो: जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो। 14 और इन सब के ऊपर प्रेम को जो सिद्धता का कटिबन्ध है बान्ध लो। 15 और मसीह की शान्ति जिस के लिये तुम एक देह होकर बुलाए भी गए हो, तुम्हारे हृदय में राज्य करे, और तुम धन्यवादी बने रहो। 16 मसीह के वचन को अपने हृदय में अधिकाई से बसने दो; और सिद्ध ज्ञान सहित एक दूसरे को सिखाओ और चिताओ, और अपने अपने मन में अनुग्रह के साथ परमेश्वर के लिये भजन और स्तुतिगान और आत्मिक गीत गाओ। 17 और वचन से या काम से जो कुछ भी करो सब प्रभु यीशु के नाम से करो, और उसके द्वारा परमेश्वर पिता का धन्यवाद करो। 18 हे पत्नियो, जैसा प्रभु में उचित है, वैसा ही अपने अपने पति के आधीन रहो। 19 हे पतियो, अपनी अपनी पत्नी से प्रेम रखो, और उन से कठोरता न करो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विगत दो सप्ताहों में जो हमने देखा है वो ये कि विवाह के बारे में हम जो सर्वाधिक बुनियादी चीज कह सकते हैं वो ये कि यह परमेश्वर का कार्य है, और सर्वाधिक अन्तिम चीज जो आप विवाह के बारे में कह सकते हैं ये है कि यह परमेश्वर का प्रदर्शन है। ये दो विशेषताएँ मूसा द्वारा उत्पत्ति 2 में व्यक्त किये गए हैं। लेकिन वे और अधिक स्पष्टता से यीशु और पौलुस के द्वारा ‘नया नियम’ में व्यक्त किये गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु: विवाह, परमेश्वर का कार्य है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह परमेश्वर का कार्य है। मरकुस 10: 6-9, ‘‘सृष्टि के आरम्भ से ‘परमेश्वर ने नर और नारी करके उन को बनाया’ {उत्पत्ति 1: 27}, है, ‘इस कारण मनुष्य अपने माता-पिता से अलग होकर अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे’ {उत्पत्ति 2: 24}। इसलिये वे अब दो नहीं पर एक तन हैं। इसलिये जिसे परमेश्वर ने जोड़ा है उसे मनुष्य अलग न करे।’’ बाइबिल में ये सबसे स्पष्ट बयान है कि विवाह मात्र मानव का कार्य नहीं है। ‘‘परमेश्वर ने जोड़ा है’’ शब्दों का अर्थ है कि ये परमेश्वर का कार्य है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पौलुस: विवाह परमेश्वर का प्रदर्शन है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस इस विशेषता को सर्वाधिक स्पष्टता से रखता है कि विवाह की बनावट, परमेश्वर का प्रदर्शन होने के लिए की गई है। इफिसियों 5: 31-32 में, वह उत्पत्ति 2:24 को उद्धृत करता है और फिर हमें वो भेद बताता है जो इसने सदैव अपने अन्दर रखा: ‘‘‘इस कारण मनुष्य अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा, और वे दोनों एक तन होंगे।’ यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।’’ दूसरे शब्दों में, माता पिता को छोड़ने और एक जीवन -साथी से मिले रहने और एक तन हो जाने में जो वाचा सम्मिलित है, वो मसीह और कलीसिया के बीच की वाचा का चित्रण है। मसीह और ‘उसकी’ कलीसिया के बीच वाचा-पालन करनेवाले प्रेम का प्रदर्शन करने के लिए, विवाह, सर्वाधिक मूलभूत रूप में अस्तित्व में रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह और कलीसिया का एक नमूना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने ‘नोएल’ से पूछा कि क्या कोई चीज थी जो वह चाहती थी कि मैं आज कहूँ। उसने कहा, ‘‘तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है।’’ मैं सोचता हूँ कि वह सही है और इसके कम से कम तीन कारण हैं: 1) ये विवाह को मलिन हास्यप्रद तस्वीरों से बाहर निकालता है और इसे वो भव्य अर्थ देता है जो परमेश्वर का अभिप्राय था कि इसका हो; 2) ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, क्योंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है; और 3) ये दिखाता है कि पति की प्रधानता और पत्नी की आधीनता, क्रूसाकार और क्रूसित हैं। अर्थात्, मसीह और कलीसिया के प्रदर्शन के रूप में वे विवाह के अर्थ में ही बुने हुए हैं, लेकिन वे दोनों, मसीह के क्रूस पर स्वयँ का इन्कार करनेवाले काम के द्वारा परिभाषित होते हैं ताकि उनके घमण्ड और स्वार्थपरकता रद्द हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने पहिले दो संदेश, इन कारणों में से प्रथम पर खर्च किये हैं: परमेश्वर के वाचा-प्रेम के प्रदर्शन के रूप में, विवाह के लिए नींव देते हुए। विवाह, एक पुरुष और एक स्त्री के बीच एक वाचा है जिसमें वे, जब तक कि वे दोनों जीवित हैं, एक नये एक-तन संयुक्तता में, एक वफ़ादार पति और एक वफ़ादार पत्नी रहने की प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र प्रतिज्ञाओं और लैंगिक संयुक्तता के द्वारा मुहर लगायी गई, ये वाचा, परमेश्वर के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करने लिए संरचित की गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुग्रह में एक ठोस आधार ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो है आज का शीर्षक: ‘‘विवाह: परमेश्वर के, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन-मंजूषा।’’ अतः हम उस दूसरे कारण की ओर चलते हैं जो मैंने कहा कि ‘नोएल’ सही थी ये कहने में कि तुम बहुत बारम्बार नहीं कह सकते कि विवाह, मसीह और कलीसिया का एक नमूना है: यथा, कि ये विवाह को अनुग्रह में एक ठोस आधार देता है, चूंकि मसीह ने अपनी दुल्हिन को केवल अनुग्रह के द्वारा ही प्राप्त किया और बनाये रखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, आज मुख्य विषय ये है कि, चूंकि इस कलीसिया के साथ मसीह की नयी वाचा, लोहू से मोल लिये गए अनुग्रह के द्वारा सृजी गई और बनायी रखी जाती है, इसलिए, मानव विवाह, उस नये-वाचा-अनुग्रह को प्रदर्शित करने के लिए हैं। और जिस तरीके से वे इसे प्रदर्शित करते हैं वो है परमेश्वर के अनुग्रह के अनुभव में टिकाव लेने के द्वारा और परमेश्वर के साथ एक लम्बवत् अनुभव से, अपने पति/पत्नी के साथ एक क्षैतिज अनुभव में इसे बाहर मोड़ने के द्वारा। दूसरे शब्दों में, विवाह में, आप घंटा ब घंटा, परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए भविष्य के अनुग्रह में एक हर्षपूर्ण निर्भरता में रहते हैं, और घंटा ब घंटा आप इसे बाहर अपने पति/पत्नी की ओर मोड़ते हैं — परमेश्वर की क्षमा और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा किये गए सहायता के विस्तार के रूप में। आज का विषय ये है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह की केन्द्रीयता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं चैकस हूँ कि सभी मसीहीगणों को अपने सभी सम्बन्धों में ये करने की अपेक्षा है (मात्र विवाहित मसीहीगण नहीं): घंटा ब घंटा, परमेश्वर के क्षमा करनेवाले, निर्दोष ठहरानेवाले, समस्त आपूर्ति करनेवाले अनुग्रह द्वारा जीवित रहिये, और फिर अपने जीवन में इसे अन्य सभों की ओर मोडि़ये। और यीशु कहते हैं कि हमारा सम्पूर्ण जीवन, परमेश्वर की महिमा का एक प्रदर्शन -मंजूषा है (मत्ति 5:16)। लेकिन विवाह, परमेश्वर के वाचा-अनुग्रह का एक अद्वितीय प्रदर्शन होने के लिए निर्दिष्ट किया गया है क्योंकि, अन्य सभी मानव सम्बन्धों से असमान, पति और पत्नी वाचा के द्वारा आजीवन, निकटतम सम्भव सम्बन्ध में बन्धे हुए हैं। प्रधानता और अधीनता की अद्वितीय भूमिकाएँ हैं, लेकिन आज का मेरा विषय वो नहीं है। वो बाद में आयेगा। आज मैं पति और पत्नी पर मसीहियों के रूप में विचार करता हूँ, सिर और शरीर की तुल्यरूपता पर नहीं। इसके पूर्व कि एक पुरुष और स्त्री बाइबिल आधारित और कृपालुता से, सिरत्व और अधीनता की अनोखी भूमिकाओं को लागू करें, उन्हें ये खोजना चाहिए कि क्षमाशीलता और निर्दोष ठहरायेजाने और प्रतिज्ञा की गई सहायता के लम्बवत् अनुभव पर अपने जीवनों को निर्मित करने और फिर इसे उनके जीवन-साथी की ओर क्षैतिज रूप से मोड़ने का क्या अर्थ है। अतः आज का केन्द्र -बिन्दु वही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, इसे विगत सप्ताह के संदेश के शब्दों में रखें: नग्न रहने और लज्जित न होने (उत्पत्ति 2: 25) की कुंजी, जबकि, वास्तव में, एक पति और एक पत्नी कई ऐसी चीजें करते हैं जिनके लिए उन्हें शर्मिन्दा होना चाहिए, परमेश्वर के लम्बवत् क्षमाशील, निर्दोष ठहरानेवाले अनुग्रह का अनुभव है, जो क्षैतिज रूप से एक-दूसरे की ओर मोड़ा जाता है और संसार को प्रदर्शित किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर का आने वाला प्रकोप ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संक्षेप में, आइये इस सच के लिए नींव को हम कुलुस्सियों में देखें। हम कुलुस्सियों 3: 6 से आरम्भ करेंगे, ‘‘इन ही के कारण परमेश्वर का प्रकोप आज्ञा न माननेवालों पर पड़ता है।’’ यदि आप कहें, ‘‘सबसे अखिरी बात जो मैं अपनी समस्याग्रस्त विवाह में सुनाना चाहता हूँ, वो है परमेश्वर का प्रकोप,’’ तो आप दिसम्बर 26, 2004 को इन्डोनेशिया के पश्चिमी तट पर एक निराश मछुआरे के समान हैं, जो कह रहा है, ‘‘अंतिम बात जो मैं मेरे समस्याग्रस्त मछली के व्यापार के बारे में सुनना चाहूंगा वो हैं ‘सुनामी’।’’ परमेश्वर के प्रकोप की एक गहरी समझ और भय ही, ठीक वो है, जो अनेकों विवाहों को आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना, सुसमाचार को मात्र मानव सम्बन्धों तक तरल कर दिया जाता है और वो अपनी बाइबिल-शास्त्रीय महिमा खो देता है। और इसके बिना, आप से सोचने को प्रलोभित होंगे कि आपके जीवन-साथी के विरुद्ध आपका प्रकोप—आपका क्रोध — जय पाने के लिए बहुत बड़ा है, क्योंकि आपने वास्तव में कभी नहीं चखा कि असीम विराट प्रकोप को अनुग्रह के द्वारा जय पाते देखना क्या है, यथा, आपके विरोध में परमेश्वर का प्रकोप। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रकोप का हटाया जाना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम परमेश्वर का प्रकोप और इसके हटाये जाने से आरम्भ करते हैं। अब मेरे साथ कुलुस्सियों 2:13-14 में वापिस जाइये, ‘‘और उस ने तुम्हें भी, जो अपने अपराधों, और अपने शरीर की खतनारहित दशा में मुर्दा थे, उसके {मसीह के} साथ जिलाया, और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, और विधियों {ऋण} का वह लेख जो {इसकी वैधानिक मांगों के साथ} हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में था मिटा डाला; और उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे अंतिम शब्द सर्वाधिक निर्णायक हैं। यह — विधियों {ऋण} का वह लेख जो हमारे विरोध में था — परमेश्वर ने उस को क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया। वो कब हुआ? दो हजार साल पहिले। ये आपके अन्दर नहीं हुआ, और यह आप से किसी सहायता के साथ नहीं हुआ। आपके जन्म लेने के भी पूर्व, परमेश्वर ने उसे आपके लिए किया और आपके बाहर किया। हमारे उद्धार की, ये महान् यथार्थता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ऋण का अभिलेख, क्रूस पर रद्द हो गया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निश्चित कीजिये कि सब सत्यों से सर्वाधिक अद्भुत और चकित करनेवाले इस सच को आप देखें: परमेश्वर ने आपके सभी पापों के अभिलेख को, जिसने आपको प्रकोप का ऋणी बनाया था (पाप, परमेश्वर के विरुद्ध अपराध हैं जो ‘उसके’ प्रकोप को ले आते हैं), लिया और उन्हें आपके मुख के सम्मुख पकड़े रहने और आपको नरक में भेजने के वारंट के रूप में उपयोग करने की बनिस्बत, ‘उसने’ उन्हें अपने पुत्र की हथेली पर रख दिया और उनसे होता हुआ एक कीला क्रूस में गाड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किस के पाप क्रूस पर कील से जड़ दिये गए? किस के पापों को क्रूस पर दण्डित किया गया? उत्तर: मेरे पाप। और ‘नोएल’ के पाप — मेरी पत्नी के पाप और मेरे पाप — उन सभी के पाप जो स्वयँ को बचाने से हताश हैं और केवल मसीह में भरोसा रखते हैं। किस के हाथ क्रूस पर कीलों से ठोंक दिये गए? किसे क्रूस पर दण्डित किया गया? यीशु को। इसके लिए एक सुन्दर नाम है। इसे एक प्रतिस्थापन कहा जाता है। परमेश्वर ने मेरे पाप पर, मसीह के शरीर में, दण्ड की आज्ञा दी (रोमियों 8:3)। पतियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकते। पत्नियो, आप इस पर बहुत अधिक मजबूती से विश्वास नहीं कर सकतीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि हम पीछे जायें और रोमियों की पत्री से निर्दोष ठहराये जाने की अपनी सारी समझ को यहाँ ले आयें, तो हम और अधिक कह सकते हैं। निर्दोष ठहराना, क्षमा से आगे बढ़ जाता है। मसीह के कारण न केवल हमें क्षमा किया जाता है, अपितु परमेश्वर हमें मसीह के कारण धर्मी भी घोषित करता है। परमेश्वर हम से दो चीजों की मांग करता है: हमारे पापों के लिए दण्ड और हमारी जीवनों में सिद्धता। हमारे पापों को दण्डित किया जाना अवश्य है और हमारी जीवनों को धर्मी होना अवश्य है। लेकिन हम स्वयँ अपना दण्ड नहीं उठा सकते (भजन 49:7-8), और हम अपनी स्वयँ की धार्मिकता उपलब्ध नहीं कर सकते। कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं (रोमियों 3:10)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए, परमेश्वर ने, हमारे लिए ‘उसके’ अपार प्रेम के द्वारा, अपने स्वयँ के पुत्र को उपलब्ध कर दिया कि दोनों काम करे। मसीह हमारे दण्ड को उठाता है और मसीह हमारी धार्मिकता पूरी करता है। और जब हम मसीह को ग्रहण करते हैं (यूहन्ना 1:12), ‘उसका’ सम्पूर्ण दण्ड और ‘उसकी’ सारी धार्मिकता हमारी गिनी जाती है (रोमियों 4:4-6; 5:19; 5:1; 8:1; 10:4; फिलिप्पियों 3:8-9; 2 कुरिन्थियों 5:21)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== निर्दोष ठहराना, बाहर की ओर मुड़ा हुआ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये वो लम्बवत् वास्तविकता है जो हमारे जीवन-साथी के प्रति बाहर क्षैतिज रूप से मोड़ी जाना चाहिए यदि विवाह को परमेश्वर के वाचा-बान्धने, वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह को प्रदर्शित करना है। हम इसे कुलुस्सियों 3:12-13 में देखते हैं, ‘‘इसलिये परमेश्वर के चुने हुओं की नाईं जो पवित्र और प्रिय हैं, बड़ी करुणा, और भलाई, और दीनता, और नम्रता, और सहनशीलता धारण करो। और यदि किसी को किसी पर दोष देने का कोई कारण हो, तो एक दूसरे की सह लो, और एक दूसरे के अपराध क्षमा करो:जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘जैसे प्रभु ने तुम्हारे अपराध क्षमा किए, वैसे ही तुम भी करो’’ — आपके जीवन-साथी (पति/पत्नी) को। जैसा प्रभु आपकी ‘‘सह लेता है,’’ वैसा ही आपको आपके जीवन-साथी की सह लेना चाहिए। जब आप ‘उसकी’ इच्छा से कम पाये जाते हैं, प्रभु प्रतिदिन आपकी ‘‘सह लेता है।’’ अवश्य ही, मसीह आपसे जो अपेक्षा करता है और जो आप उपार्जित करते हैं, के बीच की दूरी, उस दूरी से असीमित रूप से विशाल है, जो आप अपने जीवन-साथी से अपेक्षा करते हैं और जो वह उपार्जित करता है। हम जितना करते हैं, मसीह सदैव उससे अधिक क्षमा करता व धीरज से सहता है। क्षमा कीजिये जैसे कि आप क्षमा किये गए। सह लीजिये जैसा कि ‘वह’ आपकी सह लेता है। ये बात दोनों दशा में लागू होती है चाहे आप एक विश्वासी से विवाहित हैं अथवा एक अविश्वासी से। मसीह के क्रूस में आपके लिए परमेश्वर के अनुग्रह की माप को आपके जीवन-साथी के प्रति आपके अनुग्रह की माप होने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि आप एक विश्वासी से विवाहित हैं, आप ये जोड़ सकते हैं: जैसा प्रभु आपको मसीह में धर्मी गिनता है, यद्यपि आप वास्तविक व्यवहार या मनोभाव में नहीं हैं, उसी तरह अपने जीवन-साथी को मसीह में धर्मी गिनिये, यद्यपि वह (पति) है नहीं — यद्यपि वो (पत्नी) है नहीं। दूसरे शब्दों में, कुलुस्सियों 3 कहता है, क्षमा और निर्दोष ठहराने का लम्बवत् अनुग्रह लो और उन्हें बाहर की ओर क्षैतिज रूप में अपने जीवन-साथी की ओर मोड़ दो। विवाह इसी के लिए है, सर्वाधिक अन्ततोगत्वा — मसीह के वाचा-पालन करनेवाले अनुग्रह का प्रदर्शन। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सुसमाचार में जड़ पकड़े हुई बुद्धिमŸाा की आवश्यकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इस बिन्दु पर, सैकड़ों जटिल स्थितियाँ उभरती हैं जो इन सुसमाचार की सच्चाईयों में और दुःखदायी, ईमानदार अनुभव के लम्बे वर्षों में जड़ पकड़े हुई, गहरी आत्मिक बुद्धिमत्ता के लिए पुकार करती हैं। दूसरे शब्दों में, कोई तरीका नहीं है कि मैं इस संदेश को प्रत्येक जन की विशिष्ट आवश्यकताओं पर लागू कर सकता। उपदेश देने के अलावा, हमें पवित्र आत्मा की आवश्यकता है, हमें प्रार्थना की आवश्यकता है, हमें अपने स्वयँ के लिए ‘वचन’ के ऊपर मनन करने की आवश्यकता है, हमें दूसरों की अन्तर्दृष्टि को पढ़ने की आवश्यकता है, हमें बुद्धिमान मित्रों के परामर्श की आवश्यकता है जो दुःखों से पक्के हो चुके हैं, हमें कलीसिया की आवश्यकता है कि हमें सहारा दे जब सब कुछ बिखर जाता है। अतः मुझे कोई भ्रान्तियाँ नहीं हैं कि आपकी सहायता करने के लिए जो सब कहा जाना था मैं कह सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== लम्बवत् रूप से जीना, फिर बाहर की ओर मुड़ना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्षमा और दूसरे को धर्मी गिनने के रूप में वाचा-प्रेम पर मैं क्यों जोर दे रहा हूँ, इसके कई कारण देने के द्वारा समाप्त करने में सहायता हो सकती है। क्या मैं दूसरे व्यक्ति में प्रसन्न रहने में विश्वास नहीं करता? हाँ, मैं करता हूँ। अनुभव और बाइबिल दोनों मुझे उधर ढकेलते हैं। निश्चित करने के लिए कि यीशु का ब्याह ‘उसकी’ दुल्हिन, कलीसिया से हो जावे और स्पष्टतया ये सम्भव और अच्छा दोनों है कि प्रभु को प्रसन्न रखा जावे (कुलुस्सियों 1:10)। और ‘उस’ में हमारी प्रसन्नता के ‘वह’ परम योग्य है। विवाह में यह आदर्श है: दो व्यक्ति अपने आप को नम्र करते हुए और भक्तिपूर्ण तरीकों से बदल जाने की खोज में रहें, जो हमारे जीवन-साथियों को प्रसन्न करे और उनकी शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करे अथवा हर एक भले तरीके से उन्हें प्रसन्न करे। हाँ। मसीह और कलीसिया का सम्बन्ध उस सब को सम्मिलित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन, कारण कि परमेश्वर के अनुग्रह से लम्बवत् रूप से जीने और फिर अपने जीवन-साथी की ओर क्षमा और निर्दोष ठहराने में बाहर क्षैतिज रूप से मुड़ने, पर मैं जोर देता हूं, है 1) क्योंकि पाप और अपरिचित होने के आधार पर टकराव होने जा रहा है (और एक-दूसरे के बारे में अन्जानापन क्या है और पाप क्या है, इस बारे में आप एक-दूसरे के साथ सहमत भी नहीं हो सकेंगे); और 2) क्योंकि धीरज से सहने और क्षमा करने का कठोर, खुरदुरा कार्य ही है जो स्नेहों का फलना-फूलना सम्भव बनाता है जबकि वे मर गए प्रतीत होते हैं; और 3) क्योंकि परमेश्वर को महिमा मिलती है जब दो बहुत भिन्न और बहुत त्रुटिपूर्ण व्यक्ति, मसीह पर भरोसा रखते हुए, क्लेश के भट्टे में तपाकर वफ़ादारी का जीवन गढ़ते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह में, परमेश्वर ने आपको — और आपके पति/आपकी पत्नी को क्षमा कर दिया है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं इसे यहाँ अगली बार उठाऊंगा और एक खोज के बारे में बताऊंगा जो ‘नोएल’ और मैंने की है। मैं भविष्यकथन करता हूँ कि संदेश को ‘‘द कॉम्पोस्ट पाइल सरमन’’ कहा जावेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब तक, पतियो और पत्नियो, इन विशाल सच्चाईयों को अपने विवेकों में बसा लीजिये — वे सच जो आपके विवाह में की किसी भी समस्या से बड़े हैं — कि परमेश्वर ने ‘‘हमारे सब अपराधों को क्षमा किया, ऋण का वह लेख जो हमारे नाम पर, और हमारे विरोध में, इसकी वैधानिक मांगों के साथ था, मिटा डाला। इसे ‘उसने’ क्रूस पर कीलों से जड़कर साम्हने से हटा दिया।’’ इस पर अपने सम्पूर्ण हृदय से विश्वास कीजिये और अपने पति/पत्नी की ओर मोडि़ये।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>अपने पिता से जो स्वर्ग में है, मांगो</title>
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				<updated>2018-02-20T20:51:47Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;अपने पिता से जो स्वर्ग में है, मांगो&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Ask Your Father in Heaven}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। 9 तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उस से रोटी मांगे, तो वह उसे पत्थर दे? 10 वा मछली मांगे, तो उसे सांप दे? 11 सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा? इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब आप ये विचार करने के लिए एक क्षण ठहरते हैं कि परमेश्वर असीमित रूप से बलवान् है और जो ‘वह’ चाहता है कर सकता है, और ‘वह’ असीमित रूप से धार्मिक है ताकि ‘वह’ वो ही करता है जो उचित है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से भला है कि हर चीज जो ‘वह’ करता है, पूर्णरूपेण अच्छी होती है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से बुद्धिमान है ताकि ‘वह’ सदैव सिद्धता से जानता है कि सही व अच्छा क्या है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से प्रेमी है ताकि अपने सम्पूर्ण बल व धार्मिकता व भलाई व बुद्धि में, ‘उसके’ प्रियों का सनातन आनन्द, जितना ऊँचा उठाया जा सकता है ‘वह’ ऊँचा करता है — जब आप ये विचार करने के लिए एक क्षण ठहरते हैं, तब भली वस्तुओं को मांगने का इस परमेश्वर का ये उदार आमंत्रण, इस प्रतिज्ञा के साथ कि वह उन्हें देगा, अकल्पनीय रूप से अद्भुत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थनाहीनता की त्रासदी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसका अर्थ है कि कलीसिया में अल्पकालिक बड़ी त्रासदियों में से एक है कि प्रार्थना करने की हमारी अभिरुचि कितनी कम है। संसार में सबसे महान् आमंत्रण हमें प्रस्तावित है, और समझ से बाहर बात है कि हम नियमित रूप से अन्य चीजों की ओर मुड़ते हैं। ये ऐसा है मानो परमेश्वर ने अब तक के सबसे विशाल भोज में, हमें निमंत्रण भेजा और हम जवाब भेजते हैं, ‘‘मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं,’’ अथवा, ‘‘मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं; और उन्हें परखने के जाता हूं,’’ अथवा, ‘‘मैं ने ब्याह किया है, इसलिए मैं नहीं आ सकता’’ (लूका 14:18-20)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करने की एक नयी अभिरुचि या झुकाव ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक, वो तब था। लेकिन मेरी प्रार्थना है कि 2007 में प्रार्थना करने की एक नयी बाध्यकारी अभिरुचि जाग्रत करने के लिए, परमेश्वर इस संदेश को और मत्ती 7 में यीशु की ओर से इन शब्दों को, और आपकी जिन्दगी में अन्य प्रभावों को उपयोग करे। जब हम इस मूल-पाठ को देखते हैं, मैं आशा करता हूँ कि आप परमेश्वर से ऐसा करने के लिए मांगेगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम इसे दो चरणों में करेंगे। पहिला, हम प्रार्थना करने के लिए मत्ती 7: 7-11 में आठ प्रोत्साहनों की ओर देखेंगे। दूसरा, हम इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करेंगे कि उन प्रतिज्ञाओं को कैसे समझना है, कि हमें दिया जायेगा जब हम मांगते हैं और पायेंगे जब ढूंढते हैं, और दरवाजा खोल दिया जायेगा जब हम खटखटाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करने के लिए यीशु से आठ प्रोत्साहन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनमें से छः प्रोत्साहन मूल-पाठ में स्पष्ट हैं और दो अप्रत्यक्ष। ये मुझे साफ प्रतीत होता है कि इन आयतों में यीशु का मुख्य अभिप्राय है कि प्रार्थना करने के लिए हमें प्रोत्साहित करे और प्रेरित करे। ‘वह’ चाहता है कि हम प्रार्थना करें। ‘वह’ हमें कैसे प्रोत्साहित करता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. ‘वह’ हमें प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन बार ‘वह’ हमें प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता है — या, यदि आप इसे प्रेम से सुनेंगे, आप कह सकते हैं, तीन बार ‘वह’ हमें प्रार्थना करने की आज्ञा देता है — कि हमें जो आवश्यकता है, ‘उस’ से मांगें। ये उसके द्वारा आमंत्रित किये जाने की संख्या है जो हमारा ध्यान खींचती है। पद 7-8: ‘‘मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। दोहराना यह कहने के लिए है कि, ‘‘मेरा आशय यही है।’’ मैं चाहता हूँ कि तुम ये करो। तुम्हारी आवश्यकता क्या है, अपने पिता से मांगो। जिस सहायता की तुम्हें आवश्यकता है, उसके लिए अपने पिता को ढूंढो। अपने पिता के मकान के दरवाजे पर खटखटाओ ताकि ‘वह’ खोले और जो तुम्हें आवश्यक है, तुम्हें दे। मांगो, ढूंढो, खटखटाओ। मैं तीन बार तुम्हें आमंत्रित करता हूँ क्योंकि मैं वास्तव में चाहता हूँ कि तुम अपने पिता की सहायता का आनन्द उठाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. यदि हम प्रार्थना करते हैं, ‘वह’ हमसे प्रतिज्ञाएँ करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन आमंत्रणों से भी बेहतर और अधिक चकित करनेवाली हैं, सात प्रतिज्ञाएँ। पद 7-8: ‘‘मांगो, तो {1} तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो {2} तुम पाओगे; खटखटाओ, तो {3} तुम्हारे लिये खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई मांगता है, {4} उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, {5} वह पाता है? और जो खटखटाता है, {6} उसके लिये खोला जाएगा। फिर पद 11ब के अन्त में {7} ‘‘तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सात प्रतिज्ञाएँ। ये आपको दिया जायेगा। आप पायेंगे। ये आपके लिये खोल दिया जावेगा। मांगनेवाला प्राप्त करता है। ढूंढनेवाला पाता है। खटखटानेवाले को एक खुला दरवाजा मिलता है। आपका पिता आपको अच्छी वस्तुएँ देगा। निश्चित ही, प्रतिज्ञाओं के इस मुक्तहस्त क्रम-विन्यास का आशय हम से ये कहना है कि: आने के लिए प्रोत्साहित रहो। ‘उस’ से प्रार्थना करो। जो आप प्रार्थना करते हैं वो व्यर्थ में नहीं है। परमेश्वर आपके साथ खिलौने के समान खेल नहीं रहा है। ‘वह’ उत्तर देता है। जब आप प्रार्थना करते हैं ‘वह’ अच्छी वस्तुएँ देता है। उत्साहित रहिये। बहुधा प्रार्थना कीजिये, नियमित रूप से प्रार्थना कीजिये, 2007 में आत्मविश्वास से प्रार्थना कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. परमेश्वर स्वयँ को विभिन्न स्तरों पर उपलब्ध करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु हमें न केवल आमंत्रणों और प्रतिज्ञाओं की संख्या के द्वारा प्रोत्साहित करता है, अपितु आमंत्रणों के त्रिस्तरीय विविधता के द्वारा। दूसरे शब्दों में, जब आप ‘उसे’ सुलभता के विभिन्न स्तरों में ढूंढते हैं, परमेश्वर सकारात्मक रूप से प्रत्युत्तर देने को तैयार खड़ा रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मांगो, ढूंढो, खटखटाओ। यदि एक बच्चे का पिता उपस्थित है, वह उससे मांगता है जो उसे चाहिए। यदि एक बच्चे का पिता घर में कहीं है किन्तु दिखाई नहीं दे रहा है तो, जो उसे आवश्यक है उसके लिए वह अपने पिता को ढूंढता है। यदि बच्चा अपने पिता को ढूंढता है और अपने पिता को अध्ययन-कक्ष के बन्द दरवाजे के पीछे पाता है तो, जो उसे आवश्यकता है वो पाने के लिए वह खटखटाता है। मुख्य बात यह प्रतीत होती है कि कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि आप परमेश्वर को, ‘उसकी’ निकटता के साथ लगभग स्पर्शनीय, हाथ भर की दूरी पर तुरन्त पाते हैं, अथवा दिखायी देने में कठिन और बीच में अवरोधों के साथ हो तब भी, ‘वह’ सुनेगा, और ‘वह’ आपको अच्छी वस्तुएँ देगा क्योंकि आपने ‘उस’ की ओर देखा और किसी अन्य की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4. हर एक जो मांगता है, प्राप्त करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु हमें ये स्पष्ट करने के द्वारा प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करता है कि हर एक जो मांगता है, प्राप्त करता है, मात्र कुछ लोग ही नहीं। पद 8: ‘‘क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।’’ जब ‘वह’ पद 8 में जो कोई {हर एक} शब्द जोड़ता है, ‘वह’ चाहता है कि हम अपने भय और हिचकिचाहट पर जय पायें कि कैसे भी हो ये दूसरों के लिए काम करेगा किन्तु हमारे लिए नहीं। अवश्य ही, ‘वह’ यहाँ परमेश्वर के बच्चों के बारे में बात कर रहा है, सभी मानवों के लिए नहीं। यदि हमारे पास हमारे उद्धारकर्ता के रूप में यीशु और हमारे पिता के रूप में परमेश्वर नहीं होगा, तब ये प्रतिज्ञाएँ हम पर लागू नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना 1:12 कहता है: ‘‘सभी को जिन्होंने उसे {यीशु को} ग्रहण किया है, जिन्होंने उसके नाम में विश्वास किया है, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया।’’ परमेश्वर की सन्तान बनने के लिए, हमें परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह, को ग्रहण करना अवश्य है, जो हमें लेपालकपन का अधिकार देता है। ये वही है जिसके लिए ये प्रतिज्ञाएँ हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके लिए जो यीशु को ग्रहण करते हैं, उनमें से जो कोई मांगता है अपने पिता से अच्छी वस्तुएँ पाता है। मुख्य बात ये है कि ‘उसके’ बच्चों में से कोई भी बहिष्कृत नहीं है। सभी का स्वागत है और आने के लिए आग्रह है। यीशु जिस तरह यहाँ प्रेरित कर रहे हैं, मार्टिन लूथर ने देखा: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘वह’ जानता है कि हम संकोची और शर्मीले हैं, कि हम परमेश्वर के समक्ष अपनी आवश्यकताओं को रखने में अपात्र और अयोग्य होना बोध करते हैं … हम सोचते हैं कि परमेश्वर इतना विशाल है और हम इतने क्षुद्र कि हम प्रार्थना करने की हिम्मत न करें … इसी कारण मसीह हमें ऐसे संकोची विचारों से दूर लुभाना चाहता है, कि हमारी षंकाओं को दूर कर दे, और हमें आत्मविश्वास और हियाव के साथ आगे बढ़ाये।’’ (द सरमन ऑन द माउन्ट, ‘जेरोस्लेव पेलीकन’ द्वारा अनुवादित, लूथर्स वर्कस् का 21वां ग्रन्थ, {कॉन्कार्डिया, 1956}, पृ. 234)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 5. हम हमारे पिता के पास आ रहे हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे समाविष्ठ किया है, अब आइये हम इसे इसके स्वयँ के बल के साथ स्पष्टता से कहें: जब हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, हम अपने पिता के पास आ रहे हैं। पद 11: ‘‘सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ यीशु के लिए पिता, एक फेंक देने लायक लेबल (नामपत्र) नहीं था। ये सभी सच्चाईयों में सबसे महान् है। परमेश्वर हमारा पिता है। आशय ये है कि ‘वह’ हमें कभी और कभी भी वो नहीं देगा जो हमारे लिए खराब है। कभी नहीं। ‘वह’ हमारा पिता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 6. हमारा स्वर्गिक पिता हमारे सांसारिक पिता से बेहतर है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद यीशु ये दिखाने के द्वारा, कि हमारा स्वर्गिक पिता हमारे सांसारिक पिता से बेहतर है और उसकी तुलना में जो वे हमें देते थे, अधिक निश्चित रूप से हमें भली वस्तुएँ देगा, हमें प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करता है। हमारे स्वर्गिक पिता में कोई बुराई नहीं है जैसी कि हमारे सांसारिक पिता में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनः पद 11: ‘‘सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे मालूम है और यीशु को और भी अधिक मालूम था, कि हमारे सांसारिक पिता पापमय हैं। इसी कारण बाइबिल बारम्बार न केवल सांसारिक पिता और स्वर्गिक पिता के मध्य समानता की ओर हमारा ध्यान खींचती है, अपितु भिन्नताओं की ओर भी (उदाहरण के लिए, इब्रानियों 12: 9-11; मत्ती 5: 48)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यीशु मात्र ये कहने के प्रोत्साहन से आगे बढ़ता है कि परमेश्वर तुम्हारा पिता है, और कहता है कि परमेश्वर तुम्हारे सांसारिक पिता से सदैव बेहतर है, क्योंकि समस्त सांसारिक पिता बुरे हैं और परमेश्वर नहीं। यीशु यह पर बहुत सपाट और गैरचापलूस है। समस्त मानवगणों के सार्वभौमिक पापमयता में यीशु के विश्वास का यह एक स्पष्ट उदाहरण है। ‘वह’ ये मान लेता है उसके चेले सभी बुरे हैं — ‘वह’ एक कोमल शब्द नहीं चुनता (जैसे कि पापमय, अथवा दुर्बल)। ‘वह’ स्पष्ट कहता है कि उसके चेले बुरे (पोनेरोई) हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी भी परमेश्वर के पितृत्व की आपकी समझ को आपके अपने पिता के अनुभव तक सीमित न करें। बल्कि, निश्चय जानिये कि आपके पिता के कोई भी पाप या सीमाएँ या कमजोरियाँ, परमेश्वर में नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यीशु जो बिन्दु बनाता है, वो है: यहाँ तक कि पतित, पापमय पितागण के पास सामान्यतः पर्याप्त आम शालीनता रहती है कि उनके बच्चों को अच्छी वस्तुएँ दें। भयंकर दुव्र्यवहार करनेवाले पिता भी हैं। लेकिन संसार के अधिकांश भागों में, पितागण अपने बच्चे के भले की लगन रखते हैं, तब भी जबकि वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि उनके लिए अच्छा क्या है। किन्तु परमेश्वर सदैव बेहतर है। उसमें कोई बुराई नहीं है। इसीलिए, ये तर्क मजबूत है: यदि तुम्हारे सांसारिक पिता ने तुम्हें अच्छी वस्तुएँ दिया (अथवा यदि उसने न भी दिया हो तब भी!), तुम्हारा स्वर्गिक पिता और कितना अधिक अच्छी वस्तुएँ देगा — सदैव अच्छी वस्तुएँ, उन्हें जो मांगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यहाँ कुछ अप्रत्यक्ष है जो ऊपर प्रोत्साहन क्र. 4 को रेखांकित करता है — शब्द जो कोई (या हर कोई) — ‘‘जो कोई मांगता है, उसे मिलता है।’’ यदि यीशु अपने चेलों को कहता है, ‘‘तुम बुरे हो,’’ तब केवल वे लोग जो परमेश्वर के पास प्रार्थना में आ सकते हैं, परमेश्वर के बुरे बच्चे हैं। आप परमेश्वर के बच्चे हैं। और आप बुरे हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा आपको ‘उसके’ परिवार में गोद ले लिये जाने के बावजूद भी, पाप आप में बना रहता है। किन्तु यीशु कहता है, हर कोई प्राप्त करेगा — परमेश्वर के बुरे बच्चों में से हर कोई! हम एक क्षण बाद देखेंगे कि क्यों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 7. हम परमेश्वर की भलाई पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि ‘वह’ हमें ‘अपनी’ सन्तान बना चुका है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ प्रार्थना करने का एक और अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन है: ‘उसके’ बच्चों के रूप में परमेश्वर हमें अच्छी वस्तुएँ देगा क्योंकि ‘उसने’ हमें ‘उसकी’ सन्तान होने का वरदान पहिले ही दे दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अन्तः दृष्टि संत अगस्टीन से आयी: ‘‘अब किस कारण वह पुत्रों को न देगा जब वे मांगते हैं, जबकि ‘उसने’ पहिले ही ये चीज स्वीकृत कर दिया है, यथा, कि वे पुत्र हों?’’ हम देख चुके हैं कि परमेश्वर का एक पुत्र होना एक वरदान है जिसे हम तब पाते हैं जब हम यीशु के पास आते हैं (यूहन्ना 1: 12)। यूहन्ना 8: 42 में यीशु ने फरीसियों से कहा, ‘‘यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता, तो तुम मुझसे प्रेम रखते।’’ किन्तु परमेश्वर उनका पिता नहीं है। वे यीशु का तिरस्कार करते हैं। अतः, सभी परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं। लेकिन यदि परमेश्वर ने हमें सेंत मेंत में पुत्र बना लिया है, ‘वह’ कितना और अधिक हमें देगा, जो हमें आवश्यकता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 8. क्रूस, प्रार्थना की नींव है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ततः, इन शब्दों में अप्रत्यक्ष, हमारी प्रार्थना के सभी उत्तरों की नींव के रूप में है, मसीह का क्रूस। कारण कि मैं ये कहता हूँ यह है कि क्योंकि ‘वह’ हमें बुरा कहता है और फिर भी ‘वह’ कहता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। ये कैसे हो सकता है कि बुरे लोग एक सर्व पवित्र परमेश्वर के द्वारा गोद लिये गए हों? मांगें और पाने की अपेक्षा करें, और ढूंढें और पा लेने की अपेक्षा करें, और खटखटायें और अपेक्षा करें कि दरवाजा खोल दिया जायेगा, की बात छोड़ दीजिये, हम बच्चे बन जाना कैसे मान लें? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु ने अनेकों बार उत्तर दिया। मत्ती 20: 28 में, ‘उसने’ कहा, ‘‘मनुष्य का पुत्र, इसलिये नहीं आया कि उस की सेवा टहल कीई जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे; और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपने प्राण दे।’’ ‘उसने’ अपने प्राण हमें परमेश्वर के क्रोध से छुड़ौती के लिये दिया और इसलिये कि हमें सन्तानों की पदवी में लाये, जो केवल अच्छी चीजें प्राप्त करते हैं। और मत्ती 26: 28 में ‘उसने’ अन्तिम रात्रि-भोज पर कहा, ‘‘यह वाचा का मेरा वो लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।’’ जब हम ‘उस’ में विश्वास करते हैं मसीह के लोहू के कारण, हमारे पाप क्षमा कर दिये जाते हैं। यही कारण है कि यद्यपि यीशु हमें बुरे पुकारता है, हम परमेश्वर की सन्तान हो सकते हैं और उस पर भरोसा कर सकते हैं कि जब हम मांगें, हमें अच्छी वस्तुएँ दे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की मृत्यु, परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाओं की और प्रार्थना के सभी उत्तरों की जो हमें कभी भी मिलते हैं, नींव है। इसी कारण हमारी प्रार्थनाओं के अन्त में हम कहते हैं ‘‘यीशु के नाम में’’। हर एक चीज ‘उस’ पर निर्भर रहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब तब का सारांश ये है कि यीशु का वास्तव में तात्पर्य है कि हमें प्रार्थना करने को प्रोत्साहित करे। अन्यथा प्रार्थना के बारे में इस तरह से बात क्यों करें यदि हमारे लिए 2007 में ‘उसका’ लक्ष्य ये नहीं कि हम प्रार्थना करें। अतः ‘वह’ हमें प्रोत्साहन पर प्रोत्साहन देता है, कम से कम उनमें से आठ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक अन्तिम प्रश्न ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक अन्तिम प्रश्न: पद 7 व 8 में इन छः प्रतिज्ञाओं को हम कैसे समझें: ‘‘मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या इसका ये अर्थ है कि हर एक चीज जो परमेश्वर का एक बच्चा मांगता है, वह पाता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं समझता हूँ कि संदर्भ जो यहाँ है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पर्याप्त है। नहीं, हर एक चीज जो हम मांगते हैं, नहीं पाते और पाना भी नहीं चाहिए और हम पाना भी नहीं चाहेंगे। कारण कि मैं ये कहता हूँ कि हमें पाना नहीं चाहिए यह है कि हम वास्तव में परमेश्वर बन जाते हैं यदि परमेश्वर ने वो सब कर दिया जो हमने ‘उस’ से करने को कहा। हमें परमेश्वर नहीं होना चाहिए। परमेश्वर को परमेश्वर होना चाहिए। और कारण कि मैं कहता हूँ कि हर चीज जो हम मांगते हैं हम पाना भी नहीं चाहेंगे, यह है कि क्योंकि तब हमें असीम बुद्धि का बोझ उठाना पड़ेगा जो हमारे पास नहीं है। हम पर्याप्त जानते भी नहीं हैं कि विश्वसनीयता के साथ निर्णय ले सकें कि हर एक निर्णय कैसा परिणाम देगा और विगत को छोड़ दें, हमारी अपनी जिन्दगियों में अगली घटनाएँ कौन सी होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन कारण कि मैं कहता हूँ कि हम जो सब मांगते हैं नहीं पाते, यह है कि क्योंकि मूल-पाठ का यही आशय है। पद 9-10 में यीशु कहते हैं कि एक भला पिता अपने बच्चे को पत्थर नहीं देगा यदि वह रोटी मांगता है, और उसे एक सांप नहीं देगा यदि वह मछली मांगता है। ये दृष्टान्त हमें पूछने को उकसाता है कि, ‘‘क्या होगा यदि बच्चा एक सांप मांगता है?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या मूल-पाठ ये उत्तर देता है कि स्वर्गिक पिता ये देगा? हाँ, ये देता है। पद 11 में, यीशु दृष्टान्तों से ये सच निकालता है&amp;amp;nbsp;: तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘वह’ केवल अच्छी वस्तुएँ देता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वह’ अच्छी वस्तुएँ देता है। केवल अच्छी वस्तुएँ। ‘वह’ बच्चों को सांप नहीं देता। इसलिए, मूल-पाठ स्वयँ इस निष्कर्ष से दूर हटकर इंगित करता है कि मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा का अर्थ है मांगो और तुम वही चीज दी जायेगी जो तुमने मांगी है, तुम इसके लिए कब मांगते हो, जिस तरह से तुम इसके लिए मांगते हो। ये वो नहीं कहता। और इसका वो अर्थ नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम पूरे परिच्छेद को एकसाथ लें, ये कहता है कि जब हम मांगते और ढूंढते और खटखटाते हैं — जब हम जरूरतमंद बच्चों के समान, हमारे स्वयँ के संसाधनों से दूर, हमारे भरोसेमंद स्वर्गिक पिता की ओर देखते हुए प्रार्थना करते हैं — ‘वह’ सुनेगा और ‘वह’ हमें अच्छी वस्तुएँ देगा। कभी-कभी हम ठीक क्या मांगते हैं। कभी-कभी हम इसे ठीक कब मांगते हैं। कभी-कभी हम ठीक किस तरह इसकी इच्छा करते हैं। और अन्य समयों पर ‘वह’ हमें कुछ बेहतर देता है, अथवा, ऐसे एक समय पर जब ‘वह’ जानता है कि बेहतर है, अथवा इस तरीके से जो ‘वह’ जानता है कि बेहतर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अवश्य ही, ये हमारे विश्वास को परखता है। क्योंकि यदि हमने सोचा कि कुछ भिन्न चीज बेहतर थी, हमने इसके लिए सर्वप्रथम मांगा होता। किन्तु हम परमेश्वर नहीं हैं। हम असीम रूप से बलवान् नहीं हैं, या असीम धार्मिक, या असीम भले, या असीम बद्धिमान, या असीम प्रेमी। और इसलिए, ये हमारे प्रति और संसार के प्रति महान् दया है कि हम वो सब नहीं पाते जो मांगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु को ‘उसके’ ‘वचनों’ के अनुसार लीजिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन यदि हम यीशु को उसके वचनों के अनुसार लें, ओह, हम कितनी अधिक आशीष खो देते हैं क्योंकि हम मांगते और ढूंढते और खटखटाते नहीं हैं — हमारे स्वयँ के लिए, हमारे परिवारों, हमारी कलीसिया, हमारे संसार के लिए आशीषें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या आप एक नये ताजे वचनबद्धता में मेरे साथ जुड़ जावेंगे कि 2007 में अकेले और परिवारों में और समूहों में प्रार्थना के लिए अलग समय निर्धारित करेंगे। इस ‘प्रार्थना-सप्ताह’ का पूरा शेष भाग, आपके लिए तैयार की गई इसकी विशेष पुस्तिका के साथ, इस संदेश के विस्तृत अनुप्रयोग के रूप में, रखा गया है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>अपने पिता से जो स्वर्ग में है, मांगो</title>
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				<updated>2018-02-20T20:43:00Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Ask Your Father in Heaven}}   &amp;amp;gt; मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; ...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Ask Your Father in Heaven}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। 9 तुम में से ऐसा कौन मनुष्य है, कि यदि उसका पुत्र उस से रोटी मांगे, तो वह उसे पत्थर दे? 10 वा मछली मांगे, तो उसे सांप दे? 11 सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा? इस कारण जो कुछ तुम चाहते हो, कि मनुष्य तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो; क्योंकि व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब आप ये विचार करने के लिए एक क्षण ठहरते हैं कि परमेश्वर असीमित रूप से बलवान् है और जो ‘वह’ चाहता है कर सकता है, और ‘वह’ असीमित रूप से धार्मिक है ताकि ‘वह’ वो ही करता है जो उचित है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से भला है कि हर चीज जो ‘वह’ करता है, पूर्णरूपेण अच्छी होती है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से बुद्धिमान है ताकि ‘वह’ सदैव सिद्धता से जानता है कि सही व अच्छा क्या है, और ये कि ‘वह’ असीमित रूप से प्रेमी है ताकि अपने सम्पूर्ण बल व धार्मिकता व भलाई व बुद्धि में, ‘उसके’ प्रियों का सनातन आनन्द, जितना ऊँचा उठाया जा सकता है ‘वह’ ऊँचा करता है — जब आप ये विचार करने के लिए एक क्षण ठहरते हैं, तब भली वस्तुओं को मांगने का इस परमेश्वर का ये उदार आमंत्रण, इस प्रतिज्ञा के साथ कि वह उन्हें देगा, अकल्पनीय रूप से अद्भुत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थनाहीनता की त्रासदी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसका अर्थ है कि कलीसिया में अल्पकालिक बड़ी त्रासदियों में से एक है कि प्रार्थना करने की हमारी अभिरुचि कितनी कम है। संसार में सबसे महान् आमंत्रण हमें प्रस्तावित है, और समझ से बाहर बात है कि हम नियमित रूप से अन्य चीजों की ओर मुड़ते हैं। ये ऐसा है मानो परमेश्वर ने अब तक के सबसे विशाल भोज में, हमें निमंत्रण भेजा और हम जवाब भेजते हैं, ‘‘मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं,’’ अथवा, ‘‘मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं; और उन्हें परखने के जाता हूं,’’ अथवा, ‘‘मैं ने ब्याह किया है, इसलिए मैं नहीं आ सकता’’ (लूका 14:18-20)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करने की एक नयी अभिरुचि या झुकाव ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक, वो तब था। लेकिन मेरी प्रार्थना है कि 2007 में प्रार्थना करने की एक नयी बाध्यकारी अभिरुचि जाग्रत करने के लिए, परमेश्वर इस संदेश को और मत्ती 7 में यीशु की ओर से इन शब्दों को, और आपकी जिन्दगी में अन्य प्रभावों को उपयोग करे। जब हम इस मूल-पाठ को देखते हैं, मैं आशा करता हूँ कि आप परमेश्वर से ऐसा करने के लिए मांगेगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम इसे दो चरणों में करेंगे। पहिला, हम प्रार्थना करने के लिए मत्ती 7: 7-11 में आठ प्रोत्साहनों की ओर देखेंगे। दूसरा, हम इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करेंगे कि उन प्रतिज्ञाओं को कैसे समझना है, कि हमें दिया जायेगा जब हम मांगते हैं और पायेंगे जब ढूंढते हैं, और दरवाजा खोल दिया जायेगा जब हम खटखटाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करने के लिए यीशु से आठ प्रोत्साहन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इनमें से छः प्रोत्साहन मूल-पाठ में स्पष्ट हैं और दो अप्रत्यक्ष। ये मुझे साफ प्रतीत होता है कि इन आयतों में यीशु का मुख्य अभिप्राय है कि प्रार्थना करने के लिए हमें प्रोत्साहित करे और प्रेरित करे। ‘वह’ चाहता है कि हम प्रार्थना करें। ‘वह’ हमें कैसे प्रोत्साहित करता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. ‘वह’ हमें प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन बार ‘वह’ हमें प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित करता है — या, यदि आप इसे प्रेम से सुनेंगे, आप कह सकते हैं, तीन बार ‘वह’ हमें प्रार्थना करने की आज्ञा देता है — कि हमें जो आवश्यकता है, ‘उस’ से मांगें। ये उसके द्वारा आमंत्रित किये जाने की संख्या है जो हमारा ध्यान खींचती है। पद 7-8: ‘‘मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। दोहराना यह कहने के लिए है कि, ‘‘मेरा आशय यही है।’’ मैं चाहता हूँ कि तुम ये करो। तुम्हारी आवश्यकता क्या है, अपने पिता से मांगो। जिस सहायता की तुम्हें आवश्यकता है, उसके लिए अपने पिता को ढूंढो। अपने पिता के मकान के दरवाजे पर खटखटाओ ताकि ‘वह’ खोले और जो तुम्हें आवश्यक है, तुम्हें दे। मांगो, ढूंढो, खटखटाओ। मैं तीन बार तुम्हें आमंत्रित करता हूँ क्योंकि मैं वास्तव में चाहता हूँ कि तुम अपने पिता की सहायता का आनन्द उठाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. यदि हम प्रार्थना करते हैं, ‘वह’ हमसे प्रतिज्ञाएँ करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन आमंत्रणों से भी बेहतर और अधिक चकित करनेवाली हैं, सात प्रतिज्ञाएँ। पद 7-8: ‘‘मांगो, तो {1} तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो {2} तुम पाओगे; खटखटाओ, तो {3} तुम्हारे लिये खोला जाएगा। क्योंकि जो कोई मांगता है, {4} उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, {5} वह पाता है? और जो खटखटाता है, {6} उसके लिये खोला जाएगा। फिर पद 11ब के अन्त में {7} ‘‘तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सात प्रतिज्ञाएँ। ये आपको दिया जायेगा। आप पायेंगे। ये आपके लिये खोल दिया जावेगा। मांगनेवाला प्राप्त करता है। ढूंढनेवाला पाता है। खटखटानेवाले को एक खुला दरवाजा मिलता है। आपका पिता आपको अच्छी वस्तुएँ देगा। निश्चित ही, प्रतिज्ञाओं के इस मुक्तहस्त क्रम-विन्यास का आशय हम से ये कहना है कि: आने के लिए प्रोत्साहित रहो। ‘उस’ से प्रार्थना करो। जो आप प्रार्थना करते हैं वो व्यर्थ में नहीं है। परमेश्वर आपके साथ खिलौने के समान खेल नहीं रहा है। ‘वह’ उत्तर देता है। जब आप प्रार्थना करते हैं ‘वह’ अच्छी वस्तुएँ देता है। उत्साहित रहिये। बहुधा प्रार्थना कीजिये, नियमित रूप से प्रार्थना कीजिये, 2007 में आत्मविश्वास से प्रार्थना कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. परमेश्वर स्वयँ को विभिन्न स्तरों पर उपलब्ध करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु हमें न केवल आमंत्रणों और प्रतिज्ञाओं की संख्या के द्वारा प्रोत्साहित करता है, अपितु आमंत्रणों के त्रिस्तरीय विविधता के द्वारा। दूसरे शब्दों में, जब आप ‘उसे’ सुलभता के विभिन्न स्तरों में ढूंढते हैं, परमेश्वर सकारात्मक रूप से प्रत्युत्तर देने को तैयार खड़ा रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मांगो, ढूंढो, खटखटाओ। यदि एक बच्चे का पिता उपस्थित है, वह उससे मांगता है जो उसे चाहिए। यदि एक बच्चे का पिता घर में कहीं है किन्तु दिखाई नहीं दे रहा है तो, जो उसे आवश्यक है उसके लिए वह अपने पिता को ढूंढता है। यदि बच्चा अपने पिता को ढूंढता है और अपने पिता को अध्ययन-कक्ष के बन्द दरवाजे के पीछे पाता है तो, जो उसे आवश्यकता है वो पाने के लिए वह खटखटाता है। मुख्य बात यह प्रतीत होती है कि कोई अन्तर नहीं पड़ता यदि आप परमेश्वर को, ‘उसकी’ निकटता के साथ लगभग स्पर्शनीय, हाथ भर की दूरी पर तुरन्त पाते हैं, अथवा दिखायी देने में कठिन और बीच में अवरोधों के साथ हो तब भी, ‘वह’ सुनेगा, और ‘वह’ आपको अच्छी वस्तुएँ देगा क्योंकि आपने ‘उस’ की ओर देखा और किसी अन्य की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4. हर एक जो मांगता है, प्राप्त करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु हमें ये स्पष्ट करने के द्वारा प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करता है कि हर एक जो मांगता है, प्राप्त करता है, मात्र कुछ लोग ही नहीं। पद 8: ‘‘क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।’’ जब ‘वह’ पद 8 में जो कोई {हर एक} शब्द जोड़ता है, ‘वह’ चाहता है कि हम अपने भय और हिचकिचाहट पर जय पायें कि कैसे भी हो ये दूसरों के लिए काम करेगा किन्तु हमारे लिए नहीं। अवश्य ही, ‘वह’ यहाँ परमेश्वर के बच्चों के बारे में बात कर रहा है, सभी मानवों के लिए नहीं। यदि हमारे पास हमारे उद्धारकर्ता के रूप में यीशु और हमारे पिता के रूप में परमेश्वर नहीं होगा, तब ये प्रतिज्ञाएँ हम पर लागू नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना 1:12 कहता है: ‘‘सभी को जिन्होंने उसे {यीशु को} ग्रहण किया है, जिन्होंने उसके नाम में विश्वास किया है, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया।’’ परमेश्वर की सन्तान बनने के लिए, हमें परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह, को ग्रहण करना अवश्य है, जो हमें लेपालकपन का अधिकार देता है। ये वही है जिसके लिए ये प्रतिज्ञाएँ हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनके लिए जो यीशु को ग्रहण करते हैं, उनमें से जो कोई मांगता है अपने पिता से अच्छी वस्तुएँ पाता है। मुख्य बात ये है कि ‘उसके’ बच्चों में से कोई भी बहिष्कृत नहीं है। सभी का स्वागत है और आने के लिए आग्रह है। यीशु जिस तरह यहाँ प्रेरित कर रहे हैं, मार्टिन लूथर ने देखा: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘वह’ जानता है कि हम संकोची और शर्मीले हैं, कि हम परमेश्वर के समक्ष अपनी आवश्यकताओं को रखने में अपात्र और अयोग्य होना बोध करते हैं … हम सोचते हैं कि परमेश्वर इतना विशाल है और हम इतने क्षुद्र कि हम प्रार्थना करने की हिम्मत न करें … इसी कारण मसीह हमें ऐसे संकोची विचारों से दूर लुभाना चाहता है, कि हमारी षंकाओं को दूर कर दे, और हमें आत्मविश्वास और हियाव के साथ आगे बढ़ाये।’’ (द सरमन ऑन द माउन्ट, ‘जेरोस्लेव पेलीकन’ द्वारा अनुवादित, लूथर्स वर्कस् का 21वां ग्रन्थ, {कॉन्कार्डिया, 1956}, पृ. 234)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 5. हम हमारे पिता के पास आ रहे हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे समाविष्ठ किया है, अब आइये हम इसे इसके स्वयँ के बल के साथ स्पष्टता से कहें: जब हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के पास आते हैं, हम अपने पिता के पास आ रहे हैं। पद 11: ‘‘सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ यीशु के लिए पिता, एक फेंक देने लायक लेबल (नामपत्र) नहीं था। ये सभी सच्चाईयों में सबसे महान् है। परमेश्वर हमारा पिता है। आशय ये है कि ‘वह’ हमें कभी और कभी भी वो नहीं देगा जो हमारे लिए खराब है। कभी नहीं। ‘वह’ हमारा पिता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 6. हमारा स्वर्गिक पिता हमारे सांसारिक पिता से बेहतर है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद यीशु ये दिखाने के द्वारा, कि हमारा स्वर्गिक पिता हमारे सांसारिक पिता से बेहतर है और उसकी तुलना में जो वे हमें देते थे, अधिक निश्चित रूप से हमें भली वस्तुएँ देगा, हमें प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करता है। हमारे स्वर्गिक पिता में कोई बुराई नहीं है जैसी कि हमारे सांसारिक पिता में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुनः पद 11: ‘‘सो जब तुम बुरे होकर, अपने बच्चों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे मालूम है और यीशु को और भी अधिक मालूम था, कि हमारे सांसारिक पिता पापमय हैं। इसी कारण बाइबिल बारम्बार न केवल सांसारिक पिता और स्वर्गिक पिता के मध्य समानता की ओर हमारा ध्यान खींचती है, अपितु भिन्नताओं की ओर भी (उदाहरण के लिए, इब्रानियों 12: 9-11; मत्ती 5: 48)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यीशु मात्र ये कहने के प्रोत्साहन से आगे बढ़ता है कि परमेश्वर तुम्हारा पिता है, और कहता है कि परमेश्वर तुम्हारे सांसारिक पिता से सदैव बेहतर है, क्योंकि समस्त सांसारिक पिता बुरे हैं और परमेश्वर नहीं। यीशु यह पर बहुत सपाट और गैरचापलूस है। समस्त मानवगणों के सार्वभौमिक पापमयता में यीशु के विश्वास का यह एक स्पष्ट उदाहरण है। ‘वह’ ये मान लेता है उसके चेले सभी बुरे हैं — ‘वह’ एक कोमल शब्द नहीं चुनता (जैसे कि पापमय, अथवा दुर्बल)। ‘वह’ स्पष्ट कहता है कि उसके चेले बुरे (पोनेरोई) हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी भी परमेश्वर के पितृत्व की आपकी समझ को आपके अपने पिता के अनुभव तक सीमित न करें। बल्कि, निश्चय जानिये कि आपके पिता के कोई भी पाप या सीमाएँ या कमजोरियाँ, परमेश्वर में नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यीशु जो बिन्दु बनाता है, वो है: यहाँ तक कि पतित, पापमय पितागण के पास सामान्यतः पर्याप्त आम शालीनता रहती है कि उनके बच्चों को अच्छी वस्तुएँ दें। भयंकर दुव्र्यवहार करनेवाले पिता भी हैं। लेकिन संसार के अधिकांश भागों में, पितागण अपने बच्चे के भले की लगन रखते हैं, तब भी जबकि वे इस बारे में अस्पष्ट हैं कि उनके लिए अच्छा क्या है। किन्तु परमेश्वर सदैव बेहतर है। उसमें कोई बुराई नहीं है। इसीलिए, ये तर्क मजबूत है: यदि तुम्हारे सांसारिक पिता ने तुम्हें अच्छी वस्तुएँ दिया (अथवा यदि उसने न भी दिया हो तब भी!), तुम्हारा स्वर्गिक पिता और कितना अधिक अच्छी वस्तुएँ देगा — सदैव अच्छी वस्तुएँ, उन्हें जो मांगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यहाँ कुछ अप्रत्यक्ष है जो ऊपर प्रोत्साहन क्र. 4 को रेखांकित करता है — शब्द जो कोई (या हर कोई) — ‘‘जो कोई मांगता है, उसे मिलता है।’’ यदि यीशु अपने चेलों को कहता है, ‘‘तुम बुरे हो,’’ तब केवल वे लोग जो परमेश्वर के पास प्रार्थना में आ सकते हैं, परमेश्वर के बुरे बच्चे हैं। आप परमेश्वर के बच्चे हैं। और आप बुरे हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा आपको ‘उसके’ परिवार में गोद ले लिये जाने के बावजूद भी, पाप आप में बना रहता है। किन्तु यीशु कहता है, हर कोई प्राप्त करेगा — परमेश्वर के बुरे बच्चों में से हर कोई! हम एक क्षण बाद देखेंगे कि क्यों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 7. हम परमेश्वर की भलाई पर भरोसा कर सकते हैं क्योंकि ‘वह’ हमें ‘अपनी’ सन्तान बना चुका है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ प्रार्थना करने का एक और अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन है: ‘उसके’ बच्चों के रूप में परमेश्वर हमें अच्छी वस्तुएँ देगा क्योंकि ‘उसने’ हमें ‘उसकी’ सन्तान होने का वरदान पहिले ही दे दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अन्तः दृष्टि संत अगस्टीन से आयी: ‘‘अब किस कारण वह पुत्रों को न देगा जब वे मांगते हैं, जबकि ‘उसने’ पहिले ही ये चीज स्वीकृत कर दिया है, यथा, कि वे पुत्र हों?’’ हम देख चुके हैं कि परमेश्वर का एक पुत्र होना एक वरदान है जिसे हम तब पाते हैं जब हम यीशु के पास आते हैं (यूहन्ना 1: 12)। यूहन्ना 8: 42 में यीशु ने फरीसियों से कहा, ‘‘यदि परमेश्वर तुम्हारा पिता होता, तो तुम मुझसे प्रेम रखते।’’ किन्तु परमेश्वर उनका पिता नहीं है। वे यीशु का तिरस्कार करते हैं। अतः, सभी परमेश्वर के पुत्र नहीं हैं। लेकिन यदि परमेश्वर ने हमें सेंत मेंत में पुत्र बना लिया है, ‘वह’ कितना और अधिक हमें देगा, जो हमें आवश्यकता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 8. क्रूस, प्रार्थना की नींव है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ततः, इन शब्दों में अप्रत्यक्ष, हमारी प्रार्थना के सभी उत्तरों की नींव के रूप में है, मसीह का क्रूस। कारण कि मैं ये कहता हूँ यह है कि क्योंकि ‘वह’ हमें बुरा कहता है और फिर भी ‘वह’ कहता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं। ये कैसे हो सकता है कि बुरे लोग एक सर्व पवित्र परमेश्वर के द्वारा गोद लिये गए हों? मांगें और पाने की अपेक्षा करें, और ढूंढें और पा लेने की अपेक्षा करें, और खटखटायें और अपेक्षा करें कि दरवाजा खोल दिया जायेगा, की बात छोड़ दीजिये, हम बच्चे बन जाना कैसे मान लें? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु ने अनेकों बार उत्तर दिया। मत्ती 20: 28 में, ‘उसने’ कहा, ‘‘मनुष्य का पुत्र, इसलिये नहीं आया कि उस की सेवा टहल कीई जाए, परन्तु इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे; और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपने प्राण दे।’’ ‘उसने’ अपने प्राण हमें परमेश्वर के क्रोध से छुड़ौती के लिये दिया और इसलिये कि हमें सन्तानों की पदवी में लाये, जो केवल अच्छी चीजें प्राप्त करते हैं। और मत्ती 26: 28 में ‘उसने’ अन्तिम रात्रि-भोज पर कहा, ‘‘यह वाचा का मेरा वो लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया जाता है।’’ जब हम ‘उस’ में विश्वास करते हैं मसीह के लोहू के कारण, हमारे पाप क्षमा कर दिये जाते हैं। यही कारण है कि यद्यपि यीशु हमें बुरे पुकारता है, हम परमेश्वर की सन्तान हो सकते हैं और उस पर भरोसा कर सकते हैं कि जब हम मांगें, हमें अच्छी वस्तुएँ दे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की मृत्यु, परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाओं की और प्रार्थना के सभी उत्तरों की जो हमें कभी भी मिलते हैं, नींव है। इसी कारण हमारी प्रार्थनाओं के अन्त में हम कहते हैं ‘‘यीशु के नाम में’’। हर एक चीज ‘उस’ पर निर्भर रहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब तब का सारांश ये है कि यीशु का वास्तव में तात्पर्य है कि हमें प्रार्थना करने को प्रोत्साहित करे। अन्यथा प्रार्थना के बारे में इस तरह से बात क्यों करें यदि हमारे लिए 2007 में ‘उसका’ लक्ष्य ये नहीं कि हम प्रार्थना करें। अतः ‘वह’ हमें प्रोत्साहन पर प्रोत्साहन देता है, कम से कम उनमें से आठ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक अन्तिम प्रश्न ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक अन्तिम प्रश्न: पद 7 व 8 में इन छः प्रतिज्ञाओं को हम कैसे समझें: ‘‘मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा। 8 क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढता है, वह पाता है? और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या इसका ये अर्थ है कि हर एक चीज जो परमेश्वर का एक बच्चा मांगता है, वह पाता है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं समझता हूँ कि संदर्भ जो यहाँ है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पर्याप्त है। नहीं, हर एक चीज जो हम मांगते हैं, नहीं पाते और पाना भी नहीं चाहिए और हम पाना भी नहीं चाहेंगे। कारण कि मैं ये कहता हूँ कि हमें पाना नहीं चाहिए यह है कि हम वास्तव में परमेश्वर बन जाते हैं यदि परमेश्वर ने वो सब कर दिया जो हमने ‘उस’ से करने को कहा। हमें परमेश्वर नहीं होना चाहिए। परमेश्वर को परमेश्वर होना चाहिए। और कारण कि मैं कहता हूँ कि हर चीज जो हम मांगते हैं हम पाना भी नहीं चाहेंगे, यह है कि क्योंकि तब हमें असीम बुद्धि का बोझ उठाना पड़ेगा जो हमारे पास नहीं है। हम पर्याप्त जानते भी नहीं हैं कि विश्वसनीयता के साथ निर्णय ले सकें कि हर एक निर्णय कैसा परिणाम देगा और विगत को छोड़ दें, हमारी अपनी जिन्दगियों में अगली घटनाएँ कौन सी होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन कारण कि मैं कहता हूँ कि हम जो सब मांगते हैं नहीं पाते, यह है कि क्योंकि मूल-पाठ का यही आशय है। पद 9-10 में यीशु कहते हैं कि एक भला पिता अपने बच्चे को पत्थर नहीं देगा यदि वह रोटी मांगता है, और उसे एक सांप नहीं देगा यदि वह मछली मांगता है। ये दृष्टान्त हमें पूछने को उकसाता है कि, ‘‘क्या होगा यदि बच्चा एक सांप मांगता है?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या मूल-पाठ ये उत्तर देता है कि स्वर्गिक पिता ये देगा? हाँ, ये देता है। पद 11 में, यीशु दृष्टान्तों से ये सच निकालता है&amp;amp;nbsp;: तो तुम्हारा स्वर्गीय पिता अपने मांगनेवालों को और अधिक {अंग्रेजी से सही अनुवाद} अच्छी वस्तुएं क्यों न देगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘वह’ केवल अच्छी वस्तुएँ देता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वह’ अच्छी वस्तुएँ देता है। केवल अच्छी वस्तुएँ। ‘वह’ बच्चों को सांप नहीं देता। इसलिए, मूल-पाठ स्वयँ इस निष्कर्ष से दूर हटकर इंगित करता है कि मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा का अर्थ है मांगो और तुम वही चीज दी जायेगी जो तुमने मांगी है, तुम इसके लिए कब मांगते हो, जिस तरह से तुम इसके लिए मांगते हो। ये वो नहीं कहता। और इसका वो अर्थ नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम पूरे परिच्छेद को एकसाथ लें, ये कहता है कि जब हम मांगते और ढूंढते और खटखटाते हैं — जब हम जरूरतमंद बच्चों के समान, हमारे स्वयँ के संसाधनों से दूर, हमारे भरोसेमंद स्वर्गिक पिता की ओर देखते हुए प्रार्थना करते हैं — ‘वह’ सुनेगा और ‘वह’ हमें अच्छी वस्तुएँ देगा। कभी-कभी हम ठीक क्या मांगते हैं। कभी-कभी हम इसे ठीक कब मांगते हैं। कभी-कभी हम ठीक किस तरह इसकी इच्छा करते हैं। और अन्य समयों पर ‘वह’ हमें कुछ बेहतर देता है, अथवा, ऐसे एक समय पर जब ‘वह’ जानता है कि बेहतर है, अथवा इस तरीके से जो ‘वह’ जानता है कि बेहतर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अवश्य ही, ये हमारे विश्वास को परखता है। क्योंकि यदि हमने सोचा कि कुछ भिन्न चीज बेहतर थी, हमने इसके लिए सर्वप्रथम मांगा होता। किन्तु हम परमेश्वर नहीं हैं। हम असीम रूप से बलवान् नहीं हैं, या असीम धार्मिक, या असीम भले, या असीम बद्धिमान, या असीम प्रेमी। और इसलिए, ये हमारे प्रति और संसार के प्रति महान् दया है कि हम वो सब नहीं पाते जो मांगते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु को ‘उसके’ ‘वचनों’ के अनुसार लीजिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन यदि हम यीशु को उसके वचनों के अनुसार लें, ओह, हम कितनी अधिक आशीष खो देते हैं क्योंकि हम मांगते और ढूंढते और खटखटाते नहीं हैं — हमारे स्वयँ के लिए, हमारे परिवारों, हमारी कलीसिया, हमारे संसार के लिए आशीषें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या आप एक नये ताजे वचनबद्धता में मेरे साथ जुड़ जावेंगे कि 2007 में अकेले और परिवारों में और समूहों में प्रार्थना के लिए अलग समय निर्धारित करेंगे। इस ‘प्रार्थना-सप्ताह’ का पूरा शेष भाग, आपके लिए तैयार की गई इसकी विशेष पुस्तिका के साथ, इस संदेश के विस्तृत अनुप्रयोग के रूप में, रखा गया है।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>प्रभु - भोज का हम क्यों व कैसे उत्सव मनाते हैं</title>
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				<updated>2018-02-12T20:57:09Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;प्रभु - भोज का हम क्यों व कैसे उत्सव मनाते हैं&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Why and How We Celebrate the Lord's Supper}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:परन्तु यह आज्ञा देते हुए, मैं तुम्हें नहीं सराहता, इसलिये कि तुम्हारे इकट्ठे होने से भलाई नहीं, परन्तु हानि होती है। 18 क्योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूं, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो, तो तुम में फूट होती है और मैं कुछ कुछ प्रतीति भी करता हूं। 19 क्योंकि मतभेद भी तुम में अवश्य होंगे, इसलिये कि जो लोग तुम में खरे निकले हैं, वे प्रगट हो जाएं। 20 सो तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं। 21 क्योंकि खाने के समय एक दूसरे से पहले अपना भोज खा लेता है, सो कोई तो भूखा रहता है, और कोई मतवाला हो जाता है। 22 क्या खाने पीने के लिये तुम्हारे घर नहीं&amp;amp;nbsp;? या परमेश्वर की कलीसिया को तुच्छ जानते हो, और जिन के पास नहीं है उन्हें लज्जित करते हो? मैं तुम से क्या कहूं&amp;amp;nbsp;? क्या इस बात में तुम्हारी प्रशंसा करूं&amp;amp;nbsp;? मैं प्रशंसा नहीं करता। 23 क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुंची, और मैं ने तुम्हें भी पहुँचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया रोटी ली। 24 और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है: मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” 25 इसी रीति से उस ने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा; ‘‘यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है: जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” 26 क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो। 27 इसलिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लहू का अपराधी ठहरेगा। 28 इसलिये मनुष्य अपने आप को जांच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। 29 क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। 30 इसी कारण तुम में बहुतेरे निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए। 31 यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्ड न पाते। 32 परन्तु प्रभु हमें दण्ड देकर हमारी ताड़ना करता है इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें। 33 इसलिये, हे मेरे भाइयो, जब तुम खाने के लिये इकट्ठे होते हो, तो एक दूसरे के लिये ठहरा करो—34 यदि कोई भूखा हो, तो अपने घर में खा ले—जिस से तुम्हारा इकट्ठा होना दण्ड का कारण न हो: और शॆष बातों को मैं आकर ठीक कर दूँगा।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके पूर्व कि हम आगामी सप्ताह (यदि प्रभु चाहे तो) रोमियों की पत्री में लौटें, मैंने सोचा कि हमारे लिए यह अच्छा होगा कि ‘प्रभु-भोज’ को बाइबल-शास्त्रीय संदर्भ में रखें और हमारा ध्यान इस पर केन्द्रित करें कि क्यों और कैसे हम इस धर्म--विधि का पालन करते हैं। अतः आज हम संदेश को पहले रखेंगे और फिर उपदेश के साथ ‘प्रभु-भोज’ की ओर जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के बाद, हमारे जीवनों और हमारी कलीसिया की अमोघ/अचूक नींव कौन सी है, हमारी कलीसिया के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है, बैतलहम बैपटिस्ट चर्च एल्डर अफर्मॆशन ऑफ फॆथ । मैं आप सभों को प्रॊत्साहित करता हूँ कि इसे पढ़ें। आप इसे चर्च की ‘वैबसाइट’ या ‘डिज़ायरिंग गॉड वैबसाइट’ पर देख सकते हैं। अनुच्छेद/पैराग्राफ 12. 4, इसकी धर्मशिक्षा संबंधी सारांश देता है कि ‘प्रभु-भोज’ के बारे में हम क्या विश्वास करते और सिखाते हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:हम विश्वास करते हैं कि ‘प्रभु-भोज’, प्रभु की एक धर्मविधि/रिवाज़ है, जिसमें एकत्र हुए विश्वासी रोटी खाते हैं, जो ‘उसके’लोगों के लिये दे दी गई मसीह की देह को सूचित करती है, और प्रभु के कटोरे में से पीते हैं, जो मसीह के लहू में ‘नयीवाचा’ को सूचित करता है। हम इसे प्रभु के स्मरण में करते हैं, और इस तरह ‘उसकी’ मृत्यु की घोषणा/प्रचार करते हैं, जब तक ‘वह’ न आये। वे जो योग्य रीति से खाते और पीते हैं, मसीह की देह और लहू के भागी होते हैं, भौतिक रूप से नहीं, अपितु आत्मिक रूप से, इस तरह, विश्वास के द्वारा, वे उन लाभों से पोषित होते हैं जो ‘उसने’ अपनी मृत्यु के द्वारा प्राप्त किये, और इस प्रकार वे अनुग्रह में बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज की इस समझ के लिए मैं एक बाइबल-शास्त्रीय बुनियाद, छः शीर्षकों के अर्न्तगत देने का प्रयास करूँगा: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1) ऐतिहासिक आरम्भ&amp;amp;nbsp;; 2) विश्वास करने वाले हिस्सेदार; 3) भौतिक क्रिया; 4) मानसिक क्रिया; 5) आत्मिक क्रिया; और 6) पवित्र गभ्भीरता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) प्रभु - भोज का ऐतिहासिक आरम्भ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मत्ती (26: 26 से आगे), मरकुस (14: 22 से आगे), और लूका (22: 14 से आगे) रचित सुसमाचार, सभी ‘अंतिम रात्रि-भोजन’ का विवरण देते हैं जो अपने मरने से पूर्व की रात्रि में यीशु ने अपने चेलों के साथ खाया। हर एक, यीशु द्वारा धन्यवाद देने अथवा रोटी और कटोरे को आशीषित करने और ये कहते हुए ‘उसके’ चेलों को देने का वर्णन करता है कि रोटी उसकी देह है और कटोरा वाचा का लहू है या ‘उसके’ लहू में नयी वाचा है। लूका 22: 19 में, यीशु कहते हैं, ‘‘मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।’’ यूहन्ना रचित सुसमाचार, खाने और पीने का विवरण नहीं देता, अपितु उन शिक्षाओं और क्रियाओं का जिनसे वो संध्या सराबोर हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ तक हम सबसे पूर्व के अभिलेखों से कह सकते हैं, कलीसिया ने वो किया जो यीशु ने कहा: उन्होंने यीशु के और‘उसकी’ मृत्यु के स्मरण में उस रात्रि-भोजन का पुनः अभिनय/प्रदर्शन किया। पौलुस की पत्रियाँ वे सबसे आरम्भिक साक्षी हैं जो हमारे पास हैं, और 1 कुरिन्थियों 11: 20 में, वह कलीसिया के जीवन में एक घटना का उल्लेख करता है जो ‘‘प्रभु-भोज’’ कहलाता है। यह सम्भवतः इसलिए ‘‘प्रभु-भोज’’ कहलाता है क्योंकि यह प्रभु यीशु के द्वारा स्थापित या नियुक्त किया गया था, और क्योंकि इसका अर्थ ही प्रभु की मृत्यु के स्मरण का अनुष्ठान करता है। पौलुस 1 कुरिन्थियों 11: 23-24 में कहता है, ‘‘क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुँची, और मैं ने तुम्हें भी पहुँचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया रोटी ली। 24 और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है: मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” ‘‘मुझे प्रभु से पहुँची . . . ’’ का सम्भवतः अर्थ है कि प्रभु ने स्वयँ इसे पौलुस (जो उस अंतिम रात्रि-भोजन पर नहीं था, जैसा कि अन्य प्रेरित थे) के लिए पुष्टि किया कि वो जो अन्य लोगों ने अंतिम रात्रि-भोजन के बारे में सूचित किया, वह वास्तव में हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः ‘प्रभु-भोज’ का ऐतिहासिक आरम्भ, वो अंतिम रात्रि-भोजन है जो यीशु ने अपने चेलों के साथ उस पूर्व रात्रि को खाया जब वह क्रूस पर चढ़ाया गया। इसकी क्रियाएँ और इसका अर्थ, सब उसमें जड़ पकड़े हुए हैं जो यीशु ने उस अंतिम रात्रि में कहा और किया। यीशु स्वयँ ‘प्रभु-भोज’ का उद्रगम/आरम्भ है। ‘उसने’ आज्ञा दी कि इसे जारी रखा जाए। और ‘वह’इसका केन्द्र और विषय-वस्तु है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) प्रभु भोज के, विश्वास करने वाले हिस्सेदार ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु भोज कलीसिया में एकत्रित हुए ऎसे लोगों व परिवारों की एक क्रिया है, जो यीशु में विश्वास करते हैं । यह अविश्वासियों की एक क्रिया नहीं है। अविश्वासी उपस्थित हो सकते हैं--अवश्य, उपस्थित होने के लिए हम उनका स्वागत करते हैं--प्रभु भोज के बारे में कुछ गुप्त नहीं है। यह खुले-आम किया जाता है। इसका एक सार्वजनिक अर्थ है। यह एक गुप्त, जादुई शक्तियों के साथ किया जाने वाला धर्मपंथ का कर्मकाण्ड नहीं है। यह एकत्र हुई कलीसिया के द्वारा आराधना की एक सार्वजनिक क्रिया है। वास्तव में, 1 कुरिन्थियों 11: 26 में पौलुस कहता है, ‘‘जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।’’ अतः प्रभु-भोज का एक उद्घोषणा करने वाला पहलू है। उद्घोषणा, गोपनीयता नहीं, वो स्वर है जिस पर जोर दिया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम प्रभु-भोज का किसी उपचार-गृह या अस्पताल में किसी के पास ले जाने का निषेध नहीं करते, लेकिन उस प्रकार का व्यक्तिगत उत्सव मनाना (अनुष्ठान) अपवाद है, बाइबल-शास्त्रीय नियम नहीं। 1 कुरिन्थियों 11 में पाँच बार, पौलुस कलीसिया के ‘‘इकट्ठे होने’’ की बात कहता है, जब प्रभु-भोज खाया जाता है। पद 17ब: ‘‘तुम्हारे इकट्ठे होनॆ से भलाई नहीं, परन्तु हानि होती है।’’ पद 18: ‘‘क्योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूँ, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो, तो तुम में फूट होती है।’’ पद 20: ‘‘सो तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं ।’’ पद 33&amp;amp;nbsp;: ‘‘जब तुम खाने के लिये इकट्ठे होते हो, तो एक दूसरे के लिये ठहरा करो ।’’ पद 34: ‘‘यदि कोई भूखा हो, तो अपने घर में खाले-जिस से तुम्हारा इकट्ठा होना दण्ड का कारण न हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वे लोग प्रभु-भोज को अपने नियमित रात्रि-भोजन के साथ निकटता से जोड़कर भ्रष्ट कर रहे थे, और कुछ लोगों के पास खाने को अत्याधिक होता था और कुछ के पास कुछ भी नहीं। इस कारण उसने कहा, घर पर अपना रात्रि- भोजन खाओ और प्रभु-भोज खाने के लिए इकट्ठे हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पद 18 में शब्द ‘‘कलीसिया’’ पर ध्यान दीजिये: ‘‘जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो ।’’ ये मसीह की देह है, यीशु के अनुयायियों की सभा। वे जो मूरतों से फिर गये हैं और अपने पापों की क्षमा के लिए और सनातन जीवन की आशा के लिए, और अपने आत्मा की संतुष्टि के लिए, केवल यीशु पर विश्वास किया है। ये मसीही हैं। अतः प्रभु-भोज में हिस्सा लेने वाले, यीशु में विश्वास करने वाले इकट्ठा हुए लोग हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3) प्रभु भोज की भौतिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज की भौतिक क्रिया, ऐसा भोजन खाना नहीं है जिसमें क्रम से सात प्रकार के व्यंजन हों। यह बहुत सरल है। यह रोटी खाना और कटोरे/कप में से पीना है। पद 23ब-25, ‘‘प्रभु यीशु ने . . . रोटी ली, और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है। मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’ इसी रीति से उस ने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा; ‘यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है। जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोटी के प्रकार के बारे में या ये किस प्रकार तोड़ी जाती है, कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया गया है। कटोरे में क्या था उसके बारे में एकमात्र बयान मत्ती, मरकुस, और लूका, प्रत्येक में एक आयत में दिया गया है: ‘‘मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं’’ (मत्ती 26: 29; तुलना कीजिये, मरकुस 14: 25; लूका 22: 18) । अतः इसे ‘‘दाख का रस’’ कहा जाता है। मैं नहीं सोचता कि हमें इस पर बड़ा विचार करना चाहिए कि साधारण अंगूर का रस उपयोग किया जाता है अथवा द्राक्षासव (वाइन/दाखों का आसवित रस) । मूल-पाठ में ऐसा कुछ नहीं है जो किसी एक की या दूसरे की आज्ञा देता अथवा निषेध करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें जिस बारे में चिन्ता करनी चाहिए वो है आनन्द देने वाली विविध वस्तुएं-मान लीजिये, एक अलाव के चारों ओर चिप्स और कोक। प्रभु-भोज कोई खेलने की वस्तु नहीं है। हमें इसका अनुष्ठान/आयोजन एक महत्ता के बोध के साथ करना चाहिए-जिस बारे में हम एक क्षण में/थोड़ी ही देर में बात करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शीघ्रता से मैं ये भी बताना चाहूँगा कि नया नियम में प्रभु-भोज की बारम्बारता के बारे में कुछ भी नहीं है। कुछ विश्वास करते हैं कि इसे सप्ताह-वार करना अच्छा रहेगा; दूसरे इसे त्रैमासिक रूप से अभ्यास में लाते हैं। हम मध्य में हैं और सामान्यतः इसे प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को आयोजित करते/मनाते हैं। मैं सोचता हूँ कि हम इस बारे में स्वतंत्र हैं और प्रश्न इसका बनता है कि 1) परमेश्वर के वचन की सेवकाई के लगाव में कितनी बारम्बारता/आवृत्ति या अनावृत्ति इसके उचित महत्व से मेल खाती है&amp;amp;nbsp;? और 2) कितनी बारम्बारता या अनावृत्ति इसके मूल्य को महसूस करने में हमारी सहायता करती है, बनिस्बत इसके कि इसके प्रति कठोर हृदय बन जाएं&amp;amp;nbsp;? ये वे निर्णय हैं जिन्हें लेना सरल नहीं है, और विभिन्न कलीसियाएँ विभिन्न तरह से निर्णय लेती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4) प्रभु भोज की मानसिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज में हिस्सा लेने वालों की मानसिक क्रिया है यीशु पर मस्तिष्क को केन्द्रित करना और विशॆष रूप से हमारे पापों के लिए मरने में ‘उसके’ ऐतिहासिक कार्य पर। पद 24 और 25: ‘‘मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’’ जब हम खाने और पीने की भौतिक क्रिया करते हैं, हमें स्मरण करने की मानसिक क्रिया करना है। अर्थात्, हमें सचेत रूप से मस्तिष्क में यीशु के व्यक्तित्व को स्मरण में लाना है जैसा कि ‘वह’ एक समय जीवित था और यीशु का कार्य जैसा कि ‘वह’ एक बार मरा और फिर जी उठा, और हमारे पापों की क्षमा के लिए ‘उसके’ कार्य का क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज एक सख्त स्मरण दिलाने वाला है, बारम्बार, कि मसीहियत, नये युग की आत्मिकता नहीं है। यह आपके अर्न्तमन के सम्पर्क में आना नहीं है। ये रहस्यवाद नहीं है। यह ऐतिहासिक तथ्यों में जड़ पकड़े हुए है। यीशु जीवित रहा। ‘उसके’ पास एक शरीर था और एक हृदय जिसने खून पम्प किया और चमड़ी थी जिससे खून बहा। ‘वह’ पापियों के स्थान पर, रोमी क्रूस पर सार्वजनिक रूप से मरा ताकि जो कोई ‘उस’ पर विश्वास करे, वो परमेश्वर के क्रोध से छुड़ाया जाए। वो इतिहास में एक बार और सदा के लिए घटित हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए, प्रभु-भोज की मानसिक क्रिया, बुनियादी रूप से स्मरण करना है। कल्पना करना नहीं। स्वप्न देखना नहीं। विचार-धारा नहीं। सुनना नहीं। उदासीनता में चले जाना नहीं। यह मस्तिष्क को विवेकपूर्ण ढंग से पीछे इतिहास में यीशु की ओर ले जाना है और उस ओर कि हम ‘उस’ के बारे में बाइबल से क्या जानते हैं। प्रभु-भोज, बारम्बार हमें इतिहास के बुनियाद में सुस्थिर करता है। रोटी और कटोरा। देह और लहू। प्राणदण्ड और मृत्यु । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 5) प्रभु भोज की आत्मिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अति महत्वपूर्ण है। कारण ये है कि अविश्वासी वो सब कुछ कर सकते थे जो अब तक मैंने वर्णन किया है। अवश्य ही, यदि शैतान देह धारण कर सकता, वो इसे कर सकता था। खाओ, पीओ, और स्मरण करो। उस बारे में अर्न्तनिहित रूप से कुछ भी आत्मिक नहीं है। अतः प्रभु-भोज के लिए कि यह क्या हो जैसा कि यीशु का अर्थ है कि यह हो, केवल खाने, पीने, और स्मरण करने से कुछ और अधिक घटित होना चाहिए। कुछ ऐसा जो अविश्वासी और शैतान नहीं कर सकते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे एल्डर अफर्मॆशन ऑफ फॆथ में सॆ प्रमुख वाक्य एक बार और पढ़ने दीजिये और तब बाइबल में सॆ दिखाने दीजिये कि यह कहाँ से आता है। ‘‘वे जो योग्य रीति से खाते और पीते हैं, मसीह की देह और लहू के भागी होते हैं, भौतिक रूप से नहीं, अपितु आत्मिक रूप से, इस तरह, विश्वास के द्वारा, वे उन लाभों से पोषित होते हैं जो ‘उसने’ अपनी मृत्यु के द्वारा प्राप्त किये, और इस प्रकार वे अनुग्रह में बढ़ते हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मसीह की देह और लहू के भागी होते . . . आत्मिक रूप से . . . विश्वास के द्वारा’’ का विचार कहाँ से आता है&amp;amp;nbsp;? इसे सहारा देने वाला मूल-पाठ, पिछले अध्याय में है: 1 कुरिन्थियों 10: 16-18। जैसे मैं इसे पढ़ता हूँ, पूछिये, “भागी होना’ का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं (कोईनोनिया एस्टिन तोयू हैमेटोस तोयू क्रिस्तोयू )&amp;amp;nbsp;? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह के देह की सहभागिता नहीं (ओयूची कोईनोनिया तोयू सोमेटोस तोयू क्रिस्तोयू एस्टिन )&amp;amp;nbsp;? इसलिये, कि एक ही रोटी है सो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं। जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उन को देखो: क्या बलिदानों के खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं (कोईनोनिया नया तोयू थूसिआस्तरिआयू )&amp;amp;nbsp;?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर स्मरण करने से भी बहुत अधिक गहरा कुछ है। यहाँ विश्वासी हैं-वे जो यीशु मसीह पर विश्वास करते और उसे सँजोते(अपने मनों में) हैं-और पौलुस कहता है कि वे मसीह की देह और लहू में सहभागी हो रहे हैं। अक्षरश: , वे उसकी देह और लहू में हिस्सेदारी (कोईनोनिया) करने का अनुभव कर रहे हैं। वे उसकी मृत्यु में साझेदारी का अनुभव कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विश्वास के द्वारा,आत्मिक रुप से, मसीह की देह और लहू का भागी होना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ये सहभागिता/हिस्सेदारी/साझेदारी का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ, पद 18 हमें सुराग़ देता है क्योंकि यह एक समान शब्द उपयोग करता है, किन्तु इसकी तुलना उससे करता है कि यहूदियों के बलिदानों में क्या होता है: ‘‘जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उन को देखो: क्या बलिदानों के खाने वाले वेदी के सहभागी (उसी शब्द का एक रूप) नहीं&amp;amp;nbsp;?’’ वेदी में साझेदार/सहभागी/हिस्सेदार का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? इसका अर्थ है कि वेदी पर जो हुआ, वे उसमें साझेदारी कर रहे हैं अथवा उससे लाभ पा रहे हैं। वे आनन्द उठा रहे हैं, उदाहरण के लिए, क्षमा और परमेश्वर के साथ बहाल की गई संगति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पद 16 व 17 को मैं इस अर्थ में लेता हूँ कि जब विश्वासी भौतिक रूप से रोटी खाते और कटोरे में से पीते हैं, हम आत्मिक रूप से अन्य प्रकार का खाना और पीना करते हैं। हम खाते और पीते हैं--अर्थात्, जो क्रूस पर हुआ--हम उसे अपने जीवनों में लेते हैं। विश्वास के द्वारा--उस सब में भरोसा करते हुए जो परमेश्वर हमारे लिए यीशु में है--हम उन लाभों से स्वयँ को पोषित करते हैं जो यीशु ने हमारे लिए प्राप्त किये जब वह लहू बहाकर क्रूस पर मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही कारण है कि हम माह-ब-माह प्रभु की मेज पर विभिन्न बिन्दुओं पर एकाग्र करने में आपकी अगुवाई करते हैं (परमेश्वर के साथ मेल, मसीह में आनन्द, भविष्य के लिए आशा, भय से मुक्ति, विपत्ति में सुरक्षा, व्याकुलता में मार्गदर्शन, रोग से चंगाई, परीक्षा में विजय, आदि)। इसलिए कि जब यीशु मरा, उसके बहाये हुए लहू और तोड़ी गई देह ने, जो हमारे बदले में उसकी मृत्यु में चढ़ायी गई, परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाओं को मोल ले लिया। पौलुस कहता है, ‘‘परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएं हैं, वे सब उसी में हाँ के साथ हैं’’(2 कुरिन्थियों 1: 20)। परमेश्वर का हर एक वरदान, और परमेश्वर के साथ हमारी आनन्दमय संगति, यीशु के लहू के द्वारा प्राप्त किये गये। जब पौलुस कहता है, ‘‘वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह के देह की सहभागिता नहीं&amp;amp;nbsp;?’’ उसका अर्थ है: प्रभु की मेज पर क्या हम विश्वास के द्वारा आत्मिक रूप से, हर एक आत्मिक आशीष पर, जो मसीह की देह और लहू के द्वारा मोल ली गई, दावत/भोज नहीं करते&amp;amp;nbsp;? कोई भी अविश्वासी ये नहीं कर सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शैतान ये नहीं कर सकता। ये परिवार के लिए एक वरदान/उपहार है। जब हम प्रभु-भोज का उत्सव मनाते हैं, हम विश्वास के द्वारा आत्मिक रूप से, परमेश्वर की हर एक प्रतिज्ञा पर दावत करते हैं, जो यीशु के लहू के द्वारा मोल ली गई हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 6) प्रभु भोज की पवित्र गम्भीरता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं उस तरह से समापन करता हूँ जैसा पौलुस 1 कुरिन्थियों 11 में करता है। वह चेतावनी देता है कि यदि आप प्रभु-भोज में एक अश्वारोही, उदासीन, लापरवाह तरीके से आयॆं जो उस गम्भीरता की समझ नहीं रखता कि क्रूस पर क्या हुआ, यदि आप एक विश्वासी हैं, हो सकता है, अपनी जिन्दगी खो दें, क्रोध के कारण नहीं, किन्तु परमेश्वर के एक पिता-स्वरूप अनुशासन की क्रिया के रूप में। जब हम आनन्दपूर्वक और गम्भीरता से प्रभु की मेज की ओर बढ़ते हैं, मुझे साधारण रूप से धीरे-धीरे 1 कुरिन्थियों 11: 27-32 पढ़ने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:इसलिये जो कोई अनुचित रीति से (अर्थात्, मसीह के बहुमूल्य वरदान पर भरोसा न रखते हुए और अपने अन्दर न सँजोते हुए ) प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लहू का अपराधी ठहरेगा। 28 इसलिये मनुष्य अपने आप को जाँच ले (यह देखने के लिए नहीं कि आप पर्याप्त भले हैं या नहीं, अपितु यह देखने कि क्या आप अपने स्वयं से मुड़ जाने और जो आपको आवश्यकता है उसके लिए यीशु पर भरोसा रखने के इच्छुक हैं ) और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। 29 क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहचाने (अर्थात्, बिना इस बारे में सचेत हुए कि इस रोटी से एक मछली की सेन्डविच के समान बर्ताव नहीं करना है, जैसा कि कुछ लोग कुरिन्थुस में कर रहे थे ), वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। 30 (और उसके कहने का क्या अर्थ है, वो यहाँ है ) इसी कारण तुम में बहुतेरे निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए हैं (नरक में भेजे जाने के लिए नहीं&amp;amp;nbsp;; अगली आयत समझाती है )। 31 यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्ड न पाते। 32 परन्तु प्रभु हमें दण्ड देकर हमारी ताड़ना करता है (अर्थात्, कुछ दुर्बल, और रोगी हैं, और मर रहे हैं ) इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी (अर्थात्, नरक में जाने के लिए ) न ठहरें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज को हल्के रूप में न लें। ये सर्वाधिक बहुमूल्य वरदानों में से एक है जो मसीह ने ‘उसकी’ कलीसिया को दिया है। आइये हम इसे मिलकर खायें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>प्रभु - भोज का हम क्यों व कैसे उत्सव मनाते हैं</title>
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				<updated>2018-02-09T21:33:54Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Why and How We Celebrate the Lord's Supper}}   :परन्तु यह आज्ञा देते हुए, मैं तुम्हें नहीं स...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Why and How We Celebrate the Lord's Supper}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:परन्तु यह आज्ञा देते हुए, मैं तुम्हें नहीं सराहता, इसलिये कि तुम्हारे इकट्ठे होने से भलाई नहीं, परन्तु हानि होती है। 18 क्योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूं, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो, तो तुम में फूट होती है और मैं कुछ कुछ प्रतीति भी करता हूं। 19 क्योंकि मतभेद भी तुम में अवश्य होंगे, इसलिये कि जो लोग तुम में खरे निकले हैं, वे प्रगट हो जाएं। 20 सो तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं। 21 क्योंकि खाने के समय एक दूसरे से पहले अपना भोज खा लेता है, सो कोई तो भूखा रहता है, और कोई मतवाला हो जाता है। 22 क्या खाने पीने के लिये तुम्हारे घर नहीं&amp;amp;nbsp;? या परमेश्वर की कलीसिया को तुच्छ जानते हो, और जिन के पास नहीं है उन्हें लज्जित करते हो? मैं तुम से क्या कहूं&amp;amp;nbsp;? क्या इस बात में तुम्हारी प्रशंसा करूं&amp;amp;nbsp;? मैं प्रशंसा नहीं करता। 23 क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुंची, और मैं ने तुम्हें भी पहुँचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया रोटी ली। 24 और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है: मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” 25 इसी रीति से उस ने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा; ‘‘यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है: जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” 26 क्योंकि जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो। 27 इसलिये जो कोई अनुचित रीति से प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लहू का अपराधी ठहरेगा। 28 इसलिये मनुष्य अपने आप को जांच ले और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। 29 क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहचाने, वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। 30 इसी कारण तुम में बहुतेरे निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए। 31 यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्ड न पाते। 32 परन्तु प्रभु हमें दण्ड देकर हमारी ताड़ना करता है इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी न ठहरें। 33 इसलिये, हे मेरे भाइयो, जब तुम खाने के लिये इकट्ठे होते हो, तो एक दूसरे के लिये ठहरा करो—34 यदि कोई भूखा हो, तो अपने घर में खा ले—जिस से तुम्हारा इकट्ठा होना दण्ड का कारण न हो: और शॆष बातों को मैं आकर ठीक कर दूँगा।।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके पूर्व कि हम आगामी सप्ताह (यदि प्रभु चाहे तो) रोमियों की पत्री में लौटें, मैंने सोचा कि हमारे लिए यह अच्छा होगा कि ‘प्रभु-भोज’ को बाइबल-शास्त्रीय संदर्भ में रखें और हमारा ध्यान इस पर केन्द्रित करें कि क्यों और कैसे हम इस धर्म--विधि का पालन करते हैं। अतः आज हम संदेश को पहले रखेंगे और फिर उपदेश के साथ ‘प्रभु-भोज’ की ओर जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के बाद, हमारे जीवनों और हमारी कलीसिया की अमोघ/अचूक नींव कौन सी है, हमारी कलीसिया के जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है, बैतलहम बैपटिस्ट चर्च एल्डर अफर्मॆशन ऑफ फॆथ । मैं आप सभों को प्रॊत्साहित करता हूँ कि इसे पढ़ें। आप इसे चर्च की ‘वैबसाइट’ या ‘डिज़ायरिंग गॉड वैबसाइट’ पर देख सकते हैं। अनुच्छेद/पैराग्राफ 12. 4, इसकी धर्मशिक्षा संबंधी सारांश देता है कि ‘प्रभु-भोज’ के बारे में हम क्या विश्वास करते और सिखाते हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:हम विश्वास करते हैं कि ‘प्रभु-भोज’, प्रभु की एक धर्मविधि/रिवाज़ है, जिसमें एकत्र हुए विश्वासी रोटी खाते हैं, जो ‘उसके’लोगों के लिये दे दी गई मसीह की देह को सूचित करती है, और प्रभु के कटोरे में से पीते हैं, जो मसीह के लहू में ‘नयीवाचा’ को सूचित करता है। हम इसे प्रभु के स्मरण में करते हैं, और इस तरह ‘उसकी’ मृत्यु की घोषणा/प्रचार करते हैं, जब तक ‘वह’ न आये। वे जो योग्य रीति से खाते और पीते हैं, मसीह की देह और लहू के भागी होते हैं, भौतिक रूप से नहीं, अपितु आत्मिक रूप से, इस तरह, विश्वास के द्वारा, वे उन लाभों से पोषित होते हैं जो ‘उसने’ अपनी मृत्यु के द्वारा प्राप्त किये, और इस प्रकार वे अनुग्रह में बढ़ते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज की इस समझ के लिए मैं एक बाइबल-शास्त्रीय बुनियाद, छः शीर्षकों के अर्न्तगत देने का प्रयास करूँगा: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1) ऐतिहासिक आरम्भ&amp;amp;nbsp;; 2) विश्वास करने वाले हिस्सेदार; 3) भौतिक क्रिया; 4) मानसिक क्रिया; 5) आत्मिक क्रिया; और 6) पवित्र गभ्भीरता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1) प्रभु - भोज का ऐतिहासिक आरम्भ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मत्ती (26: 26 से आगे), मरकुस (14: 22 से आगे), और लूका (22: 14 से आगे) रचित सुसमाचार, सभी ‘अंतिम रात्रि-भोजन’ का विवरण देते हैं जो अपने मरने से पूर्व की रात्रि में यीशु ने अपने चेलों के साथ खाया। हर एक, यीशु द्वारा धन्यवाद देने अथवा रोटी और कटोरे को आशीषित करने और ये कहते हुए ‘उसके’ चेलों को देने का वर्णन करता है कि रोटी उसकी देह है और कटोरा वाचा का लहू है या ‘उसके’ लहू में नयी वाचा है। लूका 22: 19 में, यीशु कहते हैं, ‘‘मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।’’ यूहन्ना रचित सुसमाचार, खाने और पीने का विवरण नहीं देता, अपितु उन शिक्षाओं और क्रियाओं का जिनसे वो संध्या सराबोर हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ तक हम सबसे पूर्व के अभिलेखों से कह सकते हैं, कलीसिया ने वो किया जो यीशु ने कहा: उन्होंने यीशु के और‘उसकी’ मृत्यु के स्मरण में उस रात्रि-भोजन का पुनः अभिनय/प्रदर्शन किया। पौलुस की पत्रियाँ वे सबसे आरम्भिक साक्षी हैं जो हमारे पास हैं, और 1 कुरिन्थियों 11: 20 में, वह कलीसिया के जीवन में एक घटना का उल्लेख करता है जो ‘‘प्रभु-भोज’’ कहलाता है। यह सम्भवतः इसलिए ‘‘प्रभु-भोज’’ कहलाता है क्योंकि यह प्रभु यीशु के द्वारा स्थापित या नियुक्त किया गया था, और क्योंकि इसका अर्थ ही प्रभु की मृत्यु के स्मरण का अनुष्ठान करता है। पौलुस 1 कुरिन्थियों 11: 23-24 में कहता है, ‘‘क्योंकि यह बात मुझे प्रभु से पहुँची, और मैं ने तुम्हें भी पहुँचा दी; कि प्रभु यीशु ने जिस रात वह पकड़वाया गया रोटी ली। 24 और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है: मेरे स्मरण के लिये यही किया करो ।” ‘‘मुझे प्रभु से पहुँची . . . ’’ का सम्भवतः अर्थ है कि प्रभु ने स्वयँ इसे पौलुस (जो उस अंतिम रात्रि-भोजन पर नहीं था, जैसा कि अन्य प्रेरित थे) के लिए पुष्टि किया कि वो जो अन्य लोगों ने अंतिम रात्रि-भोजन के बारे में सूचित किया, वह वास्तव में हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः ‘प्रभु-भोज’ का ऐतिहासिक आरम्भ, वो अंतिम रात्रि-भोजन है जो यीशु ने अपने चेलों के साथ उस पूर्व रात्रि को खाया जब वह क्रूस पर चढ़ाया गया। इसकी क्रियाएँ और इसका अर्थ, सब उसमें जड़ पकड़े हुए हैं जो यीशु ने उस अंतिम रात्रि में कहा और किया। यीशु स्वयँ ‘प्रभु-भोज’ का उद्रगम/आरम्भ है। ‘उसने’ आज्ञा दी कि इसे जारी रखा जाए। और ‘वह’इसका केन्द्र और विषय-वस्तु है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2) प्रभु भोज के, विश्वास करने वाले हिस्सेदार ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु भोज कलीसिया में एकत्रित हुए ऎसे लोगों व परिवारों की एक क्रिया है, जो यीशु में विश्वास करते हैं । यह अविश्वासियों की एक क्रिया नहीं है। अविश्वासी उपस्थित हो सकते हैं--अवश्य, उपस्थित होने के लिए हम उनका स्वागत करते हैं--प्रभु भोज के बारे में कुछ गुप्त नहीं है। यह खुले-आम किया जाता है। इसका एक सार्वजनिक अर्थ है। यह एक गुप्त, जादुई शक्तियों के साथ किया जाने वाला धर्मपंथ का कर्मकाण्ड नहीं है। यह एकत्र हुई कलीसिया के द्वारा आराधना की एक सार्वजनिक क्रिया है। वास्तव में, 1 कुरिन्थियों 11: 26 में पौलुस कहता है, ‘‘जब कभी तुम यह रोटी खाते, और इस कटोरे में से पीते हो, तो प्रभु की मृत्यु को जब तक वह न आए, प्रचार करते हो।’’ अतः प्रभु-भोज का एक उद्घोषणा करने वाला पहलू है। उद्घोषणा, गोपनीयता नहीं, वो स्वर है जिस पर जोर दिया जाना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम प्रभु-भोज का किसी उपचार-गृह या अस्पताल में किसी के पास ले जाने का निषेध नहीं करते, लेकिन उस प्रकार का व्यक्तिगत उत्सव मनाना (अनुष्ठान) अपवाद है, बाइबल-शास्त्रीय नियम नहीं। 1 कुरिन्थियों 11 में पाँच बार, पौलुस कलीसिया के ‘‘इकट्ठे होने’’ की बात कहता है, जब प्रभु-भोज खाया जाता है। पद 17ब: ‘‘तुम्हारे इकट्ठे होनॆ से भलाई नहीं, परन्तु हानि होती है।’’ पद 18: ‘‘क्योंकि पहले तो मैं यह सुनता हूँ, कि जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो, तो तुम में फूट होती है।’’ पद 20: ‘‘सो तुम जो एक जगह में इकट्ठे होते हो तो यह प्रभु भोज खाने के लिये नहीं ।’’ पद 33&amp;amp;nbsp;: ‘‘जब तुम खाने के लिये इकट्ठे होते हो, तो एक दूसरे के लिये ठहरा करो ।’’ पद 34: ‘‘यदि कोई भूखा हो, तो अपने घर में खाले-जिस से तुम्हारा इकट्ठा होना दण्ड का कारण न हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वे लोग प्रभु-भोज को अपने नियमित रात्रि-भोजन के साथ निकटता से जोड़कर भ्रष्ट कर रहे थे, और कुछ लोगों के पास खाने को अत्याधिक होता था और कुछ के पास कुछ भी नहीं। इस कारण उसने कहा, घर पर अपना रात्रि- भोजन खाओ और प्रभु-भोज खाने के लिए इकट्ठे हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पद 18 में शब्द ‘‘कलीसिया’’ पर ध्यान दीजिये: ‘‘जब तुम कलीसिया में इकट्ठे होते हो ।’’ ये मसीह की देह है, यीशु के अनुयायियों की सभा। वे जो मूरतों से फिर गये हैं और अपने पापों की क्षमा के लिए और सनातन जीवन की आशा के लिए, और अपने आत्मा की संतुष्टि के लिए, केवल यीशु पर विश्वास किया है। ये मसीही हैं। अतः प्रभु-भोज में हिस्सा लेने वाले, यीशु में विश्वास करने वाले इकट्ठा हुए लोग हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3) प्रभु भोज की भौतिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज की भौतिक क्रिया, ऐसा भोजन खाना नहीं है जिसमें क्रम से सात प्रकार के व्यंजन हों। यह बहुत सरल है। यह रोटी खाना और कटोरे/कप में से पीना है। पद 23ब-25, ‘‘प्रभु यीशु ने . . . रोटी ली, और धन्यवाद करके उसे तोड़ी, और कहा; कि ‘यह मेरी देह है, जो तुम्हारे लिये है। मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’ इसी रीति से उस ने बियारी के पीछे कटोरा भी लिया, और कहा; ‘यह कटोरा मेरे लहू में नई वाचा है। जब कभी पीओ, तो मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोटी के प्रकार के बारे में या ये किस प्रकार तोड़ी जाती है, कोई विशिष्ट विवरण नहीं दिया गया है। कटोरे में क्या था उसके बारे में एकमात्र बयान मत्ती, मरकुस, और लूका, प्रत्येक में एक आयत में दिया गया है: ‘‘मैं तुम से कहता हूं, कि दाख का यह रस उस दिन तक कभी न पीऊंगा, जब तक तुम्हारे साथ अपने पिता के राज्य में नया न पीऊं’’ (मत्ती 26: 29; तुलना कीजिये, मरकुस 14: 25; लूका 22: 18) । अतः इसे ‘‘दाख का रस’’ कहा जाता है। मैं नहीं सोचता कि हमें इस पर बड़ा विचार करना चाहिए कि साधारण अंगूर का रस उपयोग किया जाता है अथवा द्राक्षासव (वाइन/दाखों का आसवित रस) । मूल-पाठ में ऐसा कुछ नहीं है जो किसी एक की या दूसरे की आज्ञा देता अथवा निषेध करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें जिस बारे में चिन्ता करनी चाहिए वो है आनन्द देने वाली विविध वस्तुएं-मान लीजिये, एक अलाव के चारों ओर चिप्स और कोक। प्रभु-भोज कोई खेलने की वस्तु नहीं है। हमें इसका अनुष्ठान/आयोजन एक महत्ता के बोध के साथ करना चाहिए-जिस बारे में हम एक क्षण में/थोड़ी ही देर में बात करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शीघ्रता से मैं ये भी बताना चाहूँगा कि नया नियम में प्रभु-भोज की बारम्बारता के बारे में कुछ भी नहीं है। कुछ विश्वास करते हैं कि इसे सप्ताह-वार करना अच्छा रहेगा; दूसरे इसे त्रैमासिक रूप से अभ्यास में लाते हैं। हम मध्य में हैं और सामान्यतः इसे प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को आयोजित करते/मनाते हैं। मैं सोचता हूँ कि हम इस बारे में स्वतंत्र हैं और प्रश्न इसका बनता है कि 1) परमेश्वर के वचन की सेवकाई के लगाव में कितनी बारम्बारता/आवृत्ति या अनावृत्ति इसके उचित महत्व से मेल खाती है&amp;amp;nbsp;? और 2) कितनी बारम्बारता या अनावृत्ति इसके मूल्य को महसूस करने में हमारी सहायता करती है, बनिस्बत इसके कि इसके प्रति कठोर हृदय बन जाएं&amp;amp;nbsp;? ये वे निर्णय हैं जिन्हें लेना सरल नहीं है, और विभिन्न कलीसियाएँ विभिन्न तरह से निर्णय लेती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 4) प्रभु भोज की मानसिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज में हिस्सा लेने वालों की मानसिक क्रिया है यीशु पर मस्तिष्क को केन्द्रित करना और विशॆष रूप से हमारे पापों के लिए मरने में ‘उसके’ ऐतिहासिक कार्य पर। पद 24 और 25: ‘‘मेरे स्मरण के लिये यही किया करो।’’ जब हम खाने और पीने की भौतिक क्रिया करते हैं, हमें स्मरण करने की मानसिक क्रिया करना है। अर्थात्, हमें सचेत रूप से मस्तिष्क में यीशु के व्यक्तित्व को स्मरण में लाना है जैसा कि ‘वह’ एक समय जीवित था और यीशु का कार्य जैसा कि ‘वह’ एक बार मरा और फिर जी उठा, और हमारे पापों की क्षमा के लिए ‘उसके’ कार्य का क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज एक सख्त स्मरण दिलाने वाला है, बारम्बार, कि मसीहियत, नये युग की आत्मिकता नहीं है। यह आपके अर्न्तमन के सम्पर्क में आना नहीं है। ये रहस्यवाद नहीं है। यह ऐतिहासिक तथ्यों में जड़ पकड़े हुए है। यीशु जीवित रहा। ‘उसके’ पास एक शरीर था और एक हृदय जिसने खून पम्प किया और चमड़ी थी जिससे खून बहा। ‘वह’ पापियों के स्थान पर, रोमी क्रूस पर सार्वजनिक रूप से मरा ताकि जो कोई ‘उस’ पर विश्वास करे, वो परमेश्वर के क्रोध से छुड़ाया जाए। वो इतिहास में एक बार और सदा के लिए घटित हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए, प्रभु-भोज की मानसिक क्रिया, बुनियादी रूप से स्मरण करना है। कल्पना करना नहीं। स्वप्न देखना नहीं। विचार-धारा नहीं। सुनना नहीं। उदासीनता में चले जाना नहीं। यह मस्तिष्क को विवेकपूर्ण ढंग से पीछे इतिहास में यीशु की ओर ले जाना है और उस ओर कि हम ‘उस’ के बारे में बाइबल से क्या जानते हैं। प्रभु-भोज, बारम्बार हमें इतिहास के बुनियाद में सुस्थिर करता है। रोटी और कटोरा। देह और लहू। प्राणदण्ड और मृत्यु । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 5) प्रभु भोज की आत्मिक क्रिया ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अति महत्वपूर्ण है। कारण ये है कि अविश्वासी वो सब कुछ कर सकते थे जो अब तक मैंने वर्णन किया है। अवश्य ही, यदि शैतान देह धारण कर सकता, वो इसे कर सकता था। खाओ, पीओ, और स्मरण करो। उस बारे में अर्न्तनिहित रूप से कुछ भी आत्मिक नहीं है। अतः प्रभु-भोज के लिए कि यह क्या हो जैसा कि यीशु का अर्थ है कि यह हो, केवल खाने, पीने, और स्मरण करने से कुछ और अधिक घटित होना चाहिए। कुछ ऐसा जो अविश्वासी और शैतान नहीं कर सकते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे एल्डर अफर्मॆशन ऑफ फॆथ में सॆ प्रमुख वाक्य एक बार और पढ़ने दीजिये और तब बाइबल में सॆ दिखाने दीजिये कि यह कहाँ से आता है। ‘‘वे जो योग्य रीति से खाते और पीते हैं, मसीह की देह और लहू के भागी होते हैं, भौतिक रूप से नहीं, अपितु आत्मिक रूप से, इस तरह, विश्वास के द्वारा, वे उन लाभों से पोषित होते हैं जो ‘उसने’ अपनी मृत्यु के द्वारा प्राप्त किये, और इस प्रकार वे अनुग्रह में बढ़ते हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मसीह की देह और लहू के भागी होते . . . आत्मिक रूप से . . . विश्वास के द्वारा’’ का विचार कहाँ से आता है&amp;amp;nbsp;? इसे सहारा देने वाला मूल-पाठ, पिछले अध्याय में है: 1 कुरिन्थियों 10: 16-18। जैसे मैं इसे पढ़ता हूँ, पूछिये, “भागी होना’ का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं (कोईनोनिया एस्टिन तोयू हैमेटोस तोयू क्रिस्तोयू )&amp;amp;nbsp;? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह के देह की सहभागिता नहीं (ओयूची कोईनोनिया तोयू सोमेटोस तोयू क्रिस्तोयू एस्टिन )&amp;amp;nbsp;? इसलिये, कि एक ही रोटी है सो हम भी जो बहुत हैं, एक देह हैं: क्योंकि हम सब उसी एक रोटी में भागी होते हैं। जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उन को देखो: क्या बलिदानों के खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं (कोईनोनिया नया तोयू थूसिआस्तरिआयू )&amp;amp;nbsp;?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर स्मरण करने से भी बहुत अधिक गहरा कुछ है। यहाँ विश्वासी हैं-वे जो यीशु मसीह पर विश्वास करते और उसे सँजोते(अपने मनों में) हैं-और पौलुस कहता है कि वे मसीह की देह और लहू में सहभागी हो रहे हैं। अक्षरश: , वे उसकी देह और लहू में हिस्सेदारी (कोईनोनिया) करने का अनुभव कर रहे हैं। वे उसकी मृत्यु में साझेदारी का अनुभव कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== विश्वास के द्वारा,आत्मिक रुप से, मसीह की देह और लहू का भागी होना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ये सहभागिता/हिस्सेदारी/साझेदारी का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ, पद 18 हमें सुराग़ देता है क्योंकि यह एक समान शब्द उपयोग करता है, किन्तु इसकी तुलना उससे करता है कि यहूदियों के बलिदानों में क्या होता है: ‘‘जो शरीर के भाव से इस्राएली हैं, उन को देखो: क्या बलिदानों के खाने वाले वेदी के सहभागी (उसी शब्द का एक रूप) नहीं&amp;amp;nbsp;?’’ वेदी में साझेदार/सहभागी/हिस्सेदार का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? इसका अर्थ है कि वेदी पर जो हुआ, वे उसमें साझेदारी कर रहे हैं अथवा उससे लाभ पा रहे हैं। वे आनन्द उठा रहे हैं, उदाहरण के लिए, क्षमा और परमेश्वर के साथ बहाल की गई संगति। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पद 16 व 17 को मैं इस अर्थ में लेता हूँ कि जब विश्वासी भौतिक रूप से रोटी खाते और कटोरे में से पीते हैं, हम आत्मिक रूप से अन्य प्रकार का खाना और पीना करते हैं। हम खाते और पीते हैं--अर्थात्, जो क्रूस पर हुआ--हम उसे अपने जीवनों में लेते हैं। विश्वास के द्वारा--उस सब में भरोसा करते हुए जो परमेश्वर हमारे लिए यीशु में है--हम उन लाभों से स्वयँ को पोषित करते हैं जो यीशु ने हमारे लिए प्राप्त किये जब वह लहू बहाकर क्रूस पर मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही कारण है कि हम माह-ब-माह प्रभु की मेज पर विभिन्न बिन्दुओं पर एकाग्र करने में आपकी अगुवाई करते हैं (परमेश्वर के साथ मेल, मसीह में आनन्द, भविष्य के लिए आशा, भय से मुक्ति, विपत्ति में सुरक्षा, व्याकुलता में मार्गदर्शन, रोग से चंगाई, परीक्षा में विजय, आदि)। इसलिए कि जब यीशु मरा, उसके बहाये हुए लहू और तोड़ी गई देह ने, जो हमारे बदले में उसकी मृत्यु में चढ़ायी गई, परमेश्वर की सारी प्रतिज्ञाओं को मोल ले लिया। पौलुस कहता है, ‘‘परमेश्वर की जितनी प्रतिज्ञाएं हैं, वे सब उसी में हाँ के साथ हैं’’(2 कुरिन्थियों 1: 20)। परमेश्वर का हर एक वरदान, और परमेश्वर के साथ हमारी आनन्दमय संगति, यीशु के लहू के द्वारा प्राप्त किये गये। जब पौलुस कहता है, ‘‘वह धन्यवाद का कटोरा, जिस पर हम धन्यवाद करते हैं, क्या मसीह के लहू की सहभागिता नहीं? वह रोटी जिसे हम तोड़ते हैं, क्या वह मसीह के देह की सहभागिता नहीं&amp;amp;nbsp;?’’ उसका अर्थ है: प्रभु की मेज पर क्या हम विश्वास के द्वारा आत्मिक रूप से, हर एक आत्मिक आशीष पर, जो मसीह की देह और लहू के द्वारा मोल ली गई, दावत/भोज नहीं करते&amp;amp;nbsp;? कोई भी अविश्वासी ये नहीं कर सकता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शैतान ये नहीं कर सकता। ये परिवार के लिए एक वरदान/उपहार है। जब हम प्रभु-भोज का उत्सव मनाते हैं, हम विश्वास के द्वारा आत्मिक रूप से, परमेश्वर की हर एक प्रतिज्ञा पर दावत करते हैं, जो यीशु के लहू के द्वारा मोल ली गई हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 6) प्रभु भोज की पवित्र गम्भीरता  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं उस तरह से समापन करता हूँ जैसा पौलुस 1 कुरिन्थियों 11 में करता है। वह चेतावनी देता है कि यदि आप प्रभु-भोज में एक अश्वारोही, उदासीन, लापरवाह तरीके से आयॆं जो उस गम्भीरता की समझ नहीं रखता कि क्रूस पर क्या हुआ, यदि आप एक विश्वासी हैं, हो सकता है, अपनी जिन्दगी खो दें, क्रोध के कारण नहीं, किन्तु परमेश्वर के एक पिता-स्वरूप अनुशासन की क्रिया के रूप में। जब हम आनन्दपूर्वक और गम्भीरता से प्रभु की मेज की ओर बढ़ते हैं, मुझे साधारण रूप से धीरे-धीरे 1 कुरिन्थियों 11: 27-32 पढ़ने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
:इसलिये जो कोई अनुचित रीति से (अर्थात्, मसीह के बहुमूल्य वरदान पर भरोसा न रखते हुए और अपने अन्दर न सँजोते हुए ) प्रभु की रोटी खाए, या उसके कटोरे में से पीए, वह प्रभु की देह और लहू का अपराधी ठहरेगा। 28 इसलिये मनुष्य अपने आप को जाँच ले (यह देखने के लिए नहीं कि आप पर्याप्त भले हैं या नहीं, अपितु यह देखने कि क्या आप अपने स्वयं से मुड़ जाने और जो आपको आवश्यकता है उसके लिए यीशु पर भरोसा रखने के इच्छुक हैं ) और इसी रीति से इस रोटी में से खाए, और इस कटोरे में से पीए। 29 क्योंकि जो खाते-पीते समय प्रभु की देह को न पहचाने (अर्थात्, बिना इस बारे में सचेत हुए कि इस रोटी से एक मछली की सेन्डविच के समान बर्ताव नहीं करना है, जैसा कि कुछ लोग कुरिन्थुस में कर रहे थे ), वह इस खाने और पीने से अपने ऊपर दण्ड लाता है। 30 (और उसके कहने का क्या अर्थ है, वो यहाँ है ) इसी कारण तुम में बहुतेरे निर्बल और रोगी हैं, और बहुत से सो भी गए हैं (नरक में भेजे जाने के लिए नहीं&amp;amp;nbsp;; अगली आयत समझाती है )। 31 यदि हम अपने आप को जाँचते, तो दण्ड न पाते। 32 परन्तु प्रभु हमें दण्ड देकर हमारी ताड़ना करता है (अर्थात्, कुछ दुर्बल, और रोगी हैं, और मर रहे हैं ) इसलिये कि हम संसार के साथ दोषी (अर्थात्, नरक में जाने के लिए ) न ठहरें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु-भोज को हल्के रूप में न लें। ये सर्वाधिक बहुमूल्य वरदानों में से एक है जो मसीह ने ‘उसकी’ कलीसिया को दिया है। आइये हम इसे मिलकर खायें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर की इच्छा क्या है और हम इसे कैसे जानें ?</title>
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				<updated>2017-07-20T20:15:35Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;परमेश्वर की इच्छा क्या है और हम इसे कैसे जानें ?&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Is the Will of God and How Do We Know It?}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। 2 और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 12: 1-2 का लक्ष्य है कि सम्पूर्ण जीवन ‘‘आत्मिक आराधना’’ बन जावे। पद 1: ‘‘अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा (सही अनुवाद- आराधना) है। परमेश्वर की दृष्टि में सभी मानव जिन्दगियों का लक्ष्य ये है कि मसीह को उतना ही मूल्यवान् दिखाया जावे जितना कि ‘वह’ है। आराधना का अर्थ है, हमारे मन और हृदयों और शरीरों को, परमेश्वर के मूल्य को, और जो कुछ ‘वह’ यीशु में हमारे लिए है, अभिव्यक्त करने के लिए उपयोग करना। जीने का एक तरीका है — प्रेम करने का एक तरीका — जो यह करता है। आपकी नौकरी/धंधे को करने का एक तरीका है जो परमेश्वर के सच्चे मूल्य को अभिव्यक्त करता है। यदि आप इसे ढूंढ नहीं सकते, तो इसका अर्थ हो सकता है कि आपको नौकरी या पेशा बदलना चाहिए। अथवा इसका अर्थ हो सकता है कि पद 2 उस अंश तक घटित नहीं हो रहा है, जितना इसे होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 2, पौलुस का उत्तर है कि कैसे हम सम्पूर्ण जीवन को आराधना में बदल दें। हमें रूपान्तरित होना चाहिए। हमें रूपान्तरित होना चाहिए। मात्र हमारा बाहरी व्यवहार नहीं, अपितु हम जिस तरह से अनुभूति करते और सोचते हैं—हमारे मन। पद 2: ‘‘''तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से'' तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आप क्या हैं, बन जाइये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे जो मसीह यीशु में विश्वास करते हैं, मसीह में लोहू-से-खरीदे-गए नये जीव बन चुके हैं। ‘‘यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है’’ (2 कुरिन्थियों 5:17)। किन्तु अब हमें वो ''बन जाना चाहिए जो हम हैं।'' ‘‘पुराना खमीर निकाल कर, अपने आप को शुद्ध करो: कि नया गूंधा हुआ आटा बन जाओ; ताकि तुम अखमीरी हो’’ (1 कुरिन्थियों 5: 7)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘तुम ने … नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये ''नया बनता जाता है''’’ (कुलुस्सियों 3:10)। तुम्हें मसीह में नया ''बना दिया गया है''; और अब तुम दिन-प्रतिदिन ''नया बनते जाते हो।'' यही है जिस पर हमने विगत सप्ताह ध्यान केन्द्रित किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हम पद 2 के अन्तिम भाग पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, यथा, नयी हो गई बुद्धि का लक्ष्य: ‘‘इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, {अब यहाँ लक्ष्य आता है} ''जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।''’’ अतः आज का हमारा केन्द्र है, शब्द ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ का अर्थ, और हम इसे कैसे जानें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की दो मनसाएं/इच्छाएं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल में ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ शब्द के लिए दो स्पष्ट और बहुत भिन्न अर्थ हैं। हमें उन्हें जानना और ये निर्णय लेना कि यहाँ रोमियों 12:2 में कौन सा उपयोग किया जा रहा है, आवश्यक है। वास्तव में, ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ के इन दो अर्थों के बीच अन्तर को जानना, सम्पूर्ण बाइबिल में सबसे बड़ी और सर्वाधिक व्याकुल करनेवाली चीजों में से एक, की समझ के लिए महत्वपूर्ण है, यथा, यह कि परमेश्वर सभी चीजों के ऊपर प्रभुसत्ता-सम्पन्न है और फिर भी कई चीजों को नापसन्द करता (या निर-अनुमोदन करता) है। जिसका अर्थ है कि परमेश्वर कुछ को नापसन्द करता है जिसे ‘वह’ घटित होने के लिए निर्धारित करता है। अर्थात्, ‘वह’ कुछ चीजों का निषेध करता है, जिन्हें ‘वह’ होने देता है। और ‘वह’ कुछ चीजों की आज्ञा देता है, जिन्हें ‘वह’ बाधित करता है। अथवा, इसे सर्वाधिक विरोधाभासी रूप में रखने के लिए: परमेश्वर कुछ घटनाओं की एक भाव में इच्छा करता है जिनकी ‘वह’ दूसरे अर्थ में इच्छा नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. परमेश्वर की राजाज्ञा-की-इच्छा, अथवा प्रभुसत्ताक-इच्छा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम धर्मशास्त्र के परिच्छेदों को देखें जो हमें इस तरह सोचने को बाध्य करते हैं। पहिले उन परिच्छेदों पर विचार करें जो ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ को, सब कुछ जो घटित होता है उस पर प्रभुसत्ताक नियंत्रण के रूप में, वर्णन करते हैं। एक सर्वथा स्पष्टतम् है, जिस तरह यीशु ने गतसमनी में परमेश्वर की इच्छा के बारे में कहा, जब ‘वह’ प्रार्थना कर रहा था। मत्ती 26:39 में ‘उसने’ कहा, ‘‘हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु ''जैसा तू चाहता है'' वैसा ही हो।’’ इस आयत में परमेश्वर की इच्छा क्या संकेत करती है? यह परमेश्वर की प्रभुसत्ताक योजना की ओर संकेत करती है जो आने वाले घण्टों में घटित होवेगी। आप याद कीजिये कि प्रेरित 4: 27-28 इसे कैसे कहता है: ‘‘क्योंकि सचमुच तेरे पवित्र सेवक यीशु के विरोध में, जिसे तू ने अभिषेक किया, हेरोदेस और पुन्तियुस पीलातुस भी अन्य जातियों और इस्राएलियों के साथ इस नगर में इकट्ठे हुए कि जो कुछ पहिले से तेरी सामर्थ (तेरे हाथ) और मति से ठहरा था वहीं करें।’’ अतः ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ यह थी कि यीशु मरे। ये ‘उसकी’ योजना थी, ‘उसकी’ राजाज्ञा। इसे बदला नहीं जाना था और यीशु ने सिर झुकाया और कहा, ‘‘ये है मेरा निवेदन, परन्तु करने के लिए जो सर्वोत्तम है, तू कर।’’ वो है परमेश्वर की प्रभुसत्ताक इच्छा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यहाँ बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु मत छोड़ दीजिये कि यह मनुष्य के पापों को सम्मिलित करता है। हेरोदेस, पीलातुस, सैनिक, यहूदी अगुवे — उन सभों ने, परमेश्वर की इच्छा को परिपूर्ण करने में कि ‘उसका’ पुत्र क्रूसित किया जावे, पाप किया (यशायाह 53:10)। अतः इस बारे में स्पष्ट हो जाइये: परमेश्वर कुछ ऐसा घटित होने की इच्छा करता है, जिससे ‘वह’ घृणा करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिला पतरस से यहाँ एक उदाहरण है। 1 पतरस 3:17 में पतरस लिखता है, ‘‘यदि परमेश्वर की यही इच्छा हो, कि तुम भलाई करने के कारण दुःख उठाओ, तो यह बुराई करने के कारण दुःख उठाने से उत्तम है।’’ दूसरे शब्दों में, ये परमेश्वर की इच्छा हो सकती है कि मसीहीगण भलाई करने के कारण दुःख उठायें। ‘उसके’ मन में सताव है। लेकिन उन मसीहियों का सताव जो इसकी पात्रता नहीं रखते, पाप है। अतः पुनः, कभी-कभी परमेश्वर इच्छा करता है कि ऐसी घटनाएँ घटित हों जिनमें पाप सम्मिलित है। ‘‘यदि परमेश्वर की यही इच्छा हो, कि तुम भलाई करने के कारण दुःख उठाओ।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस इस सच्चाई का एक अतिरंजित सारांश बयान इफिसियों 1:11 में देता है, ‘‘उसी {मसीह} में जिस में हम भी उसी की मनसा से ''जो अपनी इच्छा के मत के अनुसार'' सब कुछ करता है, पहिले से ठहराए जाकर मीरास बने।’’ परमेश्वर की इच्छा, जो कुछ भी घटित होता है उसका, परमेश्वर का प्रभुसत्ताक अभिशासन, है। और बाइबिल में ऐसे अनेकों अन्य परिच्छेद हैं जो सिखाते हैं कि विश्व के ऊपर परमेश्वर का विधान, प्रकृति के सबसे छोटे विवरण तक और मानव निर्णयों तक विस्तारित होता है। हमारे पिता, जो स्वर्ग में है, के बिना एक गौरैया भूमि पर नहीं गिरती (मत्ती 10:29)। ‘‘चिट्ठी डाली जाती तो है, परन्तु उसका निकलना यहोवा ही की ओर से होता है’’ (नीतिवचन 16:33)। ‘‘मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुंह से कहना यहोवा की ओर से होता है’’ (नीतिवचन 16:1)। ‘‘राजा का मन नालियों के जल की नाईं यहोवा के हाथ में रहता है, जिधर वह चाहता उधर उसको फेर देता है’’ (नीतिवचन 21:1)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की इच्छा का यह पहिला अर्थ है: ये है सभी चीजों पर परमेश्वर का प्रभुसत्ताक नियंत्रण। हम इसे ‘उसकी’ ‘‘प्रभु -सत्ताक इच्छा’’ कहेंगे अथवा ‘उसकी’ ‘‘राजाज्ञा की इच्छा।’’ ये तोड़ी नहीं जा सकती। ये सदा घटित होती है। ‘‘वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहनेवालों के बीच ''अपनी ही इच्छा'' के अनुसार काम करता है; और कोई उसको रोककर उस से नहीं कह सकता है, ‘तू ने यह क्या किया है?’’’ (दान्यियेल 4:35)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. परमेश्वर की, आदेश की इच्छा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, बाइबिल में ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ के लिए अन्य अर्थ है, वो जिसे हम ‘उसकी’ ‘‘आदेश की इच्छा’’ कह सकते हैं। जो ‘वह’ हमें करने का आदेश देता है, ‘उसकी’ इच्छा है। ये परमेश्वर की वो इच्छा है जिसकी हम अवज्ञा कर सकते और असफल हो सकते हैं। राजाज्ञा-की-इच्छा, हम करते हैं चाहे हम इस में विश्वास करते हैं अथवा नहीं। आदेश-की-इच्छा पूरी करने में हम असफल हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘जो मुझ से, ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है’’ (मत्ती 7: 21)। सभी ‘उसके’ पिता की इच्छा के अनुसार नहीं करते। ‘वह’ ऐसा कहता है। ‘‘हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा।’’ क्यों? क्योंकि सभी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1 थिस्सलुनीकियों 4:3 में पौलुस कहता है, ‘‘परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो।’’ यहाँ हमारे पास, परमेश्वर जो हमें आदेश देता है उसका एक विशिष्ट उदाहरण है: पवित्रता, पवित्रीकरण, यौन-शुद्धता। ये ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा है। किन्तु, ओह, कितने लोग आज्ञा पालन नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिर 1 थिस्सलुनीकियों 5:18 में पौलुस कहता है, ‘‘हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।’’ वहाँ पुनः ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा का एक विशिष्ट पहलू है: सभी परिस्थितियों में धन्यवाद दो। किन्तु बहुतेरे परमेश्वर की इस इच्छा को नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण: ‘‘और संसार और उसकी अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा’’ (1 यूहन्ना 2:17)। सभी सर्वदा बने नहीं रहते। कुछ रहते हैं। कुछ नहीं रहते। अन्तर? कुछ परमेश्वर की इच्छा को करते हैं। कुछ नहीं करते। इस अर्थ में, परमेश्वर की इच्छा, सदैव घटित नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं इन से और बाइबिल के अन्य अनेकों परिच्छेदों से ये निष्कर्ष निकालता हूँ कि परमेश्वर की इच्छा के बारे में बात करने के दो तरीके हैं। दोनों सच हैं, और दोनों समझने के लिए और उसमें विश्वास करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक को हम परमेश्वर की ''राजाज्ञा की इच्छा'' (या ‘उसकी’ प्रभुसत्ताक इच्छा) कह सकते हैं और दूसरी को हम परमेश्वर की ''आदेश की इच्छा'' कह सकते हैं। ‘उसकी’ राजाज्ञा की इच्छा सदैव घटित होती है चाहे हम इसमें विश्वास करें या न करें। ‘उसकी’ आदेश की इच्छा तोड़ी जा सकती है, और हर दिन तोड़ी जा रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इन सच्चाईयों की बहुमूल्यता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके पूर्व कि मैं इसे रोमियों 12: 2 से सम्बद्ध करूँ, मुझे इस पर टिप्पणी करने दीजिये कि ये दो सच्चाईयाँ कितनी बहुमूल्य हैं। दोनों एक गहिरी आवश्यकता के अनुरूप होती हैं जो हम सभों को होती है, जब हम गहराई से चोट खाते अथवा बड़ी हानि का अनुभव करते हैं। एक ओर, हमें इस आश्वासन् की आवश्यकता होती है कि परमेश्वर नियंत्रण रखे है और इसलिए मेरे सारे कष्ट और हानि को मिलाकर मेरे लिए और उन सब के लिए जो ‘उससे’ प्रेम रखते हंै, भलाई उत्पन्न कर सकता है। दूसरी ओर, हमें जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर हमारे साथ सम-अनुभूति रखता है और पाप या कष्ट में या उनसे प्रसन्न नहीं होता। ये दो आवश्यकताएँ, परमेश्वर की राजाज्ञा-की-इच्छा और ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा के अनुरूप हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, यदि एक बच्चे के रूप में आपसे बुरी तरह दुव्र्यवहार किया था, और कोई आपसे पूछता है, ‘‘क्या आप सोचते हो कि वो परमेश्वर की इच्छा थी?’’ आपके पास अब इसमें से कुछ बाइबिल-शास्त्रीय भाव बनाने का तरीका है, और ऐसा उत्तर देने का, जो बाइबिल का खण्डन न करे। आप कह सकते हैं, ‘‘नहीं यह परमेश्वर की इच्छा नहीं थी; क्योंकि ‘वह’ आज्ञा देता है कि मनुष्यो, दुव्र्यवहार करनेवाले न बनो, वरन् एक-दूसरे से प्रेम रखो। अनुचित ने ‘उसकी’ आज्ञा तोड़ी और इसलिए ‘उसके’ हृदय को क्रोध और दुःख से भर दिया (मरकुस 3:5)। लेकिन, अन्य अर्थ में, हाँ, ये परमेश्वर की इच्छा थी (‘उसकी प्रभुसत्ताक इच्छा), क्योंकि सैकड़ों तरीके हैं जिनसे ‘वह’ इसे रोक सकता था। किन्तु कारणों से, जिन्हें मैं अब भी पूरी तरह नहीं समझता, ‘उसने’ नहीं रोका।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और इन दो इच्छाओं के अनुरूप दो चीजें हैं जिनकी आपको इस स्थिति में आवश्यकता है: एक है, ‘एक परमेश्वर’ जो पर्याप्त सामथ्र्यवान् और प्रभुसत्ता-सम्पन्न है कि इसे भलाई में बदल दे; और अन्य है ‘एक परमेश्वर’ जो आपके साथ सम- अनुभूति रखने के योग्य हो। एक ओर, मसीह एक प्रभुसत्ता-सम्पन्न सर्वोच्च राजा है, और कुछ भी ‘उसकी’ इच्छा से हटकर नहीं होता (मत्ती 28:18)। दूसरी ओर, मसीह एक दयामय महायाजक है और हमारी दुर्बलताओं और कष्ट में सहानुभूति रखता है (इब्रानियों 4:15)। जब ‘उसकी’ इच्छा है, ‘पवित्र आत्मा’ हम पर व हमारे पापों पर जय पाता है (यूहन्ना 1:13; रोमियों 9: 15-16), और स्वयँ को बुझाये जाना और शोकित किया जाना और क्रोधित किया जाना, देता है, जब ‘उसकी’ इच्छा हो (इफिसियों 4:30; 1 थिस्सलुनीकियों 5:19)। ‘उसकी’ प्रभुसत्ताक इच्छा अजेय है, और ‘उसकी’ आदेश की इच्छा को दुःखदपूर्ण रूप से तोड़ा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें इन दोनों सच्चाईयों की आवश्यकता है — परमेश्वर की इच्छा की इन दोनों समझ की — ने केवल बाइबिल में से अर्थपूर्ण निकालने के लिए, अपितु दुःख उठाते समय परमेश्वर को दृढ़ता से थामे रहने के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== रोमियों 12: 2 में किस इच्छा का उल्लेख है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, रोमियों 12: 2 में इन में से कौन व्यक्त की गई है, ‘‘इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम ''परमेश्वर'' की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।’’ उत्तर निश्चित रूप से ये है कि पौलुस परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का उल्लेख कर रहा है। मैं कम से कम दो कारणों से यह कहता हूँ। एक यह कि परमेश्वर का हमारे लिए ये ध्येय नहीं है कि समय से पूर्व ‘उसकी’ अधिकांश ‘प्रभुसत्ताक इच्छा’ को जानें। ‘‘गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रगट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के वश में रहेंगी’’ (व्यव.वि. 29:29)। यदि आप परमेश्वर की ‘राजाज्ञा की इच्छा’ के भविष्य के विवरण जानना चाहते हैं, तो आप एक नयी बुद्धि नहीं चाहते, आप एक ‘क्रिस्टल-बॉल’ (भविष्यकथन हेतु प्रयुक्त काँच या स्फटिक का गोला) चाहते हैं। इसे रूपान्तरण और आज्ञाकारिता नहीं कहा जाता; इसे शकुन-विद्या, ज्योतिष-करना कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य कारण कि मैं कहता हूँ कि रोमियों 12: 2 में परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ है और ‘उसकी’ ‘राजाज्ञा की इच्छा’ नहीं, ये है कि वाक्यांश ‘‘अनुभव से मालूम करते रहो,’’ का आशय ये है कि हमें परमेश्वर की इच्छा का समर्थन करना चाहिए और फिर आज्ञाकारितापूर्ण ढंग से इसे करना चाहिए। परन्तु वास्तव में हमें पाप का समर्थन या इसे करना नहीं चाहिए, भले ही यह परमेश्वर की ‘प्रभुसत्ताक इच्छा’ का हिस्सा क्यों न हो। रोमियों 12: 2 में पौलुस के अर्थ का, लगभग सटीक रूप से इब्रानियों 5: 14 में भावानुवाद किया गया है, जो कहता है, ‘‘अन्न सयानों के लिए है, जिन के ज्ञानेन्द्रिय अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्के हो गए हैं।’’ (एक अन्य भावानुवाद फिलिप्पियों 1: 9-11 में देखिये।) इस आयत का यही लक्ष्य है: परमेश्वर की ''गुप्त'' इच्छा का पता लगाना नहीं, जो करने की ''योजना'' ‘वह’ करता है, अपितु परमेश्वर की ''प्रगट'' की गई इच्छा को मालूम करना, जो हमें करना ''अवश्य'' है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की प्रगटित इच्छा को जानने और करने के तीन चरण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की प्रगटित इच्छा को जानने और करने के तीन चरण हैं, अर्थात्, ‘उसकी’ ‘आदेश की इच्छा’; और वे सभी, ‘पवित्र- आत्मा’ द्वारा दी गई समझ के साथ, बुद्धि के नये हो जाने की मांग करते हैं, जिसके बारे में हमने पिछली बार चर्चा की थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण एक''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ अन्तिम, निर्णायक अधिकार के साथ केवल बाइबिल में प्रगट की जाती है। और हमें नयी की गई बुद्धि की आवश्यकता है कि पवित्र-शास्त्र में परमेश्वर जो आज्ञा देता है उसे समझ सकें और गले लगा सकें। बिना नयी की गई बुद्धि के, हम पवित्र-शास्त्र को तोड़-मरोड़ करेंगे कि स्वयँ-का-इन्कार करने, और प्रेम और शुद्धता, और केवल मसीह में परम सन्तुष्टि की उनकी मूल-भूत आज्ञाओं को अनदेखा करें। परमेश्वर की अधिकारपूर्ण ‘आदेश की इच्छा’ केवल बाइबिल में पायी जाती है। पौलुस कहता है कि पवित्रशास्त्र प्रेरणा से लिखे गए और मसीहियों को ‘‘सिद्ध, हर एक भले कामों के लिए तत्पर’’ (2 तीमुथियुस 3: 16) बनाते हैं। मात्र कुछ भले काम नहीं। ‘‘हर एक भले काम।’’ ओह, मसीहियों को परमेश्वर के लिखित ‘वचन’ पर मनन करते हुए कितनी ऊर्जा और समय और उपासना खर्च करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण दो''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का दूसरा चरण है, उन नयी परिस्थितियों में बाइबिलशास्त्रीय सच्चाईयों का हमारा अनुप्रयोग, जो बाइबिल में स्पष्टतः सम्बोधित की गई हों या नहीं। बाइबिल आपको नहीं बतलाती कि किस व्यक्ति से विवाह करें, या कौन सी कार चलावें, या एक घर खरीदें या नहीं, आप अपनी छुट्टियाँ कहाँ बितायें, सैल-फोन का कौन सा प्लान खरीदें, या कौन से मार्का वाले संतरे का रस पियें। अथवा वे अन्य हजार चुनाव जो आपको करने होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो आवश्यक है वो ये कि हमारे पास नवीनीकृत बुद्धि हो, जो बाइबिल में परमेश्वर की प्रगट की गई इच्छा के द्वारा इस प्रकार से आकार पायी हुई और इस तरह परिचालित हो, कि हम मसीह के मन के द्वारा सभी संगत कारकों को देखें और मूल्यांकन करें, और ये मालूम करें कि परमेश्वर हमें क्या करने के लिए बुला रहा है। निरन्तर परमेश्वर की ये कहती हुई आवाज़ को सुनने का प्रयास करना कि ये करो व वो करो, से यह सर्वथा भिन्न है। लोग, जो आवाजें सुनने के द्वारा अपनी जिन्दगियों को जीने का प्रयास करते हैं, रोमियों 12:2 के साथ समन्वय में नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक नवीनीकृत बुद्धि के लिए, जो ये समझे कि परमेश्वर के ‘वचन’ को कैसे लागू करना है, प्रार्थना करना और मेहनत करना, एक ओर, और परमेश्वर से पूछने की आदत कि क्या करें इसके लिए परमेश्वर आपको नया प्रकाशन दे, दूसरी ओर; इन दोनों के बीच एक पूरी दुनिया का अन्तर है। शकुन-विद्या के लिए रूपान्तरण की आवश्यकता नहीं होती। परमेश्वर का लक्ष्य है एक नया मन, सोचने और आंकने का एक नया तरीका, मात्र नयी सूचना नहीं। ‘उसका’ लक्ष्य है कि हम बदल जायें, पवित्र किये जायें, उसके प्रकाशित ‘वचन’ के द्वारा स्वतंत्र किये जायें (यूहन्ना 8: 32; 17:17)। अतः परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का दूसरा चरण है, एक नवीनीकृत मन के द्वारा जीवन की नयी परिस्थितियों में पवित्रशास्त्र के अनुप्रयोग की समझ रखना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण तीन''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का तीसरा चरण, जीने का बहुत बड़ा हिस्सा है, जहाँ, इससे पूर्व कि हम कार्य करें, सचेतन रूप से कुछ पूर्व-विचारित नहीं होता। मैं ये कहने का जोखि़म उठाता हूँ, कि आपके व्यवहार का अच्छा-भला 90 प्रतिशत, आप पहले से विचार नहीं करते। अर्थात्, आपके अधिकांश विचार, भाव, और कियाएँ स्व-इच्छित होते हैं। वे, उस से, जो भीतर है, मात्र बाहर छलकते हैं। यीशु ने कहा, ‘‘जो मन में भरा है, वही मुंह पर आता है। भला मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है; और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है। और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे’’ (मत्ती 12: 34-36)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं इस भाग को क्यों परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ कहता हूँ? एक कारण से। क्योंकि परमेश्वर इस तरह की चीजों की आज्ञा देता है: क्रोध मत करो। घमण्डी न बनो। लालच मत करो। चिन्ता मत करो। ईष्र्या मत करो। डाह न करो। और इनमें से कोई भी क्रिया पूर्व विचारित नहीं हैं। क्रोध, घमण्ड, लोभ, चिन्ता, ईष्र्या, डाह — ये सब हृदय से बिना सचेतन विचार के या ध्येय के निकल आते हैं। और हम उनके कारण दोषी हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए क्या यह स्पष्ट नहीं है कि मसीही जीवन का एक बड़ा कार्य है: तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम बदलते जाओ। हमें नये हृदयों और नये मनों की आवश्यकता है। पेड़ को अच्छा बनाइये और फल अच्छा होगा (मत्ती 12:33)। ये बड़ी चुनौती है। वो ही है जिसके लिए परमेश्वर आपको बुलाता है। आप इसे अपने बल पर नहीं कर सकते। आपको मसीह की आवश्यकता है जो आपके पापों के लिए मर गया। और आपको ‘पवित्र आत्मा’ की आवश्यकता है कि मसीह को ऊँचा- करनेवाले-सत्य में आपकी अगुवाई करे और आप में सत्य-आलिंगन करनेवाली नम्रता उत्पन्न करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने आप को इसे सौंप दीजिये। स्वयँ को परमेश्वर के लिखे हुए ‘वचन’ में डुबो दीजिये; अपने मन को इस से संतृप्त कर लीजिये। और प्रार्थना कीजिये कि ‘मसीह का आत्मा’ आपको ऐसा नया बना दे कि जो बाहर छलके वो भला, भावता और सिद्ध होवे — परमेश्वर की इच्छा होवे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर की इच्छा क्या है और हम इसे कैसे जानें ?</title>
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				<updated>2017-07-20T20:14:20Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|What Is the Will of God and How Do We Know It?}}   &amp;amp;gt; इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दय...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Is the Will of God and How Do We Know It?}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; इसलिये हे भाइयो, मैं तुम से परमेश्वर की दया स्मरण दिला कर बिनती करता हूं, कि अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है। 2 और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 12: 1-2 का लक्ष्य है कि सम्पूर्ण जीवन ‘‘आत्मिक आराधना’’ बन जावे। पद 1: ‘‘अपने शरीरों को जीवित, और पवित्र, और परमेश्वर को भावता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ: यही तुम्हारी आत्मिक सेवा (सही अनुवाद- आराधना) है। परमेश्वर की दृष्टि में सभी मानव जिन्दगियों का लक्ष्य ये है कि मसीह को उतना ही मूल्यवान् दिखाया जावे जितना कि ‘वह’ है। आराधना का अर्थ है, हमारे मन और हृदयों और शरीरों को, परमेश्वर के मूल्य को, और जो कुछ ‘वह’ यीशु में हमारे लिए है, अभिव्यक्त करने के लिए उपयोग करना। जीने का एक तरीका है — प्रेम करने का एक तरीका — जो यह करता है। आपकी नौकरी/धंधे को करने का एक तरीका है जो परमेश्वर के सच्चे मूल्य को अभिव्यक्त करता है। यदि आप इसे ढूंढ नहीं सकते, तो इसका अर्थ हो सकता है कि आपको नौकरी या पेशा बदलना चाहिए। अथवा इसका अर्थ हो सकता है कि पद 2 उस अंश तक घटित नहीं हो रहा है, जितना इसे होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 2, पौलुस का उत्तर है कि कैसे हम सम्पूर्ण जीवन को आराधना में बदल दें। हमें रूपान्तरित होना चाहिए। हमें रूपान्तरित होना चाहिए। मात्र हमारा बाहरी व्यवहार नहीं, अपितु हम जिस तरह से अनुभूति करते और सोचते हैं—हमारे मन। पद 2: ‘‘''तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से'' तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आप क्या हैं, बन जाइये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे जो मसीह यीशु में विश्वास करते हैं, मसीह में लोहू-से-खरीदे-गए नये जीव बन चुके हैं। ‘‘यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है’’ (2 कुरिन्थियों 5:17)। किन्तु अब हमें वो ''बन जाना चाहिए जो हम हैं।'' ‘‘पुराना खमीर निकाल कर, अपने आप को शुद्ध करो: कि नया गूंधा हुआ आटा बन जाओ; ताकि तुम अखमीरी हो’’ (1 कुरिन्थियों 5: 7)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘तुम ने … नए मनुष्यत्व को पहिन लिया है जो अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार ज्ञान प्राप्त करने के लिये ''नया बनता जाता है''’’ (कुलुस्सियों 3:10)। तुम्हें मसीह में नया ''बना दिया गया है''; और अब तुम दिन-प्रतिदिन ''नया बनते जाते हो।'' यही है जिस पर हमने विगत सप्ताह ध्यान केन्द्रित किया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हम पद 2 के अन्तिम भाग पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, यथा, नयी हो गई बुद्धि का लक्ष्य: ‘‘इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, {अब यहाँ लक्ष्य आता है} ''जिस से तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।''’’ अतः आज का हमारा केन्द्र है, शब्द ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ का अर्थ, और हम इसे कैसे जानें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की दो मनसाएं/इच्छाएं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल में ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ शब्द के लिए दो स्पष्ट और बहुत भिन्न अर्थ हैं। हमें उन्हें जानना और ये निर्णय लेना कि यहाँ रोमियों 12:2 में कौन सा उपयोग किया जा रहा है, आवश्यक है। वास्तव में, ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ के इन दो अर्थों के बीच अन्तर को जानना, सम्पूर्ण बाइबिल में सबसे बड़ी और सर्वाधिक व्याकुल करनेवाली चीजों में से एक, की समझ के लिए महत्वपूर्ण है, यथा, यह कि परमेश्वर सभी चीजों के ऊपर प्रभुसत्ता-सम्पन्न है और फिर भी कई चीजों को नापसन्द करता (या निर-अनुमोदन करता) है। जिसका अर्थ है कि परमेश्वर कुछ को नापसन्द करता है जिसे ‘वह’ घटित होने के लिए निर्धारित करता है। अर्थात्, ‘वह’ कुछ चीजों का निषेध करता है, जिन्हें ‘वह’ होने देता है। और ‘वह’ कुछ चीजों की आज्ञा देता है, जिन्हें ‘वह’ बाधित करता है। अथवा, इसे सर्वाधिक विरोधाभासी रूप में रखने के लिए: परमेश्वर कुछ घटनाओं की एक भाव में इच्छा करता है जिनकी ‘वह’ दूसरे अर्थ में इच्छा नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. परमेश्वर की राजाज्ञा-की-इच्छा, अथवा प्रभुसत्ताक-इच्छा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम धर्मशास्त्र के परिच्छेदों को देखें जो हमें इस तरह सोचने को बाध्य करते हैं। पहिले उन परिच्छेदों पर विचार करें जो ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ को, सब कुछ जो घटित होता है उस पर प्रभुसत्ताक नियंत्रण के रूप में, वर्णन करते हैं। एक सर्वथा स्पष्टतम् है, जिस तरह यीशु ने गतसमनी में परमेश्वर की इच्छा के बारे में कहा, जब ‘वह’ प्रार्थना कर रहा था। मत्ती 26:39 में ‘उसने’ कहा, ‘‘हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु ''जैसा तू चाहता है'' वैसा ही हो।’’ इस आयत में परमेश्वर की इच्छा क्या संकेत करती है? यह परमेश्वर की प्रभुसत्ताक योजना की ओर संकेत करती है जो आने वाले घण्टों में घटित होवेगी। आप याद कीजिये कि प्रेरित 4: 27-28 इसे कैसे कहता है: ‘‘क्योंकि सचमुच तेरे पवित्र सेवक यीशु के विरोध में, जिसे तू ने अभिषेक किया, हेरोदेस और पुन्तियुस पीलातुस भी अन्य जातियों और इस्राएलियों के साथ इस नगर में इकट्ठे हुए कि जो कुछ पहिले से तेरी सामर्थ (तेरे हाथ) और मति से ठहरा था वहीं करें।’’ अतः ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ यह थी कि यीशु मरे। ये ‘उसकी’ योजना थी, ‘उसकी’ राजाज्ञा। इसे बदला नहीं जाना था और यीशु ने सिर झुकाया और कहा, ‘‘ये है मेरा निवेदन, परन्तु करने के लिए जो सर्वोत्तम है, तू कर।’’ वो है परमेश्वर की प्रभुसत्ताक इच्छा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यहाँ बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु मत छोड़ दीजिये कि यह मनुष्य के पापों को सम्मिलित करता है। हेरोदेस, पीलातुस, सैनिक, यहूदी अगुवे — उन सभों ने, परमेश्वर की इच्छा को परिपूर्ण करने में कि ‘उसका’ पुत्र क्रूसित किया जावे, पाप किया (यशायाह 53:10)। अतः इस बारे में स्पष्ट हो जाइये: परमेश्वर कुछ ऐसा घटित होने की इच्छा करता है, जिससे ‘वह’ घृणा करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहिला पतरस से यहाँ एक उदाहरण है। 1 पतरस 3:17 में पतरस लिखता है, ‘‘यदि परमेश्वर की यही इच्छा हो, कि तुम भलाई करने के कारण दुःख उठाओ, तो यह बुराई करने के कारण दुःख उठाने से उत्तम है।’’ दूसरे शब्दों में, ये परमेश्वर की इच्छा हो सकती है कि मसीहीगण भलाई करने के कारण दुःख उठायें। ‘उसके’ मन में सताव है। लेकिन उन मसीहियों का सताव जो इसकी पात्रता नहीं रखते, पाप है। अतः पुनः, कभी-कभी परमेश्वर इच्छा करता है कि ऐसी घटनाएँ घटित हों जिनमें पाप सम्मिलित है। ‘‘यदि परमेश्वर की यही इच्छा हो, कि तुम भलाई करने के कारण दुःख उठाओ।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस इस सच्चाई का एक अतिरंजित सारांश बयान इफिसियों 1:11 में देता है, ‘‘उसी {मसीह} में जिस में हम भी उसी की मनसा से ''जो अपनी इच्छा के मत के अनुसार'' सब कुछ करता है, पहिले से ठहराए जाकर मीरास बने।’’ परमेश्वर की इच्छा, जो कुछ भी घटित होता है उसका, परमेश्वर का प्रभुसत्ताक अभिशासन, है। और बाइबिल में ऐसे अनेकों अन्य परिच्छेद हैं जो सिखाते हैं कि विश्व के ऊपर परमेश्वर का विधान, प्रकृति के सबसे छोटे विवरण तक और मानव निर्णयों तक विस्तारित होता है। हमारे पिता, जो स्वर्ग में है, के बिना एक गौरैया भूमि पर नहीं गिरती (मत्ती 10:29)। ‘‘चिट्ठी डाली जाती तो है, परन्तु उसका निकलना यहोवा ही की ओर से होता है’’ (नीतिवचन 16:33)। ‘‘मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुंह से कहना यहोवा की ओर से होता है’’ (नीतिवचन 16:1)। ‘‘राजा का मन नालियों के जल की नाईं यहोवा के हाथ में रहता है, जिधर वह चाहता उधर उसको फेर देता है’’ (नीतिवचन 21:1)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की इच्छा का यह पहिला अर्थ है: ये है सभी चीजों पर परमेश्वर का प्रभुसत्ताक नियंत्रण। हम इसे ‘उसकी’ ‘‘प्रभु -सत्ताक इच्छा’’ कहेंगे अथवा ‘उसकी’ ‘‘राजाज्ञा की इच्छा।’’ ये तोड़ी नहीं जा सकती। ये सदा घटित होती है। ‘‘वह स्वर्ग की सेना और पृथ्वी के रहनेवालों के बीच ''अपनी ही इच्छा'' के अनुसार काम करता है; और कोई उसको रोककर उस से नहीं कह सकता है, ‘तू ने यह क्या किया है?’’’ (दान्यियेल 4:35)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. परमेश्वर की, आदेश की इच्छा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, बाइबिल में ‘‘परमेश्वर की इच्छा’’ के लिए अन्य अर्थ है, वो जिसे हम ‘उसकी’ ‘‘आदेश की इच्छा’’ कह सकते हैं। जो ‘वह’ हमें करने का आदेश देता है, ‘उसकी’ इच्छा है। ये परमेश्वर की वो इच्छा है जिसकी हम अवज्ञा कर सकते और असफल हो सकते हैं। राजाज्ञा-की-इच्छा, हम करते हैं चाहे हम इस में विश्वास करते हैं अथवा नहीं। आदेश-की-इच्छा पूरी करने में हम असफल हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘जो मुझ से, ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहता है, उन में से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है’’ (मत्ती 7: 21)। सभी ‘उसके’ पिता की इच्छा के अनुसार नहीं करते। ‘वह’ ऐसा कहता है। ‘‘हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा।’’ क्यों? क्योंकि सभी परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1 थिस्सलुनीकियों 4:3 में पौलुस कहता है, ‘‘परमेश्वर की इच्छा यह है, कि तुम पवित्र बनो: अर्थात् व्यभिचार से बचे रहो।’’ यहाँ हमारे पास, परमेश्वर जो हमें आदेश देता है उसका एक विशिष्ट उदाहरण है: पवित्रता, पवित्रीकरण, यौन-शुद्धता। ये ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा है। किन्तु, ओह, कितने लोग आज्ञा पालन नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिर 1 थिस्सलुनीकियों 5:18 में पौलुस कहता है, ‘‘हर बात में धन्यवाद करो: क्योंकि तुम्हारे लिये मसीह यीशु में परमेश्वर की यही इच्छा है।’’ वहाँ पुनः ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा का एक विशिष्ट पहलू है: सभी परिस्थितियों में धन्यवाद दो। किन्तु बहुतेरे परमेश्वर की इस इच्छा को नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक और उदाहरण: ‘‘और संसार और उसकी अभिलाषाएं दोनों मिटते जाते हैं, पर जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है, वह सर्वदा बना रहेगा’’ (1 यूहन्ना 2:17)। सभी सर्वदा बने नहीं रहते। कुछ रहते हैं। कुछ नहीं रहते। अन्तर? कुछ परमेश्वर की इच्छा को करते हैं। कुछ नहीं करते। इस अर्थ में, परमेश्वर की इच्छा, सदैव घटित नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं इन से और बाइबिल के अन्य अनेकों परिच्छेदों से ये निष्कर्ष निकालता हूँ कि परमेश्वर की इच्छा के बारे में बात करने के दो तरीके हैं। दोनों सच हैं, और दोनों समझने के लिए और उसमें विश्वास करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। एक को हम परमेश्वर की ''राजाज्ञा की इच्छा'' (या ‘उसकी’ प्रभुसत्ताक इच्छा) कह सकते हैं और दूसरी को हम परमेश्वर की ''आदेश की इच्छा'' कह सकते हैं। ‘उसकी’ राजाज्ञा की इच्छा सदैव घटित होती है चाहे हम इसमें विश्वास करें या न करें। ‘उसकी’ आदेश की इच्छा तोड़ी जा सकती है, और हर दिन तोड़ी जा रही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इन सच्चाईयों की बहुमूल्यता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके पूर्व कि मैं इसे रोमियों 12: 2 से सम्बद्ध करूँ, मुझे इस पर टिप्पणी करने दीजिये कि ये दो सच्चाईयाँ कितनी बहुमूल्य हैं। दोनों एक गहिरी आवश्यकता के अनुरूप होती हैं जो हम सभों को होती है, जब हम गहराई से चोट खाते अथवा बड़ी हानि का अनुभव करते हैं। एक ओर, हमें इस आश्वासन् की आवश्यकता होती है कि परमेश्वर नियंत्रण रखे है और इसलिए मेरे सारे कष्ट और हानि को मिलाकर मेरे लिए और उन सब के लिए जो ‘उससे’ प्रेम रखते हंै, भलाई उत्पन्न कर सकता है। दूसरी ओर, हमें जानने की आवश्यकता है कि परमेश्वर हमारे साथ सम-अनुभूति रखता है और पाप या कष्ट में या उनसे प्रसन्न नहीं होता। ये दो आवश्यकताएँ, परमेश्वर की राजाज्ञा-की-इच्छा और ‘उसकी’ आदेश-की-इच्छा के अनुरूप हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, यदि एक बच्चे के रूप में आपसे बुरी तरह दुव्र्यवहार किया था, और कोई आपसे पूछता है, ‘‘क्या आप सोचते हो कि वो परमेश्वर की इच्छा थी?’’ आपके पास अब इसमें से कुछ बाइबिल-शास्त्रीय भाव बनाने का तरीका है, और ऐसा उत्तर देने का, जो बाइबिल का खण्डन न करे। आप कह सकते हैं, ‘‘नहीं यह परमेश्वर की इच्छा नहीं थी; क्योंकि ‘वह’ आज्ञा देता है कि मनुष्यो, दुव्र्यवहार करनेवाले न बनो, वरन् एक-दूसरे से प्रेम रखो। अनुचित ने ‘उसकी’ आज्ञा तोड़ी और इसलिए ‘उसके’ हृदय को क्रोध और दुःख से भर दिया (मरकुस 3:5)। लेकिन, अन्य अर्थ में, हाँ, ये परमेश्वर की इच्छा थी (‘उसकी प्रभुसत्ताक इच्छा), क्योंकि सैकड़ों तरीके हैं जिनसे ‘वह’ इसे रोक सकता था। किन्तु कारणों से, जिन्हें मैं अब भी पूरी तरह नहीं समझता, ‘उसने’ नहीं रोका।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और इन दो इच्छाओं के अनुरूप दो चीजें हैं जिनकी आपको इस स्थिति में आवश्यकता है: एक है, ‘एक परमेश्वर’ जो पर्याप्त सामथ्र्यवान् और प्रभुसत्ता-सम्पन्न है कि इसे भलाई में बदल दे; और अन्य है ‘एक परमेश्वर’ जो आपके साथ सम- अनुभूति रखने के योग्य हो। एक ओर, मसीह एक प्रभुसत्ता-सम्पन्न सर्वोच्च राजा है, और कुछ भी ‘उसकी’ इच्छा से हटकर नहीं होता (मत्ती 28:18)। दूसरी ओर, मसीह एक दयामय महायाजक है और हमारी दुर्बलताओं और कष्ट में सहानुभूति रखता है (इब्रानियों 4:15)। जब ‘उसकी’ इच्छा है, ‘पवित्र आत्मा’ हम पर व हमारे पापों पर जय पाता है (यूहन्ना 1:13; रोमियों 9: 15-16), और स्वयँ को बुझाये जाना और शोकित किया जाना और क्रोधित किया जाना, देता है, जब ‘उसकी’ इच्छा हो (इफिसियों 4:30; 1 थिस्सलुनीकियों 5:19)। ‘उसकी’ प्रभुसत्ताक इच्छा अजेय है, और ‘उसकी’ आदेश की इच्छा को दुःखदपूर्ण रूप से तोड़ा जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें इन दोनों सच्चाईयों की आवश्यकता है — परमेश्वर की इच्छा की इन दोनों समझ की — ने केवल बाइबिल में से अर्थपूर्ण निकालने के लिए, अपितु दुःख उठाते समय परमेश्वर को दृढ़ता से थामे रहने के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== रोमियों 12: 2 में किस इच्छा का उल्लेख है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, रोमियों 12: 2 में इन में से कौन व्यक्त की गई है, ‘‘इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नए हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिस से तुम ''परमेश्वर'' की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।’’ उत्तर निश्चित रूप से ये है कि पौलुस परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का उल्लेख कर रहा है। मैं कम से कम दो कारणों से यह कहता हूँ। एक यह कि परमेश्वर का हमारे लिए ये ध्येय नहीं है कि समय से पूर्व ‘उसकी’ अधिकांश ‘प्रभुसत्ताक इच्छा’ को जानें। ‘‘गुप्त बातें हमारे परमेश्वर यहोवा के वश में हैं; परन्तु जो प्रगट की गई हैं वे सदा के लिए हमारे और हमारे वंश के वश में रहेंगी’’ (व्यव.वि. 29:29)। यदि आप परमेश्वर की ‘राजाज्ञा की इच्छा’ के भविष्य के विवरण जानना चाहते हैं, तो आप एक नयी बुद्धि नहीं चाहते, आप एक ‘क्रिस्टल-बॉल’ (भविष्यकथन हेतु प्रयुक्त काँच या स्फटिक का गोला) चाहते हैं। इसे रूपान्तरण और आज्ञाकारिता नहीं कहा जाता; इसे शकुन-विद्या, ज्योतिष-करना कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्य कारण कि मैं कहता हूँ कि रोमियों 12: 2 में परमेश्वर की इच्छा, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ है और ‘उसकी’ ‘राजाज्ञा की इच्छा’ नहीं, ये है कि वाक्यांश ‘‘अनुभव से मालूम करते रहो,’’ का आशय ये है कि हमें परमेश्वर की इच्छा का समर्थन करना चाहिए और फिर आज्ञाकारितापूर्ण ढंग से इसे करना चाहिए। परन्तु वास्तव में हमें पाप का समर्थन या इसे करना नहीं चाहिए, भले ही यह परमेश्वर की ‘प्रभुसत्ताक इच्छा’ का हिस्सा क्यों न हो। रोमियों 12: 2 में पौलुस के अर्थ का, लगभग सटीक रूप से इब्रानियों 5: 14 में भावानुवाद किया गया है, जो कहता है, ‘‘अन्न सयानों के लिए है, जिन के ज्ञानेन्द्रिय अभ्यास करते करते, भले बुरे में भेद करने के लिये पक्के हो गए हैं।’’ (एक अन्य भावानुवाद फिलिप्पियों 1: 9-11 में देखिये।) इस आयत का यही लक्ष्य है: परमेश्वर की ''गुप्त'' इच्छा का पता लगाना नहीं, जो करने की ''योजना'' ‘वह’ करता है, अपितु परमेश्वर की ''प्रगट'' की गई इच्छा को मालूम करना, जो हमें करना ''अवश्य'' है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की प्रगटित इच्छा को जानने और करने के तीन चरण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की प्रगटित इच्छा को जानने और करने के तीन चरण हैं, अर्थात्, ‘उसकी’ ‘आदेश की इच्छा’; और वे सभी, ‘पवित्र- आत्मा’ द्वारा दी गई समझ के साथ, बुद्धि के नये हो जाने की मांग करते हैं, जिसके बारे में हमने पिछली बार चर्चा की थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण एक''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ अन्तिम, निर्णायक अधिकार के साथ केवल बाइबिल में प्रगट की जाती है। और हमें नयी की गई बुद्धि की आवश्यकता है कि पवित्र-शास्त्र में परमेश्वर जो आज्ञा देता है उसे समझ सकें और गले लगा सकें। बिना नयी की गई बुद्धि के, हम पवित्र-शास्त्र को तोड़-मरोड़ करेंगे कि स्वयँ-का-इन्कार करने, और प्रेम और शुद्धता, और केवल मसीह में परम सन्तुष्टि की उनकी मूल-भूत आज्ञाओं को अनदेखा करें। परमेश्वर की अधिकारपूर्ण ‘आदेश की इच्छा’ केवल बाइबिल में पायी जाती है। पौलुस कहता है कि पवित्रशास्त्र प्रेरणा से लिखे गए और मसीहियों को ‘‘सिद्ध, हर एक भले कामों के लिए तत्पर’’ (2 तीमुथियुस 3: 16) बनाते हैं। मात्र कुछ भले काम नहीं। ‘‘हर एक भले काम।’’ ओह, मसीहियों को परमेश्वर के लिखित ‘वचन’ पर मनन करते हुए कितनी ऊर्जा और समय और उपासना खर्च करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण दो''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का दूसरा चरण है, उन नयी परिस्थितियों में बाइबिलशास्त्रीय सच्चाईयों का हमारा अनुप्रयोग, जो बाइबिल में स्पष्टतः सम्बोधित की गई हों या नहीं। बाइबिल आपको नहीं बतलाती कि किस व्यक्ति से विवाह करें, या कौन सी कार चलावें, या एक घर खरीदें या नहीं, आप अपनी छुट्टियाँ कहाँ बितायें, सैल-फोन का कौन सा प्लान खरीदें, या कौन से मार्का वाले संतरे का रस पियें। अथवा वे अन्य हजार चुनाव जो आपको करने होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो आवश्यक है वो ये कि हमारे पास नवीनीकृत बुद्धि हो, जो बाइबिल में परमेश्वर की प्रगट की गई इच्छा के द्वारा इस प्रकार से आकार पायी हुई और इस तरह परिचालित हो, कि हम मसीह के मन के द्वारा सभी संगत कारकों को देखें और मूल्यांकन करें, और ये मालूम करें कि परमेश्वर हमें क्या करने के लिए बुला रहा है। निरन्तर परमेश्वर की ये कहती हुई आवाज़ को सुनने का प्रयास करना कि ये करो व वो करो, से यह सर्वथा भिन्न है। लोग, जो आवाजें सुनने के द्वारा अपनी जिन्दगियों को जीने का प्रयास करते हैं, रोमियों 12:2 के साथ समन्वय में नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक नवीनीकृत बुद्धि के लिए, जो ये समझे कि परमेश्वर के ‘वचन’ को कैसे लागू करना है, प्रार्थना करना और मेहनत करना, एक ओर, और परमेश्वर से पूछने की आदत कि क्या करें इसके लिए परमेश्वर आपको नया प्रकाशन दे, दूसरी ओर; इन दोनों के बीच एक पूरी दुनिया का अन्तर है। शकुन-विद्या के लिए रूपान्तरण की आवश्यकता नहीं होती। परमेश्वर का लक्ष्य है एक नया मन, सोचने और आंकने का एक नया तरीका, मात्र नयी सूचना नहीं। ‘उसका’ लक्ष्य है कि हम बदल जायें, पवित्र किये जायें, उसके प्रकाशित ‘वचन’ के द्वारा स्वतंत्र किये जायें (यूहन्ना 8: 32; 17:17)। अतः परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का दूसरा चरण है, एक नवीनीकृत मन के द्वारा जीवन की नयी परिस्थितियों में पवित्रशास्त्र के अनुप्रयोग की समझ रखना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''चरण तीन''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ का तीसरा चरण, जीने का बहुत बड़ा हिस्सा है, जहाँ, इससे पूर्व कि हम कार्य करें, सचेतन रूप से कुछ पूर्व-विचारित नहीं होता। मैं ये कहने का जोखि़म उठाता हूँ, कि आपके व्यवहार का अच्छा-भला 90 प्रतिशत, आप पहले से विचार नहीं करते। अर्थात्, आपके अधिकांश विचार, भाव, और कियाएँ स्व-इच्छित होते हैं। वे, उस से, जो भीतर है, मात्र बाहर छलकते हैं। यीशु ने कहा, ‘‘जो मन में भरा है, वही मुंह पर आता है। भला मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है; और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है। और मैं तुम से कहता हूं, कि जो जो निकम्मी बातें मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन हर एक बात का लेखा देंगे’’ (मत्ती 12: 34-36)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं इस भाग को क्यों परमेश्वर की ‘आदेश की इच्छा’ कहता हूँ? एक कारण से। क्योंकि परमेश्वर इस तरह की चीजों की आज्ञा देता है: क्रोध मत करो। घमण्डी न बनो। लालच मत करो। चिन्ता मत करो। ईष्र्या मत करो। डाह न करो। और इनमें से कोई भी क्रिया पूर्व विचारित नहीं हैं। क्रोध, घमण्ड, लोभ, चिन्ता, ईष्र्या, डाह — ये सब हृदय से बिना सचेतन विचार के या ध्येय के निकल आते हैं। और हम उनके कारण दोषी हैं। वे परमेश्वर की आज्ञा को तोड़ते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए क्या यह स्पष्ट नहीं है कि मसीही जीवन का एक बड़ा कार्य है: तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम बदलते जाओ। हमें नये हृदयों और नये मनों की आवश्यकता है। पेड़ को अच्छा बनाइये और फल अच्छा होगा (मत्ती 12:33)। ये बड़ी चुनौती है। वो ही है जिसके लिए परमेश्वर आपको बुलाता है। आप इसे अपने बल पर नहीं कर सकते। आपको मसीह की आवश्यकता है जो आपके पापों के लिए मर गया। और आपको ‘पवित्र आत्मा’ की आवश्यकता है कि मसीह को ऊँचा- करनेवाले-सत्य में आपकी अगुवाई करे और आप में सत्य-आलिंगन करनेवाली नम्रता उत्पन्न करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने आप को इसे सौंप दीजिये। स्वयँ को परमेश्वर के लिखे हुए ‘वचन’ में डुबो दीजिये; अपने मन को इस से संतृप्त कर लीजिये। और प्रार्थना कीजिये कि ‘मसीह का आत्मा’ आपको ऐसा नया बना दे कि जो बाहर छलके वो भला, भावता और सिद्ध होवे — परमेश्वर की इच्छा होवे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>खोज:आनन्द! पाया:मसीह!</title>
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				<updated>2017-06-27T20:14:54Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;खोज:आनन्द! पाया:मसीह!&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Quest: Joy! Found: Christ!}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्लेस पास्कल एक फ्रांसिसी गणितशास्त्रीय विद्धान था जो 1662 में मर गया। जब तक कि वह 31 वर्ष का न हुआ, परमेश्वर से भागते रहने के बाद, नवम्बर 23, 1654 को, रात्रि 10:30 बजे, पास्कल परमेश्वर से मिला और गहराई से और अविचलित रूप से उसका मन यीशु मसीह की ओर बदल गया। उसने इसे एक चर्मपत्र के टुकड़े पर लिखा और अपने कोट के अन्दर सिल लिया, जो आठ साल बाद उसकी मृत्यु के उपरान्त पाया गया। इसमें लिखा था, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अनुग्रह का वर्ष 1654, सोमवार 23 नवम्बर, संत क्लेमैंट का पर्व … रात्रि में लगभग साढ़े दस बजे से मध्य रात्रि के लगभग आधा घण्टा बाद तक, आग। इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, दार्शनिकों व विद्धानों का नहीं। निश्चित, हृदयस्पर्शी आनन्द, शान्ति। यीशु मसीह का परमेश्वर। यीशु मसीह का परमेश्वर। ‘‘मेरा परमेश्वर और तुम्हारा परमेश्वर।’’ … आनन्द, आनन्द, आनन्द, खुशी के आँसू … यीशु मसीह। यीशु मसीह। काश मैं ‘उससे’ कभी भी अलग न किया जाऊँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1968 में पास्कल और सी. एस. लेविस और जोनाथन एडवर्डस् और डान फुलर और बाइबिल ने, इन शब्दों के साथ मेरे जीवन को सदा के लिए बदल देने के लिए टीम बनाया, ‘‘आनन्द, आनन्द, आनन्द, खुशी के आँसू।’’ ये छोटी पुस्तिका, क्वेस्ट फॉर जॉय (आनन्द की खोज), जो आपके पास आराधना-पुस्तिका में है, उन दिनों में पैदा हुई। ये लगभग 15 वर्षों तक नहीं लिखी गई थी। लेकिन ये उस समय उत्पन्न हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख-आवरण के अन्दर देखिये। यहाँ है, खुशी के लिए मेरे भय के विरोध में पास्कल का विस्फोट। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; सभी मनुष्य खुशी या सुख की खोज करते हैं। ये बिना अपवाद के है। जो भी तरीके वे अपनाते हैं, वे सभी इस अन्त की ओर उन्मुख रहते हैं। कुछ लोगों के युद्ध में जाने का कारण, और अन्य लोगों का कि इससे बचकर रहें, भिन्न दृष्टिकोणों के साथ की गई, दोनों में वही इच्छा है। प्रत्येक मनुष्य की प्रत्येक क्रिया का यही अभिप्राय है, उनका भी जो स्वयँ को फांसी लगा लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने संदेह किया कि ये सच है। लेकिन मैंने सदा भय खाया कि ये पाप था। यह कि सुखी रहने की चाह रखना एक नैतिक त्रुटि थी। ये कि अपने-आप का इन्कार करने का अर्थ था आनन्द का त्याग, अधिक बड़े आनन्दों के लिए छोटे आनन्दों का परित्याग करना नहीं। लेकिन तब परमेश्वर ने इन लेखकों के द्वारा सम्मिलित होकर काम किया कि मुझे बाइबिल पुनः पढ़ने के लिए उकसाये। कि इसे एक मौका दूँ कि इसका सच्चा अर्थ पा सकूँ। और वहाँ जो मैंने आनन्द के सम्बन्ध में पाया, उसने मुझे सदा के लिए बदल दिया। मैं तब से इसे समझने, इसे जीने और इसे सिखाने का प्रयास कर रहा हूँ। ये नया नहीं है। ये वहाँ हजारों वर्षों से रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आनन्द के बारे में बाइबिल क्या कहती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये मैं आपको उसमें से कुछ चखाऊँ, कि आनन्द के बारे में बाइबिल क्या कहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उस सब में जो ‘उसने’ सिखाया, यीशु का लक्ष्य था, ‘उसके’ लोगों का आनन्द।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यूहन्ना 15:11 मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द वो चीज है जिस से परमेश्वर हमें तब भरता है जब हम यीशु में विश्वास करते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 15:13 परमेश्वर जो आशा का दाता है तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर का राज्य, आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 14:17 क्योंकि परमेश्वर का राज्य खानापीना नहीं; परन्तु धर्म और मिलाप और वह आनन्द है, जो पवित्र आत्मा से होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द, हमारे अन्दर परमेश्वर के आत्मा का फल है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; गलतियों 5:22 पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल … है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हर चीज जो प्रेरितों ने किया और लिखा, उसका लक्ष्य आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 कुरिन्थियों 1:24 यह नहीं, कि हम विश्वास के विषय में तुम पर प्रभुता जताना चाहते हैं; परन्तु तुम्हारे आनन्द में सहायक हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एक मसीही बनना, एक ऐसे आनन्द को पाना है जो आपको हर चीज को त्यागने का इच्छुक बनाता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मत्ती 13:44 ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द, बाइबिल में परमेश्वर के वचन के द्वारा पोषित होता और बनाए रखा जाता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 19:8 यहोवा के उपदेश सिद्ध हैं, हृदय को आनन्दित कर देते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वे जो मसीह में विश्वास करते हैं उनके लिए, आनन्द, सभी दुःख से आगे निकल जायेगा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 126:5 जो आंसू बहाते हुए बोते हैं, वे जयजयकार करते हुए (अथवा, आनन्द की चिल्लाहटों के साथ) लवने पाएंगे&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 30:5ब कदाचित् रात को रोना पड़े, परन्तु सबेरे आनन्द पहुंचेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर स्वयँ हमारा आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 43:4 तब मैं परमेश्वर की वेदी के पास जाऊंगा, उस ईश्वर के पास जो मेरे अति आनन्द का कुंड है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 16:10 तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर में आनन्द, सभी सांसारिक आनन्दों को पीछे कर देता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 4:7 तू ने मेरे मन में उस से कहीं अधिक आनन्द भर दिया है, जो उनको अन्न और दाखमधु की बढ़ती से होती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यदि आपका आनन्द परमेश्वर में है, कोई भी आप से आपका आनन्द नहीं ले सकता।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यूहन्ना 16:22 तुम्हें भी अब तो शोक है, परन्तु मैं तुम से फिर मिलूंगा और तुम्हारे मन में आनन्द होगा; और तुम्हारा आनन्द कोई तुम से छीन न लेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर सभी जातियों और लोगों को उस आनन्द में जुड़ जाने के लिए बुलाता है जो वह उन सब को प्रस्तुत करता है, जो विश्वास करते हैं। कोई जातिवाद नहीं। कोई स्व-जाति-गर्व-प्रथा नहीं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 67:4 राज्य राज्य के लोग आनन्द करें, और जयजयकार करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 66:1 हे सारी पृथ्वी के लोगो, परमेश्वर के लिए जयजयकार करो (आनन्द के साथ पुकारो)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सम्पूर्ण मसीही संदेश, आरम्भ से अन्त तक, बड़े आनन्द का सुसमाचार है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; लूका 2:10 तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, ‘‘मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिए होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 51:11 सो यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सियोन में आएंगे, और उनके सिरों पर सदा का आनन्द होगा; वे हर्ष और आनन्द प्राप्त करेंगे, और शोक और सिसकियों का अन्त हो जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जब हम मसीह से उसके द्वितीय आगमन पर मिलेंगे, हम उसके अविनाशी आनन्द में प्रवेश करेंगे।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मत्ती 25:23 उसके स्वामी ने उस से कहा, ‘‘धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, … अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1968 में मेरे लिए शायद सबसे अधिक चैंकानेवाली बात थी, वो सरल और स्पष्ट प्रेक्षण कि परमेश्वर में इस आनन्द की आज्ञा दी गई है। आप इसे पुस्तिका के दूसरे पृष्ठ पर देखते हैं:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 37:4 यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 33:1 हे धर्मियो यहोवा के कारण जयजयकार करो&amp;amp;nbsp;! क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 32:11 हे धर्मियो यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालो आनन्द से जयजयकार करो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी आज्ञा दी गई है क्योंकि जो जोखि़म में है वो मात्र हमारा आनन्द नहीं है अपितु परमेश्वर की महिमा, परमेश्वर का सम्मान और प्रतिष्ठा। यदि हम परमेश्वर में आनन्दित नहीं होते - यदि परमेश्वर हमारा धन और हमारी प्रसन्नता और हमारा सन्तोष नहीं है, तब ‘उसका’ अनादर होता है। ‘उसकी’ महिमा का महत्व घटाया जाता है। ‘उसकी’ प्रतिष्ठा धूमिल की जाती है। इसलिये परमेश्वर हमारे आनन्द की आज्ञा देता है, हमारे भले और ‘उसकी’ महिमा, दोनों के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस अन्वेषण ने मुझे मसीहियत का केन्द्रीय संदेश, सुसमाचार - यीशु मसीह का - शुभ समाचार, समझने में सहायता की। और ये छोटी पुस्तिका क्वेस्ट फॉर जॉय (आनन्द की खोज) वही करने के लिए है:मसीही सुसमाचार का सारांश देने और ये कैसे पापियों को बचाता है और सनातन का आनन्द देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सागर को वर्षा की एक बूंद में रखने का प्रयास करना, ख़तरनाक है - परमेश्वर की धार्मिकता और प्रेम को पुस्तिका में रखने का प्रयास करना। लेकिन मैं सोचता हूँ कि यह केवल ख़तरनाक नहीं है, ये प्रेममय है, और ये आवश्यक है। परमेश्वर ने यह एक बार किया। ‘उसने’ ‘उसके’ असीम स्वयँ को एक अकेले मानवजीवधारी, यीशु मसीह में रख दिया (कुलुस्सियों 2:9)। यह सागर को वर्षा की एक बूंद में रखने से भी अधिक विस्मयकारी था। और यह प्रेम था। चूंकि, ‘वह’ मानव और साथ ही परमेश्वर था, ‘वह’ हमारे अपने पापों के लिए मर सका। किन्तु अनेकों ने ‘उस’ में परमेश्वर को नहीं पहचाना। और मैं ये जोखि़म उठाता हूँ कि अनेकों इस छोटी पुस्तिका में सुसमाचार को नहीं देख रहे हैं। और मेरा जोखि़म बड़ा है क्योंकि मैं परमेश्वर नहीं हूँ और मैं अचूक नहीं हूँ। लेकिन मैं आपसे प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि आप देखें कि परमेश्वर ने आपको बचाने के लिए क्या किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या आप मेरे साथ इस पुस्तिका में होकर चलेंगे&amp;amp;nbsp;? यदि आप यीशु में एक विश्वासी नहीं हैं, केवल इसका प्रयास कीजिये कि परमेश्वर जो स्वयँ के और आपके बारे में दिखाये, उसके प्रति खुले रहें, और ‘उससे’ मांगिये कि जो सत्य है उसे आपको पुष्ट करे और जो नहीं है उससे आपकी रक्षा करे। यदि आप एक विश्वासी हैं, जिस पर आपने अपने जीवन को निर्मित किया है, उसे तरोताजा कीजिये, और यदि परमेश्वर इसे उपयोग करने में अगुवाई करता है, इस छोटी पुस्तिका के द्वारा संसार में सर्वाधिक उत्तम समाचार बांटने की तैयारी कीजिये। और ऐसा हो कि इस ईस्टर रविवार पर, जी उठा हुआ मसीह सम्मानित हो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल-शास्त्रीय प्रथम दो सच्चाईयों पर एक-साथ विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 1:- परमेश्वर ने हमें ‘उसकी’ महिमा के लिये सृजा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘मेरे पुत्रों को दूर से और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी की छोर से ले आओ … जिसको मैंने अपनी महिमा के लिये सृजा’’ (यशायाह 43:6-7)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 2:- प्रत्येक मानव को परमेश्वर की महिमा के लिए जीना चाहिए। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘सो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ; चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो’’ (1 कुरिन्थियों 10:31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये लगभग एक समान हैं, क्या नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? अन्तर क्या है&amp;amp;nbsp;? इससे क्यों अन्तर पड़ता है कि दो पृष्ठ हों बनिस्बत कि दोनों को एक में समेट दिया जावे&amp;amp;nbsp;? यह अन्तर ये है कि सत्य-1, परमेश्वर की योजना की बात करता है, और सत्य 2, हमारे कर्तव्य की बात करता है। उन्हें अलग रखना और उन्हें इस क्रम में रखना, वास्तविकता के बारे में कुछ बहुत निर्णायक कहता है। यदि हम इसे न सुनें, सम्भवतः हम सुसमाचार को बहुमूल्य समाचार के रूप में नहीं देखेंगे जैसा कि वो है। मसीह की वीभत्स मृत्यु, सम्भवतः एक अतिरेक प्रतिक्रिया प्रतीत होगी। निर्णायक बिन्दु ये है कि परमेश्वर सब चीजों का उद्गम और सभी चीजों का पैमाना और सभी चीजों का लक्ष्य है। और विश्व, पूरा ही परमेश्वर के विषय में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी सात-साल-की तलीथा और मैं, शनिवार के हमारे तय कार्यक्रम पर कल, ‘लेक स्ट्रीट’ पर स्थित ‘अरबाई’ में दोपहर के भोजन के लिए गये। जैसे ही हम ‘हियावाथा’ से आगे बढ़े, हमारे सामने एक नीली वैन (कार) थी, और मैंने तलीथा से कहा&amp;amp;nbsp;:- ‘‘मैं उस बम्पर पर लगे स्टिकर को पसन्द नहीं करता।’’ जहाँ वो थी वहाँ से वह इसे पढ़ नहीं सकी, इस कारण मैंने उसके लिए पढ़ा:- ‘‘इट्स आलॅ अबाउट मी’’ (ये पूरा ही मेरे विषय में है)। बड़ा ‘‘एम।’’ इसी कारण यीशु का सुसमाचार अनेकों के लिए समझना इतना कठिन है। यह वास्तविकता के एक बहुत भिन्न दर्शन में जड़ पकड़े है। ये सब हमारे विषय में नहीं है। ये सब परमेश्वर के विषय में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने हमारी बनावट की कि उसकी’ महिमा के लिए जीएँ। ये बाइबिल में सभी जगह है। और इसलिए ये हमारे जीवन की बुलाहट और हमारा कर्तव्य है कि ‘उसकी’ महिमा के लिए जीएँ। स्वयँ को जांचिये:- क्या परमेश्वर का प्रेम आपके लिए ये मायने रखता है कि ‘वह’ आपको केन्द्र बनाता है, अथवा इसका अर्थ है कि ‘वह’ आपको चिरस्थायी आनन्द देता है - ‘उसके’ स्वयँ की बड़ी कीमत पर - ‘उसे’ केन्द्र बनाने के द्वारा&amp;amp;nbsp;? वही है जिसके लिए आपको बनाया गया था। वो आपका आनन्द होगा और वो ‘उसकी’ महिमा होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद बाइबिल-शास्त्रीय दो अगली सच्चाईयों पर एक-साथ विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 3:- जैसा हमें करना चाहिए, परमेश्वर को महिमित करने में हम सब असफल रहे हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं’’ (रोमियों 3:23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 4:- हम सब परमेश्वर की न्यायोचित दण्डाज्ञा के आधीन हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘पाप की मजदूरी तो मृत्यु है …’’ (रोमियों 6:23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये, भी, एक पृष्ठ पर संयुक्त किये जा सकते थे, क्या नहीं, ठीक प्रथम दो के समान&amp;amp;nbsp;? हम कह सकते थे, ‘‘क्योंकि हम सब पापी हैं, हम परमेश्वर की दण्डाज्ञा की पात्रता रखते हैं - हम सज़ा के योग्य हैं।’’ लेकिन कुछ महत्वपूर्ण खो जायेगा यदि हम इसे उस तरह से कहें । क्या खो जायेगा, वो सत्य - 3 में बल दिया गया है, कि पाप मुख्यतः वो नहीं है जिस तरह से हमने लोगों से बर्ताव किया है, अपितु जिस तरह से हमने परमेश्वर से बर्ताव किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बम्पर पर चिपका वो स्टिकर गलत होगा, यदि इसका अर्थ था, ‘‘मेरा पाप पूरा ही मेरे विषय में है’’ तो भी। परमेश्वर, सृष्टि में अपनी स्वयँ की योजना का केन्द्र है। परमेश्वर, जीवधारियों के रूप में हमारे कर्तव्य का केन्द्र है। और पापी होने का क्या अर्थ है, परमेश्वर इसका केन्द्र है:इसका अर्थ है, जैसा रोमियों 3:23 कहता है, परमेश्वर की महिमा से रहित हो जाना, अर्थात्, परमेश्वर की महानता से हटकर किसी और महानता को चुनना और आनन्द उठाना। पाप, सबसे प्रथम और सर्वाधिक इस बारे में है कि हम परमेश्वर से कैसा बर्ताव करते हैं, अन्य लोगों से नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम नरक की भयानकता या मसीह के रक्तरंजित क्रूस की सार्थकता कभी नहीं समझेंगे, यदि हम पाप के बोझ को, परमेश्वर के अपमान के रूप में बोध नहीं करते। पाप, मात्र मनुष्य का मनुष्य से दुव्र्यवहार करना नहीं है। यह मुख्यतः मनुष्य द्वारा परमेश्वर से दुव्र्यवहार है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर का तिरस्कार करना। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को अनदेखा करना। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को छोड़कर अन्य चीजों को प्रमुखता देना। और इस प्रकार, मनुष्य द्वारा परमेश्वर के महत्व को कम आंकना। ये विश्व में परम घोर अपमान है। हमें इसकी अनुभूति करना चाहिए यदि सत्य - 4 का भयंकर दण्ड अन्यायपूर्ण प्रतीत नहीं होने जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम सब ने परमेश्वर से अवज्ञा के साथ बर्ताव किया है, और उसका क्रोध हम पर आ रहा है। ये हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अर्थव्यवस्था से बड़ी। इराक़ या उत्तरी कोरिया के साथ अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों से भी बड़ी। विवाह की कठिनाईयों या दर्दनाक कैंसर से भी बड़ी। मसीही सुसमाचार का यही आशय है, इलाज, प्रथम और मुख्यतः। हम परमेश्वर के न्यायोचित दण्ड से कैसे बच सकते हैं&amp;amp;nbsp;? सुसमाचार के कई अन्य अद्भुत प्रभाव हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन ये महत्वपूर्ण है, और अन्य इस पर आधारित हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, सुसमाचार। आइये हम बाइबिल-शास्त्रीय अंतिम दो सच्चाईयों पर एक-साथ विचार करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 5:- परमेश्वर ने, सनातन जीवन और आनन्द प्रदान करने, अपने एकमात्र पुत्र को भेजा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है:मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया …’’ (1तीमुथियुस 1:15)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 6:- मसीह की मृत्यु के द्वारा खरीदे गए लाभ, उनके हैं जो पश्चाताप् करते और ‘उस’ पर विश्वास करते हैं। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘इसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं’’ (प्रेरित 3:19)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू … उद्धार पायेगा (प्रेरित 16:31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पुनः, हम इन दो पृष्ठों को संयुक्त कर सकते थे। हम कह सकते थे:- पाप और दोष और दण्डाज्ञा का क्या इलाज है&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- ‘‘प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू उद्धार पायेगा।’’ लेकिन वो गहराई से अपूर्ण उत्तर होगा&amp;amp;nbsp;! यदि आप डूब रहे हैं, इलाज, सहायता के लिए आपका चिल्लाना मात्र नहीं है; ये है जीवन-रक्षकगण और बचाव की रस्सियाँ (और यदि आवश्यक हो) कृत्रिम श्वसन। सहायता के लिए चिल्लाना आपको मात्र बचाव के कार्य से जोड़ता है। यदि आपको हृदयाघात हुआ है, तो 911 पर फोन करना आपकी मुख्य चिकित्सा नहीं है। ये है, एम्बुलैन्स और उप-स्वास्थ्यकर्मी और सीपी. आर. और नर्सें और सर्जन और दवाईयाँ। 911 पर फोन करना, बचाव कार्य से मात्र संबंध है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने पाप से पश्चाताप् करना और यीशु पर विश्वास करना (सत्य- 6), के साथ इसी तरह है। मसीह में परमेश्वर के बचाने वाले कार्य के साथ, वो आपका संबंधन है। मसीह ने हमें बचाने के लिए 2000 साल पूर्व कुछ किया। ‘वह’ आया, ‘वह’ परमेश्वर की पुत्र के रूप में एक सिद्ध जीवन जिआ। और ‘वह’ उन सब के प्रतिस्थापन के रूप में मर गया जो ‘उस’ पर विश्वास करेंगे। 1पतरस 3:18, ‘‘मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुंचाए।’’ हमारा विश्वास, हमारे उद्धार के लिए आधार नहीं है। ये हमें हमारे उद्धार के आधार से जोड़ता है। मसीह, हमारे उद्धार का आधार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे दोषी ठहराये जाने के स्थान पर, ‘उसकी’ मृत्यु और दोषी ठहराया जाना; हमारे पाप और अपूर्णता के स्थान पर उसकी सिद्ध धार्मिकता। और हमारे उद्धार को वैध ठहराने और सुरक्षित करने और सदा-सदा के लिए हमारे आनन्द के लिए ‘उसका’ पुनरुत्थान। बाइबिल कहती है, ‘‘यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो … परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ’’ (1 कुरिन्थियों 15:17, 20)। चूंकि ‘वह’ हमारे लिए मरा और पुनः जी उठा, सभी जो ‘उस’ पर विश्वास करते हैं, उनके पास अनन्त जीवन और सदा-बढ़ता-हुआ आनन्द है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने जीवन के विषय में उस पर भरोसा कीजिये। आपके विवाह या कुंवारेपन के विषय में उस पर भरोसा रखिये। आपके व्यापार और आर्थिक स्थिति के विषय में ‘उस’ पर भरोसा कीजिये। आपके स्वास्थ्य के विषय में उस पर भरोसा कीजिये। और, इन सब के नीचे, अपने पाप और अपने दोष और अपने भय के विषय में ‘उस’ पर भरोसा कीजिये। बचाने के लिए ‘उसने’ पहिले की काम कर दिया है। ये पूरा हुआ है। ‘वह’ मर गया है और ‘वह’ जी उठा है। और ‘उस’ में विश्वास के द्वारा ‘उस’ का उद्धार आप का हो सकता है। और जब ये होता है, तब वो परिपूर्ण होता है कि आपको क्यों बनाया गया: आपके आनन्द में परमेश्वर की महिमा सदा-सर्वदा प्रतिबिम्बित हो।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%96%E0%A5%8B%E0%A4%9C:%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6!_%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE:%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B9!</id>
		<title>खोज:आनन्द! पाया:मसीह!</title>
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				<updated>2017-06-27T20:14:29Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Quest: Joy! Found: Christ!}}&amp;lt;br&amp;gt;   ब्लेस पास्कल एक फ्रांसिसी गणितशास्त्रीय विद्धा...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Quest: Joy! Found: Christ!}}&amp;lt;br&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्लेस पास्कल एक फ्रांसिसी गणितशास्त्रीय विद्धान था जो 1662 में मर गया। जब तक कि वह 31 वर्ष का न हुआ, परमेश्वर से भागते रहने के बाद, नवम्बर 23, 1654 को, रात्रि 10:30 बजे, पास्कल परमेश्वर से मिला और गहराई से और अविचलित रूप से उसका मन यीशु मसीह की ओर बदल गया। उसने इसे एक चर्मपत्र के टुकड़े पर लिखा और अपने कोट के अन्दर सिल लिया, जो आठ साल बाद उसकी मृत्यु के उपरान्त पाया गया। इसमें लिखा था, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अनुग्रह का वर्ष 1654, सोमवार 23 नवम्बर, संत क्लेमैंट का पर्व … रात्रि में लगभग साढ़े दस बजे से मध्य रात्रि के लगभग आधा घण्टा बाद तक, आग। इब्राहीम का परमेश्वर, इसहाक का परमेश्वर, याकूब का परमेश्वर, दार्शनिकों व विद्धानों का नहीं। निश्चित, हृदयस्पर्शी आनन्द, शान्ति। यीशु मसीह का परमेश्वर। यीशु मसीह का परमेश्वर। ‘‘मेरा परमेश्वर और तुम्हारा परमेश्वर।’’ … आनन्द, आनन्द, आनन्द, खुशी के आँसू … यीशु मसीह। यीशु मसीह। काश मैं ‘उससे’ कभी भी अलग न किया जाऊँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1968 में पास्कल और सी. एस. लेविस और जोनाथन एडवर्डस् और डान फुलर और बाइबिल ने, इन शब्दों के साथ मेरे जीवन को सदा के लिए बदल देने के लिए टीम बनाया, ‘‘आनन्द, आनन्द, आनन्द, खुशी के आँसू।’’ ये छोटी पुस्तिका, क्वेस्ट फॉर जॉय (आनन्द की खोज), जो आपके पास आराधना-पुस्तिका में है, उन दिनों में पैदा हुई। ये लगभग 15 वर्षों तक नहीं लिखी गई थी। लेकिन ये उस समय उत्पन्न हुई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुख-आवरण के अन्दर देखिये। यहाँ है, खुशी के लिए मेरे भय के विरोध में पास्कल का विस्फोट। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; सभी मनुष्य खुशी या सुख की खोज करते हैं। ये बिना अपवाद के है। जो भी तरीके वे अपनाते हैं, वे सभी इस अन्त की ओर उन्मुख रहते हैं। कुछ लोगों के युद्ध में जाने का कारण, और अन्य लोगों का कि इससे बचकर रहें, भिन्न दृष्टिकोणों के साथ की गई, दोनों में वही इच्छा है। प्रत्येक मनुष्य की प्रत्येक क्रिया का यही अभिप्राय है, उनका भी जो स्वयँ को फांसी लगा लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने संदेह किया कि ये सच है। लेकिन मैंने सदा भय खाया कि ये पाप था। यह कि सुखी रहने की चाह रखना एक नैतिक त्रुटि थी। ये कि अपने-आप का इन्कार करने का अर्थ था आनन्द का त्याग, अधिक बड़े आनन्दों के लिए छोटे आनन्दों का परित्याग करना नहीं। लेकिन तब परमेश्वर ने इन लेखकों के द्वारा सम्मिलित होकर काम किया कि मुझे बाइबिल पुनः पढ़ने के लिए उकसाये। कि इसे एक मौका दूँ कि इसका सच्चा अर्थ पा सकूँ। और वहाँ जो मैंने आनन्द के सम्बन्ध में पाया, उसने मुझे सदा के लिए बदल दिया। मैं तब से इसे समझने, इसे जीने और इसे सिखाने का प्रयास कर रहा हूँ। ये नया नहीं है। ये वहाँ हजारों वर्षों से रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आनन्द के बारे में बाइबिल क्या कहती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये मैं आपको उसमें से कुछ चखाऊँ, कि आनन्द के बारे में बाइबिल क्या कहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''उस सब में जो ‘उसने’ सिखाया, यीशु का लक्ष्य था, ‘उसके’ लोगों का आनन्द।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यूहन्ना 15:11 मैं ने ये बातें तुम से इसलिये कही हैं, कि मेरा आनन्द तुम में बना रहे, और तुम्हारा आनन्द पूरा हो जाए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द वो चीज है जिस से परमेश्वर हमें तब भरता है जब हम यीशु में विश्वास करते हैं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 15:13 परमेश्वर जो आशा का दाता है तुम्हें विश्वास करने में सब प्रकार के आनन्द और शान्ति से परिपूर्ण करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर का राज्य, आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 14:17 क्योंकि परमेश्वर का राज्य खानापीना नहीं; परन्तु धर्म और मिलाप और वह आनन्द है, जो पवित्र आत्मा से होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द, हमारे अन्दर परमेश्वर के आत्मा का फल है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; गलतियों 5:22 पर आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, मेल … है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हर चीज जो प्रेरितों ने किया और लिखा, उसका लक्ष्य आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 कुरिन्थियों 1:24 यह नहीं, कि हम विश्वास के विषय में तुम पर प्रभुता जताना चाहते हैं; परन्तु तुम्हारे आनन्द में सहायक हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एक मसीही बनना, एक ऐसे आनन्द को पाना है जो आपको हर चीज को त्यागने का इच्छुक बनाता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मत्ती 13:44 ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आनन्द, बाइबिल में परमेश्वर के वचन के द्वारा पोषित होता और बनाए रखा जाता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 19:8 यहोवा के उपदेश सिद्ध हैं, हृदय को आनन्दित कर देते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''वे जो मसीह में विश्वास करते हैं उनके लिए, आनन्द, सभी दुःख से आगे निकल जायेगा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 126:5 जो आंसू बहाते हुए बोते हैं, वे जयजयकार करते हुए (अथवा, आनन्द की चिल्लाहटों के साथ) लवने पाएंगे&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 30:5ब कदाचित् रात को रोना पड़े, परन्तु सबेरे आनन्द पहुंचेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर स्वयँ हमारा आनन्द है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 43:4 तब मैं परमेश्वर की वेदी के पास जाऊंगा, उस ईश्वर के पास जो मेरे अति आनन्द का कुंड है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 16:10 तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर में आनन्द, सभी सांसारिक आनन्दों को पीछे कर देता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 4:7 तू ने मेरे मन में उस से कहीं अधिक आनन्द भर दिया है, जो उनको अन्न और दाखमधु की बढ़ती से होती थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यदि आपका आनन्द परमेश्वर में है, कोई भी आप से आपका आनन्द नहीं ले सकता।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यूहन्ना 16:22 तुम्हें भी अब तो शोक है, परन्तु मैं तुम से फिर मिलूंगा और तुम्हारे मन में आनन्द होगा; और तुम्हारा आनन्द कोई तुम से छीन न लेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर सभी जातियों और लोगों को उस आनन्द में जुड़ जाने के लिए बुलाता है जो वह उन सब को प्रस्तुत करता है, जो विश्वास करते हैं। कोई जातिवाद नहीं। कोई स्व-जाति-गर्व-प्रथा नहीं।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 67:4 राज्य राज्य के लोग आनन्द करें, और जयजयकार करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 66:1 हे सारी पृथ्वी के लोगो, परमेश्वर के लिए जयजयकार करो (आनन्द के साथ पुकारो)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सम्पूर्ण मसीही संदेश, आरम्भ से अन्त तक, बड़े आनन्द का सुसमाचार है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; लूका 2:10 तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, ‘‘मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिए होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; यशायाह 51:11 सो यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सियोन में आएंगे, और उनके सिरों पर सदा का आनन्द होगा; वे हर्ष और आनन्द प्राप्त करेंगे, और शोक और सिसकियों का अन्त हो जाएगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जब हम मसीह से उसके द्वितीय आगमन पर मिलेंगे, हम उसके अविनाशी आनन्द में प्रवेश करेंगे।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मत्ती 25:23 उसके स्वामी ने उस से कहा, ‘‘धन्य हे अच्छे और विश्वासयोग्य दास, … अपने स्वामी के आनन्द में सम्भागी हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1968 में मेरे लिए शायद सबसे अधिक चैंकानेवाली बात थी, वो सरल और स्पष्ट प्रेक्षण कि परमेश्वर में इस आनन्द की आज्ञा दी गई है। आप इसे पुस्तिका के दूसरे पृष्ठ पर देखते हैं:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 37:4 यहोवा को अपने सुख का मूल जान, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 33:1 हे धर्मियो यहोवा के कारण जयजयकार करो&amp;amp;nbsp;! क्योंकि धर्मी लोगों को स्तुति करनी सोहती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भजन 32:11 हे धर्मियो यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालो आनन्द से जयजयकार करो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसकी आज्ञा दी गई है क्योंकि जो जोखि़म में है वो मात्र हमारा आनन्द नहीं है अपितु परमेश्वर की महिमा, परमेश्वर का सम्मान और प्रतिष्ठा। यदि हम परमेश्वर में आनन्दित नहीं होते - यदि परमेश्वर हमारा धन और हमारी प्रसन्नता और हमारा सन्तोष नहीं है, तब ‘उसका’ अनादर होता है। ‘उसकी’ महिमा का महत्व घटाया जाता है। ‘उसकी’ प्रतिष्ठा धूमिल की जाती है। इसलिये परमेश्वर हमारे आनन्द की आज्ञा देता है, हमारे भले और ‘उसकी’ महिमा, दोनों के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस अन्वेषण ने मुझे मसीहियत का केन्द्रीय संदेश, सुसमाचार - यीशु मसीह का - शुभ समाचार, समझने में सहायता की। और ये छोटी पुस्तिका क्वेस्ट फॉर जॉय (आनन्द की खोज) वही करने के लिए है:मसीही सुसमाचार का सारांश देने और ये कैसे पापियों को बचाता है और सनातन का आनन्द देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सागर को वर्षा की एक बूंद में रखने का प्रयास करना, ख़तरनाक है - परमेश्वर की धार्मिकता और प्रेम को पुस्तिका में रखने का प्रयास करना। लेकिन मैं सोचता हूँ कि यह केवल ख़तरनाक नहीं है, ये प्रेममय है, और ये आवश्यक है। परमेश्वर ने यह एक बार किया। ‘उसने’ ‘उसके’ असीम स्वयँ को एक अकेले मानवजीवधारी, यीशु मसीह में रख दिया (कुलुस्सियों 2:9)। यह सागर को वर्षा की एक बूंद में रखने से भी अधिक विस्मयकारी था। और यह प्रेम था। चूंकि, ‘वह’ मानव और साथ ही परमेश्वर था, ‘वह’ हमारे अपने पापों के लिए मर सका। किन्तु अनेकों ने ‘उस’ में परमेश्वर को नहीं पहचाना। और मैं ये जोखि़म उठाता हूँ कि अनेकों इस छोटी पुस्तिका में सुसमाचार को नहीं देख रहे हैं। और मेरा जोखि़म बड़ा है क्योंकि मैं परमेश्वर नहीं हूँ और मैं अचूक नहीं हूँ। लेकिन मैं आपसे प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि आप देखें कि परमेश्वर ने आपको बचाने के लिए क्या किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या आप मेरे साथ इस पुस्तिका में होकर चलेंगे&amp;amp;nbsp;? यदि आप यीशु में एक विश्वासी नहीं हैं, केवल इसका प्रयास कीजिये कि परमेश्वर जो स्वयँ के और आपके बारे में दिखाये, उसके प्रति खुले रहें, और ‘उससे’ मांगिये कि जो सत्य है उसे आपको पुष्ट करे और जो नहीं है उससे आपकी रक्षा करे। यदि आप एक विश्वासी हैं, जिस पर आपने अपने जीवन को निर्मित किया है, उसे तरोताजा कीजिये, और यदि परमेश्वर इसे उपयोग करने में अगुवाई करता है, इस छोटी पुस्तिका के द्वारा संसार में सर्वाधिक उत्तम समाचार बांटने की तैयारी कीजिये। और ऐसा हो कि इस ईस्टर रविवार पर, जी उठा हुआ मसीह सम्मानित हो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबिल-शास्त्रीय प्रथम दो सच्चाईयों पर एक-साथ विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 1:- परमेश्वर ने हमें ‘उसकी’ महिमा के लिये सृजा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘मेरे पुत्रों को दूर से और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी की छोर से ले आओ … जिसको मैंने अपनी महिमा के लिये सृजा’’ (यशायाह 43:6-7)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 2:- प्रत्येक मानव को परमेश्वर की महिमा के लिए जीना चाहिए। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘सो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ; चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो’’ (1 कुरिन्थियों 10:31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये लगभग एक समान हैं, क्या नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? अन्तर क्या है&amp;amp;nbsp;? इससे क्यों अन्तर पड़ता है कि दो पृष्ठ हों बनिस्बत कि दोनों को एक में समेट दिया जावे&amp;amp;nbsp;? यह अन्तर ये है कि सत्य-1, परमेश्वर की योजना की बात करता है, और सत्य 2, हमारे कर्तव्य की बात करता है। उन्हें अलग रखना और उन्हें इस क्रम में रखना, वास्तविकता के बारे में कुछ बहुत निर्णायक कहता है। यदि हम इसे न सुनें, सम्भवतः हम सुसमाचार को बहुमूल्य समाचार के रूप में नहीं देखेंगे जैसा कि वो है। मसीह की वीभत्स मृत्यु, सम्भवतः एक अतिरेक प्रतिक्रिया प्रतीत होगी। निर्णायक बिन्दु ये है कि परमेश्वर सब चीजों का उद्गम और सभी चीजों का पैमाना और सभी चीजों का लक्ष्य है। और विश्व, पूरा ही परमेश्वर के विषय में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी सात-साल-की तलीथा और मैं, शनिवार के हमारे तय कार्यक्रम पर कल, ‘लेक स्ट्रीट’ पर स्थित ‘अरबाई’ में दोपहर के भोजन के लिए गये। जैसे ही हम ‘हियावाथा’ से आगे बढ़े, हमारे सामने एक नीली वैन (कार) थी, और मैंने तलीथा से कहा&amp;amp;nbsp;:- ‘‘मैं उस बम्पर पर लगे स्टिकर को पसन्द नहीं करता।’’ जहाँ वो थी वहाँ से वह इसे पढ़ नहीं सकी, इस कारण मैंने उसके लिए पढ़ा:- ‘‘इट्स आलॅ अबाउट मी’’ (ये पूरा ही मेरे विषय में है)। बड़ा ‘‘एम।’’ इसी कारण यीशु का सुसमाचार अनेकों के लिए समझना इतना कठिन है। यह वास्तविकता के एक बहुत भिन्न दर्शन में जड़ पकड़े है। ये सब हमारे विषय में नहीं है। ये सब परमेश्वर के विषय में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने हमारी बनावट की कि उसकी’ महिमा के लिए जीएँ। ये बाइबिल में सभी जगह है। और इसलिए ये हमारे जीवन की बुलाहट और हमारा कर्तव्य है कि ‘उसकी’ महिमा के लिए जीएँ। स्वयँ को जांचिये:- क्या परमेश्वर का प्रेम आपके लिए ये मायने रखता है कि ‘वह’ आपको केन्द्र बनाता है, अथवा इसका अर्थ है कि ‘वह’ आपको चिरस्थायी आनन्द देता है - ‘उसके’ स्वयँ की बड़ी कीमत पर - ‘उसे’ केन्द्र बनाने के द्वारा&amp;amp;nbsp;? वही है जिसके लिए आपको बनाया गया था। वो आपका आनन्द होगा और वो ‘उसकी’ महिमा होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बाद बाइबिल-शास्त्रीय दो अगली सच्चाईयों पर एक-साथ विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 3:- जैसा हमें करना चाहिए, परमेश्वर को महिमित करने में हम सब असफल रहे हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं’’ (रोमियों 3:23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 4:- हम सब परमेश्वर की न्यायोचित दण्डाज्ञा के आधीन हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘पाप की मजदूरी तो मृत्यु है …’’ (रोमियों 6:23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये, भी, एक पृष्ठ पर संयुक्त किये जा सकते थे, क्या नहीं, ठीक प्रथम दो के समान&amp;amp;nbsp;? हम कह सकते थे, ‘‘क्योंकि हम सब पापी हैं, हम परमेश्वर की दण्डाज्ञा की पात्रता रखते हैं - हम सज़ा के योग्य हैं।’’ लेकिन कुछ महत्वपूर्ण खो जायेगा यदि हम इसे उस तरह से कहें । क्या खो जायेगा, वो सत्य - 3 में बल दिया गया है, कि पाप मुख्यतः वो नहीं है जिस तरह से हमने लोगों से बर्ताव किया है, अपितु जिस तरह से हमने परमेश्वर से बर्ताव किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बम्पर पर चिपका वो स्टिकर गलत होगा, यदि इसका अर्थ था, ‘‘मेरा पाप पूरा ही मेरे विषय में है’’ तो भी। परमेश्वर, सृष्टि में अपनी स्वयँ की योजना का केन्द्र है। परमेश्वर, जीवधारियों के रूप में हमारे कर्तव्य का केन्द्र है। और पापी होने का क्या अर्थ है, परमेश्वर इसका केन्द्र है:इसका अर्थ है, जैसा रोमियों 3:23 कहता है, परमेश्वर की महिमा से रहित हो जाना, अर्थात्, परमेश्वर की महानता से हटकर किसी और महानता को चुनना और आनन्द उठाना। पाप, सबसे प्रथम और सर्वाधिक इस बारे में है कि हम परमेश्वर से कैसा बर्ताव करते हैं, अन्य लोगों से नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम नरक की भयानकता या मसीह के रक्तरंजित क्रूस की सार्थकता कभी नहीं समझेंगे, यदि हम पाप के बोझ को, परमेश्वर के अपमान के रूप में बोध नहीं करते। पाप, मात्र मनुष्य का मनुष्य से दुव्र्यवहार करना नहीं है। यह मुख्यतः मनुष्य द्वारा परमेश्वर से दुव्र्यवहार है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर का तिरस्कार करना। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को अनदेखा करना। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को छोड़कर अन्य चीजों को प्रमुखता देना। और इस प्रकार, मनुष्य द्वारा परमेश्वर के महत्व को कम आंकना। ये विश्व में परम घोर अपमान है। हमें इसकी अनुभूति करना चाहिए यदि सत्य - 4 का भयंकर दण्ड अन्यायपूर्ण प्रतीत नहीं होने जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम सब ने परमेश्वर से अवज्ञा के साथ बर्ताव किया है, और उसका क्रोध हम पर आ रहा है। ये हमारी सबसे बड़ी समस्या है। अर्थव्यवस्था से बड़ी। इराक़ या उत्तरी कोरिया के साथ अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों से भी बड़ी। विवाह की कठिनाईयों या दर्दनाक कैंसर से भी बड़ी। मसीही सुसमाचार का यही आशय है, इलाज, प्रथम और मुख्यतः। हम परमेश्वर के न्यायोचित दण्ड से कैसे बच सकते हैं&amp;amp;nbsp;? सुसमाचार के कई अन्य अद्भुत प्रभाव हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन ये महत्वपूर्ण है, और अन्य इस पर आधारित हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, सुसमाचार। आइये हम बाइबिल-शास्त्रीय अंतिम दो सच्चाईयों पर एक-साथ विचार करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 5:- परमेश्वर ने, सनातन जीवन और आनन्द प्रदान करने, अपने एकमात्र पुत्र को भेजा। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘यह बात सच और हर प्रकार से मानने के योग्य है:मसीह यीशु पापियों का उद्धार करने के लिये जगत में आया …’’ (1तीमुथियुस 1:15)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबिल-शास्त्रीय सत्य - 6:- मसीह की मृत्यु के द्वारा खरीदे गए लाभ, उनके हैं जो पश्चाताप् करते और ‘उस’ पर विश्वास करते हैं। ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘इसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएं’’ (प्रेरित 3:19)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ‘‘प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू … उद्धार पायेगा (प्रेरित 16:31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पुनः, हम इन दो पृष्ठों को संयुक्त कर सकते थे। हम कह सकते थे:- पाप और दोष और दण्डाज्ञा का क्या इलाज है&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- ‘‘प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास कर तो तू उद्धार पायेगा।’’ लेकिन वो गहराई से अपूर्ण उत्तर होगा&amp;amp;nbsp;! यदि आप डूब रहे हैं, इलाज, सहायता के लिए आपका चिल्लाना मात्र नहीं है; ये है जीवन-रक्षकगण और बचाव की रस्सियाँ (और यदि आवश्यक हो) कृत्रिम श्वसन। सहायता के लिए चिल्लाना आपको मात्र बचाव के कार्य से जोड़ता है। यदि आपको हृदयाघात हुआ है, तो 911 पर फोन करना आपकी मुख्य चिकित्सा नहीं है। ये है, एम्बुलैन्स और उप-स्वास्थ्यकर्मी और सीपी. आर. और नर्सें और सर्जन और दवाईयाँ। 911 पर फोन करना, बचाव कार्य से मात्र संबंध है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने पाप से पश्चाताप् करना और यीशु पर विश्वास करना (सत्य- 6), के साथ इसी तरह है। मसीह में परमेश्वर के बचाने वाले कार्य के साथ, वो आपका संबंधन है। मसीह ने हमें बचाने के लिए 2000 साल पूर्व कुछ किया। ‘वह’ आया, ‘वह’ परमेश्वर की पुत्र के रूप में एक सिद्ध जीवन जिआ। और ‘वह’ उन सब के प्रतिस्थापन के रूप में मर गया जो ‘उस’ पर विश्वास करेंगे। 1पतरस 3:18, ‘‘मसीह ने भी, अर्थात् अधर्मियों के लिये धर्मी ने पापों के कारण एक बार दुःख उठाया, ताकि हमें परमेश्वर के पास पहुंचाए।’’ हमारा विश्वास, हमारे उद्धार के लिए आधार नहीं है। ये हमें हमारे उद्धार के आधार से जोड़ता है। मसीह, हमारे उद्धार का आधार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे दोषी ठहराये जाने के स्थान पर, ‘उसकी’ मृत्यु और दोषी ठहराया जाना; हमारे पाप और अपूर्णता के स्थान पर उसकी सिद्ध धार्मिकता। और हमारे उद्धार को वैध ठहराने और सुरक्षित करने और सदा-सदा के लिए हमारे आनन्द के लिए ‘उसका’ पुनरुत्थान। बाइबिल कहती है, ‘‘यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो … परन्तु सचमुच मसीह मुर्दों में से जी उठा है, और जो सो गए हैं, उन में पहिला फल हुआ’’ (1 कुरिन्थियों 15:17, 20)। चूंकि ‘वह’ हमारे लिए मरा और पुनः जी उठा, सभी जो ‘उस’ पर विश्वास करते हैं, उनके पास अनन्त जीवन और सदा-बढ़ता-हुआ आनन्द है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने जीवन के विषय में उस पर भरोसा कीजिये। आपके विवाह या कुंवारेपन के विषय में उस पर भरोसा रखिये। आपके व्यापार और आर्थिक स्थिति के विषय में ‘उस’ पर भरोसा कीजिये। आपके स्वास्थ्य के विषय में उस पर भरोसा कीजिये। और, इन सब के नीचे, अपने पाप और अपने दोष और अपने भय के विषय में ‘उस’ पर भरोसा कीजिये। बचाने के लिए ‘उसने’ पहिले की काम कर दिया है। ये पूरा हुआ है। ‘वह’ मर गया है और ‘वह’ जी उठा है। और ‘उस’ में विश्वास के द्वारा ‘उस’ का उद्धार आप का हो सकता है। और जब ये होता है, तब वो परिपूर्ण होता है कि आपको क्यों बनाया गया: आपके आनन्द में परमेश्वर की महिमा सदा-सर्वदा प्रतिबिम्बित हो।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>प्रार्थना में अर्पित रहो</title>
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				<updated>2017-06-22T20:06:30Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;प्रार्थना में अर्पित रहो&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Be Devoted to Prayer}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; … आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो … &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः इस संदेश में, मेरा सरल और मानवीय रूप से असम्भव लक्ष्य है कि आप सभी सन् 2003 में प्रार्थना में अर्पित/ लगे रहें। मेरा लक्ष्य ये है क्योंकि यही है जो बाइबिल हमें होने के लिए बुलाती है। रोमियों 12: 12 मेरा मूल-पाठ है, जो कि प्रोत्साहन की एक लम्बी श्रंखला का भाग है। ये कहता है कि हमें ‘‘आशा में आनन्दित; क्लेश में स्थिर; प्रार्थना में नित्य लगे रहना (प्रोसकार्टराउन्टेस) है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो सकता है कि आपका भाषान्तर/अनुवाद कहे, ‘‘प्रार्थना में स्थिर’’ या ‘‘प्रार्थना में विश्वासयोग्य।’’ वे सभी, शब्द के विभिन्न पक्षों तक पहुँचते हैं। ‘‘अर्पित,’’ एक अच्छा अनुवाद है। ये शब्द मरकुस 3: 9 में उपयोग किया गया है जहाँ ये कहता है, ‘‘उस ने {यीशु} अपने चेलों से कहा, भीड़ के कारण एक छोटी नाव मेरे लिये तैयार रहे (प्रोसकार्टेरे ) ताकि वे मुझे दबा न सकें।’’ एक नाव को अलग किया जाना था - अर्पित - इस उद्देश्य से कि यदि भीड़ एक ख़तरा बनती है, यीशु को दूर ले जावे। ‘‘अर्पित’’ - एक कार्य के लिए समर्पित, इसके लिए नियुक्त। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, नाव एक जगह स्थिर रहती है। किन्तु लोग इस तरह समर्पित नहीं हैं। जब ये शब्द एक व्यक्ति पर लागू होता है तो इसका अर्थ होता है न केवल पद व नियुक्ति के अर्थ में अर्पित या समर्पित अपितु नियत कार्य में कार्यशील, और इसमें तत्पर रहना। अतः उदाहरण के लिए रोमियों 13: 6 में पौलुस, सरकार की भूमिका के बारे में इस तरह बात करता है: ‘‘इसलिये कर भी दो, क्योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और सदा इसी काम में लगे {अर्पित} रहते हैं।’’ अर्थात्, वे परमेश्वर के द्वारा न केवल एक कार्य के लिए नियुक्त किये गए हैं, अपितु वे स्वयँ को इसमें दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस शब्द के बारे में जो बात ध्यान देने योग्य है वो ये कि नया नियम के इसके दस में से पाँच उपयोग, प्रार्थना पर लागू होते हैं। सुनिये, रोमियों 12: 12 के अतिरिक्त हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 1: 14 (यीशु के स्वर्गारोहण के पश्चात् जबकि चेले यरूशलेम में पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे), ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाईयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 2: 42 (यरूशलेम में आरम्भ में मसीही बने लोग), ‘‘वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन {अर्पित} रहे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 6: 4 (प्रेरितगण कहते हैं), ‘‘परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे {अर्पित} रहेंगे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुलुस्सियों 4: 2 (पौलुस हम सभी से कहता है), प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नया नियम के धर्म-शास्त्र लेखों से हम कह सकते हैं कि सामान्य मसीही जीवन, एक ऐसा जीवन है जो प्रार्थना में अर्पित है। अतः जब आप 2002 से 2003 में मुड़ते हैं, आपको पूछना चाहिए, ‘‘क्या में प्रार्थना में अर्पित हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका ये अर्थ नहीं कि वो सब जो आप करते हैं प्रार्थना है - एक पत्नी के प्रति अर्पित रहने का अर्थ इससे बढ़कर है कि जो कुछ भी पति करता है ये कि अपनी पत्नी से लिपटा रहे। अपितु उसके प्रति उसका अर्पण, उस पति के जीवन में सब कुछ को प्रभावित करता है और उसे बाध्य करता है कि स्वयँ को उसे (पत्नी को) विभिन्न तरीकों से दे दे। अतः प्रार्थना में अर्पित रहने का ये अर्थ नहीं कि सब जो आप करें वो है, प्रार्थना (यद्यपि पौलुस दूसरे स्थल पर यही कहता है, ‘‘निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,’’ 1 थिस्सलुनीकियों 5: 17)। इसका अर्थ है कि प्रार्थना करने का एक बनावट या ढाँचा होगा जो प्रार्थना में अर्पित प्रतीत होता हो। यह हर एक के लिए समान नहीं होगा। लेकिन ये कुछ अर्थपूर्ण होगा। प्रार्थना के प्रति अर्पित रहना, प्रार्थना के प्रति अर्पित न रहने से भिन्न दिखाई देता है। और परमेश्वर ये अन्तर जानता है। ‘वह’ हमें लेखा देने के लिए बुलायेगा: क्या हम प्रार्थना में अर्पित रहे हैं&amp;amp;nbsp;? क्या आपके जीवन में प्रार्थना करने का ऐसा नमूना है जिसे सच्चाई से ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ कहा जा सकता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि हम से अधिकतर लोग, कुछ ऐसे प्रकारों की प्रार्थनाएँ करने, जिसे ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं कहा जावेगा, पर सहमत होंगे। जैसे ही संकट आपकी जिन्दगी में प्रवेश करें तब प्रार्थना करना, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का नमूना नहीं होगा। केवल भोजन के समयों पर प्रार्थना करना एक प्रतिरूप है, लेकिन क्या यह पौलुस द्वारा ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ के कलीसिया को प्रोत्साहन से मेल खाती है। दिन के अन्त में एक संक्षिप्त प्रार्थना, ‘‘अब मैं सोने के लिए स्वयँ को डाल देता हूँ,’’ सम्भवतः ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। जबकि आपको पार्किंग की जगह चाहिए, कार के अन्दर ‘‘प्रभु मेरी सहायता कीजिये’’ प्रयास करना और असफल होना, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। वे सभी अच्छी हैं। लेकिन मैं सोचता हूँ कि हम सहमत होंगे कि मसीह के अनुयायियों से पौलुस कुछ और अधिक तथा भिन्न की अपेक्षा करता है जब वह कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब में हम ये न भूलें, जैसा कि हमने विगत सप्ताह देखा, कि मसीह का क्रूस - पापियों के स्थान में उसकी मृत्यु - सभी प्रार्थना की नींव है। '''क्यों''' या '''कैसे''' हम प्रार्थना करें का, कोई स्वीकार्य उत्तर नहीं होगा, यदि मसीह हमारे स्थान पर न मरा होता। इसीलिए हम ‘‘यीशु के नाम में’’ प्रार्थना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मैंने प्रार्थना की बाधाओं को तौला, ताकि मैं उन्हें सम्बोधित कर सकूँ, तो उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘क्यों प्रार्थना करें&amp;amp;nbsp;? और उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘'''कैसे''' प्रार्थना करें। आज प्रातः मैं '''कैसे''' पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ। ये बात नहीं है कि प्रश्न '''क्यों''' महत्वहीन है, किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें हमारे सभी धर्मशास्त्रीय उत्तर यथोचित मिल सकते हैं कि क्यों प्रार्थना करें और फिर भी हम प्रार्थना के जीवन में असावधान व लापरवाह हो सकते हैं। अतः मैं प्रश्न '''क्यों''' का एक संक्षिप्त उत्तर दूंगा, और फिर व्यावहारिक '''कैसे''' प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित करूंगा, जो, मैं प्रार्थना करता हूँ कि 2003 में आपको ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ के नये स्तरों का जोखि़म उठाने को उकसायेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना क्यों करें&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं तीन संक्षिप्त उतरों से आरम्भ करता हूँ कि हमें क्यों ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. बाइबिल हमें प्रार्थना करने के लिए कहती है और जो परमेश्वर कहता है, हमें करना चाहिए। कई अन्य मूल-पाठों के साथ ये मूल-पाठ कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ यदि हम अर्पित नहीं हैं, तो हम शास्त्रलेखों के प्रति अनाज्ञाकारी हैं। ये मूर्खतापूर्ण व ख़तरनाक है। यदि आपके लिए प्रार्थना करना सरल नहीं है, स्वयँ को हम शेष के साथ, सामान्यतः पाप में गिरा हुआ और पापमय समझें। तब लडि़ये। स्वयँ को उपदेश दीजिये। आपके पापों व दुर्बलताओं व सांसारिक झुकावों को आपके ऊपर शासन मत करने दीजिये। परमेश्वर कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो,’’ इसके लिए लडि़ये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. आपके अपने जीवन में, और आपके परिवार में, और इस चर्च व अन्य चर्चों में, और संसार में प्रचार के निमित्त, और हमारी संस्कृति में कुल मिलाकर आवश्यकताएँ विशाल व निराशाजनक हैं। अनेकों मामलों में स्वर्ग और नरक तराजू में झूलते हैं, विश्वास या अविश्वास, जीवन व मृत्यु। रोमियों 9:2 में, अपने नाश होते रिश्तेदारों के लिए पौलुस का शोक और मनोव्यथा स्मरण कीजिये, और याद कीजिये कि रोमियों 10:1 में वह उनके लिए ईमानदारी से प्रार्थना करता है, ‘‘हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उन के लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएं।’’ जब हम प्रार्थना करते हैं, उद्धार तराजू में झूलता है। प्रार्थना क्या है आप तब तक नहीं जानेंगे जब तक कि आप ये न जान लें कि जीवन युद्ध है। प्रार्थना करने में एक सबसे बड़ा अवरोध ये है कि हम में से अनेकों के लिए जीवन कुछ अधिक ही दिनचर्या के रूप से सरल है। युद्ध-भूमि वहाँ बाहर है, किन्तु यहाँ मेरे शांति व सन्तुष्टि के नन्हे बुलबुले में सब ठीक है। ओह काश कि परमेश्वर हमारी आँखों को खोले कि हम अपने चारों ओर की आवश्यकताओं को, और प्रार्थना की अन्तःशक्ति को, देखें और महसूस करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. प्रार्थना करने का तीसरा कारण है कि जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है। और परमेश्वर पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक कर सकता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं। ओह कैसे मैंने सालों-साल में ये सीखा है। संदेश की तैयारी के दौरान, या परामर्श के कुछ संकट के दौरान, या गवाही के कुछ वार्तालाप, या योजना बनाने की सभा में, अपने सिर को बार-बार झुकाना और परमेश्वर से याचना करना कितनी अद्भुत चीज है, और सफलता के बाद सफलता पाना जो तब तक नहीं आयी जब तक कि मैंने प्रार्थना नहीं की। कितना महत्वपूर्ण पाठ है कि तुरन्त काम में लग जाने के लिए चिड़चिड़ाना व अधीर महसूस करना क्योंकि मेरे पास इतना कुछ है करने के लिए कि मैं नहीं जानता कि इसे कैसे पूरा कर सकूंगा, लेकिन स्वयँ को बाइबिल-शास्त्रीय तथा विवेकी होने के लिए जोर देना और इससे पूर्व कि मैं काम करूँ, समय निकाल कर प्रार्थना करने के लिए अपने घुटनों पर जाना, और जबकि मैं अपने घुटनों पर हूँ, मेरे दिमाग में विचारों का लुड़कते हुए आना कि एक समस्या का सामना कैसे करूँ, या एक संदेश को आकार कैसे दूँ, या एक संकट से कैसे निपटें, या एक धर्मशास्त्रीय समस्या का समाधान करूँ - और इस तरह पाँच सैकेण्ड में क्या प्रकाशन मिला इसे समझने का प्रयास करते हुए अपने घण्टों-ब-घण्टों का काम और दीवाल पर अपना सिर मारने की हताशा से बचूँ&amp;amp;nbsp;! मेरा ये अर्थ नहीं है कि परमेश्वर हमें कठिन काम से बचाता है। मेरा अर्थ है कि तुलना में जितना आप इसे अकेले करते, प्रार्थना आपके काम को 5,000 गुना अधिक फलदायी बना सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और भी हैं, लेकिन क्यों प्रार्थना करें के ये तीन उत्तर हैं: 1) परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि प्रार्थना करें; 2) आवश्यकताएँ विराट हैं, और सनातन की चीजें दाँव पर हैं; 3) जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है और जो हम घण्टों या सप्ताहों या कभी-कभी सालों में करते, वो परमेश्वर बहुधा सैकेण्डों में उससे भी अधिक करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना के बारे में उत्तर दिये जाने के लिए, कई अन्य प्रष्न हैं जिन्हें मैं यहाँ नहीं ले सकता। इसी कारण ‘डिज़ायरिंग गॉड’ और ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’ और ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’ में प्रार्थना के ऊपर लम्बे अध्याय हैं और इसी कारण एक पूरी पुस्तक है जिसका नाम ‘ए हंगर फॉर गॉड’ है: डिज़ायरिंग गॉड थ्रू प्रेयर एण्ड फास्टिंग। विशेष रूप से यदि आप इस बारे में परेशान हैं कि लोगों के उद्धार के लिए प्रार्थना, कैसे बिनाशर्त चुनाव के साथ मेल खाती है, तो सीधे 217-220 पृष्ठों पर जाइये अथवा ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना कैसे करें ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज प्रातः के हमारे शेष समय के लिए मैं प्रार्थना के '''कैसे''' के विषय में बात करना चाहता हूँ। मैं आपको व्यावहारिक, बाइबिल-शास्त्रीय सम्भावनाओं के द्वारा प्रेरणा देने का प्रयास करना चाहता हूँ जिनका आपने कभी भी विचार नहीं किया होगा, या शायद प्रयास किया हो और फिर दृढ़ रहने में असफल हो गये होंगे - ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ में असफल। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक संकीर्ण मेरा-तरीका-या-उच्च-मानसिकता का तरीका के बिना, ये मेरा प्रयास है कि चित्रण कर सकूं कि प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का क्या अर्थ है। हम सब बहुत भिन्न हैं। हमारी दिनचर्या भिन्न हैं। हमारे परिवार भिन्न हैं। हमारे आज के दिनों की विभिन्न मांगों के साथ हम जिन्दगी के विभिन्न चरणों में हैं। हम आत्मिक परिपक्वता के विभिन्न स्तरों पर हैं, और कोई भी रातों-रात परिपक्व नहीं होता। प्रार्थना के प्रति आपके अर्पित रहने में आप जो विगत पाँच वर्षों से कर रहे होंगे, वो आपको पीछे देखने को विवश कर सकता है कि आप अचरज करें कि आप क्षीणता के इस मौसम में कैसे बने रहे। लेकिन हम सब आगे बढ़ सकते हैं। पौलुस अपनी कलीसियाओं को लिखना पसन्द करता है और कहता है, ‘‘तुम अच्छा कर रहे हो, किन्तु ऐसा ही और अधिक व अधिक करते जाओ’’ (फिलिप्पियों 1:9; 1थिस्सलुनिकियों 4:1, 10)। और यदि और कोई स्थल है जहाँ ‘‘ऐसा ही और भी अधिक करते रहो’’ लागू होता है, ये है प्रार्थना के प्रति हमारे अर्पण में। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ये व्यावहारिक सुझाव पाँच जोड़ों में रखूंगा, जिनमें से प्रत्येक एक भिन्न अंग्रेजी अक्षर से आरम्भ होता है, जो मिलकर ‘‘फेड्स (एफ ए डी ई एस)’’ की हिज्जे देगा। इस ‘‘फेड्स’’ शब्द का कोई अभिप्राय नहीं है। इनसे मात्र इसे ये हिज्जे बन जाता है। किन्तु यदि आप इस पर बल देना चाहते हैं, तो आप कह सकते हैं कि बिना इन जोड़ों के प्रार्थना के प्रति अर्पण ‘‘फेड’’ (धूमिल) हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे दिमाग में यहाँ संरचित व असंरचित प्रार्थना के बीच अन्तर है। प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो का अर्थ होगा कि आप अपनी प्रार्थना के समयों में जो कहते हैं वो बहुधा स्वतंत्र और असंरचित होगा, और बहुधा गढ़ा हुआ व संरचित होगा। यदि आप अपनी प्रार्थनाओं में केवल स्वच्छन्द हैं, सम्भवतः आप उथले और घिसे-पिटे बन जायेंगे। यदि आप अपनी प्रार्थना में केवल संरचित हैं, आप सम्भवतः यांत्रिक और खोखले बन जायेंगे। प्रार्थना करने के दोनों तरीके महत्वपूर्ण हैं। दोनों में से कोई एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वच्छन्द से मेरा अर्थ है कि आप नियमित रूप से अपनी आत्मा परमेश्वर के समक्ष उण्डेलना चाहेंगे और आप ऐसा करेंगे। आप कोई लिखित कथन या दिशा-निर्देश या सूचियाँ या पुस्तकें नहीं चाहेंगे। आपकी इतनी सारी आवश्यकताएँ होंगी कि वे स्वच्छन्द रूप से बिना किसी पूर्व-निर्धारित रूप में लुड़कती चली आती हैं। ये अच्छा है। इसके बिना ये संदेहास्पद है कि मसीह के साथ हमारा कोई सच्चा सम्बन्ध भी है। क्या आप वास्तव में एक विवाह या मित्रता की कल्पना कर सकते हैं जहाँ सभी वार्तालाप सूची या पुस्तकों से पढ़ा जाता है या केवल रटे-रटाये शब्दों में कहा जाता है। ये चरम बनावटी होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी ओर, मैं आपसे याचना करता हूँ कि ये न सोचें कि आप आत्मिक रूप से इतने गहरे या उपायकुशल या समृद्ध या अनुशासित हैं कि आप बिना रचनाओं की सहायता के कर सकते हैं। मेरे दिमाग में चार प्रकार की रचनाएँ हैं जो मैं आशा करता हूँ कि आप सभी उपयोग करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-1. बाइबिल।''' बाइबिल प्रार्थना कीजिये। बाइबिल-शास्त्रीय प्रार्थना कीजिये। इस सप्ताह हम हमारी प्रार्थनाओं को इफिसियों 3: 14-19 में दी गई प्रार्थना के चारों ओर निर्मित कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं इसी कारण उस पिता के साम्हने घुटने टेकता हूं, 15 जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है । 16 कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे, कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ पाकर बलवन्त होते जाओ। 17 और विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नेव डाल कर। 18 सब पवित्र लोगों के साथ भली भांति समझने की शक्ति पाओ&amp;amp;nbsp;; कि उसकी चैड़ाई, और लम्बाई, और ऊंचाई, और गहराई कितनी है। 19 और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कण्ठस्थ कर लीजिये और अक्सर इसे प्रार्थना कीजिये। प्रभु की प्रार्थना कीजिये और जब आप इसे प्रार्थना करते हैं, प्रत्येक वाक्यांश को अपने शब्दों में रखिये और उन लोगों पर लागू कीजिये जिनके बारे में आपको बोझ है। बाइबिल की आज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ परमेश्वर, आपको, मेरे सारे मन और मेरे सारे प्राण और मेरी सारी बुद्धि के साथ प्रेम करने के लिए मेरी सहायता कीजिये, मेरी पत्नी की, मेरे बच्चों की, अध्यक्षों की, हमारे धर्म-प्रचारकों/सुसमाचार-प्रचारकों की सहायता कीजिये।’’ बाइबिल की प्रतिज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘हे प्रभु, स्वर्ग में और पृथ्वी पर सारा अधिकार जो आपका है, उसे लीजिये और हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों को उस प्रतिज्ञा की मिठास का बोध होने दीजिये कि आप उनके संग जगत के अन्त तक रहेंगे।’’ बाइबिल की चेतावनियों को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ प्रभु, उस अत्यावश्यकता के प्रकार के साथ मुझे कुदृष्टि से लड़ने की सामर्थ दीजिये जो आपने सिखाया, जब आपने कहा, अपनी आंख निकाल कर फेंक दे और स्वर्ग में प्रवेश कर, बनिस्बत कि इसे भला-चंगा रहने दे और नरक में जाये।’’ अपने सम्मुख बाइबिल खोलिये और एक कोहनी एक ओर और एक दूसरी ओर टेकिये और प्रत्येक पैराग्राफ/अनुच्छेद को पश्चाताप् में या स्तुति में या धन्यवाद में या बिनती में, प्रार्थना कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-2. सूचियाँ।''' सूचियों को लेकर प्रार्थना कीजिये। मेरे दिमाग में लोगों की सूचियाँ हैं जिनके लिए प्रार्थना करना है और आवश्यकताओं की सूचियाँ हैं जिनके बारे में प्रार्थना करना है। यदि आप सभी लोगों को और आवश्यकताओं को याद रख सकते हैं, आपको बिना सूची के प्रार्थना करना चाहिए, आप परमेश्वर हैं। मेरे पास अवश्य ही सूचियाँ होना चाहिए, कुछ मेरे सिर में और कुछ कागज पर। मैंने लगभग 70 लोगों को कण्ठस्थ कर लिया है जिनके लिए मैं नाम लेकर प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ। लेकिन उसमें उन लोगों की सूची सम्मिलित नहीं है जो पुरोहिताश्रम में मिशन्स में आये थे, जिनके लिए मैं और ‘नोएल’ हर रात्रि एक लिखित सूची से प्रार्थना करते हैं। इसमें हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों की सूची सम्मिलित नहीं है जो मैं एक सूची में से पढ़ता हूँ। और ये तो मात्र लोग हैं, उनकी आवश्यकताओं का कोई उल्लेख नहीं जो मेरे अपने प्राण में और मेरे परिवार में और चर्च में और संसार में सप्ताह-ब-सप्ताह बदल जाती हैं। अतः मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि लोगों की सूचियों और आवश्यकताओं की सूचियों का उपयोग करें। किसी प्रकार की प्रार्थना पुस्तिका या नोटबुक या अपने हाथ के छोटे कम्प्यूटर में फाइलें रखिये। याद रखिये, मैं इस जोड़े: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई के मात्र द्वितीय-अर्द्ध के बारे में बात कर रहा हूँ। स्वच्छन्दता का मूल्य मत भूलिये। ये दोनों-और, है, दोनों में से एक-अथवा, नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-3. पुस्तकें।''' पुस्तकें जैसे कि ‘ऑपरेशन वल्र्ड’ से, प्रतिदिन या दो दिन में, एक भिन्न देश के लिए और इसमें मसीह के आन्दोलन के लिए प्रार्थना कीजिये। भूमण्डल-आकार का हृदय और परमेश्वर की सर्वोच्चता का दर्शन पाने का कितना ताकतवर तरीका है&amp;amp;nbsp;! ‘एक्सट्रीम डिवोशन’ जैसी पुस्तक से प्रार्थना कीजिये - वर्ष के हर एक दिन के लिए दुःख उठाती, सतायी जाती कलीसिया के लिए। मेरी पुस्तक लीजिये, ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’, और पृष्ठ 57-62 पलटिये ओर उन 36 चीजों से प्रार्थना कीजिये जो आरम्भिक कलीसिया ने एक-दूसरे के लिए प्रार्थना किया। ‘वैली ऑफ विज़न्स’ लीजिये, प्यूरिटन की प्रार्थनाओं की एक पुस्तक, और वो प्रार्थना कीजिये जो भूतकाल के महान् सन्तों ने प्रार्थना की है। हम ये सोचने में इतने मूर्ख हैं कि ये हम पर छोड़ दिया गया है कि वो सब जो बाइबिल कहती है और सभी आवश्यकताएँ जिनके लिए प्रार्थना करना है, बिना अच्छी पुस्तकों की सहायता के, हम देख लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-4. रूपरेखा।''' प्रार्थना की रूपरेखा या ढाँचा विकसित कीजिये कि जब आप अपने घुटनों पर आते हैं वे आपको कुछ मार्गदर्शन दें कि पहिला और दूसरा और तीसरा क्या करें। एक नमूना रहेगा, जैसा कि मैं पहिले कह चुका हूँ, प्रभु की प्रार्थना के प्रत्येक निवेदन के चारों ओर अपनी प्रार्थना को संरचित करें। एक नमूना जिसका मैं यर्थाथ में प्रतिदिन उपयोग करता हूँ, वो नमूना है, संकेन्द्रित परिक्रमाएँ, मेरे अपने प्राण से आरम्भ करके - जो मैं अनुभूति करता हूँ कि पाप है और सर्वाधिक प्रखर आवश्यकताएँ - अपने परिवार की ओर बढ़ते हुए, और फिर पासवान्-स्टाफ तथा अध्यक्षगण, फिर सम्पूर्ण चर्च-स्टाफ, फिर हमारे धर्म-प्रचारक, और फिर मसीह की विस्तृत देह में सामान्य आवश्यकताएँ और मिशनों व संस्कृति में मसीह का आन्दोलन। इस प्रकार के बिना किसी रचना या ढाँचे के मैं ठंडा पड़ने और दिशाहीन होने लगता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पहिला जोड़ा है स्वच्छन्द व गढ़ी हुई। स्वतंत्र प्रवाह के साथ आवश्यकताओं व धन्यवाद व स्तुति के द्वारा असंरचित&amp;amp;nbsp;; और बाइबिल, सूचियों, पुस्तकों व रूपरेखाओं के द्वारा संरचित। यदि आप ‘‘प्रार्थना में अर्पित’’ हैं, आप अपने प्रार्थना के जीवन में स्वच्छन्द व गढ़ी हुई का अनुसरण करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ए - (अलोन एण्ड असेम्बिल्ड) अकेले और एकत्र''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना में अर्पित का अर्थ होगा कि आप नियमित रूप से अकेले प्रार्थना करेंगे और नियमित रूप से अन्य मसीहियों की सभा में प्रार्थना करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओह, ये कितना महत्वपूर्ण है कि हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से अकेले मिलते हैं। यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर में एक व्यक्तिगत भरोसे और संगति के बिना कोई मसीहियत है ही नहीं। इसके सिवाय सब दिखावा और भूसी और आडम्बर है। अपने 16 बच्चों के साथ ‘सुसाना वेस्ली’, रसोई में अपना एप्रन/आँचल सिर के ऊपर ले लिया करती थी और सभी बच्चों ने ये सीख लिया था कि इसका अर्थ है रसोई में शान्ति। बच्चों को ये सीखने की आवश्यकता है कि मम्मी और डैडी, यीशु के साथ समय बिताते हैं जो पवित्र हैं और उन्हें बाधा नहीं पहुँचाना है। स्थान खोजिये, समय को योजित कीजिये, बच्चों को अनुशासन सिखाइये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन मैं सोचता हूँ कि अन्य विश्वासियों की सभा में प्रार्थना करना, अकेले प्रार्थना करने से, अधिक अनदेखा किया जाता है। अकेले और एकत्र। नया नियम, सामूहिक प्रार्थना के लिए एकत्र होने से, भरा पड़ा है। वास्तव में नया नियम में अधिकांश प्रार्थना, सम्भवतः प्रार्थना के लिए एकत्र होने के सम्बन्ध में विचारित की गई हैं। प्रेरित 1:14, ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाइयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे’’ - ये एक नमूना है जो आप पाते हैं। प्रेरित 12:12, जब पतरस बन्दीगृह से बाहर आया, ‘‘वह उस यूहन्ना की माता मरियम के घर आया, जो मरकुस कहलाता है&amp;amp;nbsp;; वहां बहुत लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर रहे थे।’’ आरम्भिक कलीसिया में प्रार्थना सभाएँ स्वाभाविक और मैं सोचता हूँ नियामक थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया नियम में, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने में, निश्चित ही परमेश्वर के लोगों के साथ प्रार्थना करना सम्मिलित था। आप इसमें कैसे हैं&amp;amp;nbsp;? ये उन्नत मसीहियत नहीं है। ये बुनियादी मसीहियत है। इस सप्ताह हमने बारह 30-मिनिट की प्रार्थना की योजना की है, साथ ही शुक्रवार की पूरी रात्रि में आठ घण्टों की प्रार्थना। विकल्प इसलिए हैं कि एक नये भेदन बनाने में आपकी सहायता हो। शेष वर्ष के दौरान, प्रत्येक सप्ताह, छः सुबह, 30-मिनिट की प्रार्थना सभाएँ हैं। बुद्धवार की संध्या 5: 45 पर, शहर के मुख्य स्थल पर। फिर छोटे समूह हैं जो प्रार्थना और सेवकाई के लिए इकट्ठे होते हैं। फिर रविवार की सुबह है जिसमें गीत में व अन्य प्रकारों से प्रार्थना सम्मिलित है। यदि प्रार्थना के लिए एकत्र होना, प्रार्थना के लिए आपके अर्पित होने का हिस्सा नहीं है, 2003 को एक भेदन का वर्ष बनाइये। दोनों-और: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई, अकेले व एकत्र। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ड - (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना में अर्पित रहने का अर्थ होगा कि आप प्रार्थना में परमेश्वर के पास, बहुधा निराशा से भरे और बहुधा प्रसन्न आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा मात्र ये अर्थ है कि प्रार्थना, आपकी गहरी मनोव्यथाओं और भय के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है, और प्रार्थना, आपके उच्चतम आनन्दों तथा धन्यवादों के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है। जब आप प्रतिदिन ‘पिता’ के समक्ष घुटने टेकते हैं, वो तकिया जिसे आप अपनी कुहनियों को टेकने के लिए उपयोग करते हैं, आँसुओं से दाग़दार तकिया होगी। और फिर भी, चूंकि परमेश्वर, एक प्रार्थना-सुननेवाला परमेश्वर है, आप प्रेरित पौलुस के साथ कहेंगे, ‘‘शोक करनेवाले के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं (2 कुरिन्थियों 6: 10)। और बहुधा वो आनन्द, इस पतित संसार के बोझों को दबा देगा - जैसा कि इसे करना चाहिए - और आपको आनन्द से उछलने को प्रेरित करेगा। ‘पिता’ आपसे उन समयों में भी मिलना चाहता है। निराशा की दशा में और आनन्द की दशा में - उपवास में और भोज में, प्रार्थना में अर्पित रहिये। दोनों में से एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ई - (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा कुल अर्थ है, संक्षिप्त और लम्बा। मैं संक्षिप्त और लम्बा कह सकता था, किन्तु अक्षर मेल नहीं खाते और परिवर्णी शब्द कुछ भी हिज्जे नहीं करते। इसके अलावा विस्फोटक शब्द, अधिक स्पष्ट है और ठीक वो है जो समय-समय पर प्रार्थना हो सकती है। यदि आप प्रार्थना में अर्पित हैं, आप नियमित रूप से स्तुति और धन्यवाद और आवश्यकताओं की प्रार्थनाओं के साथ विस्फोट करेंगें और वे कुछ सैकेण्डों से अधिक बने नहीं रहेंगे। और यदि आप प्रार्थना के लिए अर्पित हैं, ऐसे समय होंगे जब आप प्रभु के साथ प्रार्थना में एक लम्बे समय तक लगे रहते हैं। कभी-कभी मैं ‘नोएल’ को एक संक्षिप्त फोन करता हूँ और अन्य समयों पर हम एक संध्या साथ बिताते हैं। यदि आप मसीह से प्रेम करते हैं और सब चीजों के लिए ‘उस’ पर टिकाव लेते हैं और सभी चीजों से ऊपर ‘उसे’ संजोते हैं, आप ‘उसके’ साथ बहुधा विस्फोटक प्रार्थनाओं के साथ और बहुधा विस्तृत प्रार्थनाओं के साथ मिलेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एस - (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें और ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ में अथवा ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ में क्या अन्तर है&amp;amp;nbsp;? ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की विषय-वस्तु - जब हम प्रार्थना के लिए आते हैं, हम क्या करते हैं। ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की लम्बाई। स्वेच्छित और निर्धारित से मेरा तात्पर्य है, हम कब प्रार्थना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम प्रार्थना में अर्पित हैं, हम पूरे दिन के दौरान स्वेच्छा से प्रार्थना करेंगे - निरन्तर, जैसा कि पौलुस कहता है – मसीह के साथ एक निरन्तर संगति की भावना, पवित्र-आत्मा के द्वारा चलते हुए और अपने जीवन में ‘उसे’ एक निरन्तर व्यक्तिगत उपस्थिति के रूप में जानते हुए। जब आप ‘उससे’ बातें करते हैं तब कोई योजना नियंत्रित नहीं करेगी। दिन भर में यह दर्जनों बार होगा। ये सामान्य व अच्छा है। ये है प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन यदि आपके पास मात्र ये है, ये आपके पास बहुत देर तक नहीं रहेगा। स्वेच्छितता का सच्चा रस से भरा फल, उस बगीचे में विकसित होता है जिसकी, निर्धारण के अनुशासन द्वारा भलिभांति देखभाल की जाती है। अतः मैं आपसे याचना करता हूँ, प्रार्थना के अपने समय निर्धारित कीजिये। 2003 के लिए इसकी योजना बनाइये। आप कब ‘उससे’ नियमित रूप से मिलेंगे&amp;amp;nbsp;? कितनी देर तक आप ठहरेंगे&amp;amp;nbsp;? मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रतिदिन का आरम्भ इस तरह करें। क्या आप तैयार हैं कि एक दिन या दो आधे-दिवस या दिवसों की योजना बनायें कि आप स्वयँ या एक मित्र के साथ या अपने पति/पत्नी के साथ अलग रहेंगे - एक पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं अपितु 4 घण्टे या आठ घण्टे प्रार्थना करने के लिए&amp;amp;nbsp;? कैसे&amp;amp;nbsp;? मात्र अपनी बाइबिल पढ़ने और इसे पूरी प्रार्थना में बदल देने के द्वारा। बाइबिल की एक छोटी पुस्तक लेने और एक अध्याय पढ़ने और फिर ठहरकर उस अध्याय को हमारे परिवार तथा चर्च में प्रार्थना करने के द्वारा, ‘नोएल’ और मेरे पास, हमारे कुछ सबसे समृद्ध दिन रहे हैं। इसके बाद एक और अध्याय पढ़ना और प्रार्थना करना, और इसी प्रकार करते रहना। लेकिन ये अपने आप नहीं होता। इसे सुनियोजित किया जाना आवश्यक है। ये स्वेच्छित नहीं है। ये संरचित है। और ये महिमापूर्ण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सो अब आप समझ गये। आज हमारे लिए परमेश्वर का वचन है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ इसमें स्थिर रहिये। इसमें ईमानदार रहिये। क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि परमेश्वर हमें ऐसा करने की आज्ञा देता है&amp;amp;nbsp;; आवश्यकताएँ विराट हैं और सनातनकाल तराजू में झूल रहा है&amp;amp;nbsp;; और इसलिए कि परमेश्वर सुनता और पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक करता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हम प्रार्थना में कैसे अर्पित रहें&amp;amp;nbsp;? ये चीजें। बिना उनके प्रार्थना (फेड) धूमिल पड़ जाती है। आपकी प्रार्थना हो … &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई''''' ए – (अलोन एण्ड असेम्बल्ड) अकेले और एकत्र ड – (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न ई – (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत एस – (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु आपको प्रार्थना के इस सप्ताह में और सारे वर्ष भर में, अनुग्रह और बिनती का आत्मा दे।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>प्रार्थना में अर्पित रहो</title>
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				<updated>2017-06-22T20:06:06Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Be Devoted to Prayer}}   &amp;amp;gt; … आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थन...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Be Devoted to Prayer}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; … आशा में आनन्दित रहो; क्लेश में स्थिर रहो; प्रार्थना में नित्य लगे रहो … &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः इस संदेश में, मेरा सरल और मानवीय रूप से असम्भव लक्ष्य है कि आप सभी सन् 2003 में प्रार्थना में अर्पित/ लगे रहें। मेरा लक्ष्य ये है क्योंकि यही है जो बाइबिल हमें होने के लिए बुलाती है। रोमियों 12: 12 मेरा मूल-पाठ है, जो कि प्रोत्साहन की एक लम्बी श्रंखला का भाग है। ये कहता है कि हमें ‘‘आशा में आनन्दित; क्लेश में स्थिर; प्रार्थना में नित्य लगे रहना (प्रोसकार्टराउन्टेस) है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हो सकता है कि आपका भाषान्तर/अनुवाद कहे, ‘‘प्रार्थना में स्थिर’’ या ‘‘प्रार्थना में विश्वासयोग्य।’’ वे सभी, शब्द के विभिन्न पक्षों तक पहुँचते हैं। ‘‘अर्पित,’’ एक अच्छा अनुवाद है। ये शब्द मरकुस 3: 9 में उपयोग किया गया है जहाँ ये कहता है, ‘‘उस ने {यीशु} अपने चेलों से कहा, भीड़ के कारण एक छोटी नाव मेरे लिये तैयार रहे (प्रोसकार्टेरे ) ताकि वे मुझे दबा न सकें।’’ एक नाव को अलग किया जाना था - अर्पित - इस उद्देश्य से कि यदि भीड़ एक ख़तरा बनती है, यीशु को दूर ले जावे। ‘‘अर्पित’’ - एक कार्य के लिए समर्पित, इसके लिए नियुक्त। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, नाव एक जगह स्थिर रहती है। किन्तु लोग इस तरह समर्पित नहीं हैं। जब ये शब्द एक व्यक्ति पर लागू होता है तो इसका अर्थ होता है न केवल पद व नियुक्ति के अर्थ में अर्पित या समर्पित अपितु नियत कार्य में कार्यशील, और इसमें तत्पर रहना। अतः उदाहरण के लिए रोमियों 13: 6 में पौलुस, सरकार की भूमिका के बारे में इस तरह बात करता है: ‘‘इसलिये कर भी दो, क्योंकि वे परमेश्वर के सेवक हैं, और सदा इसी काम में लगे {अर्पित} रहते हैं।’’ अर्थात्, वे परमेश्वर के द्वारा न केवल एक कार्य के लिए नियुक्त किये गए हैं, अपितु वे स्वयँ को इसमें दे रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस शब्द के बारे में जो बात ध्यान देने योग्य है वो ये कि नया नियम के इसके दस में से पाँच उपयोग, प्रार्थना पर लागू होते हैं। सुनिये, रोमियों 12: 12 के अतिरिक्त हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 1: 14 (यीशु के स्वर्गारोहण के पश्चात् जबकि चेले यरूशलेम में पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने की प्रतीक्षा कर रहे थे), ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाईयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 2: 42 (यरूशलेम में आरम्भ में मसीही बने लोग), ‘‘वे प्रेरितों से शिक्षा पाने, और संगति रखने में और रोटी तोड़ने में और प्रार्थना करने में लौलीन {अर्पित} रहे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*प्रेरित 6: 4 (प्रेरितगण कहते हैं), ‘‘परन्तु हम तो प्रार्थना में और वचन की सेवा में लगे {अर्पित} रहेंगे।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*कुलुस्सियों 4: 2 (पौलुस हम सभी से कहता है), प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो, और धन्यवाद के साथ उस में जागृत रहो।’’&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नया नियम के धर्म-शास्त्र लेखों से हम कह सकते हैं कि सामान्य मसीही जीवन, एक ऐसा जीवन है जो प्रार्थना में अर्पित है। अतः जब आप 2002 से 2003 में मुड़ते हैं, आपको पूछना चाहिए, ‘‘क्या में प्रार्थना में अर्पित हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका ये अर्थ नहीं कि वो सब जो आप करते हैं प्रार्थना है - एक पत्नी के प्रति अर्पित रहने का अर्थ इससे बढ़कर है कि जो कुछ भी पति करता है ये कि अपनी पत्नी से लिपटा रहे। अपितु उसके प्रति उसका अर्पण, उस पति के जीवन में सब कुछ को प्रभावित करता है और उसे बाध्य करता है कि स्वयँ को उसे (पत्नी को) विभिन्न तरीकों से दे दे। अतः प्रार्थना में अर्पित रहने का ये अर्थ नहीं कि सब जो आप करें वो है, प्रार्थना (यद्यपि पौलुस दूसरे स्थल पर यही कहता है, ‘‘निरन्तर प्रार्थना में लगे रहो,’’ 1 थिस्सलुनीकियों 5: 17)। इसका अर्थ है कि प्रार्थना करने का एक बनावट या ढाँचा होगा जो प्रार्थना में अर्पित प्रतीत होता हो। यह हर एक के लिए समान नहीं होगा। लेकिन ये कुछ अर्थपूर्ण होगा। प्रार्थना के प्रति अर्पित रहना, प्रार्थना के प्रति अर्पित न रहने से भिन्न दिखाई देता है। और परमेश्वर ये अन्तर जानता है। ‘वह’ हमें लेखा देने के लिए बुलायेगा: क्या हम प्रार्थना में अर्पित रहे हैं&amp;amp;nbsp;? क्या आपके जीवन में प्रार्थना करने का ऐसा नमूना है जिसे सच्चाई से ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ कहा जा सकता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि हम से अधिकतर लोग, कुछ ऐसे प्रकारों की प्रार्थनाएँ करने, जिसे ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं कहा जावेगा, पर सहमत होंगे। जैसे ही संकट आपकी जिन्दगी में प्रवेश करें तब प्रार्थना करना, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का नमूना नहीं होगा। केवल भोजन के समयों पर प्रार्थना करना एक प्रतिरूप है, लेकिन क्या यह पौलुस द्वारा ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ के कलीसिया को प्रोत्साहन से मेल खाती है। दिन के अन्त में एक संक्षिप्त प्रार्थना, ‘‘अब मैं सोने के लिए स्वयँ को डाल देता हूँ,’’ सम्भवतः ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। जबकि आपको पार्किंग की जगह चाहिए, कार के अन्दर ‘‘प्रभु मेरी सहायता कीजिये’’ प्रयास करना और असफल होना, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ नहीं है। वे सभी अच्छी हैं। लेकिन मैं सोचता हूँ कि हम सहमत होंगे कि मसीह के अनुयायियों से पौलुस कुछ और अधिक तथा भिन्न की अपेक्षा करता है जब वह कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सब में हम ये न भूलें, जैसा कि हमने विगत सप्ताह देखा, कि मसीह का क्रूस - पापियों के स्थान में उसकी मृत्यु - सभी प्रार्थना की नींव है। '''क्यों''' या '''कैसे''' हम प्रार्थना करें का, कोई स्वीकार्य उत्तर नहीं होगा, यदि मसीह हमारे स्थान पर न मरा होता। इसीलिए हम ‘‘यीशु के नाम में’’ प्रार्थना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मैंने प्रार्थना की बाधाओं को तौला, ताकि मैं उन्हें सम्बोधित कर सकूँ, तो उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘क्यों प्रार्थना करें&amp;amp;nbsp;? और उनमें से कुछ इस प्रश्न के अन्तर्गत आते हैं, ‘‘'''कैसे''' प्रार्थना करें। आज प्रातः मैं '''कैसे''' पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ। ये बात नहीं है कि प्रश्न '''क्यों''' महत्वहीन है, किन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि हमें हमारे सभी धर्मशास्त्रीय उत्तर यथोचित मिल सकते हैं कि क्यों प्रार्थना करें और फिर भी हम प्रार्थना के जीवन में असावधान व लापरवाह हो सकते हैं। अतः मैं प्रश्न '''क्यों''' का एक संक्षिप्त उत्तर दूंगा, और फिर व्यावहारिक '''कैसे''' प्रश्नों पर ध्यान केन्द्रित करूंगा, जो, मैं प्रार्थना करता हूँ कि 2003 में आपको ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ के नये स्तरों का जोखि़म उठाने को उकसायेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना क्यों करें&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं तीन संक्षिप्त उतरों से आरम्भ करता हूँ कि हमें क्यों ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना’’ चाहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. बाइबिल हमें प्रार्थना करने के लिए कहती है और जो परमेश्वर कहता है, हमें करना चाहिए। कई अन्य मूल-पाठों के साथ ये मूल-पाठ कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ यदि हम अर्पित नहीं हैं, तो हम शास्त्रलेखों के प्रति अनाज्ञाकारी हैं। ये मूर्खतापूर्ण व ख़तरनाक है। यदि आपके लिए प्रार्थना करना सरल नहीं है, स्वयँ को हम शेष के साथ, सामान्यतः पाप में गिरा हुआ और पापमय समझें। तब लडि़ये। स्वयँ को उपदेश दीजिये। आपके पापों व दुर्बलताओं व सांसारिक झुकावों को आपके ऊपर शासन मत करने दीजिये। परमेश्वर कहता है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो,’’ इसके लिए लडि़ये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. आपके अपने जीवन में, और आपके परिवार में, और इस चर्च व अन्य चर्चों में, और संसार में प्रचार के निमित्त, और हमारी संस्कृति में कुल मिलाकर आवश्यकताएँ विशाल व निराशाजनक हैं। अनेकों मामलों में स्वर्ग और नरक तराजू में झूलते हैं, विश्वास या अविश्वास, जीवन व मृत्यु। रोमियों 9:2 में, अपने नाश होते रिश्तेदारों के लिए पौलुस का शोक और मनोव्यथा स्मरण कीजिये, और याद कीजिये कि रोमियों 10:1 में वह उनके लिए ईमानदारी से प्रार्थना करता है, ‘‘हे भाइयो, मेरे मन की अभिलाषा और उन के लिये परमेश्वर से मेरी प्रार्थना है, कि वे उद्धार पाएं।’’ जब हम प्रार्थना करते हैं, उद्धार तराजू में झूलता है। प्रार्थना क्या है आप तब तक नहीं जानेंगे जब तक कि आप ये न जान लें कि जीवन युद्ध है। प्रार्थना करने में एक सबसे बड़ा अवरोध ये है कि हम में से अनेकों के लिए जीवन कुछ अधिक ही दिनचर्या के रूप से सरल है। युद्ध-भूमि वहाँ बाहर है, किन्तु यहाँ मेरे शांति व सन्तुष्टि के नन्हे बुलबुले में सब ठीक है। ओह काश कि परमेश्वर हमारी आँखों को खोले कि हम अपने चारों ओर की आवश्यकताओं को, और प्रार्थना की अन्तःशक्ति को, देखें और महसूस करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. प्रार्थना करने का तीसरा कारण है कि जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है। और परमेश्वर पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक कर सकता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं। ओह कैसे मैंने सालों-साल में ये सीखा है। संदेश की तैयारी के दौरान, या परामर्श के कुछ संकट के दौरान, या गवाही के कुछ वार्तालाप, या योजना बनाने की सभा में, अपने सिर को बार-बार झुकाना और परमेश्वर से याचना करना कितनी अद्भुत चीज है, और सफलता के बाद सफलता पाना जो तब तक नहीं आयी जब तक कि मैंने प्रार्थना नहीं की। कितना महत्वपूर्ण पाठ है कि तुरन्त काम में लग जाने के लिए चिड़चिड़ाना व अधीर महसूस करना क्योंकि मेरे पास इतना कुछ है करने के लिए कि मैं नहीं जानता कि इसे कैसे पूरा कर सकूंगा, लेकिन स्वयँ को बाइबिल-शास्त्रीय तथा विवेकी होने के लिए जोर देना और इससे पूर्व कि मैं काम करूँ, समय निकाल कर प्रार्थना करने के लिए अपने घुटनों पर जाना, और जबकि मैं अपने घुटनों पर हूँ, मेरे दिमाग में विचारों का लुड़कते हुए आना कि एक समस्या का सामना कैसे करूँ, या एक संदेश को आकार कैसे दूँ, या एक संकट से कैसे निपटें, या एक धर्मशास्त्रीय समस्या का समाधान करूँ - और इस तरह पाँच सैकेण्ड में क्या प्रकाशन मिला इसे समझने का प्रयास करते हुए अपने घण्टों-ब-घण्टों का काम और दीवाल पर अपना सिर मारने की हताशा से बचूँ&amp;amp;nbsp;! मेरा ये अर्थ नहीं है कि परमेश्वर हमें कठिन काम से बचाता है। मेरा अर्थ है कि तुलना में जितना आप इसे अकेले करते, प्रार्थना आपके काम को 5,000 गुना अधिक फलदायी बना सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और भी हैं, लेकिन क्यों प्रार्थना करें के ये तीन उत्तर हैं: 1) परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि प्रार्थना करें; 2) आवश्यकताएँ विराट हैं, और सनातन की चीजें दाँव पर हैं; 3) जब हम प्रार्थना करते हैं, परमेश्वर कार्य करता है और जो हम घण्टों या सप्ताहों या कभी-कभी सालों में करते, वो परमेश्वर बहुधा सैकेण्डों में उससे भी अधिक करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना के बारे में उत्तर दिये जाने के लिए, कई अन्य प्रष्न हैं जिन्हें मैं यहाँ नहीं ले सकता। इसी कारण ‘डिज़ायरिंग गॉड’ और ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’ और ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’ में प्रार्थना के ऊपर लम्बे अध्याय हैं और इसी कारण एक पूरी पुस्तक है जिसका नाम ‘ए हंगर फॉर गॉड’ है: डिज़ायरिंग गॉड थ्रू प्रेयर एण्ड फास्टिंग। विशेष रूप से यदि आप इस बारे में परेशान हैं कि लोगों के उद्धार के लिए प्रार्थना, कैसे बिनाशर्त चुनाव के साथ मेल खाती है, तो सीधे 217-220 पृष्ठों पर जाइये अथवा ‘द प्लैज़र्स ऑफ गॉड’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना कैसे करें ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज प्रातः के हमारे शेष समय के लिए मैं प्रार्थना के '''कैसे''' के विषय में बात करना चाहता हूँ। मैं आपको व्यावहारिक, बाइबिल-शास्त्रीय सम्भावनाओं के द्वारा प्रेरणा देने का प्रयास करना चाहता हूँ जिनका आपने कभी भी विचार नहीं किया होगा, या शायद प्रयास किया हो और फिर दृढ़ रहने में असफल हो गये होंगे - ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो’’ में असफल। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक संकीर्ण मेरा-तरीका-या-उच्च-मानसिकता का तरीका के बिना, ये मेरा प्रयास है कि चित्रण कर सकूं कि प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने का क्या अर्थ है। हम सब बहुत भिन्न हैं। हमारी दिनचर्या भिन्न हैं। हमारे परिवार भिन्न हैं। हमारे आज के दिनों की विभिन्न मांगों के साथ हम जिन्दगी के विभिन्न चरणों में हैं। हम आत्मिक परिपक्वता के विभिन्न स्तरों पर हैं, और कोई भी रातों-रात परिपक्व नहीं होता। प्रार्थना के प्रति आपके अर्पित रहने में आप जो विगत पाँच वर्षों से कर रहे होंगे, वो आपको पीछे देखने को विवश कर सकता है कि आप अचरज करें कि आप क्षीणता के इस मौसम में कैसे बने रहे। लेकिन हम सब आगे बढ़ सकते हैं। पौलुस अपनी कलीसियाओं को लिखना पसन्द करता है और कहता है, ‘‘तुम अच्छा कर रहे हो, किन्तु ऐसा ही और अधिक व अधिक करते जाओ’’ (फिलिप्पियों 1:9; 1थिस्सलुनिकियों 4:1, 10)। और यदि और कोई स्थल है जहाँ ‘‘ऐसा ही और भी अधिक करते रहो’’ लागू होता है, ये है प्रार्थना के प्रति हमारे अर्पण में। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं ये व्यावहारिक सुझाव पाँच जोड़ों में रखूंगा, जिनमें से प्रत्येक एक भिन्न अंग्रेजी अक्षर से आरम्भ होता है, जो मिलकर ‘‘फेड्स (एफ ए डी ई एस)’’ की हिज्जे देगा। इस ‘‘फेड्स’’ शब्द का कोई अभिप्राय नहीं है। इनसे मात्र इसे ये हिज्जे बन जाता है। किन्तु यदि आप इस पर बल देना चाहते हैं, तो आप कह सकते हैं कि बिना इन जोड़ों के प्रार्थना के प्रति अर्पण ‘‘फेड’’ (धूमिल) हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे दिमाग में यहाँ संरचित व असंरचित प्रार्थना के बीच अन्तर है। प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो का अर्थ होगा कि आप अपनी प्रार्थना के समयों में जो कहते हैं वो बहुधा स्वतंत्र और असंरचित होगा, और बहुधा गढ़ा हुआ व संरचित होगा। यदि आप अपनी प्रार्थनाओं में केवल स्वच्छन्द हैं, सम्भवतः आप उथले और घिसे-पिटे बन जायेंगे। यदि आप अपनी प्रार्थना में केवल संरचित हैं, आप सम्भवतः यांत्रिक और खोखले बन जायेंगे। प्रार्थना करने के दोनों तरीके महत्वपूर्ण हैं। दोनों में से कोई एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्वच्छन्द से मेरा अर्थ है कि आप नियमित रूप से अपनी आत्मा परमेश्वर के समक्ष उण्डेलना चाहेंगे और आप ऐसा करेंगे। आप कोई लिखित कथन या दिशा-निर्देश या सूचियाँ या पुस्तकें नहीं चाहेंगे। आपकी इतनी सारी आवश्यकताएँ होंगी कि वे स्वच्छन्द रूप से बिना किसी पूर्व-निर्धारित रूप में लुड़कती चली आती हैं। ये अच्छा है। इसके बिना ये संदेहास्पद है कि मसीह के साथ हमारा कोई सच्चा सम्बन्ध भी है। क्या आप वास्तव में एक विवाह या मित्रता की कल्पना कर सकते हैं जहाँ सभी वार्तालाप सूची या पुस्तकों से पढ़ा जाता है या केवल रटे-रटाये शब्दों में कहा जाता है। ये चरम बनावटी होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी ओर, मैं आपसे याचना करता हूँ कि ये न सोचें कि आप आत्मिक रूप से इतने गहरे या उपायकुशल या समृद्ध या अनुशासित हैं कि आप बिना रचनाओं की सहायता के कर सकते हैं। मेरे दिमाग में चार प्रकार की रचनाएँ हैं जो मैं आशा करता हूँ कि आप सभी उपयोग करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-1. बाइबिल।''' बाइबिल प्रार्थना कीजिये। बाइबिल-शास्त्रीय प्रार्थना कीजिये। इस सप्ताह हम हमारी प्रार्थनाओं को इफिसियों 3: 14-19 में दी गई प्रार्थना के चारों ओर निर्मित कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं इसी कारण उस पिता के साम्हने घुटने टेकता हूं, 15 जिस से स्वर्ग और पृथ्वी पर, हर एक घराने का नाम रखा जाता है । 16 कि वह अपनी महिमा के धन के अनुसार तुम्हें यह दान दे, कि तुम उसके आत्मा से अपने भीतरी मनुष्यत्व में सामर्थ पाकर बलवन्त होते जाओ। 17 और विश्वास के द्वारा मसीह तुम्हारे हृदय में बसे कि तुम प्रेम में जड़ पकड़कर और नेव डाल कर। 18 सब पवित्र लोगों के साथ भली भांति समझने की शक्ति पाओ&amp;amp;nbsp;; कि उसकी चैड़ाई, और लम्बाई, और ऊंचाई, और गहराई कितनी है। 19 और मसीह के उस प्रेम को जान सको जो ज्ञान से परे है, कि तुम परमेश्वर की सारी भरपूरी तक परिपूर्ण हो जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कण्ठस्थ कर लीजिये और अक्सर इसे प्रार्थना कीजिये। प्रभु की प्रार्थना कीजिये और जब आप इसे प्रार्थना करते हैं, प्रत्येक वाक्यांश को अपने शब्दों में रखिये और उन लोगों पर लागू कीजिये जिनके बारे में आपको बोझ है। बाइबिल की आज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ परमेश्वर, आपको, मेरे सारे मन और मेरे सारे प्राण और मेरी सारी बुद्धि के साथ प्रेम करने के लिए मेरी सहायता कीजिये, मेरी पत्नी की, मेरे बच्चों की, अध्यक्षों की, हमारे धर्म-प्रचारकों/सुसमाचार-प्रचारकों की सहायता कीजिये।’’ बाइबिल की प्रतिज्ञाओं को प्रार्थना कीजिये: ‘‘हे प्रभु, स्वर्ग में और पृथ्वी पर सारा अधिकार जो आपका है, उसे लीजिये और हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों को उस प्रतिज्ञा की मिठास का बोध होने दीजिये कि आप उनके संग जगत के अन्त तक रहेंगे।’’ बाइबिल की चेतावनियों को प्रार्थना कीजिये: ‘‘ओ प्रभु, उस अत्यावश्यकता के प्रकार के साथ मुझे कुदृष्टि से लड़ने की सामर्थ दीजिये जो आपने सिखाया, जब आपने कहा, अपनी आंख निकाल कर फेंक दे और स्वर्ग में प्रवेश कर, बनिस्बत कि इसे भला-चंगा रहने दे और नरक में जाये।’’ अपने सम्मुख बाइबिल खोलिये और एक कोहनी एक ओर और एक दूसरी ओर टेकिये और प्रत्येक पैराग्राफ/अनुच्छेद को पश्चाताप् में या स्तुति में या धन्यवाद में या बिनती में, प्रार्थना कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-2. सूचियाँ।''' सूचियों को लेकर प्रार्थना कीजिये। मेरे दिमाग में लोगों की सूचियाँ हैं जिनके लिए प्रार्थना करना है और आवश्यकताओं की सूचियाँ हैं जिनके बारे में प्रार्थना करना है। यदि आप सभी लोगों को और आवश्यकताओं को याद रख सकते हैं, आपको बिना सूची के प्रार्थना करना चाहिए, आप परमेश्वर हैं। मेरे पास अवश्य ही सूचियाँ होना चाहिए, कुछ मेरे सिर में और कुछ कागज पर। मैंने लगभग 70 लोगों को कण्ठस्थ कर लिया है जिनके लिए मैं नाम लेकर प्रतिदिन प्रार्थना करता हूँ। लेकिन उसमें उन लोगों की सूची सम्मिलित नहीं है जो पुरोहिताश्रम में मिशन्स में आये थे, जिनके लिए मैं और ‘नोएल’ हर रात्रि एक लिखित सूची से प्रार्थना करते हैं। इसमें हमारे धर्म/सुसमाचार-प्रचारकों की सूची सम्मिलित नहीं है जो मैं एक सूची में से पढ़ता हूँ। और ये तो मात्र लोग हैं, उनकी आवश्यकताओं का कोई उल्लेख नहीं जो मेरे अपने प्राण में और मेरे परिवार में और चर्च में और संसार में सप्ताह-ब-सप्ताह बदल जाती हैं। अतः मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि लोगों की सूचियों और आवश्यकताओं की सूचियों का उपयोग करें। किसी प्रकार की प्रार्थना पुस्तिका या नोटबुक या अपने हाथ के छोटे कम्प्यूटर में फाइलें रखिये। याद रखिये, मैं इस जोड़े: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई के मात्र द्वितीय-अर्द्ध के बारे में बात कर रहा हूँ। स्वच्छन्दता का मूल्य मत भूलिये। ये दोनों-और, है, दोनों में से एक-अथवा, नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-3. पुस्तकें।''' पुस्तकें जैसे कि ‘ऑपरेशन वल्र्ड’ से, प्रतिदिन या दो दिन में, एक भिन्न देश के लिए और इसमें मसीह के आन्दोलन के लिए प्रार्थना कीजिये। भूमण्डल-आकार का हृदय और परमेश्वर की सर्वोच्चता का दर्शन पाने का कितना ताकतवर तरीका है&amp;amp;nbsp;! ‘एक्सट्रीम डिवोशन’ जैसी पुस्तक से प्रार्थना कीजिये - वर्ष के हर एक दिन के लिए दुःख उठाती, सतायी जाती कलीसिया के लिए। मेरी पुस्तक लीजिये, ‘लैट द नेशन्स बी ग्लैड’, और पृष्ठ 57-62 पलटिये ओर उन 36 चीजों से प्रार्थना कीजिये जो आरम्भिक कलीसिया ने एक-दूसरे के लिए प्रार्थना किया। ‘वैली ऑफ विज़न्स’ लीजिये, प्यूरिटन की प्रार्थनाओं की एक पुस्तक, और वो प्रार्थना कीजिये जो भूतकाल के महान् सन्तों ने प्रार्थना की है। हम ये सोचने में इतने मूर्ख हैं कि ये हम पर छोड़ दिया गया है कि वो सब जो बाइबिल कहती है और सभी आवश्यकताएँ जिनके लिए प्रार्थना करना है, बिना अच्छी पुस्तकों की सहायता के, हम देख लेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रचना-4. रूपरेखा।''' प्रार्थना की रूपरेखा या ढाँचा विकसित कीजिये कि जब आप अपने घुटनों पर आते हैं वे आपको कुछ मार्गदर्शन दें कि पहिला और दूसरा और तीसरा क्या करें। एक नमूना रहेगा, जैसा कि मैं पहिले कह चुका हूँ, प्रभु की प्रार्थना के प्रत्येक निवेदन के चारों ओर अपनी प्रार्थना को संरचित करें। एक नमूना जिसका मैं यर्थाथ में प्रतिदिन उपयोग करता हूँ, वो नमूना है, संकेन्द्रित परिक्रमाएँ, मेरे अपने प्राण से आरम्भ करके - जो मैं अनुभूति करता हूँ कि पाप है और सर्वाधिक प्रखर आवश्यकताएँ - अपने परिवार की ओर बढ़ते हुए, और फिर पासवान्-स्टाफ तथा अध्यक्षगण, फिर सम्पूर्ण चर्च-स्टाफ, फिर हमारे धर्म-प्रचारक, और फिर मसीह की विस्तृत देह में सामान्य आवश्यकताएँ और मिशनों व संस्कृति में मसीह का आन्दोलन। इस प्रकार के बिना किसी रचना या ढाँचे के मैं ठंडा पड़ने और दिशाहीन होने लगता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पहिला जोड़ा है स्वच्छन्द व गढ़ी हुई। स्वतंत्र प्रवाह के साथ आवश्यकताओं व धन्यवाद व स्तुति के द्वारा असंरचित&amp;amp;nbsp;; और बाइबिल, सूचियों, पुस्तकों व रूपरेखाओं के द्वारा संरचित। यदि आप ‘‘प्रार्थना में अर्पित’’ हैं, आप अपने प्रार्थना के जीवन में स्वच्छन्द व गढ़ी हुई का अनुसरण करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ए - (अलोन एण्ड असेम्बिल्ड) अकेले और एकत्र''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना में अर्पित का अर्थ होगा कि आप नियमित रूप से अकेले प्रार्थना करेंगे और नियमित रूप से अन्य मसीहियों की सभा में प्रार्थना करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओह, ये कितना महत्वपूर्ण है कि हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर से अकेले मिलते हैं। यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर में एक व्यक्तिगत भरोसे और संगति के बिना कोई मसीहियत है ही नहीं। इसके सिवाय सब दिखावा और भूसी और आडम्बर है। अपने 16 बच्चों के साथ ‘सुसाना वेस्ली’, रसोई में अपना एप्रन/आँचल सिर के ऊपर ले लिया करती थी और सभी बच्चों ने ये सीख लिया था कि इसका अर्थ है रसोई में शान्ति। बच्चों को ये सीखने की आवश्यकता है कि मम्मी और डैडी, यीशु के साथ समय बिताते हैं जो पवित्र हैं और उन्हें बाधा नहीं पहुँचाना है। स्थान खोजिये, समय को योजित कीजिये, बच्चों को अनुशासन सिखाइये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन मैं सोचता हूँ कि अन्य विश्वासियों की सभा में प्रार्थना करना, अकेले प्रार्थना करने से, अधिक अनदेखा किया जाता है। अकेले और एकत्र। नया नियम, सामूहिक प्रार्थना के लिए एकत्र होने से, भरा पड़ा है। वास्तव में नया नियम में अधिकांश प्रार्थना, सम्भवतः प्रार्थना के लिए एकत्र होने के सम्बन्ध में विचारित की गई हैं। प्रेरित 1:14, ‘‘ये सब कई स्त्रियों और यीशु की माता मरियम और उसके भाइयों के साथ एक चित्त होकर प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहे’’ - ये एक नमूना है जो आप पाते हैं। प्रेरित 12:12, जब पतरस बन्दीगृह से बाहर आया, ‘‘वह उस यूहन्ना की माता मरियम के घर आया, जो मरकुस कहलाता है&amp;amp;nbsp;; वहां बहुत लोग इकट्ठे होकर प्रार्थना कर रहे थे।’’ आरम्भिक कलीसिया में प्रार्थना सभाएँ स्वाभाविक और मैं सोचता हूँ नियामक थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नया नियम में, प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहने में, निश्चित ही परमेश्वर के लोगों के साथ प्रार्थना करना सम्मिलित था। आप इसमें कैसे हैं&amp;amp;nbsp;? ये उन्नत मसीहियत नहीं है। ये बुनियादी मसीहियत है। इस सप्ताह हमने बारह 30-मिनिट की प्रार्थना की योजना की है, साथ ही शुक्रवार की पूरी रात्रि में आठ घण्टों की प्रार्थना। विकल्प इसलिए हैं कि एक नये भेदन बनाने में आपकी सहायता हो। शेष वर्ष के दौरान, प्रत्येक सप्ताह, छः सुबह, 30-मिनिट की प्रार्थना सभाएँ हैं। बुद्धवार की संध्या 5: 45 पर, शहर के मुख्य स्थल पर। फिर छोटे समूह हैं जो प्रार्थना और सेवकाई के लिए इकट्ठे होते हैं। फिर रविवार की सुबह है जिसमें गीत में व अन्य प्रकारों से प्रार्थना सम्मिलित है। यदि प्रार्थना के लिए एकत्र होना, प्रार्थना के लिए आपके अर्पित होने का हिस्सा नहीं है, 2003 को एक भेदन का वर्ष बनाइये। दोनों-और: स्वच्छन्द व गढ़ी हुई, अकेले व एकत्र। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ड - (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रार्थना में अर्पित रहने का अर्थ होगा कि आप प्रार्थना में परमेश्वर के पास, बहुधा निराशा से भरे और बहुधा प्रसन्न आते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा मात्र ये अर्थ है कि प्रार्थना, आपकी गहरी मनोव्यथाओं और भय के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है, और प्रार्थना, आपके उच्चतम आनन्दों तथा धन्यवादों के साथ परमेश्वर से मिलने का एक स्थान है। जब आप प्रतिदिन ‘पिता’ के समक्ष घुटने टेकते हैं, वो तकिया जिसे आप अपनी कुहनियों को टेकने के लिए उपयोग करते हैं, आँसुओं से दाग़दार तकिया होगी। और फिर भी, चूंकि परमेश्वर, एक प्रार्थना-सुननेवाला परमेश्वर है, आप प्रेरित पौलुस के साथ कहेंगे, ‘‘शोक करनेवाले के समान हैं, परन्तु सर्वदा आनन्द करते हैं (2 कुरिन्थियों 6: 10)। और बहुधा वो आनन्द, इस पतित संसार के बोझों को दबा देगा - जैसा कि इसे करना चाहिए - और आपको आनन्द से उछलने को प्रेरित करेगा। ‘पिता’ आपसे उन समयों में भी मिलना चाहता है। निराशा की दशा में और आनन्द की दशा में - उपवास में और भोज में, प्रार्थना में अर्पित रहिये। दोनों में से एक-अथवा नहीं, अपितु दोनों-और। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''ई - (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा कुल अर्थ है, संक्षिप्त और लम्बा। मैं संक्षिप्त और लम्बा कह सकता था, किन्तु अक्षर मेल नहीं खाते और परिवर्णी शब्द कुछ भी हिज्जे नहीं करते। इसके अलावा विस्फोटक शब्द, अधिक स्पष्ट है और ठीक वो है जो समय-समय पर प्रार्थना हो सकती है। यदि आप प्रार्थना में अर्पित हैं, आप नियमित रूप से स्तुति और धन्यवाद और आवश्यकताओं की प्रार्थनाओं के साथ विस्फोट करेंगें और वे कुछ सैकेण्डों से अधिक बने नहीं रहेंगे। और यदि आप प्रार्थना के लिए अर्पित हैं, ऐसे समय होंगे जब आप प्रभु के साथ प्रार्थना में एक लम्बे समय तक लगे रहते हैं। कभी-कभी मैं ‘नोएल’ को एक संक्षिप्त फोन करता हूँ और अन्य समयों पर हम एक संध्या साथ बिताते हैं। यदि आप मसीह से प्रेम करते हैं और सब चीजों के लिए ‘उस’ पर टिकाव लेते हैं और सभी चीजों से ऊपर ‘उसे’ संजोते हैं, आप ‘उसके’ साथ बहुधा विस्फोटक प्रार्थनाओं के साथ और बहुधा विस्तृत प्रार्थनाओं के साथ मिलेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एस - (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित''''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसमें और ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ में अथवा ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ में क्या अन्तर है&amp;amp;nbsp;? ‘‘स्वच्छन्द व गढ़ी हुई’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की विषय-वस्तु - जब हम प्रार्थना के लिए आते हैं, हम क्या करते हैं। ‘‘विस्फोटक और विस्तृत’’ के द्वारा मेरा तात्पर्य था, हमारी प्रार्थनाओं की लम्बाई। स्वेच्छित और निर्धारित से मेरा तात्पर्य है, हम कब प्रार्थना करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम प्रार्थना में अर्पित हैं, हम पूरे दिन के दौरान स्वेच्छा से प्रार्थना करेंगे - निरन्तर, जैसा कि पौलुस कहता है – मसीह के साथ एक निरन्तर संगति की भावना, पवित्र-आत्मा के द्वारा चलते हुए और अपने जीवन में ‘उसे’ एक निरन्तर व्यक्तिगत उपस्थिति के रूप में जानते हुए। जब आप ‘उससे’ बातें करते हैं तब कोई योजना नियंत्रित नहीं करेगी। दिन भर में यह दर्जनों बार होगा। ये सामान्य व अच्छा है। ये है प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन यदि आपके पास मात्र ये है, ये आपके पास बहुत देर तक नहीं रहेगा। स्वेच्छितता का सच्चा रस से भरा फल, उस बगीचे में विकसित होता है जिसकी, निर्धारण के अनुशासन द्वारा भलिभांति देखभाल की जाती है। अतः मैं आपसे याचना करता हूँ, प्रार्थना के अपने समय निर्धारित कीजिये। 2003 के लिए इसकी योजना बनाइये। आप कब ‘उससे’ नियमित रूप से मिलेंगे&amp;amp;nbsp;? कितनी देर तक आप ठहरेंगे&amp;amp;nbsp;? मैं आपको प्रोत्साहित करता हूँ कि प्रतिदिन का आरम्भ इस तरह करें। क्या आप तैयार हैं कि एक दिन या दो आधे-दिवस या दिवसों की योजना बनायें कि आप स्वयँ या एक मित्र के साथ या अपने पति/पत्नी के साथ अलग रहेंगे - एक पुस्तक पढ़ने के लिए नहीं अपितु 4 घण्टे या आठ घण्टे प्रार्थना करने के लिए&amp;amp;nbsp;? कैसे&amp;amp;nbsp;? मात्र अपनी बाइबिल पढ़ने और इसे पूरी प्रार्थना में बदल देने के द्वारा। बाइबिल की एक छोटी पुस्तक लेने और एक अध्याय पढ़ने और फिर ठहरकर उस अध्याय को हमारे परिवार तथा चर्च में प्रार्थना करने के द्वारा, ‘नोएल’ और मेरे पास, हमारे कुछ सबसे समृद्ध दिन रहे हैं। इसके बाद एक और अध्याय पढ़ना और प्रार्थना करना, और इसी प्रकार करते रहना। लेकिन ये अपने आप नहीं होता। इसे सुनियोजित किया जाना आवश्यक है। ये स्वेच्छित नहीं है। ये संरचित है। और ये महिमापूर्ण है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सो अब आप समझ गये। आज हमारे लिए परमेश्वर का वचन है, ‘‘प्रार्थना में लगे {अर्पित} रहो।’’ इसमें स्थिर रहिये। इसमें ईमानदार रहिये। क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि परमेश्वर हमें ऐसा करने की आज्ञा देता है&amp;amp;nbsp;; आवश्यकताएँ विराट हैं और सनातनकाल तराजू में झूल रहा है&amp;amp;nbsp;; और इसलिए कि परमेश्वर सुनता और पाँच सैकेण्ड में उससे अधिक करता है जो हम पाँच सालों में कर सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और हम प्रार्थना में कैसे अर्पित रहें&amp;amp;nbsp;? ये चीजें। बिना उनके प्रार्थना (फेड) धूमिल पड़ जाती है। आपकी प्रार्थना हो … &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''''एफ – (फ्री एण्ड फॉर्मड्) स्वच्छन्द व गढ़ी हुई''''' ए – (अलोन एण्ड असेम्बल्ड) अकेले और एकत्र ड – (डेस्परेट एण्ड डिलाइटेड) निराश व प्रसन्न ई – (एक्सप्लोसिव एण्ड एक्सटेन्डेड) विस्फोटक और विस्तृत एस – (स्पॉन्टेनियस एण्ड शेड्यूल्ड) स्वेच्छित और निर्धारित &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रभु आपको प्रार्थना के इस सप्ताह में और सारे वर्ष भर में, अनुग्रह और बिनती का आत्मा दे।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%95%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%B8_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%98%E0%A4%AE%E0%A4%A3%E0%A5%8D%E0%A4%A1_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A4%BE</id>
		<title>केवल क्रूस में घमण्ड करना</title>
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				<updated>2017-03-29T20:37:52Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;केवल क्रूस में घमण्ड करना&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Boasting Only in the Cross}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका जीवन, संसार में एक चिरस्थायी अन्तर लाये, इसके लिए आपको बहुत सी चीजें जानने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अवश्य है कि आप कुछ बड़ी बातों को जानें जो महत्वपूर्ण हैं, और तब उनके लिए जीने और उनके लिए मरने को इच्छुक रहें। वे लोग जो संसार में एक दीर्घकालिक अन्तर लाते हैं, ऐसे लोग नहीं हैं जो बहुत सी चीजों के विशेषज्ञ हैं, अपितु वे जिन्होंने कुछ महान् चीजों में सिद्धता हासिल की है। यदि आप चाहते हैं कि आपकी जिन्दगी को महत्व मिले, यदि आप चाहते हैं कि आपके कंकड़ गिराने से बनी छोटी लहर, वे ऊंची लहरें बन जावें जो पृथ्वी के छोर तक पहुंचें और सदियों के लिए और सनातनकाल में उठती रहें, तो आपके पास उच्च ‘आई. क्यू.’ (बौद्धिक स्तर) अथवा ‘ई. क्यू.’ होने की आवश्यकता नहीं है; आपको आकर्षक दिखने या धनी होने की आवश्यकता नहीं है; आपको एक अच्छे परिवार से आने या एक अच्छे स्कूल से पढ़े-लिखे होने की आवश्यकता नहीं है। आपको कुछ महान्, भव्य, अपरिवर्तनीय, सुस्पष्ट, सरल, महिमामय चीजों को जानना आवश्यक है, और उनके द्वारा जोश से भर जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन मैं जानता हूं कि इस भीड़ में से हर एक व्यक्ति नहीं चाहता कि आपका जीवन कोई अन्तर लावे। आप में से सैंकड़ों हैं--आप परवाह नहीं करते हैं कि आप किसी महान् चीज के लिए, कोई चिरस्थायी अन्तर लाते हैं या नहीं, आप मात्र ये चाहते हैं कि लोग आपको पसन्द करें। यदि लोग आपको मात्र पसन्द करें, आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। अथवा, यदि आपके पास अच्छी नौकरी के साथ एक अच्छी पत्नी और दो अच्छे बच्चे हैं, और एक अच्छी कार और लम्बे सप्ताहाँत और थोड़े से अच्छे मित्र, एक आनन्ददायक सेवानिवृति, और एक शीघ्र व आसान मृत्यु और कोई नरक नहीं - यदि आप वो सब (सिवाय परमेश्वर के) पा सकते - आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। योग्यता के अन्दर ये एक त्रासदी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन सप्ताह पूर्व हमें हमारी कलीसिया में समाचार मिला कि ‘रूबी एलियास़न’ और ‘लूरा एडवर्डस्’ दोनों कैमरून में मारे गए। ‘रूबी’ 80 से ऊपर की थी। आजीवन अविवाहित, उन्होंने अपनी जिन्दगी को एक महान् चीज के लिए उण्डेल दिया: जिन तक सुसमाचार नहीं पहुँचा, दरिद्र, और बीमार लोगों को यीशु मसीह से परिचित कराना। ‘लूरा’ एक विधवा थी, एक चिकित्सक, लगभग 80 साल की, और कैमरून में ‘रूबी’ के साथ-साथ सेवा करती थी। ब्रेक फेल हो गये, कार कग़ार से नीचे चली गयी, और वे दोनों तुरन्त मारी गयीं। और मैंने अपने लोगों से पूछा: क्या ये दुःखद घटना थी&amp;amp;nbsp;? दो जिन्दगियाँ, एक महान् दर्शन के द्वारा चलायी गयीं, मसीह की महिमा के लिए, नाश होते दरिद्रों की अप्रचारित सेवा में खर्च हो गयीं-- दो दशक बाद उनके लगभग सभी अमेरिकी संगी-साथी, फ्लोरिडा या न्यू मैक्सिको में, खिलवाड़ में अपनी जिन्दगी खर्च करने के लिए सेवानिवृत हो गये हैं। नहीं। वो एक दुःखद घटना नहीं है। वो एक महिमा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको बताता हूँ कि दुःखद घटना क्या होती है। मैं आपके लिए ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ (फरवरी 2000, पृ. 98) से पढ़ता हूँ कि एक दुःखद घटना क्या होती है: ‘‘बॉब और पैनी … पाँच साल पहिले उत्तर-पूरब में अपनी नौकरी से समयपूर्व सेवानिवृत्ति ले लिये, जब वह 59 का और वो 51 की थी। अब वे ‘पुन्टा गोर्डा’, फ्लोरिडा, में रहते हैं, जहाँ वे अपनी 30 फुट लम्बी मछली पकड़ने की नाव में समुद्र में भ्रमण करते, सॉफ्ट-बॉल खेलते और सीपी एकत्र करते हैं।’’ अमेरिकी स्वप्न: अपनी जिन्दगी के अन्त पर आओ - तुम्हारी एक व एकमात्र जिन्दगी - और इससे पूर्व कि आप अपने सृष्टिकर्ता को हिसाब दें, ‘उसके’ सम्मुख अपना अंतिम महान् काम होने दें, ‘‘मैंने सीपी एकत्र की हैं। मेरी सीपियाँ देखिये।’’ ये है एक दुःखद घटना। और आज लोग करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं कि आपको फुसला सकें कि आप उस दुःखान्त स्वप्न को गले लगा लें। और मेरे पास चालीस मिनिट हैं कि आपसे याचना करूं कि: इसे मत खरीदिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपनी जिन्दगी को व्यर्थ मत जाने दीजिये। ये कितनी छोटी और कितनी बहुमूल्य है। मैं ऐसे घर में पला-बढ़ा हूँ, जहाँ मेरे पिता ने खोये हुओं तक सुसमाचार लाने के लिए एक सुसमाचार-प्रचारक के रूप में अपने-आप को पूरी तरह खर्च कर दिया। उनके पास, अपने में समा लेने वाला, एक ही दर्शन था: सुसमाचार का प्रचार करो। मेरी बड़े होने के पूरे वर्षों तक एक तख्ती हमारे किचिन में टंगी रहती थी। अब वो हमारे बैठक-कक्ष में टंगी है। मैं 48 वर्षों से लगभग प्रतिदिन इसकी ओर देखा है। ये कहती है, ‘‘केवल एक जीवन, ये शीघ्र ही बीत जायेगा। जो मसीह के लिए किया गया, केवल वही रह जायेगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यहाँ ‘वन डे’ में, एक पिता के रूप में हूँ। मैं 54 साल का हूँ। मेरे चार पुत्र और एक पुत्री है: ‘कस्र्टन’ 27 का, बैन्जामिन 24 का, अब्राहम 20 का, बरनबास 17 का है। तलीथा 4 साल की है। मेरे वयस्क बेटे अपनी जिन्दगियाँ विनाशक सफलता के लिए व्यर्थ न गंवायें, इस लालसा की तुलना में थोड़ी ही बातें हैं, यदि कोई है तो, जो इन महीनों व वर्षों में मुझे इससे अधिक लालसा से भरती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं आपको बेटों और बेटियों के रूप में देखते हुए, एक पिता के रूप में आपसे याचना करता हूँ - शायद ऐसा पिता आपके पास कभी नहीं था। अथवा ऐसा पिता जिसके पास आपके लिए एक ऐसा दर्शन नहीं था, जैसा कि मेरे पास आपके लिए है और परमेश्वर के पास आपके लिए है। अथवा, एक ऐसा पिता जिसके पास आपके लिए दर्शन है, किन्तु ये सब केवल पैसा और प्रतिष्ठा के बारे में है। मैं आप लोगों को बेटों और बेटियों के रूप में देखता हूँ और मैं आपसे याचना करता हूँ: चाहता हूँ कि आपकी जिन्दगियाँ कुछ महान् चीज के लिए और सनातन के लिए गिनी जावें। ये चाहता हूँ। बिना एक धुन के अपनी जिन्दगी न बितायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘पैशन 98’ और ‘पैशन 99’ और ‘वन डे’ के दर्शन से, मेरे प्रेम करने के कारणों में से एक है कि, 268 उद्घोषणा इतनी सुस्पषट है जिसके विषय में मेरी जिन्दगी है। उद्घोषणा, यशायाह 26: 8 पर आधारित है - ‘‘हे यहोवा, तेरे न्याय के मार्ग में हम लोग तेरी बाट जोहते आये हैं&amp;amp;nbsp;; तेरे नाम के स्मरण की हमारे प्राणों में लालसा बनी रहती है।’’ यहाँ मात्र एक शरीर नहीं है अपितु एक प्राण। यहाँ मात्र एक प्राण नहीं है, अपितु एक धुन और एक लालसा के साथ एक प्राण है। यहाँ मात्र पसन्द किये जाने की या सॉफ्ट-बॉल और सीपियों की लालसा नहीं है, यहाँ, अत्याधिक महान्, और अपरिमेय सुन्दर, और असीम मूल्यवान् और अनन्त सुन्तुष्टि देने वाली किसी चीज की लालसा है - परमेश्वर का नाम और महिमा - ‘‘तेरा नाम और तेरी कीर्ति, हमारे प्राणों की लालसा है’’ (अंग्रेजी से सही अनुवाद)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही जानने के लिए मैं जीवित हूँ और अनुभव करने की प्रतीक्षा करता हूँ। मेरे जीवन और जिस कलीसिया में मैं सेवा करता हूँ उसका ‘जीवन-लक्ष्य कथन’: ‘‘हम विद्यमान हैं - मैं विद्यमान हूँ - सभी लोगों के आनन्द के लिए सभी चीजों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए, एक धुन को फैलाना।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको इसे वैसा नहीं कहना पड़ेगा जैसा कि मैं इसे कहता हूँ। आपको इसे वैसा नहीं कहना पड़ेगा जैसा ‘लुई गिगलियो’ इसे कहता है (या जैसा ‘बेथ मूर’ इसे कहता है या जैसा ‘वूडी बॉकम’ इसे कहता है)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन जो भी आप करते हैं, इसे कहने के लिए अपनी धुन खोजिये और अपना रास्ता खोजिये और इसके लिए जीवित रहिये और इसके लिए मर जाइये। और आप एक ऐसा अन्तर ले आयेंगे जो बना रहेगा। आप पौलुस प्रेरित के समान होंगे। किसी और के पास अपने जीवन के लिए एक अधिक एकनिष्ठ दर्शन नहीं था जैसा कि पौलुस के पास। वह इसे विभिन्न तरीकों से कह सकता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रेरित 20: 24:- ‘‘परन्तु मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता: कि उसे प्रिय जानूं, बरन यह कि मैं अपनी दौड़ को, और उस सेवकाई को पूरी करूं, जो मैं ने परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक चीज का महत्व था: मुझे सौंपा गया काम पूरा करूं, मेरी दौड़ दौड़ूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फिलिप्पियों 3: 7-8:- ‘‘परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं कैसे आपकी सहायता करूं&amp;amp;nbsp;? मैं इस ‘वन डे’ के इस एक क्षण में परमेश्वर द्वारा कैसे उपयोग हो सकता हूँ कि आप में एक एकमात्र महान् वास्तविकता के लिए, एक एकमात्र धुन जागृत करूं जो आपको स्वतंत्र करे और आपको छोटे स्वप्नों से मुक्त करे और आपको पृथ्वी के छोरों तक भेजे&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर, जो मैं सोचता हूँ कि प्रभु ने मुझे दिया, ये था:- उन्हें धर्मशास्त्र की एक आयत तक ले जाओ जो उस केन्द्र के अधिकतम निकट है जितना तुम जा सकते हो और उन्हें दिखाओ कि पौलुस ने वहाँ क्यों कहा, जब वह कहता है:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयत गलतियों 6: 14 है:- ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा इसे सकारात्मक रूप में बयान करने के लिए:- केवल यीशु मसीह के क्रूस में घमण्ड कीजिये। यह एक एकमात्र योजना है। एक एकमात्र लक्ष्य। एक एकमात्र धुन। केवल क्रूस में घमण्ड कीजिये। इस शब्द का अनुवाद किया जा सकता है, ‘‘में उल्लासित’’ अथवा ‘‘में आनन्दित’’। केवल मसीह के क्रूस में उल्लासित रहिये। केवल मसीह के क्रूस में आनन्दित रहिये। पौलुस कहता है कि इसे आपकी एकमात्र धुन बने रहने दीजिये, आपका एकमात्र घमण्ड, और आनन्द और उल्लास। इस महान् क्षण में जो ‘वन डे’ कहलाता है, होने दीजिये कि वो एक चीज जिससे आप प्रेम करते हैं, वो एक चीज जिसे आप संजोते हैं, वो एक चीज जिस में आप आनन्दित होते हैं और जिस पर उल्लासित होते हैं, यीशु मसीह का क्रूस हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दो कारणों से, ये चैंकाने वाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1) एक ये है कि ये ऐसा कहने के समान है: केवल इलेक्ट्र्कि चेयर (विद्युत-कुर्सी) में घमण्ड कीजिये। केवल गैस-कक्ष में उल्लासित होइये। केवल प्राणघातक इन्जेक्शन में आनन्दित होइये। आपके एक घमण्ड और एक आनन्द और एक उल्लास को फांसी की रस्सी होने दीजिये। ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।’’ प्राणदण्ड का कोई और तरीका जो कभी अविश्कार किया गया था, क्रूस पर कीलों से जड़ दिये जाने से अधिक कठोर और यंत्रणा देने वाला नहीं था। ये भयंकर था। बिना चिल्लाये और अपने बालों को नोंचे और अपने कपड़ों को फाड़े - आप इसे देख नहीं सकते थे। इसे अपने जीवन की एकमात्र धुन होने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2) ये एक चीज है जो पौलुस के शब्दों के बारे में चैंकाने वाली है। दूसरी ये है कि वह कहता है कि केवल यही आपके जीवन का घमण्ड होना है। एकमात्र आनन्द। एकमात्र उल्लास। ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे उसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? वास्तव में&amp;amp;nbsp;? कोई और घमण्ड नहीं&amp;amp;nbsp;? कोई और उल्लास नहीं&amp;amp;nbsp;? कोई और आनन्द नहीं, यीशु के क्रूस के सिवाय - यीशु की मृत्यु के सिवाय&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन स्थानों के बारे में क्या, जहाँ पौलुस स्वयँ, अन्य चीजों के लिए वही शब्द ‘‘घमण्ड’’ या ‘‘उल्लास’’ उपयोग करता है&amp;amp;nbsp;? उदाहरण के लिए: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 5: 2:- ‘‘परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 5: 3, 4:- ‘‘केवल यही नहीं, बरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 कुरिन्थियों 12: 9:- ‘‘मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1 थिस्सलुनिकियों 2: 19:- ‘‘हमारी आशा, या आनन्द या बड़ाई का मुकुट क्या है&amp;amp;nbsp;? क्या … तुम ही न होगे&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो, यदि पौलुस इन सब बातों में घमण्ड व उल्लास कर सकता है, तब पौलुस का क्या अर्थ है - कि वह ‘‘ऐसा न हो किसी बात का घमण्ड करे, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का’’&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन उसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? क्या यह मात्र दोमुही बातचीत है&amp;amp;nbsp;? आप एक बात में उल्लासित होते हैं और कहते हैं कि आप किसी अन्य बात में उल्लासित हो रहे हैं&amp;amp;nbsp;? नहीं। एक बहुत गूढ़ कारण है ये कहने के लिए - कि किसी भी चीज में सभी उल्लास, सभी आनन्द, सभी धमण्ड करना, यीशु मसीह के क्रूस में आनन्द करना होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसका अर्थ यह है कि, एक मसीही के लिए, सभी अन्य घमण्ड, क्रूस में घमण्ड करना भी होना चाहिए। किसी भी अन्य चीज में सब प्रकार का उल्लास, क्रूस में उल्लास रहना चाहिए। यदि आप महिमा की आशा में उल्लासित रहते हैं तो आपको मसीह के क्रूस में उल्लासित रहना चाहिए। यदि आप क्लेशों में घमण्ड करते हैं क्योंकि क्लेश से आशा उत्पन्न होती है तो आपको मसीह के क्रूस में घमण्ड करना चाहिए। यदि आप अपनी दुर्बलताओं में घमण्ड करते हैं, या परमेश्वर के लोगों में, तो आपको मसीह के क्रूस में घमण्ड करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामला ये क्यों है&amp;amp;nbsp;? इस कारण से:- छुटकारा पाये हुए पापियों के लिए, हर एक भली चीज - निःसंदेह हर एक बुरी चीज, जो परमेश्वर भली में बदल देता है - हमारे लिए मसीह के क्रूस के द्वारा प्राप्त की गई थी। मसीह की मृत्यु से हटकर, पापियों को और कुछ नहीं वरन् ईश्वरीय-दण्ड मिलता है। मसीह के क्रूस से हटकर, केवल दण्डाज्ञा है। इसलिए हर एक चीज जो आप मसीह में उपभोग करते हैं - एक मसीही के रूप में, एक व्यक्ति के रूप में जो मसीह का भरोसा करता है - मसीह की मृत्यु के कारण है। और इसलिए सब बातों में आपका सभी प्रकार से आनन्दित होना, क्रूस में आनन्दित होना रहना चाहिए जहाँ आपकी सभी आशीषें, आपके लिए परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह की मृत्यु की कीमत पर खरीदी गई थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन कारणों में से एक, कि हम उतना मसीह-केन्द्रित और क्रूस-संतृप्त नहीं हैं जितना कि हमें होना चाहिए, ये है कि हमने ये स्पष्ट रूप से अनुभव नहीं किया है कि हर एक चीज - हर भली चीज और हर बुरी चीज जो परमेश्वर, उसके छुटकारा पाये हुए बच्चों के लिए भली में बदल देता है, हमारे लिए मसीह की मृत्यु के द्वारा खरीदी गई थी। हम, जिन्दगी और श्वास और स्वास्थय और मित्रों और हर एक चीज को, सरलता से सुनिष्चित मान लेते हैं। हम सोचते हैं कि ये हमारा अधिकार है । किन्तु तथ्य ये है कि यह अधिकार के द्वारा हमारा नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम दोगुने तौर पर इसके अपात्र हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1) हम सृष्टि हैं और हमारा सृष्टिकर्ता बाध्य या वचनबद्ध नहीं था कि हमें कुछ भी दे - जिन्दगी या स्वास्थय और कुछ भी नहीं। ‘वह’ देता है, ‘वह’ ले लेता है, और ‘वह’ हमारे साथ कुछ अन्याय नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2) और अपने सृष्टिकर्ता पर बिना किसी दावे के, सृजित प्राणी होने के अलावा, हम पापी हैं। हम ‘उसकी’ महिमा से रहित हैं। हमने ‘उसे’ अनदेखा किया और ‘उसकी’ आज्ञा का उल्लंघन किया और ‘उसे’ प्रेम करने व विश्वास करने में असफल रहे हैं। ‘उसके’ न्याय का क्रोध हमारे विरुद्ध भड़क गया है। हम ‘उस’ से जिस भी चीज की पात्रता रखते हैं वो है न्याय। इसलिए हर एक श्वास जो हम लेते हैं, हर बार जब हमारा दिल धड़कता है, प्रतिदिन जो सूरज ऊगता है, हर क्षण जो हम अपनी आँखों से देखते या हमारे कानों से सुनते हैं या अपने मुँह से बोलते हैं या अपने पैरों से चलते हैं, पापियों के लिए मुफ्त और अनर्जित वरदान/उपहार है, जो केवल ईश्वरीय-दण्ड की पात्रता रखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ये वरदान हमारे लिए किसने खरीदा&amp;amp;nbsp;? यीशु मसीह ने। और ‘उसने’ इन्हें किस तरह खरीदा&amp;amp;nbsp;? ‘अपने’ लोहू के द्वारा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन में प्रत्येक आशीष, मसीह के क्रूस को आवर्धित करने के उद्देश्य से है, या इसे दूसरे ढंग से कहें, जीवन में हर एक अच्छी चीज, मसीह को और उसे क्रूसघातित होने को बड़ा बनाने के लिए है। अतः, उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह हमारी 1991 की ‘डॉज़ स्पिरिट’ कार पूरी तरह चकनाचूर हो गई, लेकिन किसी को चोट नहीं लगी। और उस सुरक्षा में मैं उल्लासित हूँ। मैं उसमें घमण्ड करता हूँ। लेकिन क्यों किसी को चोट नहीं लगी&amp;amp;nbsp;? वो मेरे और मेरे परिवार के लिए एक वरदान था, जिसे पाने का हम में से कोई भी पात्र नहीं है। हम पापी हैं और मसीह से हटकर, स्वभाव से ही क्रोध की सन्तान हैं। तो कैसे हमें हमारे भले के लिए ऐसा वरदान मिला&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- मसीह हमारे पापों के लिए क्रूस पर मरा, और हमारे ऊपर से परमेश्वर के क्रोध को हटा दिया, और हमारे लिए परमेश्वर का सर्वशक्तिमान् अनुग्रह सुरक्षित कर दिया, जो सब बातों में, मिलकर हमारे लिए भलाई उत्पन्न करता है, हालांकि हम इसकी योग्यता नहीं रखते, फिर भी। अतः जब मैं अपनी सुरक्षा में उल्लासित होता हूँ, मैं मसीह के क्रूस में उल्लासित हो रहा हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और उस कार के लिए बीमा कम्पनी ने हमें 2800 डॉलर चुकाया और ‘नोएल’ ने उस पैसे को लिया और ‘आइओवा’ को गया और एक ‘92 शेवी ल्यूमिना’ खरीदा और बर्फबारी में उसे घर तक चला के लाया। और अब हमारे पास पुनः एक कार है। और मैं इतने अधिक उदार दान के अद्भुत अनुग्रह में फूले नहीं समाता। ठीक उसी प्रकार। आप अपनी कार को क्षतिग्रस्त कर लेते हैं। आप बिना चोट के बाहर आ जाते हैं। बीमा पैसे चुकाता है। आप को दूसरी मिल जाती है। और ऐसे आगे बढ़ जाते हैं मानो कुछ भी नहीं हुआ था। और धन्यवाद में मैं अपना सिर झुकाता हूँ और यहाँ तक कि इन छोटी पदार्थी चीजों की अनकही दयाओं में उल्लासित होता हूँ। ये सारी दयाएँ कहाँ से आती हैं&amp;amp;nbsp;? यदि आप एक उद्धार पाये हुए पापी हैं, यीशु में एक विश्वासी, तो वे क्रूस के द्वारा आती हैं। क्रूस से हटकर, केवल न्याय है - एक समय तक धीरज और दया, किन्तु उसके बाद, यदि ठुकराये गए, वो सभी दया, केवल न्याय को भड़काने का काम करती है। इसलिए हर एक वरदान, लोहू से खरीदा हुआ वरदान है। और सब प्रकार का घमण्ड करना - सभी उल्लास - क्रूस में घमण्ड करना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझ पर हाय, यदि मैं किसी आशीष में उल्लास करता हूँ जब तक कि मेरा उल्लासित होना मसीह के क्रूस में उल्लासित होना नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कहने का दूसरा तरीका ये है कि क्रूस की उद्देश्य, मसीह की महिमा है। क्रूस में परमेश्वर का लक्ष्य ये है कि मसीह सम्मानित हो। जब पौलुस गलतियों 6: 14 में कहता है, ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का,’’ वह कह रहा है कि परमेश्वर की इच्छा ये है कि क्रूस सदैव आवर्धित किया जावे - कि क्रूसघातित मसीह सदा हमारा घमण्ड और उल्लास और हमारा आनन्द और हमारी स्तुति बना रहे - कि मसीह को हमारे जीवन की हर भली चीज में महिमा और धन्यवाद और आदर मिले - और हर एक बुरी चीज में भी जिसे परमेश्वर भली में बदल देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन अब यहाँ एक प्रश्न है:- मसीह की मृत्यु में यदि परमेश्वर का यही लक्ष्य है - यथा, कि ‘‘क्रूसधातित मसीह’’ सभी चीजों के लिए सम्मानित और महिमित किया जावे, तब मसीह को वो महिमा कैसे मिलेगी जिसकी पात्रता ‘वह’ रखता है&amp;amp;nbsp;? उत्तर ये है कि बच्चों और जवानों और वयस्कों को यह सिखाया जाना है कि ये चीजें ऐसी हैं। अथवा इसे दूसरे ढंग से कहें:- मसीह के क्रूस में घमण्ड का स्रोत, मसीह के क्रूस के विषय में शिक्षा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये है मेरा काम:- आपको ये बातें सिखाने के द्वारा यीशु के लिए महिमा प्राप्त करूं। और तब आपका काम है कि उन पर चलने के द्वारा और उन्हें और अधिक लोगों को सिखाने के द्वारा, यीशु के लिए और महिमा प्राप्त करें। यीशु के बारे में शिक्षा, यीशु में घमण्ड करने के लिए है। और यदि हम चाहते हैं कि क्रूस के सिवाय और किसी में उल्लास न हो, तब हमें क्रूस के बारे में - और क्रूस के तले - शिक्षा में लगे रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा हमें यह कहना चाहिए, ‘‘क्रूस पर।’’ क्रूस पर शिक्षा, क्रूस पर घमण्ड की ओर ले जायेगा। मेरे कहने का क्या अर्थ है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 14 के शेष भाग को देखें:- ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ क्रूस में घमण्ड तब होता है जब आप क्रूस पर होते हैं। क्या पद 14 यही नहीं कहती है&amp;amp;nbsp;? संसार मेरी दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया है और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। संसार मेरे लिए मर गया है और मैं संसार के लिए मर गया हूँ। क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि मैं क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। जब हम क्रूस पर होते हैं तब हम क्रूस पर घमण्ड करना और क्रूस पर उल्लासित होना सीखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ये कब हुआ&amp;amp;nbsp;? आप कब क्रूस पर चढ़ाये गए&amp;amp;nbsp;? उत्तर गलातियों 2: 20 में है, ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।’’ जब मसीह मरा, हम मर गए। मसीह की मृत्यु का महिमित अर्थ ये है कि जब ‘वह’ मरा, ‘उसके’ सभी अपने ‘उसमें’ मर गए। वो मृत्यु, जो ‘वह’ हम सब लिए मरा, हमारी मृत्यु बन जाती है जब हम विश्वास के द्वारा मसीह से संयुक्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु आप कहते हैं, ‘‘क्या मैं जिन्दा नहीं हूँ&amp;amp;nbsp;? मैं जिन्दा महसूस करता हूँ।’’ तो, यहां पर शिक्षाण की एक आवश्यकता है। हमें अवश्य ही सीखना चाहिए कि हमें क्या हुआ। हमें ये बातें अवश्य ही सिखाया जाना चाहिए। इसी कारण गलातियों 2: 20 और 6: 14 बाइबल में हैं। परमेश्वर हमें सिखा रहा है कि हमें क्या हुआ, ताकि हम अपने आप को जान सकें और हमारे साथ कार्य करने की ‘उसका’ तरीका जान सकें और जैसा कि हमें होना चाहिए ‘उसमें’ और ‘उसके’ पुत्र में और ‘उसके’ क्रूस में उल्लासित हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम पुनः गलातियों 2: 20 को पढ़ते हैं, ये देखने के लिए कि, हाँ, हम मर गए हैं और हाँ, हम जिन्दा हैं। ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, (अतः मैं मर गया हूं, और वह कहता जाता है); और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है (क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि मैं मर गया, अर्थात् मेरा पुराना विद्रोही, अविश्वासी मनुष्यत्व मर गया, और वह कहता जाता है); और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं (अतः, हाँ, मैं जिन्दा हूँ, परन्तु ये वही ‘‘मैं’ नहीं है, जैसा कि वो ‘‘मैं’ जो मर गया) तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।’’ दूसरे शब्दों में, ‘‘मैं’’ जो जीवित है, विश्वास का नया ‘‘मैं’’ है। नयी सृष्टि जीवित रहती है। विश्वासी जीवित रहता है। पुराना मनुष्यत्व यीशु के साथ क्रूस पर मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि आप पूछें, ‘‘इस वास्तविकता से जुड़ने की कुंजी क्या है&amp;amp;nbsp;? ये मेरा कैसे हो सकता है&amp;amp;nbsp;? उत्तर, गलातियों 2: 20 में विश्वास के बारे में शब्दों में समाविष्ट है। ‘‘मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है।’’ ये है जुड़ाव। परमेश्वर आपको विश्वास के द्वारा ‘उसके’ पुत्र से जोड़ता है। और जब ‘वह’ ऐसा करता है, वहाँ परमेश्वर के पुत्र के साथ एक संयुक्तता है ताकि ‘उसकी’ मृत्यु आपकी मृत्यु बन जाती है और ‘उसका’ जीवन आपका जीवन बन जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इस सब को गलतियों 6: 14 पर ले चलिये, ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ क्रूस के सिवाय और किसी चीज में घमण्ड मत कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और कैसे मैं इतना मूलतः क्रूस-केन्द्रित बन सकता हूँ - ताकि मेरे सभी उल्लास या आनन्द का सम्बन्ध क्रूस से हो&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- पूर्ण रूप से समझिये कि जब मसीह क्रूस पर मरा, आप मर गए; और जब आपने ‘उस’ पर विश्वास किया, वो मृत्यु आपके जीवन में प्रभावकारी हुई। पौलुस कहता है, यह संसार के लिए आपकी मृत्यु और आपके लिए संसार की मृत्यु है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थ:- जब आप मसीह में अपना विश्वास रखते हैं, संसार के प्रति आपकी बन्धुआई टूट जाती है, और संसार का अभिभूत करने वाला प्रलोभन टूट जाता है। संसार के लिए आप एक शव हैं, और संसार आपके लिए एक लाश है। अथवा इसे सकारात्मक रूप में रखने के लिए, पद 15 के अनुसार, आप एक ‘‘नयी सृष्टि’’ हैं। पुराना ‘आप’ मरा हुआ है। एक नया ‘आप’ जीवित है। और वो नया ‘आप’, विश्वास का ‘आप’ है। और विश्वास जिसमें उल्लासित होता है, वो संसार नहीं, अपितु मसीह है, और विशेषतया क्रूसित मसीह। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार से आप इतना अधिक क्रूस-केन्द्रित बन जाते हैं कि आप पौलुस के साथ कहते हैं, ‘‘मैं और किसी बात का घमण्ड नहीं करूंगा, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस में।’’ संसार अब आगे को मेरा धन नहीं है। ये मेरे जीवन और मेरी सन्तुष्टि और मेरे आनन्द का स्रोत नहीं है। मसीह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन कार दुर्घटना में सुरक्षा के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? इंश्योरेन्स के भुगतान के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? क्या आपने नहीं कहा कि आप इस बारे में खुश थे&amp;amp;nbsp;? क्या वो संसार नहीं है&amp;amp;nbsp;? तो क्या आप संसार के लिए मर गए हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं हो सकता था। मैं ऐसी आशा करता हूँ। क्योंकि संसार के लिए मृत हो जाने का अर्थ, संसार से बाहर चले जाना नहीं है। और इसका ये अर्थ नहीं कि संसार की चीजों के बारे में - कुछ नकारात्मक और कुछ सकारात्मक - महसूस नहीं करना है (1 यूहन्ना 2: 15; 1 तीमुथियुस 4: 3)। इसका अर्थ है कि संसार में प्रत्येक वैध सुख, मसीह के प्रेम का एक लोहू-खरीदा प्रमाण बन जाता है, और क्रूस में घमण्ड करने का एक अवसर। हम इंश्योरेन्स के भुगतान के प्रति मृत हैं जब पैसा वो चीज नहीं है जो हमें सन्तुष्ट करती है, अपितु क्रूसित मसीह, ‘प्रदान करने वाला’, सन्तुष्ट करता है। जब हमारा हृदय, आशीष की किरण के साथ, क्रूस में विद्यमान स्रोत की ओर, वापिस दौड़ता है, तब आशीष की सांसारिकता मृत हो जाती है, और क्रूसित मसीह ही सब कुछ होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूस में - उल्लासित होने के लिए शिक्षा का यही लक्ष्य है। ओ, परमेश्वर हमें मसीह व क्रूसित मसीह की महिमा के लिए स्वप्न देखने और योजना बनाने और कार्य करने और देने और सिखाने और जीने की शक्ति प्रदान करे&amp;amp;nbsp;!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>केवल क्रूस में घमण्ड करना</title>
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				<updated>2017-03-29T20:37:23Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Boasting Only in the Cross}}   &amp;amp;gt; पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल ...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Boasting Only in the Cross}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका जीवन, संसार में एक चिरस्थायी अन्तर लाये, इसके लिए आपको बहुत सी चीजें जानने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अवश्य है कि आप कुछ बड़ी बातों को जानें जो महत्वपूर्ण हैं, और तब उनके लिए जीने और उनके लिए मरने को इच्छुक रहें। वे लोग जो संसार में एक दीर्घकालिक अन्तर लाते हैं, ऐसे लोग नहीं हैं जो बहुत सी चीजों के विशेषज्ञ हैं, अपितु वे जिन्होंने कुछ महान् चीजों में सिद्धता हासिल की है। यदि आप चाहते हैं कि आपकी जिन्दगी को महत्व मिले, यदि आप चाहते हैं कि आपके कंकड़ गिराने से बनी छोटी लहर, वे ऊंची लहरें बन जावें जो पृथ्वी के छोर तक पहुंचें और सदियों के लिए और सनातनकाल में उठती रहें, तो आपके पास उच्च ‘आई. क्यू.’ (बौद्धिक स्तर) अथवा ‘ई. क्यू.’ होने की आवश्यकता नहीं है; आपको आकर्षक दिखने या धनी होने की आवश्यकता नहीं है; आपको एक अच्छे परिवार से आने या एक अच्छे स्कूल से पढ़े-लिखे होने की आवश्यकता नहीं है। आपको कुछ महान्, भव्य, अपरिवर्तनीय, सुस्पष्ट, सरल, महिमामय चीजों को जानना आवश्यक है, और उनके द्वारा जोश से भर जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन मैं जानता हूं कि इस भीड़ में से हर एक व्यक्ति नहीं चाहता कि आपका जीवन कोई अन्तर लावे। आप में से सैंकड़ों हैं--आप परवाह नहीं करते हैं कि आप किसी महान् चीज के लिए, कोई चिरस्थायी अन्तर लाते हैं या नहीं, आप मात्र ये चाहते हैं कि लोग आपको पसन्द करें। यदि लोग आपको मात्र पसन्द करें, आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। अथवा, यदि आपके पास अच्छी नौकरी के साथ एक अच्छी पत्नी और दो अच्छे बच्चे हैं, और एक अच्छी कार और लम्बे सप्ताहाँत और थोड़े से अच्छे मित्र, एक आनन्ददायक सेवानिवृति, और एक शीघ्र व आसान मृत्यु और कोई नरक नहीं - यदि आप वो सब (सिवाय परमेश्वर के) पा सकते - आप सन्तुष्ट हो जाते हैं। योग्यता के अन्दर ये एक त्रासदी है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीन सप्ताह पूर्व हमें हमारी कलीसिया में समाचार मिला कि ‘रूबी एलियास़न’ और ‘लूरा एडवर्डस्’ दोनों कैमरून में मारे गए। ‘रूबी’ 80 से ऊपर की थी। आजीवन अविवाहित, उन्होंने अपनी जिन्दगी को एक महान् चीज के लिए उण्डेल दिया: जिन तक सुसमाचार नहीं पहुँचा, दरिद्र, और बीमार लोगों को यीशु मसीह से परिचित कराना। ‘लूरा’ एक विधवा थी, एक चिकित्सक, लगभग 80 साल की, और कैमरून में ‘रूबी’ के साथ-साथ सेवा करती थी। ब्रेक फेल हो गये, कार कग़ार से नीचे चली गयी, और वे दोनों तुरन्त मारी गयीं। और मैंने अपने लोगों से पूछा: क्या ये दुःखद घटना थी&amp;amp;nbsp;? दो जिन्दगियाँ, एक महान् दर्शन के द्वारा चलायी गयीं, मसीह की महिमा के लिए, नाश होते दरिद्रों की अप्रचारित सेवा में खर्च हो गयीं-- दो दशक बाद उनके लगभग सभी अमेरिकी संगी-साथी, फ्लोरिडा या न्यू मैक्सिको में, खिलवाड़ में अपनी जिन्दगी खर्च करने के लिए सेवानिवृत हो गये हैं। नहीं। वो एक दुःखद घटना नहीं है। वो एक महिमा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको बताता हूँ कि दुःखद घटना क्या होती है। मैं आपके लिए ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ (फरवरी 2000, पृ. 98) से पढ़ता हूँ कि एक दुःखद घटना क्या होती है: ‘‘बॉब और पैनी … पाँच साल पहिले उत्तर-पूरब में अपनी नौकरी से समयपूर्व सेवानिवृत्ति ले लिये, जब वह 59 का और वो 51 की थी। अब वे ‘पुन्टा गोर्डा’, फ्लोरिडा, में रहते हैं, जहाँ वे अपनी 30 फुट लम्बी मछली पकड़ने की नाव में समुद्र में भ्रमण करते, सॉफ्ट-बॉल खेलते और सीपी एकत्र करते हैं।’’ अमेरिकी स्वप्न: अपनी जिन्दगी के अन्त पर आओ - तुम्हारी एक व एकमात्र जिन्दगी - और इससे पूर्व कि आप अपने सृष्टिकर्ता को हिसाब दें, ‘उसके’ सम्मुख अपना अंतिम महान् काम होने दें, ‘‘मैंने सीपी एकत्र की हैं। मेरी सीपियाँ देखिये।’’ ये है एक दुःखद घटना। और आज लोग करोड़ों डॉलर खर्च कर रहे हैं कि आपको फुसला सकें कि आप उस दुःखान्त स्वप्न को गले लगा लें। और मेरे पास चालीस मिनिट हैं कि आपसे याचना करूं कि: इसे मत खरीदिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपनी जिन्दगी को व्यर्थ मत जाने दीजिये। ये कितनी छोटी और कितनी बहुमूल्य है। मैं ऐसे घर में पला-बढ़ा हूँ, जहाँ मेरे पिता ने खोये हुओं तक सुसमाचार लाने के लिए एक सुसमाचार-प्रचारक के रूप में अपने-आप को पूरी तरह खर्च कर दिया। उनके पास, अपने में समा लेने वाला, एक ही दर्शन था: सुसमाचार का प्रचार करो। मेरी बड़े होने के पूरे वर्षों तक एक तख्ती हमारे किचिन में टंगी रहती थी। अब वो हमारे बैठक-कक्ष में टंगी है। मैं 48 वर्षों से लगभग प्रतिदिन इसकी ओर देखा है। ये कहती है, ‘‘केवल एक जीवन, ये शीघ्र ही बीत जायेगा। जो मसीह के लिए किया गया, केवल वही रह जायेगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यहाँ ‘वन डे’ में, एक पिता के रूप में हूँ। मैं 54 साल का हूँ। मेरे चार पुत्र और एक पुत्री है: ‘कस्र्टन’ 27 का, बैन्जामिन 24 का, अब्राहम 20 का, बरनबास 17 का है। तलीथा 4 साल की है। मेरे वयस्क बेटे अपनी जिन्दगियाँ विनाशक सफलता के लिए व्यर्थ न गंवायें, इस लालसा की तुलना में थोड़ी ही बातें हैं, यदि कोई है तो, जो इन महीनों व वर्षों में मुझे इससे अधिक लालसा से भरती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं आपको बेटों और बेटियों के रूप में देखते हुए, एक पिता के रूप में आपसे याचना करता हूँ - शायद ऐसा पिता आपके पास कभी नहीं था। अथवा ऐसा पिता जिसके पास आपके लिए एक ऐसा दर्शन नहीं था, जैसा कि मेरे पास आपके लिए है और परमेश्वर के पास आपके लिए है। अथवा, एक ऐसा पिता जिसके पास आपके लिए दर्शन है, किन्तु ये सब केवल पैसा और प्रतिष्ठा के बारे में है। मैं आप लोगों को बेटों और बेटियों के रूप में देखता हूँ और मैं आपसे याचना करता हूँ: चाहता हूँ कि आपकी जिन्दगियाँ कुछ महान् चीज के लिए और सनातन के लिए गिनी जावें। ये चाहता हूँ। बिना एक धुन के अपनी जिन्दगी न बितायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘पैशन 98’ और ‘पैशन 99’ और ‘वन डे’ के दर्शन से, मेरे प्रेम करने के कारणों में से एक है कि, 268 उद्घोषणा इतनी सुस्पषट है जिसके विषय में मेरी जिन्दगी है। उद्घोषणा, यशायाह 26: 8 पर आधारित है - ‘‘हे यहोवा, तेरे न्याय के मार्ग में हम लोग तेरी बाट जोहते आये हैं&amp;amp;nbsp;; तेरे नाम के स्मरण की हमारे प्राणों में लालसा बनी रहती है।’’ यहाँ मात्र एक शरीर नहीं है अपितु एक प्राण। यहाँ मात्र एक प्राण नहीं है, अपितु एक धुन और एक लालसा के साथ एक प्राण है। यहाँ मात्र पसन्द किये जाने की या सॉफ्ट-बॉल और सीपियों की लालसा नहीं है, यहाँ, अत्याधिक महान्, और अपरिमेय सुन्दर, और असीम मूल्यवान् और अनन्त सुन्तुष्टि देने वाली किसी चीज की लालसा है - परमेश्वर का नाम और महिमा - ‘‘तेरा नाम और तेरी कीर्ति, हमारे प्राणों की लालसा है’’ (अंग्रेजी से सही अनुवाद)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही जानने के लिए मैं जीवित हूँ और अनुभव करने की प्रतीक्षा करता हूँ। मेरे जीवन और जिस कलीसिया में मैं सेवा करता हूँ उसका ‘जीवन-लक्ष्य कथन’: ‘‘हम विद्यमान हैं - मैं विद्यमान हूँ - सभी लोगों के आनन्द के लिए सभी चीजों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए, एक धुन को फैलाना।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको इसे वैसा नहीं कहना पड़ेगा जैसा कि मैं इसे कहता हूँ। आपको इसे वैसा नहीं कहना पड़ेगा जैसा ‘लुई गिगलियो’ इसे कहता है (या जैसा ‘बेथ मूर’ इसे कहता है या जैसा ‘वूडी बॉकम’ इसे कहता है)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन जो भी आप करते हैं, इसे कहने के लिए अपनी धुन खोजिये और अपना रास्ता खोजिये और इसके लिए जीवित रहिये और इसके लिए मर जाइये। और आप एक ऐसा अन्तर ले आयेंगे जो बना रहेगा। आप पौलुस प्रेरित के समान होंगे। किसी और के पास अपने जीवन के लिए एक अधिक एकनिष्ठ दर्शन नहीं था जैसा कि पौलुस के पास। वह इसे विभिन्न तरीकों से कह सकता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; प्रेरित 20: 24:- ‘‘परन्तु मैं अपने प्राण को कुछ नहीं समझता: कि उसे प्रिय जानूं, बरन यह कि मैं अपनी दौड़ को, और उस सेवकाई को पूरी करूं, जो मैं ने परमेश्वर के अनुग्रह के सुसमाचार पर गवाही देने के लिये प्रभु यीशु से पाई है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक चीज का महत्व था: मुझे सौंपा गया काम पूरा करूं, मेरी दौड़ दौड़ूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फिलिप्पियों 3: 7-8:- ‘‘परन्तु जो जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं कैसे आपकी सहायता करूं&amp;amp;nbsp;? मैं इस ‘वन डे’ के इस एक क्षण में परमेश्वर द्वारा कैसे उपयोग हो सकता हूँ कि आप में एक एकमात्र महान् वास्तविकता के लिए, एक एकमात्र धुन जागृत करूं जो आपको स्वतंत्र करे और आपको छोटे स्वप्नों से मुक्त करे और आपको पृथ्वी के छोरों तक भेजे&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर, जो मैं सोचता हूँ कि प्रभु ने मुझे दिया, ये था:- उन्हें धर्मशास्त्र की एक आयत तक ले जाओ जो उस केन्द्र के अधिकतम निकट है जितना तुम जा सकते हो और उन्हें दिखाओ कि पौलुस ने वहाँ क्यों कहा, जब वह कहता है:- &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयत गलतियों 6: 14 है:- ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा इसे सकारात्मक रूप में बयान करने के लिए:- केवल यीशु मसीह के क्रूस में घमण्ड कीजिये। यह एक एकमात्र योजना है। एक एकमात्र लक्ष्य। एक एकमात्र धुन। केवल क्रूस में घमण्ड कीजिये। इस शब्द का अनुवाद किया जा सकता है, ‘‘में उल्लासित’’ अथवा ‘‘में आनन्दित’’। केवल मसीह के क्रूस में उल्लासित रहिये। केवल मसीह के क्रूस में आनन्दित रहिये। पौलुस कहता है कि इसे आपकी एकमात्र धुन बने रहने दीजिये, आपका एकमात्र घमण्ड, और आनन्द और उल्लास। इस महान् क्षण में जो ‘वन डे’ कहलाता है, होने दीजिये कि वो एक चीज जिससे आप प्रेम करते हैं, वो एक चीज जिसे आप संजोते हैं, वो एक चीज जिस में आप आनन्दित होते हैं और जिस पर उल्लासित होते हैं, यीशु मसीह का क्रूस हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दो कारणों से, ये चैंकाने वाला है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1) एक ये है कि ये ऐसा कहने के समान है: केवल इलेक्ट्र्कि चेयर (विद्युत-कुर्सी) में घमण्ड कीजिये। केवल गैस-कक्ष में उल्लासित होइये। केवल प्राणघातक इन्जेक्शन में आनन्दित होइये। आपके एक घमण्ड और एक आनन्द और एक उल्लास को फांसी की रस्सी होने दीजिये। ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।’’ प्राणदण्ड का कोई और तरीका जो कभी अविश्कार किया गया था, क्रूस पर कीलों से जड़ दिये जाने से अधिक कठोर और यंत्रणा देने वाला नहीं था। ये भयंकर था। बिना चिल्लाये और अपने बालों को नोंचे और अपने कपड़ों को फाड़े - आप इसे देख नहीं सकते थे। इसे अपने जीवन की एकमात्र धुन होने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2) ये एक चीज है जो पौलुस के शब्दों के बारे में चैंकाने वाली है। दूसरी ये है कि वह कहता है कि केवल यही आपके जीवन का घमण्ड होना है। एकमात्र आनन्द। एकमात्र उल्लास। ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे उसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? वास्तव में&amp;amp;nbsp;? कोई और घमण्ड नहीं&amp;amp;nbsp;? कोई और उल्लास नहीं&amp;amp;nbsp;? कोई और आनन्द नहीं, यीशु के क्रूस के सिवाय - यीशु की मृत्यु के सिवाय&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन स्थानों के बारे में क्या, जहाँ पौलुस स्वयँ, अन्य चीजों के लिए वही शब्द ‘‘घमण्ड’’ या ‘‘उल्लास’’ उपयोग करता है&amp;amp;nbsp;? उदाहरण के लिए: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 5: 2:- ‘‘परमेश्वर की महिमा की आशा पर घमण्ड करें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; रोमियों 5: 3, 4:- ‘‘केवल यही नहीं, बरन हम क्लेशों में भी घमण्ड करें, यही जानकर कि क्लेश से धीरज और धीरज से खरा निकलना, और खरे निकलने से आशा उत्पन्न होती है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2 कुरिन्थियों 12: 9:- ‘‘मैं बड़े आनन्द से अपनी निर्बलताओं पर घमण्ड करूंगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1 थिस्सलुनिकियों 2: 19:- ‘‘हमारी आशा, या आनन्द या बड़ाई का मुकुट क्या है&amp;amp;nbsp;? क्या … तुम ही न होगे&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो, यदि पौलुस इन सब बातों में घमण्ड व उल्लास कर सकता है, तब पौलुस का क्या अर्थ है - कि वह ‘‘ऐसा न हो किसी बात का घमण्ड करे, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का’’&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन उसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? क्या यह मात्र दोमुही बातचीत है&amp;amp;nbsp;? आप एक बात में उल्लासित होते हैं और कहते हैं कि आप किसी अन्य बात में उल्लासित हो रहे हैं&amp;amp;nbsp;? नहीं। एक बहुत गूढ़ कारण है ये कहने के लिए - कि किसी भी चीज में सभी उल्लास, सभी आनन्द, सभी धमण्ड करना, यीशु मसीह के क्रूस में आनन्द करना होना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसका अर्थ यह है कि, एक मसीही के लिए, सभी अन्य घमण्ड, क्रूस में घमण्ड करना भी होना चाहिए। किसी भी अन्य चीज में सब प्रकार का उल्लास, क्रूस में उल्लास रहना चाहिए। यदि आप महिमा की आशा में उल्लासित रहते हैं तो आपको मसीह के क्रूस में उल्लासित रहना चाहिए। यदि आप क्लेशों में घमण्ड करते हैं क्योंकि क्लेश से आशा उत्पन्न होती है तो आपको मसीह के क्रूस में घमण्ड करना चाहिए। यदि आप अपनी दुर्बलताओं में घमण्ड करते हैं, या परमेश्वर के लोगों में, तो आपको मसीह के क्रूस में घमण्ड करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मामला ये क्यों है&amp;amp;nbsp;? इस कारण से:- छुटकारा पाये हुए पापियों के लिए, हर एक भली चीज - निःसंदेह हर एक बुरी चीज, जो परमेश्वर भली में बदल देता है - हमारे लिए मसीह के क्रूस के द्वारा प्राप्त की गई थी। मसीह की मृत्यु से हटकर, पापियों को और कुछ नहीं वरन् ईश्वरीय-दण्ड मिलता है। मसीह के क्रूस से हटकर, केवल दण्डाज्ञा है। इसलिए हर एक चीज जो आप मसीह में उपभोग करते हैं - एक मसीही के रूप में, एक व्यक्ति के रूप में जो मसीह का भरोसा करता है - मसीह की मृत्यु के कारण है। और इसलिए सब बातों में आपका सभी प्रकार से आनन्दित होना, क्रूस में आनन्दित होना रहना चाहिए जहाँ आपकी सभी आशीषें, आपके लिए परमेश्वर के पुत्र, यीशु मसीह की मृत्यु की कीमत पर खरीदी गई थीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन कारणों में से एक, कि हम उतना मसीह-केन्द्रित और क्रूस-संतृप्त नहीं हैं जितना कि हमें होना चाहिए, ये है कि हमने ये स्पष्ट रूप से अनुभव नहीं किया है कि हर एक चीज - हर भली चीज और हर बुरी चीज जो परमेश्वर, उसके छुटकारा पाये हुए बच्चों के लिए भली में बदल देता है, हमारे लिए मसीह की मृत्यु के द्वारा खरीदी गई थी। हम, जिन्दगी और श्वास और स्वास्थय और मित्रों और हर एक चीज को, सरलता से सुनिष्चित मान लेते हैं। हम सोचते हैं कि ये हमारा अधिकार है । किन्तु तथ्य ये है कि यह अधिकार के द्वारा हमारा नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम दोगुने तौर पर इसके अपात्र हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1) हम सृष्टि हैं और हमारा सृष्टिकर्ता बाध्य या वचनबद्ध नहीं था कि हमें कुछ भी दे - जिन्दगी या स्वास्थय और कुछ भी नहीं। ‘वह’ देता है, ‘वह’ ले लेता है, और ‘वह’ हमारे साथ कुछ अन्याय नहीं करता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 2) और अपने सृष्टिकर्ता पर बिना किसी दावे के, सृजित प्राणी होने के अलावा, हम पापी हैं। हम ‘उसकी’ महिमा से रहित हैं। हमने ‘उसे’ अनदेखा किया और ‘उसकी’ आज्ञा का उल्लंघन किया और ‘उसे’ प्रेम करने व विश्वास करने में असफल रहे हैं। ‘उसके’ न्याय का क्रोध हमारे विरुद्ध भड़क गया है। हम ‘उस’ से जिस भी चीज की पात्रता रखते हैं वो है न्याय। इसलिए हर एक श्वास जो हम लेते हैं, हर बार जब हमारा दिल धड़कता है, प्रतिदिन जो सूरज ऊगता है, हर क्षण जो हम अपनी आँखों से देखते या हमारे कानों से सुनते हैं या अपने मुँह से बोलते हैं या अपने पैरों से चलते हैं, पापियों के लिए मुफ्त और अनर्जित वरदान/उपहार है, जो केवल ईश्वरीय-दण्ड की पात्रता रखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ये वरदान हमारे लिए किसने खरीदा&amp;amp;nbsp;? यीशु मसीह ने। और ‘उसने’ इन्हें किस तरह खरीदा&amp;amp;nbsp;? ‘अपने’ लोहू के द्वारा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन में प्रत्येक आशीष, मसीह के क्रूस को आवर्धित करने के उद्देश्य से है, या इसे दूसरे ढंग से कहें, जीवन में हर एक अच्छी चीज, मसीह को और उसे क्रूसघातित होने को बड़ा बनाने के लिए है। अतः, उदाहरण के लिए, पिछले सप्ताह हमारी 1991 की ‘डॉज़ स्पिरिट’ कार पूरी तरह चकनाचूर हो गई, लेकिन किसी को चोट नहीं लगी। और उस सुरक्षा में मैं उल्लासित हूँ। मैं उसमें घमण्ड करता हूँ। लेकिन क्यों किसी को चोट नहीं लगी&amp;amp;nbsp;? वो मेरे और मेरे परिवार के लिए एक वरदान था, जिसे पाने का हम में से कोई भी पात्र नहीं है। हम पापी हैं और मसीह से हटकर, स्वभाव से ही क्रोध की सन्तान हैं। तो कैसे हमें हमारे भले के लिए ऐसा वरदान मिला&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- मसीह हमारे पापों के लिए क्रूस पर मरा, और हमारे ऊपर से परमेश्वर के क्रोध को हटा दिया, और हमारे लिए परमेश्वर का सर्वशक्तिमान् अनुग्रह सुरक्षित कर दिया, जो सब बातों में, मिलकर हमारे लिए भलाई उत्पन्न करता है, हालांकि हम इसकी योग्यता नहीं रखते, फिर भी। अतः जब मैं अपनी सुरक्षा में उल्लासित होता हूँ, मैं मसीह के क्रूस में उल्लासित हो रहा हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और उस कार के लिए बीमा कम्पनी ने हमें 2800 डॉलर चुकाया और ‘नोएल’ ने उस पैसे को लिया और ‘आइओवा’ को गया और एक ‘92 शेवी ल्यूमिना’ खरीदा और बर्फबारी में उसे घर तक चला के लाया। और अब हमारे पास पुनः एक कार है। और मैं इतने अधिक उदार दान के अद्भुत अनुग्रह में फूले नहीं समाता। ठीक उसी प्रकार। आप अपनी कार को क्षतिग्रस्त कर लेते हैं। आप बिना चोट के बाहर आ जाते हैं। बीमा पैसे चुकाता है। आप को दूसरी मिल जाती है। और ऐसे आगे बढ़ जाते हैं मानो कुछ भी नहीं हुआ था। और धन्यवाद में मैं अपना सिर झुकाता हूँ और यहाँ तक कि इन छोटी पदार्थी चीजों की अनकही दयाओं में उल्लासित होता हूँ। ये सारी दयाएँ कहाँ से आती हैं&amp;amp;nbsp;? यदि आप एक उद्धार पाये हुए पापी हैं, यीशु में एक विश्वासी, तो वे क्रूस के द्वारा आती हैं। क्रूस से हटकर, केवल न्याय है - एक समय तक धीरज और दया, किन्तु उसके बाद, यदि ठुकराये गए, वो सभी दया, केवल न्याय को भड़काने का काम करती है। इसलिए हर एक वरदान, लोहू से खरीदा हुआ वरदान है। और सब प्रकार का घमण्ड करना - सभी उल्लास - क्रूस में घमण्ड करना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझ पर हाय, यदि मैं किसी आशीष में उल्लास करता हूँ जब तक कि मेरा उल्लासित होना मसीह के क्रूस में उल्लासित होना नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कहने का दूसरा तरीका ये है कि क्रूस की उद्देश्य, मसीह की महिमा है। क्रूस में परमेश्वर का लक्ष्य ये है कि मसीह सम्मानित हो। जब पौलुस गलतियों 6: 14 में कहता है, ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का,’’ वह कह रहा है कि परमेश्वर की इच्छा ये है कि क्रूस सदैव आवर्धित किया जावे - कि क्रूसघातित मसीह सदा हमारा घमण्ड और उल्लास और हमारा आनन्द और हमारी स्तुति बना रहे - कि मसीह को हमारे जीवन की हर भली चीज में महिमा और धन्यवाद और आदर मिले - और हर एक बुरी चीज में भी जिसे परमेश्वर भली में बदल देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन अब यहाँ एक प्रश्न है:- मसीह की मृत्यु में यदि परमेश्वर का यही लक्ष्य है - यथा, कि ‘‘क्रूसधातित मसीह’’ सभी चीजों के लिए सम्मानित और महिमित किया जावे, तब मसीह को वो महिमा कैसे मिलेगी जिसकी पात्रता ‘वह’ रखता है&amp;amp;nbsp;? उत्तर ये है कि बच्चों और जवानों और वयस्कों को यह सिखाया जाना है कि ये चीजें ऐसी हैं। अथवा इसे दूसरे ढंग से कहें:- मसीह के क्रूस में घमण्ड का स्रोत, मसीह के क्रूस के विषय में शिक्षा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये है मेरा काम:- आपको ये बातें सिखाने के द्वारा यीशु के लिए महिमा प्राप्त करूं। और तब आपका काम है कि उन पर चलने के द्वारा और उन्हें और अधिक लोगों को सिखाने के द्वारा, यीशु के लिए और महिमा प्राप्त करें। यीशु के बारे में शिक्षा, यीशु में घमण्ड करने के लिए है। और यदि हम चाहते हैं कि क्रूस के सिवाय और किसी में उल्लास न हो, तब हमें क्रूस के बारे में - और क्रूस के तले - शिक्षा में लगे रहना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा हमें यह कहना चाहिए, ‘‘क्रूस पर।’’ क्रूस पर शिक्षा, क्रूस पर घमण्ड की ओर ले जायेगा। मेरे कहने का क्या अर्थ है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 14 के शेष भाग को देखें:- ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ क्रूस में घमण्ड तब होता है जब आप क्रूस पर होते हैं। क्या पद 14 यही नहीं कहती है&amp;amp;nbsp;? संसार मेरी दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया है और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। संसार मेरे लिए मर गया है और मैं संसार के लिए मर गया हूँ। क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि मैं क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ। जब हम क्रूस पर होते हैं तब हम क्रूस पर घमण्ड करना और क्रूस पर उल्लासित होना सीखते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ये कब हुआ&amp;amp;nbsp;? आप कब क्रूस पर चढ़ाये गए&amp;amp;nbsp;? उत्तर गलातियों 2: 20 में है, ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।’’ जब मसीह मरा, हम मर गए। मसीह की मृत्यु का महिमित अर्थ ये है कि जब ‘वह’ मरा, ‘उसके’ सभी अपने ‘उसमें’ मर गए। वो मृत्यु, जो ‘वह’ हम सब लिए मरा, हमारी मृत्यु बन जाती है जब हम विश्वास के द्वारा मसीह से संयुक्त हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु आप कहते हैं, ‘‘क्या मैं जिन्दा नहीं हूँ&amp;amp;nbsp;? मैं जिन्दा महसूस करता हूँ।’’ तो, यहां पर शिक्षाण की एक आवश्यकता है। हमें अवश्य ही सीखना चाहिए कि हमें क्या हुआ। हमें ये बातें अवश्य ही सिखाया जाना चाहिए। इसी कारण गलातियों 2: 20 और 6: 14 बाइबल में हैं। परमेश्वर हमें सिखा रहा है कि हमें क्या हुआ, ताकि हम अपने आप को जान सकें और हमारे साथ कार्य करने की ‘उसका’ तरीका जान सकें और जैसा कि हमें होना चाहिए ‘उसमें’ और ‘उसके’ पुत्र में और ‘उसके’ क्रूस में उल्लासित हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम पुनः गलातियों 2: 20 को पढ़ते हैं, ये देखने के लिए कि, हाँ, हम मर गए हैं और हाँ, हम जिन्दा हैं। ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूं, (अतः मैं मर गया हूं, और वह कहता जाता है); और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है (क्यों&amp;amp;nbsp;? क्योंकि मैं मर गया, अर्थात् मेरा पुराना विद्रोही, अविश्वासी मनुष्यत्व मर गया, और वह कहता जाता है); और मैं शरीर में अब जो जीवित हूं (अतः, हाँ, मैं जिन्दा हूँ, परन्तु ये वही ‘‘मैं’ नहीं है, जैसा कि वो ‘‘मैं’ जो मर गया) तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है, जिस ने मुझ से प्रेम किया, और मेरे लिये अपने आप को दे दिया।’’ दूसरे शब्दों में, ‘‘मैं’’ जो जीवित है, विश्वास का नया ‘‘मैं’’ है। नयी सृष्टि जीवित रहती है। विश्वासी जीवित रहता है। पुराना मनुष्यत्व यीशु के साथ क्रूस पर मर गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यदि आप पूछें, ‘‘इस वास्तविकता से जुड़ने की कुंजी क्या है&amp;amp;nbsp;? ये मेरा कैसे हो सकता है&amp;amp;nbsp;? उत्तर, गलातियों 2: 20 में विश्वास के बारे में शब्दों में समाविष्ट है। ‘‘मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूं, जो परमेश्वर के पुत्र पर है।’’ ये है जुड़ाव। परमेश्वर आपको विश्वास के द्वारा ‘उसके’ पुत्र से जोड़ता है। और जब ‘वह’ ऐसा करता है, वहाँ परमेश्वर के पुत्र के साथ एक संयुक्तता है ताकि ‘उसकी’ मृत्यु आपकी मृत्यु बन जाती है और ‘उसका’ जीवन आपका जीवन बन जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इस सब को गलतियों 6: 14 पर ले चलिये, ‘‘पर ऐसा न हो, कि मैं और किसी बात का घमण्ड करूं, केवल हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस का जिस के द्वारा संसार मेरी दृष्टि में और मैं संसार की दृष्टि में क्रूस पर चढ़ाया गया हूं।’’ क्रूस के सिवाय और किसी चीज में घमण्ड मत कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और कैसे मैं इतना मूलतः क्रूस-केन्द्रित बन सकता हूँ - ताकि मेरे सभी उल्लास या आनन्द का सम्बन्ध क्रूस से हो&amp;amp;nbsp;? उत्तर:- पूर्ण रूप से समझिये कि जब मसीह क्रूस पर मरा, आप मर गए; और जब आपने ‘उस’ पर विश्वास किया, वो मृत्यु आपके जीवन में प्रभावकारी हुई। पौलुस कहता है, यह संसार के लिए आपकी मृत्यु और आपके लिए संसार की मृत्यु है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अर्थ:- जब आप मसीह में अपना विश्वास रखते हैं, संसार के प्रति आपकी बन्धुआई टूट जाती है, और संसार का अभिभूत करने वाला प्रलोभन टूट जाता है। संसार के लिए आप एक शव हैं, और संसार आपके लिए एक लाश है। अथवा इसे सकारात्मक रूप में रखने के लिए, पद 15 के अनुसार, आप एक ‘‘नयी सृष्टि’’ हैं। पुराना ‘आप’ मरा हुआ है। एक नया ‘आप’ जीवित है। और वो नया ‘आप’, विश्वास का ‘आप’ है। और विश्वास जिसमें उल्लासित होता है, वो संसार नहीं, अपितु मसीह है, और विशेषतया क्रूसित मसीह। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार से आप इतना अधिक क्रूस-केन्द्रित बन जाते हैं कि आप पौलुस के साथ कहते हैं, ‘‘मैं और किसी बात का घमण्ड नहीं करूंगा, सिवाय हमारे प्रभु यीशु मसीह के क्रूस में।’’ संसार अब आगे को मेरा धन नहीं है। ये मेरे जीवन और मेरी सन्तुष्टि और मेरे आनन्द का स्रोत नहीं है। मसीह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन कार दुर्घटना में सुरक्षा के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? इंश्योरेन्स के भुगतान के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? क्या आपने नहीं कहा कि आप इस बारे में खुश थे&amp;amp;nbsp;? क्या वो संसार नहीं है&amp;amp;nbsp;? तो क्या आप संसार के लिए मर गए हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं हो सकता था। मैं ऐसी आशा करता हूँ। क्योंकि संसार के लिए मृत हो जाने का अर्थ, संसार से बाहर चले जाना नहीं है। और इसका ये अर्थ नहीं कि संसार की चीजों के बारे में - कुछ नकारात्मक और कुछ सकारात्मक - महसूस नहीं करना है (1 यूहन्ना 2: 15; 1 तीमुथियुस 4: 3)। इसका अर्थ है कि संसार में प्रत्येक वैध सुख, मसीह के प्रेम का एक लोहू-खरीदा प्रमाण बन जाता है, और क्रूस में घमण्ड करने का एक अवसर। हम इंश्योरेन्स के भुगतान के प्रति मृत हैं जब पैसा वो चीज नहीं है जो हमें सन्तुष्ट करती है, अपितु क्रूसित मसीह, ‘प्रदान करने वाला’, सन्तुष्ट करता है। जब हमारा हृदय, आशीष की किरण के साथ, क्रूस में विद्यमान स्रोत की ओर, वापिस दौड़ता है, तब आशीष की सांसारिकता मृत हो जाती है, और क्रूसित मसीह ही सब कुछ होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूस में - उल्लासित होने के लिए शिक्षा का यही लक्ष्य है। ओ, परमेश्वर हमें मसीह व क्रूसित मसीह की महिमा के लिए स्वप्न देखने और योजना बनाने और कार्य करने और देने और सिखाने और जीने की शक्ति प्रदान करे&amp;amp;nbsp;!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>‘उसके’ पुत्र से सम्बन्धित, परमेश्वर का समाचार</title>
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				<updated>2017-01-27T20:44:18Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;‘उसके’ पुत्र से सम्बन्धित, परमेश्वर का समाचार&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|God's Good News Concerning His Son}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का दास है, और प्रेरित होने के लिये बुलाया गया, और परमेश्वर के उस सुसमाचार के लिये अलग किया गया है, 2 जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, 3 अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में प्रतिज्ञा की थी, जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ, 4 और पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले सप्ताह हमने पद 1 में से देखा कि पौलुस मसीह यीशु का एक बन्धुआ-दास है, अर्थात्, वह खरीदा गया था और मसीह के स्वामित्व में है और ‘उसके’ द्वारा नियंत्रित होता है। वह मसीह को प्रसन्न करने के लिए जीवित है। और, इसलिए कि पौलुस की पहल तथा पौलुस की दास-मजदूरी पर किसी तरह निर्भर रहते हुए मसीह, के बारे में हम गलत धारणा न पायें , हमें रोमियों 15:18 में ध्यान देना चाहिए कि उस सब के लिए जो पौलुस स्वयं मसीह की सेवा में करता है, पौलुस, मसीह पर निर्भर है: ‘‘क्योंकि उन बातों को छोड़, मुझे और किसी बात के विषय में कहने का हियाव नहीं, जो मसीह ने अन्यजातियों की आधीनता के लिये वचन, और कर्म और . . . से मेरे ही द्वारा किए।’’ दूसरे शब्दों में , पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है, जिसके द्वारा मसीह, पौलुस की सहायता करता है। ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उस की सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया, कि आप सेवा टहल करे’’ (मरकुस 10: 45; साथ ही 1 कुरिन्थियों 15:10; 1 पतरस 4: 11 भी देखिये)। यदि हम यह न देखें कि पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है जिसकी आपूर्ति मसीह करता है, ताकि पौलुस की सेवा के लिए मसीह को महिमा मिले, तो हम रोमियों की पत्री के सम्पूर्ण अर्थ को प्रारम्भ से ही कतरा कर निकल जायेंगे (देखिये 1 पतरस 4:11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सभी आपूर्तियाँ करनेवाला मसीह वो है, जिससे हम अगले वाक्यांश में मिले थे, ‘‘प्रेरित होने के लिए बुलाया गया।’’ मसीह ने पौलुस को दमिश्क के मार्ग पर पुकारा और सच्ची शिक्षा के साथ चर्च (कलीसिया) की नींव रखने में, उसे ‘उसका’ आधिकारिक प्रतिनिधि होने का कार्यभार सौंपा। फिर हमने परमेश्वर के प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सर्व-योजना बनाने वाले हाथ को अगले वाक्यांश में देखा, ‘‘परमेश्वर के . . . सुसमाचार के लिये अलग किया गया।’’ गलतियों 1: 15 कहता है, परमेश्वर ने पौलुस को उसके जन्म से पहले ही अलग कर लिया था। परमेश्वर ‘उसके’ सुसमाचार के आगमन और प्रकाशन के लिए इतनी जलन रखता है कि ‘वह’ कुछ भी संयोगवश होने का मौका नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आज, हम इन शब्दों को देखते हैं, ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ (1: 1), और यह कि 2-4 आयतों में पौलुस इसे कैसे खोलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बारे में पौलुस जो पहिली बात कहता है, वो उसके ठीक अनुक्रम में है जो हमने अभी देखी है: कि परमेश्वर ये दिखाने के लिए जलन रखता है कि इसके पूर्व कि यह घटित होता, सुसमाचार की योजना बहुत पहिले बनायी गई थी। पद 2: ‘‘ . . . (पौलुस) सुसमाचार के लिये अलग किया गया (था) जिस की उस ने (परमेश्वर ने) पहिले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 2 में से इन तीन बातों पर विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) परमेश्वर का सुसमाचार, पुराना नियम की प्रतिज्ञाओं का पालन/सम्पादन है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक नया धर्म नहीं है। यह एक पुराने धर्म की पालन/सम्पादन है। पुराना नियम का परमेश्वर, नया नियम का परमेश्वर है। ‘वह’ उस समय जो तैयार कर रहा था व प्रतिज्ञा कर रहा था, वो ‘उसने’ यीशु के आने में पूरा किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सैंकड़ों साल बीत जाते हैं। यहूदी जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या मुक्तिदाता कभी आयेगा। वे भयंकर वेदना में से जाते हैं। तब परमेश्वर कार्य करता है और प्रतिज्ञा पूरी होती है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर का भरोसा किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत हो सकता है मानो ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया। किन्तु ‘वह’ भूलता नहीं है। अतः पद 2, न केवल सुसमाचार के अन्तर्विषय के बारे में एक कथन मात्र है, अपितु, इसका विश्वास करने के लिए एक कारण भी है। यदि हम यह देख सकते हैं कि परमेश्वर ने ‘उसके’ आने के शताब्दियों पूर्व मसीह की प्रतिज्ञा की थी और यह कि बहुत विस्तार में ‘वह’ ये प्रतिज्ञाएं पूरी करता है, तो हमारा विश्वास मजबूत हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3) यह पवित्र, ‘आत्मा’-प्रेरित रचनाएँ हैं, जिनका हमें सम्मान तथा विश्वास करना चाहिए।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पवित्र-शास्त्र की हमारी धर्मशिक्षा के लिए, पद 2 के विशाल रूप से महत्वपूर्ण उलझावों पर ध्यान दीजिये। प्रथम, परमेश्वर है; इसके बाद एक प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर करना चाहता है; फिर भविष्यवक्ता हैं ‘‘जिनके द्वारा’’ (ठीक से ध्यान दीजिये, जिनसे नहीं, अपितु जिनके ‘‘द्वारा’’, परमेश्वर स्वयं वक्ता बने रहते हुए) ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञा कहता है; इसके बाद रचनाएँ हैं; और ये रचनाएँ पवित्र कही जाती हैं। वे पवित्र क्यों हैं - अन्य सभी रचनाओं से अलग-थलग की गईं और अपने में अनोखी तथा बहुमूल्य&amp;amp;nbsp;? क्योंकि ये परमेश्वर है जो उन में बात करता है। आयत को सावधानी से पढि़ये: ‘‘उस (परमेश्वर) ने पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ परमेश्वर ने पवित्र-शास्त्र में प्रतिज्ञा की । परमेश्वर पवित्र-शास्त्र में बातें कर रहा है। यही है जो उन्हें पवित्र बनाता है। पवित्र-शास्त्र के लिए पौलुस की यही समझ है और हमारी भी होनी चाहिए। यदि आप ने कभी आश्चर्य किया हो कि क्यों हमारी बाइबलों के मुख-पृष्ठ पर ‘‘पवित्र बाइबल’’ लिखा होता है, तो रोमियों 1: 2 इसका उत्तर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ऐसा न हो कि रोमियों की पत्री की हमारी व्याख्या के लिए, इसकी निकट की सुसंगतता, से हम चूक जायें, तीन बातें याद रखिये: (1) 1: 1 में पौलुस, कलीसिया की नींव डालने वाले के रूप में मसीह की ओर से अधिकार के साथ बोलते और लिखते हुए, स्वयँ को मसीह यीशु के प्रेरित के रूप में देखता है - दूसरे शब्दों में , पुराने समय के एक भविष्यवक्ता के समान (इफिसियों 2: 20)। (2) 1 कुरिन्थियों 2: 13 में पौलुस ने कहा, ‘‘हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु ‘आत्मा’ की सिखायी हुई बातों में , आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिलाकर सुनाते हैं।’’ दूसरे शब्दों , पौलुस अपने शिक्षण-कार्य के लिए एक विशेष प्रेरणा का दावा करता है। (3) 2 पतरस 3: 1 में, पतरस कहता है कि कुछ ‘‘लोग उन&amp;amp;nbsp;;पौलुस के लेखोंद्ध के अर्थों को भी पवित्र शास्त्र की और बातों की नाईं खींच तान करते हैं।’’ अतः पतरस, पौलुस की पत्रियों को पवित्र शास्त्र के साथ उसी श्रेणी में रखता है, जिसके बारे में हम यहाँ पढ़ रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी कारण उपदेश देना हमारे जीवन में इतना गम्भीर है। हम विश्वास करते हैं कि रोमियों को पौलुस की पत्री, परमेश्वर का वचन है, मात्र मनुष्य के शब्द नहीं। पवित्र रचनाओं में, परमेश्वर की प्रेरणा से सुसमाचार की प्रतिज्ञा की गई थी; और परमेश्वर की प्रेरणा से पवित्र लेखों में हमारे लिए खोला गया और संरक्षित किया गया है। यही हम विश्वास करते हैं, और सच्चाई और धर्मशिक्षा और प्रचार और आराधना और सब कुछ जो संसार में है, के बारे में हम जिस तरह दृष्टिकोण रखते हैं, उसमें ये एक विशाल अन्तर लाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में पहली बात जो पौलुस कहता है, यह है कि इसकी योजना और भविष्यवाणी बहुत पहले हो चुकी थी (1: 2)। यह वो सुसमाचार है ‘‘जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . अपने पुत्र के विषय में . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में दूसरी बात जो वह कहता है(1: 3), वो यह है कि इसका सम्बन्ध उसके ‘पुत्र’ से है। ‘‘ . . . परमेश्वर के उस सुसमाचार . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, अपने पुत्र . . . के विषय में प्रतिज्ञा की थी, . . . ।’’ परमेश्वर के सुसमाचार का सम्बन्ध, परमेश्वर के ‘पुत्र’ से है। हमें परमेश्वर के पुत्र के बारे में, दो बातें अभी तुरन्त स्पष्ट करना आवश्यक है, अन्यथा हम दूर भटक जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) इसके पूर्व कि ‘वह’ मानव बना, परमेश्वर का ‘पुत्र’ अस्तित्व में था।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 8: 3 को देखिये, ‘‘क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिए भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।’’ परमेश्वर ने उसे भेजा कि वह मानव शरीर धारण कर ले। अतः इसके पूर्व कि वह मनुष्य बने, ‘पुत्र’, परमेश्वर के ‘पुत्र’ के रूप में, अस्तित्व में था। इसका अर्थ है कि एक अत्यन्त अद्वितीय रूप में - उस तरह नहीं जैसे हम परमेश्वर के पुत्र हैं - मसीह, परमेश्वर का पुत्र है और था (रोमियों 8: 14, 19)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) मसीह स्वयं परमेश्वर है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 9: 5 में, इस्राएल के सौभाग्यों का उल्लेख करते हुए, पौलुस कहता है, ‘‘ . . . पुरखे भी उन्हीं के हैं, और मसीह भी शरीर के भाव से उन्हीं (अर्थात्, इस्राएल) में से हुआ, जो सब के ऊपर परम परमेश्वर युगानुयुग धन्य है। आमीन।’’ और कुलुस्सियों 2: 9 में पौलुस कहता है, ‘‘उस (मसीह) में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है।’’ अतः जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर का सुसमाचार, ‘उसके’ ‘पुत्र’ से संबंधित है, उसका अर्थ है कि इसका संबंध ईश्वरीय, पूर्ववर्ती ‘पुत्र’ से है। परमेश्वर का सुसमाचार इस बारे में नहीं है कि परमेश्वर मानवीय मामलों का बेहतर ढंग से व्यवस्थित कर रहा है। ये इस बारे में है कि परमेश्वर, अपने पुत्र के व्यक्तित्व में जो पिता का परिपूर्ण प्रतिरूप है और स्वयं परमेश्वर है, मानवीय मामलों में बाहर से गहरा प्रभाव डाल रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ पर यह कहने के द्वारा भारी वजन डालता है, प्रथम, कि इसके घटित होने के बहुत पूर्व ही यह परमेश्वर द्वारा - प्रतिज्ञा किया हुआ - सुनियोजित है,, और, द्वितीय, कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है। विश्व के प्रभु-सत्ता सम्पन्न सृष्टिकर्ता ने, संसार के लिए भली चीजों की योजना बनायी है, और इस योजना के केन्द्र में ‘उसका’ ‘पुत्र’ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में तीसरी बात जो पौलुस कहता है, वो यह है कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ ‘शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ।’’ यह तुरन्त दो बातें कहता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) परमेश्वर का ‘पुत्र’ मनुष्य बना।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वह’ पैदा हुआ। वो काम जो उसे करना था - जिस जीवन-लक्ष्य पर वह था - इसकी मांग थी कि ‘वह’ अपने ईश्वरीय स्वभाव के साथ, एक मानव स्वभाव धारण करे। परमेश्वर ने एक मनुष्य को चुनकर, उसे अपना पुत्र नहीं बनाया; उसने अपने सनातन, एकमात्र ‘पुत्र’ को मनुष्य बनाने का चुनाव किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) पुराना नियम में राजा दाऊद के वश में, ‘वह’ पैदा हुआ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह परमेश्वर के सुसमाचार का हिस्सा क्यों है&amp;amp;nbsp;? यह शुभ-समाचार क्यों है&amp;amp;nbsp;? उत्तर यह है कि पुराना नियम की सभी प्रतिज्ञाएँ, ‘मुक्तिदाता’ - ‘उस’ अभिषिक्त, के आगमन पर निर्भर रहीं - जो दाऊद के वश में एक राजा के रूप में राज्य करेगा और परमेश्वर के लोगों के शत्रुओं को जीतेगा और सदाकाल के लिए धार्मिकता और शान्ति ले आयेगा। ‘वह’ परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं के लिए ‘‘हाँ’’ होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराना नियम की दो प्रतिज्ञाओं पर विचार कीजिए। यिर्मयाह 23: 5, ‘‘यहोवा की यह भी वाणी है, ‘देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राजा बनकर बुद्धि से राज्य करेगा, और अपने देश में न्याय और धर्म से प्रभुता करेगा।’’’ अथवा, यशायाह 11: 10, ‘‘उस समय यिशै की जड़ (अर्थात्, यिशै की सन्तान, दाऊद का पुत्र) देश दश के लोगों के लिये एक झण्डा होगी&amp;amp;nbsp;; सब राज्यों के लोग उसे ढूँढ़ेंगे, और उसका विश्रामस्थान तेजोमय होगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर का सुसमाचार, शुभ-संदेश है कि अब, सैंकड़ों साल बाद, परमेश्वर ने ‘अपनी’ योजना व प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए कार्य किया है कि दाऊद के वंश में से एक राजा आया, और, जैसा यशायाह 9:6-7 कहता है, ‘‘प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राज- कुमार रखा जाएगा। उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी, और उसकी शान्ति का अन्त न होगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’, शुभ-समाचार है कि समय पूरा हुआ है और परमेश्वर का राज्य निकट है (मरकुस 1: 14- 15, ‘‘यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया, और कहा, ‘समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है&amp;amp;nbsp;; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो’’’)। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का संसार में आना, प्रतिज्ञा किये गए राजा, ‘दाऊद की सन्तान’ का आना था। ‘वह’ सब जातियों पर राज्य करेगा और परमेश्वर के शत्रुओं पर जय पायेगा तथा धार्मिकता व शान्ति के साथ राज्य करेगा और, यशायाह 35: 10 के अनुसार ‘‘यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सियोन में आएँगे&amp;amp;nbsp;; और उनके सिर पर सदा का आनन्द होगा&amp;amp;nbsp;; वे हर्ष और आनन्द पाएँगे और शोक और लम्बी सांस का लेना जाता रहेगा।’’ यही है जो पद 3 को ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ बनाता है। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का दाऊद की ‘सन्तान/पुत्र’ के रूप में आने का अर्थ होगा, परमेश्वर की उपस्थिति में सदा का आनन्द - परमेश्वर के सब छुड़ाए हुए लोगों के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन एक और बात है जो पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ के बारे में कहता है। इसके घटित होने से पूर्व न केवल इसकी योजना बनायी गई व प्रतिज्ञा की गई थी&amp;amp;nbsp;; और न केवल यह ‘उसके’ ईश्वरीय, पूर्ववर्ती (पहले से ही अस्तित्व में) ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है&amp;amp;nbsp;; और न केवल यह संदेश है कि पुराना नियम की आशाओं तथा परमेश्वर के राज्य में धार्मिकता व शान्ति व आनन्द के स्वप्नों को परिपूर्ण करने के लिए यह ‘पुत्र’, दाऊद के मानव पुत्र के रूप में पैदा हुआ है&amp;amp;nbsp;; अपितु, पद 4 में, पौलुस कुछ ऐसा कहता है जो सर्वनाश करने वाला और उल्लासित करने वाला, दोनों था। वह कहता है कि परमेश्वर का ‘पुत्र’, ‘‘पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं क्यों कहता हूँ कि ये सर्वनाश करने वाला था? पौलुस के दिनों में अधिकांश यहूदी लोगों ने आशा की थी कि ‘मुक्तिदाता’ सामर्थ्य व राजनैतिक नियंत्रण/अधिकार के साथ आयेगा, और संसार के अत्याचारी शासकों, रोमियों को, पराजित करेगा, और यरूशलेम में पृथ्वी पर का एक राज्य स्थापित करेगा और अपने लोगों के साथ सदा के लिए विजयी होकर जीवित रहेगा। किन्तु पद 4 में पौलुस जो कहता है उसमें अन्तर्निहित है कि पद 3 व 4 के बीच ‘दाउद का पुत्र’ मर गया। ‘वह’ मर गया! वे जिन्होंने सोचा था कि ‘वह’ ‘मुक्तिदाता’ था, उजड़ गए। मुक्तिदाता मरते नहीं हैं। वे जीवित रहते और विजित होते व शासन करते हैं। वे बन्दी नहीं बनाये जाते और पीटे नहीं जाते और ठट्ठों में नहीं उड़ाये जाते और क्रूस पर नहीं चढ़ाये जाते और अपने लोगों को निसहाय नहीं छोड़ते। यह पूरी तरह सर्वनाशकारी था। (लूका 24: 21, ‘‘परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्राएल को छुटकारा देगा’’)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस अध्याय 3 व 5 व 8 में वापस मसीह की मृत्यु पर आयेगा। किन्तु अभी के लिए, वह तुरन्त परमेश्वर के सुसमाचार में विजय के आनन्ददायक स्वर पर आ जाता है। पौलुस पद 4 में कहता है, यह मृतक ‘मुक्तिदाता’, मृतकों में से जिलाया गया। यह परमेश्वर के सुसमाचार के मर्म में है। और पौलुस इस पुनरुत्थान के बारे में दो बातें कहता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) मृतकों में से ये पुनरुत्थान, ‘‘पवित्रता के आत्मा के भाव से’’ था।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं इसका अर्थ कम से कम दो बातों में लेता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''अ. परमेश्वर के ‘पवित्र आत्मा’ ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं अपना संकेत रोमियों 8: 11 से लेता हूँ, जहाँ पौलुस कहता है, ‘‘और यदि उसी का ‘आत्मा’ जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है&amp;amp;nbsp;; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने ‘आत्मा’ के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।’’ यह सिखाता है कि हम परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जिलाये जायेंगे, जो हमारे अन्दर वास करता है, वैसे ही जैसे कि मसीह जिलाया गया था। अतः यीशु को मरे हुओं में से जिलाने में ‘आत्मा’ सम्मिलित था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''ब. लेकिन पौलुस क्यों यह असामान्य अभिव्यक्ति, ‘‘पवित्रता का आत्मा’’ उपयोग करता है, (जो नया नियम में और कहीं नहीं पाया जाता)?'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा सुझाव यह है। मृतकों के साथ व्यवहार/बर्ताव करना, एक गन्दा व्यवसाय था। जब शाऊल मृतक के साथ सम्पर्क करना चाहता था, वह एन्दोर की भूतसिद्धि करने वाली के पास गया (1 शमूएल 28: 7 से आगे), और यह एक गुप्त और अवैध पेशा था। भूत साधने वाले और शगुन निकालने वाले और टोना करने वाले, इस्राएल में घृणित थे। जब मृतक मर जाते हैं, आप उन्हें अकेला छोड़ देते हैं और उनसे कोई व्यवहार नहीं रखते। विश्वासियों के लिए आत्मायन (मृत-आत्माओं से सम्पर्क) नियम विरोध था और है। मृतकों के साथ बर्ताव करना एक प्रकार का काला-जादू रहा है, एक सुन्दर, साफ, पवित्र चीज नहीं। इस सब के अलावा। एक प्राण दण्ड पाया मृतक, मरे हुओं में से जिलाया जा रहा है, यह बात भी कई लोगों के कानों में नितान्त भयंकर और घटिया और गन्दी और अशुद्ध लगी होगी, काला-टोना और काला-जादू के समान। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन सब से ऊपर हटकर पौलुस ठीक विपरीत बात पर जोर देता है: मसीह, पवित्रता के ‘आत्मा’ के भाव से मृतकों में से जिलाया गया था, किसी अन्धकार की आत्मा या दुष्ट आत्मा या अशुद्ध आत्मा के भाव से नहीं, अपितु स्वयँ परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जो सर्वोपरि पवित्रता से चिन्हित है। यीशु को जिलाने में ‘वह’ अशुद्ध नहीं हुआ। यह करना एक पवित्र कार्य था। ये उचित और अच्छा और साफ और सुन्दर और परमेश्वर को सम्मान देने वाला था, परमेश्वर के महत्व को घटाने वाला नहीं। यह पवित्र था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) इस पुनरुत्थान के द्वारा मसीह ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा (या नियुक्त किया गया)।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर मुख्य वाक्यांश ‘‘सामर्थ्य के साथ’’ है। मैं सोचता हूँ कि एन.ए.एस.बी. और के.जे.वी. और आर.एस.वी., यह दिखाने में सही हैं कि यह वाक्यांश ‘‘परमेश्वर के पुत्र’’ को रूपान्तरित करता है। बिन्दु यह नहीं है कि पुनरुत्थान के पूर्व, मसीह परमेश्वर का पुत्र नहीं था। बिन्दु यह है कि पुनरुत्थान में मसीह, अकेलेपन तथा मानवीय सीमा व दुर्बलता में परमेश्वर का ‘पुत्र’ होने से आगे बढ़कर, सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा। मुख्य वाक्यांश है, ‘‘सामर्थ्य के साथ’’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु का वही अर्थ था जब पुनरुत्थान के बाद ‘उसने’ कहा, ‘‘स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है’’(मत्ती 28:18)। यही अर्थ पौलुस का 1 कुरिन्थियों 15: 25-26 में था, जब उसने जी उठे हुए मसीह के बारे में कहा, ‘‘जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पावों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है। सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु, मसीह राजा है। ‘वह’ अभी संसार पर राज्य कर रहा है। ‘वह’ अपने सब शत्रुओं को अपने पावों के नीचे ला रहा है। एक दिन आयेगा जब ‘वह’ अपने अदृश्य राज्य में से, प्रत्यक्ष महिमा के साथ उभर कर बाहर आयेगा, और प्रत्यक्षतः व महिमित रूप में पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करेगा। ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र’’, के द्वारा पौलुस का यही अर्थ है। ‘वह’ अभी शासन कर रहा है। ‘वह’ अपने लक्ष्यों को अपने ‘आत्मा’ और अपनी कलीसिया के द्वारा कार्यरूप में परिणित कर रहा है। और वो दिन आयेगा जब मसीह प्रत्येक शत्रु को पराजित कर देगा, और हर एक घुटना टिकेगा और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार करेगी कि ‘वह’ ही प्रभु है (फिलिप्पियों 2: 11) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो परमेश्वर के सुसमाचार की परिपूर्णता होगी (का समापन होगा)। जिसके लिए हम कहते हैं, ‘‘आमीन। हे प्रभु यीशु आ।’’&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E2%80%98%E0%A4%89%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%87%E2%80%99_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_%E0%A4%B8%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%BF%E0%A4%A4,_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0</id>
		<title>‘उसके’ पुत्र से सम्बन्धित, परमेश्वर का समाचार</title>
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				<updated>2017-01-27T20:43:56Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|God's Good News Concerning His Son}}   &amp;amp;gt; पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का दास है, और प्रेरि...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|God's Good News Concerning His Son}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पौलुस की ओर से जो यीशु मसीह का दास है, और प्रेरित होने के लिये बुलाया गया, और परमेश्वर के उस सुसमाचार के लिये अलग किया गया है, 2 जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, 3 अपने पुत्र हमारे प्रभु यीशु मसीह के विषय में प्रतिज्ञा की थी, जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ, 4 और पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले सप्ताह हमने पद 1 में से देखा कि पौलुस मसीह यीशु का एक बन्धुआ-दास है, अर्थात्, वह खरीदा गया था और मसीह के स्वामित्व में है और ‘उसके’ द्वारा नियंत्रित होता है। वह मसीह को प्रसन्न करने के लिए जीवित है। और, इसलिए कि पौलुस की पहल तथा पौलुस की दास-मजदूरी पर किसी तरह निर्भर रहते हुए मसीह, के बारे में हम गलत धारणा न पायें , हमें रोमियों 15:18 में ध्यान देना चाहिए कि उस सब के लिए जो पौलुस स्वयं मसीह की सेवा में करता है, पौलुस, मसीह पर निर्भर है: ‘‘क्योंकि उन बातों को छोड़, मुझे और किसी बात के विषय में कहने का हियाव नहीं, जो मसीह ने अन्यजातियों की आधीनता के लिये वचन, और कर्म और . . . से मेरे ही द्वारा किए।’’ दूसरे शब्दों में , पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है, जिसके द्वारा मसीह, पौलुस की सहायता करता है। ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उस की सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया, कि आप सेवा टहल करे’’ (मरकुस 10: 45; साथ ही 1 कुरिन्थियों 15:10; 1 पतरस 4: 11 भी देखिये)। यदि हम यह न देखें कि पौलुस, मसीह की सेवा उस सामर्थ्य में करता है जिसकी आपूर्ति मसीह करता है, ताकि पौलुस की सेवा के लिए मसीह को महिमा मिले, तो हम रोमियों की पत्री के सम्पूर्ण अर्थ को प्रारम्भ से ही कतरा कर निकल जायेंगे (देखिये 1 पतरस 4:11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सभी आपूर्तियाँ करनेवाला मसीह वो है, जिससे हम अगले वाक्यांश में मिले थे, ‘‘प्रेरित होने के लिए बुलाया गया।’’ मसीह ने पौलुस को दमिश्क के मार्ग पर पुकारा और सच्ची शिक्षा के साथ चर्च (कलीसिया) की नींव रखने में, उसे ‘उसका’ आधिकारिक प्रतिनिधि होने का कार्यभार सौंपा। फिर हमने परमेश्वर के प्रभुसत्ता-सम्पन्न, सर्व-योजना बनाने वाले हाथ को अगले वाक्यांश में देखा, ‘‘परमेश्वर के . . . सुसमाचार के लिये अलग किया गया।’’ गलतियों 1: 15 कहता है, परमेश्वर ने पौलुस को उसके जन्म से पहले ही अलग कर लिया था। परमेश्वर ‘उसके’ सुसमाचार के आगमन और प्रकाशन के लिए इतनी जलन रखता है कि ‘वह’ कुछ भी संयोगवश होने का मौका नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आज, हम इन शब्दों को देखते हैं, ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ (1: 1), और यह कि 2-4 आयतों में पौलुस इसे कैसे खोलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके बारे में पौलुस जो पहिली बात कहता है, वो उसके ठीक अनुक्रम में है जो हमने अभी देखी है: कि परमेश्वर ये दिखाने के लिए जलन रखता है कि इसके पूर्व कि यह घटित होता, सुसमाचार की योजना बहुत पहिले बनायी गई थी। पद 2: ‘‘ . . . (पौलुस) सुसमाचार के लिये अलग किया गया (था) जिस की उस ने (परमेश्वर ने) पहिले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 2 में से इन तीन बातों पर विचार कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) परमेश्वर का सुसमाचार, पुराना नियम की प्रतिज्ञाओं का पालन/सम्पादन है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह एक नया धर्म नहीं है। यह एक पुराने धर्म की पालन/सम्पादन है। पुराना नियम का परमेश्वर, नया नियम का परमेश्वर है। ‘वह’ उस समय जो तैयार कर रहा था व प्रतिज्ञा कर रहा था, वो ‘उसने’ यीशु के आने में पूरा किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सैंकड़ों साल बीत जाते हैं। यहूदी जानने के लिए उत्सुक हैं कि क्या मुक्तिदाता कभी आयेगा। वे भयंकर वेदना में से जाते हैं। तब परमेश्वर कार्य करता है और प्रतिज्ञा पूरी होती है। इसका अर्थ है कि परमेश्वर का भरोसा किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत हो सकता है मानो ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञाओं को भूल गया। किन्तु ‘वह’ भूलता नहीं है। अतः पद 2, न केवल सुसमाचार के अन्तर्विषय के बारे में एक कथन मात्र है, अपितु, इसका विश्वास करने के लिए एक कारण भी है। यदि हम यह देख सकते हैं कि परमेश्वर ने ‘उसके’ आने के शताब्दियों पूर्व मसीह की प्रतिज्ञा की थी और यह कि बहुत विस्तार में ‘वह’ ये प्रतिज्ञाएं पूरी करता है, तो हमारा विश्वास मजबूत हो जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3) यह पवित्र, ‘आत्मा’-प्रेरित रचनाएँ हैं, जिनका हमें सम्मान तथा विश्वास करना चाहिए।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पवित्र-शास्त्र की हमारी धर्मशिक्षा के लिए, पद 2 के विशाल रूप से महत्वपूर्ण उलझावों पर ध्यान दीजिये। प्रथम, परमेश्वर है; इसके बाद एक प्रतिज्ञा है जो परमेश्वर करना चाहता है; फिर भविष्यवक्ता हैं ‘‘जिनके द्वारा’’ (ठीक से ध्यान दीजिये, जिनसे नहीं, अपितु जिनके ‘‘द्वारा’’, परमेश्वर स्वयं वक्ता बने रहते हुए) ‘वह’ अपनी प्रतिज्ञा कहता है; इसके बाद रचनाएँ हैं; और ये रचनाएँ पवित्र कही जाती हैं। वे पवित्र क्यों हैं - अन्य सभी रचनाओं से अलग-थलग की गईं और अपने में अनोखी तथा बहुमूल्य&amp;amp;nbsp;? क्योंकि ये परमेश्वर है जो उन में बात करता है। आयत को सावधानी से पढि़ये: ‘‘उस (परमेश्वर) ने पहले ही से अपने भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ परमेश्वर ने पवित्र-शास्त्र में प्रतिज्ञा की । परमेश्वर पवित्र-शास्त्र में बातें कर रहा है। यही है जो उन्हें पवित्र बनाता है। पवित्र-शास्त्र के लिए पौलुस की यही समझ है और हमारी भी होनी चाहिए। यदि आप ने कभी आश्चर्य किया हो कि क्यों हमारी बाइबलों के मुख-पृष्ठ पर ‘‘पवित्र बाइबल’’ लिखा होता है, तो रोमियों 1: 2 इसका उत्तर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और ऐसा न हो कि रोमियों की पत्री की हमारी व्याख्या के लिए, इसकी निकट की सुसंगतता, से हम चूक जायें, तीन बातें याद रखिये: (1) 1: 1 में पौलुस, कलीसिया की नींव डालने वाले के रूप में मसीह की ओर से अधिकार के साथ बोलते और लिखते हुए, स्वयँ को मसीह यीशु के प्रेरित के रूप में देखता है - दूसरे शब्दों में , पुराने समय के एक भविष्यवक्ता के समान (इफिसियों 2: 20)। (2) 1 कुरिन्थियों 2: 13 में पौलुस ने कहा, ‘‘हम मनुष्यों के ज्ञान की सिखाई हुई बातों में नहीं, परन्तु ‘आत्मा’ की सिखायी हुई बातों में , आत्मिक बातें आत्मिक बातों से मिला मिलाकर सुनाते हैं।’’ दूसरे शब्दों , पौलुस अपने शिक्षण-कार्य के लिए एक विशेष प्रेरणा का दावा करता है। (3) 2 पतरस 3: 1 में, पतरस कहता है कि कुछ ‘‘लोग उन&amp;amp;nbsp;;पौलुस के लेखोंद्ध के अर्थों को भी पवित्र शास्त्र की और बातों की नाईं खींच तान करते हैं।’’ अतः पतरस, पौलुस की पत्रियों को पवित्र शास्त्र के साथ उसी श्रेणी में रखता है, जिसके बारे में हम यहाँ पढ़ रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसी कारण उपदेश देना हमारे जीवन में इतना गम्भीर है। हम विश्वास करते हैं कि रोमियों को पौलुस की पत्री, परमेश्वर का वचन है, मात्र मनुष्य के शब्द नहीं। पवित्र रचनाओं में, परमेश्वर की प्रेरणा से सुसमाचार की प्रतिज्ञा की गई थी; और परमेश्वर की प्रेरणा से पवित्र लेखों में हमारे लिए खोला गया और संरक्षित किया गया है। यही हम विश्वास करते हैं, और सच्चाई और धर्मशिक्षा और प्रचार और आराधना और सब कुछ जो संसार में है, के बारे में हम जिस तरह दृष्टिकोण रखते हैं, उसमें ये एक विशाल अन्तर लाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में पहली बात जो पौलुस कहता है, यह है कि इसकी योजना और भविष्यवाणी बहुत पहले हो चुकी थी (1: 2)। यह वो सुसमाचार है ‘‘जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में . . . प्रतिज्ञा की थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . अपने पुत्र के विषय में . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में दूसरी बात जो वह कहता है(1: 3), वो यह है कि इसका सम्बन्ध उसके ‘पुत्र’ से है। ‘‘ . . . परमेश्वर के उस सुसमाचार . . . जिस की उस ने पहले ही से अपने भविष्यवक्ताओं के द्वारा पवित्र शास्त्र में, अपने पुत्र . . . के विषय में प्रतिज्ञा की थी, . . . ।’’ परमेश्वर के सुसमाचार का सम्बन्ध, परमेश्वर के ‘पुत्र’ से है। हमें परमेश्वर के पुत्र के बारे में, दो बातें अभी तुरन्त स्पष्ट करना आवश्यक है, अन्यथा हम दूर भटक जायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) इसके पूर्व कि ‘वह’ मानव बना, परमेश्वर का ‘पुत्र’ अस्तित्व में था।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 8: 3 को देखिये, ‘‘क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में, और पाप के बलिदान होने के लिए भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।’’ परमेश्वर ने उसे भेजा कि वह मानव शरीर धारण कर ले। अतः इसके पूर्व कि वह मनुष्य बने, ‘पुत्र’, परमेश्वर के ‘पुत्र’ के रूप में, अस्तित्व में था। इसका अर्थ है कि एक अत्यन्त अद्वितीय रूप में - उस तरह नहीं जैसे हम परमेश्वर के पुत्र हैं - मसीह, परमेश्वर का पुत्र है और था (रोमियों 8: 14, 19)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) मसीह स्वयं परमेश्वर है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 9: 5 में, इस्राएल के सौभाग्यों का उल्लेख करते हुए, पौलुस कहता है, ‘‘ . . . पुरखे भी उन्हीं के हैं, और मसीह भी शरीर के भाव से उन्हीं (अर्थात्, इस्राएल) में से हुआ, जो सब के ऊपर परम परमेश्वर युगानुयुग धन्य है। आमीन।’’ और कुलुस्सियों 2: 9 में पौलुस कहता है, ‘‘उस (मसीह) में ईश्वरत्व की सारी परिपूर्णता सदेह वास करती है।’’ अतः जब पौलुस कहता है कि परमेश्वर का सुसमाचार, ‘उसके’ ‘पुत्र’ से संबंधित है, उसका अर्थ है कि इसका संबंध ईश्वरीय, पूर्ववर्ती ‘पुत्र’ से है। परमेश्वर का सुसमाचार इस बारे में नहीं है कि परमेश्वर मानवीय मामलों का बेहतर ढंग से व्यवस्थित कर रहा है। ये इस बारे में है कि परमेश्वर, अपने पुत्र के व्यक्तित्व में जो पिता का परिपूर्ण प्रतिरूप है और स्वयं परमेश्वर है, मानवीय मामलों में बाहर से गहरा प्रभाव डाल रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ पर यह कहने के द्वारा भारी वजन डालता है, प्रथम, कि इसके घटित होने के बहुत पूर्व ही यह परमेश्वर द्वारा - प्रतिज्ञा किया हुआ - सुनियोजित है,, और, द्वितीय, कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है। विश्व के प्रभु-सत्ता सम्पन्न सृष्टिकर्ता ने, संसार के लिए भली चीजों की योजना बनायी है, और इस योजना के केन्द्र में ‘उसका’ ‘पुत्र’ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . जो शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सुसमाचार के बारे में तीसरी बात जो पौलुस कहता है, वो यह है कि यह ईश्वरीय ‘पुत्र’ ‘शरीर के भाव से तो दाऊद के वंश से उत्पन्न हुआ।’’ यह तुरन्त दो बातें कहता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) परमेश्वर का ‘पुत्र’ मनुष्य बना।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वह’ पैदा हुआ। वो काम जो उसे करना था - जिस जीवन-लक्ष्य पर वह था - इसकी मांग थी कि ‘वह’ अपने ईश्वरीय स्वभाव के साथ, एक मानव स्वभाव धारण करे। परमेश्वर ने एक मनुष्य को चुनकर, उसे अपना पुत्र नहीं बनाया; उसने अपने सनातन, एकमात्र ‘पुत्र’ को मनुष्य बनाने का चुनाव किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) पुराना नियम में राजा दाऊद के वश में, ‘वह’ पैदा हुआ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह परमेश्वर के सुसमाचार का हिस्सा क्यों है&amp;amp;nbsp;? यह शुभ-समाचार क्यों है&amp;amp;nbsp;? उत्तर यह है कि पुराना नियम की सभी प्रतिज्ञाएँ, ‘मुक्तिदाता’ - ‘उस’ अभिषिक्त, के आगमन पर निर्भर रहीं - जो दाऊद के वश में एक राजा के रूप में राज्य करेगा और परमेश्वर के लोगों के शत्रुओं को जीतेगा और सदाकाल के लिए धार्मिकता और शान्ति ले आयेगा। ‘वह’ परमेश्वर की सभी प्रतिज्ञाओं के लिए ‘‘हाँ’’ होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुराना नियम की दो प्रतिज्ञाओं पर विचार कीजिए। यिर्मयाह 23: 5, ‘‘यहोवा की यह भी वाणी है, ‘देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राजा बनकर बुद्धि से राज्य करेगा, और अपने देश में न्याय और धर्म से प्रभुता करेगा।’’’ अथवा, यशायाह 11: 10, ‘‘उस समय यिशै की जड़ (अर्थात्, यिशै की सन्तान, दाऊद का पुत्र) देश दश के लोगों के लिये एक झण्डा होगी&amp;amp;nbsp;; सब राज्यों के लोग उसे ढूँढ़ेंगे, और उसका विश्रामस्थान तेजोमय होगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः परमेश्वर का सुसमाचार, शुभ-संदेश है कि अब, सैंकड़ों साल बाद, परमेश्वर ने ‘अपनी’ योजना व प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए कार्य किया है कि दाऊद के वंश में से एक राजा आया, और, जैसा यशायाह 9:6-7 कहता है, ‘‘प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राज- कुमार रखा जाएगा। उसकी प्रभुता सर्वदा बढ़ती रहेगी, और उसकी शान्ति का अन्त न होगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’, शुभ-समाचार है कि समय पूरा हुआ है और परमेश्वर का राज्य निकट है (मरकुस 1: 14- 15, ‘‘यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया, और कहा, ‘समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है&amp;amp;nbsp;; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो’’’)। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का संसार में आना, प्रतिज्ञा किये गए राजा, ‘दाऊद की सन्तान’ का आना था। ‘वह’ सब जातियों पर राज्य करेगा और परमेश्वर के शत्रुओं पर जय पायेगा तथा धार्मिकता व शान्ति के साथ राज्य करेगा और, यशायाह 35: 10 के अनुसार ‘‘यहोवा के छुड़ाए हुए लोग लौटकर जयजयकार करते हुए सियोन में आएँगे&amp;amp;nbsp;; और उनके सिर पर सदा का आनन्द होगा&amp;amp;nbsp;; वे हर्ष और आनन्द पाएँगे और शोक और लम्बी सांस का लेना जाता रहेगा।’’ यही है जो पद 3 को ‘‘परमेश्वर का सुसमाचार’’ बनाता है। परमेश्वर के ‘पुत्र’ का दाऊद की ‘सन्तान/पुत्र’ के रूप में आने का अर्थ होगा, परमेश्वर की उपस्थिति में सदा का आनन्द - परमेश्वर के सब छुड़ाए हुए लोगों के लिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘ . . . पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है . . . ’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन एक और बात है जो पौलुस ‘‘परमेश्वर के सुसमाचार’’ के बारे में कहता है। इसके घटित होने से पूर्व न केवल इसकी योजना बनायी गई व प्रतिज्ञा की गई थी&amp;amp;nbsp;; और न केवल यह ‘उसके’ ईश्वरीय, पूर्ववर्ती (पहले से ही अस्तित्व में) ‘पुत्र’ से सम्बन्धित है&amp;amp;nbsp;; और न केवल यह संदेश है कि पुराना नियम की आशाओं तथा परमेश्वर के राज्य में धार्मिकता व शान्ति व आनन्द के स्वप्नों को परिपूर्ण करने के लिए यह ‘पुत्र’, दाऊद के मानव पुत्र के रूप में पैदा हुआ है&amp;amp;nbsp;; अपितु, पद 4 में, पौलुस कुछ ऐसा कहता है जो सर्वनाश करने वाला और उल्लासित करने वाला, दोनों था। वह कहता है कि परमेश्वर का ‘पुत्र’, ‘‘पवित्रता की आत्मा के भाव से मरे हुओं में से जी उठने के कारण सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र ठहरा है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं क्यों कहता हूँ कि ये सर्वनाश करने वाला था? पौलुस के दिनों में अधिकांश यहूदी लोगों ने आशा की थी कि ‘मुक्तिदाता’ सामर्थ्य व राजनैतिक नियंत्रण/अधिकार के साथ आयेगा, और संसार के अत्याचारी शासकों, रोमियों को, पराजित करेगा, और यरूशलेम में पृथ्वी पर का एक राज्य स्थापित करेगा और अपने लोगों के साथ सदा के लिए विजयी होकर जीवित रहेगा। किन्तु पद 4 में पौलुस जो कहता है उसमें अन्तर्निहित है कि पद 3 व 4 के बीच ‘दाउद का पुत्र’ मर गया। ‘वह’ मर गया! वे जिन्होंने सोचा था कि ‘वह’ ‘मुक्तिदाता’ था, उजड़ गए। मुक्तिदाता मरते नहीं हैं। वे जीवित रहते और विजित होते व शासन करते हैं। वे बन्दी नहीं बनाये जाते और पीटे नहीं जाते और ठट्ठों में नहीं उड़ाये जाते और क्रूस पर नहीं चढ़ाये जाते और अपने लोगों को निसहाय नहीं छोड़ते। यह पूरी तरह सर्वनाशकारी था। (लूका 24: 21, ‘‘परन्तु हमें आशा थी, कि यही इस्राएल को छुटकारा देगा’’)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस अध्याय 3 व 5 व 8 में वापस मसीह की मृत्यु पर आयेगा। किन्तु अभी के लिए, वह तुरन्त परमेश्वर के सुसमाचार में विजय के आनन्ददायक स्वर पर आ जाता है। पौलुस पद 4 में कहता है, यह मृतक ‘मुक्तिदाता’, मृतकों में से जिलाया गया। यह परमेश्वर के सुसमाचार के मर्म में है। और पौलुस इस पुनरुत्थान के बारे में दो बातें कहता है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) मृतकों में से ये पुनरुत्थान, ‘‘पवित्रता के आत्मा के भाव से’’ था।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं इसका अर्थ कम से कम दो बातों में लेता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''अ. परमेश्वर के ‘पवित्र आत्मा’ ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं अपना संकेत रोमियों 8: 11 से लेता हूँ, जहाँ पौलुस कहता है, ‘‘और यदि उसी का ‘आत्मा’ जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है&amp;amp;nbsp;; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने ‘आत्मा’ के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।’’ यह सिखाता है कि हम परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जिलाये जायेंगे, जो हमारे अन्दर वास करता है, वैसे ही जैसे कि मसीह जिलाया गया था। अतः यीशु को मरे हुओं में से जिलाने में ‘आत्मा’ सम्मिलित था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''ब. लेकिन पौलुस क्यों यह असामान्य अभिव्यक्ति, ‘‘पवित्रता का आत्मा’’ उपयोग करता है, (जो नया नियम में और कहीं नहीं पाया जाता)?'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा सुझाव यह है। मृतकों के साथ व्यवहार/बर्ताव करना, एक गन्दा व्यवसाय था। जब शाऊल मृतक के साथ सम्पर्क करना चाहता था, वह एन्दोर की भूतसिद्धि करने वाली के पास गया (1 शमूएल 28: 7 से आगे), और यह एक गुप्त और अवैध पेशा था। भूत साधने वाले और शगुन निकालने वाले और टोना करने वाले, इस्राएल में घृणित थे। जब मृतक मर जाते हैं, आप उन्हें अकेला छोड़ देते हैं और उनसे कोई व्यवहार नहीं रखते। विश्वासियों के लिए आत्मायन (मृत-आत्माओं से सम्पर्क) नियम विरोध था और है। मृतकों के साथ बर्ताव करना एक प्रकार का काला-जादू रहा है, एक सुन्दर, साफ, पवित्र चीज नहीं। इस सब के अलावा। एक प्राण दण्ड पाया मृतक, मरे हुओं में से जिलाया जा रहा है, यह बात भी कई लोगों के कानों में नितान्त भयंकर और घटिया और गन्दी और अशुद्ध लगी होगी, काला-टोना और काला-जादू के समान। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन सब से ऊपर हटकर पौलुस ठीक विपरीत बात पर जोर देता है: मसीह, पवित्रता के ‘आत्मा’ के भाव से मृतकों में से जिलाया गया था, किसी अन्धकार की आत्मा या दुष्ट आत्मा या अशुद्ध आत्मा के भाव से नहीं, अपितु स्वयँ परमेश्वर के ‘आत्मा’ के द्वारा जो सर्वोपरि पवित्रता से चिन्हित है। यीशु को जिलाने में ‘वह’ अशुद्ध नहीं हुआ। यह करना एक पवित्र कार्य था। ये उचित और अच्छा और साफ और सुन्दर और परमेश्वर को सम्मान देने वाला था, परमेश्वर के महत्व को घटाने वाला नहीं। यह पवित्र था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) इस पुनरुत्थान के द्वारा मसीह ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा (या नियुक्त किया गया)।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर मुख्य वाक्यांश ‘‘सामर्थ्य के साथ’’ है। मैं सोचता हूँ कि एन.ए.एस.बी. और के.जे.वी. और आर.एस.वी., यह दिखाने में सही हैं कि यह वाक्यांश ‘‘परमेश्वर के पुत्र’’ को रूपान्तरित करता है। बिन्दु यह नहीं है कि पुनरुत्थान के पूर्व, मसीह परमेश्वर का पुत्र नहीं था। बिन्दु यह है कि पुनरुत्थान में मसीह, अकेलेपन तथा मानवीय सीमा व दुर्बलता में परमेश्वर का ‘पुत्र’ होने से आगे बढ़कर, सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का ‘पुत्र’ ठहरा। मुख्य वाक्यांश है, ‘‘सामर्थ्य के साथ’’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु का वही अर्थ था जब पुनरुत्थान के बाद ‘उसने’ कहा, ‘‘स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है’’(मत्ती 28:18)। यही अर्थ पौलुस का 1 कुरिन्थियों 15: 25-26 में था, जब उसने जी उठे हुए मसीह के बारे में कहा, ‘‘जब तक कि वह अपने बैरियों को अपने पावों तले न ले आए, तब तक उसका राज्य करना अवश्य है। सब से अन्तिम बैरी जो नाश किया जाएगा वह मृत्यु है।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु, मसीह राजा है। ‘वह’ अभी संसार पर राज्य कर रहा है। ‘वह’ अपने सब शत्रुओं को अपने पावों के नीचे ला रहा है। एक दिन आयेगा जब ‘वह’ अपने अदृश्य राज्य में से, प्रत्यक्ष महिमा के साथ उभर कर बाहर आयेगा, और प्रत्यक्षतः व महिमित रूप में पृथ्वी पर अपना राज्य स्थापित करेगा। ‘‘सामर्थ्य के साथ परमेश्वर का पुत्र’’, के द्वारा पौलुस का यही अर्थ है। ‘वह’ अभी शासन कर रहा है। ‘वह’ अपने लक्ष्यों को अपने ‘आत्मा’ और अपनी कलीसिया के द्वारा कार्यरूप में परिणित कर रहा है। और वो दिन आयेगा जब मसीह प्रत्येक शत्रु को पराजित कर देगा, और हर एक घुटना टिकेगा और परमेश्वर पिता की महिमा के लिये हर एक जीभ अंगीकार करेगी कि ‘वह’ ही प्रभु है (फिलिप्पियों 2: 11) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वो परमेश्वर के सुसमाचार की परिपूर्णता होगी (का समापन होगा)। जिसके लिए हम कहते हैं, ‘‘आमीन। हे प्रभु यीशु आ।’’&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>तेरे वचन से अद्भुत बातें</title>
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				<updated>2017-01-20T20:49:13Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;तेरे वचन से अद्भुत बातें&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Wonderful Things from Your Word}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर द्वारा प्रकाश पाने की हमारी नितान्त आवश्यकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विगत सप्ताह इस पद से हमने इन तीन बातों को देखा था - 1. परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातें हैं, 2. परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना कोई इन अद्भुत बातों की सच्चाई को नहीं देख सकता है, और 3. इसलिए जब हम बाइबल पढ़ते हैं तो हमें परमेश्वर से अलौकिक प्रकाशन के लिए प्रार्थना करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः विग्त सप्ताह प्रार्थना पर ज़ोर था और कि आत्मिक बातों को देखने के लिए हमें परमेश्वर के अलौकिक प्रकाशन की नितान्त आवश्यकता है कि परमेश्वर की महिमा और मनोहरता और महानता को देख सकें। परमेश्वर द्वारा आपके हृदय की आंखों को खोले बिना आप परमेश्वर के वचन में बहुत-सी बातें देख सकते हैं। आप शब्दों को और व्याकरण को देख सकते हैं। आप तर्कों को देख सकते हैं। आप ऐतिहासिक तथ्यों को देख सकते हैं। आप लेखक के उद्देश्य को देख सकते हैं। आप कुछ मानवीय भावनाओं को देख सकते हैं। इन सब के लिए आवश्यकता नहीं है कि परमेश्वर हमारी आंखों को एक विशेष आत्मिक रीति से खोले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु परमेश्वर की और उसके पुत्र की और संसार में उनके कार्य की उस आत्मिक मनोहरता को आप नहीं देख सकते हैं। आप यह नहीं देख सकते कि परमेश्वर सब बातों से बढ़कर अधिक चाहने योग्य है। एक दृष्टिहीन व्यक्ति सूर्य को नहीं देख सकता है, यद्यपि वह सूर्य के विषय बहुत-सी बातों को जान सकता है और किसी ऐसे व्यक्ति से जो सूर्य को देख सकता, खगोलशास्त्र में अधिक अंक पा सकता है। किसी के विषय जानना और किसी को देख कर जानना अगल-अलग में हैं। यह जानना कि शहद मीठा होता है और शहद का चखना दो अलग अलग बातें/ (चीजें) हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के विशेष, उद्धारक प्रकाशन के बिना हमारी दशा के विषय पौलुस द्वारा दिए उस सम्पूर्ण वर्णन को मैं एक बार फिर पढ़ना चाहूँगा। इफिसियों 4:17-18 में, पौलुस मानवीय दशा के उन पांच भंयकर लक्षणों का उल्लेख करता है जिनके कारण परमेश्वर को सहायता करना आवश्यक हो जाता है, यदि हमें आत्मिक सच्चाई देखना है। वह कहता है कि अन्यजाति (दूसरे शब्दों में कहें तो संसार के लोग, जिन्होंने मसीह के अनुग्रह का स्वाद नहीं चखा है) “अपने मन की अनर्थ रीति पर चलते हैं... क्योंकि उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है, और उनके मन की कठोरता के कारण उनकी बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और वे परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए हैं ।” यदि हम इसे पीछे की ओर पढ़ें तो हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर के महान अनुग्रह से अलग, हम सब में हृदय की वह कठोरता है जिससे अज्ञानता होती है, जिससे परमेश्वर से दूरी होती है और जो अन्धकार का कारण होता है जो कि मन की अनर्थ रीति पर चलने का कारण होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पिछले सप्ताह की मुख्य बात यह थी कि, यदि परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातों को देखने की हम कोई आशा करते हैं, तो हमें परमेश्वर द्वारा एक ऐसी ईश्वरीय, अलौकिक क्षमता दी जानी होगी जो कि स्वाभाविक रूप से हम में नहीं है। और इसलिए हमें इसके लिए प्रार्थना करनी होगी – “मेरी आँखें खोल दे।” और यदि हम परमेश्वर में जीवित बने रहेंगे और उसके प्रति अपने प्रेम में सच्चे और गम्भीर और तीव्र रहेंगे, तो हमें प्रतिदिन इस सामर्थ्य को पाने की लालसा रखनी होगी। अतः प्रार्थना करें, प्रार्थना करें, प्रार्थना करें। भजन 119 पढ़ें और देखें कि वह कितनी बार प्रार्थना करता है कि परमेश्वर की सहायता से परमेश्वर और उसके मार्गों को जाने। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== (ध्यान देना) देखना बदलना है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु आज मैं कुछ और कहना चाहूँगा। परन्तु इससे पहले मैं यह सुनिश्चित करना चाहूँगा कि आप यह समझें कि यह महत्वपूर्ण क्यों है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यीशु के सदृश्य बनना परमेश्वर और उसके पुत्र और उनके वचनों और कार्यों की सुन्दरता, मूल्य तथा उत्कृष्टता को देखने के द्वारा होता है। 2 कुरिन्थियों 3:18 में पौलुस कहता है, “और हम सब खुले चेहरे से, प्रभु का तेज़ मानों दर्पण में देखते हुए, प्रभु अर्थात् आत्मा के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश करके बदलते जाते हैं ।” देखना, बदलना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरण बदलने का यही एक मसीही तरीका है जिससे कि परमेश्वर को महिमा मिलें। हम बदलते हैं क्योंकि हमने एक श्रेष्ठतर सुन्दरता, महानता और श्रेष्ठता को देखा है। यदि आप मसीह के चेहरे को देखते और तब ‘खेल जगत’ या ‘मनोरमा’ जैसी पत्रिकाओं को देखते और मसीह की महानता तथा प्रेम की कहीं उच्च सुन्दरता तथा योग्यता को याद कर अभिभूत नहीं होते हैं, तो आप अपनी सोच में अभी भी कठोर और अन्धे और निरर्थक हैं। आपको यह पुकार उठना चाहिए, “मेरी आँखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ।” और आपके जीवन में यह दिखाई देगा। आपका धन- आपकी अभिलाषा, आपकी सुन्दरता जहाँ है – वहाँ पर आपका मन होगा - और आपकी शाम और आपका सप्ताहांत और आपका धन। हम परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखने के द्वारा बदलते हैं। यदि इस संसार की अभिलाषा और महिमा से बढ़कर परमेश्वर आपके लिए अधिक महिमामय और चाहनीय नहीं है तो आपने उसे देखा ही नहीं है। 3 यूहन्ना 11 कहता है, “जो बुराई करता है उसने परमेश्वर को नहीं देखा ” (1 यूहन्ना 3:6 भी देखें)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए यह सब महत्वपूर्ण है क्योंकि समस्त सच्चे परिवर्तित जीवन जो परमेश्वर को महिमा देते हैं और जो आत्मिक रीति से मूल्यवान हैं परमेश्वर के तेज़ की महिमा को देखने के कारण हैं, न कि आचरणों की एक धार्मिक सूचि बनाने और उनका पालन करने का प्रयास करने के द्वारा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर अपने वचन के द्वारा मसीह की मनोहरता को प्रकट करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज के बाइबल पाठ से हम इस मुख्य बात को देखते हैं, मसीह की मनोहरता और महानता को परमेश्वर केवल उन्हें दिखाता है जो परमेश्वर के वचन को पढ़ते हैं। इसी कारण सच्चा आत्मिक परिवर्तन बाइबल पठन और मनन और उसे याद कर लेने से होता है। इसलिए नहीं कि आपने पालन करने के लिए कुछ नियमों को सीखा। वरन् इसलिए कि बाइबल में ही परमेश्वर मसीह की मनोहरता तथा महानता को प्रकट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर मैं एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहूँगा । यदि आपने पिछले सप्ताह के सन्देश को पढ़ा कि परिवर्तित होने के लिए हमें परमेश्वर की महिमा के तेज़ को देखना होगा, परन्तु हम उसे अपनी मरी हुई दशा, और कठोरता और अन्धेपन के कारण नहीं देख सकते हैं, और कि इसलिए हमें परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह हमें जिलाए और कोमल बनाए और हमारी आँखें खोले। ओैर माना कि आप यह निष्कर्ष निकालते हैं - ठीक तो मैं अब प्रार्थना का जीवन जीऊंगा और बाइबल पढ़ने, अध्ययन करने और उसे रटने में समय नहीं लगाऊँगा क्योंकि मानवीय रीति से देखना और समझना वह नहीं देख सकता जो देखा जाना चाहिए। यह जो मैंने कहा और जो बाइबल का यह पाठ कहता है उसका बिल्कुल गलत अर्थ निकालना होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बात यह है कि जब हम बाइबल पर दृष्टि करते हैं तो परमेश्वर ही अपनी महिमा के तेज़ को देखने के लिए हमारी आँखें खोलता है। मान लीजिए आप ताजमहल की सुन्दरता को देखना चाहते, परन्तु आप दृष्टिहीन होते, आप मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे कहता, मुझे पुकारो और मुझ से प्रार्थना करो और मैं ताजमहल की सुन्दरता देखने के लिए तुम्हारी आँखें खोल दूँगा। तो क्या आप प्रार्थना करने आगरा से चेन्नई जाते? या कि आप ताजमहल देखने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रदान प्रत्येक शक्ति और ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते कि ताजमहल तक जाएँ और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी दृष्टि उठाएँ? जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि वह आपको ताजमहल की सुन्दरता नहीं दिखाएगा यदि आप चेन्नई में ही बैठे रहेंगे, चाहे आप कितनी भी प्रार्थना कर लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा आँखों के खोले जाने का कार्य हमेशा उसके वचन के द्वारा समझाए जाने के साथ ही हो। वह यह चाहता है कि हम उसके पुत्र की महिमा को देखें (और बदल जाएँ)। इसलिए जब हम उसके पुत्र को देखते हैं तो वह हमारी आँखें खोल देता है। सच्चे आत्मिक आत्म-प्रकाशन के परमेश्वर के तरीके में आत्मा का कार्य हमेशा एक साथ होता है। आत्मा का कार्य उसकी महिमा, सुन्दरता और महानता दिखाना है जिसे हमारा ज्ञान परमेश्वर के वचन में देखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें यह सोचने की गलती नहीं करना है कि परमेश्वर के आत्मा से हमें कोई नई जानकारी पाने की आवश्यकता है। बाइबल में परमेश्वर के विषय हमारी समझ से परे हज़ारों गुना जानकारियाँ हैं। हमें आवश्यकता यह है कि हम अपने हृदय की आँखों से देखें&amp;amp;nbsp;! बाइबल में मसीह के विषय जो हम देख सकते हैं उसके विषय आत्मा के द्वारा दी कोई भी जानकारी हमें रत्ती भर भी और आत्मिक या परमेश्वर की दृष्टि में अच्छा नहीं बनाएगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान लीजिए कि आत्मा आपको यह नवीन सूचना देती है कि आपकी बाँझ मित्र गर्भवती होने जा रही है। आप उसे यह बताते हैं, और जब ऐसा हो जाता है तो आप और वह इस भविष्यवाणी तथा गर्भधारण के आश्चर्यकर्म पर खुशी से झूम उठते हैं। आत्मिक रूप से आपने क्या पाया? कुछ नहीं, यदि आप बाइबल न खोलें और हृदय की आँखों से न देखें - मसीह की उस महिमा और सुन्दरता के चित्रण को न देखें -यीशु नासरी क्रूस पर मरा और जी उठा कि पापियों का उद्धार करे और उस परमेश्वर की महिमा करे जिसने इस प्रकार की आशीष आपको दी। आश्चर्यकर्मों के कारण धार्मिक जोश स्वाभाविक बात है और आवश्यक नहीं कि उसमें कोई आत्मिक या अलौकिक बात हो। आत्मा के वरदान बहुमूल्य हैं, परन्तु पवित्र आत्मा द्वारा आँखों का खोला जाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ताकि हम बाइबल में मसीह की महिमा के तेज़ को देख सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें किसी नई सूचना की आवश्यकता नहीं है। वरन् नई आँखों की जिस से कि हमारे लिए परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है, वह हम देख सकें। मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करके भटके नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस से मैं कुछ तात्पर्य बताना चाहूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहला यह कि जब आप देखने के लिए आँखों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो आपको अपने मस्तिष्क को शून्य नहीं करना है। यह न सोच लें कि प्रार्थना की अनिवार्यता का अर्थ परमेश्वर के वचन पर केन्द्रित विचार की निश्चितता है। जब आप मसीह की महिमा के तेज़ को देखने के लिए प्रार्थना करते हैं तो मानसिक रूप से भटक न जाएं, न ही तटस्थ हों। निष्क्रिय न बनें, ठहरे ही न रहें। यह एक बड़ी गलती है। मसीहियत के विषय जो एक अद्वितीय बात है वह यह है कि वह ऐतिहासिक है और सुस्पष्ट है। यीशु वास्तव में ऐतिहासिक है। परमेश्वर की योजना यह है कि इस मनुष्य यीशु की आत्मिक सुन्दरता तथा मूल्य जैसा कि बाइबल में प्रकाशित है, देखने के लिए वह हमारी आँखें खोल दे। यदि उसे देखने के लिए हम प्रार्थना करते और तब हमारा मन भटक जाता है, तो हम उसे नहीं देखेंगे। अतः एकाग्रचित्त हों और प्रार्थना करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तब क्या&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. प्रार्थना करें और पढें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर का वचन पढ़ें&amp;amp;nbsp;! कैसा सौभाग्य! और कैसा दायित्व! और परमेश्वर को देखने की कैसी क्षमता! इफिसियों 3:3-4 देखिए। पौलुस कहता है, “अर्थात् वह रहस्य जो मुझ पर प्रकाशन के द्वारा प्रकट किया गया, जैसा मैं पहले ही संक्षेप में लिख चुका हूँ, जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।“ जिसे पढ़कर! परमेश्वर ने यह चाहा कि जीवन के सबसे बड़े रहस्य पढ़ने के द्वारा प्रकाशित हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब अध्याय 1:18 से तुलना करें, जहाँ पौलुस कहता है, “मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिस से तुम जान सको कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है।” अतः इफिसियों 3:4 कहता है कि इस रहस्य को पढ़ने द्वारा जाना जाता है। और इफिसियों 1:18 कहता है कि जो हमें जानना चाहिए वह जानने के लिए प्रार्थना के उत्तर में परमेश्वर को हमारी आँखें खोलना होगा। हाँ, हमें प्रार्थना करना होगा। हां, परमेश्वर की सहायता के बिना हम अन्धे हैं। परन्तु इस सप्ताह मुख्य बात यह है कि, हमें पढ़ना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।” प्रार्थना करना बाइबल पढ़ने का स्थान नहीं ले सकता है। प्रार्थना करना हमारे बाइबल पठ्न को देखने में बदल सकता है। परन्तु यदि हम बाइबल नहीं पढ़ेंगे, हम नहीं देखेंगे। पवित्र आत्मा इसलिए भेजा गया कि यीशु की महिमा करे, और यीशु की महिमा का चित्रण बाइबल में किया गया है। पढि़ए, खुश होईए कि आप पढ़ सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. प्रार्थना करें और अध्ययन करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 तीमुथियुस 2:15, “अपने आपको परमेश्वर के ग्रहणयोग्य और ऐसा कार्य करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर जिस से लज्जित होना न पड़े, और जो सत्य के वचन को ठीक से काम में लाए।” परमेश्वर ने अपने बारे में एक पुस्तक हमें दी है, इसलिए नहीं कि हम इसे जैसा चाहे वैसा लापरवाही के साथ पढ़ें। पौलुस कहता है, “ऐसा कार्य करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर... जो सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।” यदि आप परमेश्वर के वचन से पूरा पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें वचन का अध्ययन करना होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घड़ी का ‘पेन्डुलम’ झूलता रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रार्थना करें और बस प्रार्थना करें और अध्ययन जैसे आत्मिक कार्य पर निर्भर न करें । कुछ दूसरे लोग कहते हैं, अध्ययन करें और बस अध्ययन करें क्योंकि परमेश्वर प्रार्थना में आपको किसी वचन का अर्थ नहीं बताएगा। परन्तु बाइबल में इस प्रकार का कोई द्विभाजन नहीं है। हमें बाइबल का अध्ययन करना चाहिए और इसका ठीक ठीक उपयोग करना चाहिए, और हमें प्रार्थना करना चाहिए, अन्यथा हम बाइबल में एक आवश्यक बात को नहीं देख पाएँगे, अर्थात् मसीह के चेहरे पर परमेश्वर की महिमा के तेज़ को (2 कुरिन्थियों 4:4,6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के एक महान अध्ययनकर्ता बेन्जामिन वारफील्ड ने 1911 में लिखा, “कभी कभी हमें ऐसा सुनने को मिलता है कि आपके पुस्तकों में दस घण्टे अध्ययन करने की अपेक्षा आपके घुटनों पर दस मिनिट रहना आपको परमेश्वर का एक अधिक सच्चा, गहरा और सक्रिय ज्ञान देगा। ‘क्या!’ सही उत्तर होगा, ‘तब आपके घुटनों पर आपकी पुस्तकों के साथ दस घण्टे?’” (“द रिलीजस लाईफ ऑफ थियोलॉजिकल स्टडीज”, नॉल, द प्रिन्सटन थियोलॉजी, (ग्रैन्ड रैपिड्स: बेकर बुक हाऊस, 1983) पृ. 263)। बाइबल का सन्देश यही है। हाँ, हमें प्रार्थना करना चाहिए। यदि परमेश्वर हमारी आँखें न खोले तो हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातें नहीं देख पाएँगे। परन्तु प्रार्थना करना अध्ययन करने का स्थान नहीं ले सकता है, क्योंकि पौलुस कहता है, “प्रयत्न कर -अध्ययन कर – कि सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. प्रार्थना करें और छान-बीन करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के प्रति हमारा रवैया एक लोभी व्यक्ति के समान होना चाहिए जो सोने की खदान में सोना ढूँढ़ता है,या एक मंगेतर के समान जिसने घर में कहीं अपनी सगाई की अंगूठी खो दी है। वह घर को छान मारती है।इसी रीति से हम बाइबल में परमेश्वर को खोजते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीतिवचन 2:1-6 कहता है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करें, ओर मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े, 2 ओर बुध्दि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगाकर सोचे; 3 और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारें, 4 और उसको चान्दी की नाई ढूँढे़, और गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगा ररें; 5 तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा। 6 क्योंकि बुध्दि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुँह से निकलती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रहण करें, संचित करें, अपना मन लगाएँ, पुकारें, ज़ोर से चिल्लाएँ, चांदी के समान ढूँढें, गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगे रहें। यह बाइबल की छान-बीन करना है जिससे लाभ ही होगा। ऐसे ढूँढें जैसे कि कोई छिपा हुआ धन है, या चाँदी है। प्रार्थना अवश्य करें (जैसा कि पद 3 कहता है) परन्तु छान-बीन करना न छोड़ें। परमेश्वर उन्हें देने की प्रतिज्ञा करता है जो सम्पूर्ण हृदय से ढूंढते हैं (यिर्मयाह 29:13)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. प्रार्थना करें और विचार करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 तीमुथियुस 2:7 पर विचार करें, “जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” इसका अर्थ क्या यह है कि पौलुस की शिक्षा को समझना सोच विचार का मात्र एक मानवीय तथा स्वाभाविक कार्य है? नहीं। इस पद के अन्त में लिखा है, “प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” आप इसे स्वयं के प्रयास से नहीं देख सकते हैं। आत्मिक समझ परमेश्वर का दान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु परमेश्वर ने आत्मिक प्रकाश का दान सोच-समझ के द्वारा देना नियुक्त किया है।“जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” अतः मन लगा कर प्रार्थना करें और परमेश्वर से मांगें कि वह आपको वह प्रकाश दे जिसकी आपको आवश्यकता है। परन्तु ध्यान लगाना न छोड़ें। ध्यान दें और प्रार्थना करें। प्रार्थना करें और ध्यान दें। परमेश्वर ने इसी प्रकार ठहराया है। एक ऐतिहासिक मसीह। संरक्षण तथा प्रकाशन की एक पुस्तक। सभी यही कहती हैं - पढ़ें और अध्ययन करें, और छान-बीन करें और ध्यान दें या सोच विचार करें। परन्तु प्रार्थना के बिना सब कुछ व्यर्थ है। दोनों कार्य करना है, कोई भी एक नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''5. प्रार्थना करें और बोलें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर चाहता है कि प्रचार करने, एक-दूसरे को शिक्षा देने, चेतावनी देने, उत्साहित करने और समझाने में कहे गए वचन लिखित वचन में बदलें। कुलुस्सियों 3:16 कहता है, “मसीह के वचन को अपने हृदय में बहुतायत से बसने दो, समस्त ज्ञान सहित एक दूसरे को शिक्षा और चेतावनी दो...।” हमारे लिए मसीह का वचन एक दूसरे के लिए हमारा वचन बन जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं उपदेश देता हूँ। यह परमेश्वर की इच्छा है कि उसका वचन बारम्बार नई रीति से सुनाया जाएँ। और आप एक दूसरे को परमेश्वर का वचन सुनाते हैं। कलीसिया में छोटे-छोटे झुण्ड होने का सही आधारभूत कारण है - कि हमारे द्वारा परमेश्वर के वचन को हमारे लिए परमेश्वर का वचन बनाएँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका क्या यह अर्थ है कि हम उन समयों में प्रार्थना न करें कि हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों को देखने के लिए किसी न किसी रीति से हृदय की आँखें खोल सकते हैं क्योंकि हम इसे दृढ़ निश्चयता या प्रेरक तर्कों या सुन्दर शब्दों में कह रहे हैं? पौलुस ऐसा नहीं सिखाते हैं। इसी पुस्तक में (कुलुस्सियों 1:9-10) में वह प्रार्थना करता है – प्रार्थना! – “हमने तुम्हारे लिए प्रार्थना और यह विनती करना नहीं छोड़ा कि तुम समस्त आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहचान में परिपूर्ण हो जाओ... परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ते जाओ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मसीह का वचन हमारे मध्य बहुतायत से निवास करता है तब यदि परमेश्वर को जानना और आत्मिक ज्ञान एवं समझ पाना स्वतः ही होते, तो पौलुस को परमेश्वर से मन लगाकर यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन और प्रार्थना साथ-साथ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने बार बार देखा कि यदि हमें परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखना है तो प्रार्थना अपरिहार्य है।परन्तु हमने यह भी देखा कि परमेश्वर के वचन को पढ़ना, अध्ययन करना, छान-बीन करना, उस पर ध्यान देना और उसे सुनाना भी आवश्यक है। परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा अन्तर्दृष्टि दिए जाने के कार्य के साथ हमेशा उसके वचन द्वारा समझ प्रदान किए जाने का कार्य भी है। वह यह चाहता है कि हम परमेश्वर की महिमा को देखें और कि हम में परमेश्वर की महिमा दिखाई भी दे। और इसलिए जब बाइबल में हम परमेश्वर की महिमा को देखते हैं तो वह हमारी आंखें खोलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 पढ़ें, अध्ययन करें, छान-बीन करें, सोचें, बोलें, सुनें, और प्रार्थना करें, “मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(आगे अध्ययन के लिए देखें - लूका 24:45; प्रॆ.काम 16:14; 2 राजा 6:17; मत्ती 16:17; 11:2-6, 11:27)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>तेरे वचन से अद्भुत बातें</title>
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				<updated>2017-01-20T20:48:56Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Wonderful Things from Your Word}}   &amp;amp;gt; मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भ...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Wonderful Things from Your Word}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर द्वारा प्रकाश पाने की हमारी नितान्त आवश्यकता ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विगत सप्ताह इस पद से हमने इन तीन बातों को देखा था - 1. परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातें हैं, 2. परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना कोई इन अद्भुत बातों की सच्चाई को नहीं देख सकता है, और 3. इसलिए जब हम बाइबल पढ़ते हैं तो हमें परमेश्वर से अलौकिक प्रकाशन के लिए प्रार्थना करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः विग्त सप्ताह प्रार्थना पर ज़ोर था और कि आत्मिक बातों को देखने के लिए हमें परमेश्वर के अलौकिक प्रकाशन की नितान्त आवश्यकता है कि परमेश्वर की महिमा और मनोहरता और महानता को देख सकें। परमेश्वर द्वारा आपके हृदय की आंखों को खोले बिना आप परमेश्वर के वचन में बहुत-सी बातें देख सकते हैं। आप शब्दों को और व्याकरण को देख सकते हैं। आप तर्कों को देख सकते हैं। आप ऐतिहासिक तथ्यों को देख सकते हैं। आप लेखक के उद्देश्य को देख सकते हैं। आप कुछ मानवीय भावनाओं को देख सकते हैं। इन सब के लिए आवश्यकता नहीं है कि परमेश्वर हमारी आंखों को एक विशेष आत्मिक रीति से खोले। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु परमेश्वर की और उसके पुत्र की और संसार में उनके कार्य की उस आत्मिक मनोहरता को आप नहीं देख सकते हैं। आप यह नहीं देख सकते कि परमेश्वर सब बातों से बढ़कर अधिक चाहने योग्य है। एक दृष्टिहीन व्यक्ति सूर्य को नहीं देख सकता है, यद्यपि वह सूर्य के विषय बहुत-सी बातों को जान सकता है और किसी ऐसे व्यक्ति से जो सूर्य को देख सकता, खगोलशास्त्र में अधिक अंक पा सकता है। किसी के विषय जानना और किसी को देख कर जानना अगल-अलग में हैं। यह जानना कि शहद मीठा होता है और शहद का चखना दो अलग अलग बातें/ (चीजें) हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के विशेष, उद्धारक प्रकाशन के बिना हमारी दशा के विषय पौलुस द्वारा दिए उस सम्पूर्ण वर्णन को मैं एक बार फिर पढ़ना चाहूँगा। इफिसियों 4:17-18 में, पौलुस मानवीय दशा के उन पांच भंयकर लक्षणों का उल्लेख करता है जिनके कारण परमेश्वर को सहायता करना आवश्यक हो जाता है, यदि हमें आत्मिक सच्चाई देखना है। वह कहता है कि अन्यजाति (दूसरे शब्दों में कहें तो संसार के लोग, जिन्होंने मसीह के अनुग्रह का स्वाद नहीं चखा है) “अपने मन की अनर्थ रीति पर चलते हैं... क्योंकि उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है, और उनके मन की कठोरता के कारण उनकी बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और वे परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए हैं ।” यदि हम इसे पीछे की ओर पढ़ें तो हम यह कह सकते हैं कि परमेश्वर के महान अनुग्रह से अलग, हम सब में हृदय की वह कठोरता है जिससे अज्ञानता होती है, जिससे परमेश्वर से दूरी होती है और जो अन्धकार का कारण होता है जो कि मन की अनर्थ रीति पर चलने का कारण होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः पिछले सप्ताह की मुख्य बात यह थी कि, यदि परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातों को देखने की हम कोई आशा करते हैं, तो हमें परमेश्वर द्वारा एक ऐसी ईश्वरीय, अलौकिक क्षमता दी जानी होगी जो कि स्वाभाविक रूप से हम में नहीं है। और इसलिए हमें इसके लिए प्रार्थना करनी होगी – “मेरी आँखें खोल दे।” और यदि हम परमेश्वर में जीवित बने रहेंगे और उसके प्रति अपने प्रेम में सच्चे और गम्भीर और तीव्र रहेंगे, तो हमें प्रतिदिन इस सामर्थ्य को पाने की लालसा रखनी होगी। अतः प्रार्थना करें, प्रार्थना करें, प्रार्थना करें। भजन 119 पढ़ें और देखें कि वह कितनी बार प्रार्थना करता है कि परमेश्वर की सहायता से परमेश्वर और उसके मार्गों को जाने। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== (ध्यान देना) देखना बदलना है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु आज मैं कुछ और कहना चाहूँगा। परन्तु इससे पहले मैं यह सुनिश्चित करना चाहूँगा कि आप यह समझें कि यह महत्वपूर्ण क्यों है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यीशु के सदृश्य बनना परमेश्वर और उसके पुत्र और उनके वचनों और कार्यों की सुन्दरता, मूल्य तथा उत्कृष्टता को देखने के द्वारा होता है। 2 कुरिन्थियों 3:18 में पौलुस कहता है, “और हम सब खुले चेहरे से, प्रभु का तेज़ मानों दर्पण में देखते हुए, प्रभु अर्थात् आत्मा के द्वारा उसी तेजस्वी रूप में अंश अंश करके बदलते जाते हैं ।” देखना, बदलना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आचरण बदलने का यही एक मसीही तरीका है जिससे कि परमेश्वर को महिमा मिलें। हम बदलते हैं क्योंकि हमने एक श्रेष्ठतर सुन्दरता, महानता और श्रेष्ठता को देखा है। यदि आप मसीह के चेहरे को देखते और तब ‘खेल जगत’ या ‘मनोरमा’ जैसी पत्रिकाओं को देखते और मसीह की महानता तथा प्रेम की कहीं उच्च सुन्दरता तथा योग्यता को याद कर अभिभूत नहीं होते हैं, तो आप अपनी सोच में अभी भी कठोर और अन्धे और निरर्थक हैं। आपको यह पुकार उठना चाहिए, “मेरी आँखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ।” और आपके जीवन में यह दिखाई देगा। आपका धन- आपकी अभिलाषा, आपकी सुन्दरता जहाँ है – वहाँ पर आपका मन होगा - और आपकी शाम और आपका सप्ताहांत और आपका धन। हम परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखने के द्वारा बदलते हैं। यदि इस संसार की अभिलाषा और महिमा से बढ़कर परमेश्वर आपके लिए अधिक महिमामय और चाहनीय नहीं है तो आपने उसे देखा ही नहीं है। 3 यूहन्ना 11 कहता है, “जो बुराई करता है उसने परमेश्वर को नहीं देखा ” (1 यूहन्ना 3:6 भी देखें)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए यह सब महत्वपूर्ण है क्योंकि समस्त सच्चे परिवर्तित जीवन जो परमेश्वर को महिमा देते हैं और जो आत्मिक रीति से मूल्यवान हैं परमेश्वर के तेज़ की महिमा को देखने के कारण हैं, न कि आचरणों की एक धार्मिक सूचि बनाने और उनका पालन करने का प्रयास करने के द्वारा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर अपने वचन के द्वारा मसीह की मनोहरता को प्रकट करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज के बाइबल पाठ से हम इस मुख्य बात को देखते हैं, मसीह की मनोहरता और महानता को परमेश्वर केवल उन्हें दिखाता है जो परमेश्वर के वचन को पढ़ते हैं। इसी कारण सच्चा आत्मिक परिवर्तन बाइबल पठन और मनन और उसे याद कर लेने से होता है। इसलिए नहीं कि आपने पालन करने के लिए कुछ नियमों को सीखा। वरन् इसलिए कि बाइबल में ही परमेश्वर मसीह की मनोहरता तथा महानता को प्रकट करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर मैं एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहूँगा । यदि आपने पिछले सप्ताह के सन्देश को पढ़ा कि परिवर्तित होने के लिए हमें परमेश्वर की महिमा के तेज़ को देखना होगा, परन्तु हम उसे अपनी मरी हुई दशा, और कठोरता और अन्धेपन के कारण नहीं देख सकते हैं, और कि इसलिए हमें परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह हमें जिलाए और कोमल बनाए और हमारी आँखें खोले। ओैर माना कि आप यह निष्कर्ष निकालते हैं - ठीक तो मैं अब प्रार्थना का जीवन जीऊंगा और बाइबल पढ़ने, अध्ययन करने और उसे रटने में समय नहीं लगाऊँगा क्योंकि मानवीय रीति से देखना और समझना वह नहीं देख सकता जो देखा जाना चाहिए। यह जो मैंने कहा और जो बाइबल का यह पाठ कहता है उसका बिल्कुल गलत अर्थ निकालना होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बात यह है कि जब हम बाइबल पर दृष्टि करते हैं तो परमेश्वर ही अपनी महिमा के तेज़ को देखने के लिए हमारी आँखें खोलता है। मान लीजिए आप ताजमहल की सुन्दरता को देखना चाहते, परन्तु आप दृष्टिहीन होते, आप मान लीजिए कि परमेश्वर आपसे कहता, मुझे पुकारो और मुझ से प्रार्थना करो और मैं ताजमहल की सुन्दरता देखने के लिए तुम्हारी आँखें खोल दूँगा। तो क्या आप प्रार्थना करने आगरा से चेन्नई जाते? या कि आप ताजमहल देखने के लिए परमेश्वर द्वारा प्रदान प्रत्येक शक्ति और ज्ञानेन्द्रियों का उपयोग करते कि ताजमहल तक जाएँ और परमेश्वर की प्रतिज्ञा के अनुसार अपनी दृष्टि उठाएँ? जो बात मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि वह आपको ताजमहल की सुन्दरता नहीं दिखाएगा यदि आप चेन्नई में ही बैठे रहेंगे, चाहे आप कितनी भी प्रार्थना कर लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा आँखों के खोले जाने का कार्य हमेशा उसके वचन के द्वारा समझाए जाने के साथ ही हो। वह यह चाहता है कि हम उसके पुत्र की महिमा को देखें (और बदल जाएँ)। इसलिए जब हम उसके पुत्र को देखते हैं तो वह हमारी आँखें खोल देता है। सच्चे आत्मिक आत्म-प्रकाशन के परमेश्वर के तरीके में आत्मा का कार्य हमेशा एक साथ होता है। आत्मा का कार्य उसकी महिमा, सुन्दरता और महानता दिखाना है जिसे हमारा ज्ञान परमेश्वर के वचन में देखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें यह सोचने की गलती नहीं करना है कि परमेश्वर के आत्मा से हमें कोई नई जानकारी पाने की आवश्यकता है। बाइबल में परमेश्वर के विषय हमारी समझ से परे हज़ारों गुना जानकारियाँ हैं। हमें आवश्यकता यह है कि हम अपने हृदय की आँखों से देखें&amp;amp;nbsp;! बाइबल में मसीह के विषय जो हम देख सकते हैं उसके विषय आत्मा के द्वारा दी कोई भी जानकारी हमें रत्ती भर भी और आत्मिक या परमेश्वर की दृष्टि में अच्छा नहीं बनाएगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मान लीजिए कि आत्मा आपको यह नवीन सूचना देती है कि आपकी बाँझ मित्र गर्भवती होने जा रही है। आप उसे यह बताते हैं, और जब ऐसा हो जाता है तो आप और वह इस भविष्यवाणी तथा गर्भधारण के आश्चर्यकर्म पर खुशी से झूम उठते हैं। आत्मिक रूप से आपने क्या पाया? कुछ नहीं, यदि आप बाइबल न खोलें और हृदय की आँखों से न देखें - मसीह की उस महिमा और सुन्दरता के चित्रण को न देखें -यीशु नासरी क्रूस पर मरा और जी उठा कि पापियों का उद्धार करे और उस परमेश्वर की महिमा करे जिसने इस प्रकार की आशीष आपको दी। आश्चर्यकर्मों के कारण धार्मिक जोश स्वाभाविक बात है और आवश्यक नहीं कि उसमें कोई आत्मिक या अलौकिक बात हो। आत्मा के वरदान बहुमूल्य हैं, परन्तु पवित्र आत्मा द्वारा आँखों का खोला जाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है ताकि हम बाइबल में मसीह की महिमा के तेज़ को देख सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें किसी नई सूचना की आवश्यकता नहीं है। वरन् नई आँखों की जिस से कि हमारे लिए परमेश्वर के वचन में जो प्रकाशित किया गया है, वह हम देख सकें। मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== प्रार्थना करके भटके नहीं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस से मैं कुछ तात्पर्य बताना चाहूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहला यह कि जब आप देखने के लिए आँखों के लिए प्रार्थना करते हैं, तो आपको अपने मस्तिष्क को शून्य नहीं करना है। यह न सोच लें कि प्रार्थना की अनिवार्यता का अर्थ परमेश्वर के वचन पर केन्द्रित विचार की निश्चितता है। जब आप मसीह की महिमा के तेज़ को देखने के लिए प्रार्थना करते हैं तो मानसिक रूप से भटक न जाएं, न ही तटस्थ हों। निष्क्रिय न बनें, ठहरे ही न रहें। यह एक बड़ी गलती है। मसीहियत के विषय जो एक अद्वितीय बात है वह यह है कि वह ऐतिहासिक है और सुस्पष्ट है। यीशु वास्तव में ऐतिहासिक है। परमेश्वर की योजना यह है कि इस मनुष्य यीशु की आत्मिक सुन्दरता तथा मूल्य जैसा कि बाइबल में प्रकाशित है, देखने के लिए वह हमारी आँखें खोल दे। यदि उसे देखने के लिए हम प्रार्थना करते और तब हमारा मन भटक जाता है, तो हम उसे नहीं देखेंगे। अतः एकाग्रचित्त हों और प्रार्थना करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तब क्या&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. प्रार्थना करें और पढें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर का वचन पढ़ें&amp;amp;nbsp;! कैसा सौभाग्य! और कैसा दायित्व! और परमेश्वर को देखने की कैसी क्षमता! इफिसियों 3:3-4 देखिए। पौलुस कहता है, “अर्थात् वह रहस्य जो मुझ पर प्रकाशन के द्वारा प्रकट किया गया, जैसा मैं पहले ही संक्षेप में लिख चुका हूँ, जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।“ जिसे पढ़कर! परमेश्वर ने यह चाहा कि जीवन के सबसे बड़े रहस्य पढ़ने के द्वारा प्रकाशित हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब अध्याय 1:18 से तुलना करें, जहाँ पौलुस कहता है, “मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों, जिस से तुम जान सको कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है।” अतः इफिसियों 3:4 कहता है कि इस रहस्य को पढ़ने द्वारा जाना जाता है। और इफिसियों 1:18 कहता है कि जो हमें जानना चाहिए वह जानने के लिए प्रार्थना के उत्तर में परमेश्वर को हमारी आँखें खोलना होगा। हाँ, हमें प्रार्थना करना होगा। हां, परमेश्वर की सहायता के बिना हम अन्धे हैं। परन्तु इस सप्ताह मुख्य बात यह है कि, हमें पढ़ना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
“जिसे पढ़कर तुम जान सकते हो कि मैं मसीह के रहस्य को कहाँ तक समझता हूँ।” प्रार्थना करना बाइबल पढ़ने का स्थान नहीं ले सकता है। प्रार्थना करना हमारे बाइबल पठ्न को देखने में बदल सकता है। परन्तु यदि हम बाइबल नहीं पढ़ेंगे, हम नहीं देखेंगे। पवित्र आत्मा इसलिए भेजा गया कि यीशु की महिमा करे, और यीशु की महिमा का चित्रण बाइबल में किया गया है। पढि़ए, खुश होईए कि आप पढ़ सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. प्रार्थना करें और अध्ययन करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 तीमुथियुस 2:15, “अपने आपको परमेश्वर के ग्रहणयोग्य और ऐसा कार्य करने वाला ठहराने का प्रयत्न कर जिस से लज्जित होना न पड़े, और जो सत्य के वचन को ठीक से काम में लाए।” परमेश्वर ने अपने बारे में एक पुस्तक हमें दी है, इसलिए नहीं कि हम इसे जैसा चाहे वैसा लापरवाही के साथ पढ़ें। पौलुस कहता है, “ऐसा कार्य करनेवाला ठहराने का प्रयत्न कर... जो सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।” यदि आप परमेश्वर के वचन से पूरा पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें वचन का अध्ययन करना होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
घड़ी का ‘पेन्डुलम’ झूलता रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रार्थना करें और बस प्रार्थना करें और अध्ययन जैसे आत्मिक कार्य पर निर्भर न करें । कुछ दूसरे लोग कहते हैं, अध्ययन करें और बस अध्ययन करें क्योंकि परमेश्वर प्रार्थना में आपको किसी वचन का अर्थ नहीं बताएगा। परन्तु बाइबल में इस प्रकार का कोई द्विभाजन नहीं है। हमें बाइबल का अध्ययन करना चाहिए और इसका ठीक ठीक उपयोग करना चाहिए, और हमें प्रार्थना करना चाहिए, अन्यथा हम बाइबल में एक आवश्यक बात को नहीं देख पाएँगे, अर्थात् मसीह के चेहरे पर परमेश्वर की महिमा के तेज़ को (2 कुरिन्थियों 4:4,6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के एक महान अध्ययनकर्ता बेन्जामिन वारफील्ड ने 1911 में लिखा, “कभी कभी हमें ऐसा सुनने को मिलता है कि आपके पुस्तकों में दस घण्टे अध्ययन करने की अपेक्षा आपके घुटनों पर दस मिनिट रहना आपको परमेश्वर का एक अधिक सच्चा, गहरा और सक्रिय ज्ञान देगा। ‘क्या!’ सही उत्तर होगा, ‘तब आपके घुटनों पर आपकी पुस्तकों के साथ दस घण्टे?’” (“द रिलीजस लाईफ ऑफ थियोलॉजिकल स्टडीज”, नॉल, द प्रिन्सटन थियोलॉजी, (ग्रैन्ड रैपिड्स: बेकर बुक हाऊस, 1983) पृ. 263)। बाइबल का सन्देश यही है। हाँ, हमें प्रार्थना करना चाहिए। यदि परमेश्वर हमारी आँखें न खोले तो हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातें नहीं देख पाएँगे। परन्तु प्रार्थना करना अध्ययन करने का स्थान नहीं ले सकता है, क्योंकि पौलुस कहता है, “प्रयत्न कर -अध्ययन कर – कि सत्य के वचन को ठीक ठीक काम में लाएँ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. प्रार्थना करें और छान-बीन करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाइबल के प्रति हमारा रवैया एक लोभी व्यक्ति के समान होना चाहिए जो सोने की खदान में सोना ढूँढ़ता है,या एक मंगेतर के समान जिसने घर में कहीं अपनी सगाई की अंगूठी खो दी है। वह घर को छान मारती है।इसी रीति से हम बाइबल में परमेश्वर को खोजते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नीतिवचन 2:1-6 कहता है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे मेरे पुत्र, यदि तू मेरे वचन ग्रहण करें, ओर मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख छोड़े, 2 ओर बुध्दि की बात ध्यान से सुने, और समझ की बात मन लगाकर सोचे; 3 और प्रवीणता और समझ के लिये अति यत्न से पुकारें, 4 और उसको चान्दी की नाई ढूँढे़, और गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगा ररें; 5 तो तू यहोवा के भय को समझेगा, और परमेश्वर का ज्ञान तुझे प्राप्त होगा। 6 क्योंकि बुध्दि यहोवा ही देता है; ज्ञान और समझ की बातें उसी के मुँह से निकलती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ग्रहण करें, संचित करें, अपना मन लगाएँ, पुकारें, ज़ोर से चिल्लाएँ, चांदी के समान ढूँढें, गुप्त धन के समान उसकी खोज में लगे रहें। यह बाइबल की छान-बीन करना है जिससे लाभ ही होगा। ऐसे ढूँढें जैसे कि कोई छिपा हुआ धन है, या चाँदी है। प्रार्थना अवश्य करें (जैसा कि पद 3 कहता है) परन्तु छान-बीन करना न छोड़ें। परमेश्वर उन्हें देने की प्रतिज्ञा करता है जो सम्पूर्ण हृदय से ढूंढते हैं (यिर्मयाह 29:13)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. प्रार्थना करें और विचार करें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 तीमुथियुस 2:7 पर विचार करें, “जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” इसका अर्थ क्या यह है कि पौलुस की शिक्षा को समझना सोच विचार का मात्र एक मानवीय तथा स्वाभाविक कार्य है? नहीं। इस पद के अन्त में लिखा है, “प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” आप इसे स्वयं के प्रयास से नहीं देख सकते हैं। आत्मिक समझ परमेश्वर का दान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु परमेश्वर ने आत्मिक प्रकाश का दान सोच-समझ के द्वारा देना नियुक्त किया है।“जो मैं कहता हूँ उस पर ध्यान दें, क्योंकि प्रभु तुझे सब बातों की समझ देगा ।” अतः मन लगा कर प्रार्थना करें और परमेश्वर से मांगें कि वह आपको वह प्रकाश दे जिसकी आपको आवश्यकता है। परन्तु ध्यान लगाना न छोड़ें। ध्यान दें और प्रार्थना करें। प्रार्थना करें और ध्यान दें। परमेश्वर ने इसी प्रकार ठहराया है। एक ऐतिहासिक मसीह। संरक्षण तथा प्रकाशन की एक पुस्तक। सभी यही कहती हैं - पढ़ें और अध्ययन करें, और छान-बीन करें और ध्यान दें या सोच विचार करें। परन्तु प्रार्थना के बिना सब कुछ व्यर्थ है। दोनों कार्य करना है, कोई भी एक नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''5. प्रार्थना करें और बोलें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर चाहता है कि प्रचार करने, एक-दूसरे को शिक्षा देने, चेतावनी देने, उत्साहित करने और समझाने में कहे गए वचन लिखित वचन में बदलें। कुलुस्सियों 3:16 कहता है, “मसीह के वचन को अपने हृदय में बहुतायत से बसने दो, समस्त ज्ञान सहित एक दूसरे को शिक्षा और चेतावनी दो...।” हमारे लिए मसीह का वचन एक दूसरे के लिए हमारा वचन बन जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं उपदेश देता हूँ। यह परमेश्वर की इच्छा है कि उसका वचन बारम्बार नई रीति से सुनाया जाएँ। और आप एक दूसरे को परमेश्वर का वचन सुनाते हैं। कलीसिया में छोटे-छोटे झुण्ड होने का सही आधारभूत कारण है - कि हमारे द्वारा परमेश्वर के वचन को हमारे लिए परमेश्वर का वचन बनाएँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका क्या यह अर्थ है कि हम उन समयों में प्रार्थना न करें कि हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों को देखने के लिए किसी न किसी रीति से हृदय की आँखें खोल सकते हैं क्योंकि हम इसे दृढ़ निश्चयता या प्रेरक तर्कों या सुन्दर शब्दों में कह रहे हैं? पौलुस ऐसा नहीं सिखाते हैं। इसी पुस्तक में (कुलुस्सियों 1:9-10) में वह प्रार्थना करता है – प्रार्थना! – “हमने तुम्हारे लिए प्रार्थना और यह विनती करना नहीं छोड़ा कि तुम समस्त आत्मिक ज्ञान और समझ सहित परमेश्वर की इच्छा की पहचान में परिपूर्ण हो जाओ... परमेश्वर के ज्ञान में बढ़ते जाओ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मसीह का वचन हमारे मध्य बहुतायत से निवास करता है तब यदि परमेश्वर को जानना और आत्मिक ज्ञान एवं समझ पाना स्वतः ही होते, तो पौलुस को परमेश्वर से मन लगाकर यह प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं होती। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन और प्रार्थना साथ-साथ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने बार बार देखा कि यदि हमें परमेश्वर के वचन में परमेश्वर की महिमा देखना है तो प्रार्थना अपरिहार्य है।परन्तु हमने यह भी देखा कि परमेश्वर के वचन को पढ़ना, अध्ययन करना, छान-बीन करना, उस पर ध्यान देना और उसे सुनाना भी आवश्यक है। परमेश्वर ने यह ठहराया है कि उसके आत्मा द्वारा अन्तर्दृष्टि दिए जाने के कार्य के साथ हमेशा उसके वचन द्वारा समझ प्रदान किए जाने का कार्य भी है। वह यह चाहता है कि हम परमेश्वर की महिमा को देखें और कि हम में परमेश्वर की महिमा दिखाई भी दे। और इसलिए जब बाइबल में हम परमेश्वर की महिमा को देखते हैं तो वह हमारी आंखें खोलता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 पढ़ें, अध्ययन करें, छान-बीन करें, सोचें, बोलें, सुनें, और प्रार्थना करें, “मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(आगे अध्ययन के लिए देखें - लूका 24:45; प्रॆ.काम 16:14; 2 राजा 6:17; मत्ती 16:17; 11:2-6, 11:27)।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>मेरी आँखें खोल दे कि मैं देख सकूँ</title>
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				<updated>2017-01-19T20:42:15Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;मेरी आँखें खोल दे कि मैं देख सकूँ&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Open My Eyes That I May See}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अपने दास का उपकार कर, कि मैं, जीवित रहूँ, और तेरे वचन पर चलता रहूँ । 18 मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ । 19 मैं तो पृथ्वी पर परदेशी हूँ; अपनी आज्ञाओं को मुझ से छिपाए न रख&amp;amp;nbsp;! 20 मेरा मन तेरे नियमों की अभिलाषा के कारण हर समय खेदित रहता है । 21 तू ने अभिमानियों को, जो शापित हैं, घुड़का है, वे तेरी आज्ञाओं की बाट से भटके हुए हैं । 22 मेरी नामधराई और अपमान दूर कर, क्योंकि मैं तेरी चितौनियों को पकड़े हूँ । 23 हाकिम भी बैठे हुए आपस में मेरे विरूद्ध बातें करते थे, परन्तु तेरा दास तेरी विधियों पर ध्यान करता रहा । 24 तेरी चितौनियाँ मेरा सुखमूल और मेरे मन्त्री हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे प्राणों के लिए समानान्तर रेल पटरियां ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जबकि हमने 2011 में प्रवेश किया है, हमारे लिए परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि हम पवित्रता एवं प्रेम और मिशन एवं स्वर्ग की दिशा में दो समानान्तर रेल पटरियों के मार्ग पर स्थिर बने रहें । इस ट्रेन की ये दो पटरियाँ परमेश्वर के सिंहासन के सामने प्रार्थना तथा परमेश्वर के वचन पर मनन करना हैं । आप में से कुछ लोगों को शायद हमारे मिशन स्टेटमेन्ट “द स्प्रिचुएल डायनेमिक्स” नाम पुस्तिका का दूसरा पृष्ठ याद होगा, जहाँ लिखा है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परमेश्वर जो कुछ है उसे प्रिय जानते हुए, जिन सब से वह प्रेम करता है उन सबसे प्रेम करते हुए, उसके सभी अभिप्रायों के लिए प्रार्थना करते हुए, उसके पवित्र वचनों पर मनन करते हुए, उसके अनुग्रह द्वारा सम्भाले जाते हुए, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में, प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की महिमा के गुणगान में हम परमेश्वर पिता के साथ सहभागी होते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सिंहासन के सामने प्रार्थना करना और परमेश्वर के वचन पर मनन करना समानान्तर पटरियों के समान है जो कि हमारे प्राणों की ट्रेन को उस सही मार्ग पर रखती हैं जो पवित्रता तथा स्वर्ग की ओर ले जाता है । इस वर्ष के प्रारम्भ ही में हमें प्रार्थना तथा बाइबल मनन के लिए हमारे उत्साह को एक नवीनता प्रदान करना होगा । पुनः जागरण, और पुनःस्थापन और पुनर्नवीनीकरण के बिना सब कुछ पुराना, घिसा-पिटा और कमज़ोर हो जाता है । इसलिए प्रति वर्ष प्रार्थना-सप्ताह के दौरान प्रार्थना तथा बाइबल के प्रति अपने उत्साह को पुनः जगाने के लिए इन महान तथा बहुमूल्य बातों पर एक बार पुनः विचार करते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== भजन 119:18 से तीन सीखने योग्य बातें - ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस वर्ष वे दो सन्देश जो कि प्रार्थना सप्ताह के आरम्भ और अन्त के मध्य में हैं, भजन 119:18 से लिए गए हैं, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” इस पद में प्रार्थना और वचन दोनों के विषय हैं, और हमें यह देखना है कि कैसे, ताकि हम इन्हें अपने जीवनों और अपनी कलीसिया में इसी रीति से जोड़ सकें । हम इस पद से नीन चीजें सीखते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पहली बात यह कि परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातें हैं, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” यह “व्यवस्था” शब्द “तोरह” है जिसका अर्थ है “निर्देश” या “शिक्षा” । हमारे लिए परमेश्वर की शिक्षाओं में अद्भुत बातें हैं । वास्तव में, वे इतनी अद्भुत हैं कि जब आप उन्हें सच में देखते हैं तो वे आपको गहराई से बदल डालती हैं और पवित्रता एवं प्रेम एवं सेवकाई के लिए सामर्थ्य प्रदान करती हैं (2 कुरिन्थियों 3:18) । इसीलिए परमेश्वर के वचन को पढ़ना, और जानना और उस पर मनन करना और रटना अत्यन्त महत्वपूर्ण है । &lt;br /&gt;
*इस पद से जो दूसरी बात हम सीखते हैं वह यह है कि परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना कोई भी इन अद्भुत बातों को, जैसी वे वास्तव में हैं, नहीं देख सकता है । “मेरी आँखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” यदि परमेश्वर हमारी आंखें न खोले तो हम उसके वचन की अद्भुत बातों को नहीं देखेंगे । हम स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुन्दरता को देखने के योग्य नहीं हैं । जब हम परमेश्वर की सहायता के बिना बाइबल पढ़ते हैं, तो बाइबल की शिक्षाओं और घटनाओं में परमेश्वर की महिमा का चमकना एक दृष्टिहीन मनुष्य के चेहरे पर सूरज के चमकने के समान है । बात यह नहीं है कि आप उसके ऊपरी अर्थ को नहीं समझ सकते हैं, परन्तु यह कि आप इसकी अद्भुत सुन्दरता और महिमा को इस रीति से नहीं देख सकते हैं कि यह आपके दिल को जीत ले । &lt;br /&gt;
*जो कि हमें उस तीसरी बात की ओर ले जाती है जो हम इस पद से सीखते हैं, अर्थात, कि जब हम बाइबल पढ़ते हैं तो हमें परमेश्वर से अलौकिक प्रकाशन मांगना चाहिए । “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” क्योंकि परमेश्वर के कृपालु प्रकाशन के बिना बाइबल की शिक्षाओं तथा घटनाओं में आत्मिक सुन्दरता को तथा परमेश्वर के अद्भुत कार्यों को देखने में हम अपने आप में असहाय हैं, हमें परमेश्वर से यह प्रार्थना करना चाहिए, “मेरी आंखें खोल दे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सत्य के तीन कदम ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले सप्ताह मैं परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा और कि व्यवहारिक रूप में हम कैसे उन्हें अपने मन मस्तिष्क में समझ सकते हैं । परन्तु आज मैं प्रार्थना पर ध्यान केन्द्रित करूँगा । मैं चाहता हूँ कि हम इस गम्भीर सत्य को समझें जो कि तीन चरणों में है: परमेश्वर का वचन परमेश्वर के प्रति एक ऐसे श्रद्धापूर्ण जीवन को जीने के लिए अति आवश्यक है जो कि स्वर्ग को ले जाता हो और जो पृथ्वी पर सामर्थी तथा अर्थ पूर्ण जीवन हो । हम परमेश्वर के वचन की सच्चाई को परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना देख भी नहीं सकते हैं । और इसलिए हमें प्रतिदिन प्रार्थना का जीवन जीने वाले लोग होने की आवश्यकता है ताकि परमेश्वर वह सब करे जो उसे हमारे हृदयों तथा जीवनों में अपने वचन के अद्भुत कार्यों को करने के लिए आवश्यक हो । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए एक एक करके इन तीन कदमों को उठाएँ और बाइबल के अन्य स्थलों में उनकी पुष्टि तथा उदाहरण देखें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. पवित्रतापूर्ण जीवन के लिए बाइबल पढ़ना अति आवश्यक है ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि परमेश्वर के वचन को देखना और इसे जानना और इसका हम में होना परमेश्वर के अभिप्रायों के लिए पवित्रता तथा प्रेम तथा सामर्थ्य से परिपूर्ण जीवन जीने के लिए अति आवश्यक है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 11 को पुनः देखें, “तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूं ।” तब हम अपने जीवन में पाप से कैसे बच सकते हैं? अपने हृदयों में परमेश्वर के वचन को संचित करने के द्वारा । कितने ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचन पर मनन न करने और उस से प्रेम न करने और उसे न रटने के द्वारा अपने जीवन का बुरा हाल कर डालते हैं । क्या आप पवित्र बनना चाहते हैं, अर्थात कि, क्या आप पाप पर विजय पाने की सामर्थ्य चाहते हैं और एक अति धर्मी एवं त्यागपूर्ण प्रेम तथा मसीह के निमित्त पूर्ण भक्ति का जीवन जीना चाहते हैं? तो सही मार्ग पर आ जाइए । परमेश्वर ने धार्मिकता या सामर्थ्य की ओर जाने वाला एक मार्ग ठहराया है: और यह मार्ग अपने जीवनों में बाइबल को संचित करने का है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह बात मैं वृद्धों से कहता हूँ और यह बात मैं जवानों के माता-पिता से कहता हूँ । पवित्र शास्त्र में दी परमेश्वर की आज्ञाओं और चेतावनियों और प्रतिज्ञाओं पर मनन कीजिए और उन्हें रटिए और उन से प्रेम कीजिए । मैं यह नहीं कह रहा कि यह आसान है, विशेषकर जबकि आप वृद्ध हो चले हों । परन्तु करने योग्य अधिकांश अच्छी बातें सरल नहीं हैं । एक सुन्दर फर्नीचर बनाना, एक अच्छी कविता लिखना, एक उत्कृष्ट संगीत रचना, एक विशेष भोजन बनाना या कोई उत्सव मनाना - इन में से कोई भी सरल नहीं है । परन्तु ये करने योग्य हैं । तो क्या एक अच्छा जीवन जीने के लिए कुछ करने योग्य नहीं है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तलीथा अब दो वर्ष की है । वह बाइबल के पद याद करना सीख रही है । वह अलग-अलग प्रार्थनाएँ भी सीख रही है । क्यों? बाइबल के पदों को उसके लिए बार-बार दोहराने का कष्ट करने की क्या ज़रूरत है? बिल्कुल सीधी-सी बात है - जब वह तरूणाई में पहुंचे तो मैं चाहता हूँ कि वह परमेश्वर का भय मानने वाली, शुद्ध और पवित्र और प्रेमी और नम्र और दयालु और दीन और बुद्धिमान हो । और बाइबल बिल्कुल स्पष्ट रूप से कहती है, यह आपके हृदय में परमेश्वर के वचन को संचित करने के द्वारा होता है । “तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूँ ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना 17:17 में, हमारे लिए यीशु ने अपनी उस महान प्रार्थना में ऐसा कहा है, “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर- तेरा वचन सत्य है ।” “पवित्र करना” बाइबल का एक शब्द है जिसका अर्थ है कि एक व्यक्ति को पवित्र या धर्मी या प्रेमी या शुद्ध या सद्गुणी या आत्मिक बनाना । और इन बातों को मैं अपने स्वयं के लिए और अपने बच्चों के लिए और आपके लिए चाहता हूँ । तो फिर इस वर्ष हमें क्या करना चाहिए? यदि हम सत्य द्वारा पवित्र किए गए हैं और परमेश्वर का वचन यह सत्य है, तो हमें क्या करना चाहिए? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि एक डाँक्टर कहता है, “आप बहुत अस्वस्थ हैं और आप अपनी इस बीमारी के कारण मर जाएँगे, परन्तु यदि आप इस दवाई को लेंगे तो आप स्वस्थ हो जाएंगे और जीवित रहेंगे,” और आप इस दवाई को लेने में लापरवाही करते हैं - बहुत व्यस्त हूँ, ये गोलियाँ बड़ी-बड़ी हैं और गुटकने में बहुत कठिनाई होती है, या फिर आप इन्हें लेना भूल जाते हैं - आप अस्वस्थ रहेंगे और मर जाएँगे । पाप और आत्मिक अपरिपक्वता के साथ भी ऐसा ही है । परमेश्वर आप से जो कहता है कि वह आपको पवित्र करेगा, और आपको परिपक्व तथा बलवान तथा पवित्र बनाएगा, उसे यदि आप अनसुना करते हैं तो आप परिपक्व, बलवान और पवित्र नहीं होंगे । परमेश्वर के वचन को पढ़ना, उस पर मनन करना और उसे रटना और प्रिय जानना पाप पर विजय पाने और एक बलवान, भक्त, परिपक्व, प्रेमी, बुद्धिमान मनुष्य बनने के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त तरीका है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के वचन में ऐसी अद्भुत बातों को देखा जा सकता है जो कि आपको गहराई से परिवर्तित करेंगी, यदि आप उन्हें सच में देखेंगे और अपने आप में संचित करेंगे । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. परमेश्वर की सहायता के बिना हम नहीं देख सकते हैं ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस पाठ में दूसरी बात यह है कि परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना बाइबल में जो अद्भुत बातें हैं उन्हें हम नहीं देख सकते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण यह है कि हम पतित और भ्रष्ट और पापों में मरे हुए हैं और इसलिए अन्धे और अनभिज्ञ और कठोर हैं । इफिसियों 4:18 में पौलुस हमारा इस रीति से वर्णन करता है, हम “उस अज्ञानता के कारण जो (हम में) है, और (हमारे) मन की कठोरता के कारण, (हमारी) बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और (हम) परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए हैं ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाविवरण 29:2-4 में मूसा ने इस परेशानी के विषय में इस प्रकार लिखा है, “फिर मूसा ने सब इस्त्राएलियों को बुलाकर उनसे कहा, तुमने वह सब देख लिया है जो यहोवा ने तुम्हारी आंखों के सामने मिस्र देश में...किया उन बड़ी-बड़ी परीक्षाओं, उन महान चिन्हों तथा चमत्कारों को... । फिर भी यहोवा ने आज न तो तुमको समझ का मन, न देखने की आंखें और न सुनने के कान दिए हैं ।” ध्यान दीजिए कि. तुमने देखा... परन्तु तुम परमेश्वर के अलौकिक कार्य के बिना नहीं देख सकते हो । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही हमारी दशा है । हम अपने जीवनों में परमेश्वर के उद्बोधन, जान डालने वाले, कोमल बनाने वाले, नम्र बनाने वाले, शुद्ध करने वाले, प्रकाशित करने वाले कार्य के बिना अधर्मी, भ्रष्ट, कठोर और अनभिज्ञ हैं । परमेश्वर द्वारा हमारे हृदयों की आंखों को खोले बिना और हमें इन बातों के प्रति आत्मिक ज्ञान दिए बिना हम बाइबल की शिक्षाओं की अद्भुत बातों तथा महिमा को कभी नहीं देख पाएंगे । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सिखाने और यह जानने का कारण यह है कि हम परमेश्वर के कार्य के लिए अभिलाषी और भूखा बनें और बाइबल पढ़ने में उसकी सहायता के लिए हम परमेश्वर से विनती और याचना करें । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मत्ती 16:17; 11:4; लूका 24:45; 1 कुरि. 2:14-16; यूहन्ना 3:6-8; रोमि 8:5-8 देखें) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. हमें देखने में सहायता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरी बात यह है कि यदि पवित्र होने, और प्रेमी होने और स्वर्ग जाने के लिए परमेश्वर के वचन के सत्य को जानना और संचित करना अति आवश्यक है, और यदि स्वाभाविक रूप से हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों को नहीं देख सकते और उसकी महिमा के प्रति आकर्षित महसूस नहीं कर सकते हैं, तो हम भयंकर दशा में हैं और हमें देखने में सहायता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता है । “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, मसीही जीवन में प्रार्थना अति आवश्यक है, क्योंकि हमारे जीवनों में वचन की सामर्थ्य को प्रदान करने के लिए यह द्वार खोलती है । परमेश्वर के वचन की महिमा अन्धे व्यक्ति के चेहरे पर सूरज के चमकने के समान है, यदि परमेश्वर उस महिमा के प्रति हमारी आंखें न खोले । और यदि हम उस महिमा को नहीं देखते हैं तो हम परिवर्तित नहीं होंगे (2 कुरिन्थियों 3:18; यूहन्ना 17:17), और यदि हम परिवर्तित नहीं हुए हैं, तो हम मसीही नहीं हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इफिसियों 1:18 में पौलुस इस रीति से प्रार्थना करता है । वह कहता है, “मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों, जिस से तुम जान सको कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है... ।” दूसरे शब्दों में, ”इन बातों की शिक्षा मैंने तुम्हें दी है और तुमने उन्हें अपने बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण किया है, परन्तु जब तक तुम उनकी महिमा को अपनी आत्मिक ज्ञानेन्द्रियों (तुम्हारे हृदय की आँखों) द्वारा अनुभव नहीं करोगे, तुम परिवर्तित नहीं होंगे । (इफि. 3:14-19; कुलु 1:9 तथा 3:16 देखें) । ये बातें पौलुस मसीहियों को लिख रहा है, जो कि यह दर्शाता है कि हमें निरंतर प्रार्थना करते रहना चाहिए जब तक कि हम स्वर्ग पहुंचकर आत्मिक आंखें न पाएँ । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे बाइबल पठन को समझने के लिए सात प्रकार की प्रार्थनाए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु क्योंकि हमारा बाइबल पाठ भजन 119:18 है, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ,” हमें इस भजनकार को यह बताने देना चाहिए कि वह परमेश्वर के वचन के अपने पठन के विषय और सामान्य रूप से कैसे प्रार्थना करता है । अतः मैं भजन 119 पर एक सरसरी दृष्टि डालते हुए अन्त करना चाहूँगा और आपको वे सात प्रकार की प्रार्थनाओं को दिखाना चाहूँगा जिन्हें आप इस वर्ष अपने बाइबल पठन में उपयोग कर सकते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें प्रार्थना करना चाहिए . . . &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. कि परमेश्वर अपने वचन को हमें सिखाएँ । भजन 119:12, “मुझे अपनी विधियां सिखा ।” (पद 33,64,66,68,135 भी देखें) । परमेश्वर के वचन को सच में सीखना तब ही सम्भव है जब परमेश्वर शिक्षण के अन्य सभी माध्यमों में और द्वारा शिक्षक होता है । 2. कि परमेश्वर अपने वचन को हम से न छिपाएँ । भजन 119:19, “अपनी आज्ञाओं को मुझ से न छिपा ।” बाइबल हमें उस भंयकर ताड़ना या दण्ड के विषय चेतावनी देती है जब परमेश्वर का वचन हम से ले लिया जाएगा (आमोस 8:11; पद 43 भी देखें) । 3. कि परमेश्वर हमें उसका वचन समझाएँ । भजन 119:27, “अपने उद्देश्यों का मार्ग मुझे समझा” (पद 34,73,144,169) । यहाँ हम परमेश्वर से समझ मांगते हैं और कहते हैं कि उसके वचन को हमें समझाने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह करे । 4. कि परमेश्वर हमारे हृदयों को अपने वचन की ओर लगाएँ । भजन 119:36, “मेरे मन को अनुचित लाभ की ओर नहीं, वरन् अपनी चेतावनियों की ओर लगा ।” हमारी सबसे बड़ी परेशानी हमारी बुद्धि नहीं, परन्तु हमारी इच्छा है -स्वभाव ही से हम परमेश्वर के वचन को पढ़ना और मनन करना और याद करना नहीं चाहते हैं । अतः हमें परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह हमारे मन को अपने वचन की ओर लगाएँ । 5. कि परमेश्वर हमें जिलाए कि हम उसके वचन को मानें । भजन 119:88, “अपनी करूणा के अनुसार मुझे फिर से जिला, कि मैं तेरे मुँह की चेतावनियों को मानूं ।” वह जानता है कि परमेश्वर के वचन के प्रति मन लगाने और उसको मानने के लिए हमें जीवन और ताकत की आवश्यकता है । इसलिए वह परमेश्वर से इस बुनियादी आवश्यकता के लिए प्रार्थना करता है (पद 154 भी देखें) । 6. कि परमेश्वर अपने वचन में हमारे कदम स्थिर करे । भजन 119:133, “तू अपने वचन पर मेरे कदम स्थिर कर ।” न केवल समझ और जीवन के लिए हम परमेश्वर पर आश्रित हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन पर चलने के लिए भी, कि वह हमारे जीवनों में स्थापित हो जाएँ । हम अपने आप यह नहीं कर सकते हैं । 7. कि जब हम भटक जाएँ तब परमेश्वर हमें ढूँढ़ ले । भजन 119:176, “मैं खोई हुई भेड़ के समान भटक गया हूं, अपने दास को ढूँढ़ लें ।” यह ध्यान देने योग्य है कि यह भक्त मनुष्य अपने भजन को एक पाप अंगीकार के साथ और इस आवश्यकता के साथ अन्त करता है कि परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आए और उसे ढूँढ़ ले जाए । हमें बारम्बार यह प्रार्थना भी करना चाहिए । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन हमारा धन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यह कहते हुए समाप्त करना चाहूँगा कि जब कि हम 2011 में प्रवेश करते और पवित्र तथा प्रॆमी होना चाहते और अपने शहर और देश देश में परमेश्वर के उद्देश्यों के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहते हैं, तो हमें ऐसे लोग होना है जो अपने हृदयों में परमेश्वर के वचन को संचित रखते हैं, परन्तु इस से बढ़कर ऐसे लोग जो जानते हैं कि परमेश्वर के बिना उनकी क्या भयानक दशा है और यह कि परमेश्वर ने प्रार्थना को वह मार्ग ठहराया है जिसके द्वारा हमारी आँखें परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातें देखें और इस प्रकार परिवर्तित हो जाएं । “ मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ। ” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भजन के लेखक ने कितनी लगन से इन प्रार्थनाओं को किया? हमें कितनी लगन से करना चाहिए? भजन 119:147 में एक उत्तर दिया है, “भोर होने से पहले ही उठकर मैं सहायता के लिए तुझे पुकारता हूं ।” वह भोर को ही उठ जाता है&amp;amp;nbsp;! यह सबसे उच्च प्राथमिकता है । क्या आप भी इसे सर्वोच्च प्राथमिकता बनाएँगे?&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

	<entry>
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		<title>मेरी आँखें खोल दे कि मैं देख सकूँ</title>
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				<updated>2017-01-19T20:41:58Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Open My Eyes That I May See}}   &amp;amp;gt; अपने दास का उपकार कर, कि मैं, जीवित रहूँ, और तेरे व...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Open My Eyes That I May See}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अपने दास का उपकार कर, कि मैं, जीवित रहूँ, और तेरे वचन पर चलता रहूँ । 18 मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ । 19 मैं तो पृथ्वी पर परदेशी हूँ; अपनी आज्ञाओं को मुझ से छिपाए न रख&amp;amp;nbsp;! 20 मेरा मन तेरे नियमों की अभिलाषा के कारण हर समय खेदित रहता है । 21 तू ने अभिमानियों को, जो शापित हैं, घुड़का है, वे तेरी आज्ञाओं की बाट से भटके हुए हैं । 22 मेरी नामधराई और अपमान दूर कर, क्योंकि मैं तेरी चितौनियों को पकड़े हूँ । 23 हाकिम भी बैठे हुए आपस में मेरे विरूद्ध बातें करते थे, परन्तु तेरा दास तेरी विधियों पर ध्यान करता रहा । 24 तेरी चितौनियाँ मेरा सुखमूल और मेरे मन्त्री हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे प्राणों के लिए समानान्तर रेल पटरियां ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जबकि हमने 2011 में प्रवेश किया है, हमारे लिए परमेश्वर का उद्देश्य यह है कि हम पवित्रता एवं प्रेम और मिशन एवं स्वर्ग की दिशा में दो समानान्तर रेल पटरियों के मार्ग पर स्थिर बने रहें । इस ट्रेन की ये दो पटरियाँ परमेश्वर के सिंहासन के सामने प्रार्थना तथा परमेश्वर के वचन पर मनन करना हैं । आप में से कुछ लोगों को शायद हमारे मिशन स्टेटमेन्ट “द स्प्रिचुएल डायनेमिक्स” नाम पुस्तिका का दूसरा पृष्ठ याद होगा, जहाँ लिखा है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परमेश्वर जो कुछ है उसे प्रिय जानते हुए, जिन सब से वह प्रेम करता है उन सबसे प्रेम करते हुए, उसके सभी अभिप्रायों के लिए प्रार्थना करते हुए, उसके पवित्र वचनों पर मनन करते हुए, उसके अनुग्रह द्वारा सम्भाले जाते हुए, पवित्र आत्मा की सामर्थ्य में, प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की महिमा के गुणगान में हम परमेश्वर पिता के साथ सहभागी होते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के सिंहासन के सामने प्रार्थना करना और परमेश्वर के वचन पर मनन करना समानान्तर पटरियों के समान है जो कि हमारे प्राणों की ट्रेन को उस सही मार्ग पर रखती हैं जो पवित्रता तथा स्वर्ग की ओर ले जाता है । इस वर्ष के प्रारम्भ ही में हमें प्रार्थना तथा बाइबल मनन के लिए हमारे उत्साह को एक नवीनता प्रदान करना होगा । पुनः जागरण, और पुनःस्थापन और पुनर्नवीनीकरण के बिना सब कुछ पुराना, घिसा-पिटा और कमज़ोर हो जाता है । इसलिए प्रति वर्ष प्रार्थना-सप्ताह के दौरान प्रार्थना तथा बाइबल के प्रति अपने उत्साह को पुनः जगाने के लिए इन महान तथा बहुमूल्य बातों पर एक बार पुनः विचार करते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== भजन 119:18 से तीन सीखने योग्य बातें - ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस वर्ष वे दो सन्देश जो कि प्रार्थना सप्ताह के आरम्भ और अन्त के मध्य में हैं, भजन 119:18 से लिए गए हैं, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” इस पद में प्रार्थना और वचन दोनों के विषय हैं, और हमें यह देखना है कि कैसे, ताकि हम इन्हें अपने जीवनों और अपनी कलीसिया में इसी रीति से जोड़ सकें । हम इस पद से नीन चीजें सीखते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*पहली बात यह कि परमेश्वर के वचन में अद्भुत बातें हैं, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” यह “व्यवस्था” शब्द “तोरह” है जिसका अर्थ है “निर्देश” या “शिक्षा” । हमारे लिए परमेश्वर की शिक्षाओं में अद्भुत बातें हैं । वास्तव में, वे इतनी अद्भुत हैं कि जब आप उन्हें सच में देखते हैं तो वे आपको गहराई से बदल डालती हैं और पवित्रता एवं प्रेम एवं सेवकाई के लिए सामर्थ्य प्रदान करती हैं (2 कुरिन्थियों 3:18) । इसीलिए परमेश्वर के वचन को पढ़ना, और जानना और उस पर मनन करना और रटना अत्यन्त महत्वपूर्ण है । &lt;br /&gt;
*इस पद से जो दूसरी बात हम सीखते हैं वह यह है कि परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना कोई भी इन अद्भुत बातों को, जैसी वे वास्तव में हैं, नहीं देख सकता है । “मेरी आँखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” यदि परमेश्वर हमारी आंखें न खोले तो हम उसके वचन की अद्भुत बातों को नहीं देखेंगे । हम स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुन्दरता को देखने के योग्य नहीं हैं । जब हम परमेश्वर की सहायता के बिना बाइबल पढ़ते हैं, तो बाइबल की शिक्षाओं और घटनाओं में परमेश्वर की महिमा का चमकना एक दृष्टिहीन मनुष्य के चेहरे पर सूरज के चमकने के समान है । बात यह नहीं है कि आप उसके ऊपरी अर्थ को नहीं समझ सकते हैं, परन्तु यह कि आप इसकी अद्भुत सुन्दरता और महिमा को इस रीति से नहीं देख सकते हैं कि यह आपके दिल को जीत ले । &lt;br /&gt;
*जो कि हमें उस तीसरी बात की ओर ले जाती है जो हम इस पद से सीखते हैं, अर्थात, कि जब हम बाइबल पढ़ते हैं तो हमें परमेश्वर से अलौकिक प्रकाशन मांगना चाहिए । “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” क्योंकि परमेश्वर के कृपालु प्रकाशन के बिना बाइबल की शिक्षाओं तथा घटनाओं में आत्मिक सुन्दरता को तथा परमेश्वर के अद्भुत कार्यों को देखने में हम अपने आप में असहाय हैं, हमें परमेश्वर से यह प्रार्थना करना चाहिए, “मेरी आंखें खोल दे ।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सत्य के तीन कदम ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगले सप्ताह मैं परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहूँगा और कि व्यवहारिक रूप में हम कैसे उन्हें अपने मन मस्तिष्क में समझ सकते हैं । परन्तु आज मैं प्रार्थना पर ध्यान केन्द्रित करूँगा । मैं चाहता हूँ कि हम इस गम्भीर सत्य को समझें जो कि तीन चरणों में है: परमेश्वर का वचन परमेश्वर के प्रति एक ऐसे श्रद्धापूर्ण जीवन को जीने के लिए अति आवश्यक है जो कि स्वर्ग को ले जाता हो और जो पृथ्वी पर सामर्थी तथा अर्थ पूर्ण जीवन हो । हम परमेश्वर के वचन की सच्चाई को परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना देख भी नहीं सकते हैं । और इसलिए हमें प्रतिदिन प्रार्थना का जीवन जीने वाले लोग होने की आवश्यकता है ताकि परमेश्वर वह सब करे जो उसे हमारे हृदयों तथा जीवनों में अपने वचन के अद्भुत कार्यों को करने के लिए आवश्यक हो । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइए एक एक करके इन तीन कदमों को उठाएँ और बाइबल के अन्य स्थलों में उनकी पुष्टि तथा उदाहरण देखें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. पवित्रतापूर्ण जीवन के लिए बाइबल पढ़ना अति आवश्यक है ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली बात यह है कि परमेश्वर के वचन को देखना और इसे जानना और इसका हम में होना परमेश्वर के अभिप्रायों के लिए पवित्रता तथा प्रेम तथा सामर्थ्य से परिपूर्ण जीवन जीने के लिए अति आवश्यक है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 11 को पुनः देखें, “तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूं ।” तब हम अपने जीवन में पाप से कैसे बच सकते हैं? अपने हृदयों में परमेश्वर के वचन को संचित करने के द्वारा । कितने ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के वचन पर मनन न करने और उस से प्रेम न करने और उसे न रटने के द्वारा अपने जीवन का बुरा हाल कर डालते हैं । क्या आप पवित्र बनना चाहते हैं, अर्थात कि, क्या आप पाप पर विजय पाने की सामर्थ्य चाहते हैं और एक अति धर्मी एवं त्यागपूर्ण प्रेम तथा मसीह के निमित्त पूर्ण भक्ति का जीवन जीना चाहते हैं? तो सही मार्ग पर आ जाइए । परमेश्वर ने धार्मिकता या सामर्थ्य की ओर जाने वाला एक मार्ग ठहराया है: और यह मार्ग अपने जीवनों में बाइबल को संचित करने का है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह बात मैं वृद्धों से कहता हूँ और यह बात मैं जवानों के माता-पिता से कहता हूँ । पवित्र शास्त्र में दी परमेश्वर की आज्ञाओं और चेतावनियों और प्रतिज्ञाओं पर मनन कीजिए और उन्हें रटिए और उन से प्रेम कीजिए । मैं यह नहीं कह रहा कि यह आसान है, विशेषकर जबकि आप वृद्ध हो चले हों । परन्तु करने योग्य अधिकांश अच्छी बातें सरल नहीं हैं । एक सुन्दर फर्नीचर बनाना, एक अच्छी कविता लिखना, एक उत्कृष्ट संगीत रचना, एक विशेष भोजन बनाना या कोई उत्सव मनाना - इन में से कोई भी सरल नहीं है । परन्तु ये करने योग्य हैं । तो क्या एक अच्छा जीवन जीने के लिए कुछ करने योग्य नहीं है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तलीथा अब दो वर्ष की है । वह बाइबल के पद याद करना सीख रही है । वह अलग-अलग प्रार्थनाएँ भी सीख रही है । क्यों? बाइबल के पदों को उसके लिए बार-बार दोहराने का कष्ट करने की क्या ज़रूरत है? बिल्कुल सीधी-सी बात है - जब वह तरूणाई में पहुंचे तो मैं चाहता हूँ कि वह परमेश्वर का भय मानने वाली, शुद्ध और पवित्र और प्रेमी और नम्र और दयालु और दीन और बुद्धिमान हो । और बाइबल बिल्कुल स्पष्ट रूप से कहती है, यह आपके हृदय में परमेश्वर के वचन को संचित करने के द्वारा होता है । “तेरे वचन को मैंने अपने हृदय में संचित किया है, कि तेरे विरूद्ध पाप न करूँ ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूहन्ना 17:17 में, हमारे लिए यीशु ने अपनी उस महान प्रार्थना में ऐसा कहा है, “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर- तेरा वचन सत्य है ।” “पवित्र करना” बाइबल का एक शब्द है जिसका अर्थ है कि एक व्यक्ति को पवित्र या धर्मी या प्रेमी या शुद्ध या सद्गुणी या आत्मिक बनाना । और इन बातों को मैं अपने स्वयं के लिए और अपने बच्चों के लिए और आपके लिए चाहता हूँ । तो फिर इस वर्ष हमें क्या करना चाहिए? यदि हम सत्य द्वारा पवित्र किए गए हैं और परमेश्वर का वचन यह सत्य है, तो हमें क्या करना चाहिए? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि एक डाँक्टर कहता है, “आप बहुत अस्वस्थ हैं और आप अपनी इस बीमारी के कारण मर जाएँगे, परन्तु यदि आप इस दवाई को लेंगे तो आप स्वस्थ हो जाएंगे और जीवित रहेंगे,” और आप इस दवाई को लेने में लापरवाही करते हैं - बहुत व्यस्त हूँ, ये गोलियाँ बड़ी-बड़ी हैं और गुटकने में बहुत कठिनाई होती है, या फिर आप इन्हें लेना भूल जाते हैं - आप अस्वस्थ रहेंगे और मर जाएँगे । पाप और आत्मिक अपरिपक्वता के साथ भी ऐसा ही है । परमेश्वर आप से जो कहता है कि वह आपको पवित्र करेगा, और आपको परिपक्व तथा बलवान तथा पवित्र बनाएगा, उसे यदि आप अनसुना करते हैं तो आप परिपक्व, बलवान और पवित्र नहीं होंगे । परमेश्वर के वचन को पढ़ना, उस पर मनन करना और उसे रटना और प्रिय जानना पाप पर विजय पाने और एक बलवान, भक्त, परिपक्व, प्रेमी, बुद्धिमान मनुष्य बनने के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त तरीका है । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर के वचन में ऐसी अद्भुत बातों को देखा जा सकता है जो कि आपको गहराई से परिवर्तित करेंगी, यदि आप उन्हें सच में देखेंगे और अपने आप में संचित करेंगे । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. परमेश्वर की सहायता के बिना हम नहीं देख सकते हैं ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस पाठ में दूसरी बात यह है कि परमेश्वर की अलौकिक सहायता के बिना बाइबल में जो अद्भुत बातें हैं उन्हें हम नहीं देख सकते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण यह है कि हम पतित और भ्रष्ट और पापों में मरे हुए हैं और इसलिए अन्धे और अनभिज्ञ और कठोर हैं । इफिसियों 4:18 में पौलुस हमारा इस रीति से वर्णन करता है, हम “उस अज्ञानता के कारण जो (हम में) है, और (हमारे) मन की कठोरता के कारण, (हमारी) बुद्धि अन्धकारमय हो गई है, और (हम) परमेश्वर के जीवन से अलग हो गए हैं ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
व्यवस्थाविवरण 29:2-4 में मूसा ने इस परेशानी के विषय में इस प्रकार लिखा है, “फिर मूसा ने सब इस्त्राएलियों को बुलाकर उनसे कहा, तुमने वह सब देख लिया है जो यहोवा ने तुम्हारी आंखों के सामने मिस्र देश में...किया उन बड़ी-बड़ी परीक्षाओं, उन महान चिन्हों तथा चमत्कारों को... । फिर भी यहोवा ने आज न तो तुमको समझ का मन, न देखने की आंखें और न सुनने के कान दिए हैं ।” ध्यान दीजिए कि. तुमने देखा... परन्तु तुम परमेश्वर के अलौकिक कार्य के बिना नहीं देख सकते हो । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही हमारी दशा है । हम अपने जीवनों में परमेश्वर के उद्बोधन, जान डालने वाले, कोमल बनाने वाले, नम्र बनाने वाले, शुद्ध करने वाले, प्रकाशित करने वाले कार्य के बिना अधर्मी, भ्रष्ट, कठोर और अनभिज्ञ हैं । परमेश्वर द्वारा हमारे हृदयों की आंखों को खोले बिना और हमें इन बातों के प्रति आत्मिक ज्ञान दिए बिना हम बाइबल की शिक्षाओं की अद्भुत बातों तथा महिमा को कभी नहीं देख पाएंगे । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह सिखाने और यह जानने का कारण यह है कि हम परमेश्वर के कार्य के लिए अभिलाषी और भूखा बनें और बाइबल पढ़ने में उसकी सहायता के लिए हम परमेश्वर से विनती और याचना करें । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(मत्ती 16:17; 11:4; लूका 24:45; 1 कुरि. 2:14-16; यूहन्ना 3:6-8; रोमि 8:5-8 देखें) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. हमें देखने में सहायता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी ।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरी बात यह है कि यदि पवित्र होने, और प्रेमी होने और स्वर्ग जाने के लिए परमेश्वर के वचन के सत्य को जानना और संचित करना अति आवश्यक है, और यदि स्वाभाविक रूप से हम परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातों को नहीं देख सकते और उसकी महिमा के प्रति आकर्षित महसूस नहीं कर सकते हैं, तो हम भयंकर दशा में हैं और हमें देखने में सहायता के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने की आवश्यकता है । “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं ।” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, मसीही जीवन में प्रार्थना अति आवश्यक है, क्योंकि हमारे जीवनों में वचन की सामर्थ्य को प्रदान करने के लिए यह द्वार खोलती है । परमेश्वर के वचन की महिमा अन्धे व्यक्ति के चेहरे पर सूरज के चमकने के समान है, यदि परमेश्वर उस महिमा के प्रति हमारी आंखें न खोले । और यदि हम उस महिमा को नहीं देखते हैं तो हम परिवर्तित नहीं होंगे (2 कुरिन्थियों 3:18; यूहन्ना 17:17), और यदि हम परिवर्तित नहीं हुए हैं, तो हम मसीही नहीं हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इफिसियों 1:18 में पौलुस इस रीति से प्रार्थना करता है । वह कहता है, “मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे मन की आंखें ज्योतिर्मय हों, जिस से तुम जान सको कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है... ।” दूसरे शब्दों में, ”इन बातों की शिक्षा मैंने तुम्हें दी है और तुमने उन्हें अपने बाहरी ज्ञानेन्द्रियों से ग्रहण किया है, परन्तु जब तक तुम उनकी महिमा को अपनी आत्मिक ज्ञानेन्द्रियों (तुम्हारे हृदय की आँखों) द्वारा अनुभव नहीं करोगे, तुम परिवर्तित नहीं होंगे । (इफि. 3:14-19; कुलु 1:9 तथा 3:16 देखें) । ये बातें पौलुस मसीहियों को लिख रहा है, जो कि यह दर्शाता है कि हमें निरंतर प्रार्थना करते रहना चाहिए जब तक कि हम स्वर्ग पहुंचकर आत्मिक आंखें न पाएँ । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमारे बाइबल पठन को समझने के लिए सात प्रकार की प्रार्थनाए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु क्योंकि हमारा बाइबल पाठ भजन 119:18 है, “मेरी आंखें खोल दे कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ,” हमें इस भजनकार को यह बताने देना चाहिए कि वह परमेश्वर के वचन के अपने पठन के विषय और सामान्य रूप से कैसे प्रार्थना करता है । अतः मैं भजन 119 पर एक सरसरी दृष्टि डालते हुए अन्त करना चाहूँगा और आपको वे सात प्रकार की प्रार्थनाओं को दिखाना चाहूँगा जिन्हें आप इस वर्ष अपने बाइबल पठन में उपयोग कर सकते हैं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें प्रार्थना करना चाहिए . . . &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. कि परमेश्वर अपने वचन को हमें सिखाएँ । भजन 119:12, “मुझे अपनी विधियां सिखा ।” (पद 33,64,66,68,135 भी देखें) । परमेश्वर के वचन को सच में सीखना तब ही सम्भव है जब परमेश्वर शिक्षण के अन्य सभी माध्यमों में और द्वारा शिक्षक होता है । 2. कि परमेश्वर अपने वचन को हम से न छिपाएँ । भजन 119:19, “अपनी आज्ञाओं को मुझ से न छिपा ।” बाइबल हमें उस भंयकर ताड़ना या दण्ड के विषय चेतावनी देती है जब परमेश्वर का वचन हम से ले लिया जाएगा (आमोस 8:11; पद 43 भी देखें) । 3. कि परमेश्वर हमें उसका वचन समझाएँ । भजन 119:27, “अपने उद्देश्यों का मार्ग मुझे समझा” (पद 34,73,144,169) । यहाँ हम परमेश्वर से समझ मांगते हैं और कहते हैं कि उसके वचन को हमें समझाने के लिए जो कुछ आवश्यक है वह करे । 4. कि परमेश्वर हमारे हृदयों को अपने वचन की ओर लगाएँ । भजन 119:36, “मेरे मन को अनुचित लाभ की ओर नहीं, वरन् अपनी चेतावनियों की ओर लगा ।” हमारी सबसे बड़ी परेशानी हमारी बुद्धि नहीं, परन्तु हमारी इच्छा है -स्वभाव ही से हम परमेश्वर के वचन को पढ़ना और मनन करना और याद करना नहीं चाहते हैं । अतः हमें परमेश्वर से प्रार्थना करना चाहिए कि वह हमारे मन को अपने वचन की ओर लगाएँ । 5. कि परमेश्वर हमें जिलाए कि हम उसके वचन को मानें । भजन 119:88, “अपनी करूणा के अनुसार मुझे फिर से जिला, कि मैं तेरे मुँह की चेतावनियों को मानूं ।” वह जानता है कि परमेश्वर के वचन के प्रति मन लगाने और उसको मानने के लिए हमें जीवन और ताकत की आवश्यकता है । इसलिए वह परमेश्वर से इस बुनियादी आवश्यकता के लिए प्रार्थना करता है (पद 154 भी देखें) । 6. कि परमेश्वर अपने वचन में हमारे कदम स्थिर करे । भजन 119:133, “तू अपने वचन पर मेरे कदम स्थिर कर ।” न केवल समझ और जीवन के लिए हम परमेश्वर पर आश्रित हैं, परन्तु परमेश्वर के वचन पर चलने के लिए भी, कि वह हमारे जीवनों में स्थापित हो जाएँ । हम अपने आप यह नहीं कर सकते हैं । 7. कि जब हम भटक जाएँ तब परमेश्वर हमें ढूँढ़ ले । भजन 119:176, “मैं खोई हुई भेड़ के समान भटक गया हूं, अपने दास को ढूँढ़ लें ।” यह ध्यान देने योग्य है कि यह भक्त मनुष्य अपने भजन को एक पाप अंगीकार के साथ और इस आवश्यकता के साथ अन्त करता है कि परमेश्वर उसके पीछे-पीछे आए और उसे ढूँढ़ ले जाए । हमें बारम्बार यह प्रार्थना भी करना चाहिए । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== वचन हमारा धन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यह कहते हुए समाप्त करना चाहूँगा कि जब कि हम 2011 में प्रवेश करते और पवित्र तथा प्रॆमी होना चाहते और अपने शहर और देश देश में परमेश्वर के उद्देश्यों के प्रति पूर्ण समर्पित होना चाहते हैं, तो हमें ऐसे लोग होना है जो अपने हृदयों में परमेश्वर के वचन को संचित रखते हैं, परन्तु इस से बढ़कर ऐसे लोग जो जानते हैं कि परमेश्वर के बिना उनकी क्या भयानक दशा है और यह कि परमेश्वर ने प्रार्थना को वह मार्ग ठहराया है जिसके द्वारा हमारी आँखें परमेश्वर के वचन की अद्भुत बातें देखें और इस प्रकार परिवर्तित हो जाएं । “ मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ। ” &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भजन के लेखक ने कितनी लगन से इन प्रार्थनाओं को किया? हमें कितनी लगन से करना चाहिए? भजन 119:147 में एक उत्तर दिया है, “भोर होने से पहले ही उठकर मैं सहायता के लिए तुझे पुकारता हूं ।” वह भोर को ही उठ जाता है&amp;amp;nbsp;! यह सबसे उच्च प्राथमिकता है । क्या आप भी इसे सर्वोच्च प्राथमिकता बनाएँगे?&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>आओ हम निन्दा उठाये हुए यीशु के साथ निकल चलें</title>
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				<updated>2017-01-11T20:36:16Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;आओ हम निन्दा उठाये हुए यीशु के साथ निकल चलें&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Let Us Go with Jesus Bearing Reproach}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया। 13 सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें। 14 क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं। 15 इसलिये हम उसके द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें। 16 पर भलाई करना, और उदारता न भूलो&amp;amp;nbsp;; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों 13: 12-16 की बात ऊँचे स्वर की और स्पष्ट है: मसीहियो, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें प्रमुख बुलाहट पद 13 में है: ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ अर्थात्, यीशु के साथ आवश्यकता की ओर बढ़ो, सुख या आराम की ओर नहीं। पद 13 में ये आज्ञा, यीशु की मृत्यु पर आधारित है, कि ये कैसे हुई और इस ने क्या निष्पादित/पूरा किया। पद 12: ‘‘यीशु ने भी, लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये {यही इसने पूरा किया}, फाटक के बाहर दुःख उठाया {ये इस प्रकार से हुआ}।’’ ‘‘इसलिये आओ, … छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ दूसरे शब्दों में, वह कहता है, ‘‘मसीहियो, यीशु के साथ उसके दुःखभोग में जुड़ जाओ&amp;amp;nbsp;!’’ चूँकि यीशु ने फाटक के बाहर दुःख उठाया, अपनी सुरक्षा और मेल-जोल और आराम की छावनी से बाहर निकलो, और कलवरी के रास्ते पर उसके साथ निन्दा उठाने के लिए तैयार रहो। और चूँकि तुम्हें पवित्र करने के लिए ‘वह’ वहाँ मर गया, इसे अपनी ताकत या क्षमता में, मात्र अनुकरण का एक ढोंग करने के रूप में मत करो&amp;amp;nbsp;; इसे उस सामर्थ और पवित्रता में करो जिसे मसीह ने ‘उसकी’ मृत्यु में, तुम्हारे लिए मोल लिया है। अन्यथा यह विश्वास का एक कृत्य न होकर अपितु नायक बनने की क्रिया होगी&amp;amp;nbsp;; और आपको महिमा मिलेगी, मसीह को नहीं, और परमेश्वर प्रसन्न नहीं होगा। क्योंकि विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है (11: 6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मुख्य बात है: मसीहीजन, एक ऐसे उद्धारकर्ता के साथ, कैसे जीआ जावे, वो ये है - सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं जानता हूँ कि इस प्रोत्साहन का दुरुपयोग किया जा सकता है। एक अविवाहित स्त्री कह सकती है, ‘‘ठीक है, जितना में ढूंढ सकती हूँ, मुझे सबसे कमजोर, सर्वाधिक जरूरतमंद पुरुष को ढूंढने की खोज में रहना चाहिए और उससे इन आशाओं में विवाह कर लेना चाहिए कि मैं उसका कुछ भला कर सकूँ।’’ अथवा एक नौजवान व्यवसायी कह सकता है, ‘‘ठीक है, मुझे कमप्यूटर के पेशे में एक सर्वाधिक अस्थिर कम्पनी की खोज में रहना चाहिए और वहाँ इन आशाओं से नौकरी पाने का प्रयास करना चाहिए कि उसकी स्थिति पूरी तरह से उलट दूँ।’’ अथवा यदि आपकी कार को मरम्मत की आवश्यकता है, आप कह सकते हैं, ‘‘ठीक है, मैं ऐसे मैकेनिक को ढूंढता हूँ जिसका धंधा बन्द होने की कगार पर है क्योंकि वह स्पर्धा नहीं कर पा रहा है, और अपनी कार वहाँ ले जाऊँगा कि उसकी मदद करूँ।’’ ‘‘इतना सब आपकी व्याख्या के लिए; सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु की मूलभूत बुलाहट  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की बुलाहट के इन दुरुपयोगों के साथ समस्या ये है कि ये मूल बात के पर्याप्त निकट भी नहीं हैं। वे मात्र मूर्खतापूर्ण हैं। आपको क्यों अनुमान भी करना चाहिए कि आपको विवाह कर लेना चाहिए&amp;amp;nbsp;? हो सकता है, सुख-आराम नहीं आवश्यकता की ओर बढ़ो के प्रति यीशु की बुलाहट, किसी अधिक बड़ी सेवा की ख़ातिर पूर्णतया समर्पित कुंवारेपन की एक बुलाहट है। या हो सकता है ये किसी ऐसे प्रकार के व्यक्ति से विवाह करने की बुलाहट है, जो पर्याप्त मजबूत और पर्याप्त उग्र हो कि आपके साथ छावनी के बाहर जा सके और आपके साथ दुःख उठा सके, और जैसा कि बहुतेरे विवाह हैं, आत्म-तल्लीनता की आरामदेह छोटी हौदी में डूबने की बनिस्बत, दूसरों के भले के लिए आपके जीवनों को एक-साथ उच्चतम सीमा तक बढ़ाये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और क्यों आपको सोचना चाहिए कि आपको अमेरिका में एक नौकरी ढूंढना ही है - ऐसी कम्पनी के साथ जो कमजोर या मजबूत है - जबकि समान नौकरियाँ ऐसे देशों में उपलब्ध हैं जहाँ बमुश्किल कोई मसीही हैं और आपकी ज्योति की अत्याधिक आवश्यकता है। अथवा हो सकता है कि आप यहाँ किसी मजबूत कम्पनी के लिए काम करें क्योंकि वहाँ नाश होते हुए लोग हैं या क्योंकि वहाँ राज्य-मूल्यों को फैलाने के अत्यन्त प्रभावकारी अवसर हैं और पलंगपोश बनाना, सभी बातों में परमेश्वर की सर्वोच्चता की, सेवा करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको क्यों कल्पना करना चाहिए कि आपके पास एक कार हो&amp;amp;nbsp;? हो सकता है कि आपकी जिन्दगी के लिए यीशु की बुलाहट है कि ऐसी जगह और लोगों के पास जायें जहाँ आपको कार की कोई आवश्यकता न हो - क्योंकि वहाँ कोई सड़कें, और कोई चर्च और कोई मसीहीगण नहीं हैं। या हो सकता है कि आपके पास एक कार होना चाहिए जो ऐसा काम देती है, कि आप उसे आराम नहीं आवश्यकता की ओर, बिना रुकावट के चला सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की मूल-भूत बुलाहट का, कि कलवरी के रास्ते पर उसके साथ जुड़ जायें - छावनी के बाहर जाने और उसके साथ निन्दा उठाने - सदैव व्यंग और उपहास किया व इसे मूर्खता दिखाया जा सकता है। पलायन का ये एक सबसे सरल तरीका है। ये बहुत प्रलोभित करनेवाला है। ये आपको बुद्धिमान प्रगट करता है। ये यीशु को मूर्ख प्रगट करता है। और ये आपको एक खाली, उथली, आराम-तलबी की खोज करती दिनचर्या के मार्ग में (बहकाते हुए कुछ और वर्षों के लिए) जाने के लिए स्वतंत्र करती है, जिसे कुछ लोग जिन्दगी कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें (पद 13) … क्योंकि (पद 12) यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया।’’ जिस तरह ‘वह’ मरा और क्यों ‘वह’ मरा, हमारे लिए, जिन्हें ‘वह’ ‘उसके’ साथ जाने के लिए बुलाता है, पूरा-पूरा अन्तर ले आता है। जिस तरह ‘वह’ मरा, वो था फाटक से बाहर - पवित्र नगर, यरूशलेम, के प्रतीत होते सुख व सुरक्षा व मेल-जोल के बाहर – फाटक से बाहर, गोलगुता पर, स्वेच्छा से, बलिदानपूर्वक, प्रेम से। और ‘वह’ क्यों मरा (पद 13), लोगों को पवित्र करने के लिए, शेष संसार से हमें भिन्न बनाने के लिए, हमें पवित्र व प्रेममय व अतिवादी व जोखि़म उठानेवाले, और तुलना में उससे जो ये संसार प्रस्तुत करता है, एक अन्य नियति के द्वारा पूर्णतः विमोहित। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;?  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पवित्रीकृत लोग क्या हैं, इस पर एक पूरी पकड़ बनाने के लिए अगली आयत (पद 14) पर विचार कीजिये। पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? लोगों को पवित्र करने के लिए मसीह मरा&amp;amp;nbsp;; अर्थात्, उस प्रकार के लोगों को उत्पन्न करना जो अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी के बारे में ऐसा सोचने के इच्छुक हैं, मानो निन्दा सहने के लिए मसीह के साथ छावनी के बाहर जाना है। ऐसा कैसे&amp;amp;nbsp;? इन लोगों को क्या हो गया&amp;amp;nbsp;? पद 14 हमें दिखाता है। वे यीशु के साथ कलवरी के रास्ते पर, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर जाने को इच्छुक हैं। ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका गूढ़ अर्थ क्या है&amp;amp;nbsp;? बात ये है कि मसीह इसलिए नहीं मरा कि ‘मीनियापोलीस’ को इस युग में एक स्वर्गलोक बना दे। वह मरा ताकि हम हमारी व्यक्तिगत जिन्दगियों को, पृथ्वी पर स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोक देने के लिए इच्छुक हो जावें - ‘मीनियापोलीस’ में या कहीं और। किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम मासोक-वादी (परपीडि़त-कामुक) हैं&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम दुःखभोग से प्रेम करते हैं&amp;amp;nbsp;? नहीं। क्योंकि ‘‘हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ क्या आप इसे देखते हैं&amp;amp;nbsp;? पद 14: ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ छावनी से बाहर जाने का हमारा ध्येय - निन्दा उठाते हुए, लोगों की चिन्ता करते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर - इस कारण है कि एक नगर आ रहा है, ‘‘जीवते परमेश्वर का नगर’’ (इब्रानियों 12: 22)। जो यह युग प्रस्तुत करता है, ये उससे बेहतर है और ये सर्वदा बना रहेगा, और सबसे उत्तम बात, महिमा में परिपूर्ण, परमेश्वर वहाँ होगा (12: 23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों में ये नमूना हमने बारम्बार देखा है। हमने इसे 10: 34 में देखा जहाँ मसीहीगण, कैदियों के पास जाने के द्वारा, आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। जब इसकी कीमत उन्हें अपनी सम्पत्ति के रूप में चुकानी पड़ी, वे आनन्दित हुए, इब्रानियों के नाम पत्री कहती है, क्योंकि ‘‘यह जानकर, कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरनेवाली सम्पत्ति है’’ - वे एक आनेवाले नगर की खोज में थे, सुख और पृथ्वी पर स्वर्ग नहीं। अतः वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 11: 25-26 में देखा जब मूसा को, ‘‘पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और उत्तम लगा और मसीह के कारण निन्दित होने को मिसर के भण्डार से बड़ा धन समझकर,’’ वह आवश्यकता की ओर बढ़ा, सुख-आराम की ओर नहीं। क्यों&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 26 कहता है, ‘‘क्योंकि उस की आंखें फल पाने की ओर लगीं थीं’’ - अर्थात्, वह उस आनेवाले नगर की बाट जोह रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 12: 2 में देखा, जहाँ यीशु सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ा, जब ‘उसने’ ‘‘लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा।’’ कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 2 कहता है कि उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था। अर्थात्, ‘उसने’ उस आनेवाले नगर की ओर देखा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 13: 5-6 में देखा जहाँ मसीहीगण, अपने जीवन को पैसे के प्रेम से स्वतंत्र तथा जो उनके पास है उसी में सन्तुष्ट रहते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं। कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 5: ‘‘क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, ‘मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा।’ इसलिये हम बेधड़क होकर कहते हैं, ‘प्रभु मेरा सहायक है&amp;amp;nbsp;; मैं न डरूंगा&amp;amp;nbsp;; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है&amp;amp;nbsp;?’’’ - मैं अभी और सदैव परमेश्वर की सुरक्षा में सुरक्षित हूँ। मैं ऐसे नगर का नागरिक हूँ जो आनेवाला है और कोई मुझे इस से अलग नहीं कर सकता। अतः मैं आवश्यकता की ओर बढूंगा, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इब्रानियों 13: 14 की बात बार-बार पुष्ट होता है: मसीह इसलिए नहीं मरा कि इस युग के नगरों को - उपनगरों को - एक स्वर्गलोक बना देने दे। ‘वह’ मरा ताकि हम पृथ्वी पर - नगर में और उपनगर दोनों में, अपनी जिन्दगियों को स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोकने के इच्छुक हो जावें, और इसके बनिस्बत यीशु के साथ, सुख व मेल-जोल व सुरक्षा की छावनी से बाहर जायें, जहाँ आवश्यकताएँ हैं और जहाँ ‘वह’ भी कहता है, आज (वो दिन जब तुम मरते हो) तुम मेरे साथ स्वर्गलोक में होगे (लूका 23: 43)। हम आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं, सुख-आराम की ओर नहीं, क्योंकि हम एक आनेवाले नगर की बाट जोहते हैं। परमेश्वर के साथ एक महिमामय भविष्य में मूल आत्म-विश्वास ही है जिसे उत्पन्न करने के लिए मसीह मरा। और जब यह आपको वश में कर लेगा है, आप पवित्र किये जायेंगे (पद 12) और यीशु के साथ आवश्यकता की ओर जायेंगे, आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रति स्तुति और लोगों के लिए प्रेम का एक जीवन  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम और अधिक सुस्पष्ट हो जायें। इस जीवन में क्या सम्मिलित होता है जो आवश्यकता की ओर जाता है, आराम की ओर नहीं - छावनी के बाहर कलवरी की सड़क पर, उस आनेवाले नगर में उस आनन्द के लिए जो हमारे लिए धरा है, यीशु के साथ दुःखभोग की ओर बढ़ता हुआ, ये जीवन&amp;amp;nbsp;? पद 15 एक उत्तर देता है और पद 16 एक अन्य। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 15 कहता है, ये परमेश्वर की स्तुति का एक जीवन है - वास्तविक, हार्दिक, मौखिक स्तुति - उस प्रकार की जो आपके हृदय के एक फल और उमण्डने के रूप में आपके मुँह से निकलता है। पद 15: ‘‘इसलिये हम उसके {यीशु} द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16 कहता है, ये लोगों के लिये एक प्रेम का जीवन है - वास्तविक, व्यावहारिक, दूसरों की भलाई के लिए अपना जीवन बाँटते हुए: ‘‘पर भलाई करना, और उदारता न भूलो; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जब हम यीशु के साथ छावनी के बाहर ‘उसके’ बलिदान के स्थान पर जाते हैं, हम पूर्व की अपेक्षा अधिक स्पष्टता से देखते हैं कि हमारे लिए उसका बलिदान - पापियों के लिए एक बार व सर्वदा के लिए ‘उसका’ स्वयँ का बलिदान, (इब्रानियों 9: 26, 28) - सभी बलिदानों का एक अन्त ले आता है, केवल दो प्रकार को छोड़कर: परमेश्वर के प्रति स्तुति का बलिदान (पद 15) और लोगों के प्रति प्रेम का बलिदान (पद 16)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम यहाँ हैं छावनी के बाहर, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ, निन्दा किये जाते हुए, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, सुख-आराम की ओर नहीं - और ये सड़क क्या है&amp;amp;nbsp;? ये किस ओर जा रही है&amp;amp;nbsp;? व्यावहारिक रूप से आज दोपहर को&amp;amp;nbsp;? आपके लिये&amp;amp;nbsp;? इस सप्ताह&amp;amp;nbsp;? इस वर्ष&amp;amp;nbsp;? शायद ये वो सड़क है जो 10/40 खिड़की में सुसमाचार न पाये हुए लोगों के लिए उपवास और प्रार्थना की ओर ले जाती है, अथवा यूक्रेनियायी अनाथों के साथ सम्मिलित होने के लिए मिनिस्ट्री-हॉल में, अथवा ‘सारा’ ‘नओमी’ और अन्य की सहायता करने, हमारे पड़ोस के गर्भपात-चिकित्सालय के नये स्थल, साऊथ 5वीं स्ट्रीट स्थित ‘मिडवेस्ट हेल्थ सेंटर फॉर वीमैन’ को, अथवा ‘ग्लैन व पैट्टी लारसन’ तथा अन्य के घर को जो अनन्तकाल के किनारे पर खड़े हैं, अथवा सतायी गई कलीसिया के लिए प्रेयर जरनल (प्रार्थना दैनिकी) के 18 पृष्ट पर ताकि उन एजेन्सियों को खोज सकें जो आपको सारे संसार में दुःख उठाते मसीहियों की सहायता करने के लिए आपको व्यावहारिक तरीके दें, अथवा टेलीफोन तक कि एक भटकते हुए मित्र को एक दुरूह फोनकॉल करके याचना करें कि यीशु के पास वापिस आ जावे, अथवा एक पड़ोसी तक जो आप जानते हैं कि अविश्वास में नाश हो रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आराम नहीं, आवश्यकता की ओर कलवरी की सड़क, प्रेम और स्तुति के एक हजार सम्भावित जगहों तक ले जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== काश परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 का उपयोग करके आपको हिलाकर मुक्त करे  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज सुबह मेरी प्रार्थना ये है कि आपके मध्य जो जवान हैं जिनका पाठ्यकम अभी तक सुनिश्चित नहीं हुआ है, और आप बुजुर्ग सेवानिवृत लोग, जिनके पास ऊर्जा बची है और बहुत आजादी है, और बीच में आप अन्य लोग जो इस सब को पूर्णतः भुनाना चाहेंगे और अपनी जिन्दगियों के साथ ऐसा आमूल रूप से भिन्न करना चाहते हैं जो दर्जनों कुंवारों और विवाहित लोगों ने सालों-साल इस चर्च में किया है - मेरी प्रार्थना है कि आप सभी के मध्य, परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 से इस वचन को उपयोग करे कि आपको नींव से हिलाये और आपको आपके स्थान से मुक्त करे और संसार के सुसमाचार न पाये हुए लोगों तक, यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा के सुसमाचार के साथ पहुँचाये। मैं जानता हूँ कि ये ‘मिशन्स वीक’ नहीं है, लेकिन आप में से कुछ के लिए आज सुबह मैं इस मूल-पाठ में से यही सुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारे संसार में, आज सुबह, सैंकड़ों हजारों मसीहीगण, मात्र मसीही होने के लिए अपने जिन्दगियों का जोखि़म उठा रहे हैं। हम प्रकाशितवाक्य 5: 11 से जानते हैं कि कारण कि मसीह छावनी से बाहर गया और दुःख उठाया ये था कि हर एक कुल भाषा और लोग और जाति में से लोगों को छुड़ाये। और यदि यही कारण था कि ‘वह’ गया, तब इसका क्या अर्थ होना चाहिए जब इब्रानियों 13: 13 कहता है, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें’’&amp;amp;nbsp;? क्या हम में से अनेकों के लिए इसका अर्थ नहीं होना चाहिए: छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह ‘बेतलेहम’ छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह मिनियापोलीस छावनी छोड़ो। आरामदेह, सुरक्षित नौकरी छोड़ो। और सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ जुड़ जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहीं, इस मूल-पाठ का पालन करने में आपको संस्कृतियों को लांघना नहीं पड़ेगा। मैंने उसके सात उदाहरण दिये हैं। किन्तु सुनिये: मसीह ने छावनी के बाहर विभिन्न जातियों की ख़ातिर दुःख उठाया, जिनमें से सैंकड़ों के पास कोई चर्च नहीं, कोई पुस्तकें नहीं, कोई शिष्टमण्डल नहीं जो उन पर कम से कम ये समाचार प्रगट करे कि मसीह इस संसार में पापियों को बचाने आया। अतः मैं इस पर दबाव डालता हूँ: इब्रानियों 13: 13, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ने की एक बुलाहट है। और वो आवश्यकता जो इस रविवार, मेरे कानों तक चिल्लाती है, ऐसे लोगों की आवश्यकता है जहाँ मसीही सताव के कारण नाश हो रहे हैं, और जहाँ पापी नाश हो रहे हैं क्योंकि वहाँ कोई मसीही नहीं हैं जो सताये जाने के लिए तैयार हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपसे याचना करता हूँ, जब आप अपने भविष्य के बारे में स्वप्न देखते हैं, चाहे आप 8 के हैं या 18 या 38 या 80 के, इब्रानियों 13: 13 का स्वप्न देखिये, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हम अकेले आगे नहीं जाते  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपकी आराधना पुस्तिका में छपे हुए अन्तिम भजन ‘वी रेस्ट ऑन दी’ को गाने के द्वारा, हम स्वयँ को इसे अर्पित करने जा रहे हैं। आप में से कई ये जानते हैं कि इसके पीछे एक कहानी है जो इसे इस क्षण विशेष बल देती है। जनवरी 1956 में, इक्वाडोर में, सुख-सुविधाओं की ओर नहीं अपितु अऊका-भारतीयों (दक्षिण अमेरिकी भारतियों की एक जनजाति) की आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए ‘जिम ईलियट’, पेट फलेमिंग’, ‘एड मैक्कुली’, ‘नेट सेन्ट’, और ‘रोज़र यूडेरियन’ मारे गए थे। इस शहादत़/प्राणोत्सर्ग के ‘एलीसाबेथ ईलियट’ के विवरण के 16वें अध्याय का शीर्षक, इस भजन से एक पंक्ति है: ‘‘हम अकेले आगे नहीं जाते।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पॉम-बीच (समुद्री किनारा) पर अपनी मृत्यु से थोड़ी देर पहिले ही उन्होंने ये भजन गाया था। ईलियट लिखती हैं, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अपनी प्रार्थनाओं की समाप्ती पर उन पाँच पुरुषों ने, ‘‘फिनलेन्डिया’’ की भावोत्तेजक धुन पर अपना एक मनपसन्द भजन गाया, ‘वी रेस्ट ऑन दी’। ‘जिम’ व ‘एड’ ने ये भजन अपने कॉलेज के दिनों से गाया हुआ था और आयतों को कण्ठस्थ जानते थे। आखिरी आयत पर उनकी आवाजें गहरी कायलियत से रुंध गईं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हम तुझ पर टिकाव लिये हैं, हमारी ढाल और हमारे रक्षक, युद्ध आपका है, आपकी स्तुति होवे, जब मुक्तामय भव्य विजेताओं के फाटकों से गुजरते हुए, हम आपके साथ विश्राम करेंगे अन्तहीन दिनों तक। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस आत्मविश्वास के साथ वे यीशु के पास छावनी के बाहर निकल पड़े। वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं, और वे मर गए। और ‘जिम ईलियट’ का धर्मसार सच प्रमाणित हुआ: ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो, जिसे वह खो नहीं सकता उसे पाने के लिए, वो दे देता है जिसे वह सुरक्षित नहीं रख सकता।’’ ‘‘यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं’’ (पद 14)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि इसे गायें। और जब आप इन शब्दों पर आते हैं, ‘‘और तेरे नाम में हम जाते हैं,’’ इन्हें वास्तविकता से गायिए, और जाने को तैयार रहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%93_%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%8F_%E0%A4%AF%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A5%81_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2_%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82</id>
		<title>आओ हम निन्दा उठाये हुए यीशु के साथ निकल चलें</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%93_%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%8F_%E0%A4%AF%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A5%81_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2_%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82"/>
				<updated>2017-01-11T20:35:41Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Let Us Go with Jesus Bearing Reproach}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया। 13 सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें। 14 क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं। 15 इसलिये हम उसके द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें। 16 पर भलाई करना, और उदारता न भूलो&amp;amp;nbsp;; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों 13: 12-16 की बात ऊँचे स्वर की और स्पष्ट है: मसीहियो, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें प्रमुख बुलाहट पद 13 में है: ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ अर्थात्, यीशु के साथ आवश्यकता की ओर बढ़ो, सुख या आराम की ओर नहीं। पद 13 में ये आज्ञा, यीशु की मृत्यु पर आधारित है, कि ये कैसे हुई और इस ने क्या निष्पादित/पूरा किया। पद 12: ‘‘यीशु ने भी, लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये {यही इसने पूरा किया}, फाटक के बाहर दुःख उठाया {ये इस प्रकार से हुआ}।’’ ‘‘इसलिये आओ, … छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ दूसरे शब्दों में, वह कहता है, ‘‘मसीहियो, यीशु के साथ उसके दुःखभोग में जुड़ जाओ&amp;amp;nbsp;!’’ चूँकि यीशु ने फाटक के बाहर दुःख उठाया, अपनी सुरक्षा और मेल-जोल और आराम की छावनी से बाहर निकलो, और कलवरी के रास्ते पर उसके साथ निन्दा उठाने के लिए तैयार रहो। और चूँकि तुम्हें पवित्र करने के लिए ‘वह’ वहाँ मर गया, इसे अपनी ताकत या क्षमता में, मात्र अनुकरण का एक ढोंग करने के रूप में मत करो&amp;amp;nbsp;; इसे उस सामर्थ और पवित्रता में करो जिसे मसीह ने ‘उसकी’ मृत्यु में, तुम्हारे लिए मोल लिया है। अन्यथा यह विश्वास का एक कृत्य न होकर अपितु नायक बनने की क्रिया होगी&amp;amp;nbsp;; और आपको महिमा मिलेगी, मसीह को नहीं, और परमेश्वर प्रसन्न नहीं होगा। क्योंकि विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है (11: 6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मुख्य बात है: मसीहीजन, एक ऐसे उद्धारकर्ता के साथ, कैसे जीआ जावे, वो ये है - सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं जानता हूँ कि इस प्रोत्साहन का दुरुपयोग किया जा सकता है। एक अविवाहित स्त्री कह सकती है, ‘‘ठीक है, जितना में ढूंढ सकती हूँ, मुझे सबसे कमजोर, सर्वाधिक जरूरतमंद पुरुष को ढूंढने की खोज में रहना चाहिए और उससे इन आशाओं में विवाह कर लेना चाहिए कि मैं उसका कुछ भला कर सकूँ।’’ अथवा एक नौजवान व्यवसायी कह सकता है, ‘‘ठीक है, मुझे कमप्यूटर के पेशे में एक सर्वाधिक अस्थिर कम्पनी की खोज में रहना चाहिए और वहाँ इन आशाओं से नौकरी पाने का प्रयास करना चाहिए कि उसकी स्थिति पूरी तरह से उलट दूँ।’’ अथवा यदि आपकी कार को मरम्मत की आवश्यकता है, आप कह सकते हैं, ‘‘ठीक है, मैं ऐसे मैकेनिक को ढूंढता हूँ जिसका धंधा बन्द होने की कगार पर है क्योंकि वह स्पर्धा नहीं कर पा रहा है, और अपनी कार वहाँ ले जाऊँगा कि उसकी मदद करूँ।’’ ‘‘इतना सब आपकी व्याख्या के लिए; सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु की मूलभूत बुलाहट  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की बुलाहट के इन दुरुपयोगों के साथ समस्या ये है कि ये मूल बात के पर्याप्त निकट भी नहीं हैं। वे मात्र मूर्खतापूर्ण हैं। आपको क्यों अनुमान भी करना चाहिए कि आपको विवाह कर लेना चाहिए&amp;amp;nbsp;? हो सकता है, सुख-आराम नहीं आवश्यकता की ओर बढ़ो के प्रति यीशु की बुलाहट, किसी अधिक बड़ी सेवा की ख़ातिर पूर्णतया समर्पित कुंवारेपन की एक बुलाहट है। या हो सकता है ये किसी ऐसे प्रकार के व्यक्ति से विवाह करने की बुलाहट है, जो पर्याप्त मजबूत और पर्याप्त उग्र हो कि आपके साथ छावनी के बाहर जा सके और आपके साथ दुःख उठा सके, और जैसा कि बहुतेरे विवाह हैं, आत्म-तल्लीनता की आरामदेह छोटी हौदी में डूबने की बनिस्बत, दूसरों के भले के लिए आपके जीवनों को एक-साथ उच्चतम सीमा तक बढ़ाये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और क्यों आपको सोचना चाहिए कि आपको अमेरिका में एक नौकरी ढूंढना ही है - ऐसी कम्पनी के साथ जो कमजोर या मजबूत है - जबकि समान नौकरियाँ ऐसे देशों में उपलब्ध हैं जहाँ बमुश्किल कोई मसीही हैं और आपकी ज्योति की अत्याधिक आवश्यकता है। अथवा हो सकता है कि आप यहाँ किसी मजबूत कम्पनी के लिए काम करें क्योंकि वहाँ नाश होते हुए लोग हैं या क्योंकि वहाँ राज्य-मूल्यों को फैलाने के अत्यन्त प्रभावकारी अवसर हैं और पलंगपोश बनाना, सभी बातों में परमेश्वर की सर्वोच्चता की, सेवा करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको क्यों कल्पना करना चाहिए कि आपके पास एक कार हो&amp;amp;nbsp;? हो सकता है कि आपकी जिन्दगी के लिए यीशु की बुलाहट है कि ऐसी जगह और लोगों के पास जायें जहाँ आपको कार की कोई आवश्यकता न हो - क्योंकि वहाँ कोई सड़कें, और कोई चर्च और कोई मसीहीगण नहीं हैं। या हो सकता है कि आपके पास एक कार होना चाहिए जो ऐसा काम देती है, कि आप उसे आराम नहीं आवश्यकता की ओर, बिना रुकावट के चला सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की मूल-भूत बुलाहट का, कि कलवरी के रास्ते पर उसके साथ जुड़ जायें - छावनी के बाहर जाने और उसके साथ निन्दा उठाने - सदैव व्यंग और उपहास किया व इसे मूर्खता दिखाया जा सकता है। पलायन का ये एक सबसे सरल तरीका है। ये बहुत प्रलोभित करनेवाला है। ये आपको बुद्धिमान प्रगट करता है। ये यीशु को मूर्ख प्रगट करता है। और ये आपको एक खाली, उथली, आराम-तलबी की खोज करती दिनचर्या के मार्ग में (बहकाते हुए कुछ और वर्षों के लिए) जाने के लिए स्वतंत्र करती है, जिसे कुछ लोग जिन्दगी कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें (पद 13) … क्योंकि (पद 12) यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया।’’ जिस तरह ‘वह’ मरा और क्यों ‘वह’ मरा, हमारे लिए, जिन्हें ‘वह’ ‘उसके’ साथ जाने के लिए बुलाता है, पूरा-पूरा अन्तर ले आता है। जिस तरह ‘वह’ मरा, वो था फाटक से बाहर - पवित्र नगर, यरूशलेम, के प्रतीत होते सुख व सुरक्षा व मेल-जोल के बाहर – फाटक से बाहर, गोलगुता पर, स्वेच्छा से, बलिदानपूर्वक, प्रेम से। और ‘वह’ क्यों मरा (पद 13), लोगों को पवित्र करने के लिए, शेष संसार से हमें भिन्न बनाने के लिए, हमें पवित्र व प्रेममय व अतिवादी व जोखि़म उठानेवाले, और तुलना में उससे जो ये संसार प्रस्तुत करता है, एक अन्य नियति के द्वारा पूर्णतः विमोहित। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;?  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पवित्रीकृत लोग क्या हैं, इस पर एक पूरी पकड़ बनाने के लिए अगली आयत (पद 14) पर विचार कीजिये। पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? लोगों को पवित्र करने के लिए मसीह मरा&amp;amp;nbsp;; अर्थात्, उस प्रकार के लोगों को उत्पन्न करना जो अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी के बारे में ऐसा सोचने के इच्छुक हैं, मानो निन्दा सहने के लिए मसीह के साथ छावनी के बाहर जाना है। ऐसा कैसे&amp;amp;nbsp;? इन लोगों को क्या हो गया&amp;amp;nbsp;? पद 14 हमें दिखाता है। वे यीशु के साथ कलवरी के रास्ते पर, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर जाने को इच्छुक हैं। ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका गूढ़ अर्थ क्या है&amp;amp;nbsp;? बात ये है कि मसीह इसलिए नहीं मरा कि ‘मीनियापोलीस’ को इस युग में एक स्वर्गलोक बना दे। वह मरा ताकि हम हमारी व्यक्तिगत जिन्दगियों को, पृथ्वी पर स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोक देने के लिए इच्छुक हो जावें - ‘मीनियापोलीस’ में या कहीं और। किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम मासोक-वादी (परपीडि़त-कामुक) हैं&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम दुःखभोग से प्रेम करते हैं&amp;amp;nbsp;? नहीं। क्योंकि ‘‘हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ क्या आप इसे देखते हैं&amp;amp;nbsp;? पद 14: ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ छावनी से बाहर जाने का हमारा ध्येय - निन्दा उठाते हुए, लोगों की चिन्ता करते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर - इस कारण है कि एक नगर आ रहा है, ‘‘जीवते परमेश्वर का नगर’’ (इब्रानियों 12: 22)। जो यह युग प्रस्तुत करता है, ये उससे बेहतर है और ये सर्वदा बना रहेगा, और सबसे उत्तम बात, महिमा में परिपूर्ण, परमेश्वर वहाँ होगा (12: 23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों में ये नमूना हमने बारम्बार देखा है। हमने इसे 10: 34 में देखा जहाँ मसीहीगण, कैदियों के पास जाने के द्वारा, आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। जब इसकी कीमत उन्हें अपनी सम्पत्ति के रूप में चुकानी पड़ी, वे आनन्दित हुए, इब्रानियों के नाम पत्री कहती है, क्योंकि ‘‘यह जानकर, कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरनेवाली सम्पत्ति है’’ - वे एक आनेवाले नगर की खोज में थे, सुख और पृथ्वी पर स्वर्ग नहीं। अतः वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 11: 25-26 में देखा जब मूसा को, ‘‘पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और उत्तम लगा और मसीह के कारण निन्दित होने को मिसर के भण्डार से बड़ा धन समझकर,’’ वह आवश्यकता की ओर बढ़ा, सुख-आराम की ओर नहीं। क्यों&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 26 कहता है, ‘‘क्योंकि उस की आंखें फल पाने की ओर लगीं थीं’’ - अर्थात्, वह उस आनेवाले नगर की बाट जोह रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 12: 2 में देखा, जहाँ यीशु सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ा, जब ‘उसने’ ‘‘लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा।’’ कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 2 कहता है कि उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था। अर्थात्, ‘उसने’ उस आनेवाले नगर की ओर देखा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 13: 5-6 में देखा जहाँ मसीहीगण, अपने जीवन को पैसे के प्रेम से स्वतंत्र तथा जो उनके पास है उसी में सन्तुष्ट रहते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं। कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 5: ‘‘क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, ‘मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा।’ इसलिये हम बेधड़क होकर कहते हैं, ‘प्रभु मेरा सहायक है&amp;amp;nbsp;; मैं न डरूंगा&amp;amp;nbsp;; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है&amp;amp;nbsp;?’’’ - मैं अभी और सदैव परमेश्वर की सुरक्षा में सुरक्षित हूँ। मैं ऐसे नगर का नागरिक हूँ जो आनेवाला है और कोई मुझे इस से अलग नहीं कर सकता। अतः मैं आवश्यकता की ओर बढूंगा, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इब्रानियों 13: 14 की बात बार-बार पुष्ट होता है: मसीह इसलिए नहीं मरा कि इस युग के नगरों को - उपनगरों को - एक स्वर्गलोक बना देने दे। ‘वह’ मरा ताकि हम पृथ्वी पर - नगर में और उपनगर दोनों में, अपनी जिन्दगियों को स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोकने के इच्छुक हो जावें, और इसके बनिस्बत यीशु के साथ, सुख व मेल-जोल व सुरक्षा की छावनी से बाहर जायें, जहाँ आवश्यकताएँ हैं और जहाँ ‘वह’ भी कहता है, आज (वो दिन जब तुम मरते हो) तुम मेरे साथ स्वर्गलोक में होगे (लूका 23: 43)। हम आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं, सुख-आराम की ओर नहीं, क्योंकि हम एक आनेवाले नगर की बाट जोहते हैं। परमेश्वर के साथ एक महिमामय भविष्य में मूल आत्म-विश्वास ही है जिसे उत्पन्न करने के लिए मसीह मरा। और जब यह आपको वश में कर लेगा है, आप पवित्र किये जायेंगे (पद 12) और यीशु के साथ आवश्यकता की ओर जायेंगे, आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रति स्तुति और लोगों के लिए प्रेम का एक जीवन  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम और अधिक सुस्पष्ट हो जायें। इस जीवन में क्या सम्मिलित होता है जो आवश्यकता की ओर जाता है, आराम की ओर नहीं - छावनी के बाहर कलवरी की सड़क पर, उस आनेवाले नगर में उस आनन्द के लिए जो हमारे लिए धरा है, यीशु के साथ दुःखभोग की ओर बढ़ता हुआ, ये जीवन&amp;amp;nbsp;? पद 15 एक उत्तर देता है और पद 16 एक अन्य। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 15 कहता है, ये परमेश्वर की स्तुति का एक जीवन है - वास्तविक, हार्दिक, मौखिक स्तुति - उस प्रकार की जो आपके हृदय के एक फल और उमण्डने के रूप में आपके मुँह से निकलता है। पद 15: ‘‘इसलिये हम उसके {यीशु} द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16 कहता है, ये लोगों के लिये एक प्रेम का जीवन है - वास्तविक, व्यावहारिक, दूसरों की भलाई के लिए अपना जीवन बाँटते हुए: ‘‘पर भलाई करना, और उदारता न भूलो; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जब हम यीशु के साथ छावनी के बाहर ‘उसके’ बलिदान के स्थान पर जाते हैं, हम पूर्व की अपेक्षा अधिक स्पष्टता से देखते हैं कि हमारे लिए उसका बलिदान - पापियों के लिए एक बार व सर्वदा के लिए ‘उसका’ स्वयँ का बलिदान, (इब्रानियों 9: 26, 28) - सभी बलिदानों का एक अन्त ले आता है, केवल दो प्रकार को छोड़कर: परमेश्वर के प्रति स्तुति का बलिदान (पद 15) और लोगों के प्रति प्रेम का बलिदान (पद 16)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम यहाँ हैं छावनी के बाहर, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ, निन्दा किये जाते हुए, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, सुख-आराम की ओर नहीं - और ये सड़क क्या है&amp;amp;nbsp;? ये किस ओर जा रही है&amp;amp;nbsp;? व्यावहारिक रूप से आज दोपहर को&amp;amp;nbsp;? आपके लिये&amp;amp;nbsp;? इस सप्ताह&amp;amp;nbsp;? इस वर्ष&amp;amp;nbsp;? शायद ये वो सड़क है जो 10/40 खिड़की में सुसमाचार न पाये हुए लोगों के लिए उपवास और प्रार्थना की ओर ले जाती है, अथवा यूक्रेनियायी अनाथों के साथ सम्मिलित होने के लिए मिनिस्ट्री-हॉल में, अथवा ‘सारा’ ‘नओमी’ और अन्य की सहायता करने, हमारे पड़ोस के गर्भपात-चिकित्सालय के नये स्थल, साऊथ 5वीं स्ट्रीट स्थित ‘मिडवेस्ट हेल्थ सेंटर फॉर वीमैन’ को, अथवा ‘ग्लैन व पैट्टी लारसन’ तथा अन्य के घर को जो अनन्तकाल के किनारे पर खड़े हैं, अथवा सतायी गई कलीसिया के लिए प्रेयर जरनल (प्रार्थना दैनिकी) के 18 पृष्ट पर ताकि उन एजेन्सियों को खोज सकें जो आपको सारे संसार में दुःख उठाते मसीहियों की सहायता करने के लिए आपको व्यावहारिक तरीके दें, अथवा टेलीफोन तक कि एक भटकते हुए मित्र को एक दुरूह फोनकॉल करके याचना करें कि यीशु के पास वापिस आ जावे, अथवा एक पड़ोसी तक जो आप जानते हैं कि अविश्वास में नाश हो रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आराम नहीं, आवश्यकता की ओर कलवरी की सड़क, प्रेम और स्तुति के एक हजार सम्भावित जगहों तक ले जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== काश परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 का उपयोग करके आपको हिलाकर मुक्त करे  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज सुबह मेरी प्रार्थना ये है कि आपके मध्य जो जवान हैं जिनका पाठ्यकम अभी तक सुनिश्चित नहीं हुआ है, और आप बुजुर्ग सेवानिवृत लोग, जिनके पास ऊर्जा बची है और बहुत आजादी है, और बीच में आप अन्य लोग जो इस सब को पूर्णतः भुनाना चाहेंगे और अपनी जिन्दगियों के साथ ऐसा आमूल रूप से भिन्न करना चाहते हैं जो दर्जनों कुंवारों और विवाहित लोगों ने सालों-साल इस चर्च में किया है - मेरी प्रार्थना है कि आप सभी के मध्य, परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 से इस वचन को उपयोग करे कि आपको नींव से हिलाये और आपको आपके स्थान से मुक्त करे और संसार के सुसमाचार न पाये हुए लोगों तक, यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा के सुसमाचार के साथ पहुँचाये। मैं जानता हूँ कि ये ‘मिशन्स वीक’ नहीं है, लेकिन आप में से कुछ के लिए आज सुबह मैं इस मूल-पाठ में से यही सुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारे संसार में, आज सुबह, सैंकड़ों हजारों मसीहीगण, मात्र मसीही होने के लिए अपने जिन्दगियों का जोखि़म उठा रहे हैं। हम प्रकाशितवाक्य 5: 11 से जानते हैं कि कारण कि मसीह छावनी से बाहर गया और दुःख उठाया ये था कि हर एक कुल भाषा और लोग और जाति में से लोगों को छुड़ाये। और यदि यही कारण था कि ‘वह’ गया, तब इसका क्या अर्थ होना चाहिए जब इब्रानियों 13: 13 कहता है, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें’’&amp;amp;nbsp;? क्या हम में से अनेकों के लिए इसका अर्थ नहीं होना चाहिए: छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह ‘बेतलेहम’ छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह मिनियापोलीस छावनी छोड़ो। आरामदेह, सुरक्षित नौकरी छोड़ो। और सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ जुड़ जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहीं, इस मूल-पाठ का पालन करने में आपको संस्कृतियों को लांघना नहीं पड़ेगा। मैंने उसके सात उदाहरण दिये हैं। किन्तु सुनिये: मसीह ने छावनी के बाहर विभिन्न जातियों की ख़ातिर दुःख उठाया, जिनमें से सैंकड़ों के पास कोई चर्च नहीं, कोई पुस्तकें नहीं, कोई शिष्टमण्डल नहीं जो उन पर कम से कम ये समाचार प्रगट करे कि मसीह इस संसार में पापियों को बचाने आया। अतः मैं इस पर दबाव डालता हूँ: इब्रानियों 13: 13, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ने की एक बुलाहट है। और वो आवश्यकता जो इस रविवार, मेरे कानों तक चिल्लाती है, ऐसे लोगों की आवश्यकता है जहाँ मसीही सताव के कारण नाश हो रहे हैं, और जहाँ पापी नाश हो रहे हैं क्योंकि वहाँ कोई मसीही नहीं हैं जो सताये जाने के लिए तैयार हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपसे याचना करता हूँ, जब आप अपने भविष्य के बारे में स्वप्न देखते हैं, चाहे आप 8 के हैं या 18 या 38 या 80 के, इब्रानियों 13: 13 का स्वप्न देखिये, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हम अकेले आगे नहीं जाते  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपकी आराधना पुस्तिका में छपे हुए अन्तिम भजन ‘वी रेस्ट ऑन दी’ को गाने के द्वारा, हम स्वयँ को इसे अर्पित करने जा रहे हैं। आप में से कई ये जानते हैं कि इसके पीछे एक कहानी है जो इसे इस क्षण विशेष बल देती है। जनवरी 1956 में, इक्वाडोर में, सुख-सुविधाओं की ओर नहीं अपितु अऊका-भारतीयों (दक्षिण अमेरिकी भारतियों की एक जनजाति) की आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए ‘जिम ईलियट’, पेट फलेमिंग’, ‘एड मैक्कुली’, ‘नेट सेन्ट’, और ‘रोज़र यूडेरियन’ मारे गए थे। इस शहादत़/प्राणोत्सर्ग के ‘एलीसाबेथ ईलियट’ के विवरण के 16वें अध्याय का शीर्षक, इस भजन से एक पंक्ति है: ‘‘हम अकेले आगे नहीं जाते।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पॉम-बीच (समुद्री किनारा) पर अपनी मृत्यु से थोड़ी देर पहिले ही उन्होंने ये भजन गाया था। ईलियट लिखती हैं, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अपनी प्रार्थनाओं की समाप्ती पर उन पाँच पुरुषों ने, ‘‘फिनलेन्डिया’’ की भावोत्तेजक धुन पर अपना एक मनपसन्द भजन गाया, ‘वी रेस्ट ऑन दी’। ‘जिम’ व ‘एड’ ने ये भजन अपने कॉलेज के दिनों से गाया हुआ था और आयतों को कण्ठस्थ जानते थे। आखिरी आयत पर उनकी आवाजें गहरी कायलियत से रुंध गईं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हम तुझ पर टिकाव लिये हैं, हमारी ढाल और हमारे रक्षक, युद्ध आपका है, आपकी स्तुति होवे, जब मुक्तामय भव्य विजेताओं के फाटकों से गुजरते हुए, हम आपके साथ विश्राम करेंगे अन्तहीन दिनों तक। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस आत्मविश्वास के साथ वे यीशु के पास छावनी के बाहर निकल पड़े। वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं, और वे मर गए। और ‘जिम ईलियट’ का धर्मसार सच प्रमाणित हुआ: ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो, जिसे वह खो नहीं सकता उसे पाने के लिए, वो दे देता है जिसे वह सुरक्षित नहीं रख सकता।’’ ‘‘यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं’’ (पद 14)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि इसे गायें। और जब आप इन शब्दों पर आते हैं, ‘‘और तेरे नाम में हम जाते हैं,’’ इन्हें वास्तविकता से गायिए, और जाने को तैयार रहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%86%E0%A4%93_%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%8F_%E0%A4%AF%E0%A5%80%E0%A4%B6%E0%A5%81_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%B2_%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%82</id>
		<title>आओ हम निन्दा उठाये हुए यीशु के साथ निकल चलें</title>
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				<updated>2017-01-11T20:34:08Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Let Us Go with Jesus Bearing Reproach}}   &amp;amp;gt; इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Let Us Go with Jesus Bearing Reproach}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; इसी कारण, यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया। 13 सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें। 14 क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं। 15 इसलिये हम उसके द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें। 16 पर भलाई करना, और उदारता न भूलो&amp;amp;nbsp;; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों 13: 12-16 की बात ऊँचे स्वर की और स्पष्ट है: मसीहियो, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें प्रमुख बुलाहट पद 13 में है: ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ अर्थात्, यीशु के साथ आवश्यकता की ओर बढ़ो, सुख या आराम की ओर नहीं। पद 13 में ये आज्ञा, यीशु की मृत्यु पर आधारित है, कि ये कैसे हुई और इस ने क्या निष्पादित/पूरा किया। पद 12: ‘‘यीशु ने भी, लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये {यही इसने पूरा किया}, फाटक के बाहर दुःख उठाया {ये इस प्रकार से हुआ}।’’ ‘‘इसलिये आओ, … छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ दूसरे शब्दों में, वह कहता है, ‘‘मसीहियो, यीशु के साथ उसके दुःखभोग में जुड़ जाओ&amp;amp;nbsp;!’’ चूँकि यीशु ने फाटक के बाहर दुःख उठाया, अपनी सुरक्षा और मेल-जोल और आराम की छावनी से बाहर निकलो, और कलवरी के रास्ते पर उसके साथ निन्दा उठाने के लिए तैयार रहो। और चूँकि तुम्हें पवित्र करने के लिए ‘वह’ वहाँ मर गया, इसे अपनी ताकत या क्षमता में, मात्र अनुकरण का एक ढोंग करने के रूप में मत करो&amp;amp;nbsp;; इसे उस सामर्थ और पवित्रता में करो जिसे मसीह ने ‘उसकी’ मृत्यु में, तुम्हारे लिए मोल लिया है। अन्यथा यह विश्वास का एक कृत्य न होकर अपितु नायक बनने की क्रिया होगी&amp;amp;nbsp;; और आपको महिमा मिलेगी, मसीह को नहीं, और परमेश्वर प्रसन्न नहीं होगा। क्योंकि विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है (11: 6)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मुख्य बात है: मसीहीजन, एक ऐसे उद्धारकर्ता के साथ, कैसे जीआ जावे, वो ये है - सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैं जानता हूँ कि इस प्रोत्साहन का दुरुपयोग किया जा सकता है। एक अविवाहित स्त्री कह सकती है, ‘‘ठीक है, जितना में ढूंढ सकती हूँ, मुझे सबसे कमजोर, सर्वाधिक जरूरतमंद पुरुष को ढूंढने की खोज में रहना चाहिए और उससे इन आशाओं में विवाह कर लेना चाहिए कि मैं उसका कुछ भला कर सकूँ।’’ अथवा एक नौजवान व्यवसायी कह सकता है, ‘‘ठीक है, मुझे कमप्यूटर के पेशे में एक सर्वाधिक अस्थिर कम्पनी की खोज में रहना चाहिए और वहाँ इन आशाओं से नौकरी पाने का प्रयास करना चाहिए कि उसकी स्थिति पूरी तरह से उलट दूँ।’’ अथवा यदि आपकी कार को मरम्मत की आवश्यकता है, आप कह सकते हैं, ‘‘ठीक है, मैं ऐसे मैकेनिक को ढूंढता हूँ जिसका धंधा बन्द होने की कगार पर है क्योंकि वह स्पर्धा नहीं कर पा रहा है, और अपनी कार वहाँ ले जाऊँगा कि उसकी मदद करूँ।’’ ‘‘इतना सब आपकी व्याख्या के लिए; सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु की मूलभूत बुलाहट ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की बुलाहट के इन दुरुपयोगों के साथ समस्या ये है कि ये मूल बात के पर्याप्त निकट भी नहीं हैं। वे मात्र मूर्खतापूर्ण हैं। आपको क्यों अनुमान भी करना चाहिए कि आपको विवाह कर लेना चाहिए&amp;amp;nbsp;? हो सकता है, सुख-आराम नहीं आवश्यकता की ओर बढ़ो के प्रति यीशु की बुलाहट, किसी अधिक बड़ी सेवा की ख़ातिर पूर्णतया समर्पित कुंवारेपन की एक बुलाहट है। या हो सकता है ये किसी ऐसे प्रकार के व्यक्ति से विवाह करने की बुलाहट है, जो पर्याप्त मजबूत और पर्याप्त उग्र हो कि आपके साथ छावनी के बाहर जा सके और आपके साथ दुःख उठा सके, और जैसा कि बहुतेरे विवाह हैं, आत्म-तल्लीनता की आरामदेह छोटी हौदी में डूबने की बनिस्बत, दूसरों के भले के लिए आपके जीवनों को एक-साथ उच्चतम सीमा तक बढ़ाये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और क्यों आपको सोचना चाहिए कि आपको अमेरिका में एक नौकरी ढूंढना ही है - ऐसी कम्पनी के साथ जो कमजोर या मजबूत है - जबकि समान नौकरियाँ ऐसे देशों में उपलब्ध हैं जहाँ बमुश्किल कोई मसीही हैं और आपकी ज्योति की अत्याधिक आवश्यकता है। अथवा हो सकता है कि आप यहाँ किसी मजबूत कम्पनी के लिए काम करें क्योंकि वहाँ नाश होते हुए लोग हैं या क्योंकि वहाँ राज्य-मूल्यों को फैलाने के अत्यन्त प्रभावकारी अवसर हैं और पलंगपोश बनाना, सभी बातों में परमेश्वर की सर्वोच्चता की, सेवा करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको क्यों कल्पना करना चाहिए कि आपके पास एक कार हो&amp;amp;nbsp;? हो सकता है कि आपकी जिन्दगी के लिए यीशु की बुलाहट है कि ऐसी जगह और लोगों के पास जायें जहाँ आपको कार की कोई आवश्यकता न हो - क्योंकि वहाँ कोई सड़कें, और कोई चर्च और कोई मसीहीगण नहीं हैं। या हो सकता है कि आपके पास एक कार होना चाहिए जो ऐसा काम देती है, कि आप उसे आराम नहीं आवश्यकता की ओर, बिना रुकावट के चला सकें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु की मूल-भूत बुलाहट का, कि कलवरी के रास्ते पर उसके साथ जुड़ जायें - छावनी के बाहर जाने और उसके साथ निन्दा उठाने - सदैव व्यंग और उपहास किया व इसे मूर्खता दिखाया जा सकता है। पलायन का ये एक सबसे सरल तरीका है। ये बहुत प्रलोभित करनेवाला है। ये आपको बुद्धिमान प्रगट करता है। ये यीशु को मूर्ख प्रगट करता है। और ये आपको एक खाली, उथली, आराम-तलबी की खोज करती दिनचर्या के मार्ग में (बहकाते हुए कुछ और वर्षों के लिए) जाने के लिए स्वतंत्र करती है, जिसे कुछ लोग जिन्दगी कहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें (पद 13) … क्योंकि (पद 12) यीशु ने भी लोगों को अपने ही लोहु के द्वारा पवित्र करने के लिये फाटक के बाहर दुःख उठाया।’’ जिस तरह ‘वह’ मरा और क्यों ‘वह’ मरा, हमारे लिए, जिन्हें ‘वह’ ‘उसके’ साथ जाने के लिए बुलाता है, पूरा-पूरा अन्तर ले आता है। जिस तरह ‘वह’ मरा, वो था फाटक से बाहर - पवित्र नगर, यरूशलेम, के प्रतीत होते सुख व सुरक्षा व मेल-जोल के बाहर – फाटक से बाहर, गोलगुता पर, स्वेच्छा से, बलिदानपूर्वक, प्रेम से। और ‘वह’ क्यों मरा (पद 13), लोगों को पवित्र करने के लिए, शेष संसार से हमें भिन्न बनाने के लिए, हमें पवित्र व प्रेममय व अतिवादी व जोखि़म उठानेवाले, और तुलना में उससे जो ये संसार प्रस्तुत करता है, एक अन्य नियति के द्वारा पूर्णतः विमोहित। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पवित्रीकृत लोग क्या हैं, इस पर एक पूरी पकड़ बनाने के लिए अगली आयत (पद 14) पर विचार कीजिये। पवित्रीकरण का वास्तव में क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? लोगों को पवित्र करने के लिए मसीह मरा&amp;amp;nbsp;; अर्थात्, उस प्रकार के लोगों को उत्पन्न करना जो अपनी सम्पूर्ण जिन्दगी के बारे में ऐसा सोचने के इच्छुक हैं, मानो निन्दा सहने के लिए मसीह के साथ छावनी के बाहर जाना है। ऐसा कैसे&amp;amp;nbsp;? इन लोगों को क्या हो गया&amp;amp;nbsp;? पद 14 हमें दिखाता है। वे यीशु के साथ कलवरी के रास्ते पर, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर जाने को इच्छुक हैं। ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका गूढ़ अर्थ क्या है&amp;amp;nbsp;? बात ये है कि मसीह इसलिए नहीं मरा कि ‘मीनियापोलीस’ को इस युग में एक स्वर्गलोक बना दे। वह मरा ताकि हम हमारी व्यक्तिगत जिन्दगियों को, पृथ्वी पर स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोक देने के लिए इच्छुक हो जावें - ‘मीनियापोलीस’ में या कहीं और। किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम मासोक-वादी (परपीडि़त-कामुक) हैं&amp;amp;nbsp;? क्योंकि हम दुःखभोग से प्रेम करते हैं&amp;amp;nbsp;? नहीं। क्योंकि ‘‘हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ क्या आप इसे देखते हैं&amp;amp;nbsp;? पद 14: ‘‘क्योंकि यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं।’’ छावनी से बाहर जाने का हमारा ध्येय - निन्दा उठाते हुए, लोगों की चिन्ता करते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर - इस कारण है कि एक नगर आ रहा है, ‘‘जीवते परमेश्वर का नगर’’ (इब्रानियों 12: 22)। जो यह युग प्रस्तुत करता है, ये उससे बेहतर है और ये सर्वदा बना रहेगा, और सबसे उत्तम बात, महिमा में परिपूर्ण, परमेश्वर वहाँ होगा (12: 23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इब्रानियों में ये नमूना हमने बारम्बार देखा है। हमने इसे 10: 34 में देखा जहाँ मसीहीगण, कैदियों के पास जाने के द्वारा, आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। जब इसकी कीमत उन्हें अपनी सम्पत्ति के रूप में चुकानी पड़ी, वे आनन्दित हुए, इब्रानियों के नाम पत्री कहती है, क्योंकि ‘‘यह जानकर, कि तुम्हारे पास एक और भी उत्तम और सर्वदा ठहरनेवाली सम्पत्ति है’’ - वे एक आनेवाले नगर की खोज में थे, सुख और पृथ्वी पर स्वर्ग नहीं। अतः वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 11: 25-26 में देखा जब मूसा को, ‘‘पाप में थोड़े दिन के सुख भोगने से परमेश्वर के लोगों के साथ दुःख भोगना और उत्तम लगा और मसीह के कारण निन्दित होने को मिसर के भण्डार से बड़ा धन समझकर,’’ वह आवश्यकता की ओर बढ़ा, सुख-आराम की ओर नहीं। क्यों&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 26 कहता है, ‘‘क्योंकि उस की आंखें फल पाने की ओर लगीं थीं’’ - अर्थात्, वह उस आनेवाले नगर की बाट जोह रहा था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 12: 2 में देखा, जहाँ यीशु सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ा, जब ‘उसने’ ‘‘लज्जा की कुछ चिन्ता न करके, क्रूस का दुःख सहा।’’ कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 2 कहता है कि उस आनन्द के लिये जो उसके आगे धरा था। अर्थात्, ‘उसने’ उस आनेवाले नगर की ओर देखा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने इसे 13: 5-6 में देखा जहाँ मसीहीगण, अपने जीवन को पैसे के प्रेम से स्वतंत्र तथा जो उनके पास है उसी में सन्तुष्ट रहते हुए, सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं। कैसे&amp;amp;nbsp;? किस सामर्थ से&amp;amp;nbsp;? पद 5: ‘‘क्योंकि परमेश्वर ने कहा है, ‘मैं तुझे कभी न छोड़ूंगा, और न कभी तुझे त्यागूंगा।’ इसलिये हम बेधड़क होकर कहते हैं, ‘प्रभु मेरा सहायक है&amp;amp;nbsp;; मैं न डरूंगा&amp;amp;nbsp;; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है&amp;amp;nbsp;?’’’ - मैं अभी और सदैव परमेश्वर की सुरक्षा में सुरक्षित हूँ। मैं ऐसे नगर का नागरिक हूँ जो आनेवाला है और कोई मुझे इस से अलग नहीं कर सकता। अतः मैं आवश्यकता की ओर बढूंगा, सुख-आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इब्रानियों 13: 14 की बात बार-बार पुष्ट होता है: मसीह इसलिए नहीं मरा कि इस युग के नगरों को - उपनगरों को - एक स्वर्गलोक बना देने दे। ‘वह’ मरा ताकि हम पृथ्वी पर - नगर में और उपनगर दोनों में, अपनी जिन्दगियों को स्वर्ग बनाने के प्रयास को रोकने के इच्छुक हो जावें, और इसके बनिस्बत यीशु के साथ, सुख व मेल-जोल व सुरक्षा की छावनी से बाहर जायें, जहाँ आवश्यकताएँ हैं और जहाँ ‘वह’ भी कहता है, आज (वो दिन जब तुम मरते हो) तुम मेरे साथ स्वर्गलोक में होगे (लूका 23: 43)। हम आवश्यकता की ओर बढ़ते हैं, सुख-आराम की ओर नहीं, क्योंकि हम एक आनेवाले नगर की बाट जोहते हैं। परमेश्वर के साथ एक महिमामय भविष्य में मूल आत्म-विश्वास ही है जिसे उत्पन्न करने के लिए मसीह मरा। और जब यह आपको वश में कर लेगा है, आप पवित्र किये जायेंगे (पद 12) और यीशु के साथ आवश्यकता की ओर जायेंगे, आराम की ओर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर के प्रति स्तुति और लोगों के लिए प्रेम का एक जीवन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम और अधिक सुस्पष्ट हो जायें। इस जीवन में क्या सम्मिलित होता है जो आवश्यकता की ओर जाता है, आराम की ओर नहीं - छावनी के बाहर कलवरी की सड़क पर, उस आनेवाले नगर में उस आनन्द के लिए जो हमारे लिए धरा है, यीशु के साथ दुःखभोग की ओर बढ़ता हुआ, ये जीवन&amp;amp;nbsp;? पद 15 एक उत्तर देता है और पद 16 एक अन्य। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 15 कहता है, ये परमेश्वर की स्तुति का एक जीवन है - वास्तविक, हार्दिक, मौखिक स्तुति - उस प्रकार की जो आपके हृदय के एक फल और उमण्डने के रूप में आपके मुँह से निकलता है। पद 15: ‘‘इसलिये हम उसके {यीशु} द्वारा स्तुतिरूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर के लिये सर्वदा चढ़ाया करें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16 कहता है, ये लोगों के लिये एक प्रेम का जीवन है - वास्तविक, व्यावहारिक, दूसरों की भलाई के लिए अपना जीवन बाँटते हुए: ‘‘पर भलाई करना, और उदारता न भूलो; क्योंकि परमेश्वर ऐसे बलिदानों से प्रसन्न होता है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जब हम यीशु के साथ छावनी के बाहर ‘उसके’ बलिदान के स्थान पर जाते हैं, हम पूर्व की अपेक्षा अधिक स्पष्टता से देखते हैं कि हमारे लिए उसका बलिदान - पापियों के लिए एक बार व सर्वदा के लिए ‘उसका’ स्वयँ का बलिदान, (इब्रानियों 9: 26, 28) - सभी बलिदानों का एक अन्त ले आता है, केवल दो प्रकार को छोड़कर: परमेश्वर के प्रति स्तुति का बलिदान (पद 15) और लोगों के प्रति प्रेम का बलिदान (पद 16)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः हम यहाँ हैं छावनी के बाहर, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ, निन्दा किये जाते हुए, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, सुख-आराम की ओर नहीं - और ये सड़क क्या है&amp;amp;nbsp;? ये किस ओर जा रही है&amp;amp;nbsp;? व्यावहारिक रूप से आज दोपहर को&amp;amp;nbsp;? आपके लिये&amp;amp;nbsp;? इस सप्ताह&amp;amp;nbsp;? इस वर्ष&amp;amp;nbsp;? शायद ये वो सड़क है जो 10/40 खिड़की में सुसमाचार न पाये हुए लोगों के लिए उपवास और प्रार्थना की ओर ले जाती है, अथवा यूक्रेनियायी अनाथों के साथ सम्मिलित होने के लिए मिनिस्ट्री-हॉल में, अथवा ‘सारा’ ‘नओमी’ और अन्य की सहायता करने, हमारे पड़ोस के गर्भपात-चिकित्सालय के नये स्थल, साऊथ 5वीं स्ट्रीट स्थित ‘मिडवेस्ट हेल्थ सेंटर फॉर वीमैन’ को, अथवा ‘ग्लैन व पैट्टी लारसन’ तथा अन्य के घर को जो अनन्तकाल के किनारे पर खड़े हैं, अथवा सतायी गई कलीसिया के लिए प्रेयर जरनल (प्रार्थना दैनिकी) के 18 पृष्ट पर ताकि उन एजेन्सियों को खोज सकें जो आपको सारे संसार में दुःख उठाते मसीहियों की सहायता करने के लिए आपको व्यावहारिक तरीके दें, अथवा टेलीफोन तक कि एक भटकते हुए मित्र को एक दुरूह फोनकॉल करके याचना करें कि यीशु के पास वापिस आ जावे, अथवा एक पड़ोसी तक जो आप जानते हैं कि अविश्वास में नाश हो रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आराम नहीं, आवश्यकता की ओर कलवरी की सड़क, प्रेम और स्तुति के एक हजार सम्भावित जगहों तक ले जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== काश परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 का उपयोग करके आपको हिलाकर मुक्त करे ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज सुबह मेरी प्रार्थना ये है कि आपके मध्य जो जवान हैं जिनका पाठ्यकम अभी तक सुनिश्चित नहीं हुआ है, और आप बुजुर्ग सेवानिवृत लोग, जिनके पास ऊर्जा बची है और बहुत आजादी है, और बीच में आप अन्य लोग जो इस सब को पूर्णतः भुनाना चाहेंगे और अपनी जिन्दगियों के साथ ऐसा आमूल रूप से भिन्न करना चाहते हैं जो दर्जनों कुंवारों और विवाहित लोगों ने सालों-साल इस चर्च में किया है - मेरी प्रार्थना है कि आप सभी के मध्य, परमेश्वर इब्रानियों 13: 13 से इस वचन को उपयोग करे कि आपको नींव से हिलाये और आपको आपके स्थान से मुक्त करे और संसार के सुसमाचार न पाये हुए लोगों तक, यीशु मसीह में परमेश्वर के अनुग्रह की महिमा के सुसमाचार के साथ पहुँचाये। मैं जानता हूँ कि ये ‘मिशन्स वीक’ नहीं है, लेकिन आप में से कुछ के लिए आज सुबह मैं इस मूल-पाठ में से यही सुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सारे संसार में, आज सुबह, सैंकड़ों हजारों मसीहीगण, मात्र मसीही होने के लिए अपने जिन्दगियों का जोखि़म उठा रहे हैं। हम प्रकाशितवाक्य 5: 11 से जानते हैं कि कारण कि मसीह छावनी से बाहर गया और दुःख उठाया ये था कि हर एक कुल भाषा और लोग और जाति में से लोगों को छुड़ाये। और यदि यही कारण था कि ‘वह’ गया, तब इसका क्या अर्थ होना चाहिए जब इब्रानियों 13: 13 कहता है, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें’’&amp;amp;nbsp;? क्या हम में से अनेकों के लिए इसका अर्थ नहीं होना चाहिए: छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह ‘बेतलेहम’ छावनी छोड़ो&amp;amp;nbsp;! आरामदेह मिनियापोलीस छावनी छोड़ो। आरामदेह, सुरक्षित नौकरी छोड़ो। और सुख-आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए, कलवरी की सड़क पर यीशु के साथ जुड़ जाओ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नहीं, इस मूल-पाठ का पालन करने में आपको संस्कृतियों को लांघना नहीं पड़ेगा। मैंने उसके सात उदाहरण दिये हैं। किन्तु सुनिये: मसीह ने छावनी के बाहर विभिन्न जातियों की ख़ातिर दुःख उठाया, जिनमें से सैंकड़ों के पास कोई चर्च नहीं, कोई पुस्तकें नहीं, कोई शिष्टमण्डल नहीं जो उन पर कम से कम ये समाचार प्रगट करे कि मसीह इस संसार में पापियों को बचाने आया। अतः मैं इस पर दबाव डालता हूँ: इब्रानियों 13: 13, आराम नहीं, आवश्यकता की ओर बढ़ने की एक बुलाहट है। और वो आवश्यकता जो इस रविवार, मेरे कानों तक चिल्लाती है, ऐसे लोगों की आवश्यकता है जहाँ मसीही सताव के कारण नाश हो रहे हैं, और जहाँ पापी नाश हो रहे हैं क्योंकि वहाँ कोई मसीही नहीं हैं जो सताये जाने के लिए तैयार हों। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपसे याचना करता हूँ, जब आप अपने भविष्य के बारे में स्वप्न देखते हैं, चाहे आप 8 के हैं या 18 या 38 या 80 के, इब्रानियों 13: 13 का स्वप्न देखिये, ‘‘सो आओ, उस की निन्दा अपने ऊपर लिए हुए छावनी के बाहर उसके पास निकल चलें।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हम अकेले आगे नहीं जाते ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपकी आराधना पुस्तिका में छपे हुए अन्तिम भजन ‘वी रेस्ट ऑन दी’ को गाने के द्वारा, हम स्वयँ को इसे अर्पित करने जा रहे हैं। आप में से कई ये जानते हैं कि इसके पीछे एक कहानी है जो इसे इस क्षण विशेष बल देती है। जनवरी 1956 में, इक्वाडोर में, सुख-सुविधाओं की ओर नहीं अपितु अऊका-भारतीयों (दक्षिण अमेरिकी भारतियों की एक जनजाति) की आवश्यकता की ओर बढ़ते हुए ‘जिम ईलियट’, पेट फलेमिंग’, ‘एड मैक्कुली’, ‘नेट सेन्ट’, और ‘रोज़र यूडेरियन’ मारे गए थे। इस शहादत़/प्राणोत्सर्ग के ‘एलीसाबेथ ईलियट’ के विवरण के 16वें अध्याय का शीर्षक, इस भजन से एक पंक्ति है: ‘‘हम अकेले आगे नहीं जाते।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पॉम-बीच (समुद्री किनारा) पर अपनी मृत्यु से थोड़ी देर पहिले ही उन्होंने ये भजन गाया था। ईलियट लिखती हैं, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अपनी प्रार्थनाओं की समाप्ती पर उन पाँच पुरुषों ने, ‘‘फिनलेन्डिया’’ की भावोत्तेजक धुन पर अपना एक मनपसन्द भजन गाया, ‘वी रेस्ट ऑन दी’। ‘जिम’ व ‘एड’ ने ये भजन अपने कॉलेज के दिनों से गाया हुआ था और आयतों को कण्ठस्थ जानते थे। आखिरी आयत पर उनकी आवाजें गहरी कायलियत से रुंध गईं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हम तुझ पर टिकाव लिये हैं, हमारी ढाल और हमारे रक्षक, युद्ध आपका है, आपकी स्तुति होवे, जब मुक्तामय भव्य विजेताओं के फाटकों से गुजरते हुए, हम आपके साथ विश्राम करेंगे अन्तहीन दिनों तक। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस आत्मविश्वास के साथ वे यीशु के पास छावनी के बाहर निकल पड़े। वे आवश्यकता की ओर बढ़े, सुख-आराम की ओर नहीं, और वे मर गए। और ‘जिम ईलियट’ का धर्मसार सच प्रमाणित हुआ: ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो, जिसे वह खो नहीं सकता उसे पाने के लिए, वो दे देता है जिसे वह सुरक्षित नहीं रख सकता।’’ ‘‘यहां हमारा कोई स्थिर रहनेवाला नगर नहीं, बरन हम एक आनेवाले नगर की खोज में हैं’’ (पद 14)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको आमंत्रित करता हूँ कि इसे गायें। और जब आप इन शब्दों पर आते हैं, ‘‘और तेरे नाम में हम जाते हैं,’’ इन्हें वास्तविकता से गायिए, और जाने को तैयार रहिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

	<entry>
		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%3F</id>
		<title>बपतिस्मा क्या चित्रित करता है ?</title>
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				<updated>2016-06-21T19:03:38Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;बपतिस्मा क्या चित्रित करता है ?&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Baptism Portrays}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 21 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 6&amp;amp;nbsp;: 1 सो हम क्या कहें&amp;amp;nbsp;? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो&amp;amp;nbsp;? 2 कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं&amp;amp;nbsp;? 3 क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का / में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का / में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? 4 सो उस मृत्यु का / में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''(नोट&amp;amp;nbsp;:- मूल भाषा ग्रीक / यूनानी में तथा अंग्रेजी एन.के.जे.वी. आदि में --‘का’ के स्थान पर ‘‘में’’ है।)'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बपतिस्मा के ऊपर इस छोटी श्रृंखला में आज यह अंतिम संदेश है। मैं जानता हूँ कि कहने के लिए बहुत अधिक शॆष है। मुझे क्षमा करें यदि मैंने आपके कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ दिया है। किन्तु इन चीजों पर विचार- विमर्श करने के लिए, विभिन्न आयोजनों में हमें और अवसर मिलेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मरण रखिये कि ग्रीष्म के आरम्भ में यहाँ इस श्रंखला को रखने के हमारे मुख्य अभिप्रायों में से एक यह है कि हम विश्वास करते हैं कि नया नियम लोगों को खुले-आम और साहसपूर्वक मसीह के पास आने के लिए बुलाता है। हम, लोगों को जो विश्वासी रहें हैं, देखना चाहते हैं कि सार्वजनिक गवाही के उस बिन्दु तक आयें और आपकी गवाही / आपके साक्ष्य के द्वारा तथा यहाँ पूरे ग्रीष्म के दौरान ‘वचन’ की सेवकाई के द्वारा हम, लोगों को विश्वासी बनते देखना चाहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु ने बपतिस्मा के कर्म का आदेश क्यों दिया था&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी-कभी हम अचरज कर सकते हैं कि यीशु ने बपतिस्मा के कर्म का आदेश क्यों दिया&amp;amp;nbsp;? ये बपतिस्मा जैसी चीज क्यों है? यदि विश्वास करने के द्वारा अनुग्रह से उद्धार है, उस विश्वास को प्रदर्शित करने के लिए एक आवश्यक धर्मविधि या एक प्रतीक क्यों स्थापित किया जाए&amp;amp;nbsp;? यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर बाइबल नहीं देती। किन्तु अनुभव कुछ रुचिकर चीजें सिखाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, मेरे पहले संदेश के पश्चात्, तीन सप्ताह पूर्व, फिलिपीन्स के लिए एक भूतपूर्व सुसमाचार-प्रचारक, मेरे पास आयी और उस श्रृंखला के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त की और फिर कहा, क्यों। उस महिला ने कहा कि फिलिप्पीन्स में, जहाँ नामधारक और सर्वधर्म-समभाव कैथोलिकवाद का अच्छा अंश है, मन-परिवर्तन करने वाले विश्वासियों को बरदाश्त किया गया और परिवार के द्वारा कदाचित् ही ध्यान दिया गया - जब तक कि वे बपतिस्मा लेने के लिए नहीं आये। तब शत्रुता की बाइबल- शास्त्रीय भविष्यवाणी और अलगाव घटित हुआ। नये-प्राप्त विश्वास की इस खुली धर्मविधि के बारे में कुछ है जो ये स्पष्ट करता है कि एक व्यक्ति कहाँ खड़ा है और वह क्या कर रहा है। दूसरे शब्दों में, आज अनेकों संस्कृतियों में, स्थिति बहुत कुछ वैसी ही है जैसी स्थिति यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के साथ थी। वह पश्चाताप् के एक बपतिस्मा का प्रचार करता हुआ आया और वे जिन्होंने सोचा कि वो सब जो उन्हें चाहिए था वो उन के पास पहले से ही था, वे बहुधा क्रोधित हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी सप्ताह, इस मिशन की पत्रिका (द डॉन रिपोर्ट, मई 30) आयी। पृष्ठ 7 पर, एक नदी में एक मिशनरी व्यवस्था में बपतिस्मा देते हुए, एक मनुष्य की तस्वीर है, तस्वीर के नीचे इस शीर्षक के साथ: ‘‘बाह्य उपासना सभाएं और नदी का बपतिस्मा, कभी-कभी विकास के सर्वोत्तम वाहन होते हैं।’’ कारणों के उस सम्पूर्ण समूह को हम नहीं जानते जो, मसीह में विश्वास को प्रगट करने के एक आदर्शक तरीके के रूप में और ‘उसके’ व ‘उसके’ लोगों के साथ एकीकरण के रूप में, बपतिस्मा का परामर्श देने के लिए परमेश्वर के पास ‘उसकी’ बुद्धि में थे। हम विविध कारणों के बारे में सोच सकते हैं कि क्यों ये एक अच्छी चीज है, किन्तु हम सम्भवतः उन सभी अच्छे प्रभावों की सोच के निकट भी नहीं आ सकते जो परमेश्वर का ध्येय है। अन्त में, ये हमारे पिता में भरोसे / विश्वास का एक कर्म है कि ‘वह’ जानता है कि ‘वह’ क्या कर रहा है और हम ‘उसकी’ आज्ञा के अनुसार कार्य करके प्रसन्न हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== डुबकी या छिड़काव&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज मैं रोमियों 5: 20 – 6: 4 से इस कर्म का अर्थ थोड़ा और दिखाने का प्रयास करूँगा। ये उस प्रश्न को भी सम्बोधित करेगा जो आप में से कुछ के पास बपतिस्मा के तरीके के सम्बन्ध में है - अर्थात्, छिड़काव के बनिस्बत डुबकी। वास्तव में, छिड़काव के विरोध में डुबकी के तरीके के बारे में एक सामान्य शब्द के साथ मुझे आरम्भ करने दीजिये। कम से कम तीन प्रकार के प्रमाण हैं यह विश्वास करने के लिए कि बपतिस्मा का नया नियम का अर्थ और प्रथा, डुबकी के द्वारा था । 1) यूनानी / ग्रीक में शब्द बेप्टिज़ो का मूलभूत अर्थ है ‘‘डुबकी लगाना’’ या ‘‘डुबाना,’’ छिड़कना नहीं। 2) नया नियम में बपतिस्मों के वर्णन सुझाव देते हैं कि लोग जल में उतरे कि डुबाये जाएं बनिस्बत इसके कि एक पात्र में जल उनके पास लाया गया कि उन पर उण्डे़ला या छिड़का जाए (मत्ती 3&amp;amp;nbsp;: 6, ‘‘यरदन नदी में;’’ 3&amp;amp;nbsp;: 16 ‘‘यीशु . . . पानी में से ऊपर आया;’’ यूहन्ना 3&amp;amp;nbsp;: 23, ‘‘वहां बहुत जल था;’’ प्रेरित 8&amp;amp;nbsp;: 38, ‘‘जल में उतर पड़े’’) । 3) मसीह के साथ गाड़े जाने के प्रतीकात्मक रूप में, डुबकी मेल खाती है (रोमियों 6&amp;amp;nbsp;: 1-4; कुलुस्सियों 2&amp;amp;nbsp;: 12) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम इस पर ठहरे नहीं रहेंगे, लेकिन मुझे उस बारे में एक शब्द कहने दीजिये कि उस तथ्य की ओर हम कैसे देखेंगे कि हमारा चर्च और हमारा धर्म-सम्प्रदाय, डुबकी के द्वारा बपतिस्मा को स्थानीय प्रसंविदा समुदाय में सदस्यता का (किन्तु मसीह की सार्वभौमिक देह में नहीं ) एक निर्धारित हिस्सा बनाते हैं। हम ये विश्वास नहीं करते कि उद्धार के लिए, बपतिस्मा का तरीका, एक अनिवार्य क्रिया है। अतः हम एक व्यक्ति की मसीही स्थिति पर मात्र उनके बपतिस्मा के तरीके के आधार पर प्रश्न नहीं उठाते। तब कोई पूछ सकता है: फिर क्या आप को उन लोगों को सदस्यता में प्रवेश नहीं देना चाहिए जो सच में नया जन्म पाये हैं किन्तु जिन पर विश्वासी के रूप में छिड़काव किया गया&amp;amp;nbsp;? इसका स्पष्टीकरण देने के दो तरीके हैं कि हम ऐसा क्यों नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1) क्या बपतिस्मा की एक द्वारा मनुष्य बनाई विधि को ही हमें ‘‘बपतिस्मा’’ कहना चाहिए, यदि हम उन अच्छे प्रमाणों पर विश्वास करते हैं कि यह उस रूप से हट जाता है जिसका प्रारम्भ मसीह ने किया&amp;amp;nbsp;? क्या यह उस महत्व को घटाने के जोखि़म को और नहीं बढ़ायेगा, जो मसीह ने स्वयँ इस धर्मविधि में प्रतिष्ठित किया था&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2) स्थानीय मसीही समुदाय, जो कलीसियाएँ कहलाती हैं, साझा की गई बाइबल-शास्त्रीय दृढ़-धारणाओं के चारों ओर निर्मित हैं, जिनमें से कुछ उद्धार के लिए अत्यावश्यक हैं और जिनमें से कुछ नहीं। हम केवल धारणाओं के संकीर्णतम् सम्भव समूह के द्वारा जो किसी के पास उद्धार पाने के लिए होना चाहिए, अपने प्रसंविदा जीवन को एक-साथ होना परिभाषित नहीं करते। बल्कि हम विश्वास करते हैं कि सत्य का महत्व और धर्म-शास्त्र का अधिकार, अधिक अच्छी तरह से सम्मानित होते हैं जब मसीही विश्वास के समुदाय, स्वयँ को बाइबल-शास्त्रीय दृढ़-धारणाओं के समूह के द्वारा परिभाषित करते और उस पर स्थिर रहते हैं, बनिस्बत इसके कि हर बार जब उनकी धारणाओं में से एक विवादित हो, सदस्यता के अर्थ को पुनः परिभाषित करें। जब विभिन्न मसीही समुदाय, दूसरे विश्वासियों के लिए प्रेम और भाईचारे की प्रीति व्यक्त करते हुए, ये कर सकते हैं, सत्य और प्रेम दोनों की अच्छी तरह सेवा होती है। उदाहरण के लिए, ये तथ्य, कि बहुत से वे वक्ता जिन्हें हम ‘बैतलहम कॉन्फरेन्स फॉर पास्टर्स ’ में आमंत्रित करते हैं, इस चर्च के सदस्य नहीं हो सकते थे, कहता है कि हम प्रेम और एकता को गम्भीरता से लेते हैं और हम सत्य को गम्भीरता से लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विभिन्न समुदायों को परिभाषित करने में, कौन से गैर-मौलिक चीजों को पीढ़ी से पीढ़ी तक सम्मिलित किया जाएगा, ये मुख्यतः विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है और भिन्नता रखने वाले मूल्यांकनों पर, कि किन सच्चाईयों पर बल दिये जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बपतिस्मा क्या चित्रित करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस पृष्ठ भूमि के साथ, आइये हम रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4 को देखें, यह देखने के लिए कि बपतिस्मा क्या चित्रित करता है,केवल परोक्ष रूप में, बपतिस्मा के तरीके के लिए इसके क्या निहित-अर्थ हैं। यहाँ मेरा लक्ष्य है कि उस महिमित वास्तविकता को देखने में आपकी सहायता करूं जिसकी ओर बपतिस्मा संकेत करता है ताकि, मुख्यतः , वो वास्तविकता स्वयँ आपको जकड़ ले, और दूसरी बात, इस क्रिया/कर्म की सुन्दरता और महत्व आपके दिमाग और हृदयों में उभरे। रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 21 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 6: 1 सो हम क्या कहें&amp;amp;nbsp;? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो&amp;amp;nbsp;? 2 कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं&amp;amp;nbsp;? 3 क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का/में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का/में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? 4 सो उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''(नोट&amp;amp;nbsp;:- मूल भाषा ग्रीक/यूनानी में तथा अंग्रेजी एन.के.जे.वी. आदि में --‘का’ के स्थान पर ‘‘में’’ है।)'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मूल-पाठ के बारे में एक बड़ी बात ये है कि ये दिखाता है कि, यदि आप समझते हैं कि बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, तो आप समझते हैं कि आप के साथ वास्तव में क्या हुआ जब आप एक मसीही बने। हम में से कई लोग, विश्वास में आये और एक ऐसे बिन्दु पर बपतिस्मा दिया गया जब हम बहुत अधिक नहीं जानते थे। ये अच्छा है। ये आशा की जाती है कि मसीही चाल में बपतिस्मा पहले ही हो जाता है जब आप बहुत अधिक नहीं जानते हैं। अतः ये भी आशा की जाती है कि आप अधिक और अधिक सीखेंगे कि इसका क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मत सोचिये, ‘‘ओह, मुझे वापस जाना चाहिए और पुनः बपतिस्मा लेना चाहिए। मैं नहीं जानता था कि इसका ये सब अर्थ था।’’ नहीं। नहीं। उसका ये अर्थ होगा कि प्रत्येक नये पाठ्यक्रम के साथ जो आप बाइबल-शास्त्रीय धर्मविज्ञान में लेते हैं, आपको पुनः बपतिस्मा दिया जाएगा। इसकी जगह, इस बात में आनन्द कीजिये कि यीशु के प्रति आज्ञाकारिता में आपने अपना सरल विश्वास व्यक्त किया और अब अधिक और अधिक सीख रहे हैं कि इस सब का क्या अर्थ था। वही पौलुस यहाँ कर रहा है&amp;amp;nbsp;: वो ये आशा कर रहा है कि उसके पाठक ये जानते हैं कि उनके बपतिस्मा का क्या अर्थ था, लेकिन वह आगे बढ़ता है और फिर भी उन्हें सिखाता है, हो सकता है वे न जानते हों या भूल गये हों। इन आयतों से सीखिये कि एक समय आपने परमेश्वर के समक्ष क्या चित्रित किया, और एक मसीही बनने में आपको वास्तव में क्या हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं केवल दो चीजों को देखने जा रहा हूँ जो, इन आयतों के अनुसार, बपतिस्मा चित्रित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) बपतिस्मा, मसीह की मृत्यु में हमारी मृत्यु को चित्रित करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयतें 3-4अ&amp;amp;nbsp;: ‘‘क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का/में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का/में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? सो उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए।’’ यहाँ पर हम मसीहियों के बारे में एक महान् सत्य है। हम मर गये हैं। जब मसीह मरा ‘वह’ हमारी मृत्यु मरा। इसका अर्थ है कम से कम दो चीजें। 1) एक यह है कि हम वही लोग नहीं हैं जो किसी समय हम थे; हमारा पुराना मनुष्यत्व मर गया है। हम वही नहीं हैं। 2) दूसरा यह है कि भविष्य की हमारी शारीरिक मृत्यु का हमारे लिए वही अर्थ नहीं होगा, जो इसका होता यदि मसीह हमारी मृत्यु न मरा होता। चूंकि हम मसीह के साथ मर गये हैं, और हमारे लिए ‘वह’ हमारी मृत्यु मरा, हमारी मौत वो भयंकर चीज नहीं होगी जो वो रही होती। ‘‘ हे मृत्यु तेरी जय कहां रही&amp;amp;nbsp;? हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा&amp;amp;nbsp;?’’ (1 कुरिन्थियों 15: 55-56)। उत्तर ये है कि मृत्यु का डैन्क और जय, मसीह के द्वारा निगल लिये गए हैं। विगत सप्ताह से याद कीजिये: ‘ही ड्रैन्क द टैंक’ (‘उसने’ तालाब/कुण्ड/टंकी पी लिया)। पद 3 व 4 में शब्द ‘‘में’’ के दोहराने पर ध्यान दीजिये। ‘‘मसीह यीशु में’’ बपतिस्मा लिया, और ‘‘उस की मृत्यु में’’ बपतिस्मा लिया (पद 3), और ‘‘मृत्यु में’’ बपतिस्मा लिया (पद 4अ)। जो ये कहता है वो यह कि बपतिस्मा, मसीह के साथ हमारी संयुक्ति को चित्रित करता है, अर्थात्, हम आत्मिक रूप से ‘उस’ से जुड़ गए हैं ताकि ‘उसकी’ मृत्यु हमारी मृत्यु बन जाती है और ‘उसका’ जीवन हमारा जीवन बनेगा। हम इसका अनुभव कैसे करते हैं&amp;amp;nbsp;? आप कैसे जानें यदि ये आप के साथ हुआ है&amp;amp;nbsp;? उत्तर ये है कि ये विश्वास के द्वारा अनुभव किया जाता है। आप इसे समानान्तर आयतों में सुन सकते हैं। गलतियों 2: 20, विश्वास के साथ सम्बन्ध बनाता है: ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर/में है . . . ।’’ दूसरे शब्दों में, ‘‘मैं’’ जो मर गया, पुराना विश्वास न करने वाला, विद्रोही ‘‘मैं’’ था और ‘‘मैं’’ जो जीवित हो गया, विश्वास का ‘‘मैं’’ था -‘‘अब जो जीवन मैं जीता हूँ तो परमेश्वर के पुत्र में विश्वास के द्वारा जीता हूँ।’’ और इस सब का आधार है मसीह के साथ संयुक्ति - ‘‘मसीह मुझ में जीवित है।’’ और मैं उसमें जीवित हूँ - उसके साथ आत्मिक संयुक्ति में। ‘उसकी’ मृत्यु मेरी मृत्यु है और ‘उसका’ जीवन मेरी जिन्दगी में जिया जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका एक अन्य स्पष्टीकरण कुलुस्सियों 2: 6-7अ रहेगा: ‘‘सो जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसी में चलते रहो और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ&amp;amp;nbsp;; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ।’’ यहाँ पुनः आप देख सकते हैं कि मसीह में विश्वास, वो मार्ग है जिससे आप मसीह के साथ संयुक्ति का अनुभव करते हैं। आप ‘उसे’ प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करते हैं और उस विश्वास में आप ‘उस’ के साथ संयुक्त हो जाते हैं और ‘‘उसी में’’ चलते और ‘‘उसी में’’ बढ़ते जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जब रोमियों 6: 3-4अ कहता है कि हमने मसीह में और ‘उसकी’ मृत्यु में बपतिस्मा लिया, मैं इसका ये अर्थ लेता हूँ कि बपतिस्मा उस विश्वास को व्यक्त करता है जिस में हम मसीह के साथ संयुक्तता का अनुभव करते हैं। यही संभवतः वो कारण है कि क्यों परमेश्वर ने बपतिस्मा का तरीका बनाया कि एक गाड़े जाने को चित्रित करे। ये उस मृत्यु को प्रदर्शित करता है जो हम तब अनुभव करते हैं जब मसीह के साथ संयुक्त किये जाते हैं। इसी कारण हमें डुबाया जाता है&amp;amp;nbsp;: ये एक प्रतीकात्मक गाड़ा जाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः विश्वासीगण, जान लीजिये, कि आप मर गए हैं। पुराना अविश्वास करने वाला, विद्रोही ‘‘मैं’’ मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ा दिया गया है। आपके बपतिस्मा का यही अर्थ था और अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) बपतिस्मा, मसीह में हमारे जीवन की नवीनता को चित्रित करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4: ‘‘उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।’’ बपतिस्मा के जल के नीचे कोई नहीं ठहरता। हम जल के बाहर ऊपर निकल आते हैं। मृत्यु के पश्चात् नया जीवन आता है। जब मैं विश्वास के द्वारा मसीह से संयुक्त किया गया, अविश्वास और विद्रोह का पुराना ‘‘मैं’’ मर गया। किन्तु जिस क्षण पुराना ‘‘मैं’’ मरा, एक नये ‘‘मैं’’ को जीवन दिया गया - एक नया आत्मिक व्यक्ति, मानो जैसे कि, मुरदों में से जिलाया गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सच्चाई पर सर्वाधिक निर्णायक टीका है, कुलुस्सियों 2: 12। पौलुस कहता है, ‘‘उसी के साथ बपतिस्मा में गाड़े गए, और उसी में परमेश्वर की शक्ति पर विश्वास करके, जिस ने उस को मरे हुओं में से जिलाया, उसके साथ जी भी उठे।’’ ध्यान दीजिये&amp;amp;nbsp;: हम मसीह के साथ जी उठे, ठीक जैसा कि रोमियों 6: 4 कहता है हम नये जीवन की चाल चलते हैं। और वहाँ परमेश्वर की शक्ति है जिस ने ‘उसे’ मरे हुओं में से जिलाया, ठीक जैसा रोमियों 6: 4 कहता है कि मसीह पिता की महिमा के द्वारा जिलाया गया। और यह परमेश्वर की शक्ति में विश्वास के द्वारा होता है जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः रोमियों 6: 4 जो अस्पष्ट छोड़ देता है, उसे कुलुस्सियों 2: 12 स्पष्ट कर देता है - कि बपतिस्मा, यीशु को मरे हुओं में जिलाने में परमेश्वर की शक्ति में हमारे विश्वास को व्यक्त करता है। हम विश्वास करते हैं कि मसीह कब्र में से जीवित हो गया है और आज स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ पर बैठा राज्य कर रहा है, जहाँ से ‘वह’ सामर्थ्य और महिमा में पुनः आयेगा। और परमेश्वर की शक्ति - परमेश्वर की महिमा, जैसा कि पौलुस इसे बुलाता है, में वो विश्वास - ये है कि उस जीवन की नवीनता में हम कैसे हिस्सेदार होते हैं, जो मसीह स्वयँ में रखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, जीवन की नवीनता (या नये जीवन की चाल) , परमेश्वर की महिमा तथा शक्ति में विश्वास का जीवन है। ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, . . . मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर/में है।’’ नये जीवन की चाल, परमेश्वर की शक्ति में - परमेश्वर की महिमा में - दिन-प्रतिदिन भरोसा रखने का जीवन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बपतिस्मा चित्रित करता है कि हमारे साथ क्या हुआ जब हम मसीही बने ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आइये हम सार प्रस्तुत करें और एक निष्कर्ष पर आयें। बपतिस्मा चित्रित करता है कि हमारे साथ क्या हुआ जब हम मसीही बने। हमारे साथ ये हुआ&amp;amp;nbsp;: हम मसीह के साथ संयुक्त किये गए। ‘उसकी’ मृत्यु हमारी मृत्यु बन गई। हम ‘उसके’ साथ मर गये। और उसी क्षण में, ‘उसका’ जीवन हमारा जीवन बन गया। अब हम हमारे अन्दर मसीह का जीवन जी रहे हैं। और ये सब विश्वास के द्वारा अनुभव किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मसीही होने का यही अर्थ है - हमारा बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, उसकी वास्तविकता में जीना&amp;amp;nbsp;: दिन-ब-दिन हम अपने से हटकर परमेश्वर को देखते हैं और कहते हैं, ‘‘आपके पुत्र, मसीह के कारण, मैं आपके पास आता हूँ। ‘उस’ में मैं आपका हूँ। मैं आपके साथ घर में हूँ। आपके साथ स्वीकरण की, ‘वह’ ही मेरी आशा है। मैं उस स्वीकरण को प्रतिदिन नया ग्रहण करता हूँ। मेरे लिए ‘उसकी’ मृत्यु और ‘उस’ में मेरी मृत्यु पर मेरी आशा आधारित है। पिता, ‘उस’ में मेरा जीवन आप में विश्वास का एक जीवन है। ‘उस’ के कारण मैं आपकी शक्ति को मेरे अन्दर और मेरे लिए विश्वास करता हूँ। वही सामर्थ्य और महिमा जो आपने ‘उसे’ मरे हुओं में से जिलाने में उपयोग की, आप मेरी सहायता करने में उपयोग करेंगे । भविष्य के अनुग्रह की उस प्रतिज्ञा में मैं विश्वास करता हूँ, और उस में मैं आशा रखता हूँ। वही है जो मेरे जीवन को नया बनाता है। हे मसीह, मेरा बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, उसमें मैं कैसा गौरव करता हूँ&amp;amp;nbsp;! मेरी मृत्यु, मेरे लिए मरने के लिए और मुझे नया जीवन देने के लिए, आपको धन्यवाद। आमीन ।’’&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%AC%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE_%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%B9%E0%A5%88_%3F</id>
		<title>बपतिस्मा क्या चित्रित करता है ?</title>
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				<updated>2016-06-21T19:02:59Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|What Baptism Portrays}}   '''रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4'''  &amp;amp;gt; और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अप...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|What Baptism Portrays}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4'''&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 21 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 6&amp;amp;nbsp;: 1 सो हम क्या कहें&amp;amp;nbsp;? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो&amp;amp;nbsp;? 2 कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं&amp;amp;nbsp;? 3 क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का / में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का / में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? 4 सो उस मृत्यु का / में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''(नोट&amp;amp;nbsp;:- मूल भाषा ग्रीक / यूनानी में तथा अंग्रेजी एन.के.जे.वी. आदि में --‘का’ के स्थान पर ‘‘में’’ है।)'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बपतिस्मा के ऊपर इस छोटी श्रृंखला में आज यह अंतिम संदेश है। मैं जानता हूँ कि कहने के लिए बहुत अधिक शॆष है। मुझे क्षमा करें यदि मैंने आपके कुछ प्रश्नों को अनुत्तरित छोड़ दिया है। किन्तु इन चीजों पर विचार- विमर्श करने के लिए, विभिन्न आयोजनों में हमें और अवसर मिलेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
स्मरण रखिये कि ग्रीष्म के आरम्भ में यहाँ इस श्रंखला को रखने के हमारे मुख्य अभिप्रायों में से एक यह है कि हम विश्वास करते हैं कि नया नियम लोगों को खुले-आम और साहसपूर्वक मसीह के पास आने के लिए बुलाता है। हम, लोगों को जो विश्वासी रहें हैं, देखना चाहते हैं कि सार्वजनिक गवाही के उस बिन्दु तक आयें और आपकी गवाही / आपके साक्ष्य के द्वारा तथा यहाँ पूरे ग्रीष्म के दौरान ‘वचन’ की सेवकाई के द्वारा हम, लोगों को विश्वासी बनते देखना चाहते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु ने बपतिस्मा के कर्म का आदेश क्यों दिया था&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी-कभी हम अचरज कर सकते हैं कि यीशु ने बपतिस्मा के कर्म का आदेश क्यों दिया&amp;amp;nbsp;? ये बपतिस्मा जैसी चीज क्यों है? यदि विश्वास करने के द्वारा अनुग्रह से उद्धार है, उस विश्वास को प्रदर्शित करने के लिए एक आवश्यक धर्मविधि या एक प्रतीक क्यों स्थापित किया जाए&amp;amp;nbsp;? यह एक प्रश्न है जिसका उत्तर बाइबल नहीं देती। किन्तु अनुभव कुछ रुचिकर चीजें सिखाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, मेरे पहले संदेश के पश्चात्, तीन सप्ताह पूर्व, फिलिपीन्स के लिए एक भूतपूर्व सुसमाचार-प्रचारक, मेरे पास आयी और उस श्रृंखला के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त की और फिर कहा, क्यों। उस महिला ने कहा कि फिलिप्पीन्स में, जहाँ नामधारक और सर्वधर्म-समभाव कैथोलिकवाद का अच्छा अंश है, मन-परिवर्तन करने वाले विश्वासियों को बरदाश्त किया गया और परिवार के द्वारा कदाचित् ही ध्यान दिया गया - जब तक कि वे बपतिस्मा लेने के लिए नहीं आये। तब शत्रुता की बाइबल- शास्त्रीय भविष्यवाणी और अलगाव घटित हुआ। नये-प्राप्त विश्वास की इस खुली धर्मविधि के बारे में कुछ है जो ये स्पष्ट करता है कि एक व्यक्ति कहाँ खड़ा है और वह क्या कर रहा है। दूसरे शब्दों में, आज अनेकों संस्कृतियों में, स्थिति बहुत कुछ वैसी ही है जैसी स्थिति यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के साथ थी। वह पश्चाताप् के एक बपतिस्मा का प्रचार करता हुआ आया और वे जिन्होंने सोचा कि वो सब जो उन्हें चाहिए था वो उन के पास पहले से ही था, वे बहुधा क्रोधित हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उसी सप्ताह, इस मिशन की पत्रिका (द डॉन रिपोर्ट, मई 30) आयी। पृष्ठ 7 पर, एक नदी में एक मिशनरी व्यवस्था में बपतिस्मा देते हुए, एक मनुष्य की तस्वीर है, तस्वीर के नीचे इस शीर्षक के साथ: ‘‘बाह्य उपासना सभाएं और नदी का बपतिस्मा, कभी-कभी विकास के सर्वोत्तम वाहन होते हैं।’’ कारणों के उस सम्पूर्ण समूह को हम नहीं जानते जो, मसीह में विश्वास को प्रगट करने के एक आदर्शक तरीके के रूप में और ‘उसके’ व ‘उसके’ लोगों के साथ एकीकरण के रूप में, बपतिस्मा का परामर्श देने के लिए परमेश्वर के पास ‘उसकी’ बुद्धि में थे। हम विविध कारणों के बारे में सोच सकते हैं कि क्यों ये एक अच्छी चीज है, किन्तु हम सम्भवतः उन सभी अच्छे प्रभावों की सोच के निकट भी नहीं आ सकते जो परमेश्वर का ध्येय है। अन्त में, ये हमारे पिता में भरोसे / विश्वास का एक कर्म है कि ‘वह’ जानता है कि ‘वह’ क्या कर रहा है और हम ‘उसकी’ आज्ञा के अनुसार कार्य करके प्रसन्न हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== डुबकी या छिड़काव&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन आज मैं रोमियों 5: 20 – 6: 4 से इस कर्म का अर्थ थोड़ा और दिखाने का प्रयास करूँगा। ये उस प्रश्न को भी सम्बोधित करेगा जो आप में से कुछ के पास बपतिस्मा के तरीके के सम्बन्ध में है - अर्थात्, छिड़काव के बनिस्बत डुबकी। वास्तव में, छिड़काव के विरोध में डुबकी के तरीके के बारे में एक सामान्य शब्द के साथ मुझे आरम्भ करने दीजिये। कम से कम तीन प्रकार के प्रमाण हैं यह विश्वास करने के लिए कि बपतिस्मा का नया नियम का अर्थ और प्रथा, डुबकी के द्वारा था । 1) यूनानी / ग्रीक में शब्द बेप्टिज़ो का मूलभूत अर्थ है ‘‘डुबकी लगाना’’ या ‘‘डुबाना,’’ छिड़कना नहीं। 2) नया नियम में बपतिस्मों के वर्णन सुझाव देते हैं कि लोग जल में उतरे कि डुबाये जाएं बनिस्बत इसके कि एक पात्र में जल उनके पास लाया गया कि उन पर उण्डे़ला या छिड़का जाए (मत्ती 3&amp;amp;nbsp;: 6, ‘‘यरदन नदी में;’’ 3&amp;amp;nbsp;: 16 ‘‘यीशु . . . पानी में से ऊपर आया;’’ यूहन्ना 3&amp;amp;nbsp;: 23, ‘‘वहां बहुत जल था;’’ प्रेरित 8&amp;amp;nbsp;: 38, ‘‘जल में उतर पड़े’’) । 3) मसीह के साथ गाड़े जाने के प्रतीकात्मक रूप में, डुबकी मेल खाती है (रोमियों 6&amp;amp;nbsp;: 1-4; कुलुस्सियों 2&amp;amp;nbsp;: 12) । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम इस पर ठहरे नहीं रहेंगे, लेकिन मुझे उस बारे में एक शब्द कहने दीजिये कि उस तथ्य की ओर हम कैसे देखेंगे कि हमारा चर्च और हमारा धर्म-सम्प्रदाय, डुबकी के द्वारा बपतिस्मा को स्थानीय प्रसंविदा समुदाय में सदस्यता का (किन्तु मसीह की सार्वभौमिक देह में नहीं ) एक निर्धारित हिस्सा बनाते हैं। हम ये विश्वास नहीं करते कि उद्धार के लिए, बपतिस्मा का तरीका, एक अनिवार्य क्रिया है। अतः हम एक व्यक्ति की मसीही स्थिति पर मात्र उनके बपतिस्मा के तरीके के आधार पर प्रश्न नहीं उठाते। तब कोई पूछ सकता है: फिर क्या आप को उन लोगों को सदस्यता में प्रवेश नहीं देना चाहिए जो सच में नया जन्म पाये हैं किन्तु जिन पर विश्वासी के रूप में छिड़काव किया गया&amp;amp;nbsp;? इसका स्पष्टीकरण देने के दो तरीके हैं कि हम ऐसा क्यों नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1) क्या बपतिस्मा की एक द्वारा मनुष्य बनाई विधि को ही हमें ‘‘बपतिस्मा’’ कहना चाहिए, यदि हम उन अच्छे प्रमाणों पर विश्वास करते हैं कि यह उस रूप से हट जाता है जिसका प्रारम्भ मसीह ने किया&amp;amp;nbsp;? क्या यह उस महत्व को घटाने के जोखि़म को और नहीं बढ़ायेगा, जो मसीह ने स्वयँ इस धर्मविधि में प्रतिष्ठित किया था&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2) स्थानीय मसीही समुदाय, जो कलीसियाएँ कहलाती हैं, साझा की गई बाइबल-शास्त्रीय दृढ़-धारणाओं के चारों ओर निर्मित हैं, जिनमें से कुछ उद्धार के लिए अत्यावश्यक हैं और जिनमें से कुछ नहीं। हम केवल धारणाओं के संकीर्णतम् सम्भव समूह के द्वारा जो किसी के पास उद्धार पाने के लिए होना चाहिए, अपने प्रसंविदा जीवन को एक-साथ होना परिभाषित नहीं करते। बल्कि हम विश्वास करते हैं कि सत्य का महत्व और धर्म-शास्त्र का अधिकार, अधिक अच्छी तरह से सम्मानित होते हैं जब मसीही विश्वास के समुदाय, स्वयँ को बाइबल-शास्त्रीय दृढ़-धारणाओं के समूह के द्वारा परिभाषित करते और उस पर स्थिर रहते हैं, बनिस्बत इसके कि हर बार जब उनकी धारणाओं में से एक विवादित हो, सदस्यता के अर्थ को पुनः परिभाषित करें। जब विभिन्न मसीही समुदाय, दूसरे विश्वासियों के लिए प्रेम और भाईचारे की प्रीति व्यक्त करते हुए, ये कर सकते हैं, सत्य और प्रेम दोनों की अच्छी तरह सेवा होती है। उदाहरण के लिए, ये तथ्य, कि बहुत से वे वक्ता जिन्हें हम ‘बैतलहम कॉन्फरेन्स फॉर पास्टर्स ’ में आमंत्रित करते हैं, इस चर्च के सदस्य नहीं हो सकते थे, कहता है कि हम प्रेम और एकता को गम्भीरता से लेते हैं और हम सत्य को गम्भीरता से लेते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विभिन्न समुदायों को परिभाषित करने में, कौन से गैर-मौलिक चीजों को पीढ़ी से पीढ़ी तक सम्मिलित किया जाएगा, ये मुख्यतः विभिन्न परिस्थितियों पर निर्भर करता है और भिन्नता रखने वाले मूल्यांकनों पर, कि किन सच्चाईयों पर बल दिये जाने की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बपतिस्मा क्या चित्रित करता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उस पृष्ठ भूमि के साथ, आइये हम रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4 को देखें, यह देखने के लिए कि बपतिस्मा क्या चित्रित करता है,केवल परोक्ष रूप में, बपतिस्मा के तरीके के लिए इसके क्या निहित-अर्थ हैं। यहाँ मेरा लक्ष्य है कि उस महिमित वास्तविकता को देखने में आपकी सहायता करूं जिसकी ओर बपतिस्मा संकेत करता है ताकि, मुख्यतः , वो वास्तविकता स्वयँ आपको जकड़ ले, और दूसरी बात, इस क्रिया/कर्म की सुन्दरता और महत्व आपके दिमाग और हृदयों में उभरे। रोमियों 5&amp;amp;nbsp;: 20 – 6&amp;amp;nbsp;: 4: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और व्यवस्था बीच में आ गई, कि अपराध बहुत हो, परन्तु जहां पाप बहुत हुआ, वहां अनुग्रह उस से भी कहीं अधिक हुआ। 21 कि जैसा पाप ने मृत्यु फैलाते हुए राज्य किया, वैसा ही हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा अनुग्रह भी अनन्त जीवन के लिये धर्मी ठहराते हुए राज्य करे।। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 6: 1 सो हम क्या कहें&amp;amp;nbsp;? क्या हम पाप करते रहें, कि अनुग्रह बहुत हो&amp;amp;nbsp;? 2 कदापि नहीं, हम जब पाप के लिये मर गए तो फिर आगे को उस में क्योंकर जीवन बिताएं&amp;amp;nbsp;? 3 क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का/में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का/में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? 4 सो उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''(नोट&amp;amp;nbsp;:- मूल भाषा ग्रीक/यूनानी में तथा अंग्रेजी एन.के.जे.वी. आदि में --‘का’ के स्थान पर ‘‘में’’ है।)'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मूल-पाठ के बारे में एक बड़ी बात ये है कि ये दिखाता है कि, यदि आप समझते हैं कि बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, तो आप समझते हैं कि आप के साथ वास्तव में क्या हुआ जब आप एक मसीही बने। हम में से कई लोग, विश्वास में आये और एक ऐसे बिन्दु पर बपतिस्मा दिया गया जब हम बहुत अधिक नहीं जानते थे। ये अच्छा है। ये आशा की जाती है कि मसीही चाल में बपतिस्मा पहले ही हो जाता है जब आप बहुत अधिक नहीं जानते हैं। अतः ये भी आशा की जाती है कि आप अधिक और अधिक सीखेंगे कि इसका क्या अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मत सोचिये, ‘‘ओह, मुझे वापस जाना चाहिए और पुनः बपतिस्मा लेना चाहिए। मैं नहीं जानता था कि इसका ये सब अर्थ था।’’ नहीं। नहीं। उसका ये अर्थ होगा कि प्रत्येक नये पाठ्यक्रम के साथ जो आप बाइबल-शास्त्रीय धर्मविज्ञान में लेते हैं, आपको पुनः बपतिस्मा दिया जाएगा। इसकी जगह, इस बात में आनन्द कीजिये कि यीशु के प्रति आज्ञाकारिता में आपने अपना सरल विश्वास व्यक्त किया और अब अधिक और अधिक सीख रहे हैं कि इस सब का क्या अर्थ था। वही पौलुस यहाँ कर रहा है&amp;amp;nbsp;: वो ये आशा कर रहा है कि उसके पाठक ये जानते हैं कि उनके बपतिस्मा का क्या अर्थ था, लेकिन वह आगे बढ़ता है और फिर भी उन्हें सिखाता है, हो सकता है वे न जानते हों या भूल गये हों। इन आयतों से सीखिये कि एक समय आपने परमेश्वर के समक्ष क्या चित्रित किया, और एक मसीही बनने में आपको वास्तव में क्या हुआ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं केवल दो चीजों को देखने जा रहा हूँ जो, इन आयतों के अनुसार, बपतिस्मा चित्रित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1) बपतिस्मा, मसीह की मृत्यु में हमारी मृत्यु को चित्रित करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयतें 3-4अ&amp;amp;nbsp;: ‘‘क्या तुम नहीं जानते, कि हम जितनों ने मसीह यीशु का/में बपतिस्मा लिया, तो उस की मृत्यु का/में बपतिस्मा लिया&amp;amp;nbsp;? सो उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए।’’ यहाँ पर हम मसीहियों के बारे में एक महान् सत्य है। हम मर गये हैं। जब मसीह मरा ‘वह’ हमारी मृत्यु मरा। इसका अर्थ है कम से कम दो चीजें। 1) एक यह है कि हम वही लोग नहीं हैं जो किसी समय हम थे; हमारा पुराना मनुष्यत्व मर गया है। हम वही नहीं हैं। 2) दूसरा यह है कि भविष्य की हमारी शारीरिक मृत्यु का हमारे लिए वही अर्थ नहीं होगा, जो इसका होता यदि मसीह हमारी मृत्यु न मरा होता। चूंकि हम मसीह के साथ मर गये हैं, और हमारे लिए ‘वह’ हमारी मृत्यु मरा, हमारी मौत वो भयंकर चीज नहीं होगी जो वो रही होती। ‘‘ हे मृत्यु तेरी जय कहां रही&amp;amp;nbsp;? हे मृत्यु तेरा डंक कहां रहा&amp;amp;nbsp;?’’ (1 कुरिन्थियों 15: 55-56)। उत्तर ये है कि मृत्यु का डैन्क और जय, मसीह के द्वारा निगल लिये गए हैं। विगत सप्ताह से याद कीजिये: ‘ही ड्रैन्क द टैंक’ (‘उसने’ तालाब/कुण्ड/टंकी पी लिया)। पद 3 व 4 में शब्द ‘‘में’’ के दोहराने पर ध्यान दीजिये। ‘‘मसीह यीशु में’’ बपतिस्मा लिया, और ‘‘उस की मृत्यु में’’ बपतिस्मा लिया (पद 3), और ‘‘मृत्यु में’’ बपतिस्मा लिया (पद 4अ)। जो ये कहता है वो यह कि बपतिस्मा, मसीह के साथ हमारी संयुक्ति को चित्रित करता है, अर्थात्, हम आत्मिक रूप से ‘उस’ से जुड़ गए हैं ताकि ‘उसकी’ मृत्यु हमारी मृत्यु बन जाती है और ‘उसका’ जीवन हमारा जीवन बनेगा। हम इसका अनुभव कैसे करते हैं&amp;amp;nbsp;? आप कैसे जानें यदि ये आप के साथ हुआ है&amp;amp;nbsp;? उत्तर ये है कि ये विश्वास के द्वारा अनुभव किया जाता है। आप इसे समानान्तर आयतों में सुन सकते हैं। गलतियों 2: 20, विश्वास के साथ सम्बन्ध बनाता है: ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, पर मसीह मुझ में जीवित है: और मैं शरीर में अब जो जीवित हूँ तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर/में है . . . ।’’ दूसरे शब्दों में, ‘‘मैं’’ जो मर गया, पुराना विश्वास न करने वाला, विद्रोही ‘‘मैं’’ था और ‘‘मैं’’ जो जीवित हो गया, विश्वास का ‘‘मैं’’ था -‘‘अब जो जीवन मैं जीता हूँ तो परमेश्वर के पुत्र में विश्वास के द्वारा जीता हूँ।’’ और इस सब का आधार है मसीह के साथ संयुक्ति - ‘‘मसीह मुझ में जीवित है।’’ और मैं उसमें जीवित हूँ - उसके साथ आत्मिक संयुक्ति में। ‘उसकी’ मृत्यु मेरी मृत्यु है और ‘उसका’ जीवन मेरी जिन्दगी में जिया जा रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका एक अन्य स्पष्टीकरण कुलुस्सियों 2: 6-7अ रहेगा: ‘‘सो जैसे तुम ने मसीह यीशु को प्रभु करके ग्रहण कर लिया है, वैसे ही उसी में चलते रहो और उसी में जड़ पकड़ते और बढ़ते जाओ&amp;amp;nbsp;; और जैसे तुम सिखाए गए वैसे ही विश्वास में दृढ़ होते जाओ।’’ यहाँ पुनः आप देख सकते हैं कि मसीह में विश्वास, वो मार्ग है जिससे आप मसीह के साथ संयुक्ति का अनुभव करते हैं। आप ‘उसे’ प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण करते हैं और उस विश्वास में आप ‘उस’ के साथ संयुक्त हो जाते हैं और ‘‘उसी में’’ चलते और ‘‘उसी में’’ बढ़ते जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः जब रोमियों 6: 3-4अ कहता है कि हमने मसीह में और ‘उसकी’ मृत्यु में बपतिस्मा लिया, मैं इसका ये अर्थ लेता हूँ कि बपतिस्मा उस विश्वास को व्यक्त करता है जिस में हम मसीह के साथ संयुक्तता का अनुभव करते हैं। यही संभवतः वो कारण है कि क्यों परमेश्वर ने बपतिस्मा का तरीका बनाया कि एक गाड़े जाने को चित्रित करे। ये उस मृत्यु को प्रदर्शित करता है जो हम तब अनुभव करते हैं जब मसीह के साथ संयुक्त किये जाते हैं। इसी कारण हमें डुबाया जाता है&amp;amp;nbsp;: ये एक प्रतीकात्मक गाड़ा जाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः विश्वासीगण, जान लीजिये, कि आप मर गए हैं। पुराना अविश्वास करने वाला, विद्रोही ‘‘मैं’’ मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ा दिया गया है। आपके बपतिस्मा का यही अर्थ था और अर्थ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2) बपतिस्मा, मसीह में हमारे जीवन की नवीनता को चित्रित करता है।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 4: ‘‘उस मृत्यु का/में बपतिस्मा पाने से हम उसके साथ गाड़े गए, ताकि जैसे मसीह पिता की महिमा के द्वारा मरे हुओं में से जिलाया गया, वैसे ही हम भी नए जीवन की सी चाल चलें।’’ बपतिस्मा के जल के नीचे कोई नहीं ठहरता। हम जल के बाहर ऊपर निकल आते हैं। मृत्यु के पश्चात् नया जीवन आता है। जब मैं विश्वास के द्वारा मसीह से संयुक्त किया गया, अविश्वास और विद्रोह का पुराना ‘‘मैं’’ मर गया। किन्तु जिस क्षण पुराना ‘‘मैं’’ मरा, एक नये ‘‘मैं’’ को जीवन दिया गया - एक नया आत्मिक व्यक्ति, मानो जैसे कि, मुरदों में से जिलाया गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सच्चाई पर सर्वाधिक निर्णायक टीका है, कुलुस्सियों 2: 12। पौलुस कहता है, ‘‘उसी के साथ बपतिस्मा में गाड़े गए, और उसी में परमेश्वर की शक्ति पर विश्वास करके, जिस ने उस को मरे हुओं में से जिलाया, उसके साथ जी भी उठे।’’ ध्यान दीजिये&amp;amp;nbsp;: हम मसीह के साथ जी उठे, ठीक जैसा कि रोमियों 6: 4 कहता है हम नये जीवन की चाल चलते हैं। और वहाँ परमेश्वर की शक्ति है जिस ने ‘उसे’ मरे हुओं में से जिलाया, ठीक जैसा रोमियों 6: 4 कहता है कि मसीह पिता की महिमा के द्वारा जिलाया गया। और यह परमेश्वर की शक्ति में विश्वास के द्वारा होता है जिसने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः रोमियों 6: 4 जो अस्पष्ट छोड़ देता है, उसे कुलुस्सियों 2: 12 स्पष्ट कर देता है - कि बपतिस्मा, यीशु को मरे हुओं में जिलाने में परमेश्वर की शक्ति में हमारे विश्वास को व्यक्त करता है। हम विश्वास करते हैं कि मसीह कब्र में से जीवित हो गया है और आज स्वर्ग में परमेश्वर के दाहिने हाथ पर बैठा राज्य कर रहा है, जहाँ से ‘वह’ सामर्थ्य और महिमा में पुनः आयेगा। और परमेश्वर की शक्ति - परमेश्वर की महिमा, जैसा कि पौलुस इसे बुलाता है, में वो विश्वास - ये है कि उस जीवन की नवीनता में हम कैसे हिस्सेदार होते हैं, जो मसीह स्वयँ में रखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, जीवन की नवीनता (या नये जीवन की चाल) , परमेश्वर की महिमा तथा शक्ति में विश्वास का जीवन है। ‘‘मैं मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया हूँ, और अब मैं जीवित न रहा, . . . मैं शरीर में अब जो जीवित हूं तो केवल उस विश्वास से जीवित हूँ, जो परमेश्वर के पुत्र पर/में है।’’ नये जीवन की चाल, परमेश्वर की शक्ति में - परमेश्वर की महिमा में - दिन-प्रतिदिन भरोसा रखने का जीवन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बपतिस्मा चित्रित करता है कि हमारे साथ क्या हुआ जब हम मसीही बने ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आइये हम सार प्रस्तुत करें और एक निष्कर्ष पर आयें। बपतिस्मा चित्रित करता है कि हमारे साथ क्या हुआ जब हम मसीही बने। हमारे साथ ये हुआ&amp;amp;nbsp;: हम मसीह के साथ संयुक्त किये गए। ‘उसकी’ मृत्यु हमारी मृत्यु बन गई। हम ‘उसके’ साथ मर गये। और उसी क्षण में, ‘उसका’ जीवन हमारा जीवन बन गया। अब हम हमारे अन्दर मसीह का जीवन जी रहे हैं। और ये सब विश्वास के द्वारा अनुभव किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मसीही होने का यही अर्थ है - हमारा बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, उसकी वास्तविकता में जीना&amp;amp;nbsp;: दिन-ब-दिन हम अपने से हटकर परमेश्वर को देखते हैं और कहते हैं, ‘‘आपके पुत्र, मसीह के कारण, मैं आपके पास आता हूँ। ‘उस’ में मैं आपका हूँ। मैं आपके साथ घर में हूँ। आपके साथ स्वीकरण की, ‘वह’ ही मेरी आशा है। मैं उस स्वीकरण को प्रतिदिन नया ग्रहण करता हूँ। मेरे लिए ‘उसकी’ मृत्यु और ‘उस’ में मेरी मृत्यु पर मेरी आशा आधारित है। पिता, ‘उस’ में मेरा जीवन आप में विश्वास का एक जीवन है। ‘उस’ के कारण मैं आपकी शक्ति को मेरे अन्दर और मेरे लिए विश्वास करता हूँ। वही सामर्थ्य और महिमा जो आपने ‘उसे’ मरे हुओं में से जिलाने में उपयोग की, आप मेरी सहायता करने में उपयोग करेंगे । भविष्य के अनुग्रह की उस प्रतिज्ञा में मैं विश्वास करता हूँ, और उस में मैं आशा रखता हूँ। वही है जो मेरे जीवन को नया बनाता है। हे मसीह, मेरा बपतिस्मा क्या चित्रित करता है, उसमें मैं कैसा गौरव करता हूँ&amp;amp;nbsp;! मेरी मृत्यु, मेरे लिए मरने के लिए और मुझे नया जीवन देने के लिए, आपको धन्यवाद। आमीन ।’’&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 2</title>
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				<updated>2016-03-17T20:13:41Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 2&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Passion for the Supremacy of God, Part 2}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== '''परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 1''', का पुनरवलोकन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल, हिमशिला में एक मशाल लगाने और सभी लोगों के आनन्द के लिए, सब बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन फैलाने के एक प्रयास में, मैंने एक बात स्पष्ट करने का प्रयास किया कि हर एक काम जो परमेश्वर करता है, ‘वो’ अपने नाम की महिमा के लिए करता है। परमेश्वर, परमेश्वर को आवर्धित करता (या बड़ा बनाता) है। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर के लिए सर्वाधिक धुन से भरा हृदय, परमेश्वर का हृदय है। ये मुख्य बिन्दु था। ‘पैशन 97’, जैसा कि मैं इसे समझता हूँ, परमेश्वर के लिए परमेश्वर की धुन के बारे में है। हर एक चीज जो ‘वह’ करता है, सृष्टि से लेकर समाप्ति तक, ‘वह’ अपने नाम की महिमा के प्रदर्शन और ऊंचा उठाये रखने के अभिप्राय से करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता, प्रेमरहित नहीं है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल का दूसरा बिन्दु ये था कि ये प्रेमरहित नहीं है। कारण कि परमेश्वर का स्वयँ को इस तरह ऊंचा उठाना, प्रेमरहित नहीं है, ये है, क्योंकि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर की स्तुति में मगन रहना वो है जो मनुष्य के प्राण को सन्तुष्ट करता है। ‘‘तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा&amp;amp;nbsp;; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है (भजन 16: 10)।’’ इसलिए यदि, परमेश्वर का स्वयँ को ऊंचा उठाना--इस अंश तक कि हम उसे वैसा देख सकें जैसा ‘वो’ है--हमारे प्राणों को सन्तुष्ट करता है, तब सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही वो हस्ति है जिसके लिए स्व उन्नयन सर्वोच्च सद्गुण और प्रेम का सत्व है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप इस बात में ‘उसकी’ नकल न करें। जिस अंश तक आप स्वयँ को दूसरे व्यक्ति के लिए ऊंचा उठाते हैं कि वो आप में आनन्द प्राप्त करे, उतना ही आप घृणाकारक है--प्रेममय नहीं--क्योंकि आप उनका ध्यान उस हस्ती से हटाते हैं जो उनके प्राणों को सन्तुष्ट कर सकता है। इसलिए, हम परमेश्वर की नकल ‘उसकी’ परमेश्वरता में, न करें। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही एकमात्र अद्वितीय हस्ती है, जिसके लिए स्व-उन्नयन, प्रेम का सत्व और नींव है। इसे इसी प्रकार होना ही चाहिए यदि ‘वह’ परमेश्वर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम चाह सकते हैं कि, दूसरों को केन्द्र बनाकर, ‘वह’ मानव-प्रेम जैसा प्रेम करे; लेकिन ‘वह’ ऐसा नहीं कर सकता और फिर भी परमेश्वर बना रह सकता है। ‘वह’ स्वयँ में असीम रूप से मूल्यवान् है। परमेश्वर के तुल्य दूसरा कोई नहीं है। इसीलिए ‘वह’--स्पष्टतया इसे रखें तो--किसी भी तरह आपकी आवश्यकता के बिना, भव्य व महिमामय व सर्व-समर्थ व आत्म-निर्भर होने से चिपका हुआ है। यही अनुग्रह की नींव है। यदि आप स्वयँ को अनुग्रह का केन्द्र बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह अनुग्रह बने रहना बन्द हो जायेगा। परमेश्वर-केन्द्रित अनुग्रह, बाइबल-शास्त्रीय अनुग्रह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रसन्नता इसमें नहीं है कि परमेश्वर मुझे विश्व का केन्द्र बनाये। मेरी प्रसन्नता, परमेश्वर का सदा के लिए, विश्व का केन्द्र बने रहने में है, और सनातनकाल के सब दिनों में ‘उसकी’ संगति में मुझे खींचने में, ‘उसे’ देखने में, ‘उसे’ जानने में, उस’ में आनन्दित होने में, ‘उसे’ संजोने में, ‘उस’ में सन्तुष्ट होने में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये था कल का संदेश। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मानव-जाति के लिए परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता का तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आज ... यदि अब तक जो कहा है सच है, यदि यह बाइबल-शास्त्रीय है, तब आपके जीवन के लिए एक चैंकाने वाला तात्पर्य है। ये यह है: जब आप यहाँ से जाते हैं, और आप अपनी कलीसियाओं या अपने अहातों (कैम्पस)में वापिस जाते हैं, आपको जो करना चाहिए वो ये कि ... परमेश्वर में, आप जितना सम्भव हो सकते हैं उतना प्रसन्न रहने को अपना व्यवसाय बनायें। अतः अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम में, मेरी आपको बुलाहट ये है कि उस सारी शक्ति से जो परमेश्वर सामर्थ के साथ आपके अन्दर प्रेरणा देता है, आपके सुख की खोज करने को अपना सनातन व्यवसाय बना लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन में मेरी समस्या, और जीवन में आपकी समस्या, ये नहीं है कि आप तब सुख की खोज कर रहे हैं जब आपको अवश्य है कि अपना कर्तव्य-कर्म कर रहे हों। आपकी समस्या का ये मेरा या परमेश्वर का या बाइबल का मूल्यांकन नहीं है। अपने जीवन-परिवर्तन करने वाले उपदेश में, जो ‘‘द वेट ऑफ ग्लोरी’’ कहलाता है, सी. एस. लेविस ने इसे एकदम ठीक रखा था, जब वे कहते हैं कि हमारी समस्या ये है कि हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं, ये नहीं कि हम अपने सुख की खोज बहुत उत्सुकता से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम उन बच्चों के समान हैं जो गंदी बस्तियों में मिट्टी के खिलौनों के साथ समय गँवा रहे हैं क्योंकि हम कल्पना नहीं कर सकते कि समुद्र के किनारे एक छुट्टी का दिन कैसा होता है। हमारी समस्या ये है कि हम टिन की मूर्तियों को अपने से जकड़े हुए हैं जबकि सुनहरी वास्तविकता हमारे समक्ष खड़ी हुई है। हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं। संसार के साथ समस्या सुखवाद नहीं है; जो सच में सन्तुष्ट करने वाला है, उसके लिए प्रयास करने में सुखवाद असफल है। आज सुबह का मेरा बिन्दु यह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और उसका तात्पर्य, यदि ये सच है तो, यह है कि आपको सुबह उठना चाहिए और, ‘जॉर्ज मुलर’ के समान, इससे पूर्व कि वे बाहर जाते और कुछ भी करते, कहें, ‘‘अवश्य है कि मेरा हृदय परमेश्वर में खुश हो अन्यथा मैं किसी के लिए कोई काम का नहीं रहूंगा। मैं उनका उपयोग करूंगा और उनसे मेरी ललक और मेरे खालीपन को सन्तुष्ट करने का प्रयास करूंगा।’’ यदि आप एक प्रेम के व्यक्ति बनना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोगों के लिए अपनी जिन्दगी उत्सर्ग करने के लिए आप स्वतंत्र हों, तो आपके लिए आवष्यक है कि परमेश्वर में आनन्दित रहने को अपना लक्ष्य बनायें। आज का संदेश यही है: हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने ऐसे छोटे, क्षणिक, अपर्याप्त, असन्तोषजनक भोग-विलासों से समझौता कर लिया है कि आनन्द के लिए हमारी क्षमताएँ इस बिन्दु तक ऐसी मुरझा गई हैं कि हमने आनन्दरहित कर्तव्य-कर्म को प्रभावोत्पादकता का सत्व बना दिया है ताकि हमारे अपरिवर्तित हृदयों को ऐसा छिपा लें जो परमेश्वर द्वारा प्रेरित नहीं हो सकते। आप देखिये कि ये कितना पलायनवादी है&amp;amp;nbsp;? मैं आज सुबह, ‘स्टोइक्स’ (एक दार्शनिक) और ‘इमानुएल कान्त’ के विरोध में एक मुहिम पर हूँ, ‘एनलाइटनमेन्ट’ (ज्ञानोदय) का दार्षनिक, जिसने कहा है कि जिस अंश तक आप किसी नैतिक कार्य में अपना लाभ खोजते हैं, उतना आप इसकी प्रभावोत्पादकता को धूमिल करते हैं। यह बाइबल में नहीं है … और ये हर जगह आराधना, प्रभावोत्पादकता, साहस, और परमेश्वर-केन्द्रता को नष्ट करता है। ये मनुष्य को ऊंचा उठाता है, वो धर्मात्मा जो बिना इस लक्ष्य के कि परमेश्वर उसके प्राण को सन्तुष्ट करे, अपने कर्तव्य-कर्म को पूरा करता है। इस पर छिः&amp;amp;nbsp;! ऐसा हो कि ये हमारे हृदयों से सदा के लिए निकल जाये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुसमाचारीय वायुमण्डल में जो टंगा रहता है, मैं उसके विरूद्ध एक मुहिम पर हूँ। लगभग 25 साल पहिले मैंने ये मुहिम छेड़ी थी, और तब से, मेरे परिवार को इसमें उठाने, इस पर एक कलीसिया निर्मित करने, इस बारे में पुस्तकें लिखने का प्रयास करते हुए, इसे जीने का प्रयास करते हुए, मैं इसमें लगा हुआ हूँ। थोड़ी-थोड़ी आपत्तियाँ आती हैं। इसी तरह आप बढ़ते हैं। आप में से बहुतेरों ने मुझ से कहा है कि इस सम्मेलन के द्वारा आपकी दुनिया बदल रही है। प्रतिमान हिलाये जा रहे हैं। ‘कॉपरनिकस’ की क्रान्तियाँ क्षितिज में हैं, और यही वो तरीका है जिससे आप बदलना आरम्भ करते हैं। इसमें 15 साल लग सकते हैं ... आपत्ति पर आपत्ति। 1968 में मैंने डॉन फुलर, और सी. एस. लेविस, और जोनाथन एडवर्ड, और राजा दाऊद, और सन्त पौलुस, और यीशु मसीह की सहायता से इन कुछ चीजों को देखना आरम्भ किया। और जिस तरह से कि मेरा दिमाग काम करता है, ये है कि एक के बाद दूसरी आपत्ति आती है और मैं दुबक जाता हूँ, और तब मैं बाइबल में जाता हूँ और रोता और चिल्लाता और संघर्ष करता और पूछता और प्रार्थना करता और बात करता हूँ। तब थोड़ा-थोड़ा करके ये आपत्तियाँ, दर्शन को चमका देती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आपत्तियाँ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको अपने सम्पूर्ण मन और दिमाग और प्राण और शक्ति से, आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए। या ये ध्यान खींचने का, जॉन पाइपर की चतुर उपदेश-कला का तरीका मात्र है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#आत्म-त्याग के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? क्या यीशु ने नहीं कहा, ‘‘यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे तो अपने आप का इन्कार करे&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
#क्या यह भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं देता&amp;amp;nbsp;? क्या ऐसा नहीं है कि मसीहियत तत्वतः इच्छा की बात है, जिसके द्वारा हम वचनबद्ध होते और निर्णय लेते हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#परमेश्वर की सेवा, एक कर्तव्य-कर्म के रूप में करने की महान् विचारधारा का क्या होता है, जबकि ये कठिन है और आप इसे करना नहीं चाहते&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#क्या ये मुझे--और परमेश्वर को नहीं--चीजों के केन्द्र में नहीं रखती&amp;amp;nbsp;?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आपत्तियों का उत्तर देना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर है हाँ, और ये ऐसा, कम से कम चार तरह से करती है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अ) आज्ञाओं से।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भजन 37: 4 पर विचार कीजिये - ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान।’’ ये एक सुझाव नहीं है, ये एक आज्ञा है। यदि आप विश्वास करते हैं कि ‘‘तू व्यभिचार न करना’’ कुछ ऐसा है जिसका आपको पालन करना है, तब आपको, ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान,’’ का भी पालन करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा भजन 32: 11, ‘‘हे धर्मियो, यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालो आनन्द से जयजय- कार करो।’’ अथवा भजन 100, ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो।’’ ये एक आज्ञा है: ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो!’’ जिस अंश तक आप इसके प्रति उदासीन हैं कि चाहे आप प्रभु की सेवा आनन्द के साथ करते हैं अथवा नहीं, उतने अंश तक ही आप परमेश्वर के प्रति उदासीन हैं। ‘उसने’ आप से कहा है कि आपको ‘उसकी’ सेवा आनन्द के साथ करना आवष्यक है। अथवा फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूं आनन्दित रहो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे सम्पूर्ण बाइबल में हैं। हम आज्ञाओं की बात कर रहे हैं। ये पहिला तरीका है जिससे बाइबल इसे सिखाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब) आशंकाओं से।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘जेरेमी टेलर’ ने एक बार कहा, ‘‘यदि हम आनन्दित न रहें तो परमेश्वर हमें भयंकर बातों की आशंका बताता है।’’ जब मैंने पहिली बार इसे सुना तो मैंने सोचा कि ये चतुराई है। ये चतुराई नहीं है ... ये व्यवस्थाविवरण से 28: 47 से एक उद्धरण है, और विनाशकारी है। ‘‘क्योंकि तू ने आनन्द और प्रसन्नता के साथ अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा नहीं की, इस कारण तुझे अपने उन शत्रुओं की सेवा करनी पड़ेगी जिन्हें यहोवा तेरे विरुद्ध भेजेगा।’’ परमेश्वर भयंकर बातों की आशंका बताता है, यदि हम ‘उस’ में आनन्दित न रहें। क्या यह सुखवाद के लिए एक आज्ञा-पत्र है या कुछ और&amp;amp;nbsp;? क्या यह आज्ञा-पत्र है, परमेश्वर में अपने आनन्द की खोज अपनी भरपूर शक्ति से करने को, अपनी जिन्दगी का उद्यम बनाने का&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स) यीशु में, परमेश्वर वो सब जो आपके लिए है, उससे अनिवार्यतः सुन्तुष्ट हो जाने के रूप में उद्धार देने वाले विश्वास को प्रस्तुत करने के द्वारा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, इब्रानियों 11: 6:- ‘‘विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।’’ यदि आपको परमेश्वर को प्रसन्न करना है तो आपके पास विश्वास होना चाहिए। विश्वास क्या है&amp;amp;nbsp;? एक ऐसे के पास आना, जो ठीक-ठीक गहरे दृढ़-विश्वास के साथ है, कि आने के लिए वह मुझे प्रतिफल देने जा रहा है। यदि आप ये विश्वास नहीं करते, अथवा यदि आप परमेश्वर के पास किसी अन्य कारण से जाते हैं, आप परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, यूहन्ना 6: 35 लीजिये: यीशु कहते हैं, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा।’’ इस पद ध्यान दीजिये: जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा। विश्वास के बारे में इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? विश्वास क्या है&amp;amp;nbsp;? यूहन्ना के धर्मविज्ञान में, विश्वास, हमारे प्राणों की सन्तुष्टि के लिए यीशु के पास आना है, ऐसा कि कुछ और सन्तुष्ट नहीं कर सकता। वो है विश्वास। जिसके बारे में मैं बातें कर रहा हूँ, विश्वास उसके सिवाय और कुछ नहीं है। मैं आधार-भूत मसीहियत को ऐसी भाषा में खोल रहा हूँ जिससे आप कम परिचित हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द) पाप को, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने के पागलपन के रूप में, परिभाषित करने के द्वारा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाप, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने का पागलपन है। मूल-पाठ ये है: यिर्मयाह 2: 12-13:- ‘‘हे आकाश, चकित हो, बहुत ही थरथरा और सुनसान हो जा, यहोवा की यह वाणी है। क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयां की हैं: उन्हों ने मुझ बहते जल के सोते को त्याग दिया है, और, उन्हों ने हौद बना लिए, वरन ऐसे हौद जो टूट गए हैं, और जिन में जल नहीं रह सकता।’’ मुझसे कहिये, बुराई क्या है&amp;amp;nbsp;? बुराई की परिभाषा, वो जो विश्व को विस्मित करती है, जो परमेश्वर के स्वर्गदूतों को कहने को मजबूर करती है, ‘‘नहीं&amp;amp;nbsp;! ये नहीं हो सकता&amp;amp;nbsp;!’’ ... ये क्या है&amp;amp;nbsp;? ये सर्व-सन्तुष्टि प्रदान करने वाले, जीवित जल के सोते, परमेश्वर की ओर देख रही है, और कह रही है ‘‘नहीं, धन्यवाद,’’ और टेलीविज़न, यौन, पार्टियों, नशाखोरी, पैसा, मान-सम्मान, उपनगर में एक मकान, एक छुट्टी, एक नये कम्प्यूटर कार्यक्रम की ओर मुड़ रही है, और कह रही है ‘‘हाँ!’’ ये पागलपन है&amp;amp;nbsp;! और यिर्मयाह 2: 12 के अनुसार, ये सम्पूर्ण स्वर्ग को चकित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कम से कम, उन चार तरीकों से, बाइबल कहती है कि ‘जॉन पाइपर’ आज सुबह सच्चाई सिखा रहा है जब वह कहता है कि परमेश्वर में आपके सन्तोष की खोज को अपनी जिन्दगी अर्पित करो। अतः आपत्ति क्रमांक 1 निरस्त हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. आत्म-त्याग के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या यीशु ने मरकुस 8: 34 में नहीं कहा ‘‘जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।’’ क्रूस वो स्थान है जहाँ आप मरते हैं, प्राणदण्ड का स्थान। ये एक चिड़चिड़ी सास, या एक खराब कक्ष-साथी, या आपके हड्डियों में का कोई रोग नहीं है। ये अपने आपे या स्वयँ की मृत्यु है। अतः ‘पाइपर’, एक आजीवन -व्यवसाय के रूप में, अपने प्राणों की सन्तुष्टि की खोज में लगे रहने के लिए, हमें बुलाने में, आप विधर्मी हैं। मैंने इसे महसूस किया ... और फिर मैंने शेष आयत को पढ़ा (कभी-कभी, संदर्भों को पढ़ना सहायता करता है): ‘‘क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।’’ यहाँ तर्क क्या है&amp;amp;nbsp;? उन आयतों में यीशु का तर्क क्या है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर्क ये है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘ओ मेरे चेलो, अपना जीवन मत खो। अपना जीवन मत खो। अपना जीवन बचाओ&amp;amp;nbsp;! अपना जीवन बचाओ&amp;amp;nbsp;!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘कैसे&amp;amp;nbsp;? ... कैसे यीशु&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘इसे खो दो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘मैं इसे समझ नहीं पा रहा ... यीशु मैं इसे समझ नहीं पा रहा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘मेरा अर्थ ये है-- मेरे चेलो, मेरे प्रियो--इस अर्थ में अपना जीवन खो दो कि मेरे सिवाय तुम सब कुछ खो दो। ‘जब तक गेहूँ का एक दाना भूमि में गिरकर मरता नहीं, ये अकेला रहता है। लेकिन यदि यह मरता है, ये बहुत फल लाता है।’ संसार के प्रति मर जाओ। मान-सम्मान के प्रति मर जाओ, धन के प्रति मर जाओ, पापमय यौन के प्रति मर जाओ, आगे बढ़ने के लिए छल के प्रति मर जाओ, अपने को प्रमाणित करने के लिए लोगों की आवश्यकता के लिए मर जाओ। मर जाओ, और मुझे पा लो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। स्वयँ टिन का इन्कार करो कि सोना पाओ। एक चट्टान पर खड़े होने के लिए, स्वयँ रेत का इन्कार करो। वाइन पाने के लिए, स्वयँ खारे पानी का इन्कार करो। कोई चरम आत्म-त्याग नहीं है, न ही यीशु का कभी उस तरह का अर्थ था। मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं यीशु से यीशु के बारे में इस वचन में विश्वास करता हूँ: मत्ती 13: 44। ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के, जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।’’ आप उसे आत्म-त्याग कहते हैं&amp;amp;nbsp;? हाँ&amp;amp;nbsp;! उसने सब कुछ बेच दिया। उसने सब वस्तुओं को कूड़ा और रद्दी-माल समझा ताकि वह मसीह को प्राप्त करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, हाँ ये आत्म-त्याग है; और नहीं, ये आत्म-त्याग नहीं है। एक स्वयँ (हमारा पुराना मनुष्यत्व) है जिसे क्रूसित होना चाहिए: वो स्वयँ जो संसार से प्रेम करता है। परन्तु नया मनुष्यत्व--वो मनुष्यत्व जो सब चीजों से ऊपर मसीह से प्रेम करता है और ‘उसमें’ अपना सन्तोष ढूँढता है--उस मनुष्यत्व को मत मारिये। वो नयी सृष्टि है। उस मनुष्यत्व को परमेश्वर से तृप्त कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं उस आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ जिसे वो जवान शासक नहीं समझ सका, किन्तु जिसे यीशु ने उस क्षण सिखाया: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘हे जवान पुरुष, जा, जो तेरे पास है सब कुछ बेच दे; और आकर मेरे पीछे हो ले और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा।’’ और वो ये नहीं करेगा। और यीशु ने चेलों से कहा, ‘‘एक धनवान के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना वास्तव में कठिन है&amp;amp;nbsp;! स्वर्ग के राज्य में धनी लोगों के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है&amp;amp;nbsp;!’’ तब चेले नितान्त अचभ्भित हुए, और उन्होंने कहा, ‘‘तो फिर किसका उद्धार हो सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ और यीशु ने कहा, ‘‘मनुष्यों से यह असम्भव है। किसी के पास वो मन अपने आप से नहीं हो सकता, जिसके लिए मैं बुला रहा हूं। किन्तु परमेश्वर के साथ,’’ ‘वह’ कहता है, ‘‘सब कुछ सम्भव है।’’ और तब पतरस चिंघाड़ता है, ‘‘हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं। हमारे बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? हमने वास्तव में त्याग किया।’’ और यीशु प्रत्युत्तर देते हैं--काश मैं ‘उसकी’ आवाज का स्वर जान पाता--और कहा, ‘‘पतरस, कोई ऐसा नहीं है जिसने मेरी ख़ातिर अपना घर या माता या पिता या भाइयों या बहिनों या जमीन या बच्चे छोड़ दिया हो और जो सौ गुना माताएँ, बहिनें, भाईयों, जमीनें, और बच्चे इस जीवन में--क्लेशों के साथ--वापिस न पाये-- और आने वाले युग में , अनन्त जीवन। तुम किसी भी चीज का त्याग नहीं कर सकते जिसे तुम्हें हजार गुना लौट न दिया जायेगा। अपने ऊपर दया मत खाना जब मेरे लिए तुम्हारे सिर धड़ से काट कर अलग कर दिये जावें’’ (देखिये, मरकुस 10: 17-31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाँ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं हर उस चीज का स्वयँ के लिए इन्कार करने में विश्वास करता हूँ जो, परमेश्वर में मेरी पूरी सन्तुष्टि के मार्ग में खड़ी होती है, और इसी तरह मैं समझता हूँ कि आत्म-त्याग से बाइबल का क्या अर्थ है। मैं विश्वास करता हूँ कि ‘डेविड लिविंगस्टोन’ और ‘हडसन टेलर’--ये महान् सुसमाचार-प्रचारक--अपनी जिन्दगियों के अन्त में आने पर और अपनी पत्नियों तथा स्वास्थ्य और सब कुछ खोकर सिवाय एक चीज के, कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्रों और सब जगह लोगों को कह सकें कि, ‘‘मैंने कभी कोई बलिदान नहीं किया,’’ पूर्णतया सही थे। ये सही है&amp;amp;nbsp;! मैं जानता हूँ कि उनका क्या अर्थ है और आप जानते हैं कि उनका क्या अर्थ है। और मैं विश्वास करता हूँ कि ‘जिम एल्यिोट’ जिसने एक जवान पुरुष के रूप में अपना जीवन अर्पित कर दिया, ये कहने में पूर्णतया ठीक था कि, ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो वो दे देता है जिसे वह रख नहीं सकता, ताकि वो प्राप्त करे जिसे वह खो नहीं सकता।’’ यही है जो मैं आत्म-त्याग के बारे में विश्वास करता हूँ। अतः आपत्ति क्रमांक 2 ख़ारिज हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. क्या आप मनोभाव/भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं दे रहे हैं&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या मसीहियत, मूलतः निर्णय नहीं है&amp;amp;nbsp;? इच्छा की वचनबद्धता&amp;amp;nbsp;? क्या मनोभाव मात्र, केक के ऊपर बाद में आने वाली, वैकल्पिक, आइसिंग नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? ‘पाइपर’, मैं सोचता हूँ, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत करने का तरीका, मनोभावों को एक गैर-बाइबल-शास्त्रीय श्रेष्ठता के स्थान तक ऊंचा उठाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन तब मैं बाइबल पढ़ता हूँ--जब आप एक तर्क-वितर्क में हों, बाइबल पढ़ना सहायता करता है--और मैंने देखा किः &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें आनन्द की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में आनन्दित रहो।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें आशा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: भजन 42: 5, ‘‘परमेश्वर पर आशा लगाये रह।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें भय की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: लूका 12: 5, ‘‘उसी से डरो जो प्राण और शरीर दोनों, नरक में डाल सकता है।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें शान्ति की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: ‘‘मसीह की शान्ति तुम्हारे हृदयों में राज्य करे’’ (कुलुस्सियों 3: 15)।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें जोश की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 11, ‘‘आत्मिक उन्माद में भरे रहो (अक्षरश ‘उबलो’) प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’ ये वैकल्पिक नहीं है, ये केक की आइसिंग करना नहीं है। ये एक आज्ञा है&amp;amp;nbsp;!''' ‘‘प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें दुःख की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 15, ‘‘रोनेवालों के साथ रोओ।’’ आपके पास कोई''' विकल्प नहीं है। आपको रोना ही होगा, जो रोते हैं उनके साथ आपको रोने की अनुभूति करना ही होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें इच्छा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: 1 पतरस 2: 2, ‘‘वचन के निर्मल आत्मिक दूध की लालसा रो।’’ ये एक विकल्प नहीं है। आप नहीं कह सकते कि, ‘‘ठीक है, लेकिन मैं पर्याप्त इच्छा जगा नहीं सकता, अतः मैं इसका पालन कैसे कर सकता हूँ&amp;amp;nbsp;? ये वास्तव में एक आज्ञा नहीं हो सकती।’’ गलत&amp;amp;nbsp;! हाँ, आप अपनी इच्छा से इन अनुभूतियों को चालू या बन्द नहीं कर सकते। नहीं, वे अब भी जिम्मेदारियाँ हैं। वहाँ हमारी निराशाजनक स्थिति पायी जाती है, जिसके बारे में हमने विगत रात्रि सुना था। ''' हर एक चीज जो मैं आपसे कह रहा हूँ कि आपको अभी करने की आज्ञा दी जाती है, उसे आप, इच्छा-शक्ति या निर्णय, या वचनबद्धता के द्वारा, इसी क्षण में नहीं कर सकते हैं। आप इसे केवल चमत्कार के द्वारा कर सकते हैं। क्या आप निराश नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? क्या ये एक निराशाजनक चीज नहीं है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा आपको वो करने को कहा जावे जो आप नहीं कर सकते&amp;amp;nbsp;? यदि आपके हृदय ठीक थे आप उन्हें करते। हम भ्रष्ट हो गये हैं और हमें आज्ञा दी गई है कि कोमल-हृदयता की अनुभूति करें: ‘‘कोमल-हृदय होकर, एक-दूसरे पर दया करो।’’ आप मात्र ये नहीं कह सकते कि क्षमा का अर्थ है, ‘‘आई एम सॉरी’’ कह देना। आपको इसकी अनुभूति करना ही होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें कृतज्ञता की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: एक बच्चे को लीजिये, जिसे क्रिसमस की सुबह दादी से एक उपहार मिलता है ... और ये काले मोजे/जुराबें हैं&amp;amp;nbsp;! ईक&amp;amp;nbsp;! काले मोजे तो छोड़ दीजिये, कोई भी बच्चा क्रिसमस के लिए मोजे नहीं पाना चाहता। और तब आप कहते हैं, ‘‘अपनी दादी को धन्यवाद कहो।’’ और फिर वो बच्चा कहता है, ‘‘मोजों के लिए धन्यवाद।’’ ये वो नहीं है जिसके बारे में बाइबल बता रही है। बच्चा उसे अपनी इच्छा-शक्ति से कर सकता है। किन्तु वह उन मोजों के लिए इच्छा-शक्ति से कृतज्ञता का बोध नहीं कर सकता। न ही आप अपनी इच्छा-शक्ति के द्वारा, इफिसियों 5: 20 की आज्ञा कि ‘‘सदा सब बातों के लिए ... धन्यवाद करते रहो,’’ के अनुरूप परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति कर सकते हैं। तब ठीक है, हम तो निरुपाय हैं, जब तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य न करे।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपत्ति क्रमांक 3&amp;amp;nbsp;? मैं इसे मोल नहीं लेता। मैं विश्वास नहीं करता कि मैं अनुरागों और अनुभूतियों और मनोभावों को उससे ऊंचा उठा रहा हूँ जितना कि बाइबल उठाती है। मैं सोचता हूँ कि मैं उन्हें वहाँ से पुनः-स्थापित कर रहा हूँ जहाँ से एक निर्णयात्मक, प्रतिबद्धता से लदी, इच्छा-शक्ति, हम-इसे-कर-सकते हैं अमेरिकी धर्म ने, उन्हें गिरा दिया, क्योंकि वे हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. परमेश्वर की सेवा करने के महान् दर्शन के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या परमेश्वर की सेवा करना एक कर्तव्य-कर्म नहीं है&amp;amp;nbsp;? ‘पाइपर’, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत के तरीके में तो ये सेवा ध्वनित नहीं होती। ये बिल्कुल भी उस सेवा के समान ध्वनित नहीं होती--कर्तव्यपरायण, परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने की चुनौती तक उठने वाली सेवा--जबकि यह कठिन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका प्रत्युत्तर देना मैंने अब सीख लिया है, ‘‘आइये हम कुछ मूल-पाठों को देखें जो सेवकपन के रूपक को आकार देते हैं।’’ परमेश्वर के प्रति आपके सम्बन्ध के बारे में रूपक-अलंकार, चाहे ये एक सेवक के रूप में है, या पुत्र या पुत्री, या मित्र, सभी अपने में अवयव रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया है, असत्य होंगे। वे अपने में वे अवयव भी रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया, सत्य होंगे। अब, सेवकपन के अनुरूपता में, क्या असत्य है और क्या सत्य है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूल-पाठ जो इन दो को पृथक करने में आपकी सहायता करते हैं ताकि जब आप सेवा करते हैं आप निन्दा न करें&amp;amp;nbsp;; वे मूल-पाठ हैं, जैसे कि प्रेरित 17: 25:-‘‘परमेश्वर, न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है।’’ साथियो, परमेश्वर सेवा नहीं लेता। सावधान रहिये। ‘वह’ ऐसी सेवा नहीं लेता मानो कि ‘उसे’ आपकी या आपकी सेवा की आवश्यकता थी। ‘उसे’ आवश्यकता नहीं है। अथवा मरकुस 10: 45 के समान एक मूल-पाठ लीजिये: ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे।’’ ‘वह’ सेवा करवाने नहीं आया। सावधान्&amp;amp;nbsp;! सावधान्&amp;amp;nbsp;! यदि आप उसकी सेवा करने का जिम्मा उठाते हैं तो आप ‘उसके’ उद्देश्य को लांघते हैं&amp;amp;nbsp;! यद्यपि ये व्याकुल करने वाला है, क्या ऐसा नहीं है। पौलुस ने लगभग सभी पत्रियों में स्वयँ को प्रभु का सेवक कहा है। और यहाँ प्रेरित 17: 25 और मरकुस 10: 45 में, ये कहता है कि परमेश्वर की सेवा नहीं की जाती और ये कि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए। एक प्रकार की सेवा अवश्य होगी जो बुरी है और एक प्रकार की सेवा जो भली है। भली सेवा क्या है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भली या उत्तम सेवा 1 पतरस 4: 11 है:- ‘‘यदि कोई सेवा करे, तो उस शक्ति से करे जो परमेश्वर देता है; जिस से सब बातों में परमेश्वर की महिमा हो।’’ परमेश्वर की सेवा मानवीय हाथों से नहीं होती, मानो ‘उसे’ किसी चीज की आवश्यकता थी। आराधना करने, पर्चे टाइप करने, सम्भाषणों को सुनने, एक कार चलाने, बच्चे की नेपकिन बदलने, एक उपदेश का &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रचार करने के लिए, आपको एक तरीका खोजना होगा, इस तरह कि आप सदैव प्राप्त करने वाले हैं। क्योंकि देने वाले को महिमा प्राप्त होती है, और पाने वाले को आनन्द प्राप्त होता है। जिस भी समय हम प्रेरित 17: 25 को लांघते हैं-- ‘‘परमेश्वर, मनुष्यों के हाथों की सेवा नहीं लेता (जैसे की मानो ‘वह’ एक प्राप्त करने वाला हो,) मानो ‘उसे’ किसी वस्तु का प्रयोजन हो।’’--हम निन्दा करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सम्मेलन के अगुओं के समूह को, सेवा के बारे में, मत्ती 6: 24 से, मैंने कल एक दृष्टान्त दिया था, जहाँ ये कहता है, ‘‘तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते, या तो तुम एक से घृणा करोगे और दूसरे से प्रेम रखोगे। या तुम एक के प्रति भक्त रहोगे और दूसरे को तुच्छ जानोगे। तुम परमेश्वर और पैसा दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ तो यहाँ हम सेवा की बात कर रहे हैं। आप पैसे की सेवा कैसे करते हैं&amp;amp;nbsp;? आप पैसे की सेवा, पैसे की आवश्यकताओं को पूरी करते हुए नहीं करते&amp;amp;nbsp;? अपनी सारी ऊर्जा और समय और प्रयत्न से, अपनी जिन्दगी को निरन्तरता में ढालते हुए, आप पैसे की सेवा करते हैं, ताकि पैसे से लाभ पायें। आपका दिमाग इस बात से घूमता रहता है कि कैसे चतुर निवेश किया जावे, कैसे सर्वोत्तम लेन-देन ढूँढा जावे, जहाँ निम्न है वहाँ कैसे निवेश किया जावे ताकि ये ऊंचा जाये, और आप इसमें लिप्त रहते हैं कि रुपया से कैसे लाभ पायें, क्योंकि रुपया आपका स्रोत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरीके से आप पैसे की सेवा करते हैं यदि उसके बारे में ये सच है, तो आप परमेश्वर की सेवा किस तरह करते हैं&amp;amp;nbsp;? ये बिल्कुल समान है: आप अपने आप को विशिष्ट मुद्रा में लाते हैं, अपनी जिन्दगी को युक्ति-चालन में लाते हैं, और शक्ति व यत्न व समय व सृजनात्मकता अर्पित करते हैं ताकि स्वयँ को परमेश्वर की आशीष के निरन्तर झरने के नीचे ले आयें, जिससे कि ‘वह’ स्रोत बना रहे और आप एक खाली प्राप्तकर्ता बने रहें। आप लाभभोगी बने रहते हैं, ‘वह’ हितकारी बना रहता है; आप भूखे बने रहते हैं, ‘वह’ रोटी बना रहता है; आप प्यासे बने रहते हैं, ‘वह’ जल बना रहता है। आप कभी भी उलट-भूमिका का, परमेश्वर के ऊपर निन्दा लाने वाला काम न करें। हमें सेवा करने का एक मार्ग इस तरह का खोजना होगा जो उस ताकत में है जिसकी आपूर्ति परमेश्वर करता है। जब मैं सेवा कर रहा हूँ, मैं प्राप्त करने वाले छोर पर हूँ। अन्यथा मैं परमेश्वर को लाभभोगी की स्थिति में रखता हूँ&amp;amp;nbsp;; मैं उसका हितकारी बन जाता हूँ, और अब मैं परमेश्वर हूँ। और, संसार में ऐसे बहुतेरे धर्म हैं। अतः आपत्ति 4 निरस्त होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''5. क्या आप स्वयँ को केन्द्रीय नहीं बना रहे हैं&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘आप, आपके आनन्द और आपके सुख की खोज में लगे रहने की बात करते हैं। आप, कर्तव्य-कर्म के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो जो हमने सदा से जाना है, उससे कुछ अलग है, और आप कहते हैं कि हमें सेवा के बारे में सावधान रहना अवश्य है। ये मुझे ऐसा ध्वनित होता है जैसे मात्र स्वयँ को केन्द्रीय बनाने के लिए आप बाइबल-शास्त्रीय भाषा को युक्ति- चालन से मोड़ रहे हैं।’’ ये सबसे विध्वंसकारी आलोचना होगी, क्या नहीं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर यहाँ है: दिसम्बर 21 को मेरे विवाहित जीवन के 28 साल हो जायेंगे। मैं ‘नोएल’ से बहुत प्रेम करता हूँ। हम एक-साथ बहुत से समयों से गुजरे हैं, वास्तविक कठिन समयों और वास्तविक अच्छे समयों से। हमने अपने किशोरवय के बच्चों को, किशोरावस्था के अविश्वसनीय रूप से कठिन वर्षों में से जाते देखा है। मैं बहुत सरलता से रो देता हूँ जब मैं अपने बेटों और अपनी छोटी लड़की के बारे में सोचता हूँ। मान लीजिये कि 21 दिसम्बर को मैं लम्बी डंडी वाले 28 लाल गुलाबों को मेरी पीठ के पीछे छुपा कर लाया और द्वार पर लगी घंटी बजाया। ‘नोएल’ दरवाजे पर आती है, और इस बारे में थोड़ी विचलित दिखती है कि मैं अपने ही घर की घंटी क्यों बजा रहा था, और मैं गुलाबों को बाहर कालता हूँ और कहता हूँ, ‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’ और वो कहती है, ‘‘जॉनी, वे सुन्दर हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन तुम&amp;amp;nbsp;?’’ और मैं कहता हूँ, ‘‘ये मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गलत उत्तर। आइये, हम इसे वापिस पलटायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; (डिंग-डांग) &amp;lt;br&amp;gt; --‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’&amp;lt;br&amp;gt; --‘ जॉनी, वे सुन्दर हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन तुम क्यों&amp;amp;nbsp;?’’&amp;lt;br&amp;gt; --‘‘और कोई चीज मुझे इससे अधिक खुश नहीं करती जितना कि तुम्हारे लिए गुलाब खरीदना। वास्तव में, तुम जाकर क्यों नहीं कपड़े बदलती, क्योंकि मैंने एक, बच्चों की देखभाल करने वाली, का प्रबंध किया है और आज रात्रि हम जाकर कुछ विशेष करेंगे, क्योंकि आज रात्रि मैं और कुछ नहीं करूंगा सिर्फ इसके कि तुम्हारे साथ संध्या व्यतीत करूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सही उत्तर। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्यों&amp;amp;nbsp;? वो क्यों ऐसा नहीं कहेगी, ‘‘तुम सर्वाधिक स्वार्थी मसीही सुखवादी हो, जिससे मैं कभी मिली हूँ&amp;amp;nbsp;! तुम सदैव जो भी सोचते हो वो ये कि तुम्हें क्या खुश करता है&amp;amp;nbsp;!’’ यहाँ क्या चल रहा है&amp;amp;nbsp;? क्यों ‘ड्यूटी’, गलत उत्तर है और ‘प्रसन्नता’ सही उत्तर है&amp;amp;nbsp;? क्या आप समझे&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि आप इसे समझ गये तब आप ने इसे पा लिया, और मैं मीनियापोलीस वापिस जाकर परमेश्वर की स्तुति कर सकता हूँ। मेरी पत्नी मुझ में सर्वाधिक महिमित है जब मैं उस में सर्वाधिक सन्तुष्ट हूँ। यदि मैं, हमारे सम्बन्ध को एक सेवा-सम्बन्ध में बदलने का प्रयास करता हूँ, एक ऐसा ड्यूटी-सम्बन्ध, जहाँ मैं अपनी पत्नी में अपने सुख की खोज में न लगा रहूँ, उसका अनादर होगा ... और इसी तरह परमेश्वर का भी। जब आप स्वर्ग में जायें और पिता आपकी ओर देखते और कहते हैं, ‘‘तुम यहाँ क्यों आये हो&amp;amp;nbsp;? तुमने मेरे लिए अपना जीवन क्यों न्योछावर कर दिया&amp;amp;nbsp;?’’ बेहतर हो कि आप न कहें, ‘‘यहाँ आना मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) था, क्योंकि मैं एक मसीही हूँ।’’ बेहतर हो आप कहें, ‘‘मैं और कहाँ जाना चाहूंगा&amp;amp;nbsp;? और किस की ओर मैं मुड़ सकता यशायाह था&amp;amp;nbsp;? आप मेरे प्राणों की लालसा हैं&amp;amp;nbsp;!’’ और ये सम्मेलन इसी के बारे में है। ये सम्मेलन दो महान् चीजों के बारे में है, जो यशायाह 26: 8 से 268 पीढ़ी में, एक साथ आती हैं: ये परमेश्वर की धुन है ‘उसके’ नाम और ख्याति के लिए और मेरे हृदय की धुन कि मेरी सभी इच्छाओं में सन्तुष्ट रहूँ। विश्व में ये दो अटल चीजें हैं। और मैं क्या आशा करता हूँ कि आपने ये देख लिया है कि वे एक हैं, क्योंकि परमेश्वर और ‘उसका’ नाम और ‘उसकी’ ख्याति, मुझमें सर्वाधिक महिमित होते हैं जब मैं ‘उसमें’ सर्वाधिक सन्तुष्ट होता हूँ।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 2</title>
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				<updated>2016-03-17T20:12:05Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Passion for the Supremacy of God, Part 2}}   ==== '''परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 1''', का पु...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Passion for the Supremacy of God, Part 2}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== '''परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग 1''', का पुनरवलोकन ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल, हिमशिला में एक मशाल लगाने और सभी लोगों के आनन्द के लिए, सब बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन फैलाने के एक प्रयास में, मैंने एक बात स्पष्ट करने का प्रयास किया कि हर एक काम जो परमेश्वर करता है, ‘वो’ अपने नाम की महिमा के लिए करता है। परमेश्वर, परमेश्वर को आवर्धित करता (या बड़ा बनाता) है। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर के लिए सर्वाधिक धुन से भरा हृदय, परमेश्वर का हृदय है। ये मुख्य बिन्दु था। ‘पैशन 97’, जैसा कि मैं इसे समझता हूँ, परमेश्वर के लिए परमेश्वर की धुन के बारे में है। हर एक चीज जो ‘वह’ करता है, सृष्टि से लेकर समाप्ति तक, ‘वह’ अपने नाम की महिमा के प्रदर्शन और ऊंचा उठाये रखने के अभिप्राय से करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता, प्रेमरहित नहीं है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल का दूसरा बिन्दु ये था कि ये प्रेमरहित नहीं है। कारण कि परमेश्वर का स्वयँ को इस तरह ऊंचा उठाना, प्रेमरहित नहीं है, ये है, क्योंकि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर की स्तुति में मगन रहना वो है जो मनुष्य के प्राण को सन्तुष्ट करता है। ‘‘तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा&amp;amp;nbsp;; तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है (भजन 16: 10)।’’ इसलिए यदि, परमेश्वर का स्वयँ को ऊंचा उठाना--इस अंश तक कि हम उसे वैसा देख सकें जैसा ‘वो’ है--हमारे प्राणों को सन्तुष्ट करता है, तब सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही वो हस्ति है जिसके लिए स्व उन्नयन सर्वोच्च सद्गुण और प्रेम का सत्व है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप इस बात में ‘उसकी’ नकल न करें। जिस अंश तक आप स्वयँ को दूसरे व्यक्ति के लिए ऊंचा उठाते हैं कि वो आप में आनन्द प्राप्त करे, उतना ही आप घृणाकारक है--प्रेममय नहीं--क्योंकि आप उनका ध्यान उस हस्ती से हटाते हैं जो उनके प्राणों को सन्तुष्ट कर सकता है। इसलिए, हम परमेश्वर की नकल ‘उसकी’ परमेश्वरता में, न करें। सम्पूर्ण विश्व में परमेश्वर ही एकमात्र अद्वितीय हस्ती है, जिसके लिए स्व-उन्नयन, प्रेम का सत्व और नींव है। इसे इसी प्रकार होना ही चाहिए यदि ‘वह’ परमेश्वर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम चाह सकते हैं कि, दूसरों को केन्द्र बनाकर, ‘वह’ मानव-प्रेम जैसा प्रेम करे; लेकिन ‘वह’ ऐसा नहीं कर सकता और फिर भी परमेश्वर बना रह सकता है। ‘वह’ स्वयँ में असीम रूप से मूल्यवान् है। परमेश्वर के तुल्य दूसरा कोई नहीं है। इसीलिए ‘वह’--स्पष्टतया इसे रखें तो--किसी भी तरह आपकी आवश्यकता के बिना, भव्य व महिमामय व सर्व-समर्थ व आत्म-निर्भर होने से चिपका हुआ है। यही अनुग्रह की नींव है। यदि आप स्वयँ को अनुग्रह का केन्द्र बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह अनुग्रह बने रहना बन्द हो जायेगा। परमेश्वर-केन्द्रित अनुग्रह, बाइबल-शास्त्रीय अनुग्रह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रसन्नता इसमें नहीं है कि परमेश्वर मुझे विश्व का केन्द्र बनाये। मेरी प्रसन्नता, परमेश्वर का सदा के लिए, विश्व का केन्द्र बने रहने में है, और सनातनकाल के सब दिनों में ‘उसकी’ संगति में मुझे खींचने में, ‘उसे’ देखने में, ‘उसे’ जानने में, उस’ में आनन्दित होने में, ‘उसे’ संजोने में, ‘उस’ में सन्तुष्ट होने में है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये था कल का संदेश। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मानव-जाति के लिए परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता का तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आज ... यदि अब तक जो कहा है सच है, यदि यह बाइबल-शास्त्रीय है, तब आपके जीवन के लिए एक चैंकाने वाला तात्पर्य है। ये यह है: जब आप यहाँ से जाते हैं, और आप अपनी कलीसियाओं या अपने अहातों (कैम्पस)में वापिस जाते हैं, आपको जो करना चाहिए वो ये कि ... परमेश्वर में, आप जितना सम्भव हो सकते हैं उतना प्रसन्न रहने को अपना व्यवसाय बनायें। अतः अब, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के नाम में, मेरी आपको बुलाहट ये है कि उस सारी शक्ति से जो परमेश्वर सामर्थ के साथ आपके अन्दर प्रेरणा देता है, आपके सुख की खोज करने को अपना सनातन व्यवसाय बना लें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवन में मेरी समस्या, और जीवन में आपकी समस्या, ये नहीं है कि आप तब सुख की खोज कर रहे हैं जब आपको अवश्य है कि अपना कर्तव्य-कर्म कर रहे हों। आपकी समस्या का ये मेरा या परमेश्वर का या बाइबल का मूल्यांकन नहीं है। अपने जीवन-परिवर्तन करने वाले उपदेश में, जो ‘‘द वेट ऑफ ग्लोरी’’ कहलाता है, सी. एस. लेविस ने इसे एकदम ठीक रखा था, जब वे कहते हैं कि हमारी समस्या ये है कि हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं, ये नहीं कि हम अपने सुख की खोज बहुत उत्सुकता से कर रहे हैं। वे कहते हैं कि हम उन बच्चों के समान हैं जो गंदी बस्तियों में मिट्टी के खिलौनों के साथ समय गँवा रहे हैं क्योंकि हम कल्पना नहीं कर सकते कि समुद्र के किनारे एक छुट्टी का दिन कैसा होता है। हमारी समस्या ये है कि हम टिन की मूर्तियों को अपने से जकड़े हुए हैं जबकि सुनहरी वास्तविकता हमारे समक्ष खड़ी हुई है। हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं। संसार के साथ समस्या सुखवाद नहीं है; जो सच में सन्तुष्ट करने वाला है, उसके लिए प्रयास करने में सुखवाद असफल है। आज सुबह का मेरा बिन्दु यह है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और उसका तात्पर्य, यदि ये सच है तो, यह है कि आपको सुबह उठना चाहिए और, ‘जॉर्ज मुलर’ के समान, इससे पूर्व कि वे बाहर जाते और कुछ भी करते, कहें, ‘‘अवश्य है कि मेरा हृदय परमेश्वर में खुश हो अन्यथा मैं किसी के लिए कोई काम का नहीं रहूंगा। मैं उनका उपयोग करूंगा और उनसे मेरी ललक और मेरे खालीपन को सन्तुष्ट करने का प्रयास करूंगा।’’ यदि आप एक प्रेम के व्यक्ति बनना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि दूसरे लोगों के लिए अपनी जिन्दगी उत्सर्ग करने के लिए आप स्वतंत्र हों, तो आपके लिए आवष्यक है कि परमेश्वर में आनन्दित रहने को अपना लक्ष्य बनायें। आज का संदेश यही है: हम बहुत अधिक सरलता से खुश हो जाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमने ऐसे छोटे, क्षणिक, अपर्याप्त, असन्तोषजनक भोग-विलासों से समझौता कर लिया है कि आनन्द के लिए हमारी क्षमताएँ इस बिन्दु तक ऐसी मुरझा गई हैं कि हमने आनन्दरहित कर्तव्य-कर्म को प्रभावोत्पादकता का सत्व बना दिया है ताकि हमारे अपरिवर्तित हृदयों को ऐसा छिपा लें जो परमेश्वर द्वारा प्रेरित नहीं हो सकते। आप देखिये कि ये कितना पलायनवादी है&amp;amp;nbsp;? मैं आज सुबह, ‘स्टोइक्स’ (एक दार्शनिक) और ‘इमानुएल कान्त’ के विरोध में एक मुहिम पर हूँ, ‘एनलाइटनमेन्ट’ (ज्ञानोदय) का दार्षनिक, जिसने कहा है कि जिस अंश तक आप किसी नैतिक कार्य में अपना लाभ खोजते हैं, उतना आप इसकी प्रभावोत्पादकता को धूमिल करते हैं। यह बाइबल में नहीं है … और ये हर जगह आराधना, प्रभावोत्पादकता, साहस, और परमेश्वर-केन्द्रता को नष्ट करता है। ये मनुष्य को ऊंचा उठाता है, वो धर्मात्मा जो बिना इस लक्ष्य के कि परमेश्वर उसके प्राण को सन्तुष्ट करे, अपने कर्तव्य-कर्म को पूरा करता है। इस पर छिः&amp;amp;nbsp;! ऐसा हो कि ये हमारे हृदयों से सदा के लिए निकल जाये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुसमाचारीय वायुमण्डल में जो टंगा रहता है, मैं उसके विरूद्ध एक मुहिम पर हूँ। लगभग 25 साल पहिले मैंने ये मुहिम छेड़ी थी, और तब से, मेरे परिवार को इसमें उठाने, इस पर एक कलीसिया निर्मित करने, इस बारे में पुस्तकें लिखने का प्रयास करते हुए, इसे जीने का प्रयास करते हुए, मैं इसमें लगा हुआ हूँ। थोड़ी-थोड़ी आपत्तियाँ आती हैं। इसी तरह आप बढ़ते हैं। आप में से बहुतेरों ने मुझ से कहा है कि इस सम्मेलन के द्वारा आपकी दुनिया बदल रही है। प्रतिमान हिलाये जा रहे हैं। ‘कॉपरनिकस’ की क्रान्तियाँ क्षितिज में हैं, और यही वो तरीका है जिससे आप बदलना आरम्भ करते हैं। इसमें 15 साल लग सकते हैं ... आपत्ति पर आपत्ति। 1968 में मैंने डॉन फुलर, और सी. एस. लेविस, और जोनाथन एडवर्ड, और राजा दाऊद, और सन्त पौलुस, और यीशु मसीह की सहायता से इन कुछ चीजों को देखना आरम्भ किया। और जिस तरह से कि मेरा दिमाग काम करता है, ये है कि एक के बाद दूसरी आपत्ति आती है और मैं दुबक जाता हूँ, और तब मैं बाइबल में जाता हूँ और रोता और चिल्लाता और संघर्ष करता और पूछता और प्रार्थना करता और बात करता हूँ। तब थोड़ा-थोड़ा करके ये आपत्तियाँ, दर्शन को चमका देती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आपत्तियाँ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
#क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको अपने सम्पूर्ण मन और दिमाग और प्राण और शक्ति से, आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए। या ये ध्यान खींचने का, जॉन पाइपर की चतुर उपदेश-कला का तरीका मात्र है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#आत्म-त्याग के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? क्या यीशु ने नहीं कहा, ‘‘यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे तो अपने आप का इन्कार करे&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
#क्या यह भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं देता&amp;amp;nbsp;? क्या ऐसा नहीं है कि मसीहियत तत्वतः इच्छा की बात है, जिसके द्वारा हम वचनबद्ध होते और निर्णय लेते हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#परमेश्वर की सेवा, एक कर्तव्य-कर्म के रूप में करने की महान् विचारधारा का क्या होता है, जबकि ये कठिन है और आप इसे करना नहीं चाहते&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
#क्या ये मुझे--और परमेश्वर को नहीं--चीजों के केन्द्र में नहीं रखती&amp;amp;nbsp;?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आपत्तियों का उत्तर देना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. क्या बाइबल वास्तव में सिखाती है कि आपको आपके आनन्द की खोज में लगे रहना चाहिए&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर है हाँ, और ये ऐसा, कम से कम चार तरह से करती है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अ) आज्ञाओं से।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भजन 37: 4 पर विचार कीजिये - ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान।’’ ये एक सुझाव नहीं है, ये एक आज्ञा है। यदि आप विश्वास करते हैं कि ‘‘तू व्यभिचार न करना’’ कुछ ऐसा है जिसका आपको पालन करना है, तब आपको, ‘‘यहोवा को अपने सुख का मूल जान,’’ का भी पालन करना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा भजन 32: 11, ‘‘हे धर्मियो, यहोवा के कारण आनन्दित और मगन हो, और हे सब सीधे मनवालो आनन्द से जयजय- कार करो।’’ अथवा भजन 100, ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो।’’ ये एक आज्ञा है: ‘‘आनन्द से यहोवा की आराधना (अंग्रेजी में:- सेवा) करो!’’ जिस अंश तक आप इसके प्रति उदासीन हैं कि चाहे आप प्रभु की सेवा आनन्द के साथ करते हैं अथवा नहीं, उतने अंश तक ही आप परमेश्वर के प्रति उदासीन हैं। ‘उसने’ आप से कहा है कि आपको ‘उसकी’ सेवा आनन्द के साथ करना आवष्यक है। अथवा फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में सदा आनन्दित रहो; मैं फिर कहता हूं आनन्दित रहो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वे सम्पूर्ण बाइबल में हैं। हम आज्ञाओं की बात कर रहे हैं। ये पहिला तरीका है जिससे बाइबल इसे सिखाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''ब) आशंकाओं से।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘जेरेमी टेलर’ ने एक बार कहा, ‘‘यदि हम आनन्दित न रहें तो परमेश्वर हमें भयंकर बातों की आशंका बताता है।’’ जब मैंने पहिली बार इसे सुना तो मैंने सोचा कि ये चतुराई है। ये चतुराई नहीं है ... ये व्यवस्थाविवरण से 28: 47 से एक उद्धरण है, और विनाशकारी है। ‘‘क्योंकि तू ने आनन्द और प्रसन्नता के साथ अपने परमेश्वर यहोवा की सेवा नहीं की, इस कारण तुझे अपने उन शत्रुओं की सेवा करनी पड़ेगी जिन्हें यहोवा तेरे विरुद्ध भेजेगा।’’ परमेश्वर भयंकर बातों की आशंका बताता है, यदि हम ‘उस’ में आनन्दित न रहें। क्या यह सुखवाद के लिए एक आज्ञा-पत्र है या कुछ और&amp;amp;nbsp;? क्या यह आज्ञा-पत्र है, परमेश्वर में अपने आनन्द की खोज अपनी भरपूर शक्ति से करने को, अपनी जिन्दगी का उद्यम बनाने का&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''स) यीशु में, परमेश्वर वो सब जो आपके लिए है, उससे अनिवार्यतः सुन्तुष्ट हो जाने के रूप में उद्धार देने वाले विश्वास को प्रस्तुत करने के द्वारा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, इब्रानियों 11: 6:- ‘‘विश्वास बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है, क्योंकि परमेश्वर के पास आनेवाले को विश्वास करना चाहिए, कि वह है; और अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है।’’ यदि आपको परमेश्वर को प्रसन्न करना है तो आपके पास विश्वास होना चाहिए। विश्वास क्या है&amp;amp;nbsp;? एक ऐसे के पास आना, जो ठीक-ठीक गहरे दृढ़-विश्वास के साथ है, कि आने के लिए वह मुझे प्रतिफल देने जा रहा है। यदि आप ये विश्वास नहीं करते, अथवा यदि आप परमेश्वर के पास किसी अन्य कारण से जाते हैं, आप परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, यूहन्ना 6: 35 लीजिये: यीशु कहते हैं, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूं: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा।’’ इस पद ध्यान दीजिये: जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी पियासा न होगा। विश्वास के बारे में इसका क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? विश्वास क्या है&amp;amp;nbsp;? यूहन्ना के धर्मविज्ञान में, विश्वास, हमारे प्राणों की सन्तुष्टि के लिए यीशु के पास आना है, ऐसा कि कुछ और सन्तुष्ट नहीं कर सकता। वो है विश्वास। जिसके बारे में मैं बातें कर रहा हूँ, विश्वास उसके सिवाय और कुछ नहीं है। मैं आधार-भूत मसीहियत को ऐसी भाषा में खोल रहा हूँ जिससे आप कम परिचित हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''द) पाप को, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने के पागलपन के रूप में, परिभाषित करने के द्वारा।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पाप, परमेश्वर में आपके सुख की खोज को त्याग देने का पागलपन है। मूल-पाठ ये है: यिर्मयाह 2: 12-13:- ‘‘हे आकाश, चकित हो, बहुत ही थरथरा और सुनसान हो जा, यहोवा की यह वाणी है। क्योंकि मेरी प्रजा ने दो बुराइयां की हैं: उन्हों ने मुझ बहते जल के सोते को त्याग दिया है, और, उन्हों ने हौद बना लिए, वरन ऐसे हौद जो टूट गए हैं, और जिन में जल नहीं रह सकता।’’ मुझसे कहिये, बुराई क्या है&amp;amp;nbsp;? बुराई की परिभाषा, वो जो विश्व को विस्मित करती है, जो परमेश्वर के स्वर्गदूतों को कहने को मजबूर करती है, ‘‘नहीं&amp;amp;nbsp;! ये नहीं हो सकता&amp;amp;nbsp;!’’ ... ये क्या है&amp;amp;nbsp;? ये सर्व-सन्तुष्टि प्रदान करने वाले, जीवित जल के सोते, परमेश्वर की ओर देख रही है, और कह रही है ‘‘नहीं, धन्यवाद,’’ और टेलीविज़न, यौन, पार्टियों, नशाखोरी, पैसा, मान-सम्मान, उपनगर में एक मकान, एक छुट्टी, एक नये कम्प्यूटर कार्यक्रम की ओर मुड़ रही है, और कह रही है ‘‘हाँ!’’ ये पागलपन है&amp;amp;nbsp;! और यिर्मयाह 2: 12 के अनुसार, ये सम्पूर्ण स्वर्ग को चकित करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कम से कम, उन चार तरीकों से, बाइबल कहती है कि ‘जॉन पाइपर’ आज सुबह सच्चाई सिखा रहा है जब वह कहता है कि परमेश्वर में आपके सन्तोष की खोज को अपनी जिन्दगी अर्पित करो। अतः आपत्ति क्रमांक 1 निरस्त हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. आत्म-त्याग के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या यीशु ने मरकुस 8: 34 में नहीं कहा ‘‘जो कोई मेरे पीछे आना चाहे, वह अपने आपे से इन्कार करे और अपना क्रूस उठाकर, मेरे पीछे हो ले।’’ क्रूस वो स्थान है जहाँ आप मरते हैं, प्राणदण्ड का स्थान। ये एक चिड़चिड़ी सास, या एक खराब कक्ष-साथी, या आपके हड्डियों में का कोई रोग नहीं है। ये अपने आपे या स्वयँ की मृत्यु है। अतः ‘पाइपर’, एक आजीवन -व्यवसाय के रूप में, अपने प्राणों की सन्तुष्टि की खोज में लगे रहने के लिए, हमें बुलाने में, आप विधर्मी हैं। मैंने इसे महसूस किया ... और फिर मैंने शेष आयत को पढ़ा (कभी-कभी, संदर्भों को पढ़ना सहायता करता है): ‘‘क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिए अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।’’ यहाँ तर्क क्या है&amp;amp;nbsp;? उन आयतों में यीशु का तर्क क्या है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तर्क ये है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘ओ मेरे चेलो, अपना जीवन मत खो। अपना जीवन मत खो। अपना जीवन बचाओ&amp;amp;nbsp;! अपना जीवन बचाओ&amp;amp;nbsp;!’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘कैसे&amp;amp;nbsp;? ... कैसे यीशु&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘इसे खो दो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘मैं इसे समझ नहीं पा रहा ... यीशु मैं इसे समझ नहीं पा रहा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; --‘‘मेरा अर्थ ये है-- मेरे चेलो, मेरे प्रियो--इस अर्थ में अपना जीवन खो दो कि मेरे सिवाय तुम सब कुछ खो दो। ‘जब तक गेहूँ का एक दाना भूमि में गिरकर मरता नहीं, ये अकेला रहता है। लेकिन यदि यह मरता है, ये बहुत फल लाता है।’ संसार के प्रति मर जाओ। मान-सम्मान के प्रति मर जाओ, धन के प्रति मर जाओ, पापमय यौन के प्रति मर जाओ, आगे बढ़ने के लिए छल के प्रति मर जाओ, अपने को प्रमाणित करने के लिए लोगों की आवश्यकता के लिए मर जाओ। मर जाओ, और मुझे पा लो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। स्वयँ टिन का इन्कार करो कि सोना पाओ। एक चट्टान पर खड़े होने के लिए, स्वयँ रेत का इन्कार करो। वाइन पाने के लिए, स्वयँ खारे पानी का इन्कार करो। कोई चरम आत्म-त्याग नहीं है, न ही यीशु का कभी उस तरह का अर्थ था। मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं यीशु से यीशु के बारे में इस वचन में विश्वास करता हूँ: मत्ती 13: 44। ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के, जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया।’’ आप उसे आत्म-त्याग कहते हैं&amp;amp;nbsp;? हाँ&amp;amp;nbsp;! उसने सब कुछ बेच दिया। उसने सब वस्तुओं को कूड़ा और रद्दी-माल समझा ताकि वह मसीह को प्राप्त करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, हाँ ये आत्म-त्याग है; और नहीं, ये आत्म-त्याग नहीं है। एक स्वयँ (हमारा पुराना मनुष्यत्व) है जिसे क्रूसित होना चाहिए: वो स्वयँ जो संसार से प्रेम करता है। परन्तु नया मनुष्यत्व--वो मनुष्यत्व जो सब चीजों से ऊपर मसीह से प्रेम करता है और ‘उसमें’ अपना सन्तोष ढूँढता है--उस मनुष्यत्व को मत मारिये। वो नयी सृष्टि है। उस मनुष्यत्व को परमेश्वर से तृप्त कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ओ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं उस आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ जिसे वो जवान शासक नहीं समझ सका, किन्तु जिसे यीशु ने उस क्षण सिखाया: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘हे जवान पुरुष, जा, जो तेरे पास है सब कुछ बेच दे; और आकर मेरे पीछे हो ले और तुझे स्वर्ग में धन मिलेगा।’’ और वो ये नहीं करेगा। और यीशु ने चेलों से कहा, ‘‘एक धनवान के लिए परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना वास्तव में कठिन है&amp;amp;nbsp;! स्वर्ग के राज्य में धनी लोगों के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है&amp;amp;nbsp;!’’ तब चेले नितान्त अचभ्भित हुए, और उन्होंने कहा, ‘‘तो फिर किसका उद्धार हो सकता है&amp;amp;nbsp;?’’ और यीशु ने कहा, ‘‘मनुष्यों से यह असम्भव है। किसी के पास वो मन अपने आप से नहीं हो सकता, जिसके लिए मैं बुला रहा हूं। किन्तु परमेश्वर के साथ,’’ ‘वह’ कहता है, ‘‘सब कुछ सम्भव है।’’ और तब पतरस चिंघाड़ता है, ‘‘हम तो सब कुछ छोड़कर तेरे पीछे हो लिए हैं। हमारे बारे में क्या&amp;amp;nbsp;? हमने वास्तव में त्याग किया।’’ और यीशु प्रत्युत्तर देते हैं--काश मैं ‘उसकी’ आवाज का स्वर जान पाता--और कहा, ‘‘पतरस, कोई ऐसा नहीं है जिसने मेरी ख़ातिर अपना घर या माता या पिता या भाइयों या बहिनों या जमीन या बच्चे छोड़ दिया हो और जो सौ गुना माताएँ, बहिनें, भाईयों, जमीनें, और बच्चे इस जीवन में--क्लेशों के साथ--वापिस न पाये-- और आने वाले युग में , अनन्त जीवन। तुम किसी भी चीज का त्याग नहीं कर सकते जिसे तुम्हें हजार गुना लौट न दिया जायेगा। अपने ऊपर दया मत खाना जब मेरे लिए तुम्हारे सिर धड़ से काट कर अलग कर दिये जावें’’ (देखिये, मरकुस 10: 17-31)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हाँ, मैं आत्म-त्याग में विश्वास करता हूँ। मैं हर उस चीज का स्वयँ के लिए इन्कार करने में विश्वास करता हूँ जो, परमेश्वर में मेरी पूरी सन्तुष्टि के मार्ग में खड़ी होती है, और इसी तरह मैं समझता हूँ कि आत्म-त्याग से बाइबल का क्या अर्थ है। मैं विश्वास करता हूँ कि ‘डेविड लिविंगस्टोन’ और ‘हडसन टेलर’--ये महान् सुसमाचार-प्रचारक--अपनी जिन्दगियों के अन्त में आने पर और अपनी पत्नियों तथा स्वास्थ्य और सब कुछ खोकर सिवाय एक चीज के, कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के छात्रों और सब जगह लोगों को कह सकें कि, ‘‘मैंने कभी कोई बलिदान नहीं किया,’’ पूर्णतया सही थे। ये सही है&amp;amp;nbsp;! मैं जानता हूँ कि उनका क्या अर्थ है और आप जानते हैं कि उनका क्या अर्थ है। और मैं विश्वास करता हूँ कि ‘जिम एल्यिोट’ जिसने एक जवान पुरुष के रूप में अपना जीवन अर्पित कर दिया, ये कहने में पूर्णतया ठीक था कि, ‘‘वह मूर्ख नहीं है जो वो दे देता है जिसे वह रख नहीं सकता, ताकि वो प्राप्त करे जिसे वह खो नहीं सकता।’’ यही है जो मैं आत्म-त्याग के बारे में विश्वास करता हूँ। अतः आपत्ति क्रमांक 2 ख़ारिज हो गई। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. क्या आप मनोभाव/भावनाओं के ऊपर अत्याधिक बल नहीं दे रहे हैं&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या मसीहियत, मूलतः निर्णय नहीं है&amp;amp;nbsp;? इच्छा की वचनबद्धता&amp;amp;nbsp;? क्या मनोभाव मात्र, केक के ऊपर बाद में आने वाली, वैकल्पिक, आइसिंग नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? ‘पाइपर’, मैं सोचता हूँ, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत करने का तरीका, मनोभावों को एक गैर-बाइबल-शास्त्रीय श्रेष्ठता के स्थान तक ऊंचा उठाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन तब मैं बाइबल पढ़ता हूँ--जब आप एक तर्क-वितर्क में हों, बाइबल पढ़ना सहायता करता है--और मैंने देखा किः &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें आनन्द की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: फिलिप्पियों 4: 4, ‘‘प्रभु में आनन्दित रहो।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें आशा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: भजन 42: 5, ‘‘परमेश्वर पर आशा लगाये रह।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें भय की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: लूका 12: 5, ‘‘उसी से डरो जो प्राण और शरीर दोनों, नरक में डाल सकता है।’’''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें शान्ति की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: ‘‘मसीह की शान्ति तुम्हारे हृदयों में राज्य करे’’ (कुलुस्सियों 3: 15)।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें जोश की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 11, ‘‘आत्मिक उन्माद में भरे रहो (अक्षरश ‘उबलो’) प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’ ये वैकल्पिक नहीं है, ये केक की आइसिंग करना नहीं है। ये एक आज्ञा है&amp;amp;nbsp;!''' ‘‘प्रयत्न करने में आलसी न हो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें दुःख की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: रोमियों 12: 15, ‘‘रोनेवालों के साथ रोओ।’’ आपके पास कोई''' विकल्प नहीं है। आपको रोना ही होगा, जो रोते हैं उनके साथ आपको रोने की अनुभूति करना ही होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें इच्छा की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: 1 पतरस 2: 2, ‘‘वचन के निर्मल आत्मिक दूध की लालसा रो।’’ ये एक विकल्प नहीं है। आप नहीं कह सकते कि, ‘‘ठीक है, लेकिन मैं पर्याप्त इच्छा जगा नहीं सकता, अतः मैं इसका पालन कैसे कर सकता हूँ&amp;amp;nbsp;? ये वास्तव में एक आज्ञा नहीं हो सकती।’’ गलत&amp;amp;nbsp;! हाँ, आप अपनी इच्छा से इन अनुभूतियों को चालू या बन्द नहीं कर सकते। नहीं, वे अब भी जिम्मेदारियाँ हैं। वहाँ हमारी निराशाजनक स्थिति पायी जाती है, जिसके बारे में हमने विगत रात्रि सुना था। ''' हर एक चीज जो मैं आपसे कह रहा हूँ कि आपको अभी करने की आज्ञा दी जाती है, उसे आप, इच्छा-शक्ति या निर्णय, या वचनबद्धता के द्वारा, इसी क्षण में नहीं कर सकते हैं। आप इसे केवल चमत्कार के द्वारा कर सकते हैं। क्या आप निराश नहीं हैं&amp;amp;nbsp;? क्या ये एक निराशाजनक चीज नहीं है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के द्वारा आपको वो करने को कहा जावे जो आप नहीं कर सकते&amp;amp;nbsp;? यदि आपके हृदय ठीक थे आप उन्हें करते। हम भ्रष्ट हो गये हैं और हमें आज्ञा दी गई है कि कोमल-हृदयता की अनुभूति करें: ‘‘कोमल-हृदय होकर, एक-दूसरे पर दया करो।’’ आप मात्र ये नहीं कह सकते कि क्षमा का अर्थ है, ‘‘आई एम सॉरी’’ कह देना। आपको इसकी अनुभूति करना ही होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''हमें कृतज्ञता की अनुभूति करने की आज्ञा दी गई है: एक बच्चे को लीजिये, जिसे क्रिसमस की सुबह दादी से एक उपहार मिलता है ... और ये काले मोजे/जुराबें हैं&amp;amp;nbsp;! ईक&amp;amp;nbsp;! काले मोजे तो छोड़ दीजिये, कोई भी बच्चा क्रिसमस के लिए मोजे नहीं पाना चाहता। और तब आप कहते हैं, ‘‘अपनी दादी को धन्यवाद कहो।’’ और फिर वो बच्चा कहता है, ‘‘मोजों के लिए धन्यवाद।’’ ये वो नहीं है जिसके बारे में बाइबल बता रही है। बच्चा उसे अपनी इच्छा-शक्ति से कर सकता है। किन्तु वह उन मोजों के लिए इच्छा-शक्ति से कृतज्ञता का बोध नहीं कर सकता। न ही आप अपनी इच्छा-शक्ति के द्वारा, इफिसियों 5: 20 की आज्ञा कि ‘‘सदा सब बातों के लिए ... धन्यवाद करते रहो,’’ के अनुरूप परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति कर सकते हैं। तब ठीक है, हम तो निरुपाय हैं, जब तक कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कार्य न करे।''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपत्ति क्रमांक 3&amp;amp;nbsp;? मैं इसे मोल नहीं लेता। मैं विश्वास नहीं करता कि मैं अनुरागों और अनुभूतियों और मनोभावों को उससे ऊंचा उठा रहा हूँ जितना कि बाइबल उठाती है। मैं सोचता हूँ कि मैं उन्हें वहाँ से पुनः-स्थापित कर रहा हूँ जहाँ से एक निर्णयात्मक, प्रतिबद्धता से लदी, इच्छा-शक्ति, हम-इसे-कर-सकते हैं अमेरिकी धर्म ने, उन्हें गिरा दिया, क्योंकि वे हमारे नियंत्रण से बाहर हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. परमेश्वर की सेवा करने के महान् दर्शन के बारे में क्या&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या परमेश्वर की सेवा करना एक कर्तव्य-कर्म नहीं है&amp;amp;nbsp;? ‘पाइपर’, मसीहियत के बारे में आपकी बातचीत के तरीके में तो ये सेवा ध्वनित नहीं होती। ये बिल्कुल भी उस सेवा के समान ध्वनित नहीं होती--कर्तव्यपरायण, परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने की चुनौती तक उठने वाली सेवा--जबकि यह कठिन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसका प्रत्युत्तर देना मैंने अब सीख लिया है, ‘‘आइये हम कुछ मूल-पाठों को देखें जो सेवकपन के रूपक को आकार देते हैं।’’ परमेश्वर के प्रति आपके सम्बन्ध के बारे में रूपक-अलंकार, चाहे ये एक सेवक के रूप में है, या पुत्र या पुत्री, या मित्र, सभी अपने में अवयव रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया है, असत्य होंगे। वे अपने में वे अवयव भी रखते हैं जिन्हें, यदि आपने प्रबलित किया, सत्य होंगे। अब, सेवकपन के अनुरूपता में, क्या असत्य है और क्या सत्य है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूल-पाठ जो इन दो को पृथक करने में आपकी सहायता करते हैं ताकि जब आप सेवा करते हैं आप निन्दा न करें&amp;amp;nbsp;; वे मूल-पाठ हैं, जैसे कि प्रेरित 17: 25:-‘‘परमेश्वर, न किसी वस्तु का प्रयोजन रखकर मनुष्यों के हाथों की सेवा लेता है, क्योंकि वह तो आप ही सब को जीवन और श्वास और सब कुछ देता है।’’ साथियो, परमेश्वर सेवा नहीं लेता। सावधान रहिये। ‘वह’ ऐसी सेवा नहीं लेता मानो कि ‘उसे’ आपकी या आपकी सेवा की आवश्यकता थी। ‘उसे’ आवश्यकता नहीं है। अथवा मरकुस 10: 45 के समान एक मूल-पाठ लीजिये: ‘‘मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया, कि उसकी सेवा टहल की जाए, पर इसलिये आया कि आप सेवा टहल करे, और बहुतों की छुड़ौती के लिये अपना प्राण दे।’’ ‘वह’ सेवा करवाने नहीं आया। सावधान्&amp;amp;nbsp;! सावधान्&amp;amp;nbsp;! यदि आप उसकी सेवा करने का जिम्मा उठाते हैं तो आप ‘उसके’ उद्देश्य को लांघते हैं&amp;amp;nbsp;! यद्यपि ये व्याकुल करने वाला है, क्या ऐसा नहीं है। पौलुस ने लगभग सभी पत्रियों में स्वयँ को प्रभु का सेवक कहा है। और यहाँ प्रेरित 17: 25 और मरकुस 10: 45 में, ये कहता है कि परमेश्वर की सेवा नहीं की जाती और ये कि मनुष्य का पुत्र इसलिये नहीं आया कि उसकी सेवा टहल की जाए। एक प्रकार की सेवा अवश्य होगी जो बुरी है और एक प्रकार की सेवा जो भली है। भली सेवा क्या है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भली या उत्तम सेवा 1 पतरस 4: 11 है:- ‘‘यदि कोई सेवा करे, तो उस शक्ति से करे जो परमेश्वर देता है; जिस से सब बातों में परमेश्वर की महिमा हो।’’ परमेश्वर की सेवा मानवीय हाथों से नहीं होती, मानो ‘उसे’ किसी चीज की आवश्यकता थी। आराधना करने, पर्चे टाइप करने, सम्भाषणों को सुनने, एक कार चलाने, बच्चे की नेपकिन बदलने, एक उपदेश का &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रचार करने के लिए, आपको एक तरीका खोजना होगा, इस तरह कि आप सदैव प्राप्त करने वाले हैं। क्योंकि देने वाले को महिमा प्राप्त होती है, और पाने वाले को आनन्द प्राप्त होता है। जिस भी समय हम प्रेरित 17: 25 को लांघते हैं-- ‘‘परमेश्वर, मनुष्यों के हाथों की सेवा नहीं लेता (जैसे की मानो ‘वह’ एक प्राप्त करने वाला हो,) मानो ‘उसे’ किसी वस्तु का प्रयोजन हो।’’--हम निन्दा करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सम्मेलन के अगुओं के समूह को, सेवा के बारे में, मत्ती 6: 24 से, मैंने कल एक दृष्टान्त दिया था, जहाँ ये कहता है, ‘‘तुम दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते, या तो तुम एक से घृणा करोगे और दूसरे से प्रेम रखोगे। या तुम एक के प्रति भक्त रहोगे और दूसरे को तुच्छ जानोगे। तुम परमेश्वर और पैसा दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ तो यहाँ हम सेवा की बात कर रहे हैं। आप पैसे की सेवा कैसे करते हैं&amp;amp;nbsp;? आप पैसे की सेवा, पैसे की आवश्यकताओं को पूरी करते हुए नहीं करते&amp;amp;nbsp;? अपनी सारी ऊर्जा और समय और प्रयत्न से, अपनी जिन्दगी को निरन्तरता में ढालते हुए, आप पैसे की सेवा करते हैं, ताकि पैसे से लाभ पायें। आपका दिमाग इस बात से घूमता रहता है कि कैसे चतुर निवेश किया जावे, कैसे सर्वोत्तम लेन-देन ढूँढा जावे, जहाँ निम्न है वहाँ कैसे निवेश किया जावे ताकि ये ऊंचा जाये, और आप इसमें लिप्त रहते हैं कि रुपया से कैसे लाभ पायें, क्योंकि रुपया आपका स्रोत है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरीके से आप पैसे की सेवा करते हैं यदि उसके बारे में ये सच है, तो आप परमेश्वर की सेवा किस तरह करते हैं&amp;amp;nbsp;? ये बिल्कुल समान है: आप अपने आप को विशिष्ट मुद्रा में लाते हैं, अपनी जिन्दगी को युक्ति-चालन में लाते हैं, और शक्ति व यत्न व समय व सृजनात्मकता अर्पित करते हैं ताकि स्वयँ को परमेश्वर की आशीष के निरन्तर झरने के नीचे ले आयें, जिससे कि ‘वह’ स्रोत बना रहे और आप एक खाली प्राप्तकर्ता बने रहें। आप लाभभोगी बने रहते हैं, ‘वह’ हितकारी बना रहता है; आप भूखे बने रहते हैं, ‘वह’ रोटी बना रहता है; आप प्यासे बने रहते हैं, ‘वह’ जल बना रहता है। आप कभी भी उलट-भूमिका का, परमेश्वर के ऊपर निन्दा लाने वाला काम न करें। हमें सेवा करने का एक मार्ग इस तरह का खोजना होगा जो उस ताकत में है जिसकी आपूर्ति परमेश्वर करता है। जब मैं सेवा कर रहा हूँ, मैं प्राप्त करने वाले छोर पर हूँ। अन्यथा मैं परमेश्वर को लाभभोगी की स्थिति में रखता हूँ&amp;amp;nbsp;; मैं उसका हितकारी बन जाता हूँ, और अब मैं परमेश्वर हूँ। और, संसार में ऐसे बहुतेरे धर्म हैं। अतः आपत्ति 4 निरस्त होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''5. क्या आप स्वयँ को केन्द्रीय नहीं बना रहे हैं&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘आप, आपके आनन्द और आपके सुख की खोज में लगे रहने की बात करते हैं। आप, कर्तव्य-कर्म के बारे में ऐसे बात करते हैं मानो जो हमने सदा से जाना है, उससे कुछ अलग है, और आप कहते हैं कि हमें सेवा के बारे में सावधान रहना अवश्य है। ये मुझे ऐसा ध्वनित होता है जैसे मात्र स्वयँ को केन्द्रीय बनाने के लिए आप बाइबल-शास्त्रीय भाषा को युक्ति- चालन से मोड़ रहे हैं।’’ ये सबसे विध्वंसकारी आलोचना होगी, क्या नहीं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरा उत्तर यहाँ है: दिसम्बर 21 को मेरे विवाहित जीवन के 28 साल हो जायेंगे। मैं ‘नोएल’ से बहुत प्रेम करता हूँ। हम एक-साथ बहुत से समयों से गुजरे हैं, वास्तविक कठिन समयों और वास्तविक अच्छे समयों से। हमने अपने किशोरवय के बच्चों को, किशोरावस्था के अविश्वसनीय रूप से कठिन वर्षों में से जाते देखा है। मैं बहुत सरलता से रो देता हूँ जब मैं अपने बेटों और अपनी छोटी लड़की के बारे में सोचता हूँ। मान लीजिये कि 21 दिसम्बर को मैं लम्बी डंडी वाले 28 लाल गुलाबों को मेरी पीठ के पीछे छुपा कर लाया और द्वार पर लगी घंटी बजाया। ‘नोएल’ दरवाजे पर आती है, और इस बारे में थोड़ी विचलित दिखती है कि मैं अपने ही घर की घंटी क्यों बजा रहा था, और मैं गुलाबों को बाहर कालता हूँ और कहता हूँ, ‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’ और वो कहती है, ‘‘जॉनी, वे सुन्दर हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन तुम&amp;amp;nbsp;?’’ और मैं कहता हूँ, ‘‘ये मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गलत उत्तर। आइये, हम इसे वापिस पलटायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; (डिंग-डांग) &amp;lt;br&amp;gt; --‘‘हैप्पी एनिवर्सरी, नोएल।’’&amp;lt;br&amp;gt; --‘ जॉनी, वे सुन्दर हैं&amp;amp;nbsp;! लेकिन तुम क्यों&amp;amp;nbsp;?’’&amp;lt;br&amp;gt; --‘‘और कोई चीज मुझे इससे अधिक खुश नहीं करती जितना कि तुम्हारे लिए गुलाब खरीदना। वास्तव में, तुम जाकर क्यों नहीं कपड़े बदलती, क्योंकि मैंने एक, बच्चों की देखभाल करने वाली, का प्रबंध किया है और आज रात्रि हम जाकर कुछ विशेष करेंगे, क्योंकि आज रात्रि मैं और कुछ नहीं करूंगा सिर्फ इसके कि तुम्हारे साथ संध्या व्यतीत करूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सही उत्तर। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्यों&amp;amp;nbsp;? वो क्यों ऐसा नहीं कहेगी, ‘‘तुम सर्वाधिक स्वार्थी मसीही सुखवादी हो, जिससे मैं कभी मिली हूँ&amp;amp;nbsp;! तुम सदैव जो भी सोचते हो वो ये कि तुम्हें क्या खुश करता है&amp;amp;nbsp;!’’ यहाँ क्या चल रहा है&amp;amp;nbsp;? क्यों ‘ड्यूटी’, गलत उत्तर है और ‘प्रसन्नता’ सही उत्तर है&amp;amp;nbsp;? क्या आप समझे&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि आप इसे समझ गये तब आप ने इसे पा लिया, और मैं मीनियापोलीस वापिस जाकर परमेश्वर की स्तुति कर सकता हूँ। मेरी पत्नी मुझ में सर्वाधिक महिमित है जब मैं उस में सर्वाधिक सन्तुष्ट हूँ। यदि मैं, हमारे सम्बन्ध को एक सेवा-सम्बन्ध में बदलने का प्रयास करता हूँ, एक ऐसा ड्यूटी-सम्बन्ध, जहाँ मैं अपनी पत्नी में अपने सुख की खोज में न लगा रहूँ, उसका अनादर होगा ... और इसी तरह परमेश्वर का भी। जब आप स्वर्ग में जायें और पिता आपकी ओर देखते और कहते हैं, ‘‘तुम यहाँ क्यों आये हो&amp;amp;nbsp;? तुमने मेरे लिए अपना जीवन क्यों न्योछावर कर दिया&amp;amp;nbsp;?’’ बेहतर हो कि आप न कहें, ‘‘यहाँ आना मेरा कर्तव्य-कर्म (ड्यूटी) था, क्योंकि मैं एक मसीही हूँ।’’ बेहतर हो आप कहें, ‘‘मैं और कहाँ जाना चाहूंगा&amp;amp;nbsp;? और किस की ओर मैं मुड़ सकता यशायाह था&amp;amp;nbsp;? आप मेरे प्राणों की लालसा हैं&amp;amp;nbsp;!’’ और ये सम्मेलन इसी के बारे में है। ये सम्मेलन दो महान् चीजों के बारे में है, जो यशायाह 26: 8 से 268 पीढ़ी में, एक साथ आती हैं: ये परमेश्वर की धुन है ‘उसके’ नाम और ख्याति के लिए और मेरे हृदय की धुन कि मेरी सभी इच्छाओं में सन्तुष्ट रहूँ। विश्व में ये दो अटल चीजें हैं। और मैं क्या आशा करता हूँ कि आपने ये देख लिया है कि वे एक हैं, क्योंकि परमेश्वर और ‘उसका’ नाम और ‘उसकी’ ख्याति, मुझमें सर्वाधिक महिमित होते हैं जब मैं ‘उसमें’ सर्वाधिक सन्तुष्ट होता हूँ।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग-1</title>
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				<updated>2016-03-17T18:48:38Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग-1&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Passion for the Supremacy of God, Part 1}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -1 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आरम्भ करना चाहता हूँ, आपको कुछ कारण बताते हुए कि मैं यहाँ क्यों हूँ। एक स्थानीय कलीसिया में 16 - 17 वर्षों तक पासवान् रहे आने का एक बड़ा लाभ ये है कि बीतते महीनों और वर्षों के साथ, कलीसिया का दर्शन और पासवान् का दर्शन एक हो जाता है । लगभग एक साल पहिले हमने एक दर्शन-बयान प्रस्तुत किया था जो इस प्रकार है&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; सब लोगों के आनन्द के लिए, सभी बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन को फैलाने के लिए, हम अस्तित्व में हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि बिना किसी हिचकिचाहट के मैं कह सकता हूँ कि ये मेरा जीवन-लक्ष्य है और साथ ही साथ बैतलहम- बैप्टिस्ट-चर्च का लक्ष्य। अतः जब मुझे निमंत्रण मिला, इस सम्मेलन के बारे में पढ़ा, शब्द ‘‘धुन’’ को देखा, और यशायाह 26:8 के पीछे सच्चाई को देखा--‘‘हम लोग तेरी बाट जोहते आये हैं; तेरे नाम के स्मरण की हमारे प्राणों में लालसा बनी रहती है’’--मैं फँस गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आप सब के और इस संसार के सब लोगों के आनन्द के लिए, सभी बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाना चाहता हूँ। अतः ये कारण संख्या एक है, कि मैं यहाँ क्यों हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -2 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण संख्या दो ये है कि मैं आपके आनन्द को प्रदीप्त करने में एक माचिस की तीली बनना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि परमेश्वर में रोमांचित और आनन्दित होकर, आप इस जगह से जायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -3 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तीसरा कारण है कि मैं चाहता हूँ कि आप धर्म-शास्त्र में से देखें कि कारण संख्या एक और कारण संख्या दो, दोनों समान कारण हैं। वे एक हैं। अर्थात्, परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाना और परमेश्वर में सुखी रहना, यर्थाथ में अभिन्न हैं। क्योंकि परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक वाक्य है जिस पर मैं बार-बार लौटूंगा परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। अतः वे गीत जो हम गा रहे थे और वो प्यास जो हम व्यक्त कर रहे थे, परमेश्वर को महिमा देने के तरीके हैं। क्योंकि जितना अधिक हम ‘उस’ में सन्तुष्टि पाते हैं, उतनी ही अधिक गहराई से हम ‘उस’ में से पीते हैं और उस भोज की मेज से खाते हैं जो ‘वह’ स्वयँ है, उतना ही अधिक ‘उस’ का मूल्य और ‘उस’ की सर्व-पर्याप्ति आवर्धित होती है। अतः कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है--ये मेरे लिए वो अचरज है, मेरे लिए वो सुसमाचार है जो मैंने ‘68, ‘69 और ‘70 में खोजा, जब परमेश्वर मेरे जीवन में एक काम कर रहा था। महिमित होने के लिए परमेश्वर की धुन, और सन्तुष्ट होने के लिए आपकी धुन में, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, क्योंकि वे एक हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तीसरे कारण को कि मैं यहाँ क्यों हूँ, कहने का एक और ढंग है&amp;amp;nbsp;: मैं यहाँ हूँ कि एक हिमनदी में मशाल जला दूँ। मेरे दिमाग में एक तस्वीर है। यह मत्ती 24 में से निकली। मत्ती 24: 12 में, युग के अन्त को देखते हुए, यीशु कहते हैं&amp;amp;nbsp;: ‘‘अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।’’ मैं ठण्डा पड़ने से, मृत्यु के समान भयभीत हूँ। मैं इस विचार से घृणा करता हूँ कि परमेश्वर के लिए मेरा प्रेम अथवा लोगों के लिए मेरा प्रेम एक दिन सूख जावे या जम जावे। फिर भी यीशु कहते हैं ‘‘ये आ रहा है!’’ ये एक हिमनदी के समान सारे संसार में आ रहा है। अतः अन्त के दिनों के लिए मेरी उम्मीद का एक हिस्सा ये है कि अधर्म बहुत बढ़ता जायेगा और ये कि बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा। अब, अन्त के दिनों का यह एक बहुत रूखा विवरण हो सकता है। किन्तु यदि आप मत्ती में, नीचे एक पद 13 तक पढ़ते जायें, ये कहता है, ‘‘परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा’’--अतः कोई व्यक्ति धीरज धरने वाला है। और अगला पद कहता है, ‘‘और राज्य का यह सुसमाचार’’--उसकी व्याख्या कीजिये, ‘‘राजा यीशु के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाने का ये सुसमाचार--‘‘राज्य का ये सुसमाचार, सब जातियों में एक साक्षी के रूप में प्रचार किया जावेगा, और तब अन्त आ जायेगा।’’ अब पद 12 को पद 14 के बाजू में रखिये और देखिये कि क्या आप तनाव महसूस करते हैं। ‘‘अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।’’ किन्तु, ‘‘राज्य का यह सुसमाचार’’--मसीह के प्रभुसत्ता-सम्पन्न शासन का--‘‘सब जातियों में फैल जावेगा और तब अन्त आ जायेगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, उन दो आयतों के बीच एक तनाव है। कारण कि मैं जानता हूँ कि ये है, इसलिए कि वे लोग ठण्डे नहीं हैं जो सुसमाचार को वापिस आपके आहाते/कैम्पस में ले जाने वाले हैं। ये ठण्डे लोग नहीं हैं जो इसे संसार के, सुसमाचार न पाये हुए, लोगों तक इसे पहुँचाने वाले हैं। अब, मैं वो कैसे जानता हूँ&amp;amp;nbsp;? क्योंकि यदि आप वापिस दो आयतों, पद 9 तक जायें, आप एक भविष्यसूचक वचन में कुछ पायेंगे जो कि बहुत-बहुत भिन्न है। ये कहता है, ‘‘तब वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे,’’ यीशु कहते हैं। अब, यदि ये सच है--यदि हम अपने सुसमाचार-प्रचार की मजदूरी में अधिकारियों को सौंपे जायेंगे, यदि हम मार डाले जायेंगे, यदि हम प्रत्येक जाति के द्वारा घृणा किये जायेंगे जिनमें हम जायेंगे--मैं एक बात निष्चित जानता हूँरू ये ठण्डे लोग नहीं हैं जो वो संदेश दे रहे हैं। ये, राजा यीशु के, श्वेत-तप्त आराधक हैं, जो उस को पूरा करेंगे। इसलिए, मत्ती 24 की 9 से 14 आयतों में मैं जो देखता हूँ वो ये कि, जैसे-जैसे युग का अन्त निकट आ रहा है, ऐसे लोग होने जा रहे हैं जो बर्फीले ठण्डे होते जा रहे हैं और ऐसे लोग होने जा रहे हैं जो पर्याप्त लाल-गर्म हैं कि संसार के सब लोगों के मध्य, यीशु के लिए अपनी जान दे दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बैतलहम बैप्टिस्ट चर्च में मेरी सेवकाई और मेरा यहाँ आगमन, एक हिमशिला में आग लगाना है। एक बार मैंने ये तस्वीर अपने चर्च में दी, और 6-7 साल की एक छोटी लड़की, सभा समाप्त होने पर मेरे पास आयी--मैं अपने चर्च में बच्चों को प्रोत्साहित करता हूँ कि मेरे उपदेश के चित्र बनायें--और उसने कहा, ‘‘ये है जो मैंने देखा।’’ उसने एक अद्भुत हिमशिला बनायी था जिस पर मीनियापोलिस लिखा था, इसमें छोटी छड़ी लिये हुए एक आदमी भी था जो एक मशाल थामे हुए था और ऊपर, हिमशिला में एक छिद्र था। इसके ऊपर, उस छिद्र में से नीचे आती हुई, सूरज की बहुत सी रोशनी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, यहाँ संक्षिप्त में मेरा युगान्त-विज्ञान है। यदि आप समझना चाहते हैं कि जब यीशु आते हैं तो आपका आहाता किस प्रकार का दिखने वाला है, या ऑस्टिन या मीनियापोलिस, या जहाँ से भी आप आयें हैं वो कैसा दिखने वाला है हिमशिला खिसक रही है, और बहुत से लोग परमेश्वर के प्रति ठण्डे पड़ रहे हैं--सूख रहे हैं--जम रहे हैं--लेकिन अन्त के समयों के बारे में बाइबल में ऐसा कुछ नहीं है जो कहता है कि ‘‘बैतलहम बैप्टिस्ट चर्च’’, या यहाँ तक कि ‘‘मीनियापोलिस’’ या कहिये, ‘‘ऑस्टिन के टेक्सास विश्वविद्यालय को उस हिमशिला के नीचे आना है।’’ कुछ भी नहीं&amp;amp;nbsp;! यदि परमेश्वर के लिए श्वेत-तप्त जलती मशालों के साथ पर्याप्त लोग हों, जो हिमशिला में मशाल लगा रहे हों, तो आपके कैम्पस के ऊपर, आपके चर्च के ऊपर, और यहाँ तक कि आपके शहर के ऊपर, एक बड़ा छिद्र खुल जायेगा। और इसी कारण मैं यहाँ हूँ मैं अपनी मशाल ऊपर उठाना चाहता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग सौ साल पूर्व, ‘स्पर्जन’ सारे इंगलैण्ड में कहा करते थे, जब उन्होंने ‘मैर्टोपोलिटन टैबरनेकल’ में प्रचार किया, ‘‘लोग मुझे जलता हुआ देखने के लिए आते हैं।’’ वे आते हैं कि अपनी टिमटिमाती हुई छोटी मशाल लायें और मेरी मशाल से चिपकायें और बाहर जाकर एक और सप्ताह के लिए, यीशु के लिए जलें। मैं गद्गद हो जाऊंगा यदि आज सुबह आप एक टिमटिमाती हुई मशाल यहाँ लाये हैं और इसे मेरी अग्नि में डालते हैं। इसी लिए मैं यहाँ हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस संदेश का उद्देश्य&amp;amp;nbsp;: एक नींव बनाना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो मैं करना चाहता हूँ उसके लिए एक नींव है। यहाँ मेरा काम है, परमेश्वर की महिमा के लिए जीवित रहने, परमेश्वर की महिमा के लिए एक धुन होने, के बारे में बात करना। मेरे पास दो संदेश हैं आज सुबह और कल सुबह। आज सुबह नींव है और कल सुबह इसका अनुप्रयोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नींव ये हैरू सब बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए आपकी धुन, सीधे, सब बातों में आधिपत्य के लिए परमेश्वर की धुन, पर आधारित है। आपकी परमेश्वर-केन्द्रता--यदि ये बनी रहने वाली है--परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता में जड़ पकड़े होनी चाहिए। यदि आप चाहते हैं कि आपकी जिन्दगी में परमेश्वर सर्वोच्च रहे, आपको देखना, और विश्वास करना, इस सच से प्रेम करना होगा कि परमेश्वर के जीवन में परमेश्वर सर्वोच्च है। यदि आप चाहते हैं कि परमेश्वर आपके धन रहे-- जैसा कि हमने अभी यहाँ गाया--ताकि आप किसी भी चीज से बढ़कर परमेश्वर का मूल्य जानें, आपको देखना और विश्वास करना होगा कि परमेश्वर का धन परमेश्वर है, और यह कि किसी और चीज से बढ़कर जिसे ‘वह’ बहुमूल्य समझता है, ‘वह’ परमेश्वर को बहुमूल्य समझता है। हम विश्व के उच्चतम आनन्द को परमेश्वर को देने से इन्कार न करें, यथा, परमेश्वर की आराधना। वो नींव हैय वही है जिसके बारे में मैं आज बात करना चाहता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और फिर कल, मैं परमेश्वर में आपके आनन्द के लक्ष्य के बारे में बात करना चाहता हूँ और यह कि ये लक्ष्य आवष्यक रूप से, आपके जीवन में ‘उसकी’ महिमा के, परमेश्वर के लक्ष्य में, समाविष्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर 'उसकी' महिमा के लिए धुन से भरा है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम एक छोटी कहानी से आरम्भ करें मैं, ‘व्हीटन’ काॅलेज--मेरा अपना महाविद्यालय--में लगभग 8 या 9 साल पहिले, बोला। इस बड़े, झाड़-फानूस से सजे, नीले, सुन्दर प्रार्थनालय में ये मेरा पहिला अवसर था। और, मैं खड़ा हुआ, और मैंने कहा, ‘‘परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य है, परमेश्वर को महिमित करना और सदा के लिए ‘उसका’ आनन्द उठाना।’’ और मेरे सभी मित्र जो ऊपर बालकनी में थे कह उठे, ‘‘ओह नहीं, उसने बीस साल बाद आकर अपने स्वयँ के महाविद्यालय में इन छात्रों से बोलने के अपने पहिले ही अवसर में, कबाड़ा कर दिया, और वह वैस्टमिनिस्टर कैटिकिज़्म (धर्मशिक्षा)का पूरी तरह गलत उद्धरण देता है और ‘मनुष्य का प्रमुख लक्ष्य’ की बनिस्बत ‘परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य’ कहता है।’’’ और उनकी बड़ी राहत के लिए मैं कहता गया, ‘‘मेरा वास्तव में वही अर्थ है।’’ और इस सुबह वास्तव में मेरा यही कहना है परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य है, परमेश्वर को महिमित करना और सदा के लिए ‘उसका’ आनन्द उठाना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं एक सुसमाचार-प्रचारक के घर में पला-बढ़ा हूँ। मेरे पिता, ‘बिल पाइपर’ ने, जब मैं छोटा सा ही था, 1 कुरिन्थियों 10: 31 पद सिखाया ‘‘सो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।’’ लेकिन मैंने किसी को ये कहते हुए नहीं सुना कि परमेश्वर, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करता है। और यह कि परमेश्वर की महिमा के लिये मेरे जीने की जड़ ये है कि परमेश्वर, परमेश्वर की महिमा के लिये जीता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने संडे-स्कूल का कोई पर्चा जो घर लाया गया हो, कभी नहीं देखा जो ये कहता है, ‘‘परमेश्वर तुम से जितना प्रेम करता है, उस से अधिक स्वयँ से प्रेम करता है, और वहीं पर मात्र ये आशा पायी जाती है कि ‘वह’ आप से, अयोग्य जैसे कि आप हैं,, प्रेम कर सके।’’ संडे-स्कूल के किसी पर्चे में वो कभी नहीं पढ़ा, वही कारण है कि बैतलहम बैपटिस्ट चर्च में हम पाठ्य-क्रम पर काम कर रहे हैं। हम में से अधिकांश घरों में, और कलीसियाओं में पले-बढ़े हैं, जहाँ हम मसीही होने के बारे में इस अंश तक उत्तेजित हो गए कि हमने सोचा कि परमेश्वर हमारे बारे में उत्साहित था, उस अंश तक नहीं जितना हम एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर के बारे में उत्साहित हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मनुष्य-केन्द्रित संसार में, जहाँ स्वयँ पर अभिमान सर्वोच्च मूल्य है, इस अंश तक एक मसीही होना बहुत सरल है, कि परमेश्वर के बिना, आपने किसी भी तरह जो भी किया हो, ये उसे सहारा देता है। कौन मसीही नहीं रहेगा&amp;amp;nbsp;? हाँ, आप एक मसीही नहीं हैं यदि आप केवल उस से प्रेम करते हैं जिस से आपने, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर की सुन्दरता से सामना हुए बिना, प्रेम किया होता। यदि परमेश्वर आपकी स्व-उन्नति और ऊँचा उठने का मात्र एक माध्यम है, बनिस्बत इसके कि आपने ‘उसमें’ कुछ असीम महिमित देखा होता, एक ऐसे परमेश्वर के रूप में जो अपनी महिमा के प्रगटीकरण में लिप्त है, तब आपको आपके मन-परिवर्तन को जाँचने की आवश्यकता है। अतः, यहाँ ऑस्टिन में ‘पैशन-97’ में, एक बड़ी वास्तविक जाँच है। बहुत कम लोगों ने कभी मुझसे कहा या मुझे दिखाया है, जो अब मैंने बाइबल में देखा है, कि परमेश्वर ने मुझे ‘उसकी’ महिमा के लिए चुना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1976 में, इफिसियों 1 पर एक कक्षा में शिक्षण देना, उसमें, जिसे बेथेल काॅलेज में उन दिनों में हम ‘‘अन्तरिम-काल ’’ (‘‘इन्टरिम’’)कहते थे, क्रमबद्ध रूप से इफिसियों की 14 आयत तक बढ़ना और मेरे संसार का पुनः खिल उठना, मुझे स्मरण है। क्योंकि तीन बार--पद 6, 12, और 14--ये कहता है कि ‘उस’ ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहिले ‘उस’ में चुन लिया और पहिले से ठहराया कि हम ‘उसके’ पुत्र हों, ताकि उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उसने’ आपको चुना। क्यों&amp;amp;nbsp;? ताकि ‘उसकी’ महिमा और अनुग्रह की स्तुति हो और बढ़े। आपका उद्धार, परमेश्वर को महिमा देने के लिए है। आपका चुना जाना, परमेश्वर को महिमा देने के लिए है। आपका पुन-रुज्जीवन, परमेश्वर को महिमा देने के लिए था। आपको निर्दोष ठहराया जाना परमेश्वर की महिमा के लिए था। आपका पवित्रीकरण, परमेश्वर की महिमा के लिए है। और एक दिन आपकी महिमा-प्राप्ति, परमेश्वर की महिमा में अवशोशित हो जावेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आप परमेश्वर की महिमा के लिए सृजे गए थे |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशायाह 43: 6, 7:‘‘मेरे पुत्रों को दूर से और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी के छोर से ले आओ; हर एक को जो मेरा कहलाता है, जिसको मैं ने अपनी महिमा के लिये सृजा है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर ने मिस से 'उसकी' प्रजा इस्राएल को, 'उसकी' महिमा के लिए छुड़ाया |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मिस्र में हमारे पुरखाओं ने तेरे आश्चर्यकर्मों पर मन नहीं लगाया, न तेरी अपार करुणा को स्मरण रखा य उन्हों ने समुद्र के तीर पर, अर्थात् लाल समुद्र के तीर पर बलवा किया। तौभी उस ने अपने नाम के निमित्त उनका उद्धार किया, जिस से वह अपने पराक्रम को (और महिमा को)प्रगट करे।’’ भजन संहिता 106: 7, 8। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, ‘उसने’ लाल समुद्र को दो भाग किया और अपने बलवा करने वाले लोगों का उद्धार किया, ताकि ‘वह’ अपनी पराक्रमी सामथ्र्य प्रगट करे। और ये यरीहो तक फैलती चली गयी और एक वेश्या का उद्धार किया, ताकि जब वे वहाँ पहुँचे और तुरहियाँ बजाने को तैयार हुए, उसने नया जन्म पाया क्योंकि उसने कहा, ‘‘हमने तेरा नाम और तेरी कीर्ति सुनी है।’’ और एक स्त्री और उसके परिवार ने, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर में विश्वास किया और विनाश से बच गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर ने जंगल में इसाएल पर दया, 'उसकी' महिमा के लिए की |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने जंगल में इस्राएल को बार-बार क्षमा किया। ‘‘इस्राएल के घराने ने जंगल में मुझ से बलवा किया,’’ परमेश्वर को उद्धृत करते हुए, यहेजकेल कहता है, ‘‘और मैंने कहा, मैं अपनी जलजलाहट उण्डेलूंगा, परन्तु मैंने अपने नाम के निमित्त ऐसा किया ताकि वे उन जातियों के सामने अपवित्र न ठहरें।’’ और तब अन्ततः परमेश्वर दण्ड-स्वरूप उन्हें बाबुल में भेजता है, और 70 साल के बाद उन पर दया होती है। ‘वह’ अपनी वाचा की दुल्हिन को तलाक नहीं देगा और ‘वह’ उन्हें वापिस ले आता है। लेकिन क्यों&amp;amp;nbsp;? परमेश्वर के हृदय में क्या ध्येय बसा हुआ है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशायाह 48 से इसे सुनियेरू ‘‘अपने ही नाम के निमित्त मैं क्रोध करने में विलम्ब करता हूं, और अपनी महिमा के निमित्त अपने तईं रोक रखता हूं, ऐसा न हो कि मैं तुझे काट डालूं। देख, मैं ने तुझे निर्मल तो किया, परन्तु, चान्दी की नाईं नहीं: मैं ने दुःख की भट्टी में परखकर तुझे चुन लिया है। अपने निमित्त, हां अपने ही निमित्त मैं ने यह किया है, मेरा नाम क्यों अपवित्र ठहरे&amp;amp;nbsp;? अपनी महिमा मैं दूसरे को नहीं दूंगा।’’ दया के लिए, वो परमेश्वर-केन्द्रित अभिप्राय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर की महीमा के लिए. यीशु आये और मर गये |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु संसार में किस कारण से आये&amp;amp;nbsp;? ओ, कितनी बार हमने यूहन्ना 3: 16 को उद्घृत किया है। और ये चमत्कारपूर्ण ढंग से सच है। और इसके पूर्व कि आज सुबह हम समाप्त करें, या कम से कम कल सुबह, आप देखेंगे कि अभी ये जोर देना और वो जोर देना, जो आप सम्भवतः लम्बे समय से जानते हैं, एक-दूसरे से विषम नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन ‘वे’ क्यों आये&amp;amp;nbsp;? यीशु क्यों आये&amp;amp;nbsp;? रोमियों 15: 8 के अनुसार, ‘वे’ इस कारण से आये: ‘‘जो प्रतिज्ञाएं बापदादों को दी गई थीं, उन्हें दृढ़ करने के लिये मसीह, परमेश्वर की सच्चाई का प्रमाण देने के लिये खतना किए हुए लोगों का सेवक बना और अन्यजाति भी दया के कारण परमेश्वर की बड़ाई (महिमा)करें ।’’ मसीह पृथ्वी पर आये, स्वयँ पर मांस धारण किया, और मर गए ताकि आप दया के लिए ‘उसके’ पिता की महिमा दे सकें। ‘वह’ अपने पिता की खातिर आया। यही प्रमुख कारण है कि ‘वे’ आये, ‘उसके’ पिता की महिमा के लिये। और यह महिमा, दया के उमड़ने में, अपने सर्वोच्च शिखर तक पहुंचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 3 से इस वचन को सुनिये: ‘‘परमेश्वर ने मसीह को उसके लोहू के द्वारा एक प्रायश्चित के रूप में सामने लाया कि परमेश्वर की धार्मिकिता प्रगट हो। ये वर्तमान समय में ये प्रमाणित करने के लिए था कि वह स्वयं धार्मिक है। इसी कारण वह मरा। वह परमेश्वर की धार्मिकता को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए मरा, जिसने ऐसे पापों से आनाकानी की (पापों को लांघ गया)जैसे कि दाऊद का व्यभिचार और हत्या।’’ क्या इसने कभी आपको परेशान किया है परमेश्वर ने इसे अनदेखा किया और दाऊद ने राजा बने रहना जारी रखा&amp;amp;nbsp;? हां, इसने पौलुस को उसकी अन्र्तात्मा की गहराई तक परेशान किया कि पापों को अनदेखा करने में परमेश्वर धार्मिक नहीं है। और ये मात्र दाऊद नहीं था। पुराना नियम में हजारों भक्त रहे हैं और आज भी, जिनके पाप ‘वह’ सरलता से भुला देता और अनदेखा करता है। और पौलुस चिल्ला उठा, ‘‘आप परमेश्वर होते हुए ऐसा कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप धार्मिक होते हुए वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप न्यायी होकर वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप आराधना के योग्य होकर वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;?’’--यदि ‘ऑस्टिन’ में किसी न्यायाधीश ने ऐसा किया होता, यदि उसने एक बाल- दुरुपयोग करने वाले, एक बलात्कारी, एक हत्यारे को दोषमुक्त कर दिया होता, वह एक मिनिट में अपने पद से हटा दिया जाता,--‘‘और आप ये प्रतिदिन करते हैं, तो आप किस प्रकार के परमेश्वर हैं&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूस, एक महा-धर्मविज्ञानी समस्या का समाधान है, यथा, परमेश्वर कैसे परमेश्वर होते हुए पापों को क्षमा कर सकता है&amp;amp;nbsp;? मसीह आया कि आप जैसे व्यक्ति को बचाने में परमेश्वर को दोषमुक्त करे। उद्धार, भव्य रूप से और चमत्कारपूर्ण ढंग से परमेश्वर-केन्द्रित चीज है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यीशु महिमा पाने के लिये वापिस आ रहे हैं |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वे’ पुनः क्यों आ रहे हैं&amp;amp;nbsp;? साथियो, यीशु आ रहे हैं, ‘वे’ आ रहे हैं। और मैं आपको बता दूँ कि ‘वे’ क्यों आ रहे हैं और जब ‘वे’ आते हैं तक आप क्या कर सकते हैं, ताकि आप तैयार रहें और इसे करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 थिस्सलुनीकियों 1: 9&amp;amp;nbsp;: ‘‘वे जो सुसमाचार को नहीं मानते, प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पायेंगे, जब ‘वह’ उस दिन, अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने और सब विश्वास करने वालों में आश्चर्य का कारण होने को आयेगा।’’ आप इन दो चीजों को देखते हैं&amp;amp;nbsp;? ‘वे’ आ रहे हैं कि अपने भक्तों में महिमा और बड़ाई पायें, और आश्चर्य का कारण हों। यदि आप अभी उस पर आरम्भ नहीं करते हैं, तो जब ‘वे’ आयेंगे आप इसे नहीं कर पायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सम्मेलन विद्यमान है कि आपकी हड्डियों में एक आग लगा दे और आपके दिमाग और हृदयों में एक आग भड़का दे कि राजा यीशु से मिलने के लिए आपको तैयार करे, ताकि सारे सनातन काल में आप वो करना जारी रख सकें जिसे करने के लिए ‘उसने’ आपको सृजा है, यथा, ‘उस’ पर आश्चर्य करने और ‘उसकी’ बड़ाई करने। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमें परमेश्वर को टेलिस्कोप के सामान बड़ा करना चाहिए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उसे’ बड़ा बनाइये, किन्तु माइक्रोस्कोप के समान नहीं। दो प्रकार के आवर्धन के बारे में आप जानते हैं, क्या नहीं जानते&amp;amp;nbsp;? एक, टेलिस्कोप से बड़ा करना और दूसरा माइक्रोस्कोप से बड़ा करना है, और परमेश्वर को एक माइक्रोस्कोप के समान बड़ा बनाना, निन्दा है। परमेश्वर को माइक्रोस्कोप के समान बड़ा बनाना ऐसा है मानो कुछ सूक्ष्म लिया जावे और इसे उससे बड़ा करके दिखाया जावे जितना कि वो है। यदि आप परमेश्वर के साथ वैसा करने का प्रयास करते हैं, आप निन्दा करते हैं। किन्तु एक टेलिस्कोप अपने लैंसों को विशालता के अकल्पनीय विस्तार पर रखती है और उन्हें, जैसे वे हैं वैसा दिखाने में सहायता करने का मात्र प्रयास करती है। एक टेलिस्कोप इसी के लिए है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट्न्विकल, ट्न्विकल लिटिल स्टार--आप रात्रि में ऊपर देखते हैं और वे सुई की नोक के समान दिखते हैं। वे ऐसे नहीं हैं। आप उसे जानते हैं, आप काॅलेज में हैं, सही है&amp;amp;nbsp;? वे बड़े हैं। वे वास्तव में बहुत बड़े हैं, और वे गरम हैं&amp;amp;nbsp;! और आप के पास इसके सिवाय कोई सुराग नहीं है कि एक समय किसी ने एक टेलिस्कोप का अविष्कार किया, अपनी आँख वहाँ रखी, और उन्होंने सोचा, ‘‘ये पृथ्वी से बड़ा है, पृथ्वी से लाखों गुना बड़ा।’’ परमेश्वर ऐसा ही है। आपका जीवन इसलिए विद्यमान है कि आप अपने अहाते/कैम्पस में परमेश्वर की महिमा को आवर्धित करें। ये एक बड़ी बुलाहट है। कैसे&amp;amp;nbsp;? इसके बारे में मैं कल बात करूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यदि परमेश्वर, परमेश्वर केन्द्रित है, 'वह' कैसे प्रेम करने वाला हो सकता है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ वो मुख्य प्रश्न है जिसके साथ मैं समाप्त करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वो यहाँ उठना आरम्भ होता है। मैंने ये सत्य कहा है, कि परमेश्वर, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर है और ये कि ‘उसकी’ परमेश्वर-केन्द्रतता, मेरे परमेश्वर-केन्द्रतता की जड़ है। मैंने बीस साल तक लोगों से वो कहा है, और प्रश्न उठना आरम्भ होता हैरू ‘‘ये प्रेममय ध्वनित नहीं होता, क्योंकि 1 कुरिन्थियों 13: 5 में बाइबल कहती है, ‘‘प्रेम अपनी भलाई नहीं चाहता।’ और आप हमें अभी पिछले पन्द्रह मिनिट से कह रहे हैं, कि परमेश्वर अपना सारा समय अपनी भलाई ढूंढने में खर्च करता है। अतः या तो परमेश्वर प्रेमी नहीं है या आप एक झूठे हैं।’’ और ये एक बड़ी समस्या है। अतः मुझे उत्तर देने का प्रयास करने दीजिये कि ये कैसे है कि परमेश्वर अपने स्वयँ को ऊंचा उठाने की खोज में, प्रेममय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सी. एस. लेविस से सहायता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इसकी कुंजी सी.एस. लेविस में पायी। यदि आप में से किसी ने डिजायरिंग गाॅड पढ़ी है, तब आपको ये उद्धरण याद होगा। लेविस 28-29 की उम्र तक एक मूर्तिपूजक था और वह परमेश्वर की व्यर्थता से घृणा करता था। उसने कहा कि हर समय जब उसने भजन संहिता के इन वचनों को पढ़ा, ‘‘यहोवा की स्तुति करो, यहोवा की स्तुति करो’’--और वह मसीही धर्म-शिक्षा जानता था, कि भजन प्रेरणा से लिखे गये थे--वह जानता था कि ये वास्तव में परमेश्वर कह रहा है, ‘‘मेरी स्तुति करो, मेरी स्तुति करो’’ और ये ऐसा ध्वनित होता था मानो कोई बूढ़ी स्त्री प्रशंसा की खोज कर रही हो। ये रिफलेक्षनस् ऑन द साम्स से एक उद्धरण है। और तब अचानक परमेश्वर, सी.एस. लेविस के जीवन में आये। और ये है वो जो उसने लिखा&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; स्तुति के बारे में सर्वाधिक स्पष्ट तथ्य, चाहे परमेश्वर की या किसी और की, आश्चर्यजनक रूप से मुझसे छुपी रही। मैंने इसके बारे में, प्रशंसा, अनुमोदन, सम्मान देने के अर्थों में सोचा। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था कि स्तुति में सब प्रकार का आनन्द आप से आप ही उमण्ड़ता है, जब तक कि कभी-कभी हम इसे रोकने के लिए लज्जा को न ले आयें। संसार स्तुति से गूंजता हैरू प्रेमी अपनी प्रेमिका की प्रशंसा करते हैं, पाठक अपने मन-पसन्द कवियों की, टहलने वाले प्राकृतिक दृश्यों की प्रशंसा करते हैं, खिलाड़ी उनके पसन्द के खेलों की प्रशंसा करते हैं, मौसम, वाइन्स, व्यंजनों, अभिनेताओं, घोड़ों, काॅलेजों , देशों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, बच्चों, फूलों, पर्वतों, दुर्लभ टिकटों, दुर्लभ भृंगों, यहाँ तक कि कभी-कभी राजनीतिञों और विद्वानों की प्रशंसा । परमेश्वर की प्रशंसा के साथ मेरी सम्पूर्ण सामान्य कठिनाई, हम से बेतुके रूप से नकारने पर निर्भर थी, जहाँ तक सर्वोच्च रूप से मूल्यवान् की बात है, हम क्या करने में आनन्दित होते हैं--यहाँ तक कि हम जिसे कर नहीं सकते--उस हर एक चीज के बारे में जिसकी हम कद्र करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अब मूल-भाव के वाक्य ये हैं&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं सोचता हूँ कि हम जिस चीज का आनन्द लेते हैं उसकी प्रशंसा करने में प्रसन्न होते हैं, क्योंकि आनन्द तब तक पूर्ण नहीं है जब तक कि इसे व्यक्त न किया जावे। ये अभिनन्दन में से नहीं है कि प्रेमीगण एक-दूसरे से कहते रहते हैं कि वे कितने सुन्दर हैं। प्रसन्नता अधूरी है, जब तक कि इसे व्यक्त न किया जावे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मेरे लिये वो एक कुंजी थी जिसने कुछ इससे सम्बन्धित खोल दिया कि परमेश्वर, जो कुछ ‘वो’ करता है, उसमें कैसे प्रेममय और स्वयँ को ऊंचा करने वाला हो सकता है। यह इस प्रकार से है। आइये, मैं आपके लिए टुकड़ों को जोड़ दूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रश्न का उत्तर''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि परमेश्वर को आपसे प्रेम करना है, ‘उसे’ आपको क्या देना चाहिए&amp;amp;nbsp;? ‘उसे’ आपको वो देना चाहिए जो आपके लिए सर्वोत्तम है। सारे विश्व में सबसे अच्छी चीज है, परमेश्वर। यदि ‘वह’ आपको भरपूर स्वास्थ्य, सर्वोत्तम नौकरी, सर्वोत्तम जीवन-साथी, सर्वोत्तम कम्पयूटर, सर्वोत्तम छुट्टियाँ, किसी भी क्षेत्र में सर्वोत्तम सफलता देता और फिर भी स्वयँ को न देता, तब ‘वह’ आपसे घृणा करता होता। और यदि ‘वह’ आपको ‘परमेश्वर’ देता है और इससे हटकर कुछ भी नहीं, ‘वह’ आपसे असीम प्रेम करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे सुख के लिए मेरे पास परमेश्वर होना चाहिए, यदि परमेश्वर मेरे प्रति प्रेममय रहने वाला है तो। अब, लेविस ने कहा है कि यदि परमेश्वर आपको, सारे अनन्तकाल में सुख पाने के लिए, अपने आप को दे देता है, तो वह आनन्द कभी भी उत्कर्ष तक नहीं पहुँचेगा, जब तक कि आप इसे प्रशंसा/स्तुति में व्यक्त न कर दें। इसलिए, आपको पूर्ण रीति से प्रेम करने के लिए, परमेश्वर इस बारे में उदासीन नहीं हो सकता कि आप स्तुति के द्वारा अपने आनन्द को उत्कर्ष तक लाते हैं या नहीं। इसलिए, परमेश्वर को आपकी स्तुति की खोज में रहना अवश्य है, यदि ‘उसके’ द्वारा आपको प्रेम किया जाना है। क्या ये सार्थक लगता है&amp;amp;nbsp;? मुझे संदेह है कि मुझे ये आपके समक्ष दोहराना पडे़गा। मेरे जीवन का सार-तत्व यही है। मुझे विश्वास है कि बाइबल का सार-तत्व यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेम करने के लिए, ‘उसे’ आपको वो देना अवश्य है जो आपके लिए सर्वोत्तम है। आपके लिए जो सर्वोत्तम है, वो परमेश्वर है। ‘‘तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा य तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है’’ (भजन 16: 10)। हमारे सुख के लिए परमेश्वर स्वयँ को हमें देता है। लेकिन लेविस ने हमें दिखाया है कि जब तक ये &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख, परमेश्वर की स्तुति में अभिव्यक्ति न पायें, तो ये सुख सीमित हैं। और इसलिए परमेश्वर, आपके सुख को किसी भी तरह सीमित करने की चाह न रखते हुए, कहता है, ‘‘मेरी स्तुति करो। हर एक काम जो तुम करते हो उसमें, मेरी स्तुति करो। हर चीज जो तुम करते हो, उसमें मेरा नाम ऊंचा उठाओ। हर काम जो तुम करते हो, उसमें मेरे आधिपत्य के लिए धुन रखो,’’ जिसका सरलता से अर्थ है कि महिमित होने के लिए परमेश्वर की धुन और आनन्द करने के लिए और सन्तुष्ट होने के लिए आपकी धुन, एक-दूसरे से विषम नहीं हैं। वे एक साथ आते हैं। परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, आज सुबह की बातचीत का यह अन्त है। मैं आपको बता दूँ कि इसके साथ हम कल कहाँ जा रहे हैं, ताकि आप इस दिशा में प्रार्थना कर सकें, और ताकि आप आ सकें, जिसकी मैं आशा करता हूँ, और मुझे समाप्त करने दें, क्योंकि मैंने समाप्त नहीं किया है। यदि ये सच है, कि परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं--और इसलिए ‘उस’ में आपका सन्तोष और, ‘उसका’ आप में महिमित होने में, कोई तनाव या विरोधाभास नहीं है--तब आपके जीवन का व्यवसाय, आपके सुख का पीछा करना है। मैं इसे मसीही सुखवाद कहता हूँ, और मैं कल इस बारे में आप से बात करना चाहता हूँ कि आप इसे कैसे करें और क्यों ये आपके सम्बन्धों को, आपके आहातों, आपकी आराधना, और आपके सनातनकाल को रूपान्तरित कर देगा।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन, भाग-1</title>
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				<updated>2016-03-17T18:48:05Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Passion for the Supremacy of God, Part 1}}   ==== कारण -1 ====  मैं आरम्भ करना चाहता हूँ, आपको कुछ क...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Passion for the Supremacy of God, Part 1}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -1 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आरम्भ करना चाहता हूँ, आपको कुछ कारण बताते हुए कि मैं यहाँ क्यों हूँ। एक स्थानीय कलीसिया में 16 - 17 वर्षों तक पासवान् रहे आने का एक बड़ा लाभ ये है कि बीतते महीनों और वर्षों के साथ, कलीसिया का दर्शन और पासवान् का दर्शन एक हो जाता है । लगभग एक साल पहिले हमने एक दर्शन-बयान प्रस्तुत किया था जो इस प्रकार है&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; सब लोगों के आनन्द के लिए, सभी बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए धुन को फैलाने के लिए, हम अस्तित्व में हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि बिना किसी हिचकिचाहट के मैं कह सकता हूँ कि ये मेरा जीवन-लक्ष्य है और साथ ही साथ बैतलहम- बैप्टिस्ट-चर्च का लक्ष्य। अतः जब मुझे निमंत्रण मिला, इस सम्मेलन के बारे में पढ़ा, शब्द ‘‘धुन’’ को देखा, और यशायाह 26:8 के पीछे सच्चाई को देखा--‘‘हम लोग तेरी बाट जोहते आये हैं; तेरे नाम के स्मरण की हमारे प्राणों में लालसा बनी रहती है’’--मैं फँस गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आप सब के और इस संसार के सब लोगों के आनन्द के लिए, सभी बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाना चाहता हूँ। अतः ये कारण संख्या एक है, कि मैं यहाँ क्यों हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -2 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कारण संख्या दो ये है कि मैं आपके आनन्द को प्रदीप्त करने में एक माचिस की तीली बनना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि परमेश्वर में रोमांचित और आनन्दित होकर, आप इस जगह से जायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== कारण -3 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तीसरा कारण है कि मैं चाहता हूँ कि आप धर्म-शास्त्र में से देखें कि कारण संख्या एक और कारण संख्या दो, दोनों समान कारण हैं। वे एक हैं। अर्थात्, परमेश्वर के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाना और परमेश्वर में सुखी रहना, यर्थाथ में अभिन्न हैं। क्योंकि परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक वाक्य है जिस पर मैं बार-बार लौटूंगा परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। अतः वे गीत जो हम गा रहे थे और वो प्यास जो हम व्यक्त कर रहे थे, परमेश्वर को महिमा देने के तरीके हैं। क्योंकि जितना अधिक हम ‘उस’ में सन्तुष्टि पाते हैं, उतनी ही अधिक गहराई से हम ‘उस’ में से पीते हैं और उस भोज की मेज से खाते हैं जो ‘वह’ स्वयँ है, उतना ही अधिक ‘उस’ का मूल्य और ‘उस’ की सर्व-पर्याप्ति आवर्धित होती है। अतः कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है--ये मेरे लिए वो अचरज है, मेरे लिए वो सुसमाचार है जो मैंने ‘68, ‘69 और ‘70 में खोजा, जब परमेश्वर मेरे जीवन में एक काम कर रहा था। महिमित होने के लिए परमेश्वर की धुन, और सन्तुष्ट होने के लिए आपकी धुन में, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, क्योंकि वे एक हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तीसरे कारण को कि मैं यहाँ क्यों हूँ, कहने का एक और ढंग है&amp;amp;nbsp;: मैं यहाँ हूँ कि एक हिमनदी में मशाल जला दूँ। मेरे दिमाग में एक तस्वीर है। यह मत्ती 24 में से निकली। मत्ती 24: 12 में, युग के अन्त को देखते हुए, यीशु कहते हैं&amp;amp;nbsp;: ‘‘अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।’’ मैं ठण्डा पड़ने से, मृत्यु के समान भयभीत हूँ। मैं इस विचार से घृणा करता हूँ कि परमेश्वर के लिए मेरा प्रेम अथवा लोगों के लिए मेरा प्रेम एक दिन सूख जावे या जम जावे। फिर भी यीशु कहते हैं ‘‘ये आ रहा है!’’ ये एक हिमनदी के समान सारे संसार में आ रहा है। अतः अन्त के दिनों के लिए मेरी उम्मीद का एक हिस्सा ये है कि अधर्म बहुत बढ़ता जायेगा और ये कि बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा। अब, अन्त के दिनों का यह एक बहुत रूखा विवरण हो सकता है। किन्तु यदि आप मत्ती में, नीचे एक पद 13 तक पढ़ते जायें, ये कहता है, ‘‘परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा’’--अतः कोई व्यक्ति धीरज धरने वाला है। और अगला पद कहता है, ‘‘और राज्य का यह सुसमाचार’’--उसकी व्याख्या कीजिये, ‘‘राजा यीशु के आधिपत्य के लिए एक धुन को फैलाने का ये सुसमाचार--‘‘राज्य का ये सुसमाचार, सब जातियों में एक साक्षी के रूप में प्रचार किया जावेगा, और तब अन्त आ जायेगा।’’ अब पद 12 को पद 14 के बाजू में रखिये और देखिये कि क्या आप तनाव महसूस करते हैं। ‘‘अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।’’ किन्तु, ‘‘राज्य का यह सुसमाचार’’--मसीह के प्रभुसत्ता-सम्पन्न शासन का--‘‘सब जातियों में फैल जावेगा और तब अन्त आ जायेगा।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, उन दो आयतों के बीच एक तनाव है। कारण कि मैं जानता हूँ कि ये है, इसलिए कि वे लोग ठण्डे नहीं हैं जो सुसमाचार को वापिस आपके आहाते/कैम्पस में ले जाने वाले हैं। ये ठण्डे लोग नहीं हैं जो इसे संसार के, सुसमाचार न पाये हुए, लोगों तक इसे पहुँचाने वाले हैं। अब, मैं वो कैसे जानता हूँ&amp;amp;nbsp;? क्योंकि यदि आप वापिस दो आयतों, पद 9 तक जायें, आप एक भविष्यसूचक वचन में कुछ पायेंगे जो कि बहुत-बहुत भिन्न है। ये कहता है, ‘‘तब वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे,’’ यीशु कहते हैं। अब, यदि ये सच है--यदि हम अपने सुसमाचार-प्रचार की मजदूरी में अधिकारियों को सौंपे जायेंगे, यदि हम मार डाले जायेंगे, यदि हम प्रत्येक जाति के द्वारा घृणा किये जायेंगे जिनमें हम जायेंगे--मैं एक बात निष्चित जानता हूँरू ये ठण्डे लोग नहीं हैं जो वो संदेश दे रहे हैं। ये, राजा यीशु के, श्वेत-तप्त आराधक हैं, जो उस को पूरा करेंगे। इसलिए, मत्ती 24 की 9 से 14 आयतों में मैं जो देखता हूँ वो ये कि, जैसे-जैसे युग का अन्त निकट आ रहा है, ऐसे लोग होने जा रहे हैं जो बर्फीले ठण्डे होते जा रहे हैं और ऐसे लोग होने जा रहे हैं जो पर्याप्त लाल-गर्म हैं कि संसार के सब लोगों के मध्य, यीशु के लिए अपनी जान दे दें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः बैतलहम बैप्टिस्ट चर्च में मेरी सेवकाई और मेरा यहाँ आगमन, एक हिमशिला में आग लगाना है। एक बार मैंने ये तस्वीर अपने चर्च में दी, और 6-7 साल की एक छोटी लड़की, सभा समाप्त होने पर मेरे पास आयी--मैं अपने चर्च में बच्चों को प्रोत्साहित करता हूँ कि मेरे उपदेश के चित्र बनायें--और उसने कहा, ‘‘ये है जो मैंने देखा।’’ उसने एक अद्भुत हिमशिला बनायी था जिस पर मीनियापोलिस लिखा था, इसमें छोटी छड़ी लिये हुए एक आदमी भी था जो एक मशाल थामे हुए था और ऊपर, हिमशिला में एक छिद्र था। इसके ऊपर, उस छिद्र में से नीचे आती हुई, सूरज की बहुत सी रोशनी थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, यहाँ संक्षिप्त में मेरा युगान्त-विज्ञान है। यदि आप समझना चाहते हैं कि जब यीशु आते हैं तो आपका आहाता किस प्रकार का दिखने वाला है, या ऑस्टिन या मीनियापोलिस, या जहाँ से भी आप आयें हैं वो कैसा दिखने वाला है हिमशिला खिसक रही है, और बहुत से लोग परमेश्वर के प्रति ठण्डे पड़ रहे हैं--सूख रहे हैं--जम रहे हैं--लेकिन अन्त के समयों के बारे में बाइबल में ऐसा कुछ नहीं है जो कहता है कि ‘‘बैतलहम बैप्टिस्ट चर्च’’, या यहाँ तक कि ‘‘मीनियापोलिस’’ या कहिये, ‘‘ऑस्टिन के टेक्सास विश्वविद्यालय को उस हिमशिला के नीचे आना है।’’ कुछ भी नहीं&amp;amp;nbsp;! यदि परमेश्वर के लिए श्वेत-तप्त जलती मशालों के साथ पर्याप्त लोग हों, जो हिमशिला में मशाल लगा रहे हों, तो आपके कैम्पस के ऊपर, आपके चर्च के ऊपर, और यहाँ तक कि आपके शहर के ऊपर, एक बड़ा छिद्र खुल जायेगा। और इसी कारण मैं यहाँ हूँ मैं अपनी मशाल ऊपर उठाना चाहता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लगभग सौ साल पूर्व, ‘स्पर्जन’ सारे इंगलैण्ड में कहा करते थे, जब उन्होंने ‘मैर्टोपोलिटन टैबरनेकल’ में प्रचार किया, ‘‘लोग मुझे जलता हुआ देखने के लिए आते हैं।’’ वे आते हैं कि अपनी टिमटिमाती हुई छोटी मशाल लायें और मेरी मशाल से चिपकायें और बाहर जाकर एक और सप्ताह के लिए, यीशु के लिए जलें। मैं गद्गद हो जाऊंगा यदि आज सुबह आप एक टिमटिमाती हुई मशाल यहाँ लाये हैं और इसे मेरी अग्नि में डालते हैं। इसी लिए मैं यहाँ हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस संदेश का उद्देश्य&amp;amp;nbsp;: एक नींव बनाना ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो मैं करना चाहता हूँ उसके लिए एक नींव है। यहाँ मेरा काम है, परमेश्वर की महिमा के लिए जीवित रहने, परमेश्वर की महिमा के लिए एक धुन होने, के बारे में बात करना। मेरे पास दो संदेश हैं आज सुबह और कल सुबह। आज सुबह नींव है और कल सुबह इसका अनुप्रयोग। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नींव ये हैरू सब बातों में परमेश्वर के आधिपत्य के लिए आपकी धुन, सीधे, सब बातों में आधिपत्य के लिए परमेश्वर की धुन, पर आधारित है। आपकी परमेश्वर-केन्द्रता--यदि ये बनी रहने वाली है--परमेश्वर की परमेश्वर-केन्द्रता में जड़ पकड़े होनी चाहिए। यदि आप चाहते हैं कि आपकी जिन्दगी में परमेश्वर सर्वोच्च रहे, आपको देखना, और विश्वास करना, इस सच से प्रेम करना होगा कि परमेश्वर के जीवन में परमेश्वर सर्वोच्च है। यदि आप चाहते हैं कि परमेश्वर आपके धन रहे-- जैसा कि हमने अभी यहाँ गाया--ताकि आप किसी भी चीज से बढ़कर परमेश्वर का मूल्य जानें, आपको देखना और विश्वास करना होगा कि परमेश्वर का धन परमेश्वर है, और यह कि किसी और चीज से बढ़कर जिसे ‘वह’ बहुमूल्य समझता है, ‘वह’ परमेश्वर को बहुमूल्य समझता है। हम विश्व के उच्चतम आनन्द को परमेश्वर को देने से इन्कार न करें, यथा, परमेश्वर की आराधना। वो नींव हैय वही है जिसके बारे में मैं आज बात करना चाहता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और फिर कल, मैं परमेश्वर में आपके आनन्द के लक्ष्य के बारे में बात करना चाहता हूँ और यह कि ये लक्ष्य आवष्यक रूप से, आपके जीवन में ‘उसकी’ महिमा के, परमेश्वर के लक्ष्य में, समाविष्ट है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर 'उसकी' महिमा के लिए धुन से भरा है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम एक छोटी कहानी से आरम्भ करें मैं, ‘व्हीटन’ काॅलेज--मेरा अपना महाविद्यालय--में लगभग 8 या 9 साल पहिले, बोला। इस बड़े, झाड़-फानूस से सजे, नीले, सुन्दर प्रार्थनालय में ये मेरा पहिला अवसर था। और, मैं खड़ा हुआ, और मैंने कहा, ‘‘परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य है, परमेश्वर को महिमित करना और सदा के लिए ‘उसका’ आनन्द उठाना।’’ और मेरे सभी मित्र जो ऊपर बालकनी में थे कह उठे, ‘‘ओह नहीं, उसने बीस साल बाद आकर अपने स्वयँ के महाविद्यालय में इन छात्रों से बोलने के अपने पहिले ही अवसर में, कबाड़ा कर दिया, और वह वैस्टमिनिस्टर कैटिकिज़्म (धर्मशिक्षा)का पूरी तरह गलत उद्धरण देता है और ‘मनुष्य का प्रमुख लक्ष्य’ की बनिस्बत ‘परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य’ कहता है।’’’ और उनकी बड़ी राहत के लिए मैं कहता गया, ‘‘मेरा वास्तव में वही अर्थ है।’’ और इस सुबह वास्तव में मेरा यही कहना है परमेश्वर का प्रमुख लक्ष्य है, परमेश्वर को महिमित करना और सदा के लिए ‘उसका’ आनन्द उठाना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं एक सुसमाचार-प्रचारक के घर में पला-बढ़ा हूँ। मेरे पिता, ‘बिल पाइपर’ ने, जब मैं छोटा सा ही था, 1 कुरिन्थियों 10: 31 पद सिखाया ‘‘सो तुम चाहे खाओ, चाहे पीओ, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करो।’’ लेकिन मैंने किसी को ये कहते हुए नहीं सुना कि परमेश्वर, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करता है। और यह कि परमेश्वर की महिमा के लिये मेरे जीने की जड़ ये है कि परमेश्वर, परमेश्वर की महिमा के लिये जीता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने संडे-स्कूल का कोई पर्चा जो घर लाया गया हो, कभी नहीं देखा जो ये कहता है, ‘‘परमेश्वर तुम से जितना प्रेम करता है, उस से अधिक स्वयँ से प्रेम करता है, और वहीं पर मात्र ये आशा पायी जाती है कि ‘वह’ आप से, अयोग्य जैसे कि आप हैं,, प्रेम कर सके।’’ संडे-स्कूल के किसी पर्चे में वो कभी नहीं पढ़ा, वही कारण है कि बैतलहम बैपटिस्ट चर्च में हम पाठ्य-क्रम पर काम कर रहे हैं। हम में से अधिकांश घरों में, और कलीसियाओं में पले-बढ़े हैं, जहाँ हम मसीही होने के बारे में इस अंश तक उत्तेजित हो गए कि हमने सोचा कि परमेश्वर हमारे बारे में उत्साहित था, उस अंश तक नहीं जितना हम एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर के बारे में उत्साहित हुए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक मनुष्य-केन्द्रित संसार में, जहाँ स्वयँ पर अभिमान सर्वोच्च मूल्य है, इस अंश तक एक मसीही होना बहुत सरल है, कि परमेश्वर के बिना, आपने किसी भी तरह जो भी किया हो, ये उसे सहारा देता है। कौन मसीही नहीं रहेगा&amp;amp;nbsp;? हाँ, आप एक मसीही नहीं हैं यदि आप केवल उस से प्रेम करते हैं जिस से आपने, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर की सुन्दरता से सामना हुए बिना, प्रेम किया होता। यदि परमेश्वर आपकी स्व-उन्नति और ऊँचा उठने का मात्र एक माध्यम है, बनिस्बत इसके कि आपने ‘उसमें’ कुछ असीम महिमित देखा होता, एक ऐसे परमेश्वर के रूप में जो अपनी महिमा के प्रगटीकरण में लिप्त है, तब आपको आपके मन-परिवर्तन को जाँचने की आवश्यकता है। अतः, यहाँ ऑस्टिन में ‘पैशन-97’ में, एक बड़ी वास्तविक जाँच है। बहुत कम लोगों ने कभी मुझसे कहा या मुझे दिखाया है, जो अब मैंने बाइबल में देखा है, कि परमेश्वर ने मुझे ‘उसकी’ महिमा के लिए चुना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1976 में, इफिसियों 1 पर एक कक्षा में शिक्षण देना, उसमें, जिसे बेथेल काॅलेज में उन दिनों में हम ‘‘अन्तरिम-काल ’’ (‘‘इन्टरिम’’)कहते थे, क्रमबद्ध रूप से इफिसियों की 14 आयत तक बढ़ना और मेरे संसार का पुनः खिल उठना, मुझे स्मरण है। क्योंकि तीन बार--पद 6, 12, और 14--ये कहता है कि ‘उस’ ने हमें जगत की उत्पत्ति से पहिले ‘उस’ में चुन लिया और पहिले से ठहराया कि हम ‘उसके’ पुत्र हों, ताकि उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उसने’ आपको चुना। क्यों&amp;amp;nbsp;? ताकि ‘उसकी’ महिमा और अनुग्रह की स्तुति हो और बढ़े। आपका उद्धार, परमेश्वर को महिमा देने के लिए है। आपका चुना जाना, परमेश्वर को महिमा देने के लिए है। आपका पुन-रुज्जीवन, परमेश्वर को महिमा देने के लिए था। आपको निर्दोष ठहराया जाना परमेश्वर की महिमा के लिए था। आपका पवित्रीकरण, परमेश्वर की महिमा के लिए है। और एक दिन आपकी महिमा-प्राप्ति, परमेश्वर की महिमा में अवशोशित हो जावेगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''आप परमेश्वर की महिमा के लिए सृजे गए थे |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशायाह 43: 6, 7:‘‘मेरे पुत्रों को दूर से और मेरी पुत्रियों को पृथ्वी के छोर से ले आओ; हर एक को जो मेरा कहलाता है, जिसको मैं ने अपनी महिमा के लिये सृजा है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर ने मिस से 'उसकी' प्रजा इस्राएल को, 'उसकी' महिमा के लिए छुड़ाया |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मिस्र में हमारे पुरखाओं ने तेरे आश्चर्यकर्मों पर मन नहीं लगाया, न तेरी अपार करुणा को स्मरण रखा य उन्हों ने समुद्र के तीर पर, अर्थात् लाल समुद्र के तीर पर बलवा किया। तौभी उस ने अपने नाम के निमित्त उनका उद्धार किया, जिस से वह अपने पराक्रम को (और महिमा को)प्रगट करे।’’ भजन संहिता 106: 7, 8। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, ‘उसने’ लाल समुद्र को दो भाग किया और अपने बलवा करने वाले लोगों का उद्धार किया, ताकि ‘वह’ अपनी पराक्रमी सामथ्र्य प्रगट करे। और ये यरीहो तक फैलती चली गयी और एक वेश्या का उद्धार किया, ताकि जब वे वहाँ पहुँचे और तुरहियाँ बजाने को तैयार हुए, उसने नया जन्म पाया क्योंकि उसने कहा, ‘‘हमने तेरा नाम और तेरी कीर्ति सुनी है।’’ और एक स्त्री और उसके परिवार ने, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर में विश्वास किया और विनाश से बच गए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर ने जंगल में इसाएल पर दया, 'उसकी' महिमा के लिए की |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने जंगल में इस्राएल को बार-बार क्षमा किया। ‘‘इस्राएल के घराने ने जंगल में मुझ से बलवा किया,’’ परमेश्वर को उद्धृत करते हुए, यहेजकेल कहता है, ‘‘और मैंने कहा, मैं अपनी जलजलाहट उण्डेलूंगा, परन्तु मैंने अपने नाम के निमित्त ऐसा किया ताकि वे उन जातियों के सामने अपवित्र न ठहरें।’’ और तब अन्ततः परमेश्वर दण्ड-स्वरूप उन्हें बाबुल में भेजता है, और 70 साल के बाद उन पर दया होती है। ‘वह’ अपनी वाचा की दुल्हिन को तलाक नहीं देगा और ‘वह’ उन्हें वापिस ले आता है। लेकिन क्यों&amp;amp;nbsp;? परमेश्वर के हृदय में क्या ध्येय बसा हुआ है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यशायाह 48 से इसे सुनियेरू ‘‘अपने ही नाम के निमित्त मैं क्रोध करने में विलम्ब करता हूं, और अपनी महिमा के निमित्त अपने तईं रोक रखता हूं, ऐसा न हो कि मैं तुझे काट डालूं। देख, मैं ने तुझे निर्मल तो किया, परन्तु, चान्दी की नाईं नहीं: मैं ने दुःख की भट्टी में परखकर तुझे चुन लिया है। अपने निमित्त, हां अपने ही निमित्त मैं ने यह किया है, मेरा नाम क्यों अपवित्र ठहरे&amp;amp;nbsp;? अपनी महिमा मैं दूसरे को नहीं दूंगा।’’ दया के लिए, वो परमेश्वर-केन्द्रित अभिप्राय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''परमेश्वर की महीमा के लिए. यीशु आये और मर गये |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यीशु संसार में किस कारण से आये&amp;amp;nbsp;? ओ, कितनी बार हमने यूहन्ना 3: 16 को उद्घृत किया है। और ये चमत्कारपूर्ण ढंग से सच है। और इसके पूर्व कि आज सुबह हम समाप्त करें, या कम से कम कल सुबह, आप देखेंगे कि अभी ये जोर देना और वो जोर देना, जो आप सम्भवतः लम्बे समय से जानते हैं, एक-दूसरे से विषम नहीं हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन ‘वे’ क्यों आये&amp;amp;nbsp;? यीशु क्यों आये&amp;amp;nbsp;? रोमियों 15: 8 के अनुसार, ‘वे’ इस कारण से आये: ‘‘जो प्रतिज्ञाएं बापदादों को दी गई थीं, उन्हें दृढ़ करने के लिये मसीह, परमेश्वर की सच्चाई का प्रमाण देने के लिये खतना किए हुए लोगों का सेवक बना और अन्यजाति भी दया के कारण परमेश्वर की बड़ाई (महिमा)करें ।’’ मसीह पृथ्वी पर आये, स्वयँ पर मांस धारण किया, और मर गए ताकि आप दया के लिए ‘उसके’ पिता की महिमा दे सकें। ‘वह’ अपने पिता की खातिर आया। यही प्रमुख कारण है कि ‘वे’ आये, ‘उसके’ पिता की महिमा के लिये। और यह महिमा, दया के उमड़ने में, अपने सर्वोच्च शिखर तक पहुंचती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रोमियों 3 से इस वचन को सुनिये: ‘‘परमेश्वर ने मसीह को उसके लोहू के द्वारा एक प्रायश्चित के रूप में सामने लाया कि परमेश्वर की धार्मिकिता प्रगट हो। ये वर्तमान समय में ये प्रमाणित करने के लिए था कि वह स्वयं धार्मिक है। इसी कारण वह मरा। वह परमेश्वर की धार्मिकता को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए मरा, जिसने ऐसे पापों से आनाकानी की (पापों को लांघ गया)जैसे कि दाऊद का व्यभिचार और हत्या।’’ क्या इसने कभी आपको परेशान किया है परमेश्वर ने इसे अनदेखा किया और दाऊद ने राजा बने रहना जारी रखा&amp;amp;nbsp;? हां, इसने पौलुस को उसकी अन्र्तात्मा की गहराई तक परेशान किया कि पापों को अनदेखा करने में परमेश्वर धार्मिक नहीं है। और ये मात्र दाऊद नहीं था। पुराना नियम में हजारों भक्त रहे हैं और आज भी, जिनके पाप ‘वह’ सरलता से भुला देता और अनदेखा करता है। और पौलुस चिल्ला उठा, ‘‘आप परमेश्वर होते हुए ऐसा कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप धार्मिक होते हुए वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप न्यायी होकर वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;? आप आराधना के योग्य होकर वो कैसे कर सके&amp;amp;nbsp;?’’--यदि ‘ऑस्टिन’ में किसी न्यायाधीश ने ऐसा किया होता, यदि उसने एक बाल- दुरुपयोग करने वाले, एक बलात्कारी, एक हत्यारे को दोषमुक्त कर दिया होता, वह एक मिनिट में अपने पद से हटा दिया जाता,--‘‘और आप ये प्रतिदिन करते हैं, तो आप किस प्रकार के परमेश्वर हैं&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रूस, एक महा-धर्मविज्ञानी समस्या का समाधान है, यथा, परमेश्वर कैसे परमेश्वर होते हुए पापों को क्षमा कर सकता है&amp;amp;nbsp;? मसीह आया कि आप जैसे व्यक्ति को बचाने में परमेश्वर को दोषमुक्त करे। उद्धार, भव्य रूप से और चमत्कारपूर्ण ढंग से परमेश्वर-केन्द्रित चीज है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''यीशु महिमा पाने के लिये वापिस आ रहे हैं |''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘वे’ पुनः क्यों आ रहे हैं&amp;amp;nbsp;? साथियो, यीशु आ रहे हैं, ‘वे’ आ रहे हैं। और मैं आपको बता दूँ कि ‘वे’ क्यों आ रहे हैं और जब ‘वे’ आते हैं तक आप क्या कर सकते हैं, ताकि आप तैयार रहें और इसे करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2 थिस्सलुनीकियों 1: 9&amp;amp;nbsp;: ‘‘वे जो सुसमाचार को नहीं मानते, प्रभु के सामने से, और उसकी शक्ति के तेज से दूर होकर अनन्त विनाश का दण्ड पायेंगे, जब ‘वह’ उस दिन, अपने पवित्र लोगों में महिमा पाने और सब विश्वास करने वालों में आश्चर्य का कारण होने को आयेगा।’’ आप इन दो चीजों को देखते हैं&amp;amp;nbsp;? ‘वे’ आ रहे हैं कि अपने भक्तों में महिमा और बड़ाई पायें, और आश्चर्य का कारण हों। यदि आप अभी उस पर आरम्भ नहीं करते हैं, तो जब ‘वे’ आयेंगे आप इसे नहीं कर पायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सम्मेलन विद्यमान है कि आपकी हड्डियों में एक आग लगा दे और आपके दिमाग और हृदयों में एक आग भड़का दे कि राजा यीशु से मिलने के लिए आपको तैयार करे, ताकि सारे सनातन काल में आप वो करना जारी रख सकें जिसे करने के लिए ‘उसने’ आपको सृजा है, यथा, ‘उस’ पर आश्चर्य करने और ‘उसकी’ बड़ाई करने। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हमें परमेश्वर को टेलिस्कोप के सामान बड़ा करना चाहिए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘उसे’ बड़ा बनाइये, किन्तु माइक्रोस्कोप के समान नहीं। दो प्रकार के आवर्धन के बारे में आप जानते हैं, क्या नहीं जानते&amp;amp;nbsp;? एक, टेलिस्कोप से बड़ा करना और दूसरा माइक्रोस्कोप से बड़ा करना है, और परमेश्वर को एक माइक्रोस्कोप के समान बड़ा बनाना, निन्दा है। परमेश्वर को माइक्रोस्कोप के समान बड़ा बनाना ऐसा है मानो कुछ सूक्ष्म लिया जावे और इसे उससे बड़ा करके दिखाया जावे जितना कि वो है। यदि आप परमेश्वर के साथ वैसा करने का प्रयास करते हैं, आप निन्दा करते हैं। किन्तु एक टेलिस्कोप अपने लैंसों को विशालता के अकल्पनीय विस्तार पर रखती है और उन्हें, जैसे वे हैं वैसा दिखाने में सहायता करने का मात्र प्रयास करती है। एक टेलिस्कोप इसी के लिए है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ट्न्विकल, ट्न्विकल लिटिल स्टार--आप रात्रि में ऊपर देखते हैं और वे सुई की नोक के समान दिखते हैं। वे ऐसे नहीं हैं। आप उसे जानते हैं, आप काॅलेज में हैं, सही है&amp;amp;nbsp;? वे बड़े हैं। वे वास्तव में बहुत बड़े हैं, और वे गरम हैं&amp;amp;nbsp;! और आप के पास इसके सिवाय कोई सुराग नहीं है कि एक समय किसी ने एक टेलिस्कोप का अविष्कार किया, अपनी आँख वहाँ रखी, और उन्होंने सोचा, ‘‘ये पृथ्वी से बड़ा है, पृथ्वी से लाखों गुना बड़ा।’’ परमेश्वर ऐसा ही है। आपका जीवन इसलिए विद्यमान है कि आप अपने अहाते/कैम्पस में परमेश्वर की महिमा को आवर्धित करें। ये एक बड़ी बुलाहट है। कैसे&amp;amp;nbsp;? इसके बारे में मैं कल बात करूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यदि परमेश्वर, परमेश्वर केन्द्रित है, 'वह' कैसे प्रेम करने वाला हो सकता है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ वो मुख्य प्रश्न है जिसके साथ मैं समाप्त करना चाहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि वो यहाँ उठना आरम्भ होता है। मैंने ये सत्य कहा है, कि परमेश्वर, एक परमेश्वर-केन्द्रित परमेश्वर है और ये कि ‘उसकी’ परमेश्वर-केन्द्रतता, मेरे परमेश्वर-केन्द्रतता की जड़ है। मैंने बीस साल तक लोगों से वो कहा है, और प्रश्न उठना आरम्भ होता हैरू ‘‘ये प्रेममय ध्वनित नहीं होता, क्योंकि 1 कुरिन्थियों 13: 5 में बाइबल कहती है, ‘‘प्रेम अपनी भलाई नहीं चाहता।’ और आप हमें अभी पिछले पन्द्रह मिनिट से कह रहे हैं, कि परमेश्वर अपना सारा समय अपनी भलाई ढूंढने में खर्च करता है। अतः या तो परमेश्वर प्रेमी नहीं है या आप एक झूठे हैं।’’ और ये एक बड़ी समस्या है। अतः मुझे उत्तर देने का प्रयास करने दीजिये कि ये कैसे है कि परमेश्वर अपने स्वयँ को ऊंचा उठाने की खोज में, प्रेममय है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सी. एस. लेविस से सहायता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इसकी कुंजी सी.एस. लेविस में पायी। यदि आप में से किसी ने डिजायरिंग गाॅड पढ़ी है, तब आपको ये उद्धरण याद होगा। लेविस 28-29 की उम्र तक एक मूर्तिपूजक था और वह परमेश्वर की व्यर्थता से घृणा करता था। उसने कहा कि हर समय जब उसने भजन संहिता के इन वचनों को पढ़ा, ‘‘यहोवा की स्तुति करो, यहोवा की स्तुति करो’’--और वह मसीही धर्म-शिक्षा जानता था, कि भजन प्रेरणा से लिखे गये थे--वह जानता था कि ये वास्तव में परमेश्वर कह रहा है, ‘‘मेरी स्तुति करो, मेरी स्तुति करो’’ और ये ऐसा ध्वनित होता था मानो कोई बूढ़ी स्त्री प्रशंसा की खोज कर रही हो। ये रिफलेक्षनस् ऑन द साम्स से एक उद्धरण है। और तब अचानक परमेश्वर, सी.एस. लेविस के जीवन में आये। और ये है वो जो उसने लिखा&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; स्तुति के बारे में सर्वाधिक स्पष्ट तथ्य, चाहे परमेश्वर की या किसी और की, आश्चर्यजनक रूप से मुझसे छुपी रही। मैंने इसके बारे में, प्रशंसा, अनुमोदन, सम्मान देने के अर्थों में सोचा। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था कि स्तुति में सब प्रकार का आनन्द आप से आप ही उमण्ड़ता है, जब तक कि कभी-कभी हम इसे रोकने के लिए लज्जा को न ले आयें। संसार स्तुति से गूंजता हैरू प्रेमी अपनी प्रेमिका की प्रशंसा करते हैं, पाठक अपने मन-पसन्द कवियों की, टहलने वाले प्राकृतिक दृश्यों की प्रशंसा करते हैं, खिलाड़ी उनके पसन्द के खेलों की प्रशंसा करते हैं, मौसम, वाइन्स, व्यंजनों, अभिनेताओं, घोड़ों, काॅलेजों , देशों, ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, बच्चों, फूलों, पर्वतों, दुर्लभ टिकटों, दुर्लभ भृंगों, यहाँ तक कि कभी-कभी राजनीतिञों और विद्वानों की प्रशंसा । परमेश्वर की प्रशंसा के साथ मेरी सम्पूर्ण सामान्य कठिनाई, हम से बेतुके रूप से नकारने पर निर्भर थी, जहाँ तक सर्वोच्च रूप से मूल्यवान् की बात है, हम क्या करने में आनन्दित होते हैं--यहाँ तक कि हम जिसे कर नहीं सकते--उस हर एक चीज के बारे में जिसकी हम कद्र करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और अब मूल-भाव के वाक्य ये हैं&amp;amp;nbsp;: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; मैं सोचता हूँ कि हम जिस चीज का आनन्द लेते हैं उसकी प्रशंसा करने में प्रसन्न होते हैं, क्योंकि आनन्द तब तक पूर्ण नहीं है जब तक कि इसे व्यक्त न किया जावे। ये अभिनन्दन में से नहीं है कि प्रेमीगण एक-दूसरे से कहते रहते हैं कि वे कितने सुन्दर हैं। प्रसन्नता अधूरी है, जब तक कि इसे व्यक्त न किया जावे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मेरे लिये वो एक कुंजी थी जिसने कुछ इससे सम्बन्धित खोल दिया कि परमेश्वर, जो कुछ ‘वो’ करता है, उसमें कैसे प्रेममय और स्वयँ को ऊंचा करने वाला हो सकता है। यह इस प्रकार से है। आइये, मैं आपके लिए टुकड़ों को जोड़ दूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''प्रश्न का उत्तर''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि परमेश्वर को आपसे प्रेम करना है, ‘उसे’ आपको क्या देना चाहिए&amp;amp;nbsp;? ‘उसे’ आपको वो देना चाहिए जो आपके लिए सर्वोत्तम है। सारे विश्व में सबसे अच्छी चीज है, परमेश्वर। यदि ‘वह’ आपको भरपूर स्वास्थ्य, सर्वोत्तम नौकरी, सर्वोत्तम जीवन-साथी, सर्वोत्तम कम्पयूटर, सर्वोत्तम छुट्टियाँ, किसी भी क्षेत्र में सर्वोत्तम सफलता देता और फिर भी स्वयँ को न देता, तब ‘वह’ आपसे घृणा करता होता। और यदि ‘वह’ आपको ‘परमेश्वर’ देता है और इससे हटकर कुछ भी नहीं, ‘वह’ आपसे असीम प्रेम करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे सुख के लिए मेरे पास परमेश्वर होना चाहिए, यदि परमेश्वर मेरे प्रति प्रेममय रहने वाला है तो। अब, लेविस ने कहा है कि यदि परमेश्वर आपको, सारे अनन्तकाल में सुख पाने के लिए, अपने आप को दे देता है, तो वह आनन्द कभी भी उत्कर्ष तक नहीं पहुँचेगा, जब तक कि आप इसे प्रशंसा/स्तुति में व्यक्त न कर दें। इसलिए, आपको पूर्ण रीति से प्रेम करने के लिए, परमेश्वर इस बारे में उदासीन नहीं हो सकता कि आप स्तुति के द्वारा अपने आनन्द को उत्कर्ष तक लाते हैं या नहीं। इसलिए, परमेश्वर को आपकी स्तुति की खोज में रहना अवश्य है, यदि ‘उसके’ द्वारा आपको प्रेम किया जाना है। क्या ये सार्थक लगता है&amp;amp;nbsp;? मुझे संदेह है कि मुझे ये आपके समक्ष दोहराना पडे़गा। मेरे जीवन का सार-तत्व यही है। मुझे विश्वास है कि बाइबल का सार-तत्व यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेम करने के लिए, ‘उसे’ आपको वो देना अवश्य है जो आपके लिए सर्वोत्तम है। आपके लिए जो सर्वोत्तम है, वो परमेश्वर है। ‘‘तू मुझे जीवन का रास्ता दिखाएगा य तेरे निकट आनन्द की भरपूरी है, तेरे दाहिने हाथ में सुख सर्वदा बना रहता है’’ (भजन 16: 10)। हमारे सुख के लिए परमेश्वर स्वयँ को हमें देता है। लेकिन लेविस ने हमें दिखाया है कि जब तक ये &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुख, परमेश्वर की स्तुति में अभिव्यक्ति न पायें, तो ये सुख सीमित हैं। और इसलिए परमेश्वर, आपके सुख को किसी भी तरह सीमित करने की चाह न रखते हुए, कहता है, ‘‘मेरी स्तुति करो। हर एक काम जो तुम करते हो उसमें, मेरी स्तुति करो। हर चीज जो तुम करते हो, उसमें मेरा नाम ऊंचा उठाओ। हर काम जो तुम करते हो, उसमें मेरे आधिपत्य के लिए धुन रखो,’’ जिसका सरलता से अर्थ है कि महिमित होने के लिए परमेश्वर की धुन और आनन्द करने के लिए और सन्तुष्ट होने के लिए आपकी धुन, एक-दूसरे से विषम नहीं हैं। वे एक साथ आते हैं। परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, आज सुबह की बातचीत का यह अन्त है। मैं आपको बता दूँ कि इसके साथ हम कल कहाँ जा रहे हैं, ताकि आप इस दिशा में प्रार्थना कर सकें, और ताकि आप आ सकें, जिसकी मैं आशा करता हूँ, और मुझे समाप्त करने दें, क्योंकि मैंने समाप्त नहीं किया है। यदि ये सच है, कि परमेश्वर आप में सर्वाधिक महिमित होता है जब आप ‘उस’ में सर्वाधिक सन्तुष्ट होते हैं--और इसलिए ‘उस’ में आपका सन्तोष और, ‘उसका’ आप में महिमित होने में, कोई तनाव या विरोधाभास नहीं है--तब आपके जीवन का व्यवसाय, आपके सुख का पीछा करना है। मैं इसे मसीही सुखवाद कहता हूँ, और मैं कल इस बारे में आप से बात करना चाहता हूँ कि आप इसे कैसे करें और क्यों ये आपके सम्बन्धों को, आपके आहातों, आपकी आराधना, और आपके सनातनकाल को रूपान्तरित कर देगा।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

	<entry>
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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: एक महत्वपूर्ण और सनातन महिमा के लिए</title>
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				<updated>2015-12-11T21:04:34Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: For an Eternal Weight of Glory}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे। हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते&amp;amp;nbsp;; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते&amp;amp;nbsp;; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते। हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं&amp;amp;nbsp;; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो। क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो। सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर। और इसलिये कि हम में वही विश्वास की आत्मा है, (जिस के विषय में लिखा है, कि मैं ने विश्वास किया, इसलिये मैं बोला) सो हम भी विश्वास करते हैं, इसीलिये बोलते हैं। क्योंकि हम जानते हैं, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा। क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए। इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है। क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16 कुछ ऐसा अभिव्यक्त करता है जिसे आज सुबह यहाँ उपस्थित प्रत्येक जन अनुभव करना चाहता है। पौलुस कहता है, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यहाँ कुछ ऐसा है जो कोई नहीं चाहता और कुछ ऐसा है जो हर कोई चाहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्या है जो कोई नहीं चाहता और क्या हर कोई चाहता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज सुबह यहाँ उपस्थित कोई भी हियाव छोड़ना नहीं चाहता। कोई भी यहाँ ऐसा कहते हुए नहीं आया, ‘‘मैं निश्चित ही आशा करता हूँ कि हम कुछ गीत गायें और एक उपदेश सुनें जो हियाव छोड़ने में मेरी सहायता करे। ‘जॉन’ जो कहता है, मैं आज सुबह वास्तव में उसके द्वारा हतोत्साहित होना चाहता हूँ।’’ आप में से एक भी नहीं। आप में से कोई भी जीने के लिए, निराशा से भरा हृदय नहीं चाहता। पौलुस भी नहीं चाहता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके विपरीत, हर कोई दिन-ब-दिन भीतरी नवीनीकरण चाहता है। हम सब जानते हैं कि ताकत का बोध और नवीनता और आशा और जीवन-शक्ति और साहस और जीवन का मज़ा, थोड़े ही समय टिकता है, और फिर वे अपक्षय होने की प्रवृत्ति रखते हैं। यदि हम भीतर से मजबूत होने जा रहे हैं और अपने अन्दर आशा और आनन्द और प्रेम करने के लिए स्रोत प्राप्त करने जा रहे हैं, हमें दिन-ब-दिन नवीनीकृत होने के लिए तैयार होना पड़ेगा। हम जानते हैं कि जिन्दगी स्थिर अथवा बिना उतार-चढ़ाव के नहीं है। ये ऊपर और नीचे और ऊपर है। ये भरना और खाली होना और पुनः भरना है। ये नया करो, खर्च करो, नया करो, और खर्च करो और नया करो, है। और हम से हर एक नवीनीकरण की ताकत चाहता है। कोई भी यहाँ नहीं चाहता कि रिक्तीकरण व निरर्थकता और हतोत्साहन की घाटी में छोड़ दिया जावे। यदि दिन-ब-दिन और पुनः और पुनः और पुनः, मजबूत बना दिये जाने और आशापूर्ण और आनन्दमय और प्रेममय होने का कोई रहस्य है, तो उसमें हमारी रुचि है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दो निर्णायक शब्द: ‘‘इसलिये’’ और ‘‘क्योंकि’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसका अर्थ है कि इस मूल-पाठ में दो शब्द हैं जिस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए। पद 16 के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ और पद 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि।’’ वे इतने निर्णायक क्यों हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एक त्रिकोण के शीर्ष के रूप में पद 16''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक त्रिकोण के ऊपरी सिरे पर पद 16 को और इसे सहारा देते हुए, दो भुजाओं को चित्रित कीजिये। सो, वहाँ है हमारी लालसा, इन दो पंक्तियों के द्वारा सहारा पाये हुए: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यही हम सब आज सुबह चाहते हैं — ये कहने के योग्य हों और वास्तव में यही हमारा अर्थ हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शीर्ष को सहारा देते हुए एक भुजा के रूप में, 7-15 आयतें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयत के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसा कह रहा था जो उसे इस अनुभव तक ले आया और इसे सहारा दिया: ‘‘ये सच है और ये सच है और ये सच है’’, 7-15 आयतों में, ‘‘'''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … '''इसलिये''' हम दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ अतः त्रिकोण की प्रथम रेखा, 7-15 आयतों की सच्चाई है जो इस अनुभव तक ले जाती और इसे सहारा देती है। इसे हमारा ध्यान खींचना चाहिए और इन आयतों में ये खोजने के लिए भेजना चाहिए कि ये क्या है। हो सकता है ये हमारे लिए भी है&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शीर्ष को सहारा देते हुए, अन्य भुजा के रूप में, 17-18 आयतें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब अगली आयत 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसी चीजें कहने वाला है जो पद 16 के कारण हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … और दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ '''क्योंकि''', ये सच है और ये सच है और ये सच है। अतः त्रिकोण की दूसरी रेखा जो दूसरी ओर से नीचे आ रही है, पद 17-18 की सच्चाई है, जो उस अनुभव को सहारा देती है जिसका उसने अभी वर्णन किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या अब आप इसे देख सकते हैं&amp;amp;nbsp;? वो अनुभव जिसे पाने की हम लालसा करते हैं, वहाँ इस त्रिकोण के शीर्ष पर, दो सहारा देनेवाली भुजाओं के साथ बैठा हुआ है। 7-15 आयतें सच हैं, ‘‘'''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं।’’ ये एक भुजा है। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं’’ '''क्योंकि''' 17-18 आयतें सच हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अब हमारा लक्ष्य है कि इस त्रिकोण की दो भुजाओं को देखें और उस सत्य को बनायें जिसने पौलुस को सहारा या बल प्रदान किया और वो सत्य जो हमें सहारा/बल प्रदान करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आयत 16 दुःख उठाने के मध्य में आती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु पहिले, एक संक्षिप्त अवलोकन: पद 16 ये स्वीकार करता है कि हियाव नहीं छोड़ना और दिन प्रतिदिन नया होते जाना, दुःख उठाने के मध्य में हो रहे हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ पौलुस जानता था कि वह मर रहा है — और ये कि हर कोई मर रहा है। उसने भंयकर दुःख उठाने का अनुभव किया, और इसमें उसने उसके पृथ्वी पर के जीवन को नाश होते और क्षीण होते देखा। वहाँ दुर्बलताएँ और बीमारियाँ और चोटें और कठिनाईयाँ और दबाव और निराशा और विफलताएँ थीं। और उनमें से प्रत्येक के लिए उसने अपनी जिन्दगी के एक टुकड़े द्वारा कीमत चुकाई। इसे कहने का एक तरीका था कि ‘‘मृत्यु उसके अन्दर काम कर रही थी’’ (तुलना कीजिये, पद 12)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही संदर्भ था ये कहने के लिए, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … हम सदा नया होते जाते हैं।’’ तब अब हम जो वास्तव में पूछ रहे हैं वो मात्र ये नहीं कि ‘‘मैं जीवन में कैसे हियाव नहीं छोड़ सकता&amp;amp;nbsp;?’’ और ‘‘कैसे मैं दिन प्रतिदिन नया हो सकता हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ अपितु ‘‘मैं कैसे बिना हियाव छोड़े दुःख उठाने के लिए तैयार हो सकता हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ ‘‘मैं कैसे अपने शरीर का नाश होना और मेरे पृथ्वी पर के जीवन का क्षीण होना स्वीकार कर सकता हूँ और उसी समय हियाव न छोडूं, वरन् अपनी भीतरी ताकत को नवीनीकृत पाऊँ कि आनन्द सहित, प्रेम के कार्यों के साथ अन्त तक पहुंचूँ&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हम इस प्रश्न के लिए पौलुस के उत्तर को देखने के लिए तैयार हैं। पहिले पद 7-15 में और फिर पद 17-18 में। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पद 7-15: हियाव न छोड़ने के चार कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
7-15 आयतों में, कम से कम चार कारण हैं जो पौलुस को ये कहने तक ले जाते हैं, ‘‘इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते।’’ और उन में से प्रत्येक पृथ्वी पर के अपने जीवन के नाश होने का ध्यान रखते हैं। वह कभी भी इससे दृष्टि नहीं हटाता कि वह एक मरता हुआ मनुष्य है और ये कि उसकी जिन्दगी खर्च हो रही है। अतः इन आयतों में जो वह कर रहा है, यह दिखाना कि सच क्या है, बावजूद इसके और यहां तक इस कारण कि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा व घट रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का महिमित होना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, प्रगट व महिमित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 7: ‘‘हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों {अर्थात् नाश होता हुआ, दुर्बल, बाहरी व्यक्तित्वों} में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ, हमारी दुर्बलता में प्रगट होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 10: ‘‘हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं {बाहरी मनुष्यत्व के नाश होने का ये एक अन्य पहलू है} कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे प्रतिदिन के मरने में, परमेश्वर के पुत्र का जीवन उन्नत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 11: ‘‘क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे नाश होते शरीरों में परमेश्वर के पुत्र का जीवन प्रगट व महिमित होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, पहिला कारण कि पौलुस हियाव नहीं छोड़ता, जबकि उसका बाहरी स्वभाव नाश होता जाता है, ये कि उसकी दुर्बलता में और दूसरों की ख़तिर उसके प्रतिदिन मरने में, परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन महिमित होते हैं और यही है जिस से पौलुस किसी और चीज से बढ़कर प्रेम करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. कलीसिया का मजबूत होना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा, जीवन उसके अन्दर से कलीसिया में बह रहा है। पौलुस के दुर्बल होने के द्वारा, मसीहीगण मजबूत किये जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 12: ‘‘सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि न केवल परमेश्वर महिमा पा रहा है, परन्तु तुम, मेरे प्रियो, जीवन और सामर्थ और आशा पा रहे हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 15: ‘‘क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर {उनके लिए पौलुस के दुःख उठाने के द्वारा} परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि (और ध्यान दीजिये कि पद 15, कैसे प्रथम दो कारणों को एक साथ रखता है) दुःख उठाने की मेरी सेवकाई में, अनुग्रह तुम तक फैल रहा है और महिमा परमेश्वर तक पहुँच रही है। पौलुस के जीवन के ये दो महान् प्रेम हैं: दूसरों तक अनुग्रह पहुँचाना और परमेश्वर को महिमा पहुँचाना — और ये पद कहता है कि वे उसी एक अनुभव में होते हैं। इसलिये पौलुस हियाव नहीं छोड़ता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. परमेश्वर की बल देनेवाली उपस्थिति''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर उसे सम्भालता है और उसे हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 8-9 (ध्यान दीजिये कि इन में से प्रत्येक जोडि़यों में, जो वह वास्तव में कह रहा है, वो है: हाँ, हमारा बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, किन्तु, नहीं, हम हियाव नहीं छोड़ते): ‘‘हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं&amp;amp;nbsp;; पर त्यागे नहीं जाते&amp;amp;nbsp;; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर हमें बल देता है और हमें हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. मृतकों में से हमारा पुनरुत्थान''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चैथा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि वह कलीसिया के साथ, मृतकों में से जिलाया जावेगा और यीशु के साथ होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 14: ‘‘{हम जानते हैं}, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि ये सब ठीक होने जा रहा है। यहाँ तक कि मृत्यु भी कहानी का एक बुरा अन्त नहीं बना सकती। मैं दोबारा जीने जा रहा हूँ&amp;amp;nbsp;; और मैं तुम्हारे साथ जीने जा रहा हूँ, लोग जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ&amp;amp;nbsp;; और मैं यीशु के साथ जीने और सदाकाल के लिए उसकी महिमा में सहभागी होने जा रहा हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''इसलिये''' … यही उस त्रिकोण की पहिली भुजा है (7-15 आयतें) जो हियाव न छोड़ने अपितु प्रतिदिन नया होते जाने के अनुभव को सहारा देती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, मेरी नाश होती दुर्बलता में प्रगट व महिमित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखभोग के द्वारा कलीसिया में जीवन बह रहा है, जिसे मैं इतना अधिक प्रेम करता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखों में परमेश्वर मुझे सम्भालता/बल देता है और मुझे इससे हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हारे साथ मृतकों में से जिलाया जाऊंगा और सदा सर्वदा के लिए यीशु के साथ जीवित रहूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''इसलिये''' मैं हियाव नहीं छोड़ता&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पद 17-18: हियाव न छोड़ने के चार कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब त्रिकोण की अन्य भुजा को देखिये जो पद 16 में पौलुस के अद्भुत अनुभव को सहारा देती है, यथा, 17-18 आयतें। वह हियाव नहीं छोड़ता, और दिन प्रतिदिन नया होता जा रहा है क्योंकि 17-18 आयतें सच हैं। उसके नाश होते हुए बाहरी मनुष्यत्व के बावजूद, पौलुस के लिए हियाव न छोड़ने के पुनः चार कारण हैं — उसकी दुर्बलताएँ और रोग और चोटें और कठिनाईयाँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. क्षण भर का क्लेश''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश क्षण भर का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ इसका ये अर्थ नहीं है कि यह 60 सेकैण्ड तक रहता है। इसका अर्थ है कि यह केवल एक जीवन-काल तक रहता है (जो सहस्त्राब्दियों के लाखों युगों के साथ तुलना में क्षण भर का है) और फिर समाप्त। शब्द का अर्थ है, ‘‘वर्तमान’’ — ‘‘वर्तमान के क्लेश’’ — वे क्लेश जो इस वर्तमान जिन्दगी के आगे बने नहीं रहेंगे। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे क्लेश समाप्त हो जावेंगे। वे मेरे जीवन में अन्तिम व निर्णायक बात नहीं रह जावेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. हल्का सा क्लेश''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश हल्का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ ये एक आधुनिक निश्चिन्त अमेरिकी का विचार नहीं है। ये पौलुस का स्वयँ का विचार है। न ही पौलुस वो भूल गया था जो वह 2 कुरिन्थियों 11: 23-28 में कहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अधिक परिश्रम करने में&amp;amp;nbsp;; बार बार कैद होने में&amp;amp;nbsp;; कोड़े खाने में&amp;amp;nbsp;; बार बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैं ने बेंते खाईं&amp;amp;nbsp;; एक बार पत्थरवाह किया गया&amp;amp;nbsp;; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए&amp;amp;nbsp;; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार बार यात्राओं में&amp;amp;nbsp;; नदियों के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; डाकुओं के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; अपने जातिवालों से जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; अन्यजातियों से जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; नगरों में के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; जंगल के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; समुद्र के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में। परिश्रम और कष्ट में&amp;amp;nbsp;; बार बार जागते रहने में&amp;amp;nbsp;; भूख-पियास में&amp;amp;nbsp;; बार बार उपवास करने में&amp;amp;nbsp;; जाड़े में&amp;amp;nbsp;; उघाड़े रहने में। और और बातों को छोड़कर जिन का वर्णन मैं नहीं करता सब कलीसियाओं की चिन्ता प्रतिदिन मुझे दबाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पौलुस कहता है कि उसके क्लेश हल्के हैं, उसका अर्थ सरल या दर्दरहित नहीं है। उसका अर्थ है कि उसकी तुलना में जो आने वाला है, वे ऐसे हैं मानो कुछ भी नहीं। आने वाली महिमा के विशाल द्रव्यमान की तुलना में, पैमाने पर वे पंखों के समान हैं। ‘‘मैं समझता हूं, कि इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के साम्हने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं’’ (रोमियों 8: 18)। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे क्लेश हल्के हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश वास्तव में पौलुस के लिए, सभी तुलना से सर्वथा परे, एक भारी द्रव्यमान की सनातन महिमा उत्पन्न कर रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण {या ‘भारी द्रव्यमान की’ - अंग्रेजी से सही अनुवाद} और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’’ जो पौलुस के पास आ रहा है, वो क्षणिक नहीं है, अपितु सनातन है। ये हल्का नहीं है, अपितु वजनी है। ये क्लेश नहीं है, अपितु महिमा है। और ये समझ से सर्वथा परे है। जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं (1 कुरिन्थियों 2: 9)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और बिन्दु ये नहीं है कि क्लेश, मात्र महिमा के पूर्व आते हैं&amp;amp;nbsp;; वे महिमा उत्पन्न करने में सहायता करते हैं। इन दोनों के बीच एक वास्तविक आकस्मिक सम्बन्ध है कि कैसे हम अभी कठिनाई सहते हैं और कितना हम आने वाले युगों में परमेश्वर की महिमा का आनन्द उठा सकेंगे। धीरजवन्त दर्द का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं होता। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे सारे कष्ट मेरे लिए, सभी तुलना से परे, महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' वह अपना मन अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा पर लगाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 18: ‘‘हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं।’’ परमेश्वर आपको विश्व में सारी महिमा दे सकता है ताकि हियाव छोड़ देने से आपकी रक्षा करे और दिन प्रतिदिन आपकी आत्मा को नया बनाये, लेकिन यदि आपने इसकी ओर कभी नहीं देखा, इससे कुछ लाभ नहीं होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर का उदार आमंत्रण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, परमेश्वर ठीक इसी समय इस उपदेश में यही कर रहा है। ये मूल-पाठ परमेश्वर की ओर से आपके लिए एक उदार आमंत्रण है कि उन सभी कारणों की ओर देख लें कि क्यों आपको हियाव नहीं छोड़ना है — सभी कारण कि क्यों आप दिन प्रतिदिन नया किये जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! परमेश्वर की सामर्थ और उसके पुत्र का जीवन आपकी दुर्बलताओं में प्रगट होता है। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके दुःखभोग के द्वारा यीशु का जीवन, दूसरे लागों के जीवन में बह रहा है। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेशों में परमेश्वर आपको सम्भालता है और आपको नाश नहीं होने देगा। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश अन्तिम व निर्णायक नहीं हैं&amp;amp;nbsp;; आप यीशु के साथ और परमेश्वर की कलीसिया के साथ मृतकों में से जी उठेंगे और सदा सर्वदा के लिए आनन्द में जीवित रहेंगे। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश क्षणिक हैं। वे केवल अभी के लिए हैं, आने वाले युग के लिए नहीं। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश हल्के हैं। वे सुख जो आ रहे हैं उनकी तुलना में वे कुछ भी नहीं के समान हैं। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! ये क्लेश आपके लिए महिमा का एक सनातन भारी द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं, जो सभी तुलनाओं से परे है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देखिये&amp;amp;nbsp;! ध्यान केन्द्रित कीजिये&amp;amp;nbsp;! मनन कीजिये&amp;amp;nbsp;! इन चीजों पर विचार कीजिये&amp;amp;nbsp;! परमेश्वर जो कहता है, उस पर विश्वास कीजिये। और आप हियाव नहीं छोड़ेंगे, अपितु आपका भीतरी व्यक्ति दिन प्रतिदिन नया होता जावेगा।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: एक महत्वपूर्ण और सनातन महिमा के लिए</title>
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				<updated>2015-12-11T21:03:56Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Called to Suffer and Rejoice: For an Eternal Weight of Glory}}   &amp;amp;gt; परन्तु हमारे पास यह धन मिट्टी के बरत...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: For an Eternal Weight of Glory}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; परन्तु हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे। हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते&amp;amp;nbsp;; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते&amp;amp;nbsp;; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते। हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं&amp;amp;nbsp;; कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो। क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो। सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर। और इसलिये कि हम में वही विश्वास की आत्मा है, (जिस के विषय में लिखा है, कि मैं ने विश्वास किया, इसलिये मैं बोला) सो हम भी विश्वास करते हैं, इसीलिये बोलते हैं। क्योंकि हम जानते हैं, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा। क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए। इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है। क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है। और हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं, क्योंकि देखी हुई वस्तुएं थोड़े ही दिन की हैं, परन्तु अनदेखी वस्तुएं सदा बनी रहती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16 कुछ ऐसा अभिव्यक्त करता है जिसे आज सुबह यहाँ उपस्थित प्रत्येक जन अनुभव करना चाहता है। पौलुस कहता है, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते; यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यहाँ कुछ ऐसा है जो कोई नहीं चाहता और कुछ ऐसा है जो हर कोई चाहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== क्या है जो कोई नहीं चाहता और क्या हर कोई चाहता है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज सुबह यहाँ उपस्थित कोई भी हियाव छोड़ना नहीं चाहता। कोई भी यहाँ ऐसा कहते हुए नहीं आया, ‘‘मैं निश्चित ही आशा करता हूँ कि हम कुछ गीत गायें और एक उपदेश सुनें जो हियाव छोड़ने में मेरी सहायता करे। ‘जॉन’ जो कहता है, मैं आज सुबह वास्तव में उसके द्वारा हतोत्साहित होना चाहता हूँ।’’ आप में से एक भी नहीं। आप में से कोई भी जीने के लिए, निराशा से भरा हृदय नहीं चाहता। पौलुस भी नहीं चाहता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके विपरीत, हर कोई दिन-ब-दिन भीतरी नवीनीकरण चाहता है। हम सब जानते हैं कि ताकत का बोध और नवीनता और आशा और जीवन-शक्ति और साहस और जीवन का मज़ा, थोड़े ही समय टिकता है, और फिर वे अपक्षय होने की प्रवृत्ति रखते हैं। यदि हम भीतर से मजबूत होने जा रहे हैं और अपने अन्दर आशा और आनन्द और प्रेम करने के लिए स्रोत प्राप्त करने जा रहे हैं, हमें दिन-ब-दिन नवीनीकृत होने के लिए तैयार होना पड़ेगा। हम जानते हैं कि जिन्दगी स्थिर अथवा बिना उतार-चढ़ाव के नहीं है। ये ऊपर और नीचे और ऊपर है। ये भरना और खाली होना और पुनः भरना है। ये नया करो, खर्च करो, नया करो, और खर्च करो और नया करो, है। और हम से हर एक नवीनीकरण की ताकत चाहता है। कोई भी यहाँ नहीं चाहता कि रिक्तीकरण व निरर्थकता और हतोत्साहन की घाटी में छोड़ दिया जावे। यदि दिन-ब-दिन और पुनः और पुनः और पुनः, मजबूत बना दिये जाने और आशापूर्ण और आनन्दमय और प्रेममय होने का कोई रहस्य है, तो उसमें हमारी रुचि है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दो निर्णायक शब्द: ‘‘इसलिये’’ और ‘‘क्योंकि’’ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसका अर्थ है कि इस मूल-पाठ में दो शब्द हैं जिस पर हमारा ध्यान जाना चाहिए। पद 16 के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ और पद 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि।’’ वे इतने निर्णायक क्यों हैं&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''एक त्रिकोण के शीर्ष के रूप में पद 16''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक त्रिकोण के ऊपरी सिरे पर पद 16 को और इसे सहारा देते हुए, दो भुजाओं को चित्रित कीजिये। सो, वहाँ है हमारी लालसा, इन दो पंक्तियों के द्वारा सहारा पाये हुए: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ यही हम सब आज सुबह चाहते हैं — ये कहने के योग्य हों और वास्तव में यही हमारा अर्थ हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 16: ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शीर्ष को सहारा देते हुए एक भुजा के रूप में, 7-15 आयतें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आयत के आरम्भ में शब्द ‘‘इसलिये’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसा कह रहा था जो उसे इस अनुभव तक ले आया और इसे सहारा दिया: ‘‘ये सच है और ये सच है और ये सच है’’, 7-15 आयतों में, ‘‘'''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … '''इसलिये''' हम दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ अतः त्रिकोण की प्रथम रेखा, 7-15 आयतों की सच्चाई है जो इस अनुभव तक ले जाती और इसे सहारा देती है। इसे हमारा ध्यान खींचना चाहिए और इन आयतों में ये खोजने के लिए भेजना चाहिए कि ये क्या है। हो सकता है ये हमारे लिए भी है&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''शीर्ष को सहारा देते हुए, अन्य भुजा के रूप में, 17-18 आयतें''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब अगली आयत 17 के आरम्भ में शब्द ‘‘क्योंकि’’ का अर्थ है कि पौलुस कुछ ऐसी चीजें कहने वाला है जो पद 16 के कारण हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … और दिन प्रतिदिन नया होते जा रहे हैं।’’ '''क्योंकि''', ये सच है और ये सच है और ये सच है। अतः त्रिकोण की दूसरी रेखा जो दूसरी ओर से नीचे आ रही है, पद 17-18 की सच्चाई है, जो उस अनुभव को सहारा देती है जिसका उसने अभी वर्णन किया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तो क्या अब आप इसे देख सकते हैं&amp;amp;nbsp;? वो अनुभव जिसे पाने की हम लालसा करते हैं, वहाँ इस त्रिकोण के शीर्ष पर, दो सहारा देनेवाली भुजाओं के साथ बैठा हुआ है। 7-15 आयतें सच हैं, ‘‘'''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं।’’ ये एक भुजा है। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, अपितु दिन प्रतिदिन नया होते जाते हैं’’ '''क्योंकि''' 17-18 आयतें सच हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः अब हमारा लक्ष्य है कि इस त्रिकोण की दो भुजाओं को देखें और उस सत्य को बनायें जिसने पौलुस को सहारा या बल प्रदान किया और वो सत्य जो हमें सहारा/बल प्रदान करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== आयत 16 दुःख उठाने के मध्य में आती है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु पहिले, एक संक्षिप्त अवलोकन: पद 16 ये स्वीकार करता है कि हियाव नहीं छोड़ना और दिन प्रतिदिन नया होते जाना, दुःख उठाने के मध्य में हो रहे हैं। ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते, यद्यपि हमारा बाहरी मनुष्यत्व नाश भी होता जाता है, तौभी हमारा भीतरी मनुष्यत्व दिन प्रतिदिन नया होता जाता है।’’ पौलुस जानता था कि वह मर रहा है — और ये कि हर कोई मर रहा है। उसने भंयकर दुःख उठाने का अनुभव किया, और इसमें उसने उसके पृथ्वी पर के जीवन को नाश होते और क्षीण होते देखा। वहाँ दुर्बलताएँ और बीमारियाँ और चोटें और कठिनाईयाँ और दबाव और निराशा और विफलताएँ थीं। और उनमें से प्रत्येक के लिए उसने अपनी जिन्दगी के एक टुकड़े द्वारा कीमत चुकाई। इसे कहने का एक तरीका था कि ‘‘मृत्यु उसके अन्दर काम कर रही थी’’ (तुलना कीजिये, पद 12)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही संदर्भ था ये कहने के लिए, ‘‘हम हियाव नहीं छोड़ते … हम सदा नया होते जाते हैं।’’ तब अब हम जो वास्तव में पूछ रहे हैं वो मात्र ये नहीं कि ‘‘मैं जीवन में कैसे हियाव नहीं छोड़ सकता&amp;amp;nbsp;?’’ और ‘‘कैसे मैं दिन प्रतिदिन नया हो सकता हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ अपितु ‘‘मैं कैसे बिना हियाव छोड़े दुःख उठाने के लिए तैयार हो सकता हूँ&amp;amp;nbsp;?’’ ‘‘मैं कैसे अपने शरीर का नाश होना और मेरे पृथ्वी पर के जीवन का क्षीण होना स्वीकार कर सकता हूँ और उसी समय हियाव न छोडूं, वरन् अपनी भीतरी ताकत को नवीनीकृत पाऊँ कि आनन्द सहित, प्रेम के कार्यों के साथ अन्त तक पहुंचूँ&amp;amp;nbsp;?’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब हम इस प्रश्न के लिए पौलुस के उत्तर को देखने के लिए तैयार हैं। पहिले पद 7-15 में और फिर पद 17-18 में। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पद 7-15: हियाव न छोड़ने के चार कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
7-15 आयतों में, कम से कम चार कारण हैं जो पौलुस को ये कहने तक ले जाते हैं, ‘‘इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते।’’ और उन में से प्रत्येक पृथ्वी पर के अपने जीवन के नाश होने का ध्यान रखते हैं। वह कभी भी इससे दृष्टि नहीं हटाता कि वह एक मरता हुआ मनुष्य है और ये कि उसकी जिन्दगी खर्च हो रही है। अतः इन आयतों में जो वह कर रहा है, यह दिखाना कि सच क्या है, बावजूद इसके और यहां तक इस कारण कि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा व घट रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का महिमित होना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, प्रगट व महिमित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 7: ‘‘हमारे पास यह धन मिट्टी के बरतनों {अर्थात् नाश होता हुआ, दुर्बल, बाहरी व्यक्तित्वों} में रखा है, कि यह असीम सामर्थ हमारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर ही की ओर से ठहरे।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ, हमारी दुर्बलता में प्रगट होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 10: ‘‘हम यीशु की मृत्यु को अपनी देह में हर समय लिए फिरते हैं {बाहरी मनुष्यत्व के नाश होने का ये एक अन्य पहलू है} कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे प्रतिदिन के मरने में, परमेश्वर के पुत्र का जीवन उन्नत होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 11: ‘‘क्योंकि हम जीते जी सर्वदा यीशु के कारण मृत्यु के हाथ में सौंपे जाते हैं कि यीशु का जीवन भी हमारे मरनहार शरीर में प्रगट हो।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि हमारे नाश होते शरीरों में परमेश्वर के पुत्र का जीवन प्रगट व महिमित होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, पहिला कारण कि पौलुस हियाव नहीं छोड़ता, जबकि उसका बाहरी स्वभाव नाश होता जाता है, ये कि उसकी दुर्बलता में और दूसरों की ख़तिर उसके प्रतिदिन मरने में, परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन महिमित होते हैं और यही है जिस से पौलुस किसी और चीज से बढ़कर प्रेम करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. कलीसिया का मजबूत होना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा, जीवन उसके अन्दर से कलीसिया में बह रहा है। पौलुस के दुर्बल होने के द्वारा, मसीहीगण मजबूत किये जा रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 12: ‘‘सो मृत्यु तो हम पर प्रभाव डालती है और जीवन तुम पर।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि न केवल परमेश्वर महिमा पा रहा है, परन्तु तुम, मेरे प्रियो, जीवन और सामर्थ और आशा पा रहे हो। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 15: ‘‘क्योंकि सब वस्तुएं तुम्हारे लिये हैं, ताकि अनुग्रह बहुतों के द्वारा अधिक होकर {उनके लिए पौलुस के दुःख उठाने के द्वारा} परमेश्वर की महिमा के लिये धन्यवाद भी बढ़ाए।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि (और ध्यान दीजिये कि पद 15, कैसे प्रथम दो कारणों को एक साथ रखता है) दुःख उठाने की मेरी सेवकाई में, अनुग्रह तुम तक फैल रहा है और महिमा परमेश्वर तक पहुँच रही है। पौलुस के जीवन के ये दो महान् प्रेम हैं: दूसरों तक अनुग्रह पहुँचाना और परमेश्वर को महिमा पहुँचाना — और ये पद कहता है कि वे उसी एक अनुभव में होते हैं। इसलिये पौलुस हियाव नहीं छोड़ता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. परमेश्वर की बल देनेवाली उपस्थिति''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तीसरा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि इस दुःखभोग में और इसके द्वारा परमेश्वर उसे सम्भालता है और उसे हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 8-9 (ध्यान दीजिये कि इन में से प्रत्येक जोडि़यों में, जो वह वास्तव में कह रहा है, वो है: हाँ, हमारा बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, किन्तु, नहीं, हम हियाव नहीं छोड़ते): ‘‘हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो होते हैं, पर निराश नहीं होते। सताए तो जाते हैं&amp;amp;nbsp;; पर त्यागे नहीं जाते&amp;amp;nbsp;; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।’’ इसलिये हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि परमेश्वर हमें बल देता है और हमें हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. मृतकों में से हमारा पुनरुत्थान''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चैथा, यद्यपि उसका बाहरी स्वभाव नाश हो रहा है, तथापि वह कलीसिया के साथ, मृतकों में से जिलाया जावेगा और यीशु के साथ होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 14: ‘‘{हम जानते हैं}, कि जिस ने प्रभु यीशु को जिलाया, वही हमें भी यीशु में भागी जानकर जिलाएगा, और तुम्हारे साथ अपने साम्हने उपस्थित करेगा।’’ '''इसलिये''' हम हियाव नहीं छोड़ते … क्योंकि ये सब ठीक होने जा रहा है। यहाँ तक कि मृत्यु भी कहानी का एक बुरा अन्त नहीं बना सकती। मैं दोबारा जीने जा रहा हूँ&amp;amp;nbsp;; और मैं तुम्हारे साथ जीने जा रहा हूँ, लोग जिन्हें मैं प्रेम करता हूँ&amp;amp;nbsp;; और मैं यीशु के साथ जीने और सदाकाल के लिए उसकी महिमा में सहभागी होने जा रहा हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''इसलिये''' … यही उस त्रिकोण की पहिली भुजा है (7-15 आयतें) जो हियाव न छोड़ने अपितु प्रतिदिन नया होते जाने के अनुभव को सहारा देती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि परमेश्वर की सामर्थ और परमेश्वर के पुत्र का जीवन, मेरी नाश होती दुर्बलता में प्रगट व महिमित हो रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखभोग के द्वारा कलीसिया में जीवन बह रहा है, जिसे मैं इतना अधिक प्रेम करता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मेरे दुःखों में परमेश्वर मुझे सम्भालता/बल देता है और मुझे इससे हारने नहीं देता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. मैं नया होता जा रहा हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि तुम्हारे साथ मृतकों में से जिलाया जाऊंगा और सदा सर्वदा के लिए यीशु के साथ जीवित रहूँगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''इसलिये''' मैं हियाव नहीं छोड़ता&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== पद 17-18: हियाव न छोड़ने के चार कारण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब त्रिकोण की अन्य भुजा को देखिये जो पद 16 में पौलुस के अद्भुत अनुभव को सहारा देती है, यथा, 17-18 आयतें। वह हियाव नहीं छोड़ता, और दिन प्रतिदिन नया होता जा रहा है क्योंकि 17-18 आयतें सच हैं। उसके नाश होते हुए बाहरी मनुष्यत्व के बावजूद, पौलुस के लिए हियाव न छोड़ने के पुनः चार कारण हैं — उसकी दुर्बलताएँ और रोग और चोटें और कठिनाईयाँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. क्षण भर का क्लेश''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश क्षण भर का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ इसका ये अर्थ नहीं है कि यह 60 सेकैण्ड तक रहता है। इसका अर्थ है कि यह केवल एक जीवन-काल तक रहता है (जो सहस्त्राब्दियों के लाखों युगों के साथ तुलना में क्षण भर का है) और फिर समाप्त। शब्द का अर्थ है, ‘‘वर्तमान’’ — ‘‘वर्तमान के क्लेश’’ — वे क्लेश जो इस वर्तमान जिन्दगी के आगे बने नहीं रहेंगे। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे क्लेश समाप्त हो जावेंगे। वे मेरे जीवन में अन्तिम व निर्णायक बात नहीं रह जावेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. हल्का सा क्लेश''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश हल्का है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश … ।’’ ये एक आधुनिक निश्चिन्त अमेरिकी का विचार नहीं है। ये पौलुस का स्वयँ का विचार है। न ही पौलुस वो भूल गया था जो वह 2 कुरिन्थियों 11: 23-28 में कहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अधिक परिश्रम करने में&amp;amp;nbsp;; बार बार कैद होने में&amp;amp;nbsp;; कोड़े खाने में&amp;amp;nbsp;; बार बार मृत्यु के जोखिमों में। पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए। तीन बार मैं ने बेंते खाईं&amp;amp;nbsp;; एक बार पत्थरवाह किया गया&amp;amp;nbsp;; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए&amp;amp;nbsp;; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा। मैं बार बार यात्राओं में&amp;amp;nbsp;; नदियों के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; डाकुओं के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; अपने जातिवालों से जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; अन्यजातियों से जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; नगरों में के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; जंगल के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; समुद्र के जोखिमों में&amp;amp;nbsp;; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में। परिश्रम और कष्ट में&amp;amp;nbsp;; बार बार जागते रहने में&amp;amp;nbsp;; भूख-पियास में&amp;amp;nbsp;; बार बार उपवास करने में&amp;amp;nbsp;; जाड़े में&amp;amp;nbsp;; उघाड़े रहने में। और और बातों को छोड़कर जिन का वर्णन मैं नहीं करता सब कलीसियाओं की चिन्ता प्रतिदिन मुझे दबाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पौलुस कहता है कि उसके क्लेश हल्के हैं, उसका अर्थ सरल या दर्दरहित नहीं है। उसका अर्थ है कि उसकी तुलना में जो आने वाला है, वे ऐसे हैं मानो कुछ भी नहीं। आने वाली महिमा के विशाल द्रव्यमान की तुलना में, पैमाने पर वे पंखों के समान हैं। ‘‘मैं समझता हूं, कि इस समय के दुःख और क्लेश उस महिमा के साम्हने, जो हम पर प्रगट होनेवाली है, कुछ भी नहीं हैं’’ (रोमियों 8: 18)। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे क्लेश हल्के हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' उसका क्लेश वास्तव में पौलुस के लिए, सभी तुलना से सर्वथा परे, एक भारी द्रव्यमान की सनातन महिमा उत्पन्न कर रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 17: ‘‘क्योंकि हमारा पल भर कर हल्का सा क्लेश हमारे लिये बहुत ही महत्वपूर्ण {या ‘भारी द्रव्यमान की’ - अंग्रेजी से सही अनुवाद} और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।’’ जो पौलुस के पास आ रहा है, वो क्षणिक नहीं है, अपितु सनातन है। ये हल्का नहीं है, अपितु वजनी है। ये क्लेश नहीं है, अपितु महिमा है। और ये समझ से सर्वथा परे है। जो आँख ने नहीं देखी, और कान ने नहीं सुना, वे ही हैं जो परमेश्वर ने अपने प्रेम रखनेवालों के लिये तैयार की हैं (1 कुरिन्थियों 2: 9)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और बिन्दु ये नहीं है कि क्लेश, मात्र महिमा के पूर्व आते हैं&amp;amp;nbsp;; वे महिमा उत्पन्न करने में सहायता करते हैं। इन दोनों के बीच एक वास्तविक आकस्मिक सम्बन्ध है कि कैसे हम अभी कठिनाई सहते हैं और कितना हम आने वाले युगों में परमेश्वर की महिमा का आनन्द उठा सकेंगे। धीरजवन्त दर्द का एक क्षण भी व्यर्थ नहीं होता। मैं हियाव नहीं छोड़ता … '''क्योंकि''' मेरे सारे कष्ट मेरे लिए, सभी तुलना से परे, महिमा का एक सनातन विशाल द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस हियाव नहीं छोड़ता '''क्योंकि''' वह अपना मन अनदेखी, आनेवाली सनातन महिमा पर लगाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 18: ‘‘हम तो देखी हुई वस्तुओं को नहीं परन्तु अनदेखी वस्तुओं को देखते रहते हैं।’’ परमेश्वर आपको विश्व में सारी महिमा दे सकता है ताकि हियाव छोड़ देने से आपकी रक्षा करे और दिन प्रतिदिन आपकी आत्मा को नया बनाये, लेकिन यदि आपने इसकी ओर कभी नहीं देखा, इससे कुछ लाभ नहीं होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== परमेश्वर का उदार आमंत्रण ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वास्तव में, परमेश्वर ठीक इसी समय इस उपदेश में यही कर रहा है। ये मूल-पाठ परमेश्वर की ओर से आपके लिए एक उदार आमंत्रण है कि उन सभी कारणों की ओर देख लें कि क्यों आपको हियाव नहीं छोड़ना है — सभी कारण कि क्यों आप दिन प्रतिदिन नया किये जा सकते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! परमेश्वर की सामर्थ और उसके पुत्र का जीवन आपकी दुर्बलताओं में प्रगट होता है। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके दुःखभोग के द्वारा यीशु का जीवन, दूसरे लागों के जीवन में बह रहा है। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेशों में परमेश्वर आपको सम्भालता है और आपको नाश नहीं होने देगा। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश अन्तिम व निर्णायक नहीं हैं&amp;amp;nbsp;; आप यीशु के साथ और परमेश्वर की कलीसिया के साथ मृतकों में से जी उठेंगे और सदा सर्वदा के लिए आनन्द में जीवित रहेंगे। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश क्षणिक हैं। वे केवल अभी के लिए हैं, आने वाले युग के लिए नहीं। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! आपके क्लेश हल्के हैं। वे सुख जो आ रहे हैं उनकी तुलना में वे कुछ भी नहीं के समान हैं। &lt;br /&gt;
*देखिये&amp;amp;nbsp;! ये क्लेश आपके लिए महिमा का एक सनातन भारी द्रव्यमान उत्पन्न कर रहे हैं, जो सभी तुलनाओं से परे है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देखिये&amp;amp;nbsp;! ध्यान केन्द्रित कीजिये&amp;amp;nbsp;! मनन कीजिये&amp;amp;nbsp;! इन चीजों पर विचार कीजिये&amp;amp;nbsp;! परमेश्वर जो कहता है, उस पर विश्वास कीजिये। और आप हियाव नहीं छोड़ेंगे, अपितु आपका भीतरी व्यक्ति दिन प्रतिदिन नया होता जावेगा।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%83%E0%A4%96_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A4%8F:_%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B9_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F</id>
		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: मसीह के क्लेशों का लक्ष्य पूरा करने के लिए</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%83%E0%A4%96_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A4%8F:_%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B9_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F"/>
				<updated>2015-12-03T12:29:25Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: To Finish the Aim of Christ's Afflictions}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं; और मसीह के क्लेशों की घटी उस की देह के लिये, अर्थात् कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूं। जिसका मैं परमेश्वर के उस प्रबन्ध के अनुसार सेवक बना, जो तुम्हारे लिये मुझे सौंपा गया, ताकि मैं परमेश्वर के वचन को पूरा-पूरा प्रचार करूं। अर्थात् उस भेद को जो समयों और पीढि़यों से गुप्त रहा, परन्तु अब उसके उन पवित्र लोगों पर प्रगट हुआ है। जिन पर परमेश्वर ने प्रगट करना चाहा, कि उन्हें ज्ञात हो कि अन्यजातियों में उस भेद की महिमा का मूल्य क्या है&amp;amp;nbsp;? और वह यह है, कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है। जिसका प्रचार करके हम हर एक मनुष्य को जता देते हैं और सारे ज्ञान से हर एक मनुष्य को सिखाते हैं कि हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित करें। और इसी के लिये मैं उसकी उस शक्ति के अनुसार जो मुझ में सामर्थ के साथ प्रभाव डालती है तन मन लगाकर परिश्रम भी करता हूं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं पद 24 पर और पौलुस के ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी … पूरी किए देता हूं’’ पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ। मसीह के क्लेशों में कोई भी घटी कैसे हो सकती थी&amp;amp;nbsp;? क्या हमारे लिए उसका दुःख उठाना और उसकी मृत्यु पूर्णतया पर्याप्त नहीं थी&amp;amp;nbsp;? तो पद 24 में उसका क्या अर्थ है और ये हम पर कैसे लागू होता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस परिच्छेद का सार प्रस्तुत करते हुए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन पद 24 को उचित रीति से देखने के लिए, आइये हम इसे शेष आयतों के सम्बन्ध में देखें। पद 29 से आरम्भ करके आइये हम उलटा चलें और सार प्रस्तुत करें कि इस परिच्छेद में पौलुस क्या कह रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 29:- पौलुस कहता है कि एक प्रयोजन है जिसके लिए वह परिश्रम करता है। और इस परिश्रम का संघर्ष, घोर-व्यथा, उसकी स्वयँ की ऊर्जा मात्र नहीं है। ये मसीह की शक्ति है जो सामर्थ के साथ उसके अन्दर काम करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 28 वर्णन करता है उस उद्देश्य का, जिसके लिए पौलुस परिश्रम करता है, यथा, हर उस व्यक्ति को जिस तक वह पहुँचता है, ‘‘मसीह में सिद्ध’’ करके प्रस्तुत करे। और वह इसे मसीह का प्रचार करके, हर एक को सावधान करके, और हर एक को सिखा कर, करता है। ये पौलुस का अन्तहीन परिश्रम है, जिसकी ऊर्जा मसीह देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस जो प्रचार करता और सिखाता है, पद 26-27, उसे अधिक स्पष्टता के साथ परिभाषित करता है। पद 26 में इसे एक ‘‘भेद’’ कहा गया है, इसलिए नहीं कि इसे समझा नहीं जा सकता, अपितु इसलिए कि यह युगों से छुपा था और अब सन्तों पर प्रगट किया गया है। तब पद 27, इस भेद की महिमा के धन का वर्णन करता है। ये, ‘‘मसीह जो महिमा की आशा, तुम {अन्यजातियो} में’’ है। बीते युगों में जो पूरी तरह से प्रगट नहीं किया गया था, वो ये था कि ‘यहूदी मुक्तिदाता’ — मसीह — गैर-यहूदी जातियों तक वास्तव में पहुँचेगा और गैर-यहूदी लोगों में वास करेगा — कि ‘वह’ वास्तव में उन में वास करेगा और उन्हें इब्राहीम की प्रतिज्ञा देगा, परमेश्वर के राज्य में सभी सन्तों के साथ, महिमा की आशा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु अब वो भेद प्रगट किया जा रहा है और पौलुस मसीह का प्रचार कर रहा है और हर जगह सिखा रहा है कि मसीह का अन्दर वास करना और परमेश्वर की महिमा की आशा, उन सभी की है जो मसीह पर विश्वास करते और परमेश्वर की महिमा में वास्तव में आशा रखते हैं (1:4,23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 25, मात्र ये कहता है कि मसीह का यह प्रचार, एक भण्डारीपन की परिपूर्णता है जो परमेश्वर ने पौलुस को, परमेश्वर के वचन को फैलाने के लिए दिया है। वह कलीसिया का एक सेवक और परमेश्वर का एक भण्डारी है। उसका उत्तरदायित्व है कि सभी जातियों तक परमेश्वर का वचन ले जावे, उन्हें महिमा की आशा प्रस्तुत करे, और उन्हें विश्वास में बुलाये। और इसलिए वह, सब जातियों में से परमेश्वर के चुने हुओं को इकट्ठा करने के द्वारा, और उन्हें सिखाने और समझाने के द्वारा ताकि वे मसीह में सिद्ध बनाकर प्रस्तुत किये जा सकें, कलीसिया का एक सेवक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 24 कहता है कि सब जातियों में मसीह और महिमा की आशा के भेद को फैलाने, और फिर उन्हें समझाने और सिखाने की इस सेवकाई में दुःखभोग सम्मिलित है। ‘‘अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं; और मसीह के क्लेशों की घटी उस की देह के लिये, अर्थात् कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘घटी को पूरी किए देता हूं’’ का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इसका क्या अर्थ है कि जब पौलुस कलीसिया के लिए दुःख उठाता है — अधिक से अधिक लोगों में महिमा की आशा को फैलाते हुए, और मसीह के भेद के बारे में, और ऐसा करने में दुःख उठाना उन्हें सिखा रहा है — वह ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी को पूरी कर रहा है’’&amp;amp;nbsp;? कैसे कोई मनुष्य उसे पूरा कर सकता है, जो निश्चित ही अपने में उतना ही पूर्ण है जितना कि कोई दुःखभोग हो सकता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''संदर्भ, इसके अर्थ का सुझाव देता है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि संदर्भ जो हमने अभी देखा, सुझाव देता है कि पौलुस का दुःखभोग, मसीह के दुःखभोग की घटी को इसके मूल्य में कुछ भी जोड़ते हुए, पूरा नहीं करता, अपितु उन्हें उन लोगों तक पहुँचाने के द्वारा पूरा करता है, जिन्हें आशीष देना उनका आशय था। मसीह के क्लेशों में जो घटी है, वो ये नहीं कि वे मूल्य या गुण में अपूर्ण हैं, मानो कि वे उन सभों के पापों को पर्याप्त रूप से ढाँप नहीं सके जो विश्वास करते हैं। जो घटी है वो ये कि मसीह के क्लेशों का असीमित मूल्य, संसार में ज्ञात नहीं है। वे अभी भी अधिकांश लोगों के लिए भेद (छिपे हुए) हैं। और परमेश्वर का ध्येय ये है कि वो भेद सभी गैर-यहूदियों में प्रगट किया, फैलाया जावे। अतः क्लेशों में इस अर्थ में घटी है कि वे जाति-जाति में देखे व जाने नहीं गए हैं। उन्हें ‘वचन’ की सेवकाई करने वालों के द्वारा ले जाया जाना चाहिए। और ‘वचन’ के वे सेवक, दूसरों तक उसे पहुँचाने के द्वारा, मसीह के क्लेशों में जो घटी है, उसे पूरा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''फिलिप्पियों 2: 30 में समान शब्द''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलिप्पियों 2: 30 में इसी के समान शब्दों का उपयोग करने में, इसका एक मजबूत पुष्टीकरण है। फिलिप्पी की कलीसिया में इपफ्रुदीतुस नाम का एक मनुष्य था। जब वहाँ की कलीसिया ने पौलुस के लिए सहारा (शायद पैसा या आपूर्तियाँ अथवा पुस्तकें) एकत्र किया, उन्होंने उसे इपफ्रुदीतुस के हाथ, रोम में पौलुस को भेजने का निर्णय लिया। इस आपूर्ति के साथ अपनी यात्रा में इपफ्रुदीतुस अपनी जिन्दगी को लगभग खो देता है। पद 27 कहता है कि वह इतना बीमार हुआ कि मरने के निकट था, लेकिन परमेश्वर ने उसे बचाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब पद 29 में पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को कहता है कि जब इपफ्रुदीतुस वापिस आता है, वे उसका सम्मान करें, और वह पद 30 में अपना कारण देता है, जिसके शब्द कुलुस्सियों 1: 24 के बहुत समान हैं। ‘‘क्योंकि वह मसीह के काम के लिये अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर मरने के निकट हो गया था, ताकि जो घटी तुम्हारी ओर से मेरी सेवा में हुई, उसे पूरा करे।’’ अब, मूल वाक्यांश में, तुम्हारी ओर से मेरी सेवा में ‘‘जो घटी … उसे पूरा करे,’’ कुलुस्सियों 1: 24 में मसीह के क्लेशों में ‘‘घटी … पूरी किये देता हूं’’ के लगभग समान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, किस अर्थ में, पौलुस के प्रति फिलिप्पीवासियों की सेवा में ‘‘घटी’’ थी और किस अर्थ में इपफ्रुदीतुस ने उसे ‘‘पूरा किया’’ जो उनकी सेवा में घटी थी&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ कि एक सौ साल पहिले एक टीकाकार, ‘मारविन विन्सेन्ट’ इसे बिल्कुल ठीक समझ लेता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पौलुस को दी गई भेंट, एक देह के रूप में कलीसिया की एक भेंट थी। ये, प्रेम का एक बलिदानपूर्ण प्रस्तुतीकरण था। जो घटी थी, और जो पौलुस और कलीसिया के लिए समान रूप से सुखद रहा होता, वो था, व्यक्तिगत रूप से कलीसिया द्वारा इस भेंट का दिया जाना। ये असम्भव था, और पौलुस, इपफ्रुदीतुस की प्रीतिमय और उत्साहपूर्ण सेवकाई के द्वारा, उसे इस घटी की आपूर्ति के रूप में, चित्रित करता है। (एपिजि़ल टू द फिलिप्पियन्स एन्ड टू फिलेमोन, आई.सी.सी., पृ. 78) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हम कैसे मसीह के क्लेशों में ‘‘घटी को पूरा करते’’ हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि कुलुस्सियों 1: 24 के शब्दों का भी ठीक यही अर्थ है। मसीह ने दुःख उठाने और पापियों के लिए मरने के द्वारा संसार के लिए एक प्रेम बलिदान तैयार किया है। ये पूर्ण है और इस में किसी बात की घटी नहीं है — केवल एक चीज छोड़कर, संसार की सभी जातियों को और आपके कार्यस्थल के लोगों को स्वयँ मसीह द्वारा व्यक्तिगत प्रस्तुतीकरण। इस घटी के लिए परमेश्वर का उत्तर है कि मसीह के लोगों (पौलुस जैसे लोगों) को बुलाये कि संसार को मसीह के क्लेशों को को प्रस्तुत करें — उन्हें यरूशलेम से जगत के छोरों तक ले जायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा करने में हम ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी को पूरा करते हैं।’’ हम उसे परिपूर्ण करते हैं जिसके लिए वे बनाये गए थे, यथा, ऐसे लोगों के संसार को व्यक्तिगत प्रस्तुतिकरण, जो उन क्लेशों के असीमित मूल्य को नहीं जानते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन ध्यान दीजिये कि पौलुस इसे पद 24 में कैसे कहता है:- वह कहता है कि ये उसके दुःख उठाने में है और उसके शरीर में — अर्थात्, उसके वास्तविक, दुःख उठाते हुआ शरीर में, वह मसीह के क्लेशों की घटी को पूरा करने में अपना हिस्सा पूरा करता है। अतः, पौलुस अपने दुःख उठाने और मसीह के क्लेशों के बीच एक बहुत निकट का सम्बन्ध देखता है। ये क्या अर्थ रखता है, मैं सोचता हूँ, यह कि परमेश्वर का ध्येय है कि ‘उसके’ लोगों के क्लेशों के द्वारा, मसीह के क्लेश संसार के सम्मुख प्रस्तुत किये जावें। परमेश्वर, मसीह की देह, कलीसिया के लिए, वास्तव में चाहता है कि कुछ दुःखों का अनुभव करे जो ‘उसने’ अनुभव किये ताकि जब हम क्रूस के ख्रीष्ट को लोगों को प्रस्तुत करते हैं, वे क्रूस के ख्रीष्ट को हम में देखें। ‘उसे’ उन्हें प्रस्तुत करने में, और प्रेम का जीवन जो ‘उसने’ जिआ उसे जीने में जो क्लेश हम अनुभव करते हैं, उनके द्वारा हमें मसीह के क्लेशों को लोगों के लिए वास्तविक बनाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं ... मसीह के क्लेशों की घटी … पूरी किए देता हूं।’’ मसीह, ‘उसके’ दुःखभोग का, संसार को एक व्यक्तिगत प्रस्तुतिकरण किये जाने का इच्छुक है। और जिस तरीके से ‘वह’ स्वयँ को संसार के लिए एक दुःख भोगनेवाले के रूप में, संसार को प्रस्तुत करने का इच्छुक है, वो है ‘उसके’ लोगों के द्वारा जो, ‘उसके’ समान, संसार के लिए दुःख उठाने के इच्छुक हैं। ‘उसके’ क्लेष, हमारे क्लेशों में पूरे होते हैं क्योंकि हमारे क्लेशों में संसार ‘उसके’ क्लेश देखता है, और उनका नियत प्रभाव पड़ता है। पापियों के लिए मसीह का दुःख उठाने वाला प्रेम, पापियों के लिए उसके लोगों के दुःख उठाते हुए प्रेम में, दिखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि जो हम कुलुस्सियों 1: 24 में देखते हैं, वो मरकुस 8: 35 में यीशु के शब्दों को, जीना है, ‘‘जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।’’ उद्धार का पथ, ‘‘सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोने’’ का पथ है। मुख्य बात ये है कि सुसमाचार को लोगों तक (कार्यालय के पार या समुद्र के पार) ले जाना साधारणतया त्याग और दुःखभोग की मांग करता है, जिन्दगी का एक खो देना या स्वयँ का इन्कार करना। मसीह चाहता है कि इसी तरीके से ‘उसके’ उद्धार देने वाले दुःखभोग, ‘उसके’ लोगों के दुःख उठाने के द्वारा, संसार को पहुँचाये जावें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस बुलाहट में पौलुस का आनन्द ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पौलुस कहता है कि वह इसमें आनन्दित होता है। पद 24:- ‘‘अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं।’’ कलवरी की सड़क, एक आनन्दरहित सड़क नहीं है। ये एक कष्टमय रास्ता है, लेकिन गहरा सुख देने वाला है। जब हम, सुसमाचार-प्रचार की मुहिमों और सेवकाई और प्रेम के बलिदानों व दुःखभोग के ऊपर, आराम व सुरक्षा के अस्थाई सुखों का चुनाव करते हैं, हम आनन्द के विपरीत चुनाव करते हैं। हम टूटे हुए हौदों का चुनाव करते हैं जो अपने में कोई जल नहीं रख सकते और जल के ऐसे सोते का तिरस्कार करते हैं जिसका जल कभी नहीं सूखता (यशायाह 58: 11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में सबसे सुखी लोग वे लोग हैं जो अपने अन्दर मसीह के भेद को, जो महिमा की आशा है, जानते हैं जो उनकी गहरी लालसा को सन्तुष्ट करते हुए और अपने स्वयँ के दुःख उठाने के द्वारा, मसीह के क्लेशों को संसार तक पहुँचाने के लिए, उन्हें स्वतंत्र करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मूल-पाठ में परमेश्वर हमें बुला रहा है कि सुसमाचार की ख़ातिर जियें और इसे दुःख उठाने के द्वारा करें। मसीह ने दुःखभोग का चुनाव किया, ये उसे अचानक ही नहीं हो गया। ‘उसने’ इसे, कलीसिया का सृजन करने व उसे सिद्ध करने के, मार्ग के रूप में चुना। अब ‘वह’ हमें बुलाता है कि दुःखभोग का चुनाव करें। अर्थात्, ‘वह’ हमें बुलाता है कि अपना क्रूस उठायें और कलवरी की सड़क पर ‘उसका’ अनुसरण करें और अपने आप का इन्कार करें और संसार को ‘उसके’ क्लेश प्रस्तुत करने तथा कलीसिया की सेवकाई करने की ख़ातिर आत्मत्याग करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने अभी-अभी ‘रोमानियाई’ पासवान् तथा मिशन अगुआ ‘जोसेफ़ टीसन’ से, इसे कहने का एक यादग़ार तरीका सुना है। उसने कहा, ‘‘मसीह का क्रूस प्रायश्चित के लिए था, हमारा प्रचारण के लिए है।’’ अर्थात्, मसीह ने उद्धार निष्पादित करने के लिए दुःख उठाया, हम उद्धार फैलाने के लिए दुःख उठाते हैं। और दूसरों के भले के लिए कष्ट उठाने की हमारी स्वीकृति, मसीह के क्लेशों को एक पूरा करना है क्योंकि यह उन्हें दूसरों तक पहुँचाती और उन्हें दृश्य बनाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक देशी भारतीय सुसमाचार-प्रचारक की कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मई माह में मैं ‘मिशनस् बुक’ पर काम कर रहा था, मुझे जे. ओस्वाल्ड सैन्डर्स को बोलते हुए सुनने का एक सुअवसर मिला। उसके संदेश ने दुःख उठाने को गहराई से छुआ। वे 89 साल के हैं और अब भी सारे संसार में यात्रा करते और बोलते हैं। जब से वे 70 साल के हुए उन्होंने प्रति वर्ष एक पुस्तक लिखी है! मैं इसका उल्लेख केवल एक जिन्दगी के चरम अर्पण में उल्लसित होने के लिए कर रहा हूँ, जो 65 की उम्र से कब्र में जाने तक के आत्म-स्वार्थ में किनारा कर लेने के विचार के बिना, सुसमाचार के लिए उण्डेली गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने एक देशी मिशनरी की कहानी बतायी जो भारत में गाँव-गाँव नंगे पैर सुसमाचार का प्रचार करते हुए फिरा। उसकी कठिनाईयाँ बहुत सी थीं। कई मील की यात्रा के एक लम्बे दिन तथा बहुत हतोत्साहन के बाद वो किसी एक गांव में आया और सुसमाचार देने का प्रयास किया किन्तु उसे नगर से बाहर निकाल दिया गया और तिरस्कार किया गया। तो उदास होकर वह गाँव के छोर तक गया और एक पेड़ के नीचे लेट गया और थकावट से चूर होकर सो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब वह जागा, लोग उसे घेरे हुए थे, और सारा नगर उसके चारों ओर इकट्ठा हो गया था कि उसको बोलते हुए सुने। गाँव के मुखिया ने उसे समझाया कि जब वह सोया हुआ था तो वे उसे देखने आये। जब उन्होंने उसके छालों से भरे पैरों को देखा, उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला कि वह एक पवित्र मनुष्य होना चाहिए, और ये कि वे दुष्ट थे कि उसका तिरस्कार किया। वे खेदित थे और वो संदेश सुनना चाहते थे जिसे उन तक लाने के लिए वह इतना दुःख उठाने को तैयार था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः उस सुसमाचार-प्रचारक ने अपने छालों से भरे सुन्दर पैरों के द्वारा यीशु के क्लेशों को पूरा किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== जोसेफ़ नाम के एक मसाई योद्धा की कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एम्सटर्डम में बिली ग्राह्म एसोसियेशन द्वारा प्रायोजित, ‘इटीनरेन्ट इवान्जलिस्टस् कॉन्फ्रैंस’ में उपस्थित होने वालों में एक सर्वाधिक कम अपेक्षित व्यक्ति था, जोसेफ़ नाम का एक मसाई योद्धा। लेकिन उसकी कहानी ने, स्वयँ डा. ग्राह्म के साथ एक मुलाकात का अवसर जीत लिया। उसकी कहानी ‘माइकल कार्ड’&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt; के द्वारा बतायी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन जोसेफ़, जो अफ्रीका की गर्म, गन्दी सड़कों में से एक पर चला जा रहा था, किसी से मिला जिसने उसके साथ यीशु मसीह का सुसमाचार बाँटा। वहीं और उसी समय उसने यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण किया। पवित्र आत्मा की सामर्थ ने उसके जीवन को बदलना आरम्भ कर दिया; वह ऐसी उत्तेजना और आनन्द से भर गया था कि सबसे पहिली चीज जो वह करना चाहता था वो ये कि अपने स्वयँ के गाँव लौटे और अपने स्थानीय कबीले के सदस्यों के साथ वही शुभ-समाचार बाँटे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ ने घर-घर जाना और हर जिस व्यक्ति से वो मिला, ये आशा रखते हुए कि उनके चेहरों का चमक उठना देखे जैसा कि उसका हुआ था, उसे यीशु के क्रूस (दुःखभोग!) के बारे में और उस उद्धार के बारे में बताना आरम्भ कर दिया, जिसका प्रस्ताव ये देता है। उसे अचभ्भा हुआ कि गाँववासियों ने न केवल परवाह नहीं की, बल्कि वे हिंसक हो उठे। गाँव के पुरुषों ने उसे पकड़ लिया और जमीन पर लिटा कर रखा और स्त्रियों ने उसे कंटीले तारों वाली लाठियों से पीटा। उसे गाँव से घसीट कर बाहर कर दिया गया और जंगल में अकेला मरने के लिए छोड़ दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ किसी तरह रेंगता हुआ जल के एक पोखरे तक पहुँचा, और वहाँ, कभी होश में और कभी बेहोशी में कई दिन बिताने के बाद, उठने की ताक़त पाया। उसे उस शत्रुतापूर्ण स्वागत के बारे में अचरज हुआ जो उसने उन लोगों से पाया जिन्हें वह अपने जन्म से जानता था। उसने विचार किया कि उसने अवश्य कुछ छोड़ दिया था या यीशु की कहानी त्रुटिपूर्ण ढंग से बताया। उस संदेश का अभ्यास करके जो उसने सर्वप्रथम सुना था, उसने निर्णय लिया कि वापिस जाये और एक बार और अपने विश्वास को बाँटे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ झोपडि़यों के वृत में लंगड़ाता हुआ चला और यीशु का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। उसने पैरवी की ‘‘‘वह’ तुम्हारे लिए मर गया, ताकि तुम क्षमा पाओ और जीवते परमेश्वर को जान लो।’’ पुनः वह गाँव के पुरुषों द्वारा झपट कर पकड़ लिया गया और उसके घावों को, जो अभी चंगा होना आरम्भ ही हुए थे, पुनः उधेड़ते हुए स्त्रियों ने उसे पीटा। एक बार फिर उन्होंने बेहोशी की अवस्था में उसे घसीट कर गाँव से बाहर किया और मरने के लिए छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली पिटाई में जीवित रहना, सच में असाधारण था। दूसरी में जिन्दा रहना, एक चमत्कार था। पुनः, दिनों बाद, जोसेफ़ जंगल में जागा, घायल, निशानों से भरा — और वापिस जाने के लिए दृढ़-निश्चित। वह उसे छोटे गाँव में लौटा और इस बार, इससे पूर्व कि उसे अपना मुँह खोलने का अवसर मिले, उन्होंने उस पर हमला कर दिया। जबकि उन्होंने उसे तीसरी और सम्भवतः अन्तिम बार पीटा, उसने पुनः उनसे यीशु मसीह, प्रभु के बारे में कहा। इससे पूर्व कि वह बेहोश होता, अन्तिम चीज जो उसने देखी वो ये कि उन स्त्रियों ने जो उसे पीट रही थीं, रोना आरम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार अपने स्वयँ के बिस्तर उसकी आँखें खुलीं। वे लोग जिन्होंने उसे इतनी बुरी तरह पीटा था, अब उसकी जिन्दगी बचाने का प्रयास कर रहे थे, और उसे स्वस्थ करने के लिए सेवा-श्रुषुसा कर रहे थे। सारा गाँव मसीह के पास आ गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये उसका एक जीता-जागता उदाहरण है जो पौलुस का अर्थ है जब उसने कहा, ‘‘मैं मसीह के क्लेशों की घटी, उस की देह के लिये पूरी किए देता हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये जानना कि सुसमाचार की ख़ातिर मसीह हमें बलिदान के लिए बुलाता है, कुछ गहराई से स्वतंत्र करनेवाला और दृढ़ करनेवाला है। जब ये आता है ये हमें बिना सुरक्षा फेंक दिये जाने से, दृढ़ करता है। और जब प्रेम हमें संकेत से बुलाता है, यह हमें इसका चुनाव करने के लिए स्वतंत्र करता है। और यह हमें अमेरिकी समृद्धि के अविश्वसनीय प्रलोभन से स्वतंत्र करना आरम्भ करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हैती में, त्यागपूर्ण दान करने की एक कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकियों के लिए ये लगभग असम्भव है कि उस विधवा की यीशु की प्रशंसा को सहन कर सकें जिसने ‘‘अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी (लूका 21: 4)। ‘उसने’ वास्तव में उसकी प्रशंसा की। ‘उसने’ उस पर गैरजिम्मेदार होने का दोष नहीं लगाया। ‘उसने’ परमेश्वर की ख़ातिर उसके त्याग की प्रशंसा की। इस आत्म-प्रेरणा को देखने के लिए, हमें अमेरिका छोड़कर कहीं और जाना पड़ सकता है। हैती से ‘स्टेनफोर्ड केली’ इसे उदाहरण देकर समझाते हैं।&amp;lt;sup&amp;gt;2&amp;lt;/sup&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चर्च में एक धन्यवादी पर्व चल रहा था और प्रत्येक मसीही को एक प्रेम-भेंट लाने के लिए आमंत्रित किया गया था। हैती-वासी एक पुरुष की ओर से जिसका नाम एडमन्ड था, एक लिफाफे में 13 डॉलर रोकड़ थे। वह राशि वहाँ काम करने वाले एक व्यक्ति की तीन माह की आमदनी थी। ‘केली’ उन लोगों के समान ही चकित हुआ जो कि संयुक्त राज्य में रविवार की भेंट गिनते समय, 6,000 डॉलर रोकड़ की भेंट पायें। उन्होंने एडमन्ड के लिए चारों ओर देखा, किन्तु उसे नहीं पाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाद में ‘केली’ उस से गाँव में मिले और उससे पूछा। उन्होंने एक विवरण के लिए उस पर दबाव डाला और पाया कि एडमन्ड ने सुसमाचार की ख़ातिर, परमेश्वर को 13 डॉलर की भेंट देने के लिए अपना घोड़ा बेच दिया था। लेकिन वह पर्व में क्यों नहीं आया था&amp;amp;nbsp;? वह हिचकिचाया और उत्तर नहीं देना चाहता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ततः एडमन्ड ने कहा, ‘‘मेरे पास पहनने के लिए कमीज नहीं थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो हम इस सप्ताह देख रहे हैं वो ये कि परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने को बुला रहा है … न केवल शुद्धिकरण और परिष्कृत होने के नैतिक परिणामों के कारण, और न केवल यीशु के साथ गहरी अंतरंगता में जाने के कारक व ‘उसे’ बेहतर जानने के कारण; किन्तु इसलिए भी कि मसीह के क्लेशों में जो घटी है, उन लोगों के द्वारा पूरी कर दी जावे जो इन क्लेशों को संसार के पास ले जाते हैं और मसीह के प्रेममय बलिदान को, ‘उसके’ लोगों के प्रेममय बलिदानों के द्वारा दिखाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt; माइकल कार्ड, ‘‘वून्डेड इन द हाऊस ऑफ फ्रैन्ड्स,’’ वच्र्यू , मार्च/अप्रैल, 1991, पृ.सं. 28-29, 69। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;sup&amp;gt;2&amp;lt;/sup&amp;gt; नार्म लेविस, प्रायोरिटी वनः वॉट गॉड वान्ट्स (ऑरेन्ज, कैलिफोर्निया: प्रामिस पब्लिशिंग, 1988), पृ.सं. 120।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: मसीह के क्लेशों का लक्ष्य पूरा करने के लिए</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%83%E0%A4%96_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A4%8F:_%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B9_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8B%E0%A4%82_%E0%A4%95%E0%A4%BE_%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F"/>
				<updated>2015-12-03T12:28:34Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Called to Suffer and Rejoice: To Finish the Aim of Christ's Afflictions}}   &amp;amp;gt; अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द क...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: To Finish the Aim of Christ's Afflictions}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं; और मसीह के क्लेशों की घटी उस की देह के लिये, अर्थात् कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूं। जिसका मैं परमेश्वर के उस प्रबन्ध के अनुसार सेवक बना, जो तुम्हारे लिये मुझे सौंपा गया, ताकि मैं परमेश्वर के वचन को पूरा-पूरा प्रचार करूं। अर्थात् उस भेद को जो समयों और पीढि़यों से गुप्त रहा, परन्तु अब उसके उन पवित्र लोगों पर प्रगट हुआ है। जिन पर परमेश्वर ने प्रगट करना चाहा, कि उन्हें ज्ञात हो कि अन्यजातियों में उस भेद की महिमा का मूल्य क्या है&amp;amp;nbsp;? और वह यह है, कि मसीह जो महिमा की आशा है तुम में रहता है। जिसका प्रचार करके हम हर एक मनुष्य को जता देते हैं और सारे ज्ञान से हर एक मनुष्य को सिखाते हैं कि हम हर एक व्यक्ति को मसीह में सिद्ध करके उपस्थित करें। और इसी के लिये मैं उसकी उस शक्ति के अनुसार जो मुझ में सामर्थ के साथ प्रभाव डालती है तन मन लगाकर परिश्रम भी करता हूं । &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं पद 24 पर और पौलुस के ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी … पूरी किए देता हूं’’ पर ध्यान केन्द्रित करना चाहता हूँ। मसीह के क्लेशों में कोई भी घटी कैसे हो सकती थी&amp;amp;nbsp;? क्या हमारे लिए उसका दुःख उठाना और उसकी मृत्यु पूर्णतया पर्याप्त नहीं थी&amp;amp;nbsp;? तो पद 24 में उसका क्या अर्थ है और ये हम पर कैसे लागू होता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस परिच्छेद का सार प्रस्तुत करते हुए ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन पद 24 को उचित रीति से देखने के लिए, आइये हम इसे शेष आयतों के सम्बन्ध में देखें। पद 29 से आरम्भ करके आइये हम उलटा चलें और सार प्रस्तुत करें कि इस परिच्छेद में पौलुस क्या कह रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 29:- पौलुस कहता है कि एक प्रयोजन है जिसके लिए वह परिश्रम करता है। और इस परिश्रम का संघर्ष, घोर-व्यथा, उसकी स्वयँ की ऊर्जा मात्र नहीं है। ये मसीह की शक्ति है जो सामर्थ के साथ उसके अन्दर काम करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 28 वर्णन करता है उस उद्देश्य का, जिसके लिए पौलुस परिश्रम करता है, यथा, हर उस व्यक्ति को जिस तक वह पहुँचता है, ‘‘मसीह में सिद्ध’’ करके प्रस्तुत करे। और वह इसे मसीह का प्रचार करके, हर एक को सावधान करके, और हर एक को सिखा कर, करता है। ये पौलुस का अन्तहीन परिश्रम है, जिसकी ऊर्जा मसीह देता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस जो प्रचार करता और सिखाता है, पद 26-27, उसे अधिक स्पष्टता के साथ परिभाषित करता है। पद 26 में इसे एक ‘‘भेद’’ कहा गया है, इसलिए नहीं कि इसे समझा नहीं जा सकता, अपितु इसलिए कि यह युगों से छुपा था और अब सन्तों पर प्रगट किया गया है। तब पद 27, इस भेद की महिमा के धन का वर्णन करता है। ये, ‘‘मसीह जो महिमा की आशा, तुम {अन्यजातियो} में’’ है। बीते युगों में जो पूरी तरह से प्रगट नहीं किया गया था, वो ये था कि ‘यहूदी मुक्तिदाता’ — मसीह — गैर-यहूदी जातियों तक वास्तव में पहुँचेगा और गैर-यहूदी लोगों में वास करेगा — कि ‘वह’ वास्तव में उन में वास करेगा और उन्हें इब्राहीम की प्रतिज्ञा देगा, परमेश्वर के राज्य में सभी सन्तों के साथ, महिमा की आशा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु अब वो भेद प्रगट किया जा रहा है और पौलुस मसीह का प्रचार कर रहा है और हर जगह सिखा रहा है कि मसीह का अन्दर वास करना और परमेश्वर की महिमा की आशा, उन सभी की है जो मसीह पर विश्वास करते और परमेश्वर की महिमा में वास्तव में आशा रखते हैं (1:4,23)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 25, मात्र ये कहता है कि मसीह का यह प्रचार, एक भण्डारीपन की परिपूर्णता है जो परमेश्वर ने पौलुस को, परमेश्वर के वचन को फैलाने के लिए दिया है। वह कलीसिया का एक सेवक और परमेश्वर का एक भण्डारी है। उसका उत्तरदायित्व है कि सभी जातियों तक परमेश्वर का वचन ले जावे, उन्हें महिमा की आशा प्रस्तुत करे, और उन्हें विश्वास में बुलाये। और इसलिए वह, सब जातियों में से परमेश्वर के चुने हुओं को इकट्ठा करने के द्वारा, और उन्हें सिखाने और समझाने के द्वारा ताकि वे मसीह में सिद्ध बनाकर प्रस्तुत किये जा सकें, कलीसिया का एक सेवक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 24 कहता है कि सब जातियों में मसीह और महिमा की आशा के भेद को फैलाने, और फिर उन्हें समझाने और सिखाने की इस सेवकाई में दुःखभोग सम्मिलित है। ‘‘अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं; और मसीह के क्लेशों की घटी उस की देह के लिये, अर्थात् कलीसिया के लिये, अपने शरीर में पूरी किए देता हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== ‘‘घटी को पूरी किए देता हूं’’ का क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब इसका क्या अर्थ है कि जब पौलुस कलीसिया के लिए दुःख उठाता है — अधिक से अधिक लोगों में महिमा की आशा को फैलाते हुए, और मसीह के भेद के बारे में, और ऐसा करने में दुःख उठाना उन्हें सिखा रहा है — वह ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी को पूरी कर रहा है’’&amp;amp;nbsp;? कैसे कोई मनुष्य उसे पूरा कर सकता है, जो निश्चित ही अपने में उतना ही पूर्ण है जितना कि कोई दुःखभोग हो सकता है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''संदर्भ, इसके अर्थ का सुझाव देता है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि संदर्भ जो हमने अभी देखा, सुझाव देता है कि पौलुस का दुःखभोग, मसीह के दुःखभोग की घटी को इसके मूल्य में कुछ भी जोड़ते हुए, पूरा नहीं करता, अपितु उन्हें उन लोगों तक पहुँचाने के द्वारा पूरा करता है, जिन्हें आशीष देना उनका आशय था। मसीह के क्लेशों में जो घटी है, वो ये नहीं कि वे मूल्य या गुण में अपूर्ण हैं, मानो कि वे उन सभों के पापों को पर्याप्त रूप से ढाँप नहीं सके जो विश्वास करते हैं। जो घटी है वो ये कि मसीह के क्लेशों का असीमित मूल्य, संसार में ज्ञात नहीं है। वे अभी भी अधिकांश लोगों के लिए भेद (छिपे हुए) हैं। और परमेश्वर का ध्येय ये है कि वो भेद सभी गैर-यहूदियों में प्रगट किया, फैलाया जावे। अतः क्लेशों में इस अर्थ में घटी है कि वे जाति-जाति में देखे व जाने नहीं गए हैं। उन्हें ‘वचन’ की सेवकाई करने वालों के द्वारा ले जाया जाना चाहिए। और ‘वचन’ के वे सेवक, दूसरों तक उसे पहुँचाने के द्वारा, मसीह के क्लेशों में जो घटी है, उसे पूरा करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''फिलिप्पियों 2: 30 में समान शब्द''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
फिलिप्पियों 2: 30 में इसी के समान शब्दों का उपयोग करने में, इसका एक मजबूत पुष्टीकरण है। फिलिप्पी की कलीसिया में इपफ्रुदीतुस नाम का एक मनुष्य था। जब वहाँ की कलीसिया ने पौलुस के लिए सहारा (शायद पैसा या आपूर्तियाँ अथवा पुस्तकें) एकत्र किया, उन्होंने उसे इपफ्रुदीतुस के हाथ, रोम में पौलुस को भेजने का निर्णय लिया। इस आपूर्ति के साथ अपनी यात्रा में इपफ्रुदीतुस अपनी जिन्दगी को लगभग खो देता है। पद 27 कहता है कि वह इतना बीमार हुआ कि मरने के निकट था, लेकिन परमेश्वर ने उसे बचाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब पद 29 में पौलुस फिलिप्पी की कलीसिया को कहता है कि जब इपफ्रुदीतुस वापिस आता है, वे उसका सम्मान करें, और वह पद 30 में अपना कारण देता है, जिसके शब्द कुलुस्सियों 1: 24 के बहुत समान हैं। ‘‘क्योंकि वह मसीह के काम के लिये अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर मरने के निकट हो गया था, ताकि जो घटी तुम्हारी ओर से मेरी सेवा में हुई, उसे पूरा करे।’’ अब, मूल वाक्यांश में, तुम्हारी ओर से मेरी सेवा में ‘‘जो घटी … उसे पूरा करे,’’ कुलुस्सियों 1: 24 में मसीह के क्लेशों में ‘‘घटी … पूरी किये देता हूं’’ के लगभग समान है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, किस अर्थ में, पौलुस के प्रति फिलिप्पीवासियों की सेवा में ‘‘घटी’’ थी और किस अर्थ में इपफ्रुदीतुस ने उसे ‘‘पूरा किया’’ जो उनकी सेवा में घटी थी&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ कि एक सौ साल पहिले एक टीकाकार, ‘मारविन विन्सेन्ट’ इसे बिल्कुल ठीक समझ लेता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; पौलुस को दी गई भेंट, एक देह के रूप में कलीसिया की एक भेंट थी। ये, प्रेम का एक बलिदानपूर्ण प्रस्तुतीकरण था। जो घटी थी, और जो पौलुस और कलीसिया के लिए समान रूप से सुखद रहा होता, वो था, व्यक्तिगत रूप से कलीसिया द्वारा इस भेंट का दिया जाना। ये असम्भव था, और पौलुस, इपफ्रुदीतुस की प्रीतिमय और उत्साहपूर्ण सेवकाई के द्वारा, उसे इस घटी की आपूर्ति के रूप में, चित्रित करता है। (एपिजि़ल टू द फिलिप्पियन्स एन्ड टू फिलेमोन, आई.सी.सी., पृ. 78) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हम कैसे मसीह के क्लेशों में ‘‘घटी को पूरा करते’’ हैं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि कुलुस्सियों 1: 24 के शब्दों का भी ठीक यही अर्थ है। मसीह ने दुःख उठाने और पापियों के लिए मरने के द्वारा संसार के लिए एक प्रेम बलिदान तैयार किया है। ये पूर्ण है और इस में किसी बात की घटी नहीं है — केवल एक चीज छोड़कर, संसार की सभी जातियों को और आपके कार्यस्थल के लोगों को स्वयँ मसीह द्वारा व्यक्तिगत प्रस्तुतीकरण। इस घटी के लिए परमेश्वर का उत्तर है कि मसीह के लोगों (पौलुस जैसे लोगों) को बुलाये कि संसार को मसीह के क्लेशों को को प्रस्तुत करें — उन्हें यरूशलेम से जगत के छोरों तक ले जायें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा करने में हम ‘‘मसीह के क्लेशों की घटी को पूरा करते हैं।’’ हम उसे परिपूर्ण करते हैं जिसके लिए वे बनाये गए थे, यथा, ऐसे लोगों के संसार को व्यक्तिगत प्रस्तुतिकरण, जो उन क्लेशों के असीमित मूल्य को नहीं जानते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन ध्यान दीजिये कि पौलुस इसे पद 24 में कैसे कहता है:- वह कहता है कि ये उसके दुःख उठाने में है और उसके शरीर में — अर्थात्, उसके वास्तविक, दुःख उठाते हुआ शरीर में, वह मसीह के क्लेशों की घटी को पूरा करने में अपना हिस्सा पूरा करता है। अतः, पौलुस अपने दुःख उठाने और मसीह के क्लेशों के बीच एक बहुत निकट का सम्बन्ध देखता है। ये क्या अर्थ रखता है, मैं सोचता हूँ, यह कि परमेश्वर का ध्येय है कि ‘उसके’ लोगों के क्लेशों के द्वारा, मसीह के क्लेश संसार के सम्मुख प्रस्तुत किये जावें। परमेश्वर, मसीह की देह, कलीसिया के लिए, वास्तव में चाहता है कि कुछ दुःखों का अनुभव करे जो ‘उसने’ अनुभव किये ताकि जब हम क्रूस के ख्रीष्ट को लोगों को प्रस्तुत करते हैं, वे क्रूस के ख्रीष्ट को हम में देखें। ‘उसे’ उन्हें प्रस्तुत करने में, और प्रेम का जीवन जो ‘उसने’ जिआ उसे जीने में जो क्लेश हम अनुभव करते हैं, उनके द्वारा हमें मसीह के क्लेशों को लोगों के लिए वास्तविक बनाना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘‘मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं ... मसीह के क्लेशों की घटी … पूरी किए देता हूं।’’ मसीह, ‘उसके’ दुःखभोग का, संसार को एक व्यक्तिगत प्रस्तुतिकरण किये जाने का इच्छुक है। और जिस तरीके से ‘वह’ स्वयँ को संसार के लिए एक दुःख भोगनेवाले के रूप में, संसार को प्रस्तुत करने का इच्छुक है, वो है ‘उसके’ लोगों के द्वारा जो, ‘उसके’ समान, संसार के लिए दुःख उठाने के इच्छुक हैं। ‘उसके’ क्लेष, हमारे क्लेशों में पूरे होते हैं क्योंकि हमारे क्लेशों में संसार ‘उसके’ क्लेश देखता है, और उनका नियत प्रभाव पड़ता है। पापियों के लिए मसीह का दुःख उठाने वाला प्रेम, पापियों के लिए उसके लोगों के दुःख उठाते हुए प्रेम में, दिखता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं सोचता हूँ कि जो हम कुलुस्सियों 1: 24 में देखते हैं, वो मरकुस 8: 35 में यीशु के शब्दों को, जीना है, ‘‘जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे वह उसे खोएगा, पर जो कोई मेरे और सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।’’ उद्धार का पथ, ‘‘सुसमाचार के लिये अपना प्राण खोने’’ का पथ है। मुख्य बात ये है कि सुसमाचार को लोगों तक (कार्यालय के पार या समुद्र के पार) ले जाना साधारणतया त्याग और दुःखभोग की मांग करता है, जिन्दगी का एक खो देना या स्वयँ का इन्कार करना। मसीह चाहता है कि इसी तरीके से ‘उसके’ उद्धार देने वाले दुःखभोग, ‘उसके’ लोगों के दुःख उठाने के द्वारा, संसार को पहुँचाये जावें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== इस बुलाहट में पौलुस का आनन्द ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और पौलुस कहता है कि वह इसमें आनन्दित होता है। पद 24:- ‘‘अब मैं उन दुःखों के कारण आनन्द करता हूं; जो तुम्हारे लिये उठाता हूं।’’ कलवरी की सड़क, एक आनन्दरहित सड़क नहीं है। ये एक कष्टमय रास्ता है, लेकिन गहरा सुख देने वाला है। जब हम, सुसमाचार-प्रचार की मुहिमों और सेवकाई और प्रेम के बलिदानों व दुःखभोग के ऊपर, आराम व सुरक्षा के अस्थाई सुखों का चुनाव करते हैं, हम आनन्द के विपरीत चुनाव करते हैं। हम टूटे हुए हौदों का चुनाव करते हैं जो अपने में कोई जल नहीं रख सकते और जल के ऐसे सोते का तिरस्कार करते हैं जिसका जल कभी नहीं सूखता (यशायाह 58: 11)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संसार में सबसे सुखी लोग वे लोग हैं जो अपने अन्दर मसीह के भेद को, जो महिमा की आशा है, जानते हैं जो उनकी गहरी लालसा को सन्तुष्ट करते हुए और अपने स्वयँ के दुःख उठाने के द्वारा, मसीह के क्लेशों को संसार तक पहुँचाने के लिए, उन्हें स्वतंत्र करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस मूल-पाठ में परमेश्वर हमें बुला रहा है कि सुसमाचार की ख़ातिर जियें और इसे दुःख उठाने के द्वारा करें। मसीह ने दुःखभोग का चुनाव किया, ये उसे अचानक ही नहीं हो गया। ‘उसने’ इसे, कलीसिया का सृजन करने व उसे सिद्ध करने के, मार्ग के रूप में चुना। अब ‘वह’ हमें बुलाता है कि दुःखभोग का चुनाव करें। अर्थात्, ‘वह’ हमें बुलाता है कि अपना क्रूस उठायें और कलवरी की सड़क पर ‘उसका’ अनुसरण करें और अपने आप का इन्कार करें और संसार को ‘उसके’ क्लेश प्रस्तुत करने तथा कलीसिया की सेवकाई करने की ख़ातिर आत्मत्याग करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने अभी-अभी ‘रोमानियाई’ पासवान् तथा मिशन अगुआ ‘जोसेफ़ टीसन’ से, इसे कहने का एक यादग़ार तरीका सुना है। उसने कहा, ‘‘मसीह का क्रूस प्रायश्चित के लिए था, हमारा प्रचारण के लिए है।’’ अर्थात्, मसीह ने उद्धार निष्पादित करने के लिए दुःख उठाया, हम उद्धार फैलाने के लिए दुःख उठाते हैं। और दूसरों के भले के लिए कष्ट उठाने की हमारी स्वीकृति, मसीह के क्लेशों को एक पूरा करना है क्योंकि यह उन्हें दूसरों तक पहुँचाती और उन्हें दृश्य बनाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== एक देशी भारतीय सुसमाचार-प्रचारक की कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब मई माह में मैं ‘मिशनस् बुक’ पर काम कर रहा था, मुझे जे. ओस्वाल्ड सैन्डर्स को बोलते हुए सुनने का एक सुअवसर मिला। उसके संदेश ने दुःख उठाने को गहराई से छुआ। वे 89 साल के हैं और अब भी सारे संसार में यात्रा करते और बोलते हैं। जब से वे 70 साल के हुए उन्होंने प्रति वर्ष एक पुस्तक लिखी है! मैं इसका उल्लेख केवल एक जिन्दगी के चरम अर्पण में उल्लसित होने के लिए कर रहा हूँ, जो 65 की उम्र से कब्र में जाने तक के आत्म-स्वार्थ में किनारा कर लेने के विचार के बिना, सुसमाचार के लिए उण्डेली गई है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उन्होंने एक देशी मिशनरी की कहानी बतायी जो भारत में गाँव-गाँव नंगे पैर सुसमाचार का प्रचार करते हुए फिरा। उसकी कठिनाईयाँ बहुत सी थीं। कई मील की यात्रा के एक लम्बे दिन तथा बहुत हतोत्साहन के बाद वो किसी एक गांव में आया और सुसमाचार देने का प्रयास किया किन्तु उसे नगर से बाहर निकाल दिया गया और तिरस्कार किया गया। तो उदास होकर वह गाँव के छोर तक गया और एक पेड़ के नीचे लेट गया और थकावट से चूर होकर सो गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब वह जागा, लोग उसे घेरे हुए थे, और सारा नगर उसके चारों ओर इकट्ठा हो गया था कि उसको बोलते हुए सुने। गाँव के मुखिया ने उसे समझाया कि जब वह सोया हुआ था तो वे उसे देखने आये। जब उन्होंने उसके छालों से भरे पैरों को देखा, उन्होंने ये निष्कर्ष निकाला कि वह एक पवित्र मनुष्य होना चाहिए, और ये कि वे दुष्ट थे कि उसका तिरस्कार किया। वे खेदित थे और वो संदेश सुनना चाहते थे जिसे उन तक लाने के लिए वह इतना दुःख उठाने को तैयार था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः उस सुसमाचार-प्रचारक ने अपने छालों से भरे सुन्दर पैरों के द्वारा यीशु के क्लेशों को पूरा किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== जोसेफ़ नाम के एक मसाई योद्धा की कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एम्सटर्डम में बिली ग्राह्म एसोसियेशन द्वारा प्रायोजित, ‘इटीनरेन्ट इवान्जलिस्टस् कॉन्फ्रैंस’ में उपस्थित होने वालों में एक सर्वाधिक कम अपेक्षित व्यक्ति था, जोसेफ़ नाम का एक मसाई योद्धा। लेकिन उसकी कहानी ने, स्वयँ डा. ग्राह्म के साथ एक मुलाकात का अवसर जीत लिया। उसकी कहानी ‘माइकल कार्ड’&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt; के द्वारा बतायी जाती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक दिन जोसेफ़, जो अफ्रीका की गर्म, गन्दी सड़कों में से एक पर चला जा रहा था, किसी से मिला जिसने उसके साथ यीशु मसीह का सुसमाचार बाँटा। वहीं और उसी समय उसने यीशु को अपना प्रभु और उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण किया। पवित्र आत्मा की सामर्थ ने उसके जीवन को बदलना आरम्भ कर दिया; वह ऐसी उत्तेजना और आनन्द से भर गया था कि सबसे पहिली चीज जो वह करना चाहता था वो ये कि अपने स्वयँ के गाँव लौटे और अपने स्थानीय कबीले के सदस्यों के साथ वही शुभ-समाचार बाँटे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ ने घर-घर जाना और हर जिस व्यक्ति से वो मिला, ये आशा रखते हुए कि उनके चेहरों का चमक उठना देखे जैसा कि उसका हुआ था, उसे यीशु के क्रूस (दुःखभोग!) के बारे में और उस उद्धार के बारे में बताना आरम्भ कर दिया, जिसका प्रस्ताव ये देता है। उसे अचभ्भा हुआ कि गाँववासियों ने न केवल परवाह नहीं की, बल्कि वे हिंसक हो उठे। गाँव के पुरुषों ने उसे पकड़ लिया और जमीन पर लिटा कर रखा और स्त्रियों ने उसे कंटीले तारों वाली लाठियों से पीटा। उसे गाँव से घसीट कर बाहर कर दिया गया और जंगल में अकेला मरने के लिए छोड़ दिया गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ किसी तरह रेंगता हुआ जल के एक पोखरे तक पहुँचा, और वहाँ, कभी होश में और कभी बेहोशी में कई दिन बिताने के बाद, उठने की ताक़त पाया। उसे उस शत्रुतापूर्ण स्वागत के बारे में अचरज हुआ जो उसने उन लोगों से पाया जिन्हें वह अपने जन्म से जानता था। उसने विचार किया कि उसने अवश्य कुछ छोड़ दिया था या यीशु की कहानी त्रुटिपूर्ण ढंग से बताया। उस संदेश का अभ्यास करके जो उसने सर्वप्रथम सुना था, उसने निर्णय लिया कि वापिस जाये और एक बार और अपने विश्वास को बाँटे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जोसेफ़ झोपडि़यों के वृत में लंगड़ाता हुआ चला और यीशु का प्रचार करना आरम्भ कर दिया। उसने पैरवी की ‘‘‘वह’ तुम्हारे लिए मर गया, ताकि तुम क्षमा पाओ और जीवते परमेश्वर को जान लो।’’ पुनः वह गाँव के पुरुषों द्वारा झपट कर पकड़ लिया गया और उसके घावों को, जो अभी चंगा होना आरम्भ ही हुए थे, पुनः उधेड़ते हुए स्त्रियों ने उसे पीटा। एक बार फिर उन्होंने बेहोशी की अवस्था में उसे घसीट कर गाँव से बाहर किया और मरने के लिए छोड़ दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहली पिटाई में जीवित रहना, सच में असाधारण था। दूसरी में जिन्दा रहना, एक चमत्कार था। पुनः, दिनों बाद, जोसेफ़ जंगल में जागा, घायल, निशानों से भरा — और वापिस जाने के लिए दृढ़-निश्चित। वह उसे छोटे गाँव में लौटा और इस बार, इससे पूर्व कि उसे अपना मुँह खोलने का अवसर मिले, उन्होंने उस पर हमला कर दिया। जबकि उन्होंने उसे तीसरी और सम्भवतः अन्तिम बार पीटा, उसने पुनः उनसे यीशु मसीह, प्रभु के बारे में कहा। इससे पूर्व कि वह बेहोश होता, अन्तिम चीज जो उसने देखी वो ये कि उन स्त्रियों ने जो उसे पीट रही थीं, रोना आरम्भ कर दिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस बार अपने स्वयँ के बिस्तर उसकी आँखें खुलीं। वे लोग जिन्होंने उसे इतनी बुरी तरह पीटा था, अब उसकी जिन्दगी बचाने का प्रयास कर रहे थे, और उसे स्वस्थ करने के लिए सेवा-श्रुषुसा कर रहे थे। सारा गाँव मसीह के पास आ गया था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये उसका एक जीता-जागता उदाहरण है जो पौलुस का अर्थ है जब उसने कहा, ‘‘मैं मसीह के क्लेशों की घटी, उस की देह के लिये पूरी किए देता हूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये जानना कि सुसमाचार की ख़ातिर मसीह हमें बलिदान के लिए बुलाता है, कुछ गहराई से स्वतंत्र करनेवाला और दृढ़ करनेवाला है। जब ये आता है ये हमें बिना सुरक्षा फेंक दिये जाने से, दृढ़ करता है। और जब प्रेम हमें संकेत से बुलाता है, यह हमें इसका चुनाव करने के लिए स्वतंत्र करता है। और यह हमें अमेरिकी समृद्धि के अविश्वसनीय प्रलोभन से स्वतंत्र करना आरम्भ करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== हैती में, त्यागपूर्ण दान करने की एक कहानी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अमेरिकियों के लिए ये लगभग असम्भव है कि उस विधवा की यीशु की प्रशंसा को सहन कर सकें जिसने ‘‘अपनी घटी में से अपनी सारी जीविका डाल दी (लूका 21: 4)। ‘उसने’ वास्तव में उसकी प्रशंसा की। ‘उसने’ उस पर गैरजिम्मेदार होने का दोष नहीं लगाया। ‘उसने’ परमेश्वर की ख़ातिर उसके त्याग की प्रशंसा की। इस आत्म-प्रेरणा को देखने के लिए, हमें अमेरिका छोड़कर कहीं और जाना पड़ सकता है। हैती से ‘स्टेनफोर्ड केली’ इसे उदाहरण देकर समझाते हैं।&amp;lt;sup&amp;gt;2&amp;lt;/sup&amp;gt; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
चर्च में एक धन्यवादी पर्व चल रहा था और प्रत्येक मसीही को एक प्रेम-भेंट लाने के लिए आमंत्रित किया गया था। हैती-वासी एक पुरुष की ओर से जिसका नाम एडमन्ड था, एक लिफाफे में 13 डॉलर रोकड़ थे। वह राशि वहाँ काम करने वाले एक व्यक्ति की तीन माह की आमदनी थी। ‘केली’ उन लोगों के समान ही चकित हुआ जो कि संयुक्त राज्य में रविवार की भेंट गिनते समय, 6,000 डॉलर रोकड़ की भेंट पायें। उन्होंने एडमन्ड के लिए चारों ओर देखा, किन्तु उसे नहीं पाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बाद में ‘केली’ उस से गाँव में मिले और उससे पूछा। उन्होंने एक विवरण के लिए उस पर दबाव डाला और पाया कि एडमन्ड ने सुसमाचार की ख़ातिर, परमेश्वर को 13 डॉलर की भेंट देने के लिए अपना घोड़ा बेच दिया था। लेकिन वह पर्व में क्यों नहीं आया था&amp;amp;nbsp;? वह हिचकिचाया और उत्तर नहीं देना चाहता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्ततः एडमन्ड ने कहा, ‘‘मेरे पास पहनने के लिए कमीज नहीं थी।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो हम इस सप्ताह देख रहे हैं वो ये कि परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने को बुला रहा है … न केवल शुद्धिकरण और परिष्कृत होने के नैतिक परिणामों के कारण, और न केवल यीशु के साथ गहरी अंतरंगता में जाने के कारक व ‘उसे’ बेहतर जानने के कारण; किन्तु इसलिए भी कि मसीह के क्लेशों में जो घटी है, उन लोगों के द्वारा पूरी कर दी जावे जो इन क्लेशों को संसार के पास ले जाते हैं और मसीह के प्रेममय बलिदान को, ‘उसके’ लोगों के प्रेममय बलिदानों के द्वारा दिखाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;sup&amp;gt;1&amp;lt;/sup&amp;gt; माइकल कार्ड, ‘‘वून्डेड इन द हाऊस ऑफ फ्रैन्ड्स,’’ वच्र्यू , मार्च/अप्रैल, 1991, पृ.सं. 28-29, 69। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;sup&amp;gt;2&amp;lt;/sup&amp;gt; नार्म लेविस, प्रायोरिटी वनः वॉट गॉड वान्ट्स (ऑरेन्ज, कैलिफोर्निया: प्रामिस पब्लिशिंग, 1988), पृ.सं. 120।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: ताकि हम मसीह को प्राप्त करें</title>
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				<updated>2015-11-13T22:15:32Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: ताकि हम मसीह को प्राप्त करें&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: That We Might Gain Christ}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; निदान, हे मेरे भाइयो, प्रभु में आनन्दित रहो। वे ही बातें तुम को बार बार लिखने में मुझे तो कुछ कष्ट नहीं होता, और इस में तुम्हारी कुशलता है। कुत्तों से चैकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चैकस रहो, उन काट कूट करनेवालों से चैकस रहो; क्योंकि खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं, और मसीह यीशु पर घमण्ड करते हैं, और शरीर पर भरोसा नहीं रखते, पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं। यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं। आठवें दिन मेरा खतना हुआ, इस्राएल के वंश, और बिन्यामीन के गोत्र का हूं; इब्रानियों को इब्रानी हूं; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था। परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तामता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं। और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, बरन उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है। और मैं उसको और उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जानूं, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूं। ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं। यह मतलब नहीं, कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं: पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिस के लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबल, परमेश्वर के लोगों के लिए दुःखभोग की प्रतिज्ञा करती है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताहों में, हम दुःख उठाने के लिए तैयार होने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इसका कारण मात्र मेरा ये बोध नहीं है कि दिन बुरे हैं और धार्मिकता का मार्ग कीमती है, अपितु बाइबल की प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर के लोग दुःख उठायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, प्रेरित 14: 22 कहता है कि पौलुस ने अपनी सभी नौजवान कलीसियाओं से कहा, ‘‘हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।’’ और यीशु ने कहा, ‘‘यदि उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे’’ (यूहन्ना 15: 20)। और पतरस ने कहा, ‘‘जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है’’ (1 पतरस 4: 12)। दूसरे शब्दों में, ये अचम्भे की बात नहीं है; इसकी उम्मीद की जाना चाहिए। और पौलुस ने (2 तीमुथियुस 3: 12 में) कहा, ‘‘पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं इसे एक बाइबल-शास्त्रीय एक सच्चाई लेता हूं कि जितना अधिक हम पृथ्वी का नमक और जगत की ज्योति होने के लिए, और संसार के सुसमाचार न पाये लोगों तक पहुंचने, और अन्धकार के कामों को उजागर करने, और पाप व शैतान के बन्धनों को खोलने में, ईमानदार होते हैं, उतना ही अधिक हम दुःख उठायेंगे। इसी कारण हमें तैयारी करना चाहिए। और इसी कारण इन सप्ताहों में, मैं उन मूल- पाठों से उपदेश दे रहा हूँ जो हमें तैयार होने में सहायता करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये संदेश, परमेश्वर की सेवा में हमारे दुःख उठाने में, ‘उसके’ चार उद्देश्यों के बारे में हैं। एक है, नैतिक या आत्मिक उद्देश्य:- दुःख उठाने में हम परमेश्वर में अधिक पूर्णतया आशा रखने लगते हैं और संसार की चीजों में कम भरोसा रखते हैं। दूसरा, सामीप्य का उद्देश्य है:- जब हम मसीह के दुःखों में सहभागी होते हैं, हम ‘उसे’ बेहतर जानने लगते हैं। आज हमारे ध्यान का केन्द्र यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह के साथ अधिक अंतरंगता&amp;amp;nbsp;;या निकटताद्ध का उद्देश्य  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें सिखाने और ये दिखाने के द्वारा परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने में सहायता करता है कि दुःखभोग के द्वारा हमें मसीह के साथ और गहरे सम्बन्ध में जाने का अभिप्राय है। आप ‘उसे’ और बेहतर जान पाते हैं जब आप ‘उसके’ दर्द को बाँटते हैं। वे लोग जो मसीह की बहुमूल्यता के बारे में अधिक गहराई और मिठास के साथ लिखते हैं, वे लोग हैं जिन्होंने ‘उसके’ साथ गहराई से दुःख उठाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जैरी ब्रिजे़स के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, जैरी ब्रिजे़स की पुस्तक, ट्रस्टिंग गॉड, इवन वैन लाइफ़ हर्टस्, दुःख उठाने के बारे में तथा क्लेशों के द्वारा परमेश्वर के निकट हो जाने के बारे में, एक गहरी व सहायक पुस्तक है। और इसलिए ये जानकर कोई अचरज नहीं है कि जब वह 14 साल का था, उसने दूसरे कमरे से अपनी माँ द्वारा पुकारा जाना सुना, सर्वथा अनपेक्षित, और पहुँचा तो उसे अन्तिम श्वास लेते देखा। उसकी शारीरिक दशा भी ऐसी थी जिसने उसे सामान्य खेलकूद से वंचित रखा। और मात्र कुछ ही वर्ष पूर्व उसकी पत्नी कैंसर से मर गई। जहाज-चालकों के साथ परमेश्वर की सेवा करने ने उसको दर्द से नहीं बचाया। वह दुःखभोग के बारे में गहराई से लिखता है क्योंकि वह मसीह के साथ दुःखों में गहराई से गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''होरेशियस़ बोनार के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सौ वर्ष से भी पूर्व होरेशियस़ बोनार, स्काटलैन्ड निवासी पास्टर और भक्ति-गीत लेखक, ने एक छोटी पुस्तक लिखी जो नाइट ऑफ वीपिंग, अथवा, ‘‘वैन गॉड्स चिल्डरेन सफ़र’’ कहलाती है। इस में उसने कहा कि उसका लक्ष्य था, ‘‘सन्तों की सेवकाई करना … उनके बोझों को उठाने की खोज में रहना, उनके घावों को बाँधना, और उनके बहुत से आँसुओं में से कम से कम कुछ को सुखाना।’’ यह एक कोमल और गहरी और बुद्धिमत्तापूर्ण पुस्तक है। अतः उसे ऐसा कहते हुए सुनना अचम्भे की बात नहीं है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ''ये एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखी गई है जो स्वयँ ही परखों के द्वारा लाभ उठाने की खोज में है, और काँपता है, कि ऐसा न हो कि यह चट्टान के ऊपर से हवा के समान, उसे सदा की तरह कठोर छोड़ते हुए, गुजर जाये; उस एक के द्वारा जो हर एक व्यथा में परमेश्वर के निकट हो जायेगा ताकि वह ‘उसे’ और भी जाने, और जो यह अंगीकार करने के लिए अनच्छिुक नहीं है कि फिर भी वह जितना जानता है, थोड़ा ही जानता है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रिजे़स और बोनार, हमें दिखाते हैं कि दुःखभोग, परमेश्वर के हृदय में गहरे उतर जाने का मार्ग है। परमेश्वर के पास उसके दुःख उठाते हुए बच्चों के लिए ‘उसकी’ महिमा के विशेष प्रकाशन हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अय्यूब, स्तिफनुस, और पतरस के वचन''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महीनों तक दुःखभोग के बाद, अय्यूब अन्ततः परमेश्वर से कहता है, ‘‘मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं’’ (अय्यूब 42: 5)। अय्यूब एक भक्त और खरा मनुष्य था, परमेश्वर के मन को भाने वाला, किन्तु जो वह परमेश्वर के बारे में समृद्धि में जानता था, और जो वह ‘उसे’ संकट के द्वारा जान गया, उनके बीच अन्तर, ‘उसके’ के बारे में सुनना और देखने का अन्तर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब स्तिुफनुस को बन्दी बनाया गया और उसे उसके विश्वास के लिए परखा गया और उसे उपदेश देने का एक अवसर दिया गया, परिणाम ये हुआ कि अगुवे क्रोधित हुए और उस पर अपने दाँतों को पीसा। वे उसे घसीट कर नगर से बाहर ले जाने और मार डालने वाले ही थे। ठीक उसी क्षण, लूका हमें बताता है, ‘‘उस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिने ओर खड़ा देखा’’ (प्रेरित 7: 55)। वहाँ एक विशेष प्रकाशन है, एक विशिष्ट निकटता, जो उनके लिए तैयार की गई है जो मसीह के साथ दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पतरस इसे इस तरह प्रस्तुत करता है, ‘‘यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम पर छाया करता है’’ (1पतरस 4: 14)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने बच्चों के ऊपर, ‘उसके’ ‘आत्मा’ और ‘उसकी’ महिमा का एक विशिष्ट आगमन और ठहरना सुरक्षित रखता है, जो ‘उसके’ नाम के लिए दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मूल-पाठ से तीन प्रेक्षण  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आज के संदेश का मुख्य केन्द्र, दुःखभोग में इस निकटता या अंतरंगता के कारक पर है। सन्तों के दुःख उठाने के उद्देश्यों में से एक ये है कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता, कम औपचारिक व कम बनावटी व कम दूरी का बन जावे और अधिक व्यक्तिगत व अधिक वास्तविक व अधिक अंतरंग व निकट व गहरा हो जावे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे मूल-पाठ (फिलिप्पयों 3: 5-11) में, मैं कम से कम तीन चीजें देखना चाहता हूँ: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. पहिला, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, पौलुस की दुःख उठाने की तैयारी; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. दूसरा, मसीह के प्रति आज्ञाकारिता की कीमत के रूप में, दुःखभोग और क्षति का, पौलुस का अनुभव; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. तीसरा, इस सब में पौलुस का लक्ष्य, यथा, मसीह को प्राप्त करना: ‘उसे’ जानना और, और अधिक अंतरंगता व वास्तविकता के साथ ‘उस’ में व संगति में बने रहना, तुलना में उससे जो वह अपने सर्वोत्तम मित्रों, बरनबास और सीलास के साथ जानता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. दुःख उठाने के लिए पौलुस की तैयारी  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 5 व 6 में पौलुस उन विशेषकों को सूचीबद्ध करता है जिनका उपभोग वह मसीही बनने से पहले करता था। वह इब्राहीम की कुलीन सन्तान, इब्रानियों का इब्रानी के रूप में अपना जातीय वंशवृक्ष बताता है। ये उसके लिए बड़ा लाभ ले आया, महत्वपूर्ण होने की एक विशाल अनुभूति और भरोसा। वह एक इस्राएली था। फिर वह तीन चीजें बताता है जो, इससे पूर्व कि वह एक मसीही बना, पौलुस की जिन्दगी के ठीक मर्मस्थल को जाती हैं (पद 5 के अन्त में):- ‘‘व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस की मान्यताएं, इससे पूर्व कि उसकी भेंट मसीह से हुई''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पौलुस का जीवन था। ये वो था जिसने उसे अर्थ और महत्व दिया। ये उसकी उपलब्धि थी, उसका सौभाग्य, उसका आनन्द। विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सौभाग्य--और पौलुस का ये था कि वह व्यवस्था का पालन करनेवालों के उच्च-सोपानक, फ़रीसीगण, से आता था, और ये कि उनके बीच में वह इतना उत्साही था कि वह परमेश्वर के शत्रुओं, यीशु की कलीसिया, को सताने के मार्ग में अगुआ बना, और ये कि उसने अतिसतर्कता से व्यवस्था का पालन किया। उसे वंशगत-सम्बद्धता से सौभाग्य मिला, उसे श्रेष्ठ होने में सौभाग्य मिला, उसके द्वारा निर्दोष व्यवस्था-पालन में उसे परमेश्वर से सौभाग्य मिला--या उसने ऐसा सोचा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तब वह दमिश्क के मार्ग पर मसीह से, जीवते परमेश्वर के ‘पुत्र’ से, मिला। मसीह ने उसे बता दिया कि उसे कितना दुःख उठाना पड़ेगा (प्रेरित 9: 16)। और पौलुस ने स्वयँ को तैयार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस ने अपने पूर्व की मान्यताओं को हानि गिना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरीके से उसने स्वयँ को तैयार किया, पद 7 में वर्णित है। ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’ पौलुस, धर्मी समाज की अपनी उच्च-सोपानक स्थिति, फरीसी होने, को देखता है; वह इसके सभी सौभाग्यों और शाबासी के साथ उस समूह में सबसे उच्च स्थिति में होने के गौरव को देखता है; वह व्यवस्था-पालन में अपनी सख़्ती और उस नैतिक गर्व की अनुभूति को जिसका उसने आनन्द लिया, को देखता है; और वह, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, अपने पूरे संसार को लेकर इसे उलट देने के द्वारा, दुःख उठाने के लिए तैयारी करता है:- ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं (अर्थात् पद 5-6), उन्हीं को मैं ने हानि समझ लिया है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पूर्व कि वह मसीही बना, उसके पास एक बही-ख़ाता था जिसमें दो स्तम्भ/कॉलम थे: एक जो कहता था, लाभ या प्राप्तियाँ और दूसरा जो कहता था, हानियाँ। लाभ की ओर था, पद 5-6 का मानवीय गौरव। हानि की ओर थीं, भयंकर सम्भावनाएँ कि ये यीशु-क्रान्ति हाथ से निकल जाये और यीशु वास्तविक प्रमाणित होकर दिन जीत ले। जब वह दमिश्क के मार्ग पर जीवते मसीह से मिला, पौलुस ने एक बड़ी लाल पैन्सिल लिया और अपने लाभ के कॉलम के आर-पार बड़े लाल अक्षरों ‘‘'''हानि'''’’ लिख दिया। और उसने हानि के कॉलम पर बड़े अक्षरों में ‘‘'''लाभ'''’’ लिख दिया, जिसमें केवल एक नाम था: ‘मसीह’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और केवल यही नहीं, जितना अधिक पौलुस ने संसार में जीवन की तुलनात्मक मान्यताओं और मसीह की महानता के बारे में सोचा, वह पद 5-6 में व्यक्त की गई कुछ चीजों से आगे बढ़ गया और उस पहले कॉलम में मसीह को छोड़कर हर एक चीज को डाल दिया:- पद 8: ‘‘बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ उसने अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य उपलब्धियों को हानि गिनने से आरम्भ किया, और उसने मसीह को छोड़कर, हर एक चीज को हानि गिनने से अन्त किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सामान्य मसीहियत''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस के लिए, एक मसीही बनने का यही अर्थ था। और ऐसा न हो कि हम में से कोई यह सोचे कि वह अद्वितीय या विशिष्ट था, ध्यान दीजिये कि पद 17 में पूरे प्रेरिताई के अधिकार के साथ वह कहता है, ‘‘हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो।’’ ये है सामान्य मसीहियत। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पौलुस यहाँ कर रहा है वो ये कि यह दिखाना कि यीशु की शिक्षाओं को किस प्रकार जीना है। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया’’ (मत्ती 13: 44)। एक मसीही बनने का अर्थ है, ये खोजना कि मसीह (राजा), पवित्र आनन्द के ख़जाने की तिजोरी है और ‘उसे’ प्राप्त करने के लिए संसार की हर एक अन्य चीज के ऊपर ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। ‘‘उसने उस खेत को खरीदने के लिए, जो कुछ उसके पास था सब बेच दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, पुनः लूका 14: 33 में यीशु ने कहा, ‘‘तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु का चेला बनने का अर्थ है, अपनी सब सम्पत्ति--और हर उस चीज के ऊपर जो ये संसार प्रस्तुत करता है, बड़े लाल अक्षरों में ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यावहारिक रूप से इसका क्या अर्थ है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, इसका व्यावहारिक दृष्टि से क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ कि इसका अर्थ चार बातें हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. इसका अर्थ है कि जब कभी मुझे इस संसार की किसी भी चीज और मसीह में से चुनना पड़ता है, मैं मसीह को चुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. इसका अर्थ है कि मैं इस संसार की चीजों से इस प्रकार बर्ताव करूंगा जो मुझे मसीह के निकट ले जावे ताकि मैं मसीह को और भी प्राप्त करूं और जिस तरह से मैं संसार का उपयोग करता हूँ, उससे मैं और भी ‘उसमें’ आनन्दित हो सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. इसका अर्थ है कि मैं संसार की चीजों से सदैव इस तरह बर्ताव करूंगा जो ये प्रदर्शित करें कि वे मेरा धन नहीं हैं, अपितु ये प्रदर्शित करें कि मसीह मेरा धन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. इसका अर्थ है कि यदि मैं इस संसार की कोई या सभी चीजें खो दूं जो ये संसार प्रस्तुत करता है, मैं अपना आनन्द या अपने धन को या अपनी जिन्दगी को खो नहीं दूंगा, क्योंकि मसीह सब कुछ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये वो गणना है जिसे पौलुस ने अपने आत्मा में गिना पद 8: ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ मसीह सब-कुछ है और शेष सब हानि है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दुःख उठाने के लिए तैयार होने का ये एक तरीका क्यों है&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम एक मिनिट के लिए रुक जावें और अपनी स्थिति को पायें। मैं अब भी पहिले बिन्दु में ही चल रहा हूँ:-यथा, यह कि ये पौलुस का तरीका है दुःख उठाने के लिए तैयार होने का। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ&amp;amp;nbsp;? क्यों एक मसीही बनना, और मसीह के सिवाय अपने जीवन की हर चीज के ऊपर ‘‘हानि’’ लिख देना, दुःख उठाने के लिए तैयार होने का एक तरीका है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर ये है कि, दुःख उठाना, उन्हें दूर कर देने से अधिक, और कुछ नहीं है, जो संसार हमारे आनन्द के लिए हमें बुरी चीजें या अच्छी चीजें प्रस्तुत करता है--प्रतिष्ठा, समकक्ष लोगों के बीच सम्मान, नौकरी, पैसा, पति/पत्नी, यौन-जीवन, बच्चे, मित्रगण, स्वास्थ्य, ताकत, दृष्टि, श्रवण, सफलता इत्यादि। जब ये चीजें दूर कर दी जाती हैं (बल द्वारा या परिस्थिति द्वारा या चुनाव द्वारा), हम दुःख उठाते हैं। किन्तु यदि हमने पौलुस का और यीशु की शिक्षा का अनुसरण किया है और मसीह को प्राप्त करने के, समझ से परे मूल्य के कारण, उन्हें हानि समझ चुके हैं, तब हम दुःख उठाने के लिए तैयार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब आप एक मसीही बन जाते हैं, यदि आप मसीह को छोड़कर संसार की सभी चीजों के आर-पार एक बड़ा लाल ‘‘'''हानि'''’’ लिख देते हैं, तब जब मसीह आपको उन में से कुछ चीजों का परित्याग करने को बुलाता है, ये अजीब या अनपेक्षित नहीं है। दर्द और दुःख अत्याधिक हो सकता है। आँसू बहुत हो सकते हैं, जैसा वे गतसमनी में यीशु के लिए थे। लेकिन हम तैयार रहेंगे। हम जान जायेंगे कि मसीह का मूल्य उन सब चीजों से परे है जो संसार हमें दे सकता है और ये कि उन्हें खो देने में हम मसीह को और अधिक प्राप्त करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. दुःख उठाने का पौलुस का अनुभव  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, पद 8 के द्वितीय-अर्द्ध में पौलुस, दुःख उठाने के लिए तैयार होने से, वास्तविक दुःख उठाने की ओर बढ़ता है। वह पद 8 के प्रथम-अर्द्ध में सब चीजों को हानि गिनने से आगे बढ़कर, उस आयत के द्वितीय-अर्द्ध में सब वस्तुओं की वास्तव में हानि भोगने की ओर बढ़ता है। ‘‘ ... जिस {अर्थात् मसीह} के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ हम आगामी सप्ताह में इसे देखने जा रहे हैं:- पौलुस ने संसार के सामान्य लाभों और सुख-सुविधाओं की इतनी अधिक वास्तविक हानि का अनुभव कर लिया था कि वह कह सकता था कि वह वस्तुओं को हानि मात्र गिन नहीं रहा था ( वह हानि उठा रहा था। उसने अपनी मान्यताओं को उलटा कर देने के द्वारा तैयारी कर ली थी, और अब वह परखा जा रहा था। क्या उसने सब वस्तुओं के ऊपर मसीह का मूल्य आँका। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. दुःख उठाने में पौलुस का लक्ष्य (और परमेश्वर का उद्देश्य)  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, इस दुःख उठाने में पौलुस के लक्ष्य और परमेश्वर के उद्देश्य पर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के द्वारा मुझे समाप्त करने दीजिये। क्यों परमेश्वर ने ठहराया और पौलुस ने हानियों को स्वीकार किया कि इसका अर्थ उसके लिए एक मसीही होना था&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन आयतों में पौलुस बारम्बार उत्तर देता है ताकि हम बिन्दु को खो न सकें। इस हानि उठाने में वह निष्क्रिय नहीं है। वह सप्रयोजन/सोद्देश्य है। और उसका उद्देश्य मसीह को प्राप्त करना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 7: ‘‘उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8अः ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8बः ‘‘जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8सः ‘‘और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 9: ‘‘... और उस में पाया जाऊं {ताकि परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करूं, मेरी अपनी नहीं} ...’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10अः (सब वस्तुओं की हानि स्वीकार करने में अब भी अपने लक्ष्य को देते हुए) ‘‘ताकि मैं उसे ... जानूं’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10ब-11: (इसके बाद इसकी चार विशिष्टताएं देते हुए कि मसीह को जानने का क्या अर्थ है)’’'' &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. ‘‘उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को’’; और&amp;lt;br&amp;gt;2. ‘‘उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को’’;&amp;lt;br&amp;gt;3. ‘‘उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करना’’ {जानना};&amp;lt;br&amp;gt;4. ‘‘ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं।’’&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वो जो सब वस्तुओं की हानि उठाने में पौलुस को स्थिर रखता है, वो आत्मविश्वास है, कि संसार में बहुमूल्य चीजों की उसके द्वारा हानि उठाने में, वह कुछ अधिक बहुमूल्य को — मसीह को प्राप्त कर रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और दो बार उस प्राप्त करने को, जानना कहा गया है--पद 8अ:- ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण ... ।’’ पद 10:-‘‘ताकि मैं उसे … जानूं।’’ दुःख उठाने में ये अंतरंगता का कारक है। क्या हम ‘उसे’ जानना चाहते हैं&amp;amp;nbsp;? क्या हम ‘उसके’ साथ और अधिक व्यक्तिगत और ‘उसके’ साथ गहरा और ‘उसके’ साथ वास्तविक और ‘उसके’ साथ अंतरंग होना चाहते हैं — यहाँ तक कि हम, इस सभी धनों में महानतम् को प्राप्त करने के लिए, हर चीज को हानि गिनें&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम चाहते हैं, हम दुःख उठाने के लिए तैयार रहेंगे। यदि हम नहीं चाहते, ये हमें अचम्भे में डाल देगा और हम विद्रोह करेंगे। मसीह को जानने के, समझ से परे मूल्य के प्रति, प्रभु हमारी आँखों को खोले&amp;amp;nbsp;!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

	<entry>
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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: ताकि हम मसीह को प्राप्त करें</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%83%E0%A4%96_%E0%A4%89%E0%A4%A0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%8F_%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A5%87_%E0%A4%97%E0%A4%8F:_%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BF_%E0%A4%B9%E0%A4%AE_%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B9_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%82"/>
				<updated>2015-11-13T22:14:17Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: That We Might Gain Christ}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; निदान, हे मेरे भाइयो, प्रभु में आनन्दित रहो। वे ही बातें तुम को बार बार लिखने में मुझे तो कुछ कष्ट नहीं होता, और इस में तुम्हारी कुशलता है। कुत्तों से चैकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चैकस रहो, उन काट कूट करनेवालों से चैकस रहो; क्योंकि खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं, और मसीह यीशु पर घमण्ड करते हैं, और शरीर पर भरोसा नहीं रखते, पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं। यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं। आठवें दिन मेरा खतना हुआ, इस्राएल के वंश, और बिन्यामीन के गोत्र का हूं; इब्रानियों को इब्रानी हूं; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था। परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तामता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं। और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, बरन उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है। और मैं उसको और उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जानूं, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूं। ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं। यह मतलब नहीं, कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं: पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिस के लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबल, परमेश्वर के लोगों के लिए दुःखभोग की प्रतिज्ञा करती है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताहों में, हम दुःख उठाने के लिए तैयार होने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इसका कारण मात्र मेरा ये बोध नहीं है कि दिन बुरे हैं और धार्मिकता का मार्ग कीमती है, अपितु बाइबल की प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर के लोग दुःख उठायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, प्रेरित 14: 22 कहता है कि पौलुस ने अपनी सभी नौजवान कलीसियाओं से कहा, ‘‘हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।’’ और यीशु ने कहा, ‘‘यदि उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे’’ (यूहन्ना 15: 20)। और पतरस ने कहा, ‘‘जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है’’ (1 पतरस 4: 12)। दूसरे शब्दों में, ये अचम्भे की बात नहीं है; इसकी उम्मीद की जाना चाहिए। और पौलुस ने (2 तीमुथियुस 3: 12 में) कहा, ‘‘पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं इसे एक बाइबल-शास्त्रीय एक सच्चाई लेता हूं कि जितना अधिक हम पृथ्वी का नमक और जगत की ज्योति होने के लिए, और संसार के सुसमाचार न पाये लोगों तक पहुंचने, और अन्धकार के कामों को उजागर करने, और पाप व शैतान के बन्धनों को खोलने में, ईमानदार होते हैं, उतना ही अधिक हम दुःख उठायेंगे। इसी कारण हमें तैयारी करना चाहिए। और इसी कारण इन सप्ताहों में, मैं उन मूल- पाठों से उपदेश दे रहा हूँ जो हमें तैयार होने में सहायता करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये संदेश, परमेश्वर की सेवा में हमारे दुःख उठाने में, ‘उसके’ चार उद्देश्यों के बारे में हैं। एक है, नैतिक या आत्मिक उद्देश्य:- दुःख उठाने में हम परमेश्वर में अधिक पूर्णतया आशा रखने लगते हैं और संसार की चीजों में कम भरोसा रखते हैं। दूसरा, सामीप्य का उद्देश्य है:- जब हम मसीह के दुःखों में सहभागी होते हैं, हम ‘उसे’ बेहतर जानने लगते हैं। आज हमारे ध्यान का केन्द्र यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह के साथ अधिक अंतरंगता&amp;amp;nbsp;;या निकटताद्ध का उद्देश्य  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें सिखाने और ये दिखाने के द्वारा परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने में सहायता करता है कि दुःखभोग के द्वारा हमें मसीह के साथ और गहरे सम्बन्ध में जाने का अभिप्राय है। आप ‘उसे’ और बेहतर जान पाते हैं जब आप ‘उसके’ दर्द को बाँटते हैं। वे लोग जो मसीह की बहुमूल्यता के बारे में अधिक गहराई और मिठास के साथ लिखते हैं, वे लोग हैं जिन्होंने ‘उसके’ साथ गहराई से दुःख उठाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जैरी ब्रिजे़स के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, जैरी ब्रिजे़स की पुस्तक, ट्रस्टिंग गॉड, इवन वैन लाइफ़ हर्टस्, दुःख उठाने के बारे में तथा क्लेशों के द्वारा परमेश्वर के निकट हो जाने के बारे में, एक गहरी व सहायक पुस्तक है। और इसलिए ये जानकर कोई अचरज नहीं है कि जब वह 14 साल का था, उसने दूसरे कमरे से अपनी माँ द्वारा पुकारा जाना सुना, सर्वथा अनपेक्षित, और पहुँचा तो उसे अन्तिम श्वास लेते देखा। उसकी शारीरिक दशा भी ऐसी थी जिसने उसे सामान्य खेलकूद से वंचित रखा। और मात्र कुछ ही वर्ष पूर्व उसकी पत्नी कैंसर से मर गई। जहाज-चालकों के साथ परमेश्वर की सेवा करने ने उसको दर्द से नहीं बचाया। वह दुःखभोग के बारे में गहराई से लिखता है क्योंकि वह मसीह के साथ दुःखों में गहराई से गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''होरेशियस़ बोनार के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सौ वर्ष से भी पूर्व होरेशियस़ बोनार, स्काटलैन्ड निवासी पास्टर और भक्ति-गीत लेखक, ने एक छोटी पुस्तक लिखी जो नाइट ऑफ वीपिंग, अथवा, ‘‘वैन गॉड्स चिल्डरेन सफ़र’’ कहलाती है। इस में उसने कहा कि उसका लक्ष्य था, ‘‘सन्तों की सेवकाई करना … उनके बोझों को उठाने की खोज में रहना, उनके घावों को बाँधना, और उनके बहुत से आँसुओं में से कम से कम कुछ को सुखाना।’’ यह एक कोमल और गहरी और बुद्धिमत्तापूर्ण पुस्तक है। अतः उसे ऐसा कहते हुए सुनना अचम्भे की बात नहीं है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ''ये एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखी गई है जो स्वयँ ही परखों के द्वारा लाभ उठाने की खोज में है, और काँपता है, कि ऐसा न हो कि यह चट्टान के ऊपर से हवा के समान, उसे सदा की तरह कठोर छोड़ते हुए, गुजर जाये; उस एक के द्वारा जो हर एक व्यथा में परमेश्वर के निकट हो जायेगा ताकि वह ‘उसे’ और भी जाने, और जो यह अंगीकार करने के लिए अनच्छिुक नहीं है कि फिर भी वह जितना जानता है, थोड़ा ही जानता है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रिजे़स और बोनार, हमें दिखाते हैं कि दुःखभोग, परमेश्वर के हृदय में गहरे उतर जाने का मार्ग है। परमेश्वर के पास उसके दुःख उठाते हुए बच्चों के लिए ‘उसकी’ महिमा के विशेष प्रकाशन हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अय्यूब, स्तिफनुस, और पतरस के वचन''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महीनों तक दुःखभोग के बाद, अय्यूब अन्ततः परमेश्वर से कहता है, ‘‘मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं’’ (अय्यूब 42: 5)। अय्यूब एक भक्त और खरा मनुष्य था, परमेश्वर के मन को भाने वाला, किन्तु जो वह परमेश्वर के बारे में समृद्धि में जानता था, और जो वह ‘उसे’ संकट के द्वारा जान गया, उनके बीच अन्तर, ‘उसके’ के बारे में सुनना और देखने का अन्तर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब स्तिुफनुस को बन्दी बनाया गया और उसे उसके विश्वास के लिए परखा गया और उसे उपदेश देने का एक अवसर दिया गया, परिणाम ये हुआ कि अगुवे क्रोधित हुए और उस पर अपने दाँतों को पीसा। वे उसे घसीट कर नगर से बाहर ले जाने और मार डालने वाले ही थे। ठीक उसी क्षण, लूका हमें बताता है, ‘‘उस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिने ओर खड़ा देखा’’ (प्रेरित 7: 55)। वहाँ एक विशेष प्रकाशन है, एक विशिष्ट निकटता, जो उनके लिए तैयार की गई है जो मसीह के साथ दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पतरस इसे इस तरह प्रस्तुत करता है, ‘‘यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम पर छाया करता है’’ (1पतरस 4: 14)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने बच्चों के ऊपर, ‘उसके’ ‘आत्मा’ और ‘उसकी’ महिमा का एक विशिष्ट आगमन और ठहरना सुरक्षित रखता है, जो ‘उसके’ नाम के लिए दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मूल-पाठ से तीन प्रेक्षण  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आज के संदेश का मुख्य केन्द्र, दुःखभोग में इस निकटता या अंतरंगता के कारक पर है। सन्तों के दुःख उठाने के उद्देश्यों में से एक ये है कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता, कम औपचारिक व कम बनावटी व कम दूरी का बन जावे और अधिक व्यक्तिगत व अधिक वास्तविक व अधिक अंतरंग व निकट व गहरा हो जावे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे मूल-पाठ (फिलिप्पयों 3: 5-11) में, मैं कम से कम तीन चीजें देखना चाहता हूँ: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. पहिला, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, पौलुस की दुःख उठाने की तैयारी; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. दूसरा, मसीह के प्रति आज्ञाकारिता की कीमत के रूप में, दुःखभोग और क्षति का, पौलुस का अनुभव; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. तीसरा, इस सब में पौलुस का लक्ष्य, यथा, मसीह को प्राप्त करना: ‘उसे’ जानना और, और अधिक अंतरंगता व वास्तविकता के साथ ‘उस’ में व संगति में बने रहना, तुलना में उससे जो वह अपने सर्वोत्तम मित्रों, बरनबास और सीलास के साथ जानता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. दुःख उठाने के लिए पौलुस की तैयारी  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 5 व 6 में पौलुस उन विशेषकों को सूचीबद्ध करता है जिनका उपभोग वह मसीही बनने से पहले करता था। वह इब्राहीम की कुलीन सन्तान, इब्रानियों का इब्रानी के रूप में अपना जातीय वंशवृक्ष बताता है। ये उसके लिए बड़ा लाभ ले आया, महत्वपूर्ण होने की एक विशाल अनुभूति और भरोसा। वह एक इस्राएली था। फिर वह तीन चीजें बताता है जो, इससे पूर्व कि वह एक मसीही बना, पौलुस की जिन्दगी के ठीक मर्मस्थल को जाती हैं (पद 5 के अन्त में):- ‘‘व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस की मान्यताएं, इससे पूर्व कि उसकी भेंट मसीह से हुई''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पौलुस का जीवन था। ये वो था जिसने उसे अर्थ और महत्व दिया। ये उसकी उपलब्धि थी, उसका सौभाग्य, उसका आनन्द। विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सौभाग्य--और पौलुस का ये था कि वह व्यवस्था का पालन करनेवालों के उच्च-सोपानक, फ़रीसीगण, से आता था, और ये कि उनके बीच में वह इतना उत्साही था कि वह परमेश्वर के शत्रुओं, यीशु की कलीसिया, को सताने के मार्ग में अगुआ बना, और ये कि उसने अतिसतर्कता से व्यवस्था का पालन किया। उसे वंशगत-सम्बद्धता से सौभाग्य मिला, उसे श्रेष्ठ होने में सौभाग्य मिला, उसके द्वारा निर्दोष व्यवस्था-पालन में उसे परमेश्वर से सौभाग्य मिला--या उसने ऐसा सोचा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तब वह दमिश्क के मार्ग पर मसीह से, जीवते परमेश्वर के ‘पुत्र’ से, मिला। मसीह ने उसे बता दिया कि उसे कितना दुःख उठाना पड़ेगा (प्रेरित 9: 16)। और पौलुस ने स्वयँ को तैयार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस ने अपने पूर्व की मान्यताओं को हानि गिना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरीके से उसने स्वयँ को तैयार किया, पद 7 में वर्णित है। ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’ पौलुस, धर्मी समाज की अपनी उच्च-सोपानक स्थिति, फरीसी होने, को देखता है; वह इसके सभी सौभाग्यों और शाबासी के साथ उस समूह में सबसे उच्च स्थिति में होने के गौरव को देखता है; वह व्यवस्था-पालन में अपनी सख़्ती और उस नैतिक गर्व की अनुभूति को जिसका उसने आनन्द लिया, को देखता है; और वह, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, अपने पूरे संसार को लेकर इसे उलट देने के द्वारा, दुःख उठाने के लिए तैयारी करता है:- ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं (अर्थात् पद 5-6), उन्हीं को मैं ने हानि समझ लिया है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पूर्व कि वह मसीही बना, उसके पास एक बही-ख़ाता था जिसमें दो स्तम्भ/कॉलम थे: एक जो कहता था, लाभ या प्राप्तियाँ और दूसरा जो कहता था, हानियाँ। लाभ की ओर था, पद 5-6 का मानवीय गौरव। हानि की ओर थीं, भयंकर सम्भावनाएँ कि ये यीशु-क्रान्ति हाथ से निकल जाये और यीशु वास्तविक प्रमाणित होकर दिन जीत ले। जब वह दमिश्क के मार्ग पर जीवते मसीह से मिला, पौलुस ने एक बड़ी लाल पैन्सिल लिया और अपने लाभ के कॉलम के आर-पार बड़े लाल अक्षरों ‘‘'''हानि'''’’ लिख दिया। और उसने हानि के कॉलम पर बड़े अक्षरों में ‘‘'''लाभ'''’’ लिख दिया, जिसमें केवल एक नाम था: ‘मसीह’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और केवल यही नहीं, जितना अधिक पौलुस ने संसार में जीवन की तुलनात्मक मान्यताओं और मसीह की महानता के बारे में सोचा, वह पद 5-6 में व्यक्त की गई कुछ चीजों से आगे बढ़ गया और उस पहले कॉलम में मसीह को छोड़कर हर एक चीज को डाल दिया:- पद 8: ‘‘बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ उसने अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य उपलब्धियों को हानि गिनने से आरम्भ किया, और उसने मसीह को छोड़कर, हर एक चीज को हानि गिनने से अन्त किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सामान्य मसीहियत''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस के लिए, एक मसीही बनने का यही अर्थ था। और ऐसा न हो कि हम में से कोई यह सोचे कि वह अद्वितीय या विशिष्ट था, ध्यान दीजिये कि पद 17 में पूरे प्रेरिताई के अधिकार के साथ वह कहता है, ‘‘हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो।’’ ये है सामान्य मसीहियत। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पौलुस यहाँ कर रहा है वो ये कि यह दिखाना कि यीशु की शिक्षाओं को किस प्रकार जीना है। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया’’ (मत्ती 13: 44)। एक मसीही बनने का अर्थ है, ये खोजना कि मसीह (राजा), पवित्र आनन्द के ख़जाने की तिजोरी है और ‘उसे’ प्राप्त करने के लिए संसार की हर एक अन्य चीज के ऊपर ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। ‘‘उसने उस खेत को खरीदने के लिए, जो कुछ उसके पास था सब बेच दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, पुनः लूका 14: 33 में यीशु ने कहा, ‘‘तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु का चेला बनने का अर्थ है, अपनी सब सम्पत्ति--और हर उस चीज के ऊपर जो ये संसार प्रस्तुत करता है, बड़े लाल अक्षरों में ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यावहारिक रूप से इसका क्या अर्थ है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, इसका व्यावहारिक दृष्टि से क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ कि इसका अर्थ चार बातें हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. इसका अर्थ है कि जब कभी मुझे इस संसार की किसी भी चीज और मसीह में से चुनना पड़ता है, मैं मसीह को चुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. इसका अर्थ है कि मैं इस संसार की चीजों से इस प्रकार बर्ताव करूंगा जो मुझे मसीह के निकट ले जावे ताकि मैं मसीह को और भी प्राप्त करूं और जिस तरह से मैं संसार का उपयोग करता हूँ, उससे मैं और भी ‘उसमें’ आनन्दित हो सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. इसका अर्थ है कि मैं संसार की चीजों से सदैव इस तरह बर्ताव करूंगा जो ये प्रदर्शित करें कि वे मेरा धन नहीं हैं, अपितु ये प्रदर्शित करें कि मसीह मेरा धन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. इसका अर्थ है कि यदि मैं इस संसार की कोई या सभी चीजें खो दूं जो ये संसार प्रस्तुत करता है, मैं अपना आनन्द या अपने धन को या अपनी जिन्दगी को खो नहीं दूंगा, क्योंकि मसीह सब कुछ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये वो गणना है जिसे पौलुस ने अपने आत्मा में गिना पद 8: ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ मसीह सब-कुछ है और शेष सब हानि है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दुःख उठाने के लिए तैयार होने का ये एक तरीका क्यों है&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम एक मिनिट के लिए रुक जावें और अपनी स्थिति को पायें। मैं अब भी पहिले बिन्दु में ही चल रहा हूँ:-यथा, यह कि ये पौलुस का तरीका है दुःख उठाने के लिए तैयार होने का। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ&amp;amp;nbsp;? क्यों एक मसीही बनना, और मसीह के सिवाय अपने जीवन की हर चीज के ऊपर ‘‘हानि’’ लिख देना, दुःख उठाने के लिए तैयार होने का एक तरीका है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर ये है कि, दुःख उठाना, उन्हें दूर कर देने से अधिक, और कुछ नहीं है, जो संसार हमारे आनन्द के लिए हमें बुरी चीजें या अच्छी चीजें प्रस्तुत करता है--प्रतिष्ठा, समकक्ष लोगों के बीच सम्मान, नौकरी, पैसा, पति/पत्नी, यौन-जीवन, बच्चे, मित्रगण, स्वास्थ्य, ताकत, दृष्टि, श्रवण, सफलता इत्यादि। जब ये चीजें दूर कर दी जाती हैं (बल द्वारा या परिस्थिति द्वारा या चुनाव द्वारा), हम दुःख उठाते हैं। किन्तु यदि हमने पौलुस का और यीशु की शिक्षा का अनुसरण किया है और मसीह को प्राप्त करने के, समझ से परे मूल्य के कारण, उन्हें हानि समझ चुके हैं, तब हम दुःख उठाने के लिए तैयार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब आप एक मसीही बन जाते हैं, यदि आप मसीह को छोड़कर संसार की सभी चीजों के आर-पार एक बड़ा लाल ‘‘'''हानि'''’’ लिख देते हैं, तब जब मसीह आपको उन में से कुछ चीजों का परित्याग करने को बुलाता है, ये अजीब या अनपेक्षित नहीं है। दर्द और दुःख अत्याधिक हो सकता है। आँसू बहुत हो सकते हैं, जैसा वे गतसमनी में यीशु के लिए थे। लेकिन हम तैयार रहेंगे। हम जान जायेंगे कि मसीह का मूल्य उन सब चीजों से परे है जो संसार हमें दे सकता है और ये कि उन्हें खो देने में हम मसीह को और अधिक प्राप्त करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. दुःख उठाने का पौलुस का अनुभव  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, पद 8 के द्वितीय-अर्द्ध में पौलुस, दुःख उठाने के लिए तैयार होने से, वास्तविक दुःख उठाने की ओर बढ़ता है। वह पद 8 के प्रथम-अर्द्ध में सब चीजों को हानि गिनने से आगे बढ़कर, उस आयत के द्वितीय-अर्द्ध में सब वस्तुओं की वास्तव में हानि भोगने की ओर बढ़ता है। ‘‘ ... जिस {अर्थात् मसीह} के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ हम आगामी सप्ताह में इसे देखने जा रहे हैं:- पौलुस ने संसार के सामान्य लाभों और सुख-सुविधाओं की इतनी अधिक वास्तविक हानि का अनुभव कर लिया था कि वह कह सकता था कि वह वस्तुओं को हानि मात्र गिन नहीं रहा था ( वह हानि उठा रहा था। उसने अपनी मान्यताओं को उलटा कर देने के द्वारा तैयारी कर ली थी, और अब वह परखा जा रहा था। क्या उसने सब वस्तुओं के ऊपर मसीह का मूल्य आँका। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. दुःख उठाने में पौलुस का लक्ष्य (और परमेश्वर का उद्देश्य)  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, इस दुःख उठाने में पौलुस के लक्ष्य और परमेश्वर के उद्देश्य पर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के द्वारा मुझे समाप्त करने दीजिये। क्यों परमेश्वर ने ठहराया और पौलुस ने हानियों को स्वीकार किया कि इसका अर्थ उसके लिए एक मसीही होना था&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन आयतों में पौलुस बारम्बार उत्तर देता है ताकि हम बिन्दु को खो न सकें। इस हानि उठाने में वह निष्क्रिय नहीं है। वह सप्रयोजन/सोद्देश्य है। और उसका उद्देश्य मसीह को प्राप्त करना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 7: ‘‘उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8अः ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8बः ‘‘जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8सः ‘‘और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 9: ‘‘... और उस में पाया जाऊं {ताकि परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करूं, मेरी अपनी नहीं} ...’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10अः (सब वस्तुओं की हानि स्वीकार करने में अब भी अपने लक्ष्य को देते हुए) ‘‘ताकि मैं उसे ... जानूं’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10ब-11: (इसके बाद इसकी चार विशिष्टताएं देते हुए कि मसीह को जानने का क्या अर्थ है)’’'' &lt;br /&gt;
&amp;lt;blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
1. ‘‘उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को’’; और&amp;lt;br&amp;gt;2. ‘‘उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को’’;&amp;lt;br&amp;gt;3. ‘‘उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करना’’ {जानना};&amp;lt;br&amp;gt;4. ‘‘ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं।’’&lt;br /&gt;
&amp;lt;/blockquote&amp;gt;&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वो जो सब वस्तुओं की हानि उठाने में पौलुस को स्थिर रखता है, वो आत्मविश्वास है, कि संसार में बहुमूल्य चीजों की उसके द्वारा हानि उठाने में, वह कुछ अधिक बहुमूल्य को — मसीह को प्राप्त कर रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और दो बार उस प्राप्त करने को, जानना कहा गया है--पद 8अ:- ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण ... ।’’ पद 10:-‘‘ताकि मैं उसे … जानूं।’’ दुःख उठाने में ये अंतरंगता का कारक है। क्या हम ‘उसे’ जानना चाहते हैं&amp;amp;nbsp;? क्या हम ‘उसके’ साथ और अधिक व्यक्तिगत और ‘उसके’ साथ गहरा और ‘उसके’ साथ वास्तविक और ‘उसके’ साथ अंतरंग होना चाहते हैं — यहाँ तक कि हम, इस सभी धनों में महानतम् को प्राप्त करने के लिए, हर चीज को हानि गिनें&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम चाहते हैं, हम दुःख उठाने के लिए तैयार रहेंगे। यदि हम नहीं चाहते, ये हमें अचम्भे में डाल देगा और हम विद्रोह करेंगे। मसीह को जानने के, समझ से परे मूल्य के प्रति, प्रभु हमारी आँखों को खोले&amp;amp;nbsp;!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>दुःख उठाने और आनन्दित होने के लिए बुलाये गए: ताकि हम मसीह को प्राप्त करें</title>
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				<updated>2015-11-13T22:12:36Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Called to Suffer and Rejoice: That We Might Gain Christ}}   &amp;amp;gt; निदान, हे मेरे भाइयो, प्रभु में आनन्दि...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Called to Suffer and Rejoice: That We Might Gain Christ}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; निदान, हे मेरे भाइयो, प्रभु में आनन्दित रहो। वे ही बातें तुम को बार बार लिखने में मुझे तो कुछ कष्ट नहीं होता, और इस में तुम्हारी कुशलता है। कुत्तों से चैकस रहो, उन बुरे काम करनेवालों से चैकस रहो, उन काट कूट करनेवालों से चैकस रहो; क्योंकि खतनावाले तो हम ही हैं जो परमेश्वर के आत्मा की अगुआई से उपासना करते हैं, और मसीह यीशु पर घमण्ड करते हैं, और शरीर पर भरोसा नहीं रखते, पर मैं तो शरीर पर भी भरोसा रख सकता हूं। यदि किसी और को शरीर पर भरोसा रखने का विचार हो, तो मैं उस से भी बढ़कर रख सकता हूं। आठवें दिन मेरा खतना हुआ, इस्राएल के वंश, और बिन्यामीन के गोत्र का हूं; इब्रानियों को इब्रानी हूं; व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था। परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है। बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तामता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं: जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं। और उस में पाया जाऊं; न कि अपनी उस धार्मिकता के साथ, जो व्यवस्था से है, बरन उस धार्मिकता के साथ जो मसीह पर विश्वास करने के कारण है, और परमेश्वर की ओर से विश्वास करने पर मिलती है। और मैं उसको और उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को, और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जानूं, और उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करूं। ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं। यह मतलब नहीं, कि मैं पा चुका हूं, या सिद्ध हो चुका हूं: पर उस पदार्थ को पकड़ने के लिये दौड़ा चला जाता हूं, जिस के लिये मसीह यीशु ने मुझे पकड़ा था। हे भाइयो, मेरी भावना यह नहीं कि मैं पकड़ चुका हूं: परन्तु केवल यह एक काम करता हूं, कि जो बातें पीछे रह गई हैं उन को भूल कर, आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, निशाने की ओर दौड़ा चला जाता हूं, ताकि वह इनाम पाऊं, जिस के लिये परमेश्वर ने मुझे मसीह यीशु में ऊपर बुलाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== बाइबल, परमेश्वर के लोगों के लिए दुःखभोग की प्रतिज्ञा करती है  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस सप्ताहों में, हम दुःख उठाने के लिए तैयार होने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इसका कारण मात्र मेरा ये बोध नहीं है कि दिन बुरे हैं और धार्मिकता का मार्ग कीमती है, अपितु बाइबल की प्रतिज्ञा है कि परमेश्वर के लोग दुःख उठायेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, प्रेरित 14: 22 कहता है कि पौलुस ने अपनी सभी नौजवान कलीसियाओं से कहा, ‘‘हमें बड़े क्लेश उठाकर परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना होगा।’’ और यीशु ने कहा, ‘‘यदि उन्हों ने मुझे सताया, तो तुम्हें भी सताएंगे’’ (यूहन्ना 15: 20)। और पतरस ने कहा, ‘‘जो दुख रूपी अग्नि तुम्हारे परखने के लिए तुम में भड़की है, इस से यह समझकर अचम्भा न करो कि कोई अनोखी बात तुम पर बीत रही है’’ (1 पतरस 4: 12)। दूसरे शब्दों में, ये अचम्भे की बात नहीं है; इसकी उम्मीद की जाना चाहिए। और पौलुस ने (2 तीमुथियुस 3: 12 में) कहा, ‘‘पर जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएंगे।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः मैं इसे एक बाइबल-शास्त्रीय एक सच्चाई लेता हूं कि जितना अधिक हम पृथ्वी का नमक और जगत की ज्योति होने के लिए, और संसार के सुसमाचार न पाये लोगों तक पहुंचने, और अन्धकार के कामों को उजागर करने, और पाप व शैतान के बन्धनों को खोलने में, ईमानदार होते हैं, उतना ही अधिक हम दुःख उठायेंगे। इसी कारण हमें तैयारी करना चाहिए। और इसी कारण इन सप्ताहों में, मैं उन मूल- पाठों से उपदेश दे रहा हूँ जो हमें तैयार होने में सहायता करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये संदेश, परमेश्वर की सेवा में हमारे दुःख उठाने में, ‘उसके’ चार उद्देश्यों के बारे में हैं। एक है, नैतिक या आत्मिक उद्देश्य:- दुःख उठाने में हम परमेश्वर में अधिक पूर्णतया आशा रखने लगते हैं और संसार की चीजों में कम भरोसा रखते हैं। दूसरा, सामीप्य का उद्देश्य है:- जब हम मसीह के दुःखों में सहभागी होते हैं, हम ‘उसे’ बेहतर जानने लगते हैं। आज हमारे ध्यान का केन्द्र यही है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीह के साथ अधिक अंतरंगता&amp;amp;nbsp;;या निकटताद्ध का उद्देश्य  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमें सिखाने और ये दिखाने के द्वारा परमेश्वर हमें दुःख उठाने के लिए तैयार होने में सहायता करता है कि दुःखभोग के द्वारा हमें मसीह के साथ और गहरे सम्बन्ध में जाने का अभिप्राय है। आप ‘उसे’ और बेहतर जान पाते हैं जब आप ‘उसके’ दर्द को बाँटते हैं। वे लोग जो मसीह की बहुमूल्यता के बारे में अधिक गहराई और मिठास के साथ लिखते हैं, वे लोग हैं जिन्होंने ‘उसके’ साथ गहराई से दुःख उठाया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''जैरी ब्रिजे़स के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उदाहरण के लिए, जैरी ब्रिजे़स की पुस्तक, ट्रस्टिंग गॉड, इवन वैन लाइफ़ हर्टस्, दुःख उठाने के बारे में तथा क्लेशों के द्वारा परमेश्वर के निकट हो जाने के बारे में, एक गहरी व सहायक पुस्तक है। और इसलिए ये जानकर कोई अचरज नहीं है कि जब वह 14 साल का था, उसने दूसरे कमरे से अपनी माँ द्वारा पुकारा जाना सुना, सर्वथा अनपेक्षित, और पहुँचा तो उसे अन्तिम श्वास लेते देखा। उसकी शारीरिक दशा भी ऐसी थी जिसने उसे सामान्य खेलकूद से वंचित रखा। और मात्र कुछ ही वर्ष पूर्व उसकी पत्नी कैंसर से मर गई। जहाज-चालकों के साथ परमेश्वर की सेवा करने ने उसको दर्द से नहीं बचाया। वह दुःखभोग के बारे में गहराई से लिखता है क्योंकि वह मसीह के साथ दुःखों में गहराई से गया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''होरेशियस़ बोनार के जीवन में दुःखभोग''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक सौ वर्ष से भी पूर्व होरेशियस़ बोनार, स्काटलैन्ड निवासी पास्टर और भक्ति-गीत लेखक, ने एक छोटी पुस्तक लिखी जो नाइट ऑफ वीपिंग, अथवा, ‘‘वैन गॉड्स चिल्डरेन सफ़र’’ कहलाती है। इस में उसने कहा कि उसका लक्ष्य था, ‘‘सन्तों की सेवकाई करना … उनके बोझों को उठाने की खोज में रहना, उनके घावों को बाँधना, और उनके बहुत से आँसुओं में से कम से कम कुछ को सुखाना।’’ यह एक कोमल और गहरी और बुद्धिमत्तापूर्ण पुस्तक है। अतः उसे ऐसा कहते हुए सुनना अचम्भे की बात नहीं है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; ''ये एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा लिखी गई है जो स्वयँ ही परखों के द्वारा लाभ उठाने की खोज में है, और काँपता है, कि ऐसा न हो कि यह चट्टान के ऊपर से हवा के समान, उसे सदा की तरह कठोर छोड़ते हुए, गुजर जाये; उस एक के द्वारा जो हर एक व्यथा में परमेश्वर के निकट हो जायेगा ताकि वह ‘उसे’ और भी जाने, और जो यह अंगीकार करने के लिए अनच्छिुक नहीं है कि फिर भी वह जितना जानता है, थोड़ा ही जानता है।'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रिजे़स और बोनार, हमें दिखाते हैं कि दुःखभोग, परमेश्वर के हृदय में गहरे उतर जाने का मार्ग है। परमेश्वर के पास उसके दुःख उठाते हुए बच्चों के लिए ‘उसकी’ महिमा के विशेष प्रकाशन हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''अय्यूब, स्तिफनुस, और पतरस के वचन''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
महीनों तक दुःखभोग के बाद, अय्यूब अन्ततः परमेश्वर से कहता है, ‘‘मैं ने कानों से तेरा समाचार सुना था, परन्तु अब मेरी आंखें तुझे देखती हैं’’ (अय्यूब 42: 5)। अय्यूब एक भक्त और खरा मनुष्य था, परमेश्वर के मन को भाने वाला, किन्तु जो वह परमेश्वर के बारे में समृद्धि में जानता था, और जो वह ‘उसे’ संकट के द्वारा जान गया, उनके बीच अन्तर, ‘उसके’ के बारे में सुनना और देखने का अन्तर था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब स्तिुफनुस को बन्दी बनाया गया और उसे उसके विश्वास के लिए परखा गया और उसे उपदेश देने का एक अवसर दिया गया, परिणाम ये हुआ कि अगुवे क्रोधित हुए और उस पर अपने दाँतों को पीसा। वे उसे घसीट कर नगर से बाहर ले जाने और मार डालने वाले ही थे। ठीक उसी क्षण, लूका हमें बताता है, ‘‘उस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर स्वर्ग की ओर देखा और परमेश्वर की महिमा को और यीशु को परमेश्वर की दाहिने ओर खड़ा देखा’’ (प्रेरित 7: 55)। वहाँ एक विशेष प्रकाशन है, एक विशिष्ट निकटता, जो उनके लिए तैयार की गई है जो मसीह के साथ दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पतरस इसे इस तरह प्रस्तुत करता है, ‘‘यदि मसीह के नाम के लिये तुम्हारी निन्दा की जाती है, तो धन्य हो; क्योंकि महिमा का आत्मा, जो परमेश्वर का आत्मा है, तुम पर छाया करता है’’ (1पतरस 4: 14)। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने बच्चों के ऊपर, ‘उसके’ ‘आत्मा’ और ‘उसकी’ महिमा का एक विशिष्ट आगमन और ठहरना सुरक्षित रखता है, जो ‘उसके’ नाम के लिए दुःख उठाते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मूल-पाठ से तीन प्रेक्षण  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः आज के संदेश का मुख्य केन्द्र, दुःखभोग में इस निकटता या अंतरंगता के कारक पर है। सन्तों के दुःख उठाने के उद्देश्यों में से एक ये है कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता, कम औपचारिक व कम बनावटी व कम दूरी का बन जावे और अधिक व्यक्तिगत व अधिक वास्तविक व अधिक अंतरंग व निकट व गहरा हो जावे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारे मूल-पाठ (फिलिप्पयों 3: 5-11) में, मैं कम से कम तीन चीजें देखना चाहता हूँ: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. पहिला, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, पौलुस की दुःख उठाने की तैयारी; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. दूसरा, मसीह के प्रति आज्ञाकारिता की कीमत के रूप में, दुःखभोग और क्षति का, पौलुस का अनुभव; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. तीसरा, इस सब में पौलुस का लक्ष्य, यथा, मसीह को प्राप्त करना: ‘उसे’ जानना और, और अधिक अंतरंगता व वास्तविकता के साथ ‘उस’ में व संगति में बने रहना, तुलना में उससे जो वह अपने सर्वोत्तम मित्रों, बरनबास और सीलास के साथ जानता था। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. दुःख उठाने के लिए पौलुस की तैयारी  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पद 5 व 6 में पौलुस उन विशेषकों को सूचीबद्ध करता है जिनका उपभोग वह मसीही बनने से पहले करता था। वह इब्राहीम की कुलीन सन्तान, इब्रानियों का इब्रानी के रूप में अपना जातीय वंशवृक्ष बताता है। ये उसके लिए बड़ा लाभ ले आया, महत्वपूर्ण होने की एक विशाल अनुभूति और भरोसा। वह एक इस्राएली था। फिर वह तीन चीजें बताता है जो, इससे पूर्व कि वह एक मसीही बना, पौलुस की जिन्दगी के ठीक मर्मस्थल को जाती हैं (पद 5 के अन्त में):- ‘‘व्यवस्था के विषय में यदि कहो तो फरीसी हूं। उत्साह के विषय में यदि कहो तो कलीसिया का सतानेवाला; और व्यवस्था की धार्मिकता के विषय में यदि कहो तो निर्दोष था।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस की मान्यताएं, इससे पूर्व कि उसकी भेंट मसीह से हुई''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये पौलुस का जीवन था। ये वो था जिसने उसे अर्थ और महत्व दिया। ये उसकी उपलब्धि थी, उसका सौभाग्य, उसका आनन्द। विभिन्न समूहों के लिए विभिन्न सौभाग्य--और पौलुस का ये था कि वह व्यवस्था का पालन करनेवालों के उच्च-सोपानक, फ़रीसीगण, से आता था, और ये कि उनके बीच में वह इतना उत्साही था कि वह परमेश्वर के शत्रुओं, यीशु की कलीसिया, को सताने के मार्ग में अगुआ बना, और ये कि उसने अतिसतर्कता से व्यवस्था का पालन किया। उसे वंशगत-सम्बद्धता से सौभाग्य मिला, उसे श्रेष्ठ होने में सौभाग्य मिला, उसके द्वारा निर्दोष व्यवस्था-पालन में उसे परमेश्वर से सौभाग्य मिला--या उसने ऐसा सोचा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और तब वह दमिश्क के मार्ग पर मसीह से, जीवते परमेश्वर के ‘पुत्र’ से, मिला। मसीह ने उसे बता दिया कि उसे कितना दुःख उठाना पड़ेगा (प्रेरित 9: 16)। और पौलुस ने स्वयँ को तैयार कर लिया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''पौलुस ने अपने पूर्व की मान्यताओं को हानि गिना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरीके से उसने स्वयँ को तैयार किया, पद 7 में वर्णित है। ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं, उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’ पौलुस, धर्मी समाज की अपनी उच्च-सोपानक स्थिति, फरीसी होने, को देखता है; वह इसके सभी सौभाग्यों और शाबासी के साथ उस समूह में सबसे उच्च स्थिति में होने के गौरव को देखता है; वह व्यवस्था-पालन में अपनी सख़्ती और उस नैतिक गर्व की अनुभूति को जिसका उसने आनन्द लिया, को देखता है; और वह, अपनी मान्यताओं को उलट देने के द्वारा, अपने पूरे संसार को लेकर इसे उलट देने के द्वारा, दुःख उठाने के लिए तैयारी करता है:- ‘‘परन्तु जो बातें मेरे लाभ की थीं (अर्थात् पद 5-6), उन्हीं को मैं ने हानि समझ लिया है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इससे पूर्व कि वह मसीही बना, उसके पास एक बही-ख़ाता था जिसमें दो स्तम्भ/कॉलम थे: एक जो कहता था, लाभ या प्राप्तियाँ और दूसरा जो कहता था, हानियाँ। लाभ की ओर था, पद 5-6 का मानवीय गौरव। हानि की ओर थीं, भयंकर सम्भावनाएँ कि ये यीशु-क्रान्ति हाथ से निकल जाये और यीशु वास्तविक प्रमाणित होकर दिन जीत ले। जब वह दमिश्क के मार्ग पर जीवते मसीह से मिला, पौलुस ने एक बड़ी लाल पैन्सिल लिया और अपने लाभ के कॉलम के आर-पार बड़े लाल अक्षरों ‘‘'''हानि'''’’ लिख दिया। और उसने हानि के कॉलम पर बड़े अक्षरों में ‘‘'''लाभ'''’’ लिख दिया, जिसमें केवल एक नाम था: ‘मसीह’। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और केवल यही नहीं, जितना अधिक पौलुस ने संसार में जीवन की तुलनात्मक मान्यताओं और मसीह की महानता के बारे में सोचा, वह पद 5-6 में व्यक्त की गई कुछ चीजों से आगे बढ़ गया और उस पहले कॉलम में मसीह को छोड़कर हर एक चीज को डाल दिया:- पद 8: ‘‘बरन मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ उसने अपनी सर्वाधिक बहुमूल्य उपलब्धियों को हानि गिनने से आरम्भ किया, और उसने मसीह को छोड़कर, हर एक चीज को हानि गिनने से अन्त किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''सामान्य मसीहियत''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पौलुस के लिए, एक मसीही बनने का यही अर्थ था। और ऐसा न हो कि हम में से कोई यह सोचे कि वह अद्वितीय या विशिष्ट था, ध्यान दीजिये कि पद 17 में पूरे प्रेरिताई के अधिकार के साथ वह कहता है, ‘‘हे भाइयो, तुम सब मिलकर मेरी सी चाल चलो।’’ ये है सामान्य मसीहियत। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो पौलुस यहाँ कर रहा है वो ये कि यह दिखाना कि यीशु की शिक्षाओं को किस प्रकार जीना है। उदाहरण के लिए, यीशु ने कहा, ‘‘स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया’’ (मत्ती 13: 44)। एक मसीही बनने का अर्थ है, ये खोजना कि मसीह (राजा), पवित्र आनन्द के ख़जाने की तिजोरी है और ‘उसे’ प्राप्त करने के लिए संसार की हर एक अन्य चीज के ऊपर ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। ‘‘उसने उस खेत को खरीदने के लिए, जो कुछ उसके पास था सब बेच दिया।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा, पुनः लूका 14: 33 में यीशु ने कहा, ‘‘तुम में से जो कोई अपना सब कुछ त्याग न दे, वह मेरा चेला नहीं हो सकता।’’ दूसरे शब्दों में, यीशु का चेला बनने का अर्थ है, अपनी सब सम्पत्ति--और हर उस चीज के ऊपर जो ये संसार प्रस्तुत करता है, बड़े लाल अक्षरों में ‘‘'''हानि'''’’ लिखना। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''व्यावहारिक रूप से इसका क्या अर्थ है''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, इसका व्यावहारिक दृष्टि से क्या अर्थ है&amp;amp;nbsp;? मैं सोचता हूँ कि इसका अर्थ चार बातें हैं: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. इसका अर्थ है कि जब कभी मुझे इस संसार की किसी भी चीज और मसीह में से चुनना पड़ता है, मैं मसीह को चुनता हूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. इसका अर्थ है कि मैं इस संसार की चीजों से इस प्रकार बर्ताव करूंगा जो मुझे मसीह के निकट ले जावे ताकि मैं मसीह को और भी प्राप्त करूं और जिस तरह से मैं संसार का उपयोग करता हूँ, उससे मैं और भी ‘उसमें’ आनन्दित हो सकूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. इसका अर्थ है कि मैं संसार की चीजों से सदैव इस तरह बर्ताव करूंगा जो ये प्रदर्शित करें कि वे मेरा धन नहीं हैं, अपितु ये प्रदर्शित करें कि मसीह मेरा धन है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
4. इसका अर्थ है कि यदि मैं इस संसार की कोई या सभी चीजें खो दूं जो ये संसार प्रस्तुत करता है, मैं अपना आनन्द या अपने धन को या अपनी जिन्दगी को खो नहीं दूंगा, क्योंकि मसीह सब कुछ है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये वो गणना है जिसे पौलुस ने अपने आत्मा में गिना पद 8: ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ मसीह सब-कुछ है और शेष सब हानि है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''दुःख उठाने के लिए तैयार होने का ये एक तरीका क्यों है&amp;amp;nbsp;?''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम एक मिनिट के लिए रुक जावें और अपनी स्थिति को पायें। मैं अब भी पहिले बिन्दु में ही चल रहा हूँ:-यथा, यह कि ये पौलुस का तरीका है दुःख उठाने के लिए तैयार होने का। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ&amp;amp;nbsp;? क्यों एक मसीही बनना, और मसीह के सिवाय अपने जीवन की हर चीज के ऊपर ‘‘हानि’’ लिख देना, दुःख उठाने के लिए तैयार होने का एक तरीका है&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्तर ये है कि, दुःख उठाना, उन्हें दूर कर देने से अधिक, और कुछ नहीं है, जो संसार हमारे आनन्द के लिए हमें बुरी चीजें या अच्छी चीजें प्रस्तुत करता है--प्रतिष्ठा, समकक्ष लोगों के बीच सम्मान, नौकरी, पैसा, पति/पत्नी, यौन-जीवन, बच्चे, मित्रगण, स्वास्थ्य, ताकत, दृष्टि, श्रवण, सफलता इत्यादि। जब ये चीजें दूर कर दी जाती हैं (बल द्वारा या परिस्थिति द्वारा या चुनाव द्वारा), हम दुःख उठाते हैं। किन्तु यदि हमने पौलुस का और यीशु की शिक्षा का अनुसरण किया है और मसीह को प्राप्त करने के, समझ से परे मूल्य के कारण, उन्हें हानि समझ चुके हैं, तब हम दुःख उठाने के लिए तैयार हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब आप एक मसीही बन जाते हैं, यदि आप मसीह को छोड़कर संसार की सभी चीजों के आर-पार एक बड़ा लाल ‘‘'''हानि'''’’ लिख देते हैं, तब जब मसीह आपको उन में से कुछ चीजों का परित्याग करने को बुलाता है, ये अजीब या अनपेक्षित नहीं है। दर्द और दुःख अत्याधिक हो सकता है। आँसू बहुत हो सकते हैं, जैसा वे गतसमनी में यीशु के लिए थे। लेकिन हम तैयार रहेंगे। हम जान जायेंगे कि मसीह का मूल्य उन सब चीजों से परे है जो संसार हमें दे सकता है और ये कि उन्हें खो देने में हम मसीह को और अधिक प्राप्त करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. दुःख उठाने का पौलुस का अनुभव  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, पद 8 के द्वितीय-अर्द्ध में पौलुस, दुःख उठाने के लिए तैयार होने से, वास्तविक दुःख उठाने की ओर बढ़ता है। वह पद 8 के प्रथम-अर्द्ध में सब चीजों को हानि गिनने से आगे बढ़कर, उस आयत के द्वितीय-अर्द्ध में सब वस्तुओं की वास्तव में हानि भोगने की ओर बढ़ता है। ‘‘ ... जिस {अर्थात् मसीह} के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई, और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ हम आगामी सप्ताह में इसे देखने जा रहे हैं:- पौलुस ने संसार के सामान्य लाभों और सुख-सुविधाओं की इतनी अधिक वास्तविक हानि का अनुभव कर लिया था कि वह कह सकता था कि वह वस्तुओं को हानि मात्र गिन नहीं रहा था ( वह हानि उठा रहा था। उसने अपनी मान्यताओं को उलटा कर देने के द्वारा तैयारी कर ली थी, और अब वह परखा जा रहा था। क्या उसने सब वस्तुओं के ऊपर मसीह का मूल्य आँका। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. दुःख उठाने में पौलुस का लक्ष्य (और परमेश्वर का उद्देश्य)  ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, इस दुःख उठाने में पौलुस के लक्ष्य और परमेश्वर के उद्देश्य पर हमारा ध्यान आकृष्ट करने के द्वारा मुझे समाप्त करने दीजिये। क्यों परमेश्वर ने ठहराया और पौलुस ने हानियों को स्वीकार किया कि इसका अर्थ उसके लिए एक मसीही होना था&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन आयतों में पौलुस बारम्बार उत्तर देता है ताकि हम बिन्दु को खो न सकें। इस हानि उठाने में वह निष्क्रिय नहीं है। वह सप्रयोजन/सोद्देश्य है। और उसका उद्देश्य मसीह को प्राप्त करना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 7: ‘‘उन्हीं को मैं ने मसीह के कारण हानि समझ लिया है।’’'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8अः ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8बः ‘‘जिस के कारण मैं ने सब वस्तुओं की हानि उठाई।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 8सः ‘‘और उन्हें कूड़ा समझता हूं, जिस से मैं मसीह को प्राप्त करूं।’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 9: ‘‘... और उस में पाया जाऊं {ताकि परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करूं, मेरी अपनी नहीं} ...’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10अः (सब वस्तुओं की हानि स्वीकार करने में अब भी अपने लक्ष्य को देते हुए) ‘‘ताकि मैं उसे ... जानूं’’ '' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
''पद 10ब-11: (इसके बाद इसकी चार विशिष्टताएं देते हुए कि मसीह को जानने का क्या अर्थ है)’’'' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; 1. ‘‘उसके मृत्युन्जय की सामर्थ को’’; और&amp;lt;br&amp;gt; &amp;amp;gt; 2. ‘‘उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को’’;&amp;lt;br&amp;gt; &amp;amp;gt; 3. ‘‘उस की मृत्यु की समानता को प्राप्त करना’’ {जानना};&amp;lt;br&amp;gt; &amp;amp;gt; 4. ‘‘ताकि मैं किसी भी रीति से मरे हुओं में से जी उठने के पद तक पहुंचूं।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, वो जो सब वस्तुओं की हानि उठाने में पौलुस को स्थिर रखता है, वो आत्मविश्वास है, कि संसार में बहुमूल्य चीजों की उसके द्वारा हानि उठाने में, वह कुछ अधिक बहुमूल्य को — मसीह को प्राप्त कर रहा है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और दो बार उस प्राप्त करने को, जानना कहा गया है--पद 8अ:- ‘‘मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहिचान की उत्तमता के कारण ... ।’’ पद 10:-‘‘ताकि मैं उसे … जानूं।’’ दुःख उठाने में ये अंतरंगता का कारक है। क्या हम ‘उसे’ जानना चाहते हैं&amp;amp;nbsp;? क्या हम ‘उसके’ साथ और अधिक व्यक्तिगत और ‘उसके’ साथ गहरा और ‘उसके’ साथ वास्तविक और ‘उसके’ साथ अंतरंग होना चाहते हैं — यहाँ तक कि हम, इस सभी धनों में महानतम् को प्राप्त करने के लिए, हर चीज को हानि गिनें&amp;amp;nbsp;? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि हम चाहते हैं, हम दुःख उठाने के लिए तैयार रहेंगे। यदि हम नहीं चाहते, ये हमें अचम्भे में डाल देगा और हम विद्रोह करेंगे। मसीह को जानने के, समझ से परे मूल्य के प्रति, प्रभु हमारी आँखों को खोले&amp;amp;nbsp;!&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<id>http://hi.gospeltranslations.org/wiki/%E0%A4%A8%E0%A4%B0_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%87_%E2%80%98%E0%A4%89%E0%A4%B8%E2%80%99_%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%AA_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%85%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B0_%E0%A4%89%E0%A4%A8%E0%A4%95%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A5%80</id>
		<title>नर और नारी करके ‘उस’ ने परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार उनकी सृष्टि की</title>
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				<updated>2015-10-27T19:32:02Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;नर और नारी करके ‘उस’ ने परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार उनकी सृष्टि की&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Male and Female He Created Them in the Image of God}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फिर परमेश्वर ने कहा, ‘‘हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।’’ तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्यों की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उनको आशीष दी: और उन से कहा, ‘‘फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः मैं आपके साथ इस मूल-पाठ में सिखायी गई तीन चीजों के बारे में सोचना चाहता हूँ। एक ये है कि परमेश्वर ने मानव जीवधारियों की सृष्टि की। दूसरी ये है कि परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप के अनुसार सृजा। तीसरी ये है कि परमेश्वर ने हमें नर और नारी करके सृजा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सम्भव है कि इन तीन सच्चाईयों पर विश्वास किया जावे और एक मसीही न रहा जावे। जो भी हो, वे सब ठीक वहाँ यहूदी धर्म-ग्रन्थ में सिखाये जाते हैं। इसलिए धर्मग्रन्थ-विश्वासी एक अच्छा यहूदी, इन सच्चाईयों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन यद्यपि आप इन तीन सच्चाईयों में विश्वास कर सकते हैं और फिर भी मसीही नहीं हो सकते, ये सभी ख्रीस्तीयता (ईसाइयत) की ओर संकेत करते हैं। वे सभी उस पूर्णता की मांग करते हैं जो काम और मसीह के साथ आती है। वो ही है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ, विशेषकर तीसरे सच के लगाव में — कि हम परमेश्वर के स्वरूप में नर और नारी करके सृजे गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. परमेश्वर ने मानव जीवधारियों की सृष्टि की ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम प्रथम सत्य को लें: कि मानव जीवधारी परमेश्वर द्वारा सृजे गए हैं। मैं सोचता हूँ कि ये एक स्पष्टीकरण की मांग करता है। ‘उस’ ने हमें क्यों सृजा? जब आप कुछ बनाते हैं, आपके पास इसे बनाने का एक कारण होता है। परन्तु संसार, जैसा कि हम इसे जानते हैं, उस प्रश्न का यथोचित उत्तर दे सकता है? पुराना नियम, मनुष्य द्वारा संसार को अपने अधिकार में लाने की बात करता है। ये परमेश्वर की महिमा को प्रदर्शित करने के लिए सृजे जाने की बात करता है (यशायाह 43:7)। ये प्रभु की महिमा के ज्ञान से पृथ्वी के भर जाने की बात करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन हम क्या देखते हैं? हम एक संसार को देखते हैं जो सृष्टिकर्ता के विरुद्ध बग़ावत में है। हम यहूदी धर्मग्रन्थ को देखते हैं जो सृष्टि की कहानी के साथ नितान्त अपूर्ण एक अन्त पर आती है और महिमा की आशा अब भी आने को है। अतः मात्र विश्वास करना कि परमेश्वर ने मानव जीवधारियों को सृजा था, उस तरह जैसा कि यहूदी धर्मग्रन्थ सिखाते हैं, कि ‘उसने’ सृजा, शेष कहानी बतायी जाने की मांग करता है, यथा, ख्रीस्तीयता या मसीहियत। केवल मसीह में ही सृष्टि का उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में सृजा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा उदाहरण के लिए दूसरे सच को लीजिये: परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में सृजा। निश्चित ही इसका कुछ सम्बन्ध इसके साथ होना चाहिए कि हम यहाँ क्यों हैं। हमें बनाने में ‘उसके’ उद्देश्य का अवश्य ही इस तथ्य के साथ कुछ अद्भुत संबंध होना चाहिए कि हम मेंढक या छिपकलियाँ या पक्षी या यहाँ तक कि बंदर नहीं हैं। हम परमेश्वर के स्वरूप में मानव जीवधारी हैं, केवल हम और कोई अन्य जन्तु नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन इस विस्मयकारी गरिमा को हमने कितना गंदा कर दिया है। क्या हम परमेश्वर के समान हैं? खैर, हाँ और नहीं। हाँ हम परमेश्वर के समान हैं, यहाँ तक कि पापमय और अविश्वासी होने पर भी एक समानता है। हम इसे जानते हैं क्योंकि उत्पत्ति 9:6 में, परमेश्वर ने नूह से कहा, ‘‘जो कोई मनुष्य का लोहू बहाएगा उसका लोहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।’’ दूसरे शब्दों में, एक ऐसे संसार में भी जहाँ पाप का प्रभुत्व है (हत्या जैसे पापों के साथ), मानव जीवधारी अब भी परमेश्वर के स्वरूप में हैं। वे चूहों और मच्छरों के समान मारे नहीं जा सकते। आप अपना जीवन खो देते हैं यदि आप एक मानव जीवधारी की हत्या करते हैं। (देखिये याकूब 3:9)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु क्या हम वो स्वरूप हैं जिसमें होने के लिए परमेश्वर ने हमें बनाया है? क्या ये स्वरूप इतना बिगड़ नहीं गया है कि लगभग पहिचाने जाने से परे है? क्या आप महसूस करते हैं कि आप उस तरह से परमेश्वर के समान हैं जैसा कि आपको होना चाहिए? अतः यहाँ पुनः ये विश्वास कि हम परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, एक पूर्ति की मांग करता है—इस मामले में एक छुटकारा, एक रूपान्तरण, एक प्रकार का पुनः- सृजन। और ठीक यही है जो ख्रीस्तीयता लाती है। ‘‘क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर का दान है — और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजे गए … नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया है (इफिसियों 2:8-10; 4:24)। परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में सृजा, किन्तु हमने इसे लगभग न पहिचाने जा सकने की दशा तक बिगाड़ दिया और यीशु इसका उत्तर है। ‘वह’ विश्वास के द्वारा आता है, ‘वह’ क्षमा करता है, ‘वह’ शुद्ध करता है, और ‘वह’ एक सुधार-परियोजना आरम्भ करता है जो पवित्रीकरण कहलाती है और ये उस महिमा में समाप्त होगी जो परमेश्वर ने मानव जीवधारियों के लिए सर्वप्रथम स्थान में ठान रखा था। इसलिए चूंकि हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, हमारे पाप और विकृति एक उत्तर की मांग करते हैं। और यीशु वो उत्तर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. परमेश्वर ने हमें नर व नारी करके सृजा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन आयतों में तीसरा सच ये है कि परमेश्वर ने हमें नर व नारी सृजा। और ये भी ख्रीस्तीयता की ओर संकेत करता है और मसीह की पूर्ति की मांग करता है। कैसे? कम से कम दो तरह से। एक, विवाह के भेद से आता है। दूसरा, पाप में नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता से आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विवाह का भेद''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाह के भेद को लीजिये। उत्पत्ति 2: 24 में ठीक इस विवरण के बाद कि स्त्री कैसे सृजी गई, मूसा (उत्पत्ति का लेखक) कहता है, ‘‘इस कारण पुरुष अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे।’’ अब जब प्रेरित पौलुस इस आयत को इफिसियों 5:32 में उद्धृत करता है, वह कहता है, ‘‘यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।’’ और, इसके साथ उसके सुराग़ के रूप में, वह विवाह के अर्थ को खोलता है: ये कलीसिया के लिए मसीह के प्रेम का एक प्रतीक है जो, अपनी पत्नी के प्रति पति की प्रेममय प्रधानता में, प्रदर्शित होता है; और ये कलीसिया का मसीह के प्रति सहर्ष आधीनता का प्रतीक है जो, पति के प्रति पत्नी के सम्बन्ध में, प्रदर्शित होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह उत्पत्ति 2: 24 को एक ‘‘भेद’’ कहता है क्योंकि परमेश्वर ने उत्पत्ति में नर और नारी के विवाह के लिए अपने सभी अभिप्रायों को स्पष्टता से प्रगट नहीं किया। पुराना नियम में संकेत और सूचक थे कि विवाह, परमेश्वर और ‘उसके’ लोगों के सम्बन्ध के जैसा था। लेकिन केवल जब मसीह आया तब ही विवाह के भेद का विस्तार में हिज्जे हुआ। यह मसीह का ‘उसके’ लोगों के साथ वाचा के एक चित्र के अर्थ में है, कलीसिया के प्रति ‘उसकी’ वचनबद्धता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, क्या आप देखते हैं, कैसे परमेश्वर द्वारा मनुष्य को नर व नारी करके सृष्टि करना और फिर विवाह को एक ऐसे सम्बन्ध के रूप में विधान करना जिसमें एक नर, माता पिता को छोड़ता है और वाचा वचनबद्धता में अपनी पत्नी से मिल जाता है — कैसे सृष्टि करने का यह कार्य और विवाह का ये विधान, मसीह और ‘उसकी’ कलीसिया के प्रकाषन की मांग करते हैं। वे उस भेद के प्रकाशन के रूप में ख्रीस्तीयता की मांग करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधिकांश लोगों के लिए ये एक बहुत असंगत विचार है, यहाँ तक कि अधिकांश मसीहीगण के लिए भी, क्योंकि विवाह एक सांसारिक प्रथा है, साथ ही एक मसीही विवाह भी। आप इसे सभी संस्कृतियों में पाते हैं, केवल मसीही समाजों मात्र में नहीं। अतः सभी गैर-मसीही विवाह जिन्हें हम जानते हैं, के बारे में हम, मसीह का कलीसिया के साथ सम्बन्ध के भेदपूर्ण प्रतीक के रूप में सोचने को अभिमुख नहीं हैं। किन्तु वे हैं, और विवाह में हमारा नर और नारी के रूप में अस्तित्व ही, मसीह के लिए पुकार करता है कि स्वयँ को कलीसिया के साथ उसके सम्बन्ध में अवगत कराये। विवाह-वाचा के बारे में हमारी समझ को ख्रीस्तीयता पूर्ण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपके लिए यहाँ एक चित्र रंगने दीजिये कि इसे एक ऐसा मोड़ दूं जो आपने पहिले सोचा नहीं होगा। मसीह पुनः इस पृथ्वी पर आ रहे हैं। स्वर्गदूतों ने कहा, जैसा तुमने ‘उसे’ जाते हुए देखा, वैसे ही ‘वह’ पुनः आयेगा। अतः मेरे साथ उस दिन की कल्पना कीजिये। स्वर्ग खुल गए हैं और तुरही बजती है और ‘मनुष्य का पुत्र’ सामर्थ और विशाल महिमा के साथ और दसियों हजारों पवित्र स्वर्गदूतों के साथ, सूर्य के समान चमकता हुआ बादलों पर प्रगट होता है। ‘वह’ उन्हें ‘उसके’ चुने हुओं को चारों कोनों से इकट्ठा करने को भेजता है और जो मसीह में मरे हैं उन्हें मरे हुओं में से जिलाता है। ‘वह’ उन्हें अपनी देह के समान नयी और महिमामय देह देता है, और पलक झपकते ही हम शेष लोगों को बदल देता है कि महिमा के योग्य हो जावें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीह की दुल्हिन (कलीसिया!) की युगों से तैयारी अन्ततः पूर्ण हो गई है और ‘वह’ उसे बांह से पकड़ता है, मानो वे हों, और उसे मेज तक ले जाता है। मेम्ने का विवाह-भोज आ पहुँचा है। ‘वह’ मेज के सिरे पर खड़ा होता है और लाखों सन्तों में चुप्पी छा जाती है। और ‘वह’ कहता है, ‘‘ये, मेरी प्रिय, विवाह का अर्थ था। यही था जिस ओर सबने संकेत किया था। इसी कारण से मैंने तुम्हें नर व नारी करके सृजा और विवाह की वाचा का विधान किया। अब से कोई और विवाह और विवाह में दिया जाना, नहीं होगा, क्योंकि अन्तिम वास्तविकता आ पहुँची है और छाया जा सकती है’’ (देखिये, मरकुस 12: 25; लूका 20: 34-36)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब स्मरण कीजिये हम क्या कर रहे हैं: हम देखने का प्रयास कर रहे हैं कि तीसरा सच, परमेश्वर ने हमें उसके स्वरूप में नर व नारी करके सृजा, ख्रीस्तीयता की ओर इसकी पूर्णता के रूप में इंगित करता है। और मैंने कहा कि यह इसे दो तरीके से करता है। पहिला था विवाह के भेद के द्वारा। मानव जीवधारियों की नर व नारी के रूप में सृष्टि, विवाह के विधान के लिए सृष्टि में आवश्यक रूपरेखा उपलब्ध करता है। आप के पास बिना नर व नारी के विवाह हो ही नहीं सकता था। और विवाह का अर्थ, इसके मूलभूत रूप में या पूर्णता में नहीं जाना जाता है जब तक कि हम इसे मसीह का कलीसिया के साथ सम्बन्ध के एक दृष्टान्त के रूप में न देखें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नर व नारी के रूप में सृष्टि, विवाह की ओर संकेत करती है और विवाह मसीह और कलीसिया की ओर संकेत करता है। और इसलिए ये विश्वास कि परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में नर व नारी करके सृजा, ख्रीस्तीयता के बिना पूर्ण नहीं है — बिना मसीह और कलीसिया के लिए ‘उसके’ उद्धार देने वाले कार्य के। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैंने कहा कि एक अन्य तरीका था कि नर व नारी का परमेश्वर के स्वरूप में सृष्टि, ख्रीस्तीयता की ओर एक आवश्यक पूर्णता के रूप में संकेत करती है, यथा, नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता में इसकी विकृति से। मुझे समझाने का प्रयास करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पाप ने संसार में प्रवेश किया, नर व नारी के रूप में हमारे सम्बन्धों पर प्रभाव विध्वंसक था। परमेश्वर आदम के पास आता है जब उसने उस वर्जित फल को खा लिया था और पूछता है कि क्या हुआ। उत्पत्ति 3: 12 में आदम कहता है, ‘‘जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।’’ दूसरे शब्दों में, ये उसकी गलती है (अथवा आपकी, उसे मुझे देने के लिए!), अतः यदि किसी को उस फल को खाने के कारण मरना है, ये बेहतर होगा कि वह (स्त्री) हो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये वहाँ है सभी घरेलू हिंसाओं का आरम्भ, पत्नी के साथ सभी दुव्र्यवहार, सभी बलात्कार, सभी यौन कलंक, स्त्री का अनादर करने के सभी तरीके, जिसे परमेश्वर ने अपने स्वरूप में सृजा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्पत्ति 3:16, पतित पुरुष व स्त्री पर श्राप की घोषणा इस प्रकार करता है, परमेश्वर ने स्त्री से कहा, ‘‘मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।’’ दूसरे शब्दों में, पाप का परिणाम और हमारे युग का श्राप है, यौनों के बीच टकराव। ये आयत इसका वर्णन नहीं है कि चीजें किस तरह होना चाहिए। ये वर्णन है कि श्रापित तरीके से किस तरह चीजें होने जा रही हैं जबकि पाप राज्य कर रहा है। शासन करते हुए पुरुषगण और कुटिल स्त्रियाँ। परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी का ये अर्थ नहीं है। ये पाप की कुरूपता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये कुरूपता ख्रीस्तीयता की ओर कैसे संकेत करती है&amp;amp;nbsp;? ये ख्रीस्तीयता की ओर संकेत करती है क्योंकि ये उस चंगाई की मांग करती है जो पुरुषगण और स्त्रियों के बीच सम्बन्ध में ख्रीस्तीयता ले आती है। यदि परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में नर और नारी के रूप में सृजा, ये समाविष्ठ करता है व्यक्ति होने की समानता, प्रतिष्ठा की समानता, परस्पर आदर, मित्रभाव, सम्पूरकता, एक एकीकृत नियति। लेकिन संसार के इतिहास में ये सब कहाँ है? ये उस चंगाई में है जो यीशु ले आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु जो चंगाई ले आता है उसके बारे में दो टिप्पणी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ कहने के लिए इतना अधिक है। किन्तु मुझे केवल दो चीजें व्यक्त करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3.1. नर व नारी सृजे जाने की नियति''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, 1 पतरस 3: 7 में पतरस कहता है, कि मसीही पति और पत्नी, ‘‘जीवन के अनुग्रह के संगी वारिस’’ हैं। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि मसीह में पुरुषगण और स्त्रियाँ उसे पुनः प्राप्त करते हैं जो परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी करके सृजे जाने के द्वारा अर्थ था। इसका अर्थ है कि नर और नारी के रूप में एकसाथ उन्हें परमेश्वर की महिमा को प्रगट करना है और संगी-वारिस के रूप में एकसाथ उन्हें परमेश्वर की महिमा का उत्तराधिकारी होना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर व नारी के रूप में परमेश्वर के स्वरूप में सृष्टि (जब आप इसे पाप के साथ-साथ देखते हैं), उस चंगाई की पूर्णता की मांग करती है, जो मसीह के रूपान्तरित करनेवाले कार्य और पापियों के लिए उसके द्वारा मोल लिये गए उत्तराधिकार, के साथ आती है। उस वास्तविकता को कि नर और नारी जीवन के अनुग्रह के संगी-वारिस हैं, मसीह पाप से पुनः प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3.2. नर और नारी के रूप में अविवाहित रहने का अर्थ''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरह से मसीह चीजों को उलट देता और हमारे युद्ध की कुरूपता पर जय पाता है और परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी सृजे जाने की नियति को परिपूर्ण करता है, इसके बारे में दूसरी बात जो कही जानी है, वो 1 कुरिन्थियों 7 में पायी जाती है। वहाँ पौलुस उस समय के लिए कुछ लगभग अविश्वासनीय मूलसिद्धान्त कहता है: ‘‘मैं अविवाहितों और विधवाओं के विषय में कहता हूं, कि उन के लिये ऐसा ही रहना अच्छा है, जैसा मैं हूं … अविवाहित पुरुष प्रभु की बातों की चिन्ता में रहता है, कि प्रभु को क्योंकर प्रसन्न रखे … अविवाहिता प्रभु की चिन्ता में रहती है, कि वह देह और आत्मा दोनों में पवित्र हो … यह बात … कहता हूं … तुम्हें फंसाने के लिये नहीं … बरन … तुम एक चित्त होकर प्रभु की सेवा में लगे रहो’’ (1कुरिन्थियों 7: 8, 32-35)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या आप देखते हैं कि इसका क्या तात्पर्य है? इसका आशय है कि परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए नर व नारी के लिए वो चंगाई जो यीशु ले आता है, विवाह पर निर्भर नहीं है। वास्तव में एक अविवाहित के रूप में पौलुस के अनुभव (और एक अविवाहित पुरुष के रूप में यीशु का नमूना) ने उसे सिखाया कि प्रभु के प्रति एक प्रकार की स्थिर-मना भक्ति है जो अविवाहित पुरुष या स्त्री के लिए सम्भव है, जो कि सामान्यतः विवाहित सन्तों का हिस्सा नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कहने का एक अन्य तरीका ये है: विवाह इस युग के लिए एक अस्थायी प्रथा है, जब तक कि मृतकों का पुनरुत्थान न हो। इसके अर्थ का मूलतत्व और उद्देश्य, कलीसिया के प्रति मसीह के सम्बन्ध को प्रदर्शित करना है। लेकिन जब वास्तविकता आती है, प्रदर्शन, जैसा कि हम जानते हैं, ये एक ओर कर दिया जायेगा। और आने वाले युग में न विवाह होगा और न विवाह में दिया जाना। और वे जो अविवाहित और प्रभु के प्रति अर्पित रहे हैं, वे जीवन के अनुग्रह के पूर्ण संगी-वारिस के रूप में मेम्ने के विवाह-भोज में बैठेंगे। और प्रभु के प्रति उनकी भक्ति और उनके बलिदानों के अनुसार वे स्नेहों और सम्बन्धों और सभी कल्पना से परे आनन्दों के साथ, पुरस्कृत किये जावेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सारांश ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, हमने जो देखा है, मैं उसका सार प्रस्तुत कर दूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. परमेश्वर ने मानव-जीवधारियों को सृजा। और जैसे ही पुराना नियम बन्द होता है, ये विस्मयकारी तथ्य, शेष कहानी, ख्रीस्तीयता की मांग करता है, ताकि जो परमेश्वर करने जा रहा था उसको सार्थक करे। सृष्टि करने में ‘उसके’ उद्देश्य, बिना मसीह के कार्य के अपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. परमेश्वर ने हमें '''अपने स्वरूप में''' सृजा। लेकिन हमने उस स्वरूप को इतनी बुरी तरह बिगाड़ दिया कि ये कठिनाई से पहचाने जाने लायक है। इसलिए ये सच्चाई ख्रीस्तीयता की पूर्णता की मांग करती है, क्योंकि जो जो यीशु करता है वो ये कि जो खो गया था उसे पुनः प्राप्त करे। ये ‘‘मसीह में नयी सृष्टि’’ कहलाता है। स्वरूप को धार्मिकता और पवित्रता में पु्र्स्थापित किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में '''नर और नारी करके''' सृजा। और ये भी ख्रीस्तीयता की सच्चाई में पूर्णता की मांग करता है। कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से समझ नहीं सकता कि विवाह में नर और नारी होने का क्या अर्थ है जब तक कि वे ये न देखें कि विवाह का तात्पर्य मसीह और कलीसिया को चित्रित करना है। और परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी के रूप में सृजे जाने की सच्ची नियति कोई नहीं जान सकता जब तक कि वे ये न जानें कि नर व नारी, जीवन के अनुग्रह के संगी-वारिस हैं। और अन्त में, कोई भी, परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी के रूप में अविवाहित होने का अर्थ पूर्णतः नहीं समझ सकता जब तक कि वे मसीह से न सीखें कि आने वाले युग में कोई विवाह नहीं होगा, और इसलिए परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी होने की महिमामय नियति, विवाह पर निर्भर नहीं है, अपितु प्रभु के प्रति भक्ति पर। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इन सच्चाईयों पर टिके रहिये: परमेश्वर ने आपको सृजा; ‘उसने’ आपको अपने स्वरूप में सृजा; और ‘उसने’ आपको नर व नारी सृजा ताकि आप प्रभु के प्रति पूर्णरूपेण और मूलतः और अद्वितीय रूप से अर्पित रहें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>नर और नारी करके ‘उस’ ने परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार उनकी सृष्टि की</title>
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				<updated>2015-10-27T19:31:44Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Male and Female He Created Them in the Image of God}}   &amp;amp;gt; फिर परमेश्वर ने कहा, ‘‘हम मनुष्य को अपन...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Male and Female He Created Them in the Image of God}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; फिर परमेश्वर ने कहा, ‘‘हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएं; और वे समुद्र की मछलियों, और आकाश के पक्षियों, और घरेलू पशुओं, और सारी पृथ्वी पर, और सब रेंगनेवाले जन्तुओं पर जो पृथ्वी पर रेंगते हैं, अधिकार रखें।’’ तब परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्वर ने उसको उत्पन्न किया, नर और नारी करके उस ने मनुष्यों की सृष्टि की। और परमेश्वर ने उनको आशीष दी: और उन से कहा, ‘‘फूलो-फलो, और पृथ्वी में भर जाओ, और उसको अपने वश में कर लो; और समुद्र की मछलियों, तथा आकाश के पक्षियों, और पृथ्वी पर रेंगनेवाले सब जन्तुओं पर अधिकार रखो।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः मैं आपके साथ इस मूल-पाठ में सिखायी गई तीन चीजों के बारे में सोचना चाहता हूँ। एक ये है कि परमेश्वर ने मानव जीवधारियों की सृष्टि की। दूसरी ये है कि परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप के अनुसार सृजा। तीसरी ये है कि परमेश्वर ने हमें नर और नारी करके सृजा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये सम्भव है कि इन तीन सच्चाईयों पर विश्वास किया जावे और एक मसीही न रहा जावे। जो भी हो, वे सब ठीक वहाँ यहूदी धर्म-ग्रन्थ में सिखाये जाते हैं। इसलिए धर्मग्रन्थ-विश्वासी एक अच्छा यहूदी, इन सच्चाईयों को स्वीकार कर लेगा। लेकिन यद्यपि आप इन तीन सच्चाईयों में विश्वास कर सकते हैं और फिर भी मसीही नहीं हो सकते, ये सभी ख्रीस्तीयता (ईसाइयत) की ओर संकेत करते हैं। वे सभी उस पूर्णता की मांग करते हैं जो काम और मसीह के साथ आती है। वो ही है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ, विशेषकर तीसरे सच के लगाव में — कि हम परमेश्वर के स्वरूप में नर और नारी करके सृजे गए हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 1. परमेश्वर ने मानव जीवधारियों की सृष्टि की ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आइये हम प्रथम सत्य को लें: कि मानव जीवधारी परमेश्वर द्वारा सृजे गए हैं। मैं सोचता हूँ कि ये एक स्पष्टीकरण की मांग करता है। ‘उस’ ने हमें क्यों सृजा? जब आप कुछ बनाते हैं, आपके पास इसे बनाने का एक कारण होता है। परन्तु संसार, जैसा कि हम इसे जानते हैं, उस प्रश्न का यथोचित उत्तर दे सकता है? पुराना नियम, मनुष्य द्वारा संसार को अपने अधिकार में लाने की बात करता है। ये परमेश्वर की महिमा को प्रदर्शित करने के लिए सृजे जाने की बात करता है (यशायाह 43:7)। ये प्रभु की महिमा के ज्ञान से पृथ्वी के भर जाने की बात करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन हम क्या देखते हैं? हम एक संसार को देखते हैं जो सृष्टिकर्ता के विरुद्ध बग़ावत में है। हम यहूदी धर्मग्रन्थ को देखते हैं जो सृष्टि की कहानी के साथ नितान्त अपूर्ण एक अन्त पर आती है और महिमा की आशा अब भी आने को है। अतः मात्र विश्वास करना कि परमेश्वर ने मानव जीवधारियों को सृजा था, उस तरह जैसा कि यहूदी धर्मग्रन्थ सिखाते हैं, कि ‘उसने’ सृजा, शेष कहानी बतायी जाने की मांग करता है, यथा, ख्रीस्तीयता या मसीहियत। केवल मसीह में ही सृष्टि का उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 2. परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में सृजा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अथवा उदाहरण के लिए दूसरे सच को लीजिये: परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में सृजा। निश्चित ही इसका कुछ सम्बन्ध इसके साथ होना चाहिए कि हम यहाँ क्यों हैं। हमें बनाने में ‘उसके’ उद्देश्य का अवश्य ही इस तथ्य के साथ कुछ अद्भुत संबंध होना चाहिए कि हम मेंढक या छिपकलियाँ या पक्षी या यहाँ तक कि बंदर नहीं हैं। हम परमेश्वर के स्वरूप में मानव जीवधारी हैं, केवल हम और कोई अन्य जन्तु नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन इस विस्मयकारी गरिमा को हमने कितना गंदा कर दिया है। क्या हम परमेश्वर के समान हैं? खैर, हाँ और नहीं। हाँ हम परमेश्वर के समान हैं, यहाँ तक कि पापमय और अविश्वासी होने पर भी एक समानता है। हम इसे जानते हैं क्योंकि उत्पत्ति 9:6 में, परमेश्वर ने नूह से कहा, ‘‘जो कोई मनुष्य का लोहू बहाएगा उसका लोहू मनुष्य ही से बहाया जाएगा क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्य को अपने ही स्वरूप के अनुसार बनाया है।’’ दूसरे शब्दों में, एक ऐसे संसार में भी जहाँ पाप का प्रभुत्व है (हत्या जैसे पापों के साथ), मानव जीवधारी अब भी परमेश्वर के स्वरूप में हैं। वे चूहों और मच्छरों के समान मारे नहीं जा सकते। आप अपना जीवन खो देते हैं यदि आप एक मानव जीवधारी की हत्या करते हैं। (देखिये याकूब 3:9)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परन्तु क्या हम वो स्वरूप हैं जिसमें होने के लिए परमेश्वर ने हमें बनाया है? क्या ये स्वरूप इतना बिगड़ नहीं गया है कि लगभग पहिचाने जाने से परे है? क्या आप महसूस करते हैं कि आप उस तरह से परमेश्वर के समान हैं जैसा कि आपको होना चाहिए? अतः यहाँ पुनः ये विश्वास कि हम परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, एक पूर्ति की मांग करता है—इस मामले में एक छुटकारा, एक रूपान्तरण, एक प्रकार का पुनः- सृजन। और ठीक यही है जो ख्रीस्तीयता लाती है। ‘‘क्योंकि विश्वास के द्वारा अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है, और यह तुम्हारी ओर से नहीं, बरन परमेश्वर का दान है — और न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे। क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं; और मसीह यीशु में भले कामों के लिये सृजे गए … नये मनुष्यत्व को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सत्य की धार्मिकता, और पवित्रता में सृजा गया है (इफिसियों 2:8-10; 4:24)। परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में सृजा, किन्तु हमने इसे लगभग न पहिचाने जा सकने की दशा तक बिगाड़ दिया और यीशु इसका उत्तर है। ‘वह’ विश्वास के द्वारा आता है, ‘वह’ क्षमा करता है, ‘वह’ शुद्ध करता है, और ‘वह’ एक सुधार-परियोजना आरम्भ करता है जो पवित्रीकरण कहलाती है और ये उस महिमा में समाप्त होगी जो परमेश्वर ने मानव जीवधारियों के लिए सर्वप्रथम स्थान में ठान रखा था। इसलिए चूंकि हम जानते हैं कि हम परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, हमारे पाप और विकृति एक उत्तर की मांग करते हैं। और यीशु वो उत्तर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== 3. परमेश्वर ने हमें नर व नारी करके सृजा ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इन आयतों में तीसरा सच ये है कि परमेश्वर ने हमें नर व नारी सृजा। और ये भी ख्रीस्तीयता की ओर संकेत करता है और मसीह की पूर्ति की मांग करता है। कैसे? कम से कम दो तरह से। एक, विवाह के भेद से आता है। दूसरा, पाप में नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता से आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''विवाह का भेद''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विवाह के भेद को लीजिये। उत्पत्ति 2: 24 में ठीक इस विवरण के बाद कि स्त्री कैसे सृजी गई, मूसा (उत्पत्ति का लेखक) कहता है, ‘‘इस कारण पुरुष अपने माता पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहेगा और वे एक ही तन बने रहेंगे।’’ अब जब प्रेरित पौलुस इस आयत को इफिसियों 5:32 में उद्धृत करता है, वह कहता है, ‘‘यह भेद तो बड़ा है; पर मैं मसीह और कलीसिया के विषय में कहता हूं।’’ और, इसके साथ उसके सुराग़ के रूप में, वह विवाह के अर्थ को खोलता है: ये कलीसिया के लिए मसीह के प्रेम का एक प्रतीक है जो, अपनी पत्नी के प्रति पति की प्रेममय प्रधानता में, प्रदर्शित होता है; और ये कलीसिया का मसीह के प्रति सहर्ष आधीनता का प्रतीक है जो, पति के प्रति पत्नी के सम्बन्ध में, प्रदर्शित होता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वह उत्पत्ति 2: 24 को एक ‘‘भेद’’ कहता है क्योंकि परमेश्वर ने उत्पत्ति में नर और नारी के विवाह के लिए अपने सभी अभिप्रायों को स्पष्टता से प्रगट नहीं किया। पुराना नियम में संकेत और सूचक थे कि विवाह, परमेश्वर और ‘उसके’ लोगों के सम्बन्ध के जैसा था। लेकिन केवल जब मसीह आया तब ही विवाह के भेद का विस्तार में हिज्जे हुआ। यह मसीह का ‘उसके’ लोगों के साथ वाचा के एक चित्र के अर्थ में है, कलीसिया के प्रति ‘उसकी’ वचनबद्धता। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तब, क्या आप देखते हैं, कैसे परमेश्वर द्वारा मनुष्य को नर व नारी करके सृष्टि करना और फिर विवाह को एक ऐसे सम्बन्ध के रूप में विधान करना जिसमें एक नर, माता पिता को छोड़ता है और वाचा वचनबद्धता में अपनी पत्नी से मिल जाता है — कैसे सृष्टि करने का यह कार्य और विवाह का ये विधान, मसीह और ‘उसकी’ कलीसिया के प्रकाषन की मांग करते हैं। वे उस भेद के प्रकाशन के रूप में ख्रीस्तीयता की मांग करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अधिकांश लोगों के लिए ये एक बहुत असंगत विचार है, यहाँ तक कि अधिकांश मसीहीगण के लिए भी, क्योंकि विवाह एक सांसारिक प्रथा है, साथ ही एक मसीही विवाह भी। आप इसे सभी संस्कृतियों में पाते हैं, केवल मसीही समाजों मात्र में नहीं। अतः सभी गैर-मसीही विवाह जिन्हें हम जानते हैं, के बारे में हम, मसीह का कलीसिया के साथ सम्बन्ध के भेदपूर्ण प्रतीक के रूप में सोचने को अभिमुख नहीं हैं। किन्तु वे हैं, और विवाह में हमारा नर और नारी के रूप में अस्तित्व ही, मसीह के लिए पुकार करता है कि स्वयँ को कलीसिया के साथ उसके सम्बन्ध में अवगत कराये। विवाह-वाचा के बारे में हमारी समझ को ख्रीस्तीयता पूर्ण करती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपके लिए यहाँ एक चित्र रंगने दीजिये कि इसे एक ऐसा मोड़ दूं जो आपने पहिले सोचा नहीं होगा। मसीह पुनः इस पृथ्वी पर आ रहे हैं। स्वर्गदूतों ने कहा, जैसा तुमने ‘उसे’ जाते हुए देखा, वैसे ही ‘वह’ पुनः आयेगा। अतः मेरे साथ उस दिन की कल्पना कीजिये। स्वर्ग खुल गए हैं और तुरही बजती है और ‘मनुष्य का पुत्र’ सामर्थ और विशाल महिमा के साथ और दसियों हजारों पवित्र स्वर्गदूतों के साथ, सूर्य के समान चमकता हुआ बादलों पर प्रगट होता है। ‘वह’ उन्हें ‘उसके’ चुने हुओं को चारों कोनों से इकट्ठा करने को भेजता है और जो मसीह में मरे हैं उन्हें मरे हुओं में से जिलाता है। ‘वह’ उन्हें अपनी देह के समान नयी और महिमामय देह देता है, और पलक झपकते ही हम शेष लोगों को बदल देता है कि महिमा के योग्य हो जावें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीह की दुल्हिन (कलीसिया!) की युगों से तैयारी अन्ततः पूर्ण हो गई है और ‘वह’ उसे बांह से पकड़ता है, मानो वे हों, और उसे मेज तक ले जाता है। मेम्ने का विवाह-भोज आ पहुँचा है। ‘वह’ मेज के सिरे पर खड़ा होता है और लाखों सन्तों में चुप्पी छा जाती है। और ‘वह’ कहता है, ‘‘ये, मेरी प्रिय, विवाह का अर्थ था। यही था जिस ओर सबने संकेत किया था। इसी कारण से मैंने तुम्हें नर व नारी करके सृजा और विवाह की वाचा का विधान किया। अब से कोई और विवाह और विवाह में दिया जाना, नहीं होगा, क्योंकि अन्तिम वास्तविकता आ पहुँची है और छाया जा सकती है’’ (देखिये, मरकुस 12: 25; लूका 20: 34-36)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब स्मरण कीजिये हम क्या कर रहे हैं: हम देखने का प्रयास कर रहे हैं कि तीसरा सच, परमेश्वर ने हमें उसके स्वरूप में नर व नारी करके सृजा, ख्रीस्तीयता की ओर इसकी पूर्णता के रूप में इंगित करता है। और मैंने कहा कि यह इसे दो तरीके से करता है। पहिला था विवाह के भेद के द्वारा। मानव जीवधारियों की नर व नारी के रूप में सृष्टि, विवाह के विधान के लिए सृष्टि में आवश्यक रूपरेखा उपलब्ध करता है। आप के पास बिना नर व नारी के विवाह हो ही नहीं सकता था। और विवाह का अर्थ, इसके मूलभूत रूप में या पूर्णता में नहीं जाना जाता है जब तक कि हम इसे मसीह का कलीसिया के साथ सम्बन्ध के एक दृष्टान्त के रूप में न देखें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः नर व नारी के रूप में सृष्टि, विवाह की ओर संकेत करती है और विवाह मसीह और कलीसिया की ओर संकेत करता है। और इसलिए ये विश्वास कि परमेश्वर ने हमें ‘उसके’ स्वरूप में नर व नारी करके सृजा, ख्रीस्तीयता के बिना पूर्ण नहीं है — बिना मसीह और कलीसिया के लिए ‘उसके’ उद्धार देने वाले कार्य के। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, मैंने कहा कि एक अन्य तरीका था कि नर व नारी का परमेश्वर के स्वरूप में सृष्टि, ख्रीस्तीयता की ओर एक आवश्यक पूर्णता के रूप में संकेत करती है, यथा, नर-नारी के सम्बन्धों की ऐतिहासिक कुरूपता में इसकी विकृति से। मुझे समझाने का प्रयास करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब पाप ने संसार में प्रवेश किया, नर व नारी के रूप में हमारे सम्बन्धों पर प्रभाव विध्वंसक था। परमेश्वर आदम के पास आता है जब उसने उस वर्जित फल को खा लिया था और पूछता है कि क्या हुआ। उत्पत्ति 3: 12 में आदम कहता है, ‘‘जिस स्त्री को तू ने मेरे संग रहने को दिया है उसी ने उस वृक्ष का फल मुझे दिया, और मैंने खाया।’’ दूसरे शब्दों में, ये उसकी गलती है (अथवा आपकी, उसे मुझे देने के लिए!), अतः यदि किसी को उस फल को खाने के कारण मरना है, ये बेहतर होगा कि वह (स्त्री) हो&amp;amp;nbsp;! &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये वहाँ है सभी घरेलू हिंसाओं का आरम्भ, पत्नी के साथ सभी दुव्र्यवहार, सभी बलात्कार, सभी यौन कलंक, स्त्री का अनादर करने के सभी तरीके, जिसे परमेश्वर ने अपने स्वरूप में सृजा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उत्पत्ति 3:16, पतित पुरुष व स्त्री पर श्राप की घोषणा इस प्रकार करता है, परमेश्वर ने स्त्री से कहा, ‘‘मैं तेरी पीड़ा और तेरे गर्भवती होने के दुःख को बहुत बढ़ाऊंगा; तू पीड़ित होकर बालक उत्पन्न करेगी; और तेरी लालसा तेरे पति की ओर होगी, और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।’’ दूसरे शब्दों में, पाप का परिणाम और हमारे युग का श्राप है, यौनों के बीच टकराव। ये आयत इसका वर्णन नहीं है कि चीजें किस तरह होना चाहिए। ये वर्णन है कि श्रापित तरीके से किस तरह चीजें होने जा रही हैं जबकि पाप राज्य कर रहा है। शासन करते हुए पुरुषगण और कुटिल स्त्रियाँ। परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी का ये अर्थ नहीं है। ये पाप की कुरूपता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब, ये कुरूपता ख्रीस्तीयता की ओर कैसे संकेत करती है&amp;amp;nbsp;? ये ख्रीस्तीयता की ओर संकेत करती है क्योंकि ये उस चंगाई की मांग करती है जो पुरुषगण और स्त्रियों के बीच सम्बन्ध में ख्रीस्तीयता ले आती है। यदि परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में नर और नारी के रूप में सृजा, ये समाविष्ठ करता है व्यक्ति होने की समानता, प्रतिष्ठा की समानता, परस्पर आदर, मित्रभाव, सम्पूरकता, एक एकीकृत नियति। लेकिन संसार के इतिहास में ये सब कहाँ है? ये उस चंगाई में है जो यीशु ले आता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== यीशु जो चंगाई ले आता है उसके बारे में दो टिप्पणी ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ कहने के लिए इतना अधिक है। किन्तु मुझे केवल दो चीजें व्यक्त करने दीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3.1. नर व नारी सृजे जाने की नियति''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रथम, 1 पतरस 3: 7 में पतरस कहता है, कि मसीही पति और पत्नी, ‘‘जीवन के अनुग्रह के संगी वारिस’’ हैं। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि मसीह में पुरुषगण और स्त्रियाँ उसे पुनः प्राप्त करते हैं जो परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी करके सृजे जाने के द्वारा अर्थ था। इसका अर्थ है कि नर और नारी के रूप में एकसाथ उन्हें परमेश्वर की महिमा को प्रगट करना है और संगी-वारिस के रूप में एकसाथ उन्हें परमेश्वर की महिमा का उत्तराधिकारी होना है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नर व नारी के रूप में परमेश्वर के स्वरूप में सृष्टि (जब आप इसे पाप के साथ-साथ देखते हैं), उस चंगाई की पूर्णता की मांग करती है, जो मसीह के रूपान्तरित करनेवाले कार्य और पापियों के लिए उसके द्वारा मोल लिये गए उत्तराधिकार, के साथ आती है। उस वास्तविकता को कि नर और नारी जीवन के अनुग्रह के संगी-वारिस हैं, मसीह पाप से पुनः प्राप्त करता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3.2. नर और नारी के रूप में अविवाहित रहने का अर्थ''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस तरह से मसीह चीजों को उलट देता और हमारे युद्ध की कुरूपता पर जय पाता है और परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी सृजे जाने की नियति को परिपूर्ण करता है, इसके बारे में दूसरी बात जो कही जानी है, वो 1 कुरिन्थियों 7 में पायी जाती है। वहाँ पौलुस उस समय के लिए कुछ लगभग अविश्वासनीय मूलसिद्धान्त कहता है: ‘‘मैं अविवाहितों और विधवाओं के विषय में कहता हूं, कि उन के लिये ऐसा ही रहना अच्छा है, जैसा मैं हूं … अविवाहित पुरुष प्रभु की बातों की चिन्ता में रहता है, कि प्रभु को क्योंकर प्रसन्न रखे … अविवाहिता प्रभु की चिन्ता में रहती है, कि वह देह और आत्मा दोनों में पवित्र हो … यह बात … कहता हूं … तुम्हें फंसाने के लिये नहीं … बरन … तुम एक चित्त होकर प्रभु की सेवा में लगे रहो’’ (1कुरिन्थियों 7: 8, 32-35)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या आप देखते हैं कि इसका क्या तात्पर्य है? इसका आशय है कि परमेश्वर के स्वरूप में सृजे गए नर व नारी के लिए वो चंगाई जो यीशु ले आता है, विवाह पर निर्भर नहीं है। वास्तव में एक अविवाहित के रूप में पौलुस के अनुभव (और एक अविवाहित पुरुष के रूप में यीशु का नमूना) ने उसे सिखाया कि प्रभु के प्रति एक प्रकार की स्थिर-मना भक्ति है जो अविवाहित पुरुष या स्त्री के लिए सम्भव है, जो कि सामान्यतः विवाहित सन्तों का हिस्सा नहीं है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसे कहने का एक अन्य तरीका ये है: विवाह इस युग के लिए एक अस्थायी प्रथा है, जब तक कि मृतकों का पुनरुत्थान न हो। इसके अर्थ का मूलतत्व और उद्देश्य, कलीसिया के प्रति मसीह के सम्बन्ध को प्रदर्शित करना है। लेकिन जब वास्तविकता आती है, प्रदर्शन, जैसा कि हम जानते हैं, ये एक ओर कर दिया जायेगा। और आने वाले युग में न विवाह होगा और न विवाह में दिया जाना। और वे जो अविवाहित और प्रभु के प्रति अर्पित रहे हैं, वे जीवन के अनुग्रह के पूर्ण संगी-वारिस के रूप में मेम्ने के विवाह-भोज में बैठेंगे। और प्रभु के प्रति उनकी भक्ति और उनके बलिदानों के अनुसार वे स्नेहों और सम्बन्धों और सभी कल्पना से परे आनन्दों के साथ, पुरस्कृत किये जावेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सारांश ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, हमने जो देखा है, मैं उसका सार प्रस्तुत कर दूँ। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. परमेश्वर ने मानव-जीवधारियों को सृजा। और जैसे ही पुराना नियम बन्द होता है, ये विस्मयकारी तथ्य, शेष कहानी, ख्रीस्तीयता की मांग करता है, ताकि जो परमेश्वर करने जा रहा था उसको सार्थक करे। सृष्टि करने में ‘उसके’ उद्देश्य, बिना मसीह के कार्य के अपूर्ण हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. परमेश्वर ने हमें '''अपने स्वरूप में''' सृजा। लेकिन हमने उस स्वरूप को इतनी बुरी तरह बिगाड़ दिया कि ये कठिनाई से पहचाने जाने लायक है। इसलिए ये सच्चाई ख्रीस्तीयता की पूर्णता की मांग करती है, क्योंकि जो जो यीशु करता है वो ये कि जो खो गया था उसे पुनः प्राप्त करे। ये ‘‘मसीह में नयी सृष्टि’’ कहलाता है। स्वरूप को धार्मिकता और पवित्रता में पु्र्स्थापित किया जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. परमेश्वर ने हमें अपने स्वरूप में '''नर और नारी करके''' सृजा। और ये भी ख्रीस्तीयता की सच्चाई में पूर्णता की मांग करता है। कोई भी व्यक्ति पूरी तरह से समझ नहीं सकता कि विवाह में नर और नारी होने का क्या अर्थ है जब तक कि वे ये न देखें कि विवाह का तात्पर्य मसीह और कलीसिया को चित्रित करना है। और परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी के रूप में सृजे जाने की सच्ची नियति कोई नहीं जान सकता जब तक कि वे ये न जानें कि नर व नारी, जीवन के अनुग्रह के संगी-वारिस हैं। और अन्त में, कोई भी, परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी के रूप में अविवाहित होने का अर्थ पूर्णतः नहीं समझ सकता जब तक कि वे मसीह से न सीखें कि आने वाले युग में कोई विवाह नहीं होगा, और इसलिए परमेश्वर के स्वरूप में नर व नारी होने की महिमामय नियति, विवाह पर निर्भर नहीं है, अपितु प्रभु के प्रति भक्ति पर। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः इन सच्चाईयों पर टिके रहिये: परमेश्वर ने आपको सृजा; ‘उसने’ आपको अपने स्वरूप में सृजा; और ‘उसने’ आपको नर व नारी सृजा ताकि आप प्रभु के प्रति पूर्णरूपेण और मूलतः और अद्वितीय रूप से अर्पित रहें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत करो</title>
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				<updated>2015-08-03T20:47:13Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: &amp;quot;एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत करो&amp;quot; सुरक्षित कर दिया ([edit=sysop] (indefinite) [move=sysop] (indefinite))&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Strengthen Each Other's Hands in God}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और दाऊद ने जान लिया कि शाऊल मेरे प्राण की खोज में निकला है। और दाऊद जीप नाम जंगल के होरेश नाम स्थान में था; कि शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)। उस ने उस से कहा, मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है। तब उन दोनों ने यहोवा की शपथ खाकर आपस में वाचा बान्धी; तब दाऊद होरेश में रह गया, और योनातन अपने घर चला गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज का संदेश, विगत रविवार को इफिसियों की पत्री से आरम्भ की गई श्रंखला में, एक क्रमभंग है। क्रमभंग का कारण वो गहरी क़ायलियत है जो हम ‘बैतलेहेम’ के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के बारे में अनुभूति करते हैं कि किसी प्रकार के छोटे समूह का हिस्सा हों जहाँ आप विश्वास की लड़ाई (कुश्ती) को लड़ने के लिए एक दूसरे की सहायता करते हैं। अतः आज हमारी एकाग्रता, परमेश्वर में एक दूसरे के हाथों को मजबूत बनाने पर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम विश्वास करते हैं कि सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है। हम विश्वास करते हैं कि सन्तों द्वारा धीरज से सहना, एक सामूहिक जिम्मेदारी है। उसी प्रेमी प्रभु ने जिसने कहा, ‘‘मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा (यूहन्ना 10: 27-28), यह भी कहा, ‘‘जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा (मत्ती 24: 13)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जो परमेश्वर से जन्मे हैं वे यीशु के हाथ में सनातन के लिए सुरक्षित हैं। और वे जो परमेश्वर से जन्मे हैं उन्हें अन्त तक धीरज धरना चाहिए ताकि अन्ततः उद्धार पायें। और इस कारण प्रश्न उठता है:- परमेश्वर ने कैसे ठहराया है कि उसके लोगों को अन्त तक विश्वास में बनाये रखे ताकि ‘वह’ अचूक रूप से उस प्रतिज्ञा को पूरी कर सके कि वे सुरक्षित हैं और यह कि उनमें से एक भी नहीं खोयेगा? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः हम उस प्रश्न के उत्तर के एक कठिन भाग पर ध्यान एकाग्र कर रहे हैं:- यथा, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि हम अन्य विश्वासियों से इस प्रकार सम्बन्धित रहें कि हम विश्वास की लड़ाई दिन-प्रतिदिन और अन्त तक सफलतापूर्वक लड़ने में, एक दूसरे की सहायता कर सकें। इस उत्तर का बाइबिल-शास्त्रीय आधार, इब्रानियों 3: 12-14 है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे भाइयो, चैकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए। बरन जिस दिन तक ‘‘आज’’ का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए। क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने एक साधन/उपाय नियुक्त किया है जिसके द्वारा ‘वह’ हमें हमारे भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहने के योग्य बनायेगा। ये यह है:- उस प्रकार के मसीही सम्बन्ध विकसित कीजिये जिसमें आप, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को दृढ़ता से थामे रहने में और पाप की छल-पूर्णता से बचने में, एक दूसरे की सहायता करते हैं। दृढ़ता से खड़े रहने और परमेश्वर के सारे हथियार पहनने के लिए, दिन-प्रतिदिन एक दूसरे को प्रोत्साहित कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीहियों के एक झुण्ड का एक हिस्सा बने रहिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बच्चो, किशोरो, नौजवानो, कॉलेज के छात्रगणो, कुंवारो, विवाहित जोड़ो, विधवाओ, विधुरो! क्या आप मसीही मित्रों के एक झुण्ड का हिस्सा हैं जिसने आपस में प्रण किया है कि विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करेंगे और एक दूसरे को पाप के धूर्त अनाधिकार-प्रवेश से बचायेंगे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यह नहीं कहता कि एक सुसंगठित छोटे समूह के न होने पर आप उद्धार नहीं पा सकते। लेकिन मैं अवश्य कहता हूँ, और मैं विश्वास करता हूँ कि यह परमेश्वर का वचन है, कि यदि आपके पास विश्वास में ऐसे अन्तरंग-साथियों का समूह नहीं है, तब आप, आपके संरक्षण और विश्वास में बने रहने के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त किये गए एक साधन, की उपेक्षा कर रहे हैं। और अनुग्रह के साधन की उपेक्षा करना, आपके प्राण के लिए बहुत ख़तरनाक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, आज प्रातः मेरा लक्ष्य बहुत सरल है:- आपको प्रेरित करूं कि मसीहियों के किसी छोटे झुण्ड का हिस्सा बन जाइये, जहाँ आप, दिन-प्रतिदिन विश्वास की लड़ाई लड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें और प्रोत्साहित हो सकें। संदेश के अन्त में, आपके प्रार्थना-सहित विचार करने के लिए, ‘पीटर नेल्सन’ छोटे समूहों के एक तन्त्र को संक्षिप्त में प्रस्तुत करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दाऊद के साथ योनातन की भेंट से चार शिक्षाएं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूल-पाठ, 1 शमूएल 23: 15-18 है। विश्वास की सदा जारी रहने वाली लड़ाई में क्या होने की आवश्यकता है, यह इसका एक सरल और गम्भीर दृष्टान्त है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाऊल के मार्ग से दूर रहने का प्रयास करते हुए, दाऊद, यरूशलेम के दक्षिण में लगभग 30 मील की दूरी पर स्थित जीप के जंगल में, एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है। शाऊल, इस्राएल का राजा, दाऊद को मार डालना चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सिंहासन के लिए वह एक ख़तरनाक प्रतिद्वन्दी है। योनातन, शाऊल का पुत्र, दाऊद से प्रीति रखता है और सुनता है कि वह जीप के जंगल में है, और परमेश्वर में उसके हाथ मजबूत करने के लिए वहाँ जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योनातन और दाऊद के बीच ये भेंट, विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करने के बारे में कम से कम चार पाठ समझाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. मसीही सखापन (अन्तरंग-मैत्री) के लिए हर एक की आवश्यकता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वाधिक गहरे सन्तगण और सबसे मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथों को मजबूत करने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है। दाऊद गहरा था, दाऊद मजबूत था, और दाऊद को योनातन की आवश्यकता थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीही अन्तरंग-मैत्री, मात्र नये रंगरूटों (नयी भर्ती) के लिए नहीं है। यह प्रत्येक विश्वासी के लिए है। अन्य मसीहियों की सेवकाई की आवश्यकता से बाहर, हम कभी भी विकास नहीं करते। यदि आप सोचते हैं कि विश्वास की लड़ाई में प्रतिदिन प्रोत्साहन की आवश्यकता से आप परे हैं, तब सम्भवतः आपका हृदय पाप के धूर्त छल-पूर्णता का शिकार बन चुका है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दाऊद, परमेश्वर के मन के अनुसार पुरुष था। वह एक महान् योद्धा था। निस्संदेह, वह ताकत और बुद्धि और धर्मशास्त्रीय समझ में योनातन से श्रेष्ठ था। लेकिन पद 16 कहता है कि योनातन गया और उसका हाथ परमेश्वर में दृढ़ बनाया (मजबूत किया)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी भी मत सोचिये कि एक व्यक्ति इतना मजबूत है कि उसे परमेश्वर में मजबूत किये जाने की आवश्यकता नहीं है। और कभी भी मत सोचिये कि कोई व्यक्ति आपसे इतना ऊपर है कि उसे बल देने के लिए आप परमेश्वर के औज़ार नहीं हो सकते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
’चार्ल्स् स्पर्जन’ ने अनेक मसीही अगुवों के लिए कहा, जब उसने लिखा, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; कुछ साल पहिले, मैं आत्मा की भयावह उदासी का शिकार था। विभिन्न समस्याकारक घटनाएँ मेरे साथ घटित हुईं; मैं बीमार भी था, और मेरा दिल मेरे अन्दर डूब गया था। उन गहराईयों में से प्रभु को पुकारने को मैं बाध्य था। इससे पूर्व कि मैं आराम के लिए ’मैन्टोन’ जाऊं, मैंने शरीर में बहुत तकलीफ़ उठाई, लेकिन उससे भी अधिक प्राण में, क्योंकि मेरा आत्मा व्याकुल था। इस दबाव के नीचे, मैंने इन शब्दों में से एक उपदेश दिया, ‘‘हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?’’ उस मूल-पाठ में से प्रचार करने के लिए मैं उतना ही योग्य था जितना कि मैं कभी होने की आशा कर सकता हूँ&amp;amp;nbsp;; अवश्य ही, मैं आशा करता हूँ कि मेरे कुछ भाई, उन हृदय तोड़नेवाले शब्दों में उतनी गहराई से प्रवेश कर सके होंगे। मैंने अपनी पूरी माप में, परमेश्वर द्वारा त्याग दी गई एक आत्मा के भय की अनुभूति की। अब, वो एक इच्छित अनुभव नहीं था। प्राण के उस ‘ग्रहण’ में से दोबारा गुजरने के विचार मात्र से ही मैं काँप जाता हूँ; मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं कभी भी उस तरह से दुःख न उठाऊं। (ऑटोबायोग्राफी, ग्रन्थ-2, पृ. 415) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इसका उल्लेख किया कि मूल बात पर वापिस आऊं कि बड़े से बड़ा सन्त/भक्त, सर्वाधिक पराक्रमी योद्धा भी, परमेश्वर में उनके हाथों को बल प्रदान किये जाने की आवश्यकता से ऊपर नहीं हैं। वास्तव में, उन पर शैतान के आक्रमण, उनकी आवश्यकता को और भी बड़ा बना सकते हैं। अतः मूल-पाठ में से हमारी पहिली शिक्षा है कि प्रतिदिन के प्रोत्साहन की आपकी आवश्यकता से, आप कभी भी अधिक बढ़ नहीं जाते। गहरे से गहरा सन्त और सर्वाधिक मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथ मजबूत बनाये जाने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. एक सचेतन प्रयास''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी शिक्षा ये है कि परमेश्वर में एक व्यक्ति के हाथ मजबूत बनाये जाने में सचेतन प्रयास सम्मिलित रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अभिप्राय-सहित है। आप इसे हवा में नहीं करते; आप उठते हैं और होरेश को जाते हैं। पद 16:- ‘‘शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारी कलीसिया में ये कितना अन्तर ले आयेगा यदि, जब हम सब प्रातः उठें, हम किसी के हाथ को परमेश्वर में मजबूत बनाने की योजना बनायें! योनातन, दाऊद से होरेश में संयोगवश नहीं मिला (यद्यपि कभी-कभी वैसा होता है!)। उसने योजना बनाया कि उसके पास जाये और उसे बल प्रदान करे। मसीही परिपक्वता का ये चिन्ह है कि परमेश्वर में किसी का हाथ मजबूत बनाने के लिए आप अपने जीवन में ध्येय और अवसर निर्मित करते हैं। आज, आप किसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाने जा रहे हैं? इस सप्ताह? विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता इस तरह से करने के लिए क्या आपके पास प्रतिबद्ध (जान-बूझकर/साभिप्राय) साथियों का एक झुण्ड है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं मैमवोर्स ऑफ सैमुएल परसी पढ़ रहा था, पासवानों के छोटे समूह में से एक, जिसने 1792 में प्रथम ‘बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी’ की स्थापना की। अन्य लोगों में ‘जॉन रेलैण्ड’ और ‘जॉन सुटक्लिफ’ और ‘एन्ड्रयू फुलर’ और ‘सैमुएल परसी’ और ‘विलियम कैरी’ थे। अन्य सब बातों से बढ़कर, हाल ही में एक चीज स्पष्ट दिखायी दी है:- इन पुरुषों ने एक दूसरे से प्रेम किया और फिर आपस में मिले और एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए गम्भीरता से प्रतिबद्ध हुए। उन्होंने तब भी ऐसा किया जब वे एक दूसरे से बहुत दूर थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘सैमुएल परसी’ ने ‘विलियम कैरी’ से, जब वह इंडिया के लिए जा चुका था, उसके पहिले पत्र के लिए एक साल से अधिक प्रतीक्षा की। लेकिन जब यह आया, ये है जो उसने ‘कैरी’ को लिखा, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; जो विवरण आपने हमें दिया, उसने हमें नयी ताकत से प्रेरणा दी, और प्रभु में हमारे हाथों को बहुत मजबूत बनाया। हमने पढ़ा, और रोये, और स्तुति की, और प्रार्थना की। ओह, कौन किन्तु केवल मसीही अनुभूति करता है, ऐसे आनन्द जो हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता के साथ जुड़े हुए हैं? (पृ. 58) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या वो एक महान् वाक्यांश नहीं है:- ‘‘हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस चीज के लिए मैं आज सुबह वास्तव में याचना कर रहा हूँ, वो है कि आप सभी यीशु मसीह के लिए मित्रता बनायें-- कि आपके पास, परस्पर सहमति के साथ, विश्वास में साथियों का एक झुण्ड हो, कि आप आशा और बल के लिए एक दूसरे को निरन्तर यीशु मसीह की ओर इंगित करते रहेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. परमेश्वर में एक दूसरे को बल प्रदान करना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये एक तीसरी शिक्षा है। वो ताकत जो हमें एक दूसरे को देना है, परमेश्वर में बल है, हमारे अपने में नहीं। पद 16 ये नहीं कहता कि योनातन होरेश तक चल कर गया कि दाऊद का आत्म-विश्वास मजबूत करे। उसने ऐसा नहीं किया। ये कहता है कि वह उठा और दाऊद के पास होरेश को गया, और परमेश्वर में उसके हाथ को मजबूत बनाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीही अन्तरंग-मैत्री और अन्य सभी सहारा-समूह व चिकित्सा-समूह और आत्म-सहायता-समूहों में यही अन्तर है। मसीही अन्तरंग-मैत्री का सम्पूर्ण सार है कि सहायता और बल के लिए एक-दूसरे को, मनुष्य नहीं, मसीह की ओर इंगित करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ एक प्रकार का विरोधाभासी कथन है:- एक ओर मैं आपसे कहता हूँ कि, मुझे आपकी आवश्यकता है। परमेश्वर ने आपको अनुग्रह के एक माध्यम के रूप में नियुक्त किया है कि अन्त तक धीरज धरे रहने में मेरी सहायता करें। किन्तु दूसरी ओर, मुझे अवश्य कहना चाहिए कि जिस तरह से आप वास्तव में मेरी सहायता कर सकते हैं, वो है कुछ कहने या करने के द्वारा जो मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहने को प्रेरित करे और आप पर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ हम पुनः अपने सर्वाधिक सामान्य विषय के साथ हैं:- सब जो हम करते हैं, उसमें मूलभूत परमेश्वर-केन्द्रिता, यहाँ तक कि हमारी मानवीय एकता, हमारी अन्तरंग-मित्रता, हमारी मित्रता। अवश्य है कि यह मित्रता यीशु के लिए हो। प्रत्येक मसीही समूह जो विद्यमान है, अवश्य है कि एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए विद्यमान रहे और मनुष्य में नहीं। हमारे मूल-पाठ में वो तीसरी शिक्षा है:- ‘‘योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं स्मरण दिलाना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, उसने यह कैसे किया? हम इसे कैसे करते हैं? योनातन ने कहा (पद 17):- ‘‘मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योनातन कैसे जानता था कि दाऊद इस्राएल के ऊपर राजा होगा? वे गहरे मित्र थे और इसलिए ये कल्पना करना कठिन है कि दाऊद ने योनातन को अध्याय 16 की घटना के बारे में नहीं बताया होगा, जब शमूएल भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के ऊपर राजा होने के लिए, एक बालक के रूप में दाऊद का अभिषेक किया था। अतः जिस तरीके से योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया, वो था उसे एक प्रतिज्ञा स्मरण दिलाकर जो परमेश्वर ने की थी (1 शमूएल 16: 12)। शाऊल, दाऊद के विरोध में सफल न हो सका क्योंकि परमेश्वर उसकी ओर था। अतः परमेश्वर की योजना में उसकी नियति स्मरण दिलाने के द्वारा, योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यही हमारे साथ है। एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बारे में स्मरण दिलाने के द्वारा जो विशेषतया एक दूसरे की आवश्यकताओं से मेल खाती हैं, हम परमेश्वर में एक-दूसरे के हाथों को मजबूत करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको अपने मित्रों से क्या सुनने की आवश्यकता होती यदि आप ‘विलियम कैरी’ होते, घर से 15,000 मील दूर, लाखों अविश्वासियों से घिरे हुए, एक साथी के संग विश्वास की लड़ाई लड़ते हुए? आपको कुछ ऐसे की आवश्यकता होती, ‘सैमुएल परसी’ के शब्द, एक बहुमूल्य मित्र जो जानता था कि ‘कैरी’ का हाथ परमेश्वर में कैसे मजबूत करे। सुनिये कि अक्टूबर 4, 1794 के इस पत्र को, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ कैसे संतृप्त करती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भाई, मैं आपके बाजू में खड़े होने और उस आक्रमण के सभी चढ़ाव-उतार में प्रतिभागी होने को लालायित हूँ--एक आक्रमण जिसे और कुछ भी नहीं केवल कायरता असफल बना सकती है। हाँ, हमारे उद्धार का ‘कप्तान’, हमारे आगे चलता है। कभी-कभी वह अपनी उपस्थिति छुपा सकता है (किन्तु उसकी सामर्थ्य नहीं) कि हमारे आत्मिक शास्त्रों और स्वर्गिक हथियारों के साथ हमारी बहादुरी को परखे। ओह, मसीही योद्धा के लिए एक जीवित विश्वास क्या नहीं कर सकता! यह ‘छुड़ानेवाले’ को आकाशों में से ले आयेगा; ये उसे ऐसे सजायेगा जैसे कि लोहू में डुबोये गये वस्त्र से; ये उसे युद्ध में सामने खड़ा करेगा, और हमारे मुंह में एक नया गीत डालेगा-- ‘‘ये मेम्ने से लड़ेंगे; और मेम्ना उनपर जय पाएगा।’’ हाँ, ‘वह’ पाएगा--इससे पूर्व कि हम युद्ध-क्षेत्र में प्रवेश करें, विजय सुनिश्चित है; हमारे माथे को सुशोभित करने के लिए मुकुट पहिले ही से तैयार हैं, यहाँ तक कि वो महिमा का मुकुट जो मुर्झाता नहीं, और हमने पहिले ही प्रस्तावित कर लिया है कि इसके साथ क्या करें--हम इसे ‘जयवन्त’ के चरणों में डाल देंगे, और कहेंगे, ‘‘हमें नहीं, ओ प्रभु, हम पर नहीं, वरन् आपके नाम को महिमा दीजिये,’’ जबकि सम्पूर्ण स्वर्ग इस ‘कोरस’ में जुड़ जाता है, ‘‘मेम्ना ही योग्य है।’’ (मैमवॉर, पृ. 66) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक है, कि हम सभी के पास उस प्रकार के शब्दों के साथ अपने साथियों को बल देने के लिए वरदान नहीं है। लेकिन यदि आप अपने दिमाग को परमेश्वर में वचन में तल्लीन कर दें और दिन-रात उसपर मनन करें, जैसा कि भजन 1 कहता है, तब आप जीवन के जल का एक सोता होंगे और अनेक लोगों के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायेंगे। आज सुबह आपके लिए परमेश्वर की बुलाहट है:- आओ, हम एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायें! आमीन।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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		<title>एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत करो</title>
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				<updated>2015-08-03T20:46:52Z</updated>
		
		<summary type="html">&lt;p&gt;Pcain: नया पृष्ठ: {{info|Strengthen Each Other's Hands in God}}   &amp;amp;gt; और दाऊद ने जान लिया कि शाऊल मेरे प्राण की खोज ...&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;{{info|Strengthen Each Other's Hands in God}} &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; और दाऊद ने जान लिया कि शाऊल मेरे प्राण की खोज में निकला है। और दाऊद जीप नाम जंगल के होरेश नाम स्थान में था; कि शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)। उस ने उस से कहा, मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है। तब उन दोनों ने यहोवा की शपथ खाकर आपस में वाचा बान्धी; तब दाऊद होरेश में रह गया, और योनातन अपने घर चला गया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज का संदेश, विगत रविवार को इफिसियों की पत्री से आरम्भ की गई श्रंखला में, एक क्रमभंग है। क्रमभंग का कारण वो गहरी क़ायलियत है जो हम ‘बैतलेहेम’ के सभी सदस्यों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता के बारे में अनुभूति करते हैं कि किसी प्रकार के छोटे समूह का हिस्सा हों जहाँ आप विश्वास की लड़ाई (कुश्ती) को लड़ने के लिए एक दूसरे की सहायता करते हैं। अतः आज हमारी एकाग्रता, परमेश्वर में एक दूसरे के हाथों को मजबूत बनाने पर है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम विश्वास करते हैं कि सनातन सुरक्षा एक सामुदायिक परियोजना है। हम विश्वास करते हैं कि सन्तों द्वारा धीरज से सहना, एक सामूहिक जिम्मेदारी है। उसी प्रेमी प्रभु ने जिसने कहा, ‘‘मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूं, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं। और मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूं, और वे कभी नाश न होंगी, और कोई उन्हें मेरे हाथ से छीन न लेगा (यूहन्ना 10: 27-28), यह भी कहा, ‘‘जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा (मत्ती 24: 13)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे शब्दों में, जो परमेश्वर से जन्मे हैं वे यीशु के हाथ में सनातन के लिए सुरक्षित हैं। और वे जो परमेश्वर से जन्मे हैं उन्हें अन्त तक धीरज धरना चाहिए ताकि अन्ततः उद्धार पायें। और इस कारण प्रश्न उठता है:- परमेश्वर ने कैसे ठहराया है कि उसके लोगों को अन्त तक विश्वास में बनाये रखे ताकि ‘वह’ अचूक रूप से उस प्रतिज्ञा को पूरी कर सके कि वे सुरक्षित हैं और यह कि उनमें से एक भी नहीं खोयेगा? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आज प्रातः हम उस प्रश्न के उत्तर के एक कठिन भाग पर ध्यान एकाग्र कर रहे हैं:- यथा, परमेश्वर ने यह ठहराया है कि हम अन्य विश्वासियों से इस प्रकार सम्बन्धित रहें कि हम विश्वास की लड़ाई दिन-प्रतिदिन और अन्त तक सफलतापूर्वक लड़ने में, एक दूसरे की सहायता कर सकें। इस उत्तर का बाइबिल-शास्त्रीय आधार, इब्रानियों 3: 12-14 है, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; हे भाइयो, चैकस रहो, कि तुम में ऐसा बुरा और अविश्वासी मन न हो, जो जीवते परमेश्वर से दूर हट जाए। बरन जिस दिन तक ‘‘आज’’ का दिन कहा जाता है, हर दिन एक दूसरे को समझाते रहो, ऐसा न हो, कि तुम में से कोई जन पाप के छल में आकर कठोर हो जाए। क्योंकि हम मसीह के भागी हुए हैं, यदि हम अपने प्रथम भरोसे पर अन्त तक दृढ़ता से स्थिर रहें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
परमेश्वर ने एक साधन/उपाय नियुक्त किया है जिसके द्वारा ‘वह’ हमें हमारे भरोसे को अन्त तक दृढ़ता से थामे रहने के योग्य बनायेगा। ये यह है:- उस प्रकार के मसीही सम्बन्ध विकसित कीजिये जिसमें आप, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को दृढ़ता से थामे रहने में और पाप की छल-पूर्णता से बचने में, एक दूसरे की सहायता करते हैं। दृढ़ता से खड़े रहने और परमेश्वर के सारे हथियार पहनने के लिए, दिन-प्रतिदिन एक दूसरे को प्रोत्साहित कीजिये। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== मसीहियों के एक झुण्ड का एक हिस्सा बने रहिये ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बच्चो, किशोरो, नौजवानो, कॉलेज के छात्रगणो, कुंवारो, विवाहित जोड़ो, विधवाओ, विधुरो! क्या आप मसीही मित्रों के एक झुण्ड का हिस्सा हैं जिसने आपस में प्रण किया है कि विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करेंगे और एक दूसरे को पाप के धूर्त अनाधिकार-प्रवेश से बचायेंगे? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं यह नहीं कहता कि एक सुसंगठित छोटे समूह के न होने पर आप उद्धार नहीं पा सकते। लेकिन मैं अवश्य कहता हूँ, और मैं विश्वास करता हूँ कि यह परमेश्वर का वचन है, कि यदि आपके पास विश्वास में ऐसे अन्तरंग-साथियों का समूह नहीं है, तब आप, आपके संरक्षण और विश्वास में बने रहने के लिए परमेश्वर द्वारा नियुक्त किये गए एक साधन, की उपेक्षा कर रहे हैं। और अनुग्रह के साधन की उपेक्षा करना, आपके प्राण के लिए बहुत ख़तरनाक है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः, आज प्रातः मेरा लक्ष्य बहुत सरल है:- आपको प्रेरित करूं कि मसीहियों के किसी छोटे झुण्ड का हिस्सा बन जाइये, जहाँ आप, दिन-प्रतिदिन विश्वास की लड़ाई लड़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकें और प्रोत्साहित हो सकें। संदेश के अन्त में, आपके प्रार्थना-सहित विचार करने के लिए, ‘पीटर नेल्सन’ छोटे समूहों के एक तन्त्र को संक्षिप्त में प्रस्तुत करेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== दाऊद के साथ योनातन की भेंट से चार शिक्षाएं ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मूल-पाठ, 1 शमूएल 23: 15-18 है। विश्वास की सदा जारी रहने वाली लड़ाई में क्या होने की आवश्यकता है, यह इसका एक सरल और गम्भीर दृष्टान्त है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
शाऊल के मार्ग से दूर रहने का प्रयास करते हुए, दाऊद, यरूशलेम के दक्षिण में लगभग 30 मील की दूरी पर स्थित जीप के जंगल में, एक जगह से दूसरी जगह जा रहा है। शाऊल, इस्राएल का राजा, दाऊद को मार डालना चाहता है क्योंकि वह सोचता है कि सिंहासन के लिए वह एक ख़तरनाक प्रतिद्वन्दी है। योनातन, शाऊल का पुत्र, दाऊद से प्रीति रखता है और सुनता है कि वह जीप के जंगल में है, और परमेश्वर में उसके हाथ मजबूत करने के लिए वहाँ जाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योनातन और दाऊद के बीच ये भेंट, विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता करने के बारे में कम से कम चार पाठ समझाता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''1. मसीही सखापन (अन्तरंग-मैत्री) के लिए हर एक की आवश्यकता''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सर्वाधिक गहरे सन्तगण और सबसे मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथों को मजबूत करने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है। दाऊद गहरा था, दाऊद मजबूत था, और दाऊद को योनातन की आवश्यकता थी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीही अन्तरंग-मैत्री, मात्र नये रंगरूटों (नयी भर्ती) के लिए नहीं है। यह प्रत्येक विश्वासी के लिए है। अन्य मसीहियों की सेवकाई की आवश्यकता से बाहर, हम कभी भी विकास नहीं करते। यदि आप सोचते हैं कि विश्वास की लड़ाई में प्रतिदिन प्रोत्साहन की आवश्यकता से आप परे हैं, तब सम्भवतः आपका हृदय पाप के धूर्त छल-पूर्णता का शिकार बन चुका है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दाऊद, परमेश्वर के मन के अनुसार पुरुष था। वह एक महान् योद्धा था। निस्संदेह, वह ताकत और बुद्धि और धर्मशास्त्रीय समझ में योनातन से श्रेष्ठ था। लेकिन पद 16 कहता है कि योनातन गया और उसका हाथ परमेश्वर में दृढ़ बनाया (मजबूत किया)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कभी भी मत सोचिये कि एक व्यक्ति इतना मजबूत है कि उसे परमेश्वर में मजबूत किये जाने की आवश्यकता नहीं है। और कभी भी मत सोचिये कि कोई व्यक्ति आपसे इतना ऊपर है कि उसे बल देने के लिए आप परमेश्वर के औज़ार नहीं हो सकते। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
’चार्ल्स् स्पर्जन’ ने अनेक मसीही अगुवों के लिए कहा, जब उसने लिखा, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; कुछ साल पहिले, मैं आत्मा की भयावह उदासी का शिकार था। विभिन्न समस्याकारक घटनाएँ मेरे साथ घटित हुईं; मैं बीमार भी था, और मेरा दिल मेरे अन्दर डूब गया था। उन गहराईयों में से प्रभु को पुकारने को मैं बाध्य था। इससे पूर्व कि मैं आराम के लिए ’मैन्टोन’ जाऊं, मैंने शरीर में बहुत तकलीफ़ उठाई, लेकिन उससे भी अधिक प्राण में, क्योंकि मेरा आत्मा व्याकुल था। इस दबाव के नीचे, मैंने इन शब्दों में से एक उपदेश दिया, ‘‘हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?’’ उस मूल-पाठ में से प्रचार करने के लिए मैं उतना ही योग्य था जितना कि मैं कभी होने की आशा कर सकता हूँ&amp;amp;nbsp;; अवश्य ही, मैं आशा करता हूँ कि मेरे कुछ भाई, उन हृदय तोड़नेवाले शब्दों में उतनी गहराई से प्रवेश कर सके होंगे। मैंने अपनी पूरी माप में, परमेश्वर द्वारा त्याग दी गई एक आत्मा के भय की अनुभूति की। अब, वो एक इच्छित अनुभव नहीं था। प्राण के उस ‘ग्रहण’ में से दोबारा गुजरने के विचार मात्र से ही मैं काँप जाता हूँ; मैं प्रार्थना करता हूँ कि मैं कभी भी उस तरह से दुःख न उठाऊं। (ऑटोबायोग्राफी, ग्रन्थ-2, पृ. 415) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने इसका उल्लेख किया कि मूल बात पर वापिस आऊं कि बड़े से बड़ा सन्त/भक्त, सर्वाधिक पराक्रमी योद्धा भी, परमेश्वर में उनके हाथों को बल प्रदान किये जाने की आवश्यकता से ऊपर नहीं हैं। वास्तव में, उन पर शैतान के आक्रमण, उनकी आवश्यकता को और भी बड़ा बना सकते हैं। अतः मूल-पाठ में से हमारी पहिली शिक्षा है कि प्रतिदिन के प्रोत्साहन की आपकी आवश्यकता से, आप कभी भी अधिक बढ़ नहीं जाते। गहरे से गहरा सन्त और सर्वाधिक मजबूत अगुवों को, परमेश्वर में उनके हाथ मजबूत बनाये जाने के लिए साथियों की आवश्यकता होती है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''2. एक सचेतन प्रयास''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरी शिक्षा ये है कि परमेश्वर में एक व्यक्ति के हाथ मजबूत बनाये जाने में सचेतन प्रयास सम्मिलित रहता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये अभिप्राय-सहित है। आप इसे हवा में नहीं करते; आप उठते हैं और होरेश को जाते हैं। पद 16:- ‘‘शाऊल का पुत्र योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हमारी कलीसिया में ये कितना अन्तर ले आयेगा यदि, जब हम सब प्रातः उठें, हम किसी के हाथ को परमेश्वर में मजबूत बनाने की योजना बनायें! योनातन, दाऊद से होरेश में संयोगवश नहीं मिला (यद्यपि कभी-कभी वैसा होता है!)। उसने योजना बनाया कि उसके पास जाये और उसे बल प्रदान करे। मसीही परिपक्वता का ये चिन्ह है कि परमेश्वर में किसी का हाथ मजबूत बनाने के लिए आप अपने जीवन में ध्येय और अवसर निर्मित करते हैं। आज, आप किसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाने जा रहे हैं? इस सप्ताह? विश्वास की लड़ाई लड़ने में एक दूसरे की सहायता इस तरह से करने के लिए क्या आपके पास प्रतिबद्ध (जान-बूझकर/साभिप्राय) साथियों का एक झुण्ड है? &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं मैमवोर्स ऑफ सैमुएल परसी पढ़ रहा था, पासवानों के छोटे समूह में से एक, जिसने 1792 में प्रथम ‘बैपटिस्ट मिशनरी सोसाइटी’ की स्थापना की। अन्य लोगों में ‘जॉन रेलैण्ड’ और ‘जॉन सुटक्लिफ’ और ‘एन्ड्रयू फुलर’ और ‘सैमुएल परसी’ और ‘विलियम कैरी’ थे। अन्य सब बातों से बढ़कर, हाल ही में एक चीज स्पष्ट दिखायी दी है:- इन पुरुषों ने एक दूसरे से प्रेम किया और फिर आपस में मिले और एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए गम्भीरता से प्रतिबद्ध हुए। उन्होंने तब भी ऐसा किया जब वे एक दूसरे से बहुत दूर थे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
‘सैमुएल परसी’ ने ‘विलियम कैरी’ से, जब वह इंडिया के लिए जा चुका था, उसके पहिले पत्र के लिए एक साल से अधिक प्रतीक्षा की। लेकिन जब यह आया, ये है जो उसने ‘कैरी’ को लिखा, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; जो विवरण आपने हमें दिया, उसने हमें नयी ताकत से प्रेरणा दी, और प्रभु में हमारे हाथों को बहुत मजबूत बनाया। हमने पढ़ा, और रोये, और स्तुति की, और प्रार्थना की। ओह, कौन किन्तु केवल मसीही अनुभूति करता है, ऐसे आनन्द जो हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता के साथ जुड़े हुए हैं? (पृ. 58) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्या वो एक महान् वाक्यांश नहीं है:- ‘‘हमारे प्रिय प्रभु यीशु मसीह के लिए मित्रता।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस चीज के लिए मैं आज सुबह वास्तव में याचना कर रहा हूँ, वो है कि आप सभी यीशु मसीह के लिए मित्रता बनायें-- कि आपके पास, परस्पर सहमति के साथ, विश्वास में साथियों का एक झुण्ड हो, कि आप आशा और बल के लिए एक दूसरे को निरन्तर यीशु मसीह की ओर इंगित करते रहेंगे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''3. परमेश्वर में एक दूसरे को बल प्रदान करना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये एक तीसरी शिक्षा है। वो ताकत जो हमें एक दूसरे को देना है, परमेश्वर में बल है, हमारे अपने में नहीं। पद 16 ये नहीं कहता कि योनातन होरेश तक चल कर गया कि दाऊद का आत्म-विश्वास मजबूत करे। उसने ऐसा नहीं किया। ये कहता है कि वह उठा और दाऊद के पास होरेश को गया, और परमेश्वर में उसके हाथ को मजबूत बनाया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मसीही अन्तरंग-मैत्री और अन्य सभी सहारा-समूह व चिकित्सा-समूह और आत्म-सहायता-समूहों में यही अन्तर है। मसीही अन्तरंग-मैत्री का सम्पूर्ण सार है कि सहायता और बल के लिए एक-दूसरे को, मनुष्य नहीं, मसीह की ओर इंगित करें। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ एक प्रकार का विरोधाभासी कथन है:- एक ओर मैं आपसे कहता हूँ कि, मुझे आपकी आवश्यकता है। परमेश्वर ने आपको अनुग्रह के एक माध्यम के रूप में नियुक्त किया है कि अन्त तक धीरज धरे रहने में मेरी सहायता करें। किन्तु दूसरी ओर, मुझे अवश्य कहना चाहिए कि जिस तरह से आप वास्तव में मेरी सहायता कर सकते हैं, वो है कुछ कहने या करने के द्वारा जो मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहने को प्रेरित करे और आप पर नहीं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ हम पुनः अपने सर्वाधिक सामान्य विषय के साथ हैं:- सब जो हम करते हैं, उसमें मूलभूत परमेश्वर-केन्द्रिता, यहाँ तक कि हमारी मानवीय एकता, हमारी अन्तरंग-मित्रता, हमारी मित्रता। अवश्य है कि यह मित्रता यीशु के लिए हो। प्रत्येक मसीही समूह जो विद्यमान है, अवश्य है कि एक दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनाने के लिए विद्यमान रहे और मनुष्य में नहीं। हमारे मूल-पाठ में वो तीसरी शिक्षा है:- ‘‘योनातन उठकर उसके पास होरेश में गया, और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया (अंग्रेजी में:- उसका हाथ परमेश्वर में मजबूत बनाया)।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
'''4. एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाएं स्मरण दिलाना''' &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्त में, उसने यह कैसे किया? हम इसे कैसे करते हैं? योनातन ने कहा (पद 17):- ‘‘मत डर; क्योंकि तू मेरे पिता शाऊल के हाथ में न पड़ेगा; और तू ही इस्राएल का राजा होगा; और मैं तेरे नीचे हूंगा; और इस बात को मेरा पिता शाऊल भी जानता है।’’ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
योनातन कैसे जानता था कि दाऊद इस्राएल के ऊपर राजा होगा? वे गहरे मित्र थे और इसलिए ये कल्पना करना कठिन है कि दाऊद ने योनातन को अध्याय 16 की घटना के बारे में नहीं बताया होगा, जब शमूएल भविष्यद्वक्ता ने इस्राएल के ऊपर राजा होने के लिए, एक बालक के रूप में दाऊद का अभिषेक किया था। अतः जिस तरीके से योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया, वो था उसे एक प्रतिज्ञा स्मरण दिलाकर जो परमेश्वर ने की थी (1 शमूएल 16: 12)। शाऊल, दाऊद के विरोध में सफल न हो सका क्योंकि परमेश्वर उसकी ओर था। अतः परमेश्वर की योजना में उसकी नियति स्मरण दिलाने के द्वारा, योनातन ने परमेश्वर में दाऊद का हाथ मजबूत किया। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
और यही हमारे साथ है। एक-दूसरे को परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं के बारे में स्मरण दिलाने के द्वारा जो विशेषतया एक दूसरे की आवश्यकताओं से मेल खाती हैं, हम परमेश्वर में एक-दूसरे के हाथों को मजबूत करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपको अपने मित्रों से क्या सुनने की आवश्यकता होती यदि आप ‘विलियम कैरी’ होते, घर से 15,000 मील दूर, लाखों अविश्वासियों से घिरे हुए, एक साथी के संग विश्वास की लड़ाई लड़ते हुए? आपको कुछ ऐसे की आवश्यकता होती, ‘सैमुएल परसी’ के शब्द, एक बहुमूल्य मित्र जो जानता था कि ‘कैरी’ का हाथ परमेश्वर में कैसे मजबूत करे। सुनिये कि अक्टूबर 4, 1794 के इस पत्र को, परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ कैसे संतृप्त करती हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;amp;gt; भाई, मैं आपके बाजू में खड़े होने और उस आक्रमण के सभी चढ़ाव-उतार में प्रतिभागी होने को लालायित हूँ--एक आक्रमण जिसे और कुछ भी नहीं केवल कायरता असफल बना सकती है। हाँ, हमारे उद्धार का ‘कप्तान’, हमारे आगे चलता है। कभी-कभी वह अपनी उपस्थिति छुपा सकता है (किन्तु उसकी सामर्थ्य नहीं) कि हमारे आत्मिक शास्त्रों और स्वर्गिक हथियारों के साथ हमारी बहादुरी को परखे। ओह, मसीही योद्धा के लिए एक जीवित विश्वास क्या नहीं कर सकता! यह ‘छुड़ानेवाले’ को आकाशों में से ले आयेगा; ये उसे ऐसे सजायेगा जैसे कि लोहू में डुबोये गये वस्त्र से; ये उसे युद्ध में सामने खड़ा करेगा, और हमारे मुंह में एक नया गीत डालेगा-- ‘‘ये मेम्ने से लड़ेंगे; और मेम्ना उनपर जय पाएगा।’’ हाँ, ‘वह’ पाएगा--इससे पूर्व कि हम युद्ध-क्षेत्र में प्रवेश करें, विजय सुनिश्चित है; हमारे माथे को सुशोभित करने के लिए मुकुट पहिले ही से तैयार हैं, यहाँ तक कि वो महिमा का मुकुट जो मुर्झाता नहीं, और हमने पहिले ही प्रस्तावित कर लिया है कि इसके साथ क्या करें--हम इसे ‘जयवन्त’ के चरणों में डाल देंगे, और कहेंगे, ‘‘हमें नहीं, ओ प्रभु, हम पर नहीं, वरन् आपके नाम को महिमा दीजिये,’’ जबकि सम्पूर्ण स्वर्ग इस ‘कोरस’ में जुड़ जाता है, ‘‘मेम्ना ही योग्य है।’’ (मैमवॉर, पृ. 66) &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ठीक है, कि हम सभी के पास उस प्रकार के शब्दों के साथ अपने साथियों को बल देने के लिए वरदान नहीं है। लेकिन यदि आप अपने दिमाग को परमेश्वर में वचन में तल्लीन कर दें और दिन-रात उसपर मनन करें, जैसा कि भजन 1 कहता है, तब आप जीवन के जल का एक सोता होंगे और अनेक लोगों के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायेंगे। आज सुबह आपके लिए परमेश्वर की बुलाहट है:- आओ, हम एक-दूसरे के हाथों को परमेश्वर में मजबूत बनायें! आमीन।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Pcain</name></author>	</entry>

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